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ममता के तुष्टिकरण पर भारी पड़ेगा राष्ट्रवाद: इधर तारिक रहमान को मिठाई, उधर SIR में अड़ंगा बने अफसरों पर आयोग का डंडा


पश्चिम बंगाल मैं जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है। बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।

अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और सुशासन की मांग
ममता सरकार की इन्हीं कारगुजारियों से बंगाल में बदलाव का आहट सुनाई देने लगी है। यहीं से बंगाल में बदलाव की कहानी शुरू होती है। तुष्टिकरण की थकी हुई राजनीति के मुकाबले राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करने वाली भाजपा तेजी से जनता का भरोसा जीतती दिख रही है। ममता सरकार की घुसपैठ पर चुप्पी, वोट बैंक की राजनीति और ईडी-आयोग जैसी संस्थाओं से टकराव वाली नीतियां आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रही हैं। ममता बनर्जी अपनी जिद और तुष्टिकरण की राजनीति से बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा रही हैं। हर गलत फैसला, हर पक्षपाती कदम और हर संवैधानिक टकराव जनता को यह एहसास दिला रहा है कि अब बदलाव जरूरी है। यही कारण है कि बंगाल की फिजा में अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और स्थिरता की मांग गूंजने लगी है।

तुष्टिकरण के लिए तारिक रहमान को बधाई और मिठाई
राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हुई, वैसे ही ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने ट्रैक पर लौट आई यानी मुस्लिम तुष्टिकरण। बांग्लादेश में जीत हासिल करने वाले तारिक रहमान को जीत की बधाई के साथ मिठाई भेजना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक गहरा संदेश है। यह संदेश साफ है—वोट बैंक सर्वोपरि है, चाहे राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दांव पर क्यों न लग जाए। विडंबना देखिए कि जिस बंगाल में सबसे ज्यादा अवैध घुसपैठियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है, उसी बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशी नेता को मिठाई भेजने में संकोच नहीं करतीं। सवाल यह है कि क्या राज्य के मूल निवासियों की चिंता से ज्यादा जरूरी विदेश के ‘भाई’ से रिश्ते निभाना है? यह दोहरा चरित्र अब किसी से छिपा नहीं रहा।

जय श्रीराम के नारों से बिदकने वाली ममता की बाबरी यात्रा पर बोलती बंद
दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता सरकार को इन दिनों कई भूचाल का सामना करना पड़ रहा है। ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हैं तो खुद उनकी पार्टी में उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है। कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद रहे विधायक हुमायूं कबीर अब उन्हीं के गले की फांस बनते जा रहे हैं। मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा, उस पर अमल और  बाबरी यात्रा निकालकर  राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के नारों से ही बिदक जाती थीं, उनकी बोलती बाबरी यात्रा पर बंद हो गई है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यही साम्प्रदायिक संतुलन अब तेजी से दरकता नजर आ रहा है। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27-28 प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णायक वोट बैंक बनते रहे हैं। लेकिन अब यही वोट बैंक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि वोट-बैंक रूपी यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

चुनाव आयोग का सख्त संदेश: अब लापरवाही नहीं चलेगी
इस बीच चुनाव आयोग ने ममता सरकार को करारा झटका दिया है। SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में अड़ंगा डालने वाले मुख्यमंत्री के सात अधिकारियों को सस्पेंड कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि संवैधानिक कार्यों में बाधा किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि तृणमूल सरकार की मनमानी पर सीधा तमाचा है। सात अफसर निलंबित हो गए, लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा करने का साहस कहां से मिला? क्या बिना मुख्यमंत्री के इशारे के इतने बड़े स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव है? अफसरों को मोहरा बनाकर खुद को पाक-साफ दिखाने की यह पुरानी राजनीति अब जनता समझ चुकी है। दरअसल, ममता सरकार की राजनीति का केंद्र बिंदु वर्षों से एक ही रहा है और वह है एक वर्ग विशेष को खुश रखना। अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार की ढिलाई किसी भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: एसआईआर में दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं
हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी ममता सरकार को साफ शब्दों में चेताया कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े, यह अपने आप में बताता है कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव बनाया जा रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से भिड़ती नजर आई हों। कभी राज्यपाल से टकराव, कभी केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप, ईडी की टीम से टकराव और अब चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, यह एक ऐसे नेतृत्व की तस्वीर पेश करता है, जो कानून से ऊपर खुद को मान बैठा है।

अब इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर जोर दे रही जनता
एक ओर जहां देश के दूसरे हिस्से इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर बात कर रहे हैं, वहीं बंगाल की राजनीति आज भी पहचान और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। उद्योग पलायन कर रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का फोकस बांग्लादेशी नेताओं को मिठाई भेजने और वोट बैंक साधने पर है। अब बंगाल का आम नागरिक सवाल पूछ रहा है, क्या यही सुशासन है? क्या यही ‘मां-माटी-मानुष’ का मॉडल है? जिन इलाकों में स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं, वहां सरकार की चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है। जनता समझ रही है कि यह सब अचानक नहीं हो रहा, बल्कि वर्षों की राजनीतिक प्रयोगशाला का नतीजा है।

तुष्टिकरण की राजनीति अब भारी पड़ेगा विकास और सुशासन
सात अफसरों का निलंबन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिस्टम से खिलवाड़ नहीं चलेगा। यह ममता सरकार के लिए आखिरी चेतावनी भी हो सकती है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, जवाबदेही जरूर होती है। ममता बनर्जी आज उसी जाल में फंसती दिख रही हैं, जिसे उन्होंने खुद बुना है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और अफसरशाही का दुरुपयोग, ये सब मिलकर उनकी सरकार की विश्वसनीयता को तेजी से खोखला कर रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब मनमानी का दौर खत्म होने वाला है। बंगाल बदलाव चाहता है। वह विकास और सुशासन चाहता है। वह महिला शक्ति का आत्मसम्मान और युवाओ के लिए रोजगार चाहता है। और शायद इस बार वोट सिर्फ भावनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई, सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए ही पड़ेगा।

बाबरी यात्रा के जरिए ममता के मुस्लिम वोट बैंक में पैठ बनाना लक्ष्य
बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद नादिया-मुर्शिदाबाद बॉर्डर (पलाशी) से बेलडांगा तक 22 किलोमीटर का पैदल मार्च (बाबरी यात्रा) शुरू की है। इस बाबरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुर्शिदाबाद के बेल़डांगा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (Replica) का निर्माण करना है। इस यात्रा के जरिए कबीर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपनी पैठ बनाएंगे और अपनी नई पार्टी, जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के लिए जनसंपर्क करेंगे। यह यात्रा नादिया जिले के ऐतिहासिक स्थल पलाशी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद जिले में निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद स्थल तक जाएगी। हालांकि पहले इसे उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक ले जाने की योजना थी, जिसे फिलहाल छोटा कर दिया गया है। खबरों के मुताबिक पहले यह यात्रा लगभग 265 किलोमीटर लंबी होनी थी, लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के चलते और पुलिस की अनुमति न मिलने के कारण इसे घटाकर 22 किलोमीटर कर दिया गया है।

राहुल गाँधी ने बांग्लादेश में तख्तापलट की अपनी सहमति दी: बांग्लादेशी पत्रकार ने लगाया आरोप, कहा- खालिदा जिया के बेटे से लंदन में की थी मुलाकात

                                         तारिक रहमान और राहुल गाँधी (साभार: Firstpost & Mint)
भारत की प्रमुख विपक्ष दल कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी ने अपनी लंदन यात्रा के दौरान बांग्लादेश की कट्टरपंथी नेता खालिदा जिया के भगोड़े बेटे तारिक रहमान से मुलाकात की थी। खालिदा जिया के जेल में रहने के दौरान तारिक रहमान को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था। राहुल गाँधी और तारिक रहमान पर यह आरोप बांग्लादेश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने लगाया है।

बांग्लादेशी समाचार पत्र ‘ब्लिट्ज़’ के संपादक सलाहुद्दीन शोएब चौधरी ने शनिवार (10 अगस्त 2024) को रिपब्लिक टीवी के एक शो में यह दावा किया। चौधरी ने डिबेट के दौरान कहा कि लंदन में हुई यह गुप्त बैठक बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी।

 

सलाहुद्दीन शोएब चौधरी ने दावा किया कि BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान के साथ हुई उस बैठक में राहुल गाँधी ने इस बात के लिए अपनी सहमति दी, जो आज बांग्लादेश में देखने को मिल रहा है। यानी शेख हसीना को हटाने के लिए दोनों के बीच सहमति बनी। सलाहुद्दीन शोएब चौधरी ने आगे कहा, “बांग्लादेश पर तालिबान ने कब्जा कर लिया है और हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है।”

बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार के इस दावे पर भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोला है। भाजपा के IT सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा, “यह गंभीर मामला है। बालक बुद्धि को इस यात्रा के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए और यह भी बताना चाहिए कि उन्होंने किससे मुलाकात की।” भाजपा नेता सरदार आरपी सिंह ने भी राहुल गाँधी से सवाल किया है।

सरदार आरपी सिंह ने सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “राहुल गाँधी को लंदन में बीएनपी के तारिक रहमान के साथ अपनी बैठक के बारे में स्पष्ट करना चाहिए। क्या उन्होंने बांग्लादेश में तख्तापलट और हिंदुओं के नरसंहार को आगे बढ़ाने का आदेश दिया था? यह जानकारी बांग्लादेश में बैठे ब्लिट्ज के संपादक सलाउद्दीन चौधरी ने साझा की है।”

उन्होंने यह भी लिखा था कि BNP का कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान इस्लामी आतंकवादी और सजायाफ्ता है। वह साल 2007 से बांग्लादेश से फरार है और ब्रिटेन में रह रहा है। उन्होंने कहा कि तारिक रहमान ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए डेविड बर्गमैन और जॉन डैनिलोविच जैसे पूर्व अमेरिकी राजनयिकों को लगाया था।

कौन है तारिक रहमान?

तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1967 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका हुआ है। वह बांग्लादेश की पहली महिला पीएम रहीं खालिदा जिया और बांग्लादेश के 7वें राष्ट्रपति रहे जियाउर रहमान के बेटे हैं। उनकी माँ खालिदा जिया इसके पहले वाली सरकार में एक राजनीतिक कैदी थीं। हाल ही में बांग्लादेशी सेना द्वारा देश तख्तापलट करने के बाद वह जेल से रिहा हुई हैं।
रहमान ने अपना राजनीतिक जीवन 1988 में बीएनपी के प्राथमिक सदस्य के रूप में शुरू किया। उन्होंने 1991 में राष्ट्रीय चुनावों के दौरान अपनी माँ के लिए प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1996-2001 के दौरान जब अवामी लीग सत्ता में थी, रहमान ने हाशिए पर पड़े लोगों के लिए न्याय की आड़ में सरकार के खिलाफ सक्रिय रूप से आंदोलन चलाया।
यूनाइटेड किंगडम में निर्वासित जीवन बिताने वाले तारिक रहमान 21 अगस्त 2004 को अवामी लीग की रैली पर ग्रेनेड फेंकने के मास्टरमाइंड है। इसमें शेख हसीना को निशाना बनाने के लिए सैन्य-ग्रेड आर्गेस ग्रेनेड से हमला किया गया था। हमले में महिला अवामी लीग की अध्यक्ष और दिवंगत राष्ट्रपति जिल्लुर रहमान की पत्नी इवी रहमान सहित 24 नेता और कार्यकर्ता मारे गए थे।
इस हमले के लिए तारिक रहमान को अदालत ने 10 अक्टूबर 2018 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 11 सितंबर 2008 को रहमान इलाज का बहाना बनाकर लंदन भाग गए। ऐसा भी कहा जाता है कि उन्होंने एक लिखित बॉन्ड दिया था कि वह भविष्य में राजनीति में शामिल नहीं होंगे। इसके बाद उन्हें लंदन जाने की अनुमति दी गई थी।
खालिदा ज़िया ने दावा किया कि बांग्लादेश लौटने के बाद उनका बेटा सक्रिय रूप से राजनीति में भाग लेगा। हालाँकि, लंदन से ही तारिक शेख हसीना सरकार के खिलाफ काम करने लगे। इसके बाद तारिक को सजा होने के बाद शेख हसीना सरकार ब्रिटेन की सरकार पर तारिक के प्रत्यर्पण के लिए लगातार दबाव डाल रही थी। हालाँकि, वह इसमें सफल नहीं हुईं।