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अखिलेश यादव सरकार में केवल मुसलमानों का कल्याण


उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति किसी से छिपी नहीं है। सपा ने खुद को हमेशा अल्पसंख्यकों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के बीच अपना जनाधार बनाए रखने के लिए पार्टी ने अपने विभिन्न कार्यकालों में अनेक योजनाओं के केंद्र बिंदु में मुस्लिमों को ही रखा। यहां तक कि कई योजनाओं तो उन्होंने सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही शुरू कीं। मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के कार्यकाल तक अल्पसंख्यक कल्याण को राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया। यही कारण है कि भाजपा सहित अन्य दल अक्सर समाजवादी पार्टी पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।

सपा ने चार कार्यकाल में मुस्लिमों में ही पहचान बनाई

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चार प्रमुख कार्यकालों में सत्ता में रही। मुलायम सिंह यादव 1989-91, 1993-95 और 2003-07 के बीच मुख्यमंत्री रहे, जबकि अखिलेश यादव ने 2012 से 2017 तक राज्य की कमान संभाली। इन अवधियों में मुस्लिम समुदाय की शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार, मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई योजनाएं लागू की गईं। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने अल्पसंख्यक कल्याण को अपनी राजनीति और शासन की केंद्रीय धुरी बनाए रखा। छात्रवृत्ति, मुस्लिम लड़कियों के लिए आर्थिक सहायता, मदरसा आधुनिकीकरण, उर्दू शिक्षा और आरक्षण की मांग जैसी पहलों ने मुस्लिम समुदाय के बीच पार्टी की मजबूत पहचान बनाई। दूसरी ओर, इन्हीं नीतियों को विपक्ष ने “मुस्लिम तुष्टिकरण” करार दिया।

कब्रिस्तानों की चारदीवारी योजना: वोट बैंक के लिए कब्जे 

अखिलेश यादव सरकार के सबसे चर्चित फैसलों में से एक राज्यभर के कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण था। वर्ष 2012-13 के बजट में इसके लिए विशेष प्रावधान किया गया। सरकार का तर्क था कि भूमि विवादों और अतिक्रमण को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए एक हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। विपक्ष ने इसे खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण बताया। यह योजना मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय रही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक इसका राजनीतिक प्रभाव देखने को मिला। सपा सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मो. आजम खां के पास था। उन्होंने ही कब्रिस्तानों की चारदीवारी के निर्माण की योजना चलाई। इस योजना पर पांच साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जबकि हकीकत यह है कि कई जिलों में योजना पर काम ही नहीं हुआ। जहां काम हुआ भी वहां भी घपले की शिकायतें हैं।

लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू शिक्षा और उर्दू सॉफ्टवेयर को बढ़ावा

अखिलेश यादव सरकार ने लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू सॉफ्टवेयर शामिल करने की घोषणा की। रामपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा था कि विद्यार्थियों को दिए जाने वाले लैपटॉप में हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराया जाएगा। मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे उर्दू भाषा के संरक्षण और डिजिटल युग में उसके विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना।

सच्चर समिति के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की पैरवी

दिसंबर 2012 में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सत्ता में आने पर सपा विधि विषेशज्ञों की राय लेकर केरल तथा आंध्र प्रदेश की तर्ज पर मुसलमानों को इतना आरक्षण देगी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे। हालांकि यह नीति पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच इसे सपा की राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

‘हमारी बेटी उसका कल’: मुस्लिम लड़कियों के लिए सबसे चर्चित योजना

10 दिसंबर 2012 को रामपुर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने “हमारी बेटी उसका कल” योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत हाईस्कूल उत्तीर्ण अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को 30,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाती थी। इसका उद्देश्य लड़कियों की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विवाह संबंधी सहायता देना था। योजना का सबसे बड़ा लाभ मुस्लिम छात्राओं को मिला। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। प्रारंभिक चरण में लगभग 14,000 लड़कियों को इसका लाभ मिला। बाद में यह संख्या और बढ़ी। सरकार ने इस योजना के लिए लगभग 250 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। “हमारी बेटी उसका कल” योजना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका तक दाखिल हुई थी।

 वोट बैंक को साधने के लिए 84 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में लगभग 84 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। सपा के 42 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी होकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में कुल 63 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे थे, जिनमें सबसे अधिक सपा के थे। 15 मार्च 2012 को बनी पहली अखिलेश यादव सरकार में कुल 48 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इनमें 9 मुस्लिम मंत्री शामिल थे।
प्रदेश में हज यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश सरकार ने हज यात्रियों की सुविधा के लिए लखनऊ हज हाउस और अन्य व्यवस्थाओं का विस्तार किया। हज प्रशिक्षण शिविरों, आवास और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दिया गया। गाजियाबाद में 1886 हज यात्रियों के रुकने के लिए बनाए गए हज हाउस में शासन ने 51.16 करोड़ रुपये खर्च किए। 11 साल में बनकर तैयार हुए इस हज हाउस शिलान्यास 30 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ¨सिंह ने किया था और उद्घाटन उनके पुत्र व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 5 सितंबर 2016 को किया। नगर विकास मंत्री आजम खान ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के हज पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए जाने के लिए व्यवस्था की गई है।

मुलायम से अखिलेश यादव तक आतंकियों को बचाने समाजवादी पार्टी की नापाक कोशिशें


समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।

तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं।

आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।

अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?

अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।

आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।

आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।

हिन्दू विरोधी समाजवादी पार्टी : मुलायम से अखिलेश तक मुसलमानों को खुश रखने हिन्दुओं को गोली और गाली

जिस पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह से लेकर वर्तमान सर्वेसर्वा अखिलेश यादव हिन्दू होते हुए जब सिर्फ सत्ता की खातिर मुस्लिम वोटबैंक को खुश रखने जब सनातन पर ही हमलावर हो सकते हैं किसी और के क्या हो सकते हैं? हैरानी होती है समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले हिन्दुओं पर चाहे वह किसी भी जाति से हों, जो हिन्दू विरोधी पार्टी को वोट देते हैं। जाति से पहले धर्म आता है जब धर्म ही नहीं रहेगा जाति क्या करेगी? सनातन को गाली देना और हिन्दुओं को जातियों में बांटकर राज करने की मंशा रखने वालों से जनहित की कामना करना अंधे कुएं में चीखने से कम नहीं।    
समाजवादी पार्टी ने वर्षों तक खुद को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बताने की कोशिश की, लेकिन हकीकत में उसकी राजनीति का सबसे बड़ा सच हमेशा हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण ही रहा। मुलायम सिंह यादव के दौर में अयोध्या में कारसेवकों पर चली गोलियां केवल फायरिंग नहीं थीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था पर सीधा हमला था। “परिंदा भी पर नहीं मार सकता” जैसे अहंकारी बयान से लेकर राम मंदिर आंदोलन को सांप्रदायिक उन्माद बताने तक, सपा ने हमेशा हिंदू भावनाओं को संदेह और शत्रुता की नजर से देखा। समय बदला, चेहरे बदले, लेकिन सोच नहीं बदली। अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी वही राजनीति नए रूप में सामने आती रही है। कभी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, कभी कुंभ और कांवड़ यात्रा पर तंज, तो कभी रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेताओं पर नरम रुख…यह सब बताता है कि अखिलेश यादव की भी राजनीति में हिंदू आस्था के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि वोट बैंक का गुणा-भाग ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।

हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के दौर में कारसेवकों पर गोलियां चली थीं, तो आज सपा नेताओं के बयानों से हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां चलाई जाती हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं द्वारा रामचरितमानस को बकवास कहना हो या सनातन परंपराओं को कटघरे में खड़ा करना, सपा नेतृत्व हर बार या तो चुप दिखाई दिया या बचाव की मुद्रा में खड़ा नजर आता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का बहुसंख्यक समाज बार-बार सपा की राजनीति को नकारता रहा है। जनता समझ चुकी है कि जो पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बहुसंख्यकों की आस्था को चोट पहुंचाने में संकोच नहीं करती, वह समाज को जोड़ने नहीं, बांटने की राजनीति करती है। यही वजह है कि सपा को सत्ता से बेदखली का दर्द बार-बार झेलना पड़ा और हिंदू समाज का अविश्वास उसके साथ लगातार गहराता चला गया।

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने हिंदुओं का, उनकी आस्था का और सनातन संस्कृति का विरोध और अपमान किया

कांवड़ यात्रा के नाम पर ध्रुवीकरण — अखिलेश यादव
जुलाई 2025
कांवड़ यात्रा मार्गों पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि सपा हमेशा कांवड़ यात्रा और सनातन परंपराओं को राजनीतिक चश्मे से देखती है।

मंदिरों पर कब्जा कर रही BJP – अखिलेश यादव
मई 2025
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन विवाद पर अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा “मंदिरों पर अप्रत्यक्ष कब्जा” कर रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि सपा मंदिर प्रशासन को लेकर भ्रम फैलाकर धार्मिक राजनीति कर रही है।

गौशाला को ‘दुर्गंध’ बताने पर अखिलेख के खिलाफ मोर्चा खोला
2 अप्रैल 2025
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को घेरने की तैयारी कर ली है। दरअसल अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कन्नौज में कहा था कि भाजपा वाले दुर्गंध पसंद करते हैं इसलिए गौशाला बना रहे हैं। हम सुगंध पसंद कर रहे थे इसलिए इत्र पार्क बना रहे थे। भाजपा ने दुर्गंध के मुद्दे को गाय और गौशाला का अपमान बताते हुए यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

राम लला की प्राण प्रतिष्ठा BJP-RSS का राजनीतिक कार्यक्रम बताया
11 जनवरी 2024
मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया था और अब उनके पुत्र राम मंदिर के विरोध पर उतर आए हैं। राम लला मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर अखिलेश यादव ने दूरी बनाते हुए कहा कि वह इसमें नहीं जाएंगे। उन्होंने इस भव्य-दिव्य राम जन्मभूमि न्यास के कार्यक्रम को बीजेपी और आरएसएस का कार्यक्रम बताया। सपा द्वारा इस कार्यक्रम को “राजनीतिक आयोजन” कहने के बाद भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा राम मंदिर आंदोलन से आज भी असहज है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने से इनकार
9 जनवरी 2024
विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधि जब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण देने पहुंचे, तब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहते हुए निमंत्रण लेने से इनकार कर दिया कि “हम उन्हें नहीं जानते, जो निमंत्रण देने आए हैं।” इस घटना के बाद भाजपा ने उन पर राम मंदिर आंदोलन और सनातन आस्था का अपमान करने का आरोप लगाया।

राम मंदिर का उद्घाटन मार्केटिंग इवेंट है – एसटी हसनसमाजवादी पार्टी राम मंदिर का शुरू से ही विरोध करती आ रही है और इसमें अड़ंगे डालने में लगी है। अब समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता ने एसटी हसन ने राम मंदिर के उद्घाटन को भाजपा का एक ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ और ‘मार्केटिंग इवेंट’ करार दे दिया। दूसरी ओर सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने अक्सर राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों या हिंदू धर्मगुरुओं पर तंज कसते हुए उन्हें पाखंडी या राजनीतिक फायदे के लिए काम करने वाला बताया है।

सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिंदू धर्म को धोखा बताया
28 अगस्त 2023
सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस प्रकरण के बाद दिए बयान से बवाल मच गया। हिंदू धर्म को धोखा बतानेवाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान की चारों तरफ निंदा होने लगी है। अयोध्या के साधु-संतों ने भी बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य बौखला गए हैं। उनको बोलने का ज्ञान नहीं है और स्वामी प्रसाद मौर्य ऊटपटांग बोलते हैं।

सपा समर्थकों ने पावन रामचरितमानस की प्रतियां जलाईं
29 जनवरी 2023
स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन में कुछ लोगों द्वारा रामचरितमानस की प्रतियां जलाने का वीडियो वायरल हुआ। इस घटना के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेताओं के बयानों ने धार्मिक उन्माद पैदा किया। (Reddit)

रामचरितमानस बकवास है – स्वामी प्रसाद मौर्य
24 जनवरी 2023
रामचरितमानस विवाद के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि “यह सब बकवास है।” इस बयान के बाद संत समाज, अखाड़ा परिषद और कई हिंदू संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किए। भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेतृत्व जानबूझकर सनातन ग्रंथों को निशाना बना रहा है। समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि रामचरितमानस की कुछ चौपाइयां दलितों और पिछड़ों का अपमान करती हैं। उन्होंने मांग की कि “आपत्तिजनक हिस्सों को हटाया जाए या किताब पर प्रतिबंध लगाया जाए।” इस बयान के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुईं।

भगवा राजनीति देश के लिए खतरा — मुलायम सिंह यादव
अप्रैल 2009
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ में बोलते हुए मुलायम सिंह यादव ने भाजपा और हिंदुत्व राजनीति पर हमला किया। यादव ने भगवा राजनीति को देश के लिए खतरा बता दिया। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री को घेरते हुए इसे हिंदू धार्मिक पहचान को कट्टरवाद से जोड़ने की कोशिश बताया।

देश मिथकों से नहीं विकास से चलता है – अमर सिंह
सितंबर 2007
रामसेतु विवाद के दौरान नई दिल्ली में समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने कहा कि “देश मिथकों से नहीं, विकास से चलता है।” रामसेतु पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे के बीच, रामसेतु को मिथक बताने वाला यह बयान बड़ा विवाद बन गया।

राम मंदिर आंदोलन ने देश बांटा – मुलायम सिंह यादव
अगस्त 2003
मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राम मंदिर आंदोलन ने “देश को बांटने का काम किया।” विश्व हिंदू परिषद और रामभक्त संगठनों ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान बताया।

अयोध्या की पूरी जमीन ही विवादित, निर्माण का अधिकार नहीं
27 फरवरी 2003
लोकसभा में बोलते हुए सपा सांसद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अयोध्या की पूरी जमीन विवादित है। जब तक इसका फैसला नहीं हो जाता तब तक किसी भी पक्ष को कोई भी निर्माण कार्य करने का अधिकार नहीं है और न किया जा सकता है। न ही हमारी पार्टी करने देगी।

साधु-संतों को ‘राजनीतिक एजेंट’ बताने पर विवाद
वर्ष 1995
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य सपा नेताओं ने अपने बयान में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई संतों और महंतों को “भाजपा के राजनीतिक एजेंट” कहा। संत समाज ने इसका तीखा विरोध किया। सपा नेता रामगोपाल यादव ने भाजपा पर राम के नाम के राजनीतिकरण और पेटेंट का आरोप लगाया था।

सपा राज में हनुमानगढ़ी के पास कारसेवकों पर गोलियां बरसाईं
2 नवंबर 1990
समाजवादी पार्टी के राज में अयोध्या की गलियों में एक बार फिर कारसेवकों की भारी भीड़ जुटी और हनुमानगढ़ी के पास पहुंचने पर सुरक्षा बलों ने दूसरी बार गोलियां बरसाईं। जोश और जुनून से भरे हजारों कारसेवकों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कोठारी बंधुओं समेत कई कारसेवकों की मौत हुई। हिंदू संगठनों ने इसे रामभक्तों पर दमन बताया। तब मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि देश की एकता के लिए हमें मस्जिद को बचाना पड़ा।
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मुलायम सरकार में अयोध्या में गोली कांड
30 अक्टूबर 1990
अयोध्या में हजारों की संख्या में कारसेवक बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे और बैरिकेडिंग तोड़कर आगे निकलने लगे। तब मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाने का आदेश दिया था, जिसमें कई कारसेवक मारे गए थे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई। यह घटना आज भी सपा के खिलाफ हिंदू विरोध का सबसे जीवंत उदाहरण है।