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क्या प्रियंका ने कांग्रेस की कुटिया में चिंगारी छोड़ दी है? कांग्रेस सांसद के बाद वाड्रा बोले, प्रियंका नेतृत्व संभालें और बने प्रधानमंत्री चेहरा

सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बना कांग्रेस नितरोज मुंगेरी के सपने देख पार्टी को गटर में धकेल रही है। याद होगा, 2004 में यूपीए सरकार जब सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने तत्कालीन महामहिम डॉ अबुल कलाम के पास पहुंची और कांटें हाथ आने पर मजबूर कठपुतली डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने पर परिवार भक्तों ने खूब ढोल पीट-पीट कर शोर मचाया "सोनिया गाँधी त्याग की देवी", लेकिन यह नहीं बताया कि संवैधानिक बेड़ियों के चलते सोनिया गाँधी तो क्या राहुल या प्रियंका में से कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। परिवार गुलामों को मालूम होना चाहिए कि संविधान में चाणक्य नीति को जवाहर लाल नेहरू ने भी अपनाकर इंदौर के राजा की विदेशी पत्नी के बच्चों के हाथ इंदौर का राज नहीं जाने दिया था।      

कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की कड़ियों को जोड़ें तो यह साफ-साफ नजर आने लगा है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खेमे खुलकर आमने-सामने आने को आतुर हैं। कांग्रेस की हार-दर-हार से बौखलाए कांग्रेस नेताओं का विश्वास राहुल गांधी से उठने लगा है। यही वजह है कि भाई-बहन (राहुल-प्रियंका) के बीच शीतयुद्ध की खबरें सुर्खियों में हैं। दूसरे यह कि संसद सत्र समाप्त होने पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्षी नेताओं को चाय पर निमंत्रण पर राहुल की गैर-मौजूदगी में प्रियंका वाड्रा में जाना और रक्षामंत्री राजसिंह के साथ बैठने से भी कांग्रेस में हलचल शुरू हो गयी है। सुर्खियों को खुद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उस प्रशांत किशोर से मुलाकात करते हवा दी है, जो पिछले दिनों राहुल गांधी के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर चुके हैं। प्रशांत तो राहुल गांधी के सबसे अहम मुद्दे ‘वोट चोरी’ की आलोचना कर चुके हैं और उन्होंने यह भी कहा है कि Gen Z को राहुल गांधी को क्यों सुनना चाहिए। जहां कांग्रेस का एक खेमा राहुल गांधी को भविष्य का पीएम प्रोजेक्ट करने में लगा है, वहीं प्रियंका के चाहने वालों का मानना है कि राहुल कभी पीएम नहीं बन सकते। इसलिए 2029 में प्रियंका गांधी को कांग्रेस का पीएम चेहरा बनाना चाहिए। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने साफ तौर पर कहा है कि अब प्रियंका गांधी वाड्रा को ही पीएम फेस के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहिए। गांधी परिवार की इस रार के बीच प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के बयान ने आग में घी का काम किया है। वाड्रा ने कहा है कि प्रियंका गांधी की पूरे देश में डिमांड है। देश की यह मांग है कि अब प्रियंका आगे आएं और नेतृत्व संभाले। रॉबर्ट के इस बयान ने राहुल गांधी को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है।
अवलोकन करें:-
नेहरू ने “विदेशी महिला के पुत्र” को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्
नेहरू ने “विदेशी महिला के पुत्र” को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्
 

राहुल गांधी जनता के साथ संवाद में सहज नहीं रह पाते

दरअसल, अब कांग्रेस के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि राहुल गांधी जनता से संवाद में सहज नहीं रह पाते हैं। कई बार संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक में इसके जीवंत उदाहरण मिले हैं। इसके अलावा राहुल गांधी सीमित कोर टीम पर निर्भर रहते हैं और संगठन की शिकायतें सुनने के लिए उतने उपलब्ध नहीं दिखते। राहुल गांधी ने अपने चारों ओर सलाहकारों का ऐसा चक्रव्यूह बना लिया है, जिसे भेदकर कोई सच्चा, समर्पित कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी सही बात राहुल तक नहीं पहुंचा पाता। इसके विपरीत कांग्रेस कार्यकर्ताओं में फिलहाल तो प्रियंका गांधी वाड्रा को एक आसान‑सुलभ, सुनने वाली नेता के रूप में देखा जा रहा है, जो कठिन मुद्दों पर भी हल्की भाषा में सख्त बात कहने की क्षमता रखती हैं। प्रियंका गांधी खेमे के नेता संसद के शीतकालीन सत्र में उनके भाषण को राहुल गांधी से कहीं बेहतर मानते हैं।

 कांग्रेस सांसद इमरान ने प्रियंका को पीएम फेस बनाने की पैरवी की

यही वजह है कि अब राहुल के खिलाफ प्रियंका का समर्थन खुलकर सामने आने लगा है। यूपी के सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की खुली वकालत कर दी। मसूद ने कहा कि कांग्रेस ने प्रियंका को पीएम चेहरा बनाया और अगले लोकसभा चुनाव में वो पीएम बनीं तो इंदिरा गांधी की तरह बांग्लादेश और पाकिस्तान को करारा जवाब देंगी। मसूद ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस में प्रियंका ही विदेश नीति के मोर्चे पर सशक्त नेता के रूप में स्थापित हो सकती है। मसूद के बयान ने कांग्रेस में तूफान ला दिया। इसके बाद में पार्टी ने ऐसा दबाव बनाया कि मसूद को अपने बयान पर सफाई देनी पड़ी। हालांकि इसने इस सवाल को धार दे दी कि क्या वास्तव में कांग्रेस में ‘राहुल हटाओ, प्रियंका लाओ’ की पुकार चल रही है ? इस प्रकरण ने मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह सवाल और तेज कर दिया कि क्या कांग्रेस सचमुच राहुल की जगह प्रियंका को आगे लाने पर विचार कर रही है या यह केवल नाराज नेताओं की आकांक्षाओं की प्रतिध्वनि है?
प्रियंका की बढ़ती स्वीकार्यता: कार्यकर्ताओं से संगठन तक
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी को प्रियंका गांधी को कम से कम राहुल के समकक्ष सार्वजनिक भूमिका देनी चाहिए, क्योंकि वे नेताओं‑कार्यकर्ताओं से सहज संवाद करती हैं और निर्णय लेने से पहले अलग‑अलग धाराओं को सुनती भी हैं। कुछ नेताओं ने तो दबी जुबान से यहां तक सुझाव दे डाला कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को हटाकर पार्टी की बागडोर प्रियंका को सौंप दी जाए। जिन नेताओं ने इसे खुलकर बोला, उन पर तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हुई। हालांकि, सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक, राहुल गांधी की लगातार हार और विवादित बयानों की तुलना में प्रियंका की छवि को कांग्रेस ऐसे पेश करने की कोशिश में दिखाई देती है, जैसे उनके आने से मृतप्राय हो रही कांग्रेस को नई ऑक्सीजन मिल जाएगी।
‘प्रियंका फॉर पीएम’ के पक्षधर में रॉबर्ट वाड्रा का नाम आगे
प्रियंका गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री मानने वालों की कतार अलग‑अलग कारणों से बढ़ती नजर आर रही है। पहला कारण तो राहुल गांधी का हर स्तर पर बुरी तरह फेल हो जाना है। इसके अलावा कांग्रेस के भीतर सांसद इमरान मसूद, ओडिशा के विधायक मोहम्मद मोक़ीम जैसे नेता और कुछ अन्य प्रदेश स्तर के चेहरे खुले तौर पर चाहते हैं कि प्रियंका को पार्टी शीर्ष नेतृत्व सौंपा जाए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राहुल गांधी के जीजा ने भी पहली बार सार्वजनिक तौर पर प्रियंका को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। गांधी परिवार की इस रार के बीच प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के बयान ने आग में घी का काम किया है। वाड्रा ने कहा है कि प्रियंका गांधी की पूरे देश में डिमांड है। देश की यह मांग है कि अब प्रियंका आगे आएं और नेतृत्व संभाले। रॉबर्ट के इस बयान ने राहुल गांधी को हाशिए पर धकेल दिया है। वाड्रा ने इस पर जोर देते हुए कहा है कि लोगों को प्रियंका में इंदिरा गांधी की झलक दिखती है और समय आने पर वे शीर्ष पद पर अनिवार्य रूप से दिखेंगी।
दो चेहरों में से एक को चुनना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
आज की तस्वीर यह है कि प्रियंका गांधी वाड्रा का राजनीतिक कद केवल राहुल गांधी के समानांतर नहीं, बल्कि कई मायनों में उनसे आगे बढ़ता दिख रहा है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व इस उभार को औपचारिक मान्यता देने की हिम्मत जुटा पाएगा या फिर उसे एक और ‘अन्यथा संभावित’ ब्रह्मास्त्र बनाकर फिर से चुप्पी साथ लेगा? और फिर राहुल गांधी की फेल विचारधारा को ही आगे बढ़ाएगा। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की राजनीति की बिसात पर सच यही है कि जैसे‑जैसे ‘प्रियंका फॉर पीएम’ का शोर और तेजी से जोर पकड़ेगा, वैसे-वैसे दोनों भाई‑बहन के बीच की रेखाएं और दूरियां बढ़ती जाएंगी। गांधी परिवार में बड़ी दरार और दीवार के बाद तय होगा कि चुनावी पोस्टर पर असली चेहरा कौन होगा?
राहुल को कोसने वाले प्रशांत से प्रियंका की मुलाकात के मायने
कांग्रेस के नेता और प्रियंका के पति ही नहीं, खुद प्रियंका वाड्रा की गतिविधियों में ‘राहुल-विरोध’ की झलक दिखाई देने लगी है। इसका पता इससे चलता है कि बिहार चुनाव में राहुल गांधी की पानी पी-पीकर बुरी तरह से कोस चुके प्रशांत किशोर के साथ प्रियंका की नजदीकी बढ़ी है। इन दिनों जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी के बीच एक अहम मुलाकात हुई है। इसके बाद कांग्रेस के साथ-साथ राजनीति भी गर्मा गई है। माना जा रहा है कि प्रशांत के आने से वर्ष 2029 का लोकसभा का चुनावी जंग एक नए गठबंधन के साथ हो सकता है। क्योंकि जंग हारने वाले जब दो दल मिलते हैं तो जीत के नए समीकरण पर ही बात को केंद्रित करते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी जंग में महागठबंधन की बात करें तो कांग्रेस गठबंधन की राजनीति में सहज नहीं रही है। कई बार तो अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात तक कर डाली। ऐसा संभव है कि प्रियंका गांधी से प्रशांत किशोर की बात एक चुनावी रणनीतिकार के रूप में हुई हो। लेकिन दोनों के गठबंधन की खबरें हवा में हैं। बता दें कि कांग्रेस के साथ पंजाब में प्रशांत किशोर काम भी कर चुके हैं।
राहुल बनाम प्रशांत किशोर: राजनीति में नैरेटिव की लड़ाई
बिहार चुनाव राहुल वर्सेज प्रशांत किशोर का ताजा उदाहरण हैं। दरअसल, भारतीय राजनीति में जब कोई चुनावी रणनीतिकार सीधे किसी नेता को चुनौती देता है, तो वह सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, पूरी राजनीति की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। प्रशांत किशोर के राहुल गांधी के खिलाफ हालिया बयान इसी श्रेणी में आते हैं। ये बयान केवल आलोचना नहीं, बल्कि कांग्रेस की सोच, नेतृत्व और जमीनी राजनीति से उसके कटाव का आईना हैं। यह आलोचना राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करती है जो सिर्फ भाषणों में जिंदा रहते हैं, लेकिन चुनावी जमीन गंवा देते हैं। किशोर ने कहा था कि राहुल गांधी न तो बिहार में टिकते हैं, न वहां की सामाजिक-आर्थिक जटिलताओं को आत्मसात करते हैं। गांव में रात बिताने की चुनौती देकर उन्होंने राहुल गांधी की जमीनी पकड़ पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया था।
आखिर राहुल गांधी को क्यों सुने Gen-Z – प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर का सवाल है कि राहुल गांधी को क्यों सुने Gen-Z. यह सवाल साधारण नहीं है। यह सीधा हमला है राहुल गांधी की प्रासंगिकता पर। किशोर का तर्क है कि आज का युवा—खासतौर पर बिहार और उत्तर भारत का युवा—भावनात्मक भाषणों या प्रतीकात्मक यात्राओं से नहीं, बल्कि स्थायी समाधान और ठोस रोडमैप से जुड़ता है। उनके अनुसार राहुल गांधी की राजनीति इवेंट-ड्रिवन है, जबकि युवा रिजल्ट-ड्रिवन राजनीति चाहता है। प्रशांत ने तो यहां तक कहा था कि राहुल गांधी ने “दिल्ली में बैठकर बिहार को समझने का भ्रम पाल लिया गया है।” इतना ही नहीं जिस वोट चोरी के मुद्दे पर राहुल गांधी ने यात्रा निकाली थी, उस पर ही किशोर का कहना था कि “वोट चोरी” जैसे मुद्दे केवल एक राजनीतिक बहाना है। इससे जनता का प्राथमिक सरोकार नहीं जुड़ा है।
96 चुनाव हारने के बाद कांग्रेस का बदलता नैरेटिव
कांग्रेस के भीतर बढ़ती इस बहस और हाल के बयानों ने साफ कर दिया है कि प्रियंका गांधी वाड्रा का कद राहुल गांधी की तुलना में तेजी से उभर रहा है। प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस के प्रधानमंत्री चेहरे के रूप में देखने वाले पार्टी नेताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह उभार केवल रिश्तेदारी या किसी करिश्मे की देन नहीं है, बल्कि पार्टी‑संगठन, संसद और जनमानस में लगातार फेल हो रहे राहुल गांधी के चलते बदल रहे समीकरणों का परिणाम है। कांग्रेस लंबे समय से राहुल गांधी को विचारधारा और नेतृत्व का केंद्रीय चेहरा बनाकर चल रही थी, लेकिन राहुल गांधी ने जब से पहला चुनाव लड़ा है और कांग्रेस का नेतृत्व संभाला है, तब से कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा के 96 चुनाव हार चुकी है। लगातार चुनावी पराजयों और आंतरिक असंतोष ने उनके नेतृत्व के प्रति भरोसे में खतरनाक दरार डाल दी है। यह दरार हर चुनावी हार के बाद और चौड़ी होती जा रही है। ताजा उदाहरण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार है।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को एक और हार का सामना करना पड़ा है। देश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के लिए चुनावी हार अब एक दुखद ‘पैटर्न’ बन चुकी है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के निराशाजनक नतीजों ने एक बार फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी 10 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है। जब से राहुल गांधी ने सक्रिय रूप से पार्टी की कमान संभाली है, तब से कांग्रेस लगातार एक के बाद एक राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। हर चुनाव में नई रणनीति, नए गठबंधन और नए वादों के बावजूद, पार्टी की ‘हार की राह’ खत्म होती नहीं दिख रही है। बिहार में महागठबंधन की हार ने यह स्थापित कर दिया है कि राहुल गांधी का नेतृत्व न तो मतदाताओं को आकर्षित कर पा रहा है और न ही पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं को एकजुट रख पा रहा है। चुनावों के आंकड़े गवाह हैं कि राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी में जैसे-जैसे जिम्मेदारी ज्यादा हुई। वैसे-वैसे कांग्रेस की दुर्दशा बद से बदतर होती गई। राहुल गांधी ने 2004 में लोकसभा का पहला चुनाव लड़ा था। वे सांसद से लेकर पार्टी महासचिव और अखिल भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी रहे। लेकिन हालात ये हैं कि पिछले दो दशक के उनके राजनीतिक जीवन के दौरान कांग्रेस हार की सैंचुरी लगाने के करीब पहुंच चुकी है। कांग्रेस पिछले 21 साल की अवधि में लोकसभा और विधानसभाओं के 96 चुनाव हार चुकी है।

महागठबंधन में दरार: लालू-तेजस्वी को आंखें दिखाने लगी कांग्रेस, RJD से नहीं मिले कांग्रेस नेता

जब राहुल गाँधी सिर्फ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में तेजस्वी के साथ अपना रोड शो कर रहे थे तभी इसी ब्लॉग पर लिखा था कि तेजस्वी ने अपनी जमीन और अपने ही कार्यकर्ताओं को लेकर राहुल को खुला मैदान देने से अपने ही पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है। दूसरे यह कि जब तक INDI गठबंधन राहुल को सिरमौर बनाकर रखेगा कांग्रेस के साथ-साथ अपना भी नुकसान करते रहेंगे। क्योकि जितना राहुल ही नहीं गाँधी परिवार बोलेगा बीजेपी को कोई नहीं हरा सकता।   
बिहार में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद महागठबंधन में सीट और टिकटों के लेकर घमासान मच गया है। आरजेडी चीफ लालू यादव की कार की घेराबंधी कर डाली तो राबड़ी के आवास के बाहर नाराज कार्यकर्ताओं का अखाड़ा बन गया। उधर कांग्रेस भी महागठबंधन की कमजोर कड़ी होने के बावजूद लालू-तेजस्वी पर आंखे तरेर रही है। आलाकमान की शह पर कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव को भी भाव नहीं दे रहे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना पहुंच चुके हैं। लेकिन उन्होंने जानबूझकर लालू और तेजस्वी से मुलाकात नहीं की। इससे महागठबंधन पर महा-संकट आने के आसार नजर आने लगे हैं। यदि दो-तीन दिन में सियासी पेच ना सुलझा तो दरार और बढ़ सकती है। दूसरी ओर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर भी विवादों में घिर गए हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही पीके पर पैसे लेकर सीटें बांटने के आरोप लगाए हैं। ऐन चुनाव से पहले ऐसी पोल खुलने के बीच मानहानि मामले में नोटिस ने पीके की टेंशन और बढ़ा दी है।

 राहुल के पीछे लग तेजस्वी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी

दरअसल, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली थी। इस यात्रा में राहुल गांधी 17 दिनों तक बिहार में रहे। तेजस्वी ने ही राहुल को लीड करने का मौका दिया और वे पहली बार राहुल गांधी के पीछे-पीछे घूमे। तेजस्वी ने यात्रा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे बिहार में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस की कुछ सांसें चलने लगीं। राहुल गांधी को गुमान हो गया कि यह सब उनकी वजह से है। इसलिए इसके बाद से कांग्रेस अब आरजेडी को आंखे दिखाने लगी है। तेजस्वी के सीएम फेस पर भी एतराज जताने के बाद अब कांग्रेस ने सीट बंटवारा के लिए राजद को अल्टीमेट तक दे दिया है। यदि दो-तीन दिन में दोनों दलों में सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपनी पहली सूची जारी कर सकती है। कांग्रेस ने पहले 15 उम्मीदवारों की सूची बना ली है। यदि कांग्रेस आम सहमति के पहले लिस्ट जारी कर देती है तो महागठबंधन पर महा-संकट के बादल छा सकते हैं।
कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू-तेजस्वी को नहीं दे रहे भाव
कांग्रेस ने भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतकर सबसे कमजोर प्रदर्शन किया हो। इसके बावजूद वह अगले माह होने वाले चुनाव के लिए राजद की आंख में आंख मिला कर बात कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस के बड़े नेता अब लालू यादव और तेजस्वी को भी भाव नहीं दे रहे। हाइकमान के आदेश पर अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी चुनाव प्रबंधन के लिए पटना आए। लेकिन उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी से मुलाकात करने की जरूरत ही नहीं समझी। भूपेश बघेल ने तो सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती ही दे डाली। उन्होंने कहा, तेजस्वी खुद को अपनी ओर से सीएम फेस बता रहे हैं, लेकिन सीएम का चेहरा उनकी पार्टी का हाईकमान घटक दलों की सहमति से तय करेगा।
महागठबंधन उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से चुनाव पर असर
चुनाव के लिए पहले चरण के नामांकन की शुरुआत 10 अक्टूबर से हो चुकी है। लेकिन 10 अक्टूबर तक महागठबंधन का सीट बंटवारा फाइनल नहीं हो सका है। संभावित प्रत्याशियों में इसको लेकर रोष है कि पिछली बार उम्मीदवारों की घोषणा में देरी से तैयारी का समय नहीं मिला था। पहले चरण के चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख से एक दिन पहले प्रत्याशियों के नाम घोषित किये गये। कांग्रेस ने आंतरिक गुटबाजी और संभावित असंतोष से निपटने के लिए यह देरी की थी। लेकिन इस कोशिश में उम्मीदवारों को हड़बड़ी में आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ा। टिकट को लेकर भी असंतोष था। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केके तिवारी ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कर टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं की जांच कराये जाने की मांग की थी।
तीन साल पीके के साथ घूमी, अब कर दिया विश्वासघात 
जन सुराज पार्टी की लिस्ट की घोषणा होते ही कार्यकर्ताओं और संभावित प्रत्याशियों की नाराजगी और रोष सामने आ गया है। जन सुराज की महिला कार्यकर्ता पुष्पा सिंह ने टिकट ना देने पर पीके पर विश्वासघात का आरोप लगाया है। उन्होंने मीडिया से कहा कि तीन साल मैं घर में नहीं बैठी। अपना सारा सुख त्याग दिया और जन सुराज के लिए काम किया। घर की बेटी-बहू होकर भी मैंने हिम्मत जुटाई। वे पैदल चले तो मैं भी उनके साथ चल पड़ी। आज मेरे साथ अन्याय हुआ है। टिकट के लिए उन लोगों का नाम अनाउंस हुआ जो क्षेत्र में घूमे ही नहीं, जनता उनको पसंद तक नहीं करती है। बहुत उम्मीद लेकर आई थी, सब पर पानी फिर गया है। मैंने तो उम्मीदवार बनने का प्रोसेस भी पूरा कर लिया था। पुष्पा ने कहा कि बनियापुर-मशरख की जनता जन सुराज का हिसाब कर देगी।
जन सुराज पार्टी ने 21 हजार लिए, टिकट किसी और को दिया
पाटलिपुत्र ऑफिस के बाहर पहुंचे कार्यकर्ता अमर कुमार सिन्हा ने दावा किया, ‘पार्टी ने उनको कुम्हरार विधानसभा से टिकट देने की बात कही थी। इसके लिए 21000 रुपए भी लिए काम कराया। 5 जनसभाएं करवाई और एंड मोमेंट पर ये सीट केसी सिन्हा को दे दी। सिन्हा के मुताबिक RCP सिंह ने अपनी बेटी को टिकट दिलवा दिया। पीके ने काम करवाया और RCP सिंह ने भरोसा दिया। हमने जन सुराज पार्टी छोड़ दिया। ये आदमी (प्रशांत किशोर) बिहार बदलाव की बात कर रहा है और दूसरे को चोर बोलकर खुद को ईमानदार साबित करना चाहता है।
मुजफ्फरपुर की सीट पीके ने 40 लाख में बेची- केजरीवाल
दरअसल, गुरुवार को जन सुराज ने 51 सीटों पर कैंडिडेट्स के नाम की घोषणा की। नाम की घोषणा के साथ ही हंगामा शुरू हो गया। कई कार्यकर्ता टिकट नहीं मिलने से नाराज दिखे। मुजफ्फरपुर में जन सुराज के नेता संजय केजरीवाल ने पार्टी से त्यागपत्र देने के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की है। संजय केजरीवाल ने कहा कि जन सुराज में अब सिद्धांत-विचारधारा नहीं, बल्कि पैसे का बोलबाला हो गया है। मुजफ्फरपुर नगर विधानसभा की टिकट 40 लाख रुपए में बेची गई है।
125 करोड़ के मानहानि केस में नोटिस ने पीके की बढ़ाई टेंशन
दूसरी ओर 125 करोड़ के मानहानि केस में प्रशांत किशोर को कोर्ट से नोटिस जारी हुआ है। भाजपा सांसद डॉ. संजय जायसवाल की ओर से दायर मानहानि केस की सुनवाई सब जज 1 बेतिया के न्यायालय में हुई। कोर्ट ने मानहानि केस एडमिट कर लिया है। इसमें जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर को कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने प्रशांत किशोर को विशेष दूत से समन देने का आदेश दिया है। सांसद की तरफ से मैंडेटरी इंजेक्शन पिटीशन भी दाखिल किया गया था। जिस पर कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

बिहार : क्या घोटालेबाज़ माँ की कोख में ट्रेनिंग लेकर पेट से बाहर आते हैं? प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ का शुरू हो गया करप्शन?; जो सड़क दरभंगा के BJP सांसद ने बनवाई, 2 महीने बाद उसके ही नाम पर निकाल लिए लाखों

सीता देवी (लाल घेरे में) पर MP गोपाल जी ठाकुर की बनाई सड़क का दोबारा फर्जी निर्माण दिखा कर भुगतान करने का आरोप है (फोटो साभार: Sita Devi & Gopal Jee Thakur/FB)
मार्च 2024 में एक सड़क का निर्माण पूरा हुआ। 11 लाख रुपए की लागत से। 2 महीने बाद फिर से उसी सड़क के निर्माण के नाम पर 6 लाख रूपए दोबारा निकाल लिए गए। मामला बिहार के दरभंगा जिले का है। भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में जिला परिषद की अध्यक्ष सीता देवी हैं।

फर्जी भुगतान के इस मामले की रिपोर्ट दैनिक भास्कर ने प्रकाशित की है। अखबार ने जब सीता देवी से इसको लेकर सवाल किया तो उनका जवाब था- आप (पत्रकार) ऑफिस में आइए, बात की जाएगी। उनका यह भी दावा है कि 11 लाख रुपए से दरभंगा के बीजेपी सांसद गोपाल जी ठाकुर ने देकुली गाँव में जो सड़क बनवाई है वह दूसरी तरफ है और उन्होंने दूसरी तरफ सड़क बनवाई है।

यह दूसरी बात है कि ग्रामीण उनके दावे को खारिज कर रहे हैं। ऑपइंडिया को ग्रामीणों ने बताया है कि सड़क गोपाल ठाकुर के सांसद निधि से ही बनी है। सीता देवी जिस सड़क का दावा कर रही हैं उसका जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं है।

गोपाल जी ठाकुर ने बनवाई सड़क

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, दरभंगा जिला के देकुली गाँव में यह गड़बड़ी हुई है। देकुली गाँव में दिलीप झा के घर से नारायण झा के घर PCC सड़क का निर्माण सांसद गोपाल जी ठाकुर ने अपनी सांसद निधि से करवाया था। यह सड़क 15वें वित्त आयोग के तहत बनाई गई थी। इसको लेकर सांसद ठाकुर ने जनवरी, 2023 में मंजूरी दी थी।

इसके बाद जनवरी, 2024 में इस सड़क निर्माण के लिए निर्माण विभाग मंजूरी मिल गई और मार्च, 2024 तक यह सड़क बना कर तैयार कर दी गई थी। इस सड़क के निर्माण के लिए मार्च, 2024 में ही भुगतान कर दिया गया था। यह भुगतान 11.67 लाख रूपए का किया गया था। यह काम करवाए जाने की जानकारी 15वीं वित्त आयोग के पोर्टल पर है।

इसका योजना कोड 67389875 है। यह सड़क अभी भी बनी हुई है और गाँव में लोग इससे आवाजाही करते हैं। गोपालजी ठाकुर के निर्माण करवाने का शिलापट भी रोड के किनारे लगा हुआ है।

सीता देवी पर दोहरीकरण के आरोप

इसी सड़क के निर्माण के नाम पर मई, 2024 में 6 लाख रूपए का भुगतान दरभंगा जिला परिषद की चेयरमैन सीता देवी ने किया है। यह भुगतान तीन किश्त में किया गया है। यह भुगतान उसी सड़क के नाम पर किया गया, जिसे गोपाल जी ठाकुर ने बनवाया।

इस योजना का नाम ‘रंजीत झा के घर से चन्द्रमोहन झा के घर तक सड़क का निर्माण’ था। रंजीत झा, उन्हीं नारायण झा के बेटे हैं, जिनके घर के पास निर्माण सांसद गोपाल जी ठाकुर ने करवाया था।

रिपोर्ट कहती है कि सीता देवी ने इस निर्माण का प्रस्ताव तब रखा था, जब वह जिला परिषद की सदस्य हुआ करती थीं और भुगतान तब हुआ, जब वह अध्यक्ष बन गईं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जब यह सड़क पहले ही बन चुकी थी तो ऐसे में दोबारा किस सड़क का निर्माण किया गया और किस एवज में पैसा लिया गया।

यह भी प्रश्न उठता है कि यदि उसी सड़क के निर्माण के लिए मार्च, 2024 में 11 लाख रूपए खर्च किए गए तो मई, 2024 में उसकी लागत 6 लाख रूपए कैसे रह गई। इसके अलावा इस पूरे मामले में यह भी प्रश्न उठता है कि मात्र कुछ ही महीनों के भीतर सड़क का निर्माण क्यों करवाया गया?

यदि नहीं करवाया गया तो भुगतान क्यों किया गया और यदि करवाया गया तो इसका कारण पहले बनी सड़क की गुणवत्ता खराब होना था क्या? गुणवत्ता खराब होने वाला तर्क भी इस मामले में फिट नहीं बैठता है, क्योंकि कोई सड़क अगर 2 महीने में टूट जाती तो उस पर जाँच होती। इस मामले में ऑपइंडिया ने एक स्थानीय व्यक्ति से भी बात की है।

ऑपइंडिया ने उनसे सड़क निर्माण के विषय में पूछा। नाम ना छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि इस सड़क का निर्माण गोपालजी ठाकुर ने ही करवाया था और इसे काफी मजबूती से बनवा दिया था। उन्होंने बताया कि इस सड़क के निर्माण को उनके समेत पूरे गाँव ने देखा था।

उन्होंने बताया कि यह सड़क तबसे चल रही है और इसके दोबारा निर्माण की कोई आवश्यकता ही नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार निर्माण के बाद और कोई भी गतिविधि यहाँ उन्हें नहीं दिखी। ग्रामीण ने बताया कि यदि इसको लेकर दोबारा पैसा लिया गया है, तो यह गड़बड़ी है। इस गड़बड़ी को लेकर जाँच की माँग की गई है।

जिला परिषद से जुड़े लोगों ने यह भी आशंका जताई है कि चुनावी वर्ष में यह घोटाला कहीं सरकार की छवि बिगाड़ने को तो नहीं किया गया। सीता देवी को लोगों ने जनसुराज पार्टी से जुदा बताया है। सीता देवी ने इस मामले में दैनिक भास्कर से बात की है।

उन्होंने दैनिक भास्कर से कहा, “दोनों दो साईड का मामला है। एक तरफ से सांसद की ओर से और दूसरी तरफ से जिला परिषद की ओर से सड़क बनाई गई है। आप ऑफिस में आए, बात की जाएगी।” अब इस मामले में जाँच की माँग हो रही है।

पहले भी सामने आ चुकी 15 करोड़ रूपए की गड़बड़ी

इससे पहले भी जिला परिषद में 15 करोड़ रूपए की गड़बड़ी पकड़ी जा चुकी है। मई, 2025 में ही जिला परिषद के मुख्य अभियंता के नाम से फर्जी तरीके से हस्ताक्षर करके 142 योजनाओं को मंजूरी देने की बात सामने आई थी। इन योजनाओं की लागत 15 करोड़ रूपए थी। बाद में मुख्य अभियंता ने स्वयं इन योजनाओं को मंजूरी देने की बात से इनकार किया था। इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद इन योजनाओं पर रोक लगा दी गई थी और जाँच चालू कर दी गई थी।

‘BJP बंगाल में बनेगी अकेली सबसे बड़ी पार्टी, TMC के लिए आ रहा मुश्किल समय’: प्रशांत किशोर, ममता बनर्जी के ‘रणनीतिकार’

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का आगामी लोकसभा चुनावों में क्या हाल होगा, इस पर ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार रह चुके प्रशांत किशोर ने एक मीडिया संस्थान से बात की। प्रशांत किशोर ने इस बातचीत में अपना दावा किया कि भाजपा बंगाल में एक बड़ी पार्टी बनकर उभरने वाली है।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम हैदराबाद डॉयलॉग्स में बात करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा, “मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि भाजपा हर मायने में बंगाल में टीएमसी से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर रही है। लोकसभा चुनाव में बंगाल से चौंकाने वाले नतीजे देखने के लिए तैयार रहिए जो कि भाजपा के पक्ष में होंगे। जब मैं कहता हूँ कि भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव में बंगाल में सिंगल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी तो कुछ लोग कह देते हैं- अरे तुम तो भाजपा के एजेंट हो इसलिए ऐसा कहते हो। अगर मैं ऐसा नहीं कहूँगा तो प्रोफेशनली में ईमानदार नहीं कहलाऊँगा।”

प्रशांत किशोर आगे कहते हैं, “मैं कोई पार्टी का प्रवक्ता नहीं हूँ कि मुझे वही कहना है जैसा पार्टी चाहती है। लेकिन ये तथ्य है। ये न्यूज जाते ही बंगाल में लोग मुझे भाजपा का पिट्ठू बोलेंगे। लेकिन आप नतीजे देखेंगे तो पता चलेगा। मैं देख पा रहा हूँ बीजेपी बहुत बड़ा कमबैक बंगाल में करने वाली है, जो कि टीएमसी समर्थकों के लिए बहुत ही निराशाजनक बात है। मैं टीएमसी का कठिन समय देख पा रहा हूँ।”

इससे पहले प्रशांत किशोर ने साल 2021 में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उस समय कहा था कि पीएम मोदी का अनूठा अनुभव उनकी यूएसपी है। किशोर ने कहा था कि पीएम मोदी का विशाल राजनीतिक अनुभव उन्हें मतदाताओं की इच्छाओं और महत्वकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करता है। किशोर ने कहा कि वह अपने 40-45 साल के अनुभवों के कारण ‘दूसरे अनुमान (सेकंड गेस)’ लगाने में सक्षम होते हैं।