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समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।

पुरखे बताते थे महिलाओं की चड्डी का रंग, ग्रामीण-गरीब महिला आकर्षक नहीं होती; आज ‘सपोले’ बता रहे सपा सबसे बड़ी महिला हितैषी: अखिलेश यादव गैंग से दोगले भी लजाए


लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने शुक्रवार (16 अप्रैल 2026) को कहा कि समाजवादी पार्टी महिलाओं का सबसे अधिक सम्मान करने वाली पार्टी है। उन्होंने दावा किया कि सपा महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और हक की सबसे बड़ी हितैषी रही है। लेकिन जैसे ही यह दावा सदन में गूँजा, सत्ता पक्ष की बेंचों से हंसी की लहर उठी। ये बयान उन्होंने उस समय दिया, जब संसद में नारी शक्ति वंदन (संसोधन) अधिनियम 2026 पर चर्चा चल रही थी। महिला आरक्षण से जुड़ा ये बिल लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सपा, डीएमके, कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने इसका खुला विरोध किया।

 बहरहाल, धर्मेंद्र यादव ने जब सपा को सबसे बड़ी महिला हितैषी पार्टी बताया, उसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर पुरानी खबरें, न्यायालय के फैसले और उन दिनों की रिपोर्ट्स वायरल हो गईं। लोग पूछने लगे कि क्या सचमुच सपा महिलाओं की हितैषी है? या फिर यह सिर्फ एक राजनैतिक चेहरा है, जिसके पीछे 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश की महिलाओं की जो दर्दनाक हालत थी, वह आज भी काले धब्बे की तरह सपा के चेहरे पर चिपकी हुई है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) और ह्यूमन राइट्स कमीशन की रिपोर्ट्स इस सवाल का जवाब साफ-साफ देती हैं। 2012-2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में महिला अपराधों का आँकड़ा चौंकाने वाला रहा। साल 2012 में राज्य में बलात्कार के 1963 मामले दर्ज हुए थे। 2013 में यह संख्या अचानक बढ़कर 3050 हो गई, यानी महज एक साल में 55 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी। कुल महिला अपराध (क्राइम अगेंस्ट वुमेन) 2013 में 32,546 रहे।

साल 2014 में यह संख्या 38,467 तक पहुँच गई। इसके बाद तो 2016 और 2017 में यूपी पूरे देश में महिला अपराधों में सबसे ऊपर रहा। साल 2017 में अकेले यूपी में 56,011 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल महिला अपराधों का बड़ा हिस्सा था। एनसीआरबी के मुताबिक, उस दौरान यूपी न सिर्फ कुल संख्या में टॉप पर था, बल्कि बलात्कार, अपहरण, दहेज हत्या और छेड़छाड़ जैसे मामलों में भी अग्रणी रहा।

इटावा की घटना है जंगलराज की गवाह

ये आँकड़े सिर्फ कागज पर नहीं थे। ये असल जिंदगियों के टूटने की कहानियाँ थीं। अखिलेश यादव के गृह जिले इटावा में यादवों का आतंक ऐसा था कि बच्चियाँ और महिलाएँ अकेले घर से बाहर निकलने से काँपती थीं। गाँवों में दबंगों का राज था। पुलिस निष्क्रिय थी। न्याय की उम्मीद खत्म हो चुकी थी।

इसी दरमियान 11 मई 2014 को इटावा के सिविल लाइन थाना क्षेत्र के गौरापुरा गाँव में 15 साल की नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना ने पूरे प्रदेश को शर्मसार कर दिया। मुख्य आरोपित सनी यादव (शादीशुदा) ने पीड़िता के घर घुसकर उसके साथ दुष्कर्म किया। लड़की ने रोते-रोते अपनी माँ को बताया। पीड़िता की माँ ने तुरंत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने सनी यादव को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन यहीं से दबाव शुरू हुआ।

आरोपित के परिवार ने पीड़िता की माँ पर केस वापस लेने का भारी दबाव बनाया। धमकियाँ दी गईं कि अगर जुबान खोली तो बेटी जैसा हाल किया जाएगा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हालाँकि इसके बाद जब वो शौच के लिए खेत में गईं, तो उन्हें खेत में ही घेर लिया गया। आरोपित के पिता बसंतलाल यादव और उसके साथियों ने उसे निर्वस्त्र कर दिया। धारदार हथियारों से लहूलुहान कर दिया। महिला को गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया।

उस समय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और इटावा उनका पैतृक जिला। फिर भी दबंगों का साहस ऐसा था कि किसी की परवाह नहीं की। पीड़िता की माँ की चीखें आज भी यूपी की महिलाओं के मन में गूंजती हैं, क्या वो राज्य की सरकार थी या सपा का जंगलराज था?

मुलायम सिंह यादव के बयानों को भूले तो नहीं?

इसी तरह की घटनाएँ सपा शासन में आम थीं। लेकिन सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बयानों ने महिलाओं के घावों पर नमक छिड़क दिया। अप्रैल 2014 में बदायूँ में दो बहनों के साथ गैंगरेप और हत्या के बाद मुलायम ने मुरादाबाद में कहा, “लड़कियाँ पहले दोस्ती करती हैं। फिर लड़के-लड़की में मतभेद हो जाता है। वे इसे रेप का नाम दे देती हैं। लड़कों से गलती हो जाती है। क्या रेप केस में फाँसी दी जाएगी? लड़के हैं, नादानी में रेप हो जाता है।”

यह बयान पूरे देश में आग की तरह फैला। महिलाएँ सड़कों पर उतर आईं। लेकिन मुलायम ने पीछे हटने की बजाय और विवादित बयान दिए। अगस्त 2015 में उन्होंने कहा, “एक महिला से चार लोग रेप नहीं कर सकते। रेप तो एक ही आदमी करता है, लेकिन एफआईआर में चार लोगों के नाम लिख दिए जाते हैं, जो गलत है। यूपी में तो केवल दो फीसदी रेप होते हैं।” यही नहीं, जुलाई 2014 में उन्होंने कहा, “21 करोड़ की आबादी की तुलना में यूपी में कम रेप होते हैं।” और फिर नवंबर 2014 में बाराबंकी में उन्होंने कहा, “गाँव की गरीब महिलाएँ ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं।” उनके कहने का मतलब था कि गाँव की महिलाओं से कौन रेप करेगा?

आजम खान ने बताया था जयाप्रदा की चड्ढी का रंग

मुलायम के साथी सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान भी महिलाओं के अपमान में आगे रहे हैं। जयाप्रदा (तत्कालीन सपा सहयोगी) के बारे में उन्होंने कहा, “उनकी (जयाप्रदा की) चड्डी का रंग खाकी है।” यह टिप्पणी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में दी गई, लेकिन महिलाओं की गरिमा को तार-तार कर गई।

यही नहीं, इससे पहले साल 2010 में महिला आरक्षण बिल पर मुलायम ने कहा था कि यह बिल नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा। उन्होंने दावा किया कि बिल से सिर्फ बड़े घर की और शहर की लड़कियाँ फायदा उठाएँगी, गाँव की गरीब महिलाएँ तो आकर्षक नहीं होतीं। सपा ने 2010 में बिल का तीखा विरोध किया और सदन में हंगामा किया।

अखिलेश यादव ने भी बाद में ‘कोटा के भीतर कोटा’ की माँग करते हुए बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ओबीसी, दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण नहीं तो बिल अधूरा है। सपा की यह रणनीति महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को सुनिश्चित नहीं होने देने में अहम रही।

गायत्री प्रसाद प्रजापति केस में कोर्ट ने लगाई थी फटकार, उम्रकैद की सजा

सपा सरकार में मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भी गंभीर मामले सामने आए। गायत्री प्रसाद प्रजापति सपा सरकार में खनन मंत्री थे। 2017 में चित्रकूट की एक महिला ने शिकायत की कि प्रजापति ने अपने सरकारी आवास पर उसे और उसकी नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप किया। वीडियो बनाया और धमकाया। पुलिस ने कुछ नहीं किया।

पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। 2021 में लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने प्रजापति समेत दो अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने सरकारी पद का दुरुपयोग कर नाबालिग की गरिमा लूटी। पीड़िता की बेटी की आँखों में आज भी वह रात घूमती होगी, जब उसके घर का माहौल ही उसे सबसे बड़ा खतरा बन गया। वह सोचती होगी कि क्या मंत्री का पद इतना ताकतवर था कि न्याय भी चुप रह गया?

पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 केस, रेप केस में सजा

सपा के पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 2023 में भदोही की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें 2014 के बलात्कार मामले में 15 साल की सजा सुनाई। पीड़िता एक गायिका थीं। मिश्रा ने उन्हें कार्यक्रम के बहाने बुलाया और बार-बार बलात्कार किया। कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। आज वे आगरा सेंट्रल जेल में बंद हैं। इन मामलों ने सपा की ‘महिला हितैषी’ छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

अपने अतीत को सुधारे समाजवादी पार्टी

आज जब सपा के सांसद लोकसभा में महिलाओं का सम्मान करने का दावा करते हैं, तो पुरानी घटनाएँ और न्यायालय के फैसले उनकी पोल खोल देते हैं। सपा का इतिहास महिला आरक्षण का विरोध, विवादित बयानों और अपराधियों को संरक्षण देने का रहा है। 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित न हो पाने में सपा की भूमिका अहम रही। मुलायम और अखिलेश दोनों ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ को बहाना बनाया, लेकिन असल में इनकी मंशा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित रखने की रही।

ये घटनाएँ सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि उन माँ-बेटियों की चीखें हैं, जिन्हें सपा शासन ने कभी सुरक्षा नहीं दी। आज भी जब कोई सपा नेता महिलाओं का सम्मान करने का दावा करता है, तो इटावा की पीड़िता माँ-बेटी, चित्रकूट की नाबालिग और भदोही की गायिका की याद आ जाती है। सपा को अगर वाकई महिलाओं का सम्मान करना है, तो पहले अपने इतिहास का सामना करे।

क्या मुख़्तार अंसारी के साथ आतंक के अध्याय का भी अंत हो गया? ऐसा सोचना गलत है बेशक योगी का प्रयास चल रहा है

 सुभाष चन्द्र

कुछ लोगों का मत है कि मुख़्तार अंसारी की मौत से आतंक के अध्याय का भी अंत हो गया लेकिन एक दूसरा मत यह भी है कि बेशक योगी जी का अभियान चल रहा है आतंकी और माफियाओं को ख़त्म करने के लिए पर आतंक और माफिया कमजोर हो सकते हैं ख़त्म होने में काफी समय लगेगा, क्योकि जब तक भारत में कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां मुस्लिम तुष्टिकरण करती रहेंगी, शायद ख़त्म न भी हो। मुख़्तार की मौत पर विधवा विलाप उस समय कहाँ मर गए थे, जब इसने गुंडागर्दी का आतंक मचा उत्तर प्रदेश को दहलाया हुआ था। कितनी गोदें सुनी कर दी थी, ना जाने कितनी महिलाओं का सिंदूर मिटा दिया था। 

लेखक 
अतीक अहमद और अशरफ की मौत के बाद उनके गैंग के गुर्गे फिर से एक्टिव हैं 2 दिन पहले अतीक के बेटे अली अहमद समेत 8 लोगों पर बालू व्यापारी ने 10 लाख की रंगदारी मांगने का मामला दर्ज किया हैअतीक की बीवी शाइस्ता परवीन फरवरी से गायब है वो कहीं छुपी हुई कोई नेक काम तो कर नहीं रही होगी? अतीक गैंग के रहते आतंक कैसे ख़त्म माना जा सकता है 

फिर, मुख़्तार अंसारी के परिवार के कई सदस्यों पर मुक़दमे चल रहे हैं - 

-बीवी अफ़सा पर 11 मुक़दमे दर्ज हैं -  (धोखाधड़ी और गैंगस्टर एक्ट में);

-भाई सिबगतुल्ला पर 3 मुक़दमे हैं - (जानलेवा मामले);

-भाई अफजल पर 7 मुक़दमे;

-बेटे अब्बास के खिलाफ 8 मुक़दमे और पुत्रवधु निखत पर भी एक मुकदमा है;

-बेटे उमर पर 6 आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं

इसके अलावा मुख्तार अंसारी पर सुप्रीम कोर्ट भी मेहरबान रहा है उसके एक केस में  वर्षों के बाद मिली 7 साल की सजा पर सुप्रीम कोर्ट में रोक लगा दी और सजा सुनाने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस दिनेश कुमार सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया था जबकि वो वरीयता में बहुत पीछे थे यह भी याद रखना चाहिए कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में 12 जजों ने मुख़्तार के मामले में हाथ डालने से मना कर दिया था

एक केस में मुख़्तार और उसके भाई अफजाल की 4 साल की सजा में “दोषसिद्धि” पर रोक लगा कर संसद सदस्यता बहाल कर दी 

मुख़्तार अंसारी की मौत पर अखिलेश यादव बहुत बिलबिला रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि “सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में संदिग्ध मौतों की जांच होनी चाहिए हर किसी को सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है आज के समय में राज्य “सरकारी अराजकता” के दौर में चल रहा है” 

अखिलेश को मुख़्तार अंसारी बहुत प्रिय इसलिए था क्योंकि वह अखिलेश के पिता मुलायम सिंह का लाड़ला था जो 29 अगस्त, 2003 से 13 मई, 2007 तक मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह तो कारसेवकों पर गोलियां बरसाने वाले बदमाश CM थे, उन्होंने 2004 में डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह पर मुख़्तार के खिलाफ कार्रवाई करने पर मुकदमा दर्ज कर दिया था इसके अलावा 14 अक्टूबर, 2005 को मऊ में मुलायम राज में भयंकर दंगे कराए थे

अखिलेश और विपक्ष और मुख़्तार अंसारी के परिवार को योगी प्रशासन पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाने और मौत के लिए जिम्मेदार कहते हुए 10 बार सोचना चाहिए योगी जी यदि किसी विरोधी के लिए कुछ बुरा करना चाहते तो कोरोना काल में आजम खान कोरोना के इलाज के दौरान निपटा दिया गया होता लेकिन 2 बार बीमार होने पर भी उसे कुछ नुकसान नहीं हुआ

लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि मुख़्तार अंसारी की मौत का भी बखेड़ा खड़ा करके और उसे “शहीद’ साबित करते हुए अखिलेश और विपक्ष की नज़र “मुस्लिम वोटों” पर ही हैं

जब मुलायम सिंह यादव के भाषण के बाद बिजनौर में भड़के थे दंगे, हिन्दू महिलाएँ बनीं निशाना: 20+ मौतों का सरकारी आँकड़ा

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 10 अक्टूबर 2022 गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अंतिम साँस ली। उनके बेटे अखिलेश यादव ने ट्वीट कर उनके निधन के बारे में बताया। मुलायम सिंह के निधन के बाद लोग उनके भाषण और उनसे जुड़ी घटनाओं को याद कर रहे हैं। इस क्रम में उनका 1990 में बिजनौर में दिया गया भाषण भी चर्चा में है। इसके बाद बिजनौर में दंगा भड़क गया था। यहाँ कर्फ्यू लगा दिया गया। दंगे में 20 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। वाहनों को फूँक डाला गया। कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। एक सप्ताह से ज्यादा का कर्फ्यू लगा रहा।

लेखक दिव्य कुमार सोती ने सपा नेता के निधन पर ट्विटर पर लिखा, “नेताजी चमत्कारी भाषण देते थे। 30 अक्टूबर 1990 को बिजनौर में भाषण दिया। सीएम नेताजी का हेलीकाप्टर उड़ा और रैली से उत्साहित होकर लौटी समुदाय विशेष की भीड़ ने पूरे जिले पर हमला कर दिया। राम मंदिर को लेकर यात्रा निकाल रही महिलाएँ उठा ली गईं। सरकारी आँकड़ा 20 मौतों का है, वैसे 200 प्लस। नमन।” इसके साथ ही उन्होंने ”अमर उजाला में प्रकाशित बिजनौर दंगों की उस रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट भी साझा किया है। यह रिपोर्ट अगस्त 2020 में प्रकाशित की गई थी।

32 साल (9 अक्टूबर 1990) पहले बिजनौर के प्रदर्शनी मैदान में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की सभा का आयोजन किया गया था। मुलायम सिंह की सभा में ट्रकों के अलावा अन्य वाहनों में लदकर एक संप्रदाय के लोग आए थे। मुख्यमंत्री ने सभा के दौरान भाषण दिया था कि अयोध्या में उनके रहते परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। उन्होंने पूरी अयोध्या की किलेबंदी कर दी थी। उस वक्त राम मंदिर को लेकर पहले से ही माहौल गरम था। ऐसे में मुलायम के हेलीकॉप्टर से उड़ते ही बिजनौर में तनाव व्याप्त हो गया। सभा के बाद दोनों संप्रदाय के लोग कई जगहों पर आमने-सामने आ गए थे। सभा से लौटते हुए वहाँ जमकर पथराव हुआ। यह तनाव कई दिनों तक चलता रहा।

अवलोकन करें:-

निहत्ते रामभक्तों से खून की होली खेलने वाले मुलायम सिंह की राम नाम सत्य होने पर महान कैसे ?
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30 अक्टूबर 1990 को बड़ी तादाद में लोग बिजनौर के एक स्कूल में राम मंदिर आंदोलन के मुद्दे को लेकर इकट्ठा हुए थे। उसके बाद कलक्ट्रेट में ज्ञापन देने के लिए निकले थे। जैसे ही लोग बाजार में घुसे उन पर पथराव और गोलीबारी शुरू हो गई। बिजनौर में दंगा भड़क गया। बताया जाता है कि इसमें 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस दंगे को याद करके आज भी लोग सिहर उठते हैं।