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झूठ फैला रहा वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज बेशर्म वकील प्रशांत भूषण, मोदी की रैली में शामिल होने पर छात्रों को 50 नंबर मिलने की बात

प्रॉपगैंडिस्ट प्रशांत भूषण 
आखिर नीचता की भी हद होती है। नरेंद्र मोदी के विरोध में कितना नीचे गिरेगा विपक्ष? आतंकवादियों की पैरवी के लिए खड़ा होने वाले वकील प्रशांत भूषण ने उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवम्बर 9 को हो रही रैली में शामिल होने वाले छात्रों को 50 अंक मिलने की झूठी फैलाकर क्या हासिल करना चाहता है? कहने को वकील है लेकिन लगता है अक्ल नहीं।    

सोशल मीडिया पर अक्सर फर्जी खबरें फैलाने वाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर एक और दावा किया है। शनिवार(नवम्बर 8) को एक्स पर एक पोस्ट में, वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले प्रशांत किशोर ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल होने वाले छात्रों को 50 अंक देगा।

प्रशांत भूषण ने विश्वविद्यालय के नाम पर ये फर्जी नोटिस पोस्ट किया है। इसमें कहा गया था कि सभी बी.टेक सीएसई और स्पेशलाइजेशन (द्वितीय वर्ष) और बीसीए (द्वितीय वर्ष) के छात्रों को एफआरआई में होने वाले आगामी कार्यक्रम में शामिल होना होगा। रविवार (9 नवंबर 2025) को ये कार्यक्रम है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री के साथ एक संवाद होगा। इसमें कहा गया था, “इस कार्यक्रम में उपस्थिति भारतीय ज्ञान परंपरा पाठ्यक्रम के अंतर्गत मानी जाएगी और प्रत्येक प्रतिभागी को 50 इंटरनल नंबर दिए जाएँगे।”

नोटिस में आगे कहा गया है, “अतः, भारतीय ज्ञान प्रणाली पाठ्यक्रम वाले सभी कार्यक्रमों के लिए इस कार्यक्रम में भाग लेना अनिवार्य है।”

हालाँकि यह ‘नोटिस’ बीसीए विभागाध्यक्ष रोहित गोयल और बी.टेक सीएसई कार्यक्रम समन्वयक गोविंद सिंह पंवार के नाम पर जारी किया गया था, लेकिन इसमें किसी के हस्ताक्षर नहीं थे।

सोशल मीडिया पर ‘नोटिस’ आने के बाद, देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि यह नोटिस फर्जी है। फेसबुक पर एक पोस्ट में, निजी विश्वविद्यालय ने कहा, “हमारे संज्ञान में आया है कि 09 नवंबर 2025 को एफआरआई के आगामी दौरे के अंकों के संबंध में डीबीयूयू के नाम से एक फर्जी नोटिस प्रसारित किया गया है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह नोटिस पूरी तरह से झूठा है और विश्वविद्यालय द्वारा जारी या अनुमोदित नहीं है। इस पर कोई आधिकारिक हस्ताक्षर, संदर्भ संख्या या प्राधिकरण नहीं है।”

विश्वविद्यालय ने एक आधिकारिक अधिसूचना भी जारी की, जिसमें कहा गया, “विश्वविद्यालय प्राधिकारियों के संज्ञान में आया है कि हाल ही में देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के नाम से अज्ञात तरीके से एक फर्जी नोटिस प्रसारित किया गया है। सभी संबंधित छात्रों को सूचित किया जाता है कि यह नोटिस पूरी तरह से फर्जी है और विश्वविद्यालय द्वारा जारी नहीं किया गया है। इस पर किसी भी सक्षम प्राधिकारी का आधिकारिक लेटरहेड, संदर्भ संख्या या हस्ताक्षर नहीं हैं, और इसे विश्वविद्यालय के किसी भी अधिकृत माध्यम से अनुमोदित या जारी नहीं किया गया है। विश्वविद्यालय घोषणा करता है कि यह नोटिस फर्जी है।”

पिछले नोटिस के विपरीत, इस नोटिस पर रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर और मुहर लगी है। बाद में पीआईबी फैक्ट चेक ने भी X पर पोस्ट किया कि प्रशांत भूषण द्वारा पोस्ट किया गया नोटिस फर्जी है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी रविवार को उत्तराखंड के रजत जयंती समारोह में शामिल होने के लिए देहरादून में हैं। इस कार्यक्रम में वह 8,260 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया जाएगा।

बिहार चुनाव : ‘अशांत’ हुआ प्रशांत का दल: गुंडे की तरह पीसकर छोड़ देंगे, धांधली हो रही है…. ‘प्रत्याशी सुझाव पत्र’ में घपले से भड़के टिकट दावेदारों के समर्थक, जन सुराज में अराजकता भारी

                                            जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (साभार: आज तक)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, दोनों प्रमुख गठबंधन अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं और पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपनी नए नवेले दल ‘जन सुराज’ के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में खुद को दोनों प्रमुख गठबंधनों से अलग दिखाने के नाम पर प्रशांत किशोर ने आक्रामकता का सहारा लिया है।

प्रशांत गुस्से में हर किसी को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव लड़ने और चुनावी तैयारियों को लेकर भी आक्रामक हैं। उन्होंने तो यहाँ तक एलान कर दिया था कि वो बिहार में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का एलान कर देंगे। चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है लेकिन अब तक प्रशांत के उम्मीदवारों का कहीं अता-पता नहीं है। अलबत्ता उम्मीदवारी को लेकर जन सुराज के नेता-कार्यकर्ता अभी से आपस में भिड़ने लगे हैं।

जन सुराज: लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जब राजनीतिक दल बनाने का एलान किया था तो उन्होंने दल के भीतर सबसे अधिक लोकतंत्र बनाने जैसे दावे किए थे। इसके अलावा अलग-अलग मंचों पर भी वह ऐसे दावे करते रहे हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता बरतने का भी उन्होंने दावा किया था।

प्रशांत किशोर ने अपने दल को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए तय किया कि वह उम्मीदवारों का चयन भी लोगों की मर्जी से ही करेंगे। तय हुआ कि वह इसके लिए लोगों की राय लेंगे। इसके लिए उनके दल द्वारा ‘प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र’ छपवाए गए हैं, इन पर उस विधानसभा क्षेत्र के कई संभावित उम्मीदवारों के नाम होते हैं। लोगों को इसमें से अपनी राय रखते हुए अपने द्वारा समर्थित जन सुराज के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती है।

यूँ तो इन पर्चे से जन सुराज अपनी पार्टी का लोकतंत्र दिखाना चाहती थी लेकिन इन्हीं की वजह से पार्टी के भीतर मौजूद भीड़ तंत्र का चेहरा सामने आ गया। बिहार में कई जगहों पर इन पर्चों को लेकर संभावित प्रत्याशियों के समर्थक ही आपस में भिड़ गए। कहीं, एक ही संभावित प्रत्याशी के समर्थकों को ज्यादा पर्चे दिए जाने की बात पर हंगामा हुआ तो कहीं अपने लोग बंद कमरे में अपने चहेते प्रत्याशी के नाम पर दनादन पर्चे भरते दिखे।

मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें एक कमरे में बैठे 3-4 लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के दर्जनों-सैकड़ों फॉर्म भरते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में फॉर्म भर रहे ये लोग खुद इस बात को मान भी रहे हैं कि किसके समर्थन में वो पर्चे भर रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद दावा किया जा रहा है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के ये प्रपत्र लोगों तक पहुँच ही नहीं रहे हैं। संभावित प्रत्याशी खुद ही अपने नाम पर मुहर लगवा रहे हैं।

इसमें जब वीडियो बना रहे लोगों ने मुहर लगा रहे लोगों से पूछा कि आप खुद ही क्यों छाप रहे हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि जनता को पता ही नहीं है इसलिए हम खुद ही यह कर रहे हैं। ये लोग करीब 300 पर्चों पर मुहर लगा रहे थे।

यह कोई अकेली-इकलौती घटना नहीं है, ऐसा कई जगहों पर हुआ है और यह आम होता जा रहा है। दरभंगा में भी ऐसा ही मामला देखने को मिला। वहाँ भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के दौरान जमकर बवाल हुआ है। बैलेट पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट में बदल गया और कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकने लगे। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए हैं।

बेनीपुर में हंगामा कर रहे लोगों ने यह दावा किया कि उनको पर्चे नहीं दिए गए हैं। लोगों ने धांधली का आरोप भी लगाया है। एक शख्स ने दावा किया कि एक व्यक्ति के समर्थकों को बंडल के बंडल दिए गए हैं। खूब गाली गलौज तक की गई है। एक अन्य शख्स के दावा कि कुछ-कुछ लोगों को 6-6 पर्चे दिए जा रहे हैं जबकि कुछ लोगों को एक भी नहीं मिल रहा है।

बिस्फी में भी जन सुराज के कार्यकर्ता सम्मेलन में वोटिंग को लेकर जमकर हंगामा हुआ है। बिस्फी में नागेंद्र यादव, मोहम्मद कलीन और वशिष्ठ नारायण को पार्टी की तरफ से संभावित प्रत्याशी बनाया गया है। तीनों के नाम के पर्चे जनता को दिए गए लेकिन वे आपस में ही भिड़ गए। संभावित प्रत्याशियों ने एक-दूसरे पर गुंडे तक बुलाने का आरोप लगा दिया है। दावा किया गया है कि यहाँ वशिष्ठ नारायण को पहले ही इस वोटिंग को लेकर बता दिया गया था लेकिन अन्य संभावित प्रत्याशियों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।

वशिष्ठ नारायण झा का कहना है कि वो वोटिंग के समर्थन में थे और वो ताल ठोककर तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे गुंडे की तरह पीसकर छोड़ दिया जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों ने नाराजगी जताई है।

अब यह आपसी फूट ही जन सुराज की हकीकत बन गया है। यानी बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बना पा रहे हैं।

क्यों टिकट बँटवारे में हुई देरी

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपनी बड़ी उपस्थिति और ‘नई राजनीति’ का दावा तो बहुत पहले कर दिया था लेकिन जब बात टिकट बाँटने की बारी आई तो पार्टी के अंदर ही कई परतें खुलने लगीं।

हालाँकि, प्रशांत किशोर ने महीनों पहले ऐलान किया था कि जन सुराज अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, सबसे पहले टिकटों की घोषणा होगी मगर अब तक टिकटों की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई वजहें हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जन सुराज को खुद भी एहसास है कि फिलहाल उसका जनाधार वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। पार्टी के भीतर भी कई कार्यकर्ता इस बात को समझते हैं कि अगर टिकट बाँटे गए और चुनाव लड़ा गया, तो अधिकतर सीटों पर मुकाबला तीसरे या चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगा।

ऐसे में प्रशांत किशोर अन्य दलों के टिकट बाँटे जाने का इंतजार कर रहे हैं। ताकि किसी बड़े दल से असंतुष्ट और जनाधार वाले नेता या गुट उनके साथ जुड़ सके। उनका मत है कि जन सुराज के संगठन को चलाने वाले स्थानीय लोग। जन सुराज का पूरा संगठन उन्हीं लोगों के हाथ में है जो शुरू से इस अभियान से जुड़े रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में सर्वे किए, बैठकें कीं और पार्टी की नींव डाली। यही लोग जमीन पर पैसा भी खर्च करते हैं।

अब जब टिकट वितरण की घड़ी आई है, तो वही पुराने कार्यकर्ता खुद दावेदार बन बैठे हैं। ऐसे में अगर किसी को टिकट नहीं मिला या पक्षपात दिखा, तो बगावत तय है। ऐसे में प्रशांत किशोर इस बगावत से अपनी पार्टी को बचाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। खुद को अलग दिखाने का दावा करने वाले प्रशांत के सामने अभी पूरी तैयार भी ना हो सके संगठन को संभालने की जिम्मेदारी है।

‘चुनाव में सलाह देने के लेता था 100 करोड़ रूपए+’: प्रशांत किशोर ने मुस्लिमों के आगे कबूली अपनी फीस, बोले- हमें कमजोर समझते हैं क्या आप?

जन सुराज के संयोजक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने खुलासा किया है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या नेता को चुनावी सलाह देने के लिए वह 100 करोड़ रुपये से अधिक फीस लेते हैं। प्रशांत ने यह बात गुरुवार (31 अक्टूबर 2024) को बिहार विधानसभा उपचुनावों के प्रचार के दौरान कही।

बिहार के बेलागंज में एक सभा को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने बताया कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं कि उनके चुनावी अभियान का खर्च कैसे पूरा होता है।

प्रशांत किशोर ने कहा, “मेरी रणनीतियों पर दस राज्यों में सरकारें चल रही हैं। क्या आपको लगता है कि मुझे अपने अभियान के लिए तंबू और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च उठाने में दिक्कत होगी? बिहार में किसी ने मेरी जैसी फीस के बारे में नहीं सुना है। एक चुनाव में सलाह देकर मैं 100 करोड़ रुपये से अधिक कमा लेता हूँ, जो मुझे अगले दो साल तक अपने अभियान को चलाने के लिए पर्याप्त है।”


जन सुराज पार्टी ने आगामी उपचुनावों के लिए चार विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। बेलागंज से मोहम्मद अमजद, इमामगंज से जितेंद्र पासवान, रामगढ़ से सुशील कुमार सिंह कुशवाहा और तारारी से किरण सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। बिहार के इन चार विधानसभा क्षेत्रों – बेलागंज, इमामगंज, रामगढ़, और तारारी – में 13 नवंबर को उपचुनाव होने हैं, और इनके नतीजे 23 नवंबर को घोषित किए जाएंगे।

प्रशांत किशोर का यह बयान चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनकी फीस और फंडिंग को लेकर चल रहे सवालों का जवाब था।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर एक जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार हैं, जिन्होंने भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावी अभियान तैयार किए हैं। उनका करियर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार से चर्चा में आया, जब उनकी बनाई रणनीतियों ने बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाने में मदद की। इसके बाद उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार, दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कॉन्ग्रेस जैसे कई दलों के साथ काम किया​
प्रशांत किशोर की कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) ने विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनावों में रणनीतियाँ तैयार कीं, जिससे वे राजनीति में एक भरोसेमंद नाम बन गए। हालाँकि वे कई बार कॉन्ग्रेस में शामिल होने की अटकलों में भी रहे हैं, लेकिन आखिर में उन्होंने खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई है।

हिंदी पट्टी में बनी हुई है पकड़, दक्षिण में भी मिलेगी बढ़त, बंगाल-ओडिशा में सबसे बड़ी पार्टी होगी बीजेपी : प्रशांत किशोर

                    प्रशांत किशोर ने पीटीआई संपादकों के साथ की बातचीत (फोटो साभार : PTI)
बीजेपी को सत्ता में लाने का श्रेय बीजेपी को नहीं, विपक्ष को जाता है। जिस तरह सावन के अन्धे को हर तरफ हरा ही हरा दिखाई देता है, ठीक वही स्थिति विपक्ष की है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री मनोनीत होते ही विपक्ष मोदी को केवल गाली देता रहा, कभी गोधरा मुद्दे को उठाकर मुसलमानों में डर बैठा डराता रहा। मौत का सौदागर, नीच और चाय बेचने वाला कहकर अपमानित करता रहा, लेकिन ये सभी मिथ्या साबित होकर मोदी की राह में फूल बिछाते रहे। कोई अन्य नहीं, मुसलमान ही इनसे पूछे की 2002 से पहले गुजरात में कितने दंगे हुए और कितने हज़ार मुसलमान मारे गए? मलियाना(उत्तर प्रदेश) में कितने मुसलमान मारे गए? 

मोदी की डिग्री पर प्रश्न करने वालों ने कभी सोनिया गाँधी की डिग्री पूछने की हिम्मत नहीं की। मोदी को चाय बेचने वाला कहने वालों ने कभी यह पूछने का साहस नहीं किया कि राजीव गाँधी से शादी से सोनिया इटली में क्या करती थी। फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर शोर मचाना शुरू कर दिया कि बीजेपी धर्म को राजनीति में लाकर जनता को गुमराह कर रही है। जबकि सच्चाई यह है कि सनातन शास्त्रों में राजनीति ज्ञान होने के कारण पहले अपने पुत्रों को गुरुकुलों में मुनियों से शिक्षा लेने भेजते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स को क्या मालूम जीवन में गुरुकुल का क्या महत्व है? 

जो पुरुषोत्तम श्रीराम को मिथ्या बता दे, उनसे सनातन का ढोंग रचने के अलावा कुछ नहीं अपेक्षा नहीं की जा सकती। सेकुलरिज्म के नाम पर केवल हिन्दुओं अधिकारों का हनन, जातियों में विभाजित करने की तुच्छ सोंच से आज तक बाहर आने की हिम्मत नहीं कर पा  रहे। इन पाखंडी सेक्युलरिस्टों से पूछो कि सेकुलरिज्म का मतलब क्या होता है, क्या परिभाषा है? हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने से पहले बताओ दूसरे धर्मों को जातियों में बाँटने की हिम्मत कर के दिखाने के लिए माँ का दूध पीकर आओ। हिन्दुओं में एक ही मंदिर है एक ही शमशान है, लेकिन अन्य धर्मों में हर जाति के अलग कब्रिस्तान, मस्जिद और चर्च क्यों हैं?  

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने माना है कि बीजेपी लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ रही है। प्रशांत किशोर का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी दक्षिण और पूर्वी भारत में जोरदार पकड़ बना चुकी है और दोनों ही क्षेत्रों से अपनी सीटों को काफी बढ़ाने में सक्षम होगी, यहाँ तक कि तमिलनाडु में बीजेपी का मत प्रतिशत दहाई अंक में पहुँच सकता है। प्रशांत किशोर ने कहा कि कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों को बीजेपी और नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कम से कम 3 बड़े मौके मिले थे, लेकिन विपक्षी दल इन मौकों को भुनाने में असफल रहे।

पीटीआई के संपादकों के साथ विशेष चर्चा में प्रशांत किशोर ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना में सबसे बड़ी या दूसरे नंबर की पार्टी हो सकती है, जबकि ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। आप को भले ही ये बात अभी आश्चर्यजनक लग रही हो, लेकिन हकीकत में ऐसा होने जा रहा है। प्रशांत किशोर ने कहा कि दक्षिण के राज्यों में कर्नाटक में कॉन्ग्रेस मजबूत है, लेकिन बाकी राज्यों में बीजेपी अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है।

प्रशांत किशोर ने एक आँकड़ा दिया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार और केरल में कुल मिलाकर 543 लोकसभा सीटों में 204 सीटें हैं। इन राज्यों में बीजेपी न ही साल 2014 में और न ही 2029 में अच्छा प्रदर्शन कर पाई। बीजेपी 2024 सीटों में से 50 सीटें भी नहीं जीत पाई थी। साल 2014 में ये आँकड़ा 29 सीटों का था, तो 2019 में 47 सीटों का, लेकिन इस बार ये आँकड़ा बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना में बीजेपी बेहतरीन प्रदर्शन करने जा रही है।

इस दौरान उन्होंने कहा कि बीजेपी ने भले ही 370 से ज्यादा सीटों का लक्ष्य रखा है, लेकिन वो इसे पार नहीं कर पाएगी। हालाँकि इस बार भी वो 300 से अधिक सीटों पर जोरदार जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने चल रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी को परेशानी तब होती, जब विपक्षी दल खासकर कॉन्ग्रेस उसे उत्तर और पश्चिम भारत में 100 से अधिक सीटों पर हराने की स्थिति में होती, लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा है। बीजेपी की इन इलाकों पर मजबूत पकड़ है।

बीजेपी करेगी अच्छा प्रदर्शन

प्रशांत किशोर ने कहा कि पिछले कुछ सालों में दक्षिण और पूर्वी भारत में बीजेपी ने काफी मेहनत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इन राज्यों का लगातार दौरा किया है, जबकि विपक्ष के नेता अपने घरों में रहे। उन्होंने एक तुलनात्मक बात जोड़ते हुए राहुल गाँधी पर कटाक्ष भी किया। उन्होंने कहा, “पिछले 5 सालों में राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी कितनी बार तमिलनाडु गए? आपकी लड़ाई यूपी, बिहार और एमपी में है, लेकिन आप मणिपुर और मेघालय का दौरा कर रहे हैं, तो सफलता कैसे मिलेगी?”
साल 2019 में अमेठी से हार के बाद राहुल गाँधी ने वायनाड पर ध्यान केंद्रित किया। वो अकेले केरल में पार्टी को जिता भी लेंगे, तो भी पूरे देश में उनकी हालत खराब रहेगी। अमेठी से भागने का मतलब है पूरे देश में गलत संदेश जाना, जबकि अभी तक कॉन्ग्रेस रायबरेली और अमेठी से अपने उम्मीदवार तक तय नहीं कर सकी है और न ही राहुल गाँधी अमेठी को लेकर बहुत ज्यादा इच्छाशक्ति ही रखते हैं।
प्रशांत किशोर ने कहा कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, लेकिन राहुल गाँधी वायनाड में जोर लगा रहे हैं। वहीं, नरेंद्र मोदी ने गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश को चुना, क्योंकि अगर आप हिंदी पट्टी को नहीं जीतेंगे, तो फिर आप लड़ाई में ही नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने हिंदी पट्टी में अपनी पकड़ बनाकर रखी है।

विपक्षी दलों खासकर कॉन्ग्रेस को मिले थे तीन बड़े मौके

प्रशांत किशोर ने कहा कि कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों को बीजेपी को रोकने के तीन बड़े मौके मिले थे, लेकिन हर बार वो चूक गए। उन्होंने कहा कि साल 2014 के बाद जब भी बीजेपी बैकफुट पर गई, विपक्षी दल उस मौके को भुनाने में असफल रहे। साल 2015 और 2016 में बीजेपी लगातार चुनाव हारी, असम को छोड़कर, लेकिन विपक्ष ने बीजेपी को वापसी करने का मौका दिया। इसी तरह से साल 2017 में नोटबंदी के बाद यूपी में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी एक बार फिर से हारने लगी थी। वो गुजरात में लगभग हार गई थी, एमपी-राजस्थान-छत्तीसगढ़ में बुरी पराजय हुआ, लेकिन बीजेपी ने 2019 में वापसी कर ली।
किशोर ने आगे कहा कि इसी तरह से कोरोना के समय बीजेपी की हालत खराब हुई। बीजेपी पश्चिम बंगाल में बुरी तरह से हारी, लेकिन विपक्ष के नेता नरेंद्र मोदी की चुनौती का सामना करने की जगह अपने घरों में बैठ गए और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी फिर से वापसी करने में सफल रही। उन्होंने कहा, “अगर आप किसी बल्लेबाज का कैच बार-बार छोड़ते रहेंगे, तो वो शतक बनाएगा, खासकर जब वो नरेंद्र मोदी जैसा अच्छा बल्लेबाज हो।”

इंडी गठबंधन प्रभावी नहीं

प्रशांत किशोर ने कहा कि बीजेपी से मुकाबले के लिए विपक्षी दलों का जो गठबंधन बना है, न तो उसकी जरूरत थी और न ही वो प्रभावी है। उन्होंने कहा कि देश की 350 लोकसभा सीटों पर तो बीजेपी और किसी अन्य दल की सीधी टक्कर है। ऐसे में गठबंधन का यहाँ कोई मतलब नहीं बनता। वैसे भी बीजेपी इसलिए जीत रही है, क्योंकि गठबंधन की पार्टियाँ कॉन्ग्रेस, सपा, आरजेडी, एनसीपी और टीएमसी अपने ही इलाकों में बीजेपी का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं। इस पार्टियों के पास ही कोई नैरेटिव है, न ही कोई मजबूत चेहरा और न ही कोई ढंग का एजेंडा।

नव्वा (नौंवी) फेल आदमी हैं। क्रिकेट खेलने गए तो वहाँ पानी ढोते थे… प्रशांत किशोर ने बताई तेजस्वी यादव की ‘पहचान’

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर इन दिनों पदयात्रा पर हैं। इस दौरान वो लोगों के बीच जाकर उनसे बात करके उन्हें जात-पात से ऊपर उठकर वोट करने को कहते हैं। हाल में उन्होंने इसी क्रम में बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने 16 नवंबर 2023 को बयान देते हुए कहा कि तेजस्वी यादव की पहचान क्या है? वो नव्वा (नौंवी) फेल आदमी हैं। क्रिकेट खेलने गए तो वहाँ पानी ढोते थे। कौन सा ऐसा बड़ा पराक्रम कर दिया। लालू के लड़के हैं इसलिए सब लोग जानते हैं।

नव्वा (नौंवी) फेल को वोट देने वाले शिक्षित भी किसी अशिक्षित से कम नहीं। चलो तेजस्वी नव्वा (नौंवी) फेल है, तो क्यों जनता ने उसे वोट दिया? क्या अशिक्षित शिक्षित पर राज करेगा? जब जनता ही ऐसे लोगों को अपना नेता मानेगी किसी को दोष देना व्यर्थ है? जेल जाने से पहले लालू यादव द्वारा अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री को बनाना बिहार के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं था, यानि जो मुख्यमंत्री शपथ तक न पढ़ सके, क्या मुख्यमंत्री पद का घोर अपमान नहीं था? जिस प्रदेश का मुख्यमंत्री ही अशिक्षित हो प्रदेश का क्या चलाएगा? 

पत्रकारों से बात करते हुए वह बोले- इन लोगों को क्या मतलब है इन चीजों से। गया उलूल-जुलूल बकवास किया, लोगों को जाति धर्म में बाँटा… पैसा वसूल करके लोगों को धर्म में बाँटा। जाति के नाम पर लोग गरीबी में मजबूरी में वोट दे देते हैं। उसके बाद नेता बनकर ज्ञान दे रहा है।

प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव के जीडीपी वाले बयान पर इतनी तल्ख प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अभी आपने कुछ दिन पहले देखा होगा कि महाज्ञानी उपमुख्यमंत्री ने कहा कि जीडीपी तो सबसे ज्यादा बिहार की है। प्रशांत किशोर बोले- “तेजस्वी को तो यही नहीं पता कि जीडीपी क्या है? बिना कागज देखे अगर वो इसकी परिभाषा बता दें तो हम ये काम छोड़कर तेजस्वी यादव का झंडा ले लेंगे। या बिना कागज देखे जीडीपी की फुल फॉर्म ही लिख दें तो हम मान जाएँगे।” इसके बाद उन्होंने तेजस्वी पर नौंवी फेल वाली टिप्पणी की।

प्रशांत किशोर का बयान आने के बाद शुक्रवार (17 नवंबर 2023) को लालू प्रसाद यादव की बेटी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी और अपना गुस्सा जाहिर किया। रोहिणी आचार्य ने अपने ट्वीट में लिखा- “ये है कौन? इसको कोई पहचानता भी है। ये भी किसी को बाबू जी बना ले, ताकि किसी का राजनीतिक वारिस बन सके। ये जो कह रहा है वो अपना बाप अपनी दुकानदारी एवं अपने फायदे के हिसाब से समय-समय पर बदलते रहता है।”

रोहिणी आगे लिखती हैं- “कभी मोदी-शाह इसके बाबू जी, कभी पवन वर्मा-नीतीश कुमार इसके बाबू जी। कभी राहुल गाँधी इसके बाबूजी, कभी अभिषेक बनर्जी इसके बाबूजी, कभी जगन रेड्डी इसके बाबूजी तो कभी स्टालिन इसके बाबूजी…अभी फिर से इसने सबसे पहले वालों को अपना बाप बना रखा है सिर्फ नाम नहीं उजागर कर पा रहा है। भाजपा की दलाली करता है इसलिए मीडिया की कृपा दृष्टि इस पर बना रहता है। वरना गली का कुत्ता भी इसको भाव ना दे और चला है तेजस्वी पर कीचड़ उछालने।”

तेजस्वी यादव के अलावा प्रशांत किशोर ने राहुल गाँधी पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा-राजीव गांधी के लड़के हैं राहुल गाँधी इसलिए वह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं।
आपके बाबू जी की पार्टी है तो कोई भी नेता बन जाएगा। बाबूजी की दुकान है तो कोई भी जाकर बैठ जाएगा और मालिक हो जाएगा। इसमें आपकी योग्यता क्या है?

‘JDU का विलय कांग्रेस में करने को कह रहे थे प्रशांत किशोर’ : नितीश कुमार का बड़ा आरोप

                                                                                                                          साभार: रिपब्लिक
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पुराने ‘अनन्य’ सहयोगी और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पर निशाना साधा है। नीतीश कुमार ने कहा है कि प्रशांत किशोर वही व्यक्ति हैं जिन्होंने जेडीयू (जनता दल यूनाइटेड) को कांग्रेस में विलय करने की सलाह दी थी। वह कुछ भी बोलते रहते हैं उन्हें बोलने दीजिए।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण की पुण्यतिथि पर जेपी गोलंबर पहुंचे थे। जहाँ, उनसे पत्रकारों ने उनसे पूछा कि प्रशांत किशोर ने कहा है कि उन्हें पद का ऑफर दिया गया था। जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें (प्रशांत किशोर को) जो कुछ भी बोलना है, बोलें। हमें उनसे कोई लेना-देना नहीं है।

नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर (पीके) को लेकर कहा है, “आजकल बीजेपी में गए हैं तो उनके हिसाब से कर रहे हैं। इन लोगों का कोई ठिकाना नहीं है। वह मेरे घर में रहते थे, अब जो चाहे वह बोलते रहते हैं। हमने उनको नहीं बुलाया था बल्कि वो खुद मिलने आए थे। क्या-क्या बात बात हुई थी हमारे बीच, इस पर हम कुछ नहीं बोलेंगे। उनको बोलने दीजिए जो कुछ बोलना है। उनको राजनीति से क्या मतलब है, इसलिए उन्हें बोलने दीजिए।”

उन्होंने पीके पर आरोप लगाते हुए कहा, “हम लोगों को उससे कोई लेना-देना नहीं है। एक बार वह (पीके) हमसे कह रहे थे कि अपनी पार्टी को कांग्रेस में मर्ज कर लीजिए। आप ही बताइए, हम कांग्रेस में क्यों मर्ज करेंगे। ये आज से करीब 4-5 साल पहले की बात है।”

बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर अब बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। जब वो आरजेडी और जेडीयू का विरोध कर रहे हैं तो इसका मतलब तो यही हुआ कि वो बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं।

दरअसल, प्रशांत किशोर ने 5 अक्टूबर, 2022 को अपनी ‘जन-सुराज’ यात्रा के दौरान दावा किया करते हुए कहा था कि नीतीश कुमार ने उन्हें पद का ऑफर किया है। उन्होंने कहा था, “जब मैं कुछ दिन पहले नीतीश कुमार से मिला तो उन्होंने मुझसे फिर से जेडीयू में शामिल होने और साथ काम करने के लिए कहा था। साथ ही यह भी कहा कि आप मेरे राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं।”

उन्होंने यह भी कहा था कि नीतीश कमार ने उन्हें अपना कैंपेन वापस लेने के लिए कहा। लेकिन, उन्होंने नीतीश कुमार से स्पष्ट रूप से कहा कि वह उनके साथ काम नहीं करेंगे, भले ही वह (नीतीश कुमार) उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बना दें या उनके लिए सीएम की कुर्सी छोड़ दें।

नीतीश कुमार 2024 के लिए PM मटेरियल नहींः प्रशांत किशोर

आज सियासत कब क्या करवट ले ले, कहना असंभव है। मोदी और योगी को हराने एक के एक बाद गठबंधन हो रहे हैं, लेकिन सभी विफल हो रहे हैं। 1977 , में  तत्कालीन इंदिरा गाँधी को हराने वामपंथ को छोड़ समस्त विपक्ष एकजुट हुआ था, इंदिरा गाँधी को हरा दिया, लेकिन दो वर्ष बाद ही दरार पड़नी शुरू हुई जो ढाई साल में ही ऐसे बिखरी की इंदिरा वापस आ गयी, जनाधार न होने की वजह से कोई भी धुरंधर नेता प्रधानमंत्री नहीं बन पाया। ठीक वही स्थिति आज है। प्रांतों में भी पूर्ण आधार होने के बावजूद प्रधानमंत्री बनने की सोंच मुंगेरी के हसीं स्वप्न ही कहा जा सकता है। 
राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने साफ़ कर दिया है कि नीतीश कुमार को 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष का चेहरा बनाए जाने को लेकर राजनीतिक गलियारों में कोई चर्चा नहीं है। नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ते हुए फिर से राजद के साथ मिल कर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। प्रशांत किशोर ने कहा कि जदयू के ताज़ा कदम का राष्ट्रीय स्तर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने पूछा कि नीतीश कुमार को किसने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है?

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि ये सब सिर्फ मीडिया में चल रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी गठबंधन या मोर्चे ने उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार बनाने के लिए चर्चा नहीं शुरू की है। उन्होंने कहा कि अगर किसी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाने की चर्चा होती, तो उन्हें मालूम होता। प्रशांत किशोर ने बताया कि नीतीश कुमार जब कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए थे, तब अंतिम बार दोनों की बात हुई थी। उन्होंने इसे बिहार केंद्रित प्रयोग बताते हुए कहा कि देश के स्तर पर इस तरह के किसी महागठबंधन की कोई चर्चा नहीं है।

‘रिपब्लिक टीवी’ से बात करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा, “अगर नई सरकार अच्छा कार्य करती है और तेज़ गति से विकास करती है, तब राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई असर हो सकता है। 2017-22 के बीच नीतीश कुमार भाजपा के साथ सहज नहीं थे। उनके इस कदम के पीछे कोई राष्ट्रीय एजेंडा नहीं है। 2012-13 और नरेंद्र मोदी के उभरने के बाद से ही बिहार में अस्थिरता की स्थिति थी। उस समय से लेकर अब तक ये सरकार गठन का छठा प्रयोग है।”

प्रशांत किशोर ने कहा कि सभी 6 प्रयोगों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे और बिहार की राजनीतिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। उन्होंने आशा जताई कि नई सरकार कुछ अच्छा करेगी। उन्होंने बताया कि कैसे 2010 में उन्होंने लोगों को नीतीश कुमार की इज्जत करते हुए देखा है। उन्होंने 2015 के चुनाव प्रचार अभियान का उदाहरण देते हुए कहा कि तब महागठबंधन को वोट न देने वाले लोग और नरेंद्र मोदी के समर्थक भी नीतीश कुमार को भला-बुरा नहीं कहते थे।

2015 में हुए विधानसभा चुनाव में लालू यादव और नीतीश कुमार साथ थे। प्रशांत किशोर ने तब महागठबंधन के चुनाव प्रचार अभियान की रणनीति की कमान सँभाली थी। उन्हें जदयू में पद ही मिला था, लेकिन नीतीश कुमार से अनबन के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी। प्रशांत किशोर ने कहा कि वो पहली बार लोगों को नीतीश कुमार और उनकी सरकार व प्रशासनिक स्टाइल को लेकर लोगों को वो बातें कहते हुए सुन रहे हैं, जो वो पिछली सरकारों के लिए कहते थे।

प्रशांत किशोर ने बिहार में एक नए अभियान की घोषणा करते हुए कहा कि जदयू में पुनः शामिल होने की उनकी कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार उन्हें क्या ऑफर देंगे और वो उन्हें क्या देंगे, इसका अब कोई मतलब नहीं है। IPAC के संस्थापक ने बिहार में नए राजनीतिक दल की स्थापना के लिए 3000 किलोमीटर लंबी पदयात्रा और 18,000 लोगों को अपने साथ जोड़ने की योजना बनाई है। इसकी घोषणा वो पहले ही कर चुके हैं।