राजधानी दिल्ली में मंगलवार (30 जून 2026) से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके लिए दिल्ली में 13 हजार से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों (SIR) की ड्यूटी लगाई गई है। पहले चरण के तहत आज से एन्यूमरेशन फॉर्म बाँटे जाएँगे। पहला चरण 29 जुलाई को खत्म होगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (29 जून 2026) को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अशोक कुमार ने एक महीने तक चलने वाली इस SIR प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। दिल्ली की 70 विधानसभाओं में 13,033 BLO और राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त BLA घर-घर जाकर सर्वे करेंगे।
BLO एन्युमरेशन फॉर्म की दो कॉपियाँ देंगे, जिसको भरने के बाद एक BLO को वापस करनी होगी और दूसरी अपने पास रहेगी। इस फॉर्म के साथ कोई भी पहचान पत्र या दस्तावेज जमा नहीं करना है। BLO को आदेश है कि अगर घर पर कोई नहीं मिलता है तो वह फॉर्म को घर में डालकर चला जाए और फिर कम से कम तीन बार चक्कर लगाए।
SIR में 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाने पर BBC ने ‘मुस्लिम-बहिष्कार’ का चलाया प्रोपेगेंडा
एक समय था जब भारतीय BBC द्वारा प्रसारित किसी समाचार पर आंख मीच कर विश्वास करते थे, लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा वही BBC बन रहा है (बी)Bhramit (बी)Biased (सी)Campaigner, भारत विरोधी आज इसी BBC का इस्तेमाल कर रहे हैं और हमारा कहलाए जाने वाला राष्ट्रीय मीडिया खामोश रहता है। या यूँ समझा जाए कि "यार जो प्रकाशित/प्रसारित करना है करो हम चुप रहेंगे। तुम भी अपनी रोजी-रोटी कमाओ और हम भी।" यह आम नागरिक से लेकर राजनेताओं के चिंतन का विषय है।
चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।
“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।
इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।
12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”
स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।
बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?
दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।
शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।
सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।
SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।
BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”
हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।
सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समय सीमा का ध्यान रखा जाए।
वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”
लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।
अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?
इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।
वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट
जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।
इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।
TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”
वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत
हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।
इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।
जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।
सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।
वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।
हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।
पश्चिम बंगाल मैं जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है। बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।
अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और सुशासन की मांग ममता सरकार की इन्हीं कारगुजारियों से बंगाल में बदलाव का आहट सुनाई देने लगी है। यहीं से बंगाल में बदलाव की कहानी शुरू होती है। तुष्टिकरण की थकी हुई राजनीति के मुकाबले राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करने वाली भाजपा तेजी से जनता का भरोसा जीतती दिख रही है। ममता सरकार की घुसपैठ पर चुप्पी, वोट बैंक की राजनीति और ईडी-आयोग जैसी संस्थाओं से टकराव वाली नीतियां आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रही हैं। ममता बनर्जी अपनी जिद और तुष्टिकरण की राजनीति से बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा रही हैं। हर गलत फैसला, हर पक्षपाती कदम और हर संवैधानिक टकराव जनता को यह एहसास दिला रहा है कि अब बदलाव जरूरी है। यही कारण है कि बंगाल की फिजा में अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और स्थिरता की मांग गूंजने लगी है।
तुष्टिकरण के लिए तारिक रहमान को बधाई और मिठाई राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हुई, वैसे ही ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने ट्रैक पर लौट आई यानी मुस्लिम तुष्टिकरण। बांग्लादेश में जीत हासिल करने वाले तारिक रहमान को जीत की बधाई के साथ मिठाई भेजना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक गहरा संदेश है। यह संदेश साफ है—वोट बैंक सर्वोपरि है, चाहे राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दांव पर क्यों न लग जाए। विडंबना देखिए कि जिस बंगाल में सबसे ज्यादा अवैध घुसपैठियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है, उसी बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशी नेता को मिठाई भेजने में संकोच नहीं करतीं। सवाल यह है कि क्या राज्य के मूल निवासियों की चिंता से ज्यादा जरूरी विदेश के ‘भाई’ से रिश्ते निभाना है? यह दोहरा चरित्र अब किसी से छिपा नहीं रहा।
जय श्रीराम के नारों से बिदकने वाली ममता की बाबरी यात्रा पर बोलती बंद दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता सरकार को इन दिनों कई भूचाल का सामना करना पड़ रहा है। ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हैं तो खुद उनकी पार्टी में उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है। कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद रहे विधायक हुमायूं कबीर अब उन्हीं के गले की फांस बनते जा रहे हैं। मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा, उस पर अमल और बाबरी यात्रा निकालकर राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के नारों से ही बिदक जाती थीं, उनकी बोलती बाबरी यात्रा पर बंद हो गई है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यही साम्प्रदायिक संतुलन अब तेजी से दरकता नजर आ रहा है। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27-28 प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णायक वोट बैंक बनते रहे हैं। लेकिन अब यही वोट बैंक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि वोट-बैंक रूपी यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
चुनाव आयोग का सख्त संदेश: अब लापरवाही नहीं चलेगी इस बीच चुनाव आयोग ने ममता सरकार को करारा झटका दिया है। SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में अड़ंगा डालने वाले मुख्यमंत्री के सात अधिकारियों को सस्पेंड कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि संवैधानिक कार्यों में बाधा किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि तृणमूल सरकार की मनमानी पर सीधा तमाचा है। सात अफसर निलंबित हो गए, लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा करने का साहस कहां से मिला? क्या बिना मुख्यमंत्री के इशारे के इतने बड़े स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव है? अफसरों को मोहरा बनाकर खुद को पाक-साफ दिखाने की यह पुरानी राजनीति अब जनता समझ चुकी है। दरअसल, ममता सरकार की राजनीति का केंद्र बिंदु वर्षों से एक ही रहा है और वह है एक वर्ग विशेष को खुश रखना। अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार की ढिलाई किसी भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: एसआईआर में दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी ममता सरकार को साफ शब्दों में चेताया कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े, यह अपने आप में बताता है कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव बनाया जा रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से भिड़ती नजर आई हों। कभी राज्यपाल से टकराव, कभी केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप, ईडी की टीम से टकराव और अब चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, यह एक ऐसे नेतृत्व की तस्वीर पेश करता है, जो कानून से ऊपर खुद को मान बैठा है।
अब इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर जोर दे रही जनता एक ओर जहां देश के दूसरे हिस्से इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर बात कर रहे हैं, वहीं बंगाल की राजनीति आज भी पहचान और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। उद्योग पलायन कर रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का फोकस बांग्लादेशी नेताओं को मिठाई भेजने और वोट बैंक साधने पर है। अब बंगाल का आम नागरिक सवाल पूछ रहा है, क्या यही सुशासन है? क्या यही ‘मां-माटी-मानुष’ का मॉडल है? जिन इलाकों में स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं, वहां सरकार की चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है। जनता समझ रही है कि यह सब अचानक नहीं हो रहा, बल्कि वर्षों की राजनीतिक प्रयोगशाला का नतीजा है।
तुष्टिकरण की राजनीति अब भारी पड़ेगा विकास और सुशासन सात अफसरों का निलंबन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिस्टम से खिलवाड़ नहीं चलेगा। यह ममता सरकार के लिए आखिरी चेतावनी भी हो सकती है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, जवाबदेही जरूर होती है। ममता बनर्जी आज उसी जाल में फंसती दिख रही हैं, जिसे उन्होंने खुद बुना है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और अफसरशाही का दुरुपयोग, ये सब मिलकर उनकी सरकार की विश्वसनीयता को तेजी से खोखला कर रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब मनमानी का दौर खत्म होने वाला है। बंगाल बदलाव चाहता है। वह विकास और सुशासन चाहता है। वह महिला शक्ति का आत्मसम्मान और युवाओ के लिए रोजगार चाहता है। और शायद इस बार वोट सिर्फ भावनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई, सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए ही पड़ेगा।
बाबरी यात्रा के जरिए ममता के मुस्लिम वोट बैंक में पैठ बनाना लक्ष्य बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद नादिया-मुर्शिदाबाद बॉर्डर (पलाशी) से बेलडांगा तक 22 किलोमीटर का पैदल मार्च (बाबरी यात्रा) शुरू की है। इस बाबरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुर्शिदाबाद के बेल़डांगा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (Replica) का निर्माण करना है। इस यात्रा के जरिए कबीर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपनी पैठ बनाएंगे और अपनी नई पार्टी, जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के लिए जनसंपर्क करेंगे। यह यात्रा नादिया जिले के ऐतिहासिक स्थल पलाशी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद जिले में निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद स्थल तक जाएगी। हालांकि पहले इसे उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक ले जाने की योजना थी, जिसे फिलहाल छोटा कर दिया गया है। खबरों के मुताबिक पहले यह यात्रा लगभग 265 किलोमीटर लंबी होनी थी, लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के चलते और पुलिस की अनुमति न मिलने के कारण इसे घटाकर 22 किलोमीटर कर दिया गया है।
पूर्वी भारत की राजनीति इन दिनों एक असामान्य करवट ले रही है। विशेषकर पश्चिम बंगाल, जहां सत्ता का समीकरण वर्षों से लगभग स्थिर दिखता था, अब वही जमीन अस्थिर होती जा रही है। एसआईआर ने राज्य की राजनीति को जिस तरह बदल दिया है, वह केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है; यह पहचान, सुरक्षा और शासन की विश्वसनीयता से जुड़ा भावनात्मक प्रश्न बन चुका है। बिहार में हुए चुनाव परिणामों और एसआईआर की चर्चा ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि इसके प्रभाव की तरंगें सीधे बंगाल तक पहुंची हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य नहीं मान रहे. क्योंकि बंगाल की राजनीति, अपनी जटिलताओं के बावजूद, कभी भी एकाकी नहीं रही। यह हमेशा पड़ोसी राज्यों के प्रभाव और केंद्र–राज्य संबंधों से प्रभावित होती आई है। इसी पृष्ठभूमि में यह सच्चाई भी सामने आने लगी है कि एसआईआर के डर से घुसपैठिए पश्चिम बंगाल छोड़कर भागने लगे हैं। खासकर राज्य के सीमावर्ती जिलों में घुसपैठियों की यह हालत यह आम लोगों की बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। एसआईआर की गूंज और घुसपैठ पर सवालिया निशान ने ममता सरकार की बेचैनी और बढ़ा दी है।तेज रिवर्स माइग्रेशन से कठघरे में ममता बनर्जी की सरकार
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के मुद्दे पर अब विमर्श शुरू हो गया है। भाजपा का कहना है कि बांग्लादेशी नागरिकों का पलायन उनके दावे को सच साबित कर रहा है, तो तृणमूल कांग्रेस का पलायन पर बचाव उसे कठघरे में खड़ा कर रहा है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर की वजह से बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक अपने देश लौट रहे हैं। भारत-बांग्लादेश की हकीमपुर सीमा पर जमे बांग्लादेशियों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो 10-15 साल पहले दलालों की मदद से भारत में घुस आए थे। या यह भी कह सकते हैं कि इनको तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नेताओं का भी समर्थन प्राप्त था। यही वजह है कि इन्होंने अपने रहने के लिए अस्थायी झुग्गियां बना लीं। फिर दलालों की मदद से आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र भी बनवा लिए। इसके बाद तो कई घुसपैठिए स्थायी आवास बनाकर रहने लगे। अब जब दो दशक बाद भारत में एसआईआर शुरू हुआ तो बांग्लादेशी नागरिकों ने यहां से पलायन करना शुरू कर दिया। इस रिवर्स माइग्रेशन ने बंगाल में घुसपैठ के विमर्श को धार दे दी है।
नवंबर की शुरुआत से ही लौटने लगे बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी
पश्चिम बंगाल के हकीमपुर में अंतरराष्ट्रीय सीमा से बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों के अपने देश लौटने के मामले में राजनीतिक वाकयुद्ध तेज हो गया है। मतदाता सूची को सुधारने के लिए शुरू किये गये अभियान और घुसपैठ पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आक्रामक रुख अख्तियार किया है। क्योंकि एसआईआर शुरू होने के कुछ ही दिन बाद प्रवासी बांग्लादेशियों के स्वदेश लौटने का सिलसिला शुरू हो गया था। सीमावर्ती जिलों में घुसपैठियों के टोले के टोले की स्वदेश वापसी की तस्वीरें मीडिया में आने लगीं। शुरू में इसे बहुत अधिक तवज्जों नहीं दी गयी, लेकिन अब यह राजनीतिक विमर्श बन गया है, जिसने सीमा चौकी को एक ‘वैचारिक युद्धक्षेत्र’ में बदल दिया है। उत्तर 24 परगना जिले के बनगांव में भारत-बांग्लादेश सीमा पर, स्थानीय लोगों और सुरक्षाकर्मियों ने बताया कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के शुरू होने के बाद नवंबर की शुरुआत से ही बिना दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों के वापस लौटने की कोशिशों में वृद्धि हुई है।
मनोवैज्ञानिक दबाव से हर दिन सैकड़ों लोग वापस लौट रहे बांग्लादेश
बीएसएफ के अधिकारियों के मुताबिक एसआईआर के चलते लगभग 150-200 लोग हर दिन बांग्लादेश लौट रहे हैं। कई बार यह संख्या दोगुनी भी हो जाती है। 30 नवंबर 2025 तक लगभग आठ-दस हजार लोग सीमा पार कर चुके हैं। दिसंबर माह में स्वदेश वापसी में और तेजी आने वाली है। बंगाल और बांग्लादेश की सीमा दशकों से संवेदनशील रही है। यहां अवैध आव्रजन कोई नया संकट नहीं, बल्कि ऐसी समस्या है जिसने धीरे-धीरे जनसंख्या संतुलन, रोजगार, स्थानीय राजनीति और कानून-व्यवस्था को प्रभावित किया है। अब एसआईआर के नाम पर छिड़ी राष्ट्रीय बहस ने एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा कर दिया है कि सीमावर्ती इलाकों में हलचल साफ देखी जा सकती है। स्थानीय सूत्र बताते हैं कि कई अवैध प्रवासी अपने ठिकानों से गायब हो रहे हैं, और कुछ समूह बांग्लादेश की ओर लौटने की कोशिश में निरंतर लगे हुए हैं।
जीरो लाइन की ओर बढ़ते लोग अवैध घुसपैठ की पुष्टि कर रहे – भाजपा
भाजपा का कहना है कि अपने छोटे-छोटे बैग और बच्चों को थामे जीरो लाइन की ओर बढ़ते लोगों की तस्वीरें पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ के उसके दावे को पुख्ता करती हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि उनकी पार्टी यही तो कह रही है। एसआईआर ने घुसपैठियों को हिलाकर रख दिया है। आखिरकार सच्चाई सामने आ रही है। वे इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें पकड़े जाने का डर है। भाजपा का कहना है कि अवैध रूप से बसे बांग्लादेशियों ने चुनावी जनसांख्यिकी को बदला है। अब एसआईआर ने रिवर्स माइग्रेशन को तेजी दी है। भाजपा का मानना है कि ये दृश्य उसके इस दावे को पुष्ट करते हैं कि ‘अवैध रूप से बसे बांग्लादेशियों’ ने दशकों से पश्चिम बंगाल की चुनावी जनसांख्यिकी को बदल दिया है। भाजपा प्रवक्ता कीया घोष ने कहा कि बांग्लादेशियों का वापस जाना उनके दावे को किसी संदेह के परे साबित करता है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से हजारों नामों का हटना भी भाजपा की बात को साबित करता है।
तुष्टिकरण की राजनीति करने वाला ममता बनर्जी का खेमा बहुत बैचेन
इसके राजनीतिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं। क्योंकि ऐसा मानना है कि तुष्टिकरण की नीति के चलते स्थानीय सरकार ने इन्हें प्रश्रय दिया हुआ था। इसीलिए सबसे ज्यादा बेचैनी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक खेमे में देखी जा रही है। ममता सरकार की राजनीति एक लंबे समय से विशिष्ट समुदायों के समर्थन पर टिकी रही है, और विपक्ष का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस ने “तुष्टिकरण” की नीति को शासन का स्थायी सूत्र बना दिया। यही कारण है कि जैसे ही घुसपैठ का सवाल राष्ट्रीय विमर्श में उभरा, तृणमूल कांग्रेस के भीतर असहजता बढ़ने लगी। ममता बनर्जी का एसआईआर के खिलाफ तीखा रुख इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा उनके पारंपरिक वोट बैंक को अस्थिर कर सकता है। बंगाल की सामाजिक संरचना में अवैध प्रवासियों का प्रश्न हमेशा से संवेदनशील रहा है, लेकिन इस बार कथा बदल चुकी है। अब यह केवल सुरक्षा या पहचान का सवाल नहीं, बल्कि सीधा राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बन गया है
बिहार में भाजपा की जीत की हवा बदले बंगाल में भी जमीनी समीकरण
यह भी सच है कि पड़ौसी राज्य बिहार में भाजपा-एनडीए की प्रचंड जीत ने इस बहस में एक नई परत जोड़ दी है। वहां के चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया कि नागरिकता, सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन जैसे मुद्दे अब केवल भाषणों में नहीं रह गए। ये सीधे मतदान को प्रभावित कर रहे हैं। रिजल्ट को प्रभावित कर रहे हैं। बिहार में भाजपा की सफलता और एसआईआर के प्रति सकारात्मक रुझान ने बंगाल में भाजपा को नई ऊर्जा दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार की हवा ने बंगाल में भी जमीन के समीकरण बदलने शुरू कर दिए हैं। भाजपा अब घुसपैठ और एसआईआर को एक केंद्रीय मुद्दे के रूप में पेश कर रही है, और तृणमूल कांग्रेस इस सच्चाई को रोक पाने में फिलहाल कमजोर दिख रही है।
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया जोरों पर चल रही है, इससे जुड़े कुछ न कुछ मामले सामने आ रहे हैं। अपना फर्जी वोट बैंक जाने के डर से सीएम ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस प्रक्रिया का विरोध किया जा रहा है। वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बीच चुनाव आयोग की ओर से एक बड़ा खुलासा किया गया है। आयोग के मुताबिक अभी तक के पुनरीक्षण में यह फैक्ट सामने आए हैं उनके अनुसार पश्चिम बंगाल की मौजूदा वोटर लिस्ट में 26 लाख से अधिक वोटर्स के नाम 2002 की वोटर लिस्ट से मेल नहीं खा रहे हैं। यानि एक तरह से राज्य में 26 लाख से अधिक वोटर ‘फर्जी’ हैं। आयोग के मुताबिक फाइनल रिपोर्ट में यह संख्या बढ़ भी सकती है। इससे पहले भी राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अब तक 10 लाख से ज्यादा SIR फॉर्म ऐसे हैं जिन्हें अब तक जमा नहीं कराया गया है। इससे साफ है कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटर बने हुए हैं। चुनाव आयोग के इस खुलासे के बाद तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के होश उड़े हुए हैं।
चुनाव आयोग को Employees' Provident Fund Pension तर्ज पर वोटर लिस्ट बनानी चाहिए। जिसमे आधार कार्ड, मोबाइल नंबर, चेहरा और अंगूठे का निशान हो, न मतदान के दिन बुर्का(चेहरे को पहचानने के लिए) हटाने का झगड़ा और न ही मतदान तक किसी पोलिंग एजेंट के बैठने की जरुरत। सिर्फ मतदान शुरू होने से पहले और मतदान ख़त्म होने पर EVM को चेक और सील करते समय एजेंट की जरुरत। जिस तरह आज टेक्नोलॉजी विकसित कर रही है, उसके सहयोग से चेहरा और ऊँगली अंगूठे का निशान उस मतदाता ने अगर कहीं और किसी अन्य नाम से नाम दर्ज करवाया हुआ है सब अपने आप सामने आने पर उम्मीद है पूरे भारत में लाखों फर्जी मतदाता निकल जाएंगे। चर्चा है कि घरों में काम करने वाली बांग्लादेशी महिलाओं ने हिन्दू क्षेत्रों में हिन्दू नाम रख और अन्य प्रदेश में किसी और नाम से लिस्ट में नाम है। आधार बनवाये हुए हैं। सब पकड़ में आ जायेंगे। अगर चुनाव आयोग Employees' Provident Fund तर्ज पर वोटर लिस्ट बनाता है बार-बार SIR की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। ना ही मतदान से पहले पर्चियां बाँटने की जरुरत। मतदाता बस अपना वोटर कार्ड, मोबाइल और आधार कार्ड लेकर आये। बोगस मतदान करने आयी या आये को तुरन्त पुरुष/महिला सुरक्षा कर्मी द्वारा हिरासत में लेकर हवालात भेजा जाए। एक बार खर्चा जरूर होगा लेकिन भविष्य में बचत।
ममता सरकार और टीएमसी नेता बीएलओ को तरह-तरह से धमका रहे
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की ओर से वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अभियान चलाया जा रहा है। ममता सरकार और टीएमसी नेताओं द्वारा बीएलओ को तरह-तरह से धमकाकर इसमें अड़चने पैदा की जा रही हैं। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बुधवार को इस बारे में जानकारी दी। अधिकारी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में नवीनतम वोटर लिस्ट की तुलना जब पिछली SIR प्रक्रिया के दौरान साल 2002 और 2006 के बीच विभिन्न राज्यों में तैयार की गई लिस्ट से की गई। तब जाकर वोटर लिस्ट की ये विसंगति सामने आई है कि 26 लाख से अधिक वोटर्स के नाम 2002 की वोटर लिस्ट से मेल नहीं खा रहे हैं। निर्वाचन आयोग के सूत्रों के अनुसार, राज्य में वर्तमान में जारी SIR की प्रक्रिया के तहत बुधवार दोपहर तक पश्चिम बंगाल में छह करोड़ से अधिक गणना प्रपत्र अपलोड कर दिए गए थे।
अब तक प्रदेश के 26 लाख से अधिक वोटर्स के नामों का मिलान नहीं
चुनाव आयोग के अधिकारी ने बताया है- “पोर्टल पर अपलोड होने के बाद, इन प्रपत्रों को ‘मैपिंग’ प्रक्रिया के तहत लाया जाता है, जहां इनका मिलान पिछले एसआईआर रिकॉर्ड से किया जाता है। शुरुआती निष्कर्षों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 26 लाख से अधिक मतदाताओं के नामों का मिलान अब भी पिछले एसआईआर चक्र के आंकड़ों से नहीं किया जा सका है।” चुनाव आयोग ने हाल ही में जानकारी दी थी कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दूसरे चरण का आयोजन पश्चिम बंगाल समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया जाएगा, जहां अगले साल चुनाव होने है। SIR की प्रक्रिया 4 नवंबर से शुरू होकर 4 दिसंबर तक चलेगी। मतदाता सूची का मसौदा 9 दिसंबर को जारी किया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
एसआईआर के 10.33 लाख फॉर्म जमा नहीं कराए गए – CEO
इससे पहले भी राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि लाखों फॉर्म जमा नहीं हुए हैं। ये इसलिए ‘जमा नहीं कराए जा सके’ क्योंकि वोटर या तो गैर-हाजिर रहे, डुप्लीकेट थे या फिर वोटर्स की मौत हो चुकी है या हमेशा के लिए ये लोग कहीं और चले गए हैं। सीईओ अग्रवाल ने कहा कि एसआईआर फॉर्म के जमा कराने और डिजिटलाइज का काम जारी है। अभी तक इनमें से 10.33 लाख फॉर्म ऐसे रहे जिन्हें वापस जमा नहीं कराया गया है। यह रियल-टाइम डेटा है।” उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में अब तक 7.64 करोड़ एसआईआर फॉर्म बांटे जा चुके हैं। जमा कराने वाले फॉर्म के बारे में विस्तार से बताते हुए सीईओ ने कहा कि अभी के लिए, ‘जमा नहीं कराए गए’ फॉर्म बांटे गए कुल फ़ॉर्म का महज 1.35 फीसदी है। अग्रवाल ने वोटर रोल के SIR प्रक्रिया में लगे बूथ-लेवल ऑफिसर (BLO) की भूमिका की भी तारीफ की और कहा कि वे इस काम के असली हीरो हैं।
80,600 बीएलओ लगाए, कनेक्टिविटी के लिए Wi-fi हब बनाए
उन्होंने कहा कि कई बूथ-लेवल ऑफिसर ऐसे भी हैं जो वोटर्स तक पहुंचने और फॉर्मैलिटी पूरी करने के लिए ऑफिस टाइम के बाद भी लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “बूथ-लेवल ऑफिसर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। SIR प्रक्रिया के असली हीरो यही लोग हैं। यह प्रक्रिया 4 नवंबर को शुरू की गई थी और महज 20 दिनों के अंदर, वे 7 करोड़ से ज्यादा वोटर्स तक पहुंच गए, जो कोई आसान काम नहीं है।” राज्य में SIR के लिए 80,600 से अधिक बीएलओ, के साथ-साथ 8,000 सुपरवाइजर, 3,000 असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और 294 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स को लगाया गया है। इस प्रक्रिया के दौरान बीएलओ को आसानी से कनेक्टिविटी के लिए Wi-fi हब बनाए गए हैं। उनका कहना है कि BLO को डेटा एंट्री में मदद करने के लिए DM, ERO और BDO ऑफिस में हेल्प डेस्क भी हैं, जहां कहीं भी इंटरनेट की दिक्कतें हैं, वहां अलग से Wi-fi हब हैं।”
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में फर्जी नाम 1.04 करोड़ से ज्यादा- रिपोर्ट
मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर देशभर में सियासी हलचल तेज हो गई है। बीजेपी का आरोप है कि यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों की सुनियोजित साजिश है, जिसका मकसद लोकतंत्र को कमजोर करना है। बिहार में चुनावी साल के बीच पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया है, जहां ममता बनर्जी की सरकार पर फर्जी वोटरों के सहारे चुनाव परिणाम प्रभावित करने का आरोप लगाया जा रहा है। बीजेपी का कहना है कि बंगाल में फ्री एंड फेयर चुनाव तभी संभव है, जबकि एसआईआर पूरी तरह से सुनिश्चित हो। एक स्टडी रिपोर्ट ने बीजेपी के इन आरोपों को और बल दिया है। रिपोर्ट में सामने आए तथ्य के आधार पर चुनाव आयोग से तुरंत सख्त कार्रवाई की मांग हो सकती है। अगस्त 2025 में आई इस स्टडी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में करीब 1.04 करोड़ फर्जी नाम दर्ज हैं। यह कुल वोटरों का लगभग 13.7% हिस्सा है। रिपोर्ट में सामने आया है कि 2004 में 4.74 करोड़ वोटर थे, 2024 तक 6.57 करोड़ (जनसंख्या, उम्र,मौत और नए 18 साल के वोटरों को जोड़कर) होने चाहिए थे। इस रिपोर्ट को एस पी जैन, इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च, मुंबई के विधु शेखर और आईआईएम विशाखापट्टनम के मिलन कुमार ने तैयार किया। इस स्टडी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिसमें बहुत से मृत लोगों के नाम अब भी वोटर लिस्ट में दर्ज हैं। कई नाबालिग और राज्य छोड़ चुके लोग भी वोटर के तौर पर मौजूद हैं। कुछ जिलों में तो वोटरों की संख्या वहां की वास्तविक आबादी से भी ज्यादा पाई गई।
ममता बनर्जी सरकार में एसआईआर का पहले दिन से अनर्गल विरोध
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एसआईआर की शुरुआत के पहले दिन से विरोध शुरू कर दिया है। राज्य में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटरों को बचाने के लिए अभी से सारी हदें पार की जा रही है। प्रदेश के बीएलओ यूनाइटेड फोरम का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी तत्व बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) को धमका रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि यदि ममता के मुताबिक राज्य में कोई बोगस वोटर नहीं है, तो उन्हें एसआईआर से एतराज क्यों है? भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। चिट्ठी में तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और फर्जी वोटर्स” के नामों को हटाने का विरोध कर रही है। एसआईआर की शुरुआत के दिन ही पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी बढ़ गई!
टीएमसी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओ को धमकाने में लगे
पश्चिम बंगाल बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के लिए शनिवार को BLO का ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर दिया है। राजस्थान समेत कई राज्यों में बीएलओ को ट्रेनिंग दी गई। लेकिन पश्चिम बंगाल में इस दौरान कई BLO ने प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्थाओं का विरोध किया। दरअसल, इसके पीछे वहां की तृणमूल सरकार ही है, जो एसआईआर का विरोध कर रही है। इसलिए पार्टी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओज को धमकाने में लगे हैं। बीएलओ ने उचित दस्तावेज और सुरक्षा देने की मांग की है। BLO का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान उनके स्कूलों में उपस्थिति दर्ज नहीं की जा रही है और BLO के रूप में उनकी ड्यूटी को ऑन ड्यूटी नहीं माना जा रहा है।
भाजपा ने ममता बनर्जी के मार्च को जमात की रैली बताया पश्चिम बंगाल में मंगलवार को CM ममता बनर्जी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के खिलाफ कोलकाता में विरोध मार्च निकाला। 3.8 km लंबी रैली में उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और बड़ी संख्या में पार्टी वर्कर्स मौजूद रहे। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि जैसे हर उर्दू बोलने वाला पाकिस्तानी नहीं, वैसे ही हर बांग्लाभाषी बांग्लादेशी नहीं होता। इधर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता के मार्च को जमात की रैली बताया। उन्होंने कहा- यह भारतीय संविधान की नैतिकता के खिलाफ है। वहीं, बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- ममता जी को अगर कुछ कहना है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
जो ममता बनर्जी विपक्ष में रहते घुसपैठियों को बाहर निकालने का शोर मचाती थी आज वही ममता घुसपैठियों को बचाने अपनी संवैधानिक सीमाओं को तोड़ने में आमादा है। आखिर क्यों आज घुसपैठियों की हिमायत कर रही हैं। बंगाल में जितने भी दंगे-फसाद हो रहे हैं क्या ममता की शै पर हो रहे हैं। दूसरे, जब से ममता बंगाल की मुख्यमंत्री बनी है तभी से हिन्दुओं पर कितने-कितने भयंकर हमले हुए हैं कितने दंगाइयों को गिरफ्तार जेलों में डाला? चुनावों में पैरों तले जमीन निकलते देख चोटिल होने का ड्रामा कर सिम्पथी वोट बटोरने का जाल बिछा देती है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एसआईआर की शुरुआत के पहले दिन से विरोध शुरू कर दिया है। राज्य में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटरों को बचाने के लिए अभी से सारी हदें पार की जा रही है। प्रदेश के बीएलओ यूनाइटेड फोरम का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी तत्व बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) को धमका रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि यदि ममता के मुताबिक राज्य में कोई बोगस वोटर नहीं है, तो उन्हें एसआईआर से एतराज क्यों है? भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। चिट्ठी में तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और फर्जी वोटर्स” के नामों को हटाने का विरोध कर रही है। एसआईआर की शुरुआत के दिन ही पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी बढ़ गई!
टीएमसी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओ को धमकाने में लगे पश्चिम बंगाल बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के लिए शनिवार को BLO का ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर दिया है। राजस्थान समेत कई राज्यों में बीएलओ को ट्रेनिंग दी गई। लेकिन पश्चिम बंगाल में इस दौरान कई BLO ने प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्थाओं का विरोध किया। दरअसल, इसके पीछे वहां की तृणमूल सरकार ही है, जो एसआईआर का विरोध कर रही है। इसलिए पार्टी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओज को धमकाने में लगे हैं। बीएलओ ने उचित दस्तावेज और सुरक्षा देने की मांग की है। BLO का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान उनके स्कूलों में उपस्थिति दर्ज नहीं की जा रही है और BLO के रूप में उनकी ड्यूटी को ऑन ड्यूटी नहीं माना जा रहा है।
भाजपा ने ममता बनर्जी के मार्च को जमात की रैली बताया पश्चिम बंगाल में मंगलवार को CM ममता बनर्जी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के खिलाफ कोलकाता में विरोध मार्च निकाला। 3.8 km लंबी रैली में उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और बड़ी संख्या में पार्टी वर्कर्स मौजूद रहे। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि जैसे हर उर्दू बोलने वाला पाकिस्तानी नहीं, वैसे ही हर बांग्लाभाषी बांग्लादेशी नहीं होता। इधर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता के मार्च को जमात की रैली बताया। उन्होंने कहा- यह भारतीय संविधान की नैतिकता के खिलाफ है। वहीं, बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- ममता जी को अगर कुछ कहना है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
टीएमसी नेता चाहते हैं किसी भी फर्जी वोटर का नाम ना कटे इसी बीच, पश्चिम बंगाल के 94 हजार बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) खौफ में हैं। बीएलओ यूनाइटेड फोरम के महासचिव स्वप्न मंडल ने कहा कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी बीएलओ को धमका रहे हैं। मुख्य चुनाव अधिकारी से पिछले हफ्ते सुरक्षा मांगी थी। पूर्व बर्दवान जिले के एक बीएलओ ने कहा, ‘ टीएमसी वाले चाहते हैं कि कोई नाम न कटे। हम हर पल खतरे में काम कर रहे हैं।’ हालात यह है कि नेता धमकाते हैं कि कोई गड़बड़ी मिली तो बीएलओ को जेल भेज देंगे। वहीं, ममता के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने वर्कर्स को बीएलओ संग साए जैसे रहने को कहा था। चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि बीएलओ की सुरक्षा का जिम्मा संबंधित थाने का है। सभी पुलिस अधीक्षकों को इस बाबत निर्देश दिए हैं।
सुरक्षा ना मिलने से बीएलओ ने सामूहिक असंतोष जताया BLO ने मांग की है कि आयोग में उनकी ट्रेनिंग और फील्ड वर्क को ड्यूटी मानने, पर्याप्त सुरक्षा देने और इसके लिए जरूरी कागजात जारी करने की मांग की है। बीएलओ ने आरोप लगाया है कि ट्रेनिंग का कोई वैध प्रमाण-पत्र या दस्तावेज नहीं दिया, जिससे वे अपने विभाग में उपस्थिति सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं। दुर्गापुर के उप-मंडलीय कार्यालय (SDO) में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन किए गए। वहां BLO ने सामूहिक रूप से असंतोष जताया। दरअसल, राज्य में SIR 4 नवम्बर से 4 दिसम्बर किया जाना है। इस दौरान बूथ स्तर अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर वोटर्स का सत्यापन और फॉर्म भरने का काम करेंगे। BLO की ट्रेनिंग 3 नवम्बर तक चलेगी।
बीएलओ की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की होगी – आयोग चुनाव आयोग ने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती नहीं की जाएगी। आयोग ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की होगी। आयोग ने बड़े बूथों के लिए दो BLO नियुक्त करने के प्रस्ताव को भी नहीं माना। चुनाव आयोग ने BLO के लिए 16 प्वाइंट वाली गाइडलाइन जारी की है और फील्ड कार्य को सरल बनाने के लिए एक नया मोबाइल एप भी शुरू किया है। ट्रेनिंग के दौरान BLO को विशेष किट और प्रोसेस की विस्तार से जानकारी दी जा रही है। एक बीएलओ ने कहा, “हम काम करने को तैयार हैं, लेकिन राज्य सरकार को हमें सुरक्षा और उचित प्रमाण-पत्र देना चाहिए। इनके बिना हम ड्यूटी जारी नहीं रख सकते।”
पूरी वोटर लिस्ट के बिना आए तो बीएलओ को बांधने की धमकी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। शिकायत के मुताबिक, बर्मन ने कथित तौर पर अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर बीएलओ 2000 लोगों की पूरी वोटर लिस्ट के बिना आता है, तो उसे बांध देना, यह कहते हुए कि “हम उसे बांध देंगे.” इस घटना का एक वीडियो लिंक भी चिट्ठी के साथ अटैच किया गया है।
लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों, फर्जी वोटर” के नाम हटाने का विरोध बीजेपी ने इसे खुलेआम डराने-धमकाने वाला काम बताया और दावा किया कि यह BLOs को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस के तहत अपनी ड्यूटी करने से रोकने के लिए दी जा रही धमकियों का एक बड़ा हिस्सा है। चिट्ठी में तृणमूल पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और नकली लोगों” के नाम हटाने का विरोध कर रही है। बीजेपी ने CEO से गिरिंद्रनाथ बर्मन के खिलाफ ड्यूटी पर मौजूद सरकारी कर्मचारी को धमकी देने के लिए FIR दर्ज करने की अपील की है और चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं की गई तो ऐसी और भी घटनाएं हो सकती हैं और अधिकारियों पर शारीरिक हमले भी हो सकते हैं।
12 राज्यों में 51 करोड़ वोटर्स के लिए 5.33 लाख बीएलओ देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR शुरू हो गया। इनमें से तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और पश्चिम बंगाल में 2026 में चुनाव हैं। असम में भी अगले साल चुनाव हैं, लेकिन अभी वहां SIR का शेड्यूल तय नहीं है। जिन 12 राज्यों में SIR होना है, उनमें पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। SIR वाले 12 राज्यों में करीब 51 करोड़ वोटर्स हैं। इस काम में 5.33 लाख बीएलओ (BLO) और 7 लाख से ज्यादा बीएलए (BLA) राजनीतिक दलों की ओर से लगाए जाएंगे। SIR के दौरान BLO/BLA वोटर को फॉर्म देंगे। वोटर को उन्हें जानकारी मैच करवानी है। अगर दो जगह वोटर लिस्ट में नाम है तो उसे एक जगह से कटवाना होगा। अगर नाम वोटर लिस्ट में नहीं है तो जुड़वाने के लिए फॉर्म भरना होगा और संबंधित डॉक्यूमेंट्स देने होंगे।
बीजेपी कार्यकर्ताओं को TMC विधायक की धमकी (साभार : dailypioneer) आखिर चुनाव आयोग द्वारा बंगाल में SIR से क्यों डर लग रहा है? क्या तृणमूल नेताओं द्वारा भड़काऊ बयान देने के पीछे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन है? आखिर संवैधानिक पद पर बैठी ममता संवैधानिक संस्था के काम में क्यों दखल कर रही है? क्या ममता बंगाल राज्य में गुंडाराज को अप्रयत्क्ष समर्थन दे रही है? यदि ऐसा होता है तो ममता के राज में अब तक हुए उपद्रवों को ध्यान में रख राज्य के शांतिप्रिय लोगों को चुनावी दिनों में चोटिल होने के ड्रामे को नज़रअंदाज कर सत्ता से बाहर करने के लिए मतदान करें।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं ने मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया के बीच हिंसक और भड़काऊ बयान दिए हैं। बर्दवान (उत्तर) के TMC विधायक निशीथ मलिक ने एक रैली में खुलेआम धमकी दी कि अगर बीजेपी ने SIR के नाम पर किसी भी असली वोटर को हटाने की कोशिश की, तो वे बीजेपी कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से आग लगा देंगे।
इस धमकी को TMC के मंत्री और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के बयान से और हवा मिली। हकीम ने कहा कि वे CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) का विरोध करेंगे, जिसका बीजेपी और चुनाव आयोग गठजोड़ कर रहे हैं और ‘उनके पैर तोड़ दिए जाएँगे।’ मेयर फिरहाद हकीम ने जोर देकर कहा कि जब तक ममता बनर्जी हैं, बीजेपी में यहाँ NRC लागू करने की हिम्मत नहीं है।
#WATCH | West Bengal Minister and Kolkata Mayor, Firhad Hakim, says, "We attended the all-party meeting. I have made it clear on behalf of my party that if the name of even one genuine voter is removed, we will oppose the SIR. We will not allow the name of even a single genuine… pic.twitter.com/VhgYBsvCu1
दोनों TMC नेताओं ने धमकी दी है कि अगर एक भी असली वोटर का नाम हटाया गया तो वे इसका कड़ा विरोध करेंगे। बीजेपी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी नेता एस आर बनर्जी ने इन बयानों को अशांति पैदा करने की रणनीति बताते हुए चुनाव आयोग से केंद्रीय बलों की सुरक्षा में SIR प्रक्रिया पूरी कराने की माँग की है।
क्या हमारे नेता जिन्हे जनता अपना शुभचिंतक समझती है विश्वास के काबिल हैं? विपक्ष में रहते जो ममता बनर्जी घुसपैठियों-रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानियों- को देश से निकालने की वकालत करती है आज मुख्यमंत्री बनने पर उन्ही घुसपैठियों का अपना दामाद बना अपनी कुर्सी की खातिर के लिए उन्हें निकालने का विरोध कर रही है।
अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया का जोरदार विरोध किया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कहना है कि मुख्यमंत्री फर्जी वोटरों के कटने के डर से इसका विरोध कर रही हैं।
ममता बनर्जी ने अमित शाह को घेरा
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए BJP को चेतावनी दी। ममता बनर्जी ने कहा, “मैंने भाजपा को चेतावनी दी थी कि आग से मत खेलो। जनता के आक्रोश के लिए तैयार रहो।” ममता ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला बोला और कहा कि वह एक्टिंग (कार्यवाहक) प्रधानमंत्री की तरह व्यवहार करते हैं।
ममता बनर्जी ने शाह की तुलना मीर जाफर से की, जिन्होंने 1757 में सिराज-उद-दौला से विश्वासघात किया था। उन्होंने कहा, “अमित शाह पर हमेशा भरोसा मत करो। वह एक दिन आपके मीर जाफर बनेंगे।” ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अमित शाह ने पार्टी की बैठक में कई नाम हटाने की बात कही थी, जिस पर उन्होंने सवाल उठाया।
BJP का पलटवार: ‘फर्जी वोटरों के कटने का डर’
ममता बनर्जी के बयान पर BJP नेताओं ने तुरंत पलटवार किया। BJP सांसद बिप्लब कुमार देब ने कहा कि अमित शाह जो कहते हैं, वह वास्तव में करते हैं। उन्होंने राम मंदिर निर्माण और ट्रिपल तलाक खत्म करने जैसे फैसलों का हवाला दिया।
वहीं, BJP नेता लॉकेट चटर्जी ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि ममता बनर्जी बिहार में फर्जी मतदाताओं के नाम कटने के बाद SIR प्रक्रिया से डरी हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि बंगाल में सबसे ज़्यादा फर्जी मतदाता हैं और अब ममता को चुनाव जीतने की उम्मीद नहीं है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री NRC की बात जनता को गुमराह करने के लिए कर रही हैं, जबकि भारतीय नागरिकों के नाम नहीं हटेंगे।
वहीं, भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर राजनीतिक मर्यादाएँ तोड़ने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने राज्य सचिवालय ‘नबन्ना’ में बैठकर खुलेआम धमकी दी है कि अगर बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) हुआ, तो इससे दंगे भड़क सकते हैं और ‘कई अन्य चीजें’ हो सकती हैं।
Crossing all limits of political and constitutional propriety, West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee today, while sitting in the state secretariat, Nabanna, openly threatened that if SIR is conducted in Bengal, it would lead to riots and “many other things.” She went even… pic.twitter.com/sRNikOLEtm
बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी पर दंगे भड़काने और हिंदू-मुस्लिम संघर्ष कराने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने घुसपैठिओं का मुद्दा भी उठाया और कहा कि अगर देश छोड़कर भागे लोग वापस आ गए हैं, तो यह कोई ‘धर्मशाला’ नहीं है, जहाँ कोई भी प्रवेश कर सकता है।
अमन ने वीडियो जारी कर माँगी माफी और वोट अधिकार यात्रा में राहुल गाँधी (साभार- X-@politics pecharcha/The Hindu) जब से राहुल गाँधी राजनीति तो नहीं सियासत में सक्रिय हुए है तभी से अटकलों का बाजार बहुत गर्म था कि राहुल कांग्रेस के बहादुरशाह ज़फर साबित होंगे। और अब शायद इसका समय आ गया है। जिस तरह से राहुल संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कर रहे हैं उसके मद्देनज़र कल समाचार था कि कांग्रेस की मान्यता समाप्त करने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज हो गयी है। जो कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का दम भरती हो उसकी मान्यता पर प्रश्नचिन्ह लगना कोई छोटी बात नहीं। और इस प्रश्नचिन्ह का जिम्मेदार सिर्फ गाँधी परिवार है।
इस गाँधी परिवार ने देश को अपनी जागीर समझ जो मन में आया दूसरे को अपमानित कर अपनी शान समझता है। इस परिवार की निगाह में किसी नेता तो क्या किसी संवैधानिक संस्था का कोई महत्व नहीं। जो सोनिया गाँधी से लेकर राहुल गाँधी तक साफ देखा जा सकता है। और SIR पर राहुल द्वारा परोसा जाने वाला झूठ, जो सूरज ढलने से पहले ही बेनकाब हो रहा है। चुनाव आयोग को धमकियां, जैसे चुनाव आयोग परिवार का गुलाम हो। क्या ये सब?
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और राजद नेता तेजस्वी यादव ने जोर शोर से बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली, SIR पर जमकर लोगों को भड़काया। अनर्गल बातें फैलाईं। अब उनके एक-एक झूठ की कलई खुल करल सामने आती जा रही है।
ताजा मामला एक वायरल वीडियो का है। वीडियो में रफीगंज निवासी अमन कुमार से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव ने पूछा कि वह SIR के बारे में क्या जानते हैं। इस पर अमन ने कहा कि इसका मतलब है कि गरीबों का नाम वोटर्स लिस्ट से हटा दिया जाएगा।
असल में उसकी शिकायत थी कि उसके पिता रजाक का नाम लिस्ट से हटा दिया गया। अमन ने तो राहुल गाँधी के सामने ये तक कह दिया कि आगे चलकर गरीबों से मतदान करने का अधिकार छीन लिया जाएगा।
अमन के बयान के बाद राहुल गाँधी ये कहा, “बिल्कुल, यही हो रहा है।”
खुल गई पोल
वीडियो वायरल हुआ तो स्थानीय प्रशासन और चुनाव आयोग ने अमन की शिकायत की जाँच की। इसमें पता चला कि रजाक के साथ अमन का भी का नाम वास्तव में वोटर लिस्ट में मौजूद था। प्रशासन ने अमन से इस पर सवाल पूछे तो उसने कहा कि लिस्ट उसने चेक ही नहीं की थी।
इसके बाद अमन कुमार ने वीडियो बनाकर ही सार्वजनिक रूप से माफी माँगी और कहा कि उसे गलत जानकारी मिली थी।
अमन ही नहीं, राहुल ने अलग अलग क्षेत्रों से कई लोगों से ये कहलवाया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से गायब है। नहाटा के चकला गाँव की एक महिला को भी ये कहकर वोट अधिकार यात्रा में शामिल किया गया कि उसके घरवालों के नाम सूची में नहीं हैं। उसे वह राहुल गाँधी से मिल कर जुड़वा सकती हैं। बाद में पता चला कि उसके घरल के सभी लोगों का नाम लिस्ट में शामिल है।
🚨पप्पू फिर से पकड़ा गया
बिहार के ग्रामीण इलाके में एक महिला ने दावा किया कि उसके परिवार का नाम मतदाता सूची से गायब है—बाद में उसने स्वीकार किया कि उसे राहुल गांधी से ऐसा कहने के लिए कहा गया था। 👇👇👇👇👇👇 pic.twitter.com/B9RuXV2NwN
प्रशासन के पूछे जाने पर महिला ने बताया कि उसे जबरन बुलाया गया था। उसे सही जानकारी नहीं थी।
जबरन मुद्दा बनाने की कोशिश
असल में राहुल गाँधी इस यात्रा के जरिए मतदाता सूची में गड़बड़ी होने की बात उठाना चाह रहे थे, जो असल में हुई नहीं। राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को ‘वोट चोरी’ की साजिश बताया था और दावा किया था कि देशभर में गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग ने भी इस पूरे मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और स्पष्ट रूप से कहा कि SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया का उद्देश्य मृत या फर्जी नामों को हटाना है, न कि गरीबों या अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया को सही ठहराया और कहा कि आधार कार्ड को वोटर सत्यापन के लिए अनिवार्य नहीं माना गया है।
चुनाव आयोग ने कहा ता कि वोटर लिस्ट से 65 लाख लोगों के नाम हटाए गए हैं। इन्हीं 65 लाख कटे नामों के सहारे राहुल गाँधी राजनीतिक संजीवनी खोजने की कोशिश कर रहे थे। हालाँकि उनका असर लोगों पर नहीं दिख पा रहा है क्योंकि लगभग सभी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।
इसके बाद कांग्रेस नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलीभगत करके, लाखों फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए हैं। इस पर भी चुनाव आय़ोग ने उनके एक एक आरोपों का तथ्य सहित जवाब पेश कर दिया।
नाम हटाने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पटना से दिल्ली तक एसआईआर के खिलाफ बवाल खड़ा करने की कोशिश की। गले फाड़-फाड़ कर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन आयोग के बार बार पूछे जाने के बावजूद ये नहीं बता पा रहे कि उन्हें आखिर आपत्ति किस बात पर है?
सासाराम में भी यात्रा के दौरान उन्होंने वोट चोरी और मतदाता के हक की बात दोहराते रहे लेकिन यहाँ पर भी लोगों ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया। ऐसे में झूठी शिकायतों के सहारे वे लोगों का बरगलाने का प्रयास तो कर सकते हैं पर सफल नहीं हो सकते।