Showing posts with label #SBI Research. Show all posts
Showing posts with label #SBI Research. Show all posts

SBI रिसर्च: दो साल में जेट स्पीड से हम तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनेंगे, 2030 तक अपर मिडल इनकम वाला बनेगा देश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजनरी नेतृत्व में भारत ने बीते एक दशक में जिस तेज आर्थिक छलांग को अंजाम दिया है, वह अब आंकड़ों की भाषा में बोल रही है। भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस गति से दौड़ रही है, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है और न ही केवल वैश्विक परिस्थितियों की देन है, बल्कि यह उस दूरदर्शी नेतृत्व का नतीजा है, जिसने नीति, नीयत और नजर, इन तीनों को एक ही दिशा में साध दिया है। आज भारत की जीडीपी ग्रोथ न केवल दुनिया में सबसे तेज है, बल्कि यह स्थायी, संतुलित और भविष्य-उन्मुख भी है। यही वजह है कि वैश्विक मंदी, युद्ध और अस्थिरताओं के बीच भी भारत की इकोनॉमी जेट स्पीड से आगे बढ़ रही है, जबकि कई विकसित देश रनवे पर ही हांफते दिख रहे हैं। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट बताती है कि यह वही भारत है, जो 2014 में 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की सीमाओं में घिरा हुआ था। आज वही भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की दहलीज पार करने को तैयार है और 2028 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने जा रहा है। यह परिवर्तन केवल आकार का नहीं, बल्कि संरचना का है। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने भारत को “वेलफेयर स्टेट” से आगे बढ़ाकर “वर्कफेयर स्टेट” की दिशा में मोड़ा, जहां सब्सिडी भी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनी और सबका साथ, सबका विकास के मंत्र के साथ समावेशी विकास हुआ।

देश में विकास अब कोई नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव

दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसियां और वित्तीय संस्थान आज जिस भरोसे के साथ भारत की ओर देख रही हैं, वह भरोसा अचानक पैदा नहीं हुआ। जीएसटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, पीएलआई स्कीम, रिकॉर्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश और वित्तीय अनुशासन आदि उपायों ने मिलकर भारत की आर्थिक नींव को इतना अधिक मजबूत कर दिया है कि अब झटके उसे गिरा नहीं सकते। मूडीज द्वारा 7.3 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अनुमान और एसबीआई रिसर्च का यह आकलन कि भारत दो वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, उसी भरोसे की आधिकारिक मुहर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विकास केवल कॉरपोरेट बैलेंस शीट तक सीमित नहीं है। बढ़ता मिडिल क्लास, उभरता अपर मिडिल इनकम समूह और 2030 तक भारत का अपर मिडिल इनकम वाला देश बनने का अनुमान इस बात का संकेत है कि आर्थिक विकास अब आम जीवन में उतर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने भारत को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां विकास कोई नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव बनता जा रहा है।

2014 से 2028: इकोनॉमी की लंबी छलांग, आंकड़ों की सीढ़ी चढ़ता भारत

भारत की आर्थिक कहानी अब अनुमानों, आकांक्षाओं या राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं रही। यह कहानी अब ठोस आंकड़ों की है। ऐसे आंकड़े, जो देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता को मजबूत कर रहे हैं। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट, मूडीज़ का ग्रोथ अनुमान और ऑक्सफैम की रिपोर्ट, तीनों मिलकर यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, तब भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर की थी। उस समय भारत दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और “ब्रिक्स” जैसे मंचों पर भी उसे ना उभरती ताकत के रूप में देखा जाता था, ना ही निर्णायक शक्ति के रूप में। लेकिन पिछले एक दशक में पीएम मोदी की विजनरी नीतियों ने सारी तस्वीर बदलकर रख दी है। अब स्पेस से लेकर टेक्नोल़ॉजी तक हर सेक्टर में तेजी बढ़ते भारत की ओर दुनिया देख रही है।

जर्मनी-जापान को पीछे छोड़ तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की तैयारी
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, 2021 तक यह अर्थव्यवस्था करीब 3 ट्रिलियन डॉलर के स्तर को छू चुकी थी। महामारी के झटकों के बावजूद भारत ने जो रिकवरी दिखाई, उसने दुनिया को चौंकाया। पिछले साल में भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को पार करने की दहलीज पर था, जिसे अब बड़ी छलांग लगाकर पार करना है। एक अनुमान के मुताबिक भारत 2028 तक 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य पूरा कर लेगा। एसबीआई रिसर्च का यह निष्कर्ष कि भारत अगले दो वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, केवल आकार का सवाल नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की विकास दर, निवेश प्रवाह और घरेलू मांग, तीनों एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। जर्मनी और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं जहां जनसंख्या, मांग और उत्पादकता की सीमाओं से जूझ रही हैं, वहीं भारत युवा जनसंख्या और बढ़ती खपत के बल पर आगे निकलने को तैयार है।

अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज की मुहर: 7.3 प्रतिशत की ग्रोथ
अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज़ द्वारा 2025 के लिए 7.3 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अनुमान वैश्विक संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। आज जब अमेरिका और यूरोप 1–2 प्रतिशत की वृद्धि को भी उपलब्धि मान रहे हैं, भारत का 7 प्रतिशत से ऊपर रहना उसकी आंतरिक मजबूती का संकेत है। यह ग्रोथ “बबल” नहीं, बल्कि निवेश, खपत और सुधारों के साझा असर का परिणाम है। पिछले एक दशक में भारत की सबसे बड़ी ताकत पीएम मोदी की विजनरी नीतियों की निरंतरता रही है। जीएसटी, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, डिजिटल इंडिया और इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपेक्स, इन सभी ने मिलकर अर्थव्यवस्था को औपचारिक, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाया है। एसबीआई रिसर्च स्पष्ट करता है कि भारत अब “रीफॉर्म थकान” के दौर से निकलकर “रीफॉर्म डिविडेंड” के चरण में प्रवेश कर चुका है।

भारत में 2030 तक अपर मिडिल क्लास का तेजी से विस्तार
भारत 2030 तक एक ऐसा देश बनने की ओर अग्रसर है, जहां अपर मिडिल क्लास की संख्या ऐतिहासिक रूप से बढ़ेगी। औसत आय में वृद्धि, औपचारिक रोजगार का विस्तार और वित्तीय समावेशन ने खपत को मजबूत किया है। यही कारण है कि वैश्विक मंदी के बावजूद भारत की घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश भारत के सुनहरे भविष्य की नींव रख रहा है। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क, इन पर हुआ निवेश अब केवल खर्च नहीं, बल्कि उत्पादक पूंजी बन चुका है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, सरकार के कैपेक्स ने निजी निवेश को आकर्षित किया है और रोजगार सृजन को गति दी है। यह वही मॉडल है, जिसने पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को उछाल दिया था।

ऑक्सफैम रिपोर्ट और मेक इन इंडिया एवं पीएलआई की सफलता
भारत अब केवल सेवाओं की अर्थव्यवस्था नहीं रहा। पीएलआई योजनाओं के चलते इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण, ऑटोमोबाइल, फार्मा और रक्षा उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी है। मूडीज़ का आकलन भी बताता है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर आने वाले वर्षों में ग्रोथ का अहम स्तंभ बनेगा। ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि भारत में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और लक्षित सब्सिडी ने असमानता के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया है। मुफ्त राशन, स्वास्थ्य बीमा और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने निचले तबके की खपत क्षमता को बनाए रखा, जो आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।

टैक्स कलेक्शन में वृद्धि और सब्सिडी के लक्षित वितरण से इकोनॉमी मजबूत
डिजिटल भुगतान और जीएसटी नेटवर्क ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक दायरे में लाया है। इससे टैक्स बेस बढ़ा, राजस्व में स्थिरता आई और नीति निर्माण अधिक डेटा-आधारित हुआ। एसबीआई रिसर्च इसे दीर्घकालिक उत्पादकता वृद्धि का आधार मानता है। तेज ग्रोथ के साथ घाटे को नियंत्रित रखना आसान नहीं होता, लेकिन भारत ने इस संतुलन को साधा है। टैक्स कलेक्शन में वृद्धि, सब्सिडी का लक्षित वितरण और खर्च की प्राथमिकताओं ने अर्थव्यवस्था को विश्वसनीय बनाया है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक सप्लाई चेन बाधाओं के बीच भारत का स्थिर रहना उसकी आंतरिक शक्ति का प्रमाण है। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा लगातार बना हुआ है। 2 ट्रिलियन डॉलर से 5 ट्रिलियन डॉलर तक की यात्रा केवल आर्थिक मजबूती नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की यात्रा है। एसबीआई रिसर्च, मूडीज और ऑक्सफैम, तीनों संकेत देते हैं कि भारत सही दिशा में, सही गति से आगे बढ़ रहा है। इसलिए अब तो तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना भारत के लिए लक्ष्य नहीं, केवल एक पड़ाव होगा।

अपने ही जाल में फंस रहे ट्रम्प; मोदी सरकार का सख्त संदेश, नहीं लेंगे अमेरिकी F-35 फाइटर, एसबीआई रिसर्च- ट्रंप टैरिफ से USA को ज्यादा नुकसान


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सात अगस्त से भारत के खिलाफ 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का पैंतरा खुद उनके लिए ही उल्टा पड़ने वाला है! ट्रंप जिस F-35 फाइटर जेट की जबरन खरीद के लिए टैरिफ के माध्यम से भारत पर दबाव बना रहे थे, उसके बारे में भारत ने अमेरिकी अधिकारियों को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि उसकी फाइटर जेट खरीदने में दिलचस्पी नहीं है। ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है। दूसरी ओर एसबीआई रिसर्च में यह भी साफ तौर पर सामने आया है कि ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी का नुकसान भारत से ज्यादा अमेरिका और उसके नागरिकों को ही होने वाला है। रिपोर्ट के अनुमान के अनुसार भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला अमेरिका के लिए महंगा साबित होगा। टैरिफ के कारण हर अमेरिकी उपभोक्ता को सालाना औसतन 2,400 डॉलर (करीब दो लाख रुपए) का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। अमेरिका में कम आय वाले परिवारों पर इसका असर तीन गुना तक हो सकता है। रिसर्च यह भी बताता है कि ट्रंप टैरिफ से डॉलर कमजोर हो सकता है। इसके अलावा अमेरिका की जीडीपी में भारत से कहीं ज्यादा गिरावट का अनुमान है।

अमेरिका के दबाव का भारत ने रणनीतिक कूटनीति से दिया जवाब
इस बीच वैश्विक मंच पर भारत की कूटनीति एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिका के बार-बार दबाव बनाने के बावजूद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखने का फैसला किया है। यह कदम न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की रणनीति को दर्शाता है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का भी परिचायक है। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो महासचिव मार्क रूट ने भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों को रूस से तेल खरीदने के खिलाफ चेतावनी दी थी। ट्रंप ने तो 25 प्रतिशत टैरिफ और रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त जुर्माने की घोषणा तक कर दी। फिर भी, भारत ने साफ कर दिया कि वह अपनी ऊर्जा नीति को राष्ट्रीय हितों और बाजार की ताकतों के आधार पर तय करेगा और किसी बाहरी दबाव में नहीं आएगा।

रूस से सस्ता तेल खरीदने से भारत को अरबों डॉलर की बचत
अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए तेल और गैस की बिक्री पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और झूठा दावा किया कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि भारत की ऊर्जा नीति पारदर्शी है और यह राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी स्पष्ट किया कि अगर रूसी तेल पर प्रतिबंध लगता है तो भारत गुयाना, ब्राजील और कनाडा जैसे अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल आयात करेगा।

पीएम मोदी की नीति से घरेलू  महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिली

यह दर्शाता है कि भारत ने वैकल्पिक रास्तों की तैयारी पहले से कर रखी है। बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिसके चलते रूसी तेल की कीमतें वैश्विक बाजार में कम हो गईं। तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया। मई 2025 में भारत ने रूस से 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का 38% से अधिक था। इससे भारत ने न केवल अरबों डॉलर की बचत की, बल्कि घरेलू स्तर पर महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिली।

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में उत्पादन की शर्त पर ही डिफेंस डील
भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति को तगड़ा झटका देते हुए साफ कर दिया है कि वह उससे F-35 फाइटर जेट नहीं खरीदेगा। F-35अमेरिका का 5वीं जेनरेशन का लड़ाकू विमान है। इसे लॉकहीड मार्टिन कंपनी ने डेवलप किया है। ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से ये जानकारी दी है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि मोदी सरकार निकट भविष्य में अमेरिका के साथ कोई बड़ा रक्षा सौदा करने का मन नहीं बना रही है। सरकार रक्षा उपकरण बनाने वाली साझेदारी में ज्यादा दिलचस्पी रखती है। यानी, भारत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और देश में उत्पादन की शर्त पर डिफेंस डील चाहता है। इस साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्हाइट हाउस दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को फाइटर जेट बेचने की पेशकश की थी। इसके बाद अप्रैल में भारत दौरे पर आए अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी भारत को F-35 खरीदने का ऑफर दिया था।