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JNU की जिस वामपंथन निवेदिता मेनन को ‘मुस्लिम मर्द’ लगते हैं अट्रैक्टिव, वो भारत को कह रही ‘मनहूस देश’

                                                                                       साभार 
हाल ही में पत्रकार मंदीप पुनिया के यूट्यूब चैनल पर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन का एक इंटरव्यू आया है। इस इंटरव्यू में निवेदिता ने छात्र आंदोलनों और शिक्षा के मुद्दों की आड़ लेकर भारत राष्ट्र, देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे हमले करते हुए भारत को ‘मनहूस’ देश बताया है।

JNU जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में बैठकर लंबे समय तक पठन-पाठन से जुड़ी रहीं एक प्रोफेसर द्वारा सार्वजनिक मंचों से इस तरह के वक्तव्य देना केवल असहमति व्यक्त करना नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने पर किया गया एक सोची-समझी रणनीति का प्रहार है।

पूरे साक्षात्कार के दौरान बोले गए उनके शब्द यह साफ उजागर करते हैं कि वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम किस हद तक भारत के प्रति द्वेष और घृणा से भरा हुआ है।

भारत को ‘मनहूस’ बताकर किया देश का अनादर, हिंदुओं पर भी की घटिया टिप्पणी

निवेदिता मेनन ने अपने इस इंरव्यू में देश में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन, विभिन्न छात्र आंदोलनों और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए भारत राष्ट्र के प्रति अपनी अंतर्निहित घृणा को जगजाहिर कर दिया। उन्होंने भारत जैसे महान, सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश के लिए ‘मनहूस’ जैसे अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया।

देश के भीतर चल रहे CJP के अभियानों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब जुनैद जैसे बच्चे को ट्रेन में मार के फेंक दिया जाता है और पूरा देश सन्नाटे में रहता है, मुझे लगता है कि पिछले 12 साल में ऐसे उनको मतलब बार-बार एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम यहाँ के नहीं हो। तुम्हें बुलडोज करेंगे हम, तुम्हें हम कुछ भी करेंगे और तुम चू तक नहीं कर सकते। CJP का प्रोटेस्ट जो है वह थोड़ा साँस लेने की जगह दी और मुसलमानों को शायद लगने लगा कि शायद इस मनहूस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है।”

भारत जैसे महान राष्ट्र, जहाँ करोड़ों नागरिक अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संप्रभुता पर गर्व करते हैं, उसी राष्ट्र को एक ‘मनहूस’ ढाँचा बताकर पेश करना यह साबित करता है कि तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास रचनात्मक आलोचना के नाम पर केवल राष्ट्र-विरोधी जहर उगलने का काम बचा है।

इस प्रकार की भ्रामक भाषा का प्रयोग करके वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को एक अत्याचारी राष्ट्र के रूप में चित्रित करने का प्रयास करती हैं।

CJP और अराजक आंदोलनों का महिमामंडन: संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की साजिश

निवेदिता का पूरा जोर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों को सही ठहराने और उनका महिमामंडन करने पर रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के भेष में तमाम उपद्रवियों के संसद में घुसने की साजिशों और उपद्रव में शामिल वामंपथी और कट्टरपंथी संगठनों व पुलिस पर हमले करने वाले गुंडो को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।

मेनन ने इन आंदोलनों को ‘लोकतांत्रिक जीत’ का नाम दिया। उन्होंने कह, “यह अकाउंटेबिलिटी शब्द जो CJP के प्रोटेस्ट ने इतना आम बनाया कि हर कोई अकाउंटेबिलिटी और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। एक स्टूडेंट ने आपको याद होगा एनसीआरटी की टेक्स्ट बुक से डेमोक्रेसी का वर्णन पढ़ते हुए बताया कि अकाउंटेबिलिटी है डेमोक्रेसी का फीचर। तो यह इस मूवमेंट का सबसे बड़ा की सबसे बड़ी बड़ी जीत यह है कि अकाउंटेबिलिटी शब्द हमारे शब्दकोश में हमारे आम बोलचाल में यह शब्द आ गया है।”

आंदोलन के नेतृत्व और उसके स्वरूप पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, “CJP के कॉल पे जिस तरह के लोग निकल के आए तो एक तरह से मैं सुन रही हूँ यह शब्द ऑर्गेनिक बहुत ज्यादा कि यह ऑर्गेनिक हो गया। अब ऑर्गेनिक तो हो गया लेकिन ऑर्गेनिक अपने आप में उभर के नहीं आता है। कहीं न कहीं एक कॉल देने वाला एक केंद्र होना चाहिए और इसमें अभिजीत दीपके का नाम और अभिजीत दीपके की भूमिका जो है हम कभी नहीं भूल सकते। उनको रिड्यूस नहीं कर सकते।”

उन्होंने यह दावा भी किया कि इस तरह के आंदोलनों ने पिछले 12 वर्षों के सन्नाटे को तोड़ा है और विभिन्न वामपंथी समूहों को एक मंच पर लाया है। उन्होंने कहा, “लेकिन वह जो बिल्कुल एक 12 साल से घना सन्नाटा छाया हुआ था, इन 12 सालों में जो कुछ भी हुआ है, एक तरह से अभिजीत ने इसीलिए लेफ्ट ग्रुप्स उनके साथ जुड़ सके। इसीलिए इतने सारे लोग दुनिया देश भर में, दुनिया भर में एक्चुअली दुनिया भर में भी सपोर्ट हुआ है।”

RSS, केंद्र सरकार और शैक्षणिक व्यवस्था पर जहरीले प्रहार

इंटरव्यू के दौरान केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति निवेदिता मेनन का राजनीतिक विद्वेष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने देश के नए शिक्षा मंत्री, नवगठित टास्क फोर्स और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर तीखी और अमर्यादित टिप्पणियाँ कीं। साथ ही आरोप लगाया कि इनकी मानसिकता महिलाओं को लेकर भी बहुत घटिया है।

उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, “धर्मेंद्र प्रधान निकल गए लेकिन जो एजुकेशन मिनिस्टर बन के आए वह उनसे भी कट्टर संघी हैं और भी कट्टर RSS के मतलब प्रचारक हैं। उन्होंने बिलकिस बानो के बलात्कारियों के बारे में बहुत ही सपोर्टिवली बात की। तो ऐसे शख्स को एजुकेशन मिनिस्टर बनाया है जो हमने सोचा होगा कि धर्मेंद्र प्रधान से खराब कोई नहीं होगा, लो उन्होंने एक और अपने बट से निकाला।” मेनन ने नए शिक्षा मंत्री पर कई तरह के अन्य घटिया आरोप लगाए और हिंदू समाज पर अभद्र टिप्पणी की।

सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए बनाई गई टास्क फोर्स के गठन और उसमें शामिल सदस्यों का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने जो सो कॉल्ड हाई पावर टास्क फोर्स बनाया है उसमें देख लीजिए किस तरह के लोग हैं। उसमें IAS के ब्यूरोक्रेट्स हैं, उसमें इंफोसिस के चीफ हैं और इंफोसिस एजुकेशन के बारे में क्या बताएगा हमको? फिर एक और हैं जिन्होंने गोमूत्र के बारे में बहुत प्रशंसा की है कि गोमूत्र के जरिए बहुत सारी बीमारियाँ ठीक होती हैं। तो इस तरह का एक टास्क फोर्स बनाया है जिससे हमें मतलब कोई उम्मीद ही नहीं।”

देश के राजनीतिक ढाँचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह से नकारते हुए उन्होंने आरोप लगाया, “12 साल से हिंदू राष्ट्र ही रहा है हमारे यहाँ, हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की गई है और एक तरह से हिंदू राष्ट्र बन भी गया है। हम सब हिंदू राष्ट्र की छाया में रह रहे हैं।”

CAA विरोधी प्रदर्शनों, उमर खालिद और अलगाववादी निरंतरता का समर्थन

इंटरव्यू में निवेदिता मेनन ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों के संदिग्धों का खुलकर बचाव किया। उन्होंने उमर खालिद जैसे जेल में बंद आरोपितों द्वारा फैलाए गए आख्यानों का महिमामंडन किया और इसे एक बड़े क्रांतिकारी सफर के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा, “जो बीज बोए गए एंटी-सीएए और फार्मर्स प्रोटेस्ट में जो बीज बोए गए और उनको दबाया गया एक तरह से, लेकिन उसमें से जो वो सीड्स उमर खालिद जैसे नौजवानों ने जो बीज बोए थे, वो पौधे बनकर उभरे। और अब तो वो एक कंटिन्यूटी है, एक कंटिन्यूटी है एंटी-सीएए से लेके यहाँ तक।”

इसके अलावा उन्होंने देश की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर पूर्ण अविश्वास व्यक्त करते हुए कहा, “इस तरह का जो व्यवहार है किसी सरकार का दिखाता है हमें कि उनका कोई इरादा नहीं है एक चुनाव जीतने का, इसका मतलब यह है ना कि उनको चुनाव से डर नहीं है क्योंकि हर लेवल पर उन्होंने EVM, ECI, SIR, डीलिमिटेशन ये सारी चीजों को लेके अब उनको लगता है कि चुनाव हमें जीतने की जरूरत ही नहीं है।”

PM मोदी को दी गई गालियों को बताया ‘प्रतिरोध’, ‘एंटी-पेट्रियारकल’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’

छात्र आंदोलनों के दौरान प्रधानमंत्री और देश की संवैधानिक हस्तियों को दी जाने वाली अभद्र और अमर्यादित गालियों को सही ठहराने के लिए निवेदिता मेनन और मंदीप पुनिया ने फेमिनिस्ट और ‘क्वीर’ थ्योरी का सहारा लिया। उन्होंने इसे युवाओं का ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ करार देते हुए कहा, “जब कोई भी ग्रुप पे एक गाली बार-बार मारी जाती है, उस गाली को उठा के एक फूलों का गुलदस्ता बनाना और बैज ऑफ ऑनर बनाना, यह भी ऐतिहासिक प्रोसेस है।”

उन्होंने आगे गालियों का बचाव करते हुए कहा, “ज्यादातर जो गालियाँ हैं वो एक्चुअली एंटी-पेट्रियारकल हैं, मुझे गालियाँ सुनके लगा कि यह भी वो जो रेजिस्टेंस का एक पोक, दिस इज अ काइंड ऑफ रेजिस्टेंस जो व्हिच आवर जनरेशन, तो मुझे लगता है गालियाँ सुनके लगा कि यह भी रेजिस्टेंस का हिस्सा है।”

एक पूर्व विश्वविद्यालय प्रोफेसर द्वारा युवाओं की अशिष्टता, अमर्यादित भाषा और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के प्रति गालियों को ‘बैज ऑफ ऑनर’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’ बताकर बढ़ावा देना वामपंथी बौद्धिक वर्ग के नैतिक पतन की चरम सीमा को दर्शाता है।

JNU के मंच का दुरुपयोग और युवाओं के मन में जहर घोलने का प्रयास

इंटरव्यू के अंत में निवेदिता मेनन ने यह खुलकर स्वीकार किया कि वे किस प्रकार युवाओं की इन अराजक कार्यशैली से सीख रही हैं और इसे बढ़ावा देना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “यह RSS और BJP वाले जब प्रोपेगेंडा करते हैं, उनसे सीखूँगी मैं, उनसे सीखूँगी कैसे जब कीचड़ उछाला जाता है आप कीचड़ को उठा के उनके ऊपर नहीं, उसको एक तरह से गुब्बारा या गुलदस्ता बना के वापस उछाल रहे हैं।”

एक प्रोफेसर का यह दायित्व होता है कि वह छात्रों को अध्ययन, अनुशासित बहस, राष्ट्रनिर्माण और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति जागरूक करे। लेकिन इसके विपरीत, निवेदिता मेनन जैसे वामपंथी विचारक युवाओं के मन में देश की राज्य व्यवस्था, न्यायपालिका और सीमाओं के प्रति आक्रोश और अलगाववाद की भावना को भड़काने में लगे रहते हैं।

निवेदिता मेनन का पुराना ‘कच्चा-चिट्ठा’: विवादित बयानों की पूरी लिस्ट

भारत को ‘मनहूस देश’ बताना या भारतीय सेना व संवैधानिक व्यवस्था पर हमले करना निवेदिता मेनन की किसी नई सोच का नतीजा नहीं है। अगर उनके पिछले करियर और रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका पूरा इतिहास ही भारत विरोधी बयानों, सेना के अपमान, अलगाववादियों के समर्थन और हिंदू विरोधी एजेंडे से भरा पड़ा है।

भारत ने कश्मीर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है: निवेदिता का विवादित बयान

मार्च 2016 में, JNU परिसर में ‘आजादी’ के नारों को लेकर जारी विवाद के दौरान निवेदिता मेनन ने ‘व्हाट नेशनहुड मीन्स टू मी’ (मेरे लिए राष्ट्रवाद का क्या अर्थ है) विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया था। इस भाषण में उन्होंने खुले तौर पर कहा था, “हम सभी जानते हैं कि कश्मीर पर भारत का कब्जा अवैध है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि भारत ने कश्मीर पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है (India is illegally occupying Kashmir)।”

उन्होंने टाइम और न्यूजवीक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के विवादित नक्शों का संदर्भ देकर यह तर्क दिया था कि यदि पूरा विश्व भारत को कश्मीर में एक आक्रामक शक्ति मानता है, तो घाटी में ‘आजादी’ के नारे लगना पूरी तरह से जायज और प्राकृतिक है। उनके इस वक्तव्य से देश भर में भारी आक्रोश पैदा हुआ था।

भारतीय सैनिकों का अपमान और ‘रोजी-रोटी के लिए काम करने’ का आरोप

फरवरी 2017 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में निवेदिता मेनन मुख्य वक्ता थीं। वहाँ उन्होंने न केवल भारत का विवादित नक्शा प्रदर्शित किया, बल्कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले भारतीय सेना के जवानों का घोर अपमान किया।

उन्होंने कहा था, “सैनिक देश की रक्षा या देशभक्ति के लिए सीमाओं पर नहीं खड़े हैं, बल्कि वे केवल अपनी आजीविका (रोजगार) चलाने और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए सेना में काम करते हैं।” उन्होंने आगे यह भी कहा था कि भारत को सियाचिन जैसे क्षेत्रों से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए और उस पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

इस राष्ट्र-विरोधी बयान के बाद जोधपुर में विश्वविद्यालय परिसर से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन हुए थे, मेनन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी और संगोष्ठी की आयोजक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था।

भारत के आधिकारिक मानचित्र और अखंडता पर सवाल उठाना

निवेदिता मेनन ने अपने कई व्याख्यानों और लेखों में भारत के भौगोलिक मानचित्र की वैधता को खारिज किया है। ‘हिमालयन मैगजीन’ और विदेशी प्रकाशनों के विवादित नक्शों का हवाला देकर उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया है कि भारत एक ‘कृत्रिम राष्ट्र-राज्य’ है।

वे उत्तर-पूर्व भारत और कश्मीर के भारत में विलय को एक ‘सैनिक जबर्दस्ती’ के रूप में पेश करती हैं, जो सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला रुख है।

‘लव जिहाद’ पर वामपंथी-इस्लामी साँठगाँठ: आरफा खानम और निवेदिता मेनन द्वारा पीड़ित हिंदुओं का मजाक

निवेदिता मेनन और ‘द वायर’ की प्रोपेगैंडिस्ट आरफा खानम शेरवानी की एक पुरानी बातचीत का विश्लेषण यह साफ उजागर करता है कि किस तरह वामपंथी और इस्लामी मिलकर हिंदू समाज की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों का मजाक उड़ाते हैं।

आरफा खानम ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हुए सवाल पूछा कि ‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’, तो निवेदिता मेनन ने ठहाके लगाते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा, “मुस्लिम मर्द होंगे इतने अट्रैक्टिव और उनको अपने ही धर्म में वो नहीं मिलता होगा।”

आरफा और निवेदिता की इस जोड़ी ने लव जिहाद के पीछे की उस गहरी कड़वी सच्चाई को छिपाने की कोशिश की, जहाँ मुस्लिम युवक अपनी मजहबी पहचान छिपाकर हाथ में कलावा बाँधते हैं, फर्जी हिंदू नाम रखकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं और बाद में यौन शोषण व धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं।

भारतीय संविधान, हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर अनर्गल टिप्पणियाँ

प्रोफेसर मेनन अपने भाषणों में लगातार हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और हिंदुत्व की अवधारणा पर तीखे हमले करती रही हैं। वे हिंदुत्व को एक उग्र, हिंसक और महिला-विरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करती हैं, जबकि अन्य धर्मों में मौजूद कड़े कट्टरपंथ और कुरीतियों पर वे पूरी तरह मौन धारण कर लेती हैं।

हिंदू धर्म की मान्यताओं को निशाना बनाकर बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ असंतोष फैलाना उनकी रणनीतिक बयानबाजी का मुख्य हिस्सा रहा है।

देश की न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की साख पर प्रहार

मेनन का यह रिकॉर्ड रहा है कि वे भारत की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं करतीं। कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अलगाववादियों या आतंकवादियों के समर्थकों के मामले में वे हमेशा न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए जाँच के आदेशों को वे ‘राज्य का दमन’ बताती हैं और पुलिस द्वारा की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों को ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का नाम देती हैं। इस प्रकार वे युवाओं के मन में भारतीय राज्य व्यवस्था के प्रति पूर्ण अविश्वास पैदा करने का काम करती हैं।

वैचारिक अराजकता और राष्ट्र-विरोधी आख्यान का वास्तविक आईना

निवेदिता मेनन के इस हालिया इंटरव्यू और उनका पुराना विवादित इतिहास यह साफ उजागर करता है कि उनका पूरा आख्यान केवल किसी राजनीतिक दल या सरकार का विरोध नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और संवैधानिक ढाँचे पर किया गया एक गहरा प्रहार है।

भारत जैसे विविध और सहिष्णु देश को ‘मनहूस’ बताना, देश की रक्षा करने वाली भारतीय सेना के शौर्य को मात्र ‘रोजी-रोटी का जरिया’ करार देना, कश्मीर पर भारत के संप्रभु अधिकारों को अवैध बताना और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपितों को ‘क्रांति का बीज’ कहना- यह सब एक सुनियोजित वामपंथी-अलगाववादी सोच का हिस्सा है।

लोकतंत्र में असहमति और वैचारिक आलोचना का हमेशा स्वागत है, लेकिन जब असहमति के नाम पर राष्ट्र के अस्तित्व को नकारा जाने लगे, गालियों को ‘सम्मान का पदक’ (Badge of Honor) बनाकर पेश किया जाने लगे और अराजकता को बढ़ावा दिया जाए, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि ‘वैचारिक आतंकवाद’ कहा जाएगा।

बंगाल : ‘BJP कार्यकर्ताओं को आग लगा देंगे’: TMC विधायक ने SIR को लेकर दिया भड़काऊ बयान, मेयर हकीम बोले- बीजेपी और चुनाव आयोग की टाँगे तोड़ देंगे

                       बीजेपी कार्यकर्ताओं को TMC विधायक की धमकी (साभार : dailypioneer)
आखिर चुनाव आयोग द्वारा बंगाल में SIR से क्यों डर लग रहा है? क्या तृणमूल नेताओं द्वारा भड़काऊ बयान देने के पीछे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन है? आखिर संवैधानिक पद पर बैठी ममता संवैधानिक संस्था के काम में क्यों दखल कर रही है? क्या ममता बंगाल राज्य में गुंडाराज को अप्रयत्क्ष समर्थन दे रही है? यदि ऐसा होता है तो ममता के राज में अब तक हुए उपद्रवों को ध्यान में रख राज्य के शांतिप्रिय लोगों को चुनावी दिनों में चोटिल होने के ड्रामे को नज़रअंदाज कर सत्ता से बाहर करने के लिए मतदान करें।      

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं ने मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया के बीच हिंसक और भड़काऊ बयान दिए हैं। बर्दवान (उत्तर) के TMC विधायक निशीथ मलिक ने एक रैली में खुलेआम धमकी दी कि अगर बीजेपी ने SIR के नाम पर किसी भी असली वोटर को हटाने की कोशिश की, तो वे बीजेपी कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से आग लगा देंगे।

इस धमकी को TMC के मंत्री और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के बयान से और हवा मिली। हकीम ने कहा कि वे CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) का विरोध करेंगे, जिसका बीजेपी और चुनाव आयोग गठजोड़ कर रहे हैं और ‘उनके पैर तोड़ दिए जाएँगे।’ मेयर फिरहाद हकीम ने जोर देकर कहा कि जब तक ममता बनर्जी हैं, बीजेपी में यहाँ NRC लागू करने की हिम्मत नहीं है।

दोनों TMC नेताओं ने धमकी दी है कि अगर एक भी असली वोटर का नाम हटाया गया तो वे इसका कड़ा विरोध करेंगे। बीजेपी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी नेता एस आर बनर्जी ने इन बयानों को अशांति पैदा करने की रणनीति बताते हुए चुनाव आयोग से केंद्रीय बलों की सुरक्षा में SIR प्रक्रिया पूरी कराने की माँग की है। 

पाकिस्तान और ईरान ने 12000 अफगानों को देश से निकाला: भारत में CAA में मुस्लिमों को जोड़ने की पैरवी करने वाला गिरोह इस्लामी मुल्कों की करनी पर चुप क्यों?

ईरान और पाकिस्तान ने हाल ही में लगभग 12,000 अफगान प्रवासियों को अपने-अपने देशों से निर्वासित किया है। अफगानिस्तान के शरणार्थी और प्रत्यावर्तन मंत्रालय ने बताया कि सभी अफगान वापस अफगानिस्तान लौट आए हैं। हालाँकि, भारत में पड़ोसी देशों के मुस्लिमों को लेकर चिंतित रहने वाले कथित सेक्युलर इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। एक इस्लामी देश में ही मुस्लिमों के लिए जगह नहीं है।


ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ अफगानिस्तान के लोगों के साथ हो रहा है। जो काम पाकिस्तान अफगान लोगों के साथ करता है, वही काम अरब देश पाकिस्तान-बांग्लादेश या एशिया के अन्य इस्लामी देशों के साथ करते हैं। ऐसे में समय में देश के ये सेक्युलर जमात चुप्पी साध लेता है। इनके पास कहने को ना शब्द होते हैं और ना ही इसके पीछे देने के लिए तर्क होता है।

देश में नागरिकता संशोधन कानून लागू हुआ तो यही जमात पड़ोसी देशों के मुस्लिमों को लेकर चिंतित हो रहे थे। उनके लिए ऐसे तर्क दे रहे थे, जैसे मानवाधिकार के ये कितने बड़े रहनुमा हों। सायमा, राना अयूब, आरफा खानुम शेरवानी जैसे लोग CAA का यह कहकर विरोध कर रहे थे, जब भारत पड़ोसी इस्लामी मुल्कों के पीड़ित हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई आदि को अपने यहाँ आश्रय दे सकता है तो मुस्लिमों को क्यों नहीं।

अब जब पाकिस्तान अफगानिस्तान के मुस्लिमों को अपने यहाँ से जबरन निकाल रहा है तो ये जमात ना ही पाकिस्तान की भर्त्सना कर पा रहा है और ना ही ईरान का। एक इस्लामी मुल्क जब अन्य इस्लामी मुल्क के गरीब, पीड़ित मुस्लिमों को ही आश्रय नहीं दे रहा है तो भारत जैसे विविधता वाले देश से इस तरह की माँग किस तरह पर की जा सकती है, जबकि हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध जैसे धर्मों के लोगों को आश्रय लेने के लिए दुनिया में और कहीं जगह नहीं है।

चुनिंदा और अपनी सहूलियत के हिसाब से मुद्देे को रंग देने के कारण ही आज भारत में मुस्लिमों से जुड़े हर सवाल पर लोगों को संदेह होने लगा। इस संदेह में आरफा-सायमा जैसे नैरेटिव गढ़ने वालों का बहुत बड़ा योगदान है। वर्ना भारत में तो दुनिया भर के सताए हुए लोगों के आश्रय देने की प्राचीन परंपरा रही है। चाहे वो पारसी हों, यहूदी हों या यहीद के शासन काल के मुस्लिम ही क्यों ना हों, जिन्हें सिंध के राजा दाहिर ने अपने यहाँ शरण दिया था।

भारत में शरण पाने के बाद सारे समुदाय एवं पथ के लोग भारत की संस्कृति में समाहित हो गए, रच-बस गए लेकिन इस्लाम हमेशा खुद को अलग-थलग रखा। वह खुद को विशेष महसूस कराने के दायित्व दूसरे पर डालता रहा। परिणाम ये रहा है कि वे स्थानीय समुदाय के मन-मस्तिष्क में ऐसे लोगों की वजह से अपना स्थान नहीं बना पाए, जो आज के सेक्युलर बिरादरी जैसे कारामात उस दौरान के कुछ कथित लोग भी करते रहे होंगे।

इसमें आखिरकार नुकसान गरीब मुस्लिम वर्ग का ही हुआ। लेकिन, इन लोगों के लिए ये कभी मुद्दा रहा ही नहीं कि गरीब मुस्लिमों के बीच शिक्षा और विकास को तवज्जो दी जाए। अगर ऐसा होता तो ये सीरिया, लेबनान, इराक जैसे हिंसा ग्रस्त मुल्कों के आवाज उठाते। वहाँ के आतंकियों और सरकारों को कोसते। विश्व समुदाय के लोगों से उनके बीच शांति बहाल करने की कोशिश करते। हालाँकि, ऐसी माँग करते हुए उन्हें कभी देखा नहीं गया।

जब ईरान और पाकिस्तान की सरकारों ने अफगानिस्तान के हिंसा प्रभावित लोगों को देश से बाहर निकाल दिया तो हैदराबाद के सांसद ओसदुद्दीन ओवैसी भी चुप्पी साधे बैठे हैं। वे शपथ ग्रहण करते हुए जय फिलिस्तीन के नारे लगा सकते हैं, पाकिस्तान के मुस्लिमों को CAA के तहत भारत में बसने के अधिकार की माँग कर सकते हैं लेकिन अफगानिस्तान के अपने मुस्लिम भाइयों के लिए आवाज नहीं उठा सकते।

ये सारा कुछ इस्लाम की वैश्विक भाईचारा का नतीजा है कह लें, देश की राजनीति में मुस्लिमवाद को बढ़ावा देने की कोशिश, ताकि खुद को पीड़ित शोषित दिखाकर विशेष रियायतों की माँग की सके। दुनिया को यह बताया जा सके कि देखो कि भारत किस तरह मुस्लिमों की अनदेखी करता है। इस तरह नैरेटिव ग़ढ़ने में यहाँ का बुद्धिजीवी, राजीनतिक और समाज का एक बड़ा तबका आक्रामक ढंग से काम कर रहा है।


ईरान और पाकिस्तान द्वारा अफगान शरणार्थियों को जबरन वापस भेजे जाने के बाद अफ़गानिस्तान में मानवीय संकट और भी बढ़ गया है। इनमें से कई निर्वासित अफ़गानिस्तान लौटने के बाद अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं, क्योंकि देश आर्थिक अस्थिरता और बुनियादी सेवाओं की कमी का सामना कर रहा है। इसके अलावा, इन्हें नस्लीय भेदभाव एवं उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

दुनिया भर के मानवाधिकार समूहों और संगठनों ने सामूहिक निर्वासन की निंदा की है और अफ़गान निर्वासितों की सुरक्षा और भलाई के बारे में चिंता व्यक्त की है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं। इसके तहत शरणार्थियों को ऐसे देशों में जबरन वापस लौटने पर प्रतिबंध है, जहाँ उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

देश दुनिया के तमाम मानवाधिकार संगठनों द्वारा पाकिस्तान और ईरान सरकार की निंदा की जा रही है, लेकिन भारत के बुद्धिजीवी खामोश हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ रहा है कि इन देशों से वापस भेजे गए अफगान प्रवासी किस तरह अपना जीवन यापन करेंगे। ये भी पता नहीं है कि उनके साथ उनके देश में किस तरह का सलूक होगा।

इस तरह आरफा-सायमा और ओवैसी जैसे लोगों के लिए दो मुस्लिम देशों के बीच उनका आंतरिक मामला बन जाता है, जबकि वे भारत से चाहते हैं कि बांग्लादेशी मुस्लिम ही नहीं, म्यांमार के रोहिंग्या, पाकिस्तान के शिया-सुन्नी और अफगानिस्तान के मुस्लिमों को भी भारत अपने यहाँ शरण दें।

UNO, अमेरिका या अन्य कोई भी देश, जितने चाहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी भारत से ले जाएं, परंतु हमारे कानून CAA पर ज्ञान देना बंद करें; अमेरिका अपना कानून देखे; चीन को कुछ कहने की हिम्मत करो -

 सुभाष चन्द्र

अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी आयोग ने भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू करने के भारत सरकार द्वारा जारी नियमों की अधिसूचना पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि “धर्म या आस्था के आधार पर किसी को भी नागरिकता से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। 

आयोग के अध्यक्ष स्टीफन स्नेक ने कहा कि “पड़ोसी देशों से भागकर भारत में शरण लेने आए लोगों के लिए तो CAA में धार्मिक अनिवार्यता का प्रावधान है और हिंदुओं, पारसियों, सिखों, बौद्धों, जैनियों और ईसाइयों के लिए तो त्वरित नागरिकता का मार्ग प्रशस्त है लेकिन मुसलमानों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है

स्टीफन स्नेक ने कहा कि इस कानून का मकसद यदि धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करना होता तो इसमें बर्मा के रोहिंग्या मुसलमान, पाकिस्तान के अहमदिया मुसलमान और अफगानिस्तान के हज़ारा शिया भी शामिल होते। भारत सरकार अतीत में भारत के मानवाधिकारों के रिकॉर्ड पर टिप्पणी करने के लिए USIRF के क्षेत्राधिकार को खारिज कर चुका है

एक कहावत है - “तू कौन, मैं खामखां” और यह अमेरिकी संस्था का रोल ऐसे ही “खामखां” का रोल है भारत के लिए। स्टीफन इतने शातिर हैं कि उन्होंने इन पड़ोसी देशों का नाम नहीं लिया और यह नहीं बताया कि ये तीनो इस्लामिक देश हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान और केवल इतना कहा कि लोग वहां से भाग कर आए हैं लेकिन जानबूझकर कहना भूल गए कि उन देशों से “प्रताड़ित” होकर भागना पड़ा

अमेरिका को कभी यह दिखाई नहीं दिया कि इन तीनों देशों में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं, पारसियों, सिखों, बौद्धों, जैनियों और ईसाइयों) की क्या हालत है खासकर हिंदुओं की जो पाकिस्तान में 1947 के 22% से घटकर 2% रह गए। इन अल्पसंख्यकों को भारत के सिवाय कौन शरण दे सकता है। ये इस्लामिक देश होते हुए मुसलमानों को भी ठीक से नहीं रख सकते तो फिर तो साफ़ है इन्होने अल्पसंख्यकों की क्या दुर्दशा की होगी, वह कल्पना से परे है

भारत कोई धर्मशाला नहीं है जहां सभी देशों से मुसलमान आकर भारत में बस जाएं। अमेरिका को यदि लगता है रोहिंग्या, पाकिस्तान के अहमदिया और अफगानिस्तान के हज़ारा मुस्लिम पीड़ित हैं तो अमेरिका समेत सभी देश और UNO जिनकों उनसे हमदर्दी हैं, उन्हें अपने अपने देश में शरण दे सकते हैं। भारत में तो बांग्लादेशी और रोहिंग्या करोड़ों हैं, जितने मर्जी ले जाए अमेरिका क्योंकि भारत की आबादी तो 140 करोड़ है और अमेरिका की मात्र 34 करोड़ जिसके पास बहुत भूभाग है जहां उन्हें रखा जा सकता है

अमेरिका ने इन तीन इस्लामिक देशों को छोड़िए कभी चीन को भी मुसलमानों की रक्षा के लिए प्रवचन नहीं दिए और आज ही खबर है कि ईरान ने अल्पसंख्यक बहाई समुदाय के लोगों पर बंद कमरों में भी पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया है। जाहिर है यह सभी अल्पसंख्यकों पर लागू होगा

अमेरिका हमें उपदेश देने से पहले अपने गिरेबान में झाँक कर देखो। क्या अमेरिका ने  भारत के कानून CAA से मिलता जुलता कानून नहीं बनाया है। अमेरिका ने कानून बनाया है “The Spectrum Amendment और The Lautenberg Amendment”  जिसके अनुसार ईरान में रहने वाले ईसाइयों को कहा गया है कि यदि वे ईरान छोड़ कर आना चाहते हैं तो अमेरिका आ सकते हैं परंतु मुसलमानों को आने की छूट नहीं है

CAA पर छातियां पीटने से पहले अमेरिका अपना कानून देखे। खुद मुसलमानों को नहीं लेना चाहता और हमें कहते हैं कि हर देश के मुसलमानों को शरण दे दो। कितना दोगलापन है?

केजरीवाल पर शरणार्थी आपराधिक मुकदमा दायर करें और मानवाधिकार हनन की शिकायत दर्ज करें; हिन्दू शरणार्थियों के अपमान पर सारा हिन्दू समुदाय “आप”/कांग्रेस का बहिष्कार करे

सुभाष चन्द्र 

भारतीय राजनीति का जहरीला कोबरा अरविन्द केजरीवाल अपने असली रंग में आ गया और रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की भारत में अवैध घुसपैठ को समर्थन देते हुए हिंदू शरणार्थियों को अपमानित करते हुए उन्हें “बलात्कारी” तक कह गया। पाकिस्तान/बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आए हुए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी कोई रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की तरह अवैध घुसपैठिये नहीं है और उन्हें कानून के अंतर्गत ही नागरिकता दी जा रही है लेकिन विपक्ष CAA का पुरजोर विरोध कर रहा है केवल मुस्लिमों को खुश करने के लिए 

लेखक 
इस विषय में दिल्ली के ठग और मक्कार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सारी सीमाएं लांघते हुए शरणार्थियों का घोर अपमान करते हुए कहा है कि -

“केंद्र सरकार का लागू किया गया CAA कानून बहुत खतरनाक है जिसकी वजह से Law and Order ठप हो जाएगा और चोरी डकैतियां और बलात्कार बढ़ेंगे”

हमारा देश एक गरीब देश है और अगर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के 3 करोड़ लोगों में डेढ़ करोड़ लोग भी भारत में आ गए तो उनको कहां बसाया जाएगा, नौकरियां कहां से देंगे, जो रोजगार हमारे बच्चों को मिलना चाहिए वो तो वो लोग ले जाएंगे’

CAA के बाद ये पाकिस्तानी पूरे देश में फ़ैल जाएंगे और हमारे ही मुल्क के लोगों को हड़काएंगे और हुड़दंग करेंगे; इनकी इतनी हिम्मत हो गई कि दिल्ली की जनता द्वारा भारी बहुमत से चुने गए CM को हमारे ही मुल्क में घुस कर माफ़ी मांगने को कह रहे हैं”

पाकिस्तानियों को पूरी सुरक्षा और सम्मान के साथ मेरे घर के बाहर प्रदर्शन करने की इज़ाज़त दी गई लेकिन इस देश के किसानों को दिल्ली आने की भी इज़ाज़त नहीं है; भारत के किसानों को अश्रु गैस के गोले, लाठियां, डंडे और गोलियां? और पाकिस्तानियों को इतना सम्मान?”

अब शरणार्थियों को चाहिए कि वे केजरीवाल के खिलाफ एक तो मानहानि का आपराधिक  मुकदमा दायर करें क्योंकि केजरीवाल ने सभी शरणार्थियों को “बलात्कारी (rapist) कहा है, उन्हें चोर और डकैत और दंगाई कहा है” NCRB के रिकॉर्ड से बताया जाए कितने शरणार्थी और कितने रोहिंग्या या बांग्लादेशी अपराधों में लिप्त रहे हैं 

दूसरा केस शरणार्थियों को NHRC में फाइल करना चाहिए कि केजरीवाल ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हम शरणार्थियों के मानवाधिकारों के हनन की कोशिश की है और ऐसी ही शिकायत उन्हें UNHCR के पास भी दायर करनी चाहिए क्योंकि जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस विषय को गलत ढंग से UNO में उठा सकते हैं तो शरणार्थी भी यह विषय UN संस्था तक ले जाने का अधिकार रखते हैं

केजरीवाल के दिल में हिंदुओं के लिए कितना जहर भरा है वो इस बात से साबित होता है कि उसने हिन्दू शरणार्थियों को चोर, डकैत और बलात्कारी कहने के साथ साथ उन्हें बार बार पाकिस्तानी कहा है, न हिंदू कहा और न शरणार्थी कहा 

दूसरी तरफ केजरीवाल, कांग्रेस और विपक्षी दल रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को पूरे देश में बसाने और वोट बैंक बनाने के लिए आगे रहे हैं जब पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए लोगों को नागरिकता मिल जाएगी तो यही केजरीवाल और अन्य दल उन शरणार्थियों के चरणों में लोटते फिरेंगे वोट के लिए

केजरीवाल और विपक्ष को अगर CAA नहीं चाहिए तो पहले सभी रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को देश से बाहर भेजने के लिए हामी भरो उन्हें लाइन लगा कर वापस भेजो चुनाव आयोग 2024 लोकसभा चुनाव से पहले सभी रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के फर्जी आधार कार्ड पर बने वोटर कार्ड रद्द करे

CAA पर बुरे फँसे अरविंद केजरीवाल: रोहिंग्या, अवैध बांग्लादेशी और पाकिस्तानियों का विरोध करने की बजाए CAA का विरोध, हिंदू शरणार्थियों ने दिल्ली CM का घर घेरा

        सीएए का विरोध करने पर केजरीवाल को अमित शाह ने सुनाई (फोटो साभार: एचटी, ANI, इंडिया टाइम्स)
नागरिकता संशोधन कानून के लागू होने के बाद जिस तरह विपक्षी नेता मोदी सरकार को घेर रहे हैं उसे देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने अपने हालिया इंटरव्यू में सबको करारा जवाब दिया है। इसी लिस्ट में चूँकि आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी थे इसलिए उनको भी अमित शाह ने खरी-खरी सुनाई और कहा कि भ्रष्टाचार की पोल खुलने से केजरीवाल जो हैं वो आपा खो बैठे हैं।

दरअसल, देश में सीएए लागू होने पर अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि अगर सीएए लागू होगा तो देश में अंधाधुंध लोग आएँगे, जैसा कि स्वतंत्रता के बाद हुआ था। इससे कानून व्यवस्था बिगड़ेगी और चोरियाँ, डकैतियाँ और बलात्कार आदि होंगे।

उनकी इसी चिंता का जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा, “दिल्ली मुख्यमंत्री अपने भ्रष्टाचार के उजागर होने से अपना आपा खो चुके हैं। उनको मालूम नहीं है सारे लोग आ चुके हैं और भारत में ही रह रहे हैं। सिर्फ उनको अधिकार नहीं मिला है। ये उनको अधिकार देने की बात है। 2014 तक जो आ गए उनको नागरिकता देने की बात हो रही है। इतनी ही चिंता है तो क्यों बांग्लादेश घुसपैठियों की बात क्यों नहीं करते, रोहिंग्याओं की बात क्यों नहीं करते… क्योंकि वो वोटबैंक की पॉलिटिक्स कर रहे हैं। दिल्ली के चुनाव उनके लिए लोहे के चने चबाने जैसे हैं इसलिए वो वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं।

अमित शाह से जब पूछा गया कि अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि सरकार अपने लोगों को नौकरी नहीं दे पा रही, फिर इन्हें कैसे देगी। इस पर अमित शाह ने कहा कि केजरीवाल ने कभी भी रोहिंग्याओं के लिए तो कुछ नहीं कहा। सिर्फ जो बौद्ध, हिंदू, पारसी, ईसाई, सिख शरणार्थी आए हैं, वो उन्हीं का विरोध कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “ये लोग विभाजन का समय भूल गए हैं। ये शरणार्थी अपनी करोड़ों की संपत्ति छोड़कर यहाँ आए थे। हम उनकी समस्याएँ क्यों नहीं सुनेंगे? उन्हें यहाँ नौकरी और शिक्षा नहीं मिलती। हम उनके प्रति सहानुभूति क्यों नहीं व्यक्त करेंगे? देश का बँटवारा करना उनका फैसला नहीं था। यह कॉन्ग्रेस थी जिसने यह निर्णय लिया और उन्होंने उन्हें नागरिकता देने का वादा किया। अब वे अपने वादे से मुकर रहे हैं।”

एक तरफ अमित शाह ने अरविंद केजरीवाल को उनके बयान पर उन्हें ये सब कहा। वहीं दूसरी ओर हिंदू शरणार्थी भी सड़कों पर दिल्ली सीएम के विरोध में उतर आए। इन लोगों ने अरविंद केजरीवाल के आवास के बाहर हाथ में झंडे लेकर प्रदर्शन किया। इस दौरान मोदी-मोदी के नारे लगे। साथ ही केजरीवाल माफी माँगो का नारा लगाती भी महिलाएँ दिखीं। महिलाओं के हाथ में लगे पोस्टरों में लिखा दिखा- “झूठे केजरीवाल CAA कानून पर भ्रम मत फैलाओ जनता को सच बताओ।”

CAA पर मुस्लिमों को किया गुमराह: अजमेर दरगाह के दीवान ने कबूली सच्चाई

राजस्थान के अजमेर में स्थित मुस्लिमों के लिए पाक मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दीवान एवं सजदानशीं सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने CAA और मथुरा-काशी को लेकर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि CAA उन लोगों के लिए है, जो दूसरे देशों से प्रताड़ित होकर भारत आते हैं और यहाँ नागरिकता के आवेदन करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि काशी और मथुरा के मंदिर के मामले को कोर्ट के बाहर आपसी बातचीत से हल कर लेना चाहिए।

जब सैयद जैनुल आबेदीन से पूछा गया कि क्या CAA कानून मुस्लिमों को खिलाफ है। इस पर सैयद जैनुल आबेदीन ने कहा, “पार्लियामेंट के अंदर होम मिनिस्टर कह रहा है भाई। मैं थोड़े कह रहा हूँ। पार्लियामेंट के अंदर सबने ये कहा है कि CAA कानून बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार से जो माइग्रेट होकर यहाँ आए हैं और वर्तमान में यहाँ रह रहे हैं उनके लिए है।”

उन्होंने आगे कहा, “इन देशों से आने वाले लोगों दिया गया क्या इंडियन सिटीजनशिप? नहीं दी गई। ये कानून उनके लिए ही है। हिंदुस्तान का मुसलमान डर क्यों रहा है? ये उनके लिए नहीं है। इससे सिटीजनशिप कैंसिल नहीं होती है। बस बात खत्म।” बता दें कि देश के मुस्लिमों में ये प्रोपेगेंडा फैलाई गई थी कि CAA कानून मुस्लिमों की नागरिकता खत्म करने के लिए लाई गई है।

सैयद आबेदीन ने CAA को लेकर ही नहीं, बल्कि वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी ढाँचा विवाद तथा मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह ढाँचे को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि काशी और मथुरा के विवाद को आपसी सहमति से दोनों पक्षों को मिलकर सुलझा लेना चाहिए। आबेदीन ने कहा कि इससे दोनों पक्षों के बीच कटुता नहीं रहेगी।

सैयद आबेदीन ने कहा, “मथुरा और काशी का विवाद अभी कोर्ट के सामने विचाराधीन है। इसलिए उसके ऊपर कोई कमेंट नहीं कर सकते। हमारा जो पुराना एक्सपीरियंस है, उसके हिसाब से हम चाहते हैं कि इस मसले का हल कोर्ट के बाहर बैठकर तय हो सकता है तो सबसे ज्यादा बेहतर है दोनों पक्षों के लिए। उससे दोनों पक्षों के अंदर कटुता भी नहीं रहेगी। अमन और शांति रहेगी।”

उन्होंने कहा, “कोर्ट के फैसले से तो जिसके पक्ष में फैसला आएगा, वह खुश होगा और जिसके हक में नहीं होगा, उसके दिल में कटुता रहेगी। तो ऐसा क्यों करना? ये देश वो पुराना नहीं है। जितने राजे-रजवाड़े, महाराजा थे, उनका एक धर्मगुरु होता था। ये धर्म के मामले में उनसे परामर्श लेकर फैसले लिया करते थे। आज जो एक नई बात पैदा की है इन्होंने कि धर्म और राजनीति….।”

धर्म और राजनीति के मिश्रण पर सैयद आबेदीन ने कहा, “गोरखपुर प्रेस सबसे ज्यादा मशहूर है इंडिया के अंदर। गीता प्रेस। उसका 1957 का एडिशन ‘श्री कल्याण’ है। बहुत मोटी बुक है। उस किताब के पेज नंबर 771 और 772 का श्लोक कहता है कि अगर राजनीति को धर्म से अलग कर दिया जाएगा तो राजनीति विधवा हो जाएगी और धर्म को राजनीति से अलग कर दिया जाएगा तो धर्म विधुर (जिसकी पत्नी की मृत्यु हो गई हो) हो जाएगा।”


CAA-रामनवमी हिंसा में शामिल कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI पर बैन लगाने की तैयारी में मोदी सरकार

                                    कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI को ब्लैकलिस्ट करने की तैयारी में मोदी सरकार
केंद्र सरकार जल्द ही संदिग्ध गतिविधियों में शामिल रहने वाले विवादास्पद संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर जल्द ही प्रतिबंध लगा सकती है। पिछले सप्ताह रामनवमी के दौरान भारत के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा और सांप्रदायिक तनाव में PFI की भूमिका सामने आई है। बताया जा रहा है कि प्रतिबंध की तैयारी पूरी कर ली गई है और अगले सप्ताह तक एक नोटिफिकेशन जारी कर इसकी घोषणा की जा सकती है।

पीएफआई पहले से ही कई राज्यों में गैर-कानूनी घोषित है, मगर सरकार अब इसे एक केंद्रीकृत नोटिफिकेशन के जरिए प्रतिबंधित करना चाहती है। पीएफआई की स्थापना 2006 में की गई थी, तभी से यह विभिन्न असामाजिक और राष्ट्र-विरोधी कार्यों में संलिप्तता को लेकर जाँच के दायरे में आता रहा है।

विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में कहा गया है कि गृह मंत्रालय के पास इस संगठन को प्रतिबंधित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि केंद्र पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया में लगा हुआ है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA), दोनों ने पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करते हुए खुफिया रिपोर्ट दी हैं। NIA डोजियर के अनुसार, पीएफआई स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) का ही बदला रूप है। SIMI को संयुक्त राज्य अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमलों के बाद 2001 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। एनआईए ने बताया किया कि दोनों संगठनों के बोर्ड में एक ही लोग शामिल रहे हैं। ED की जाँच के अनुसार, इस संगठन ने CAA-NRC विरोधी प्रदर्शनों के लिए धन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

साल 2020 में पीएफआई की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के छह सदस्यों को आरएसएस (RSS) कार्यकर्ता वरुण भूपालम की हत्या के प्रयास के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने एक प्रसिद्ध दक्षिणपंथी विचारक चक्रवर्ती सुलीबेले और बेंगलुरु दक्षिण के सांसद तेजस्वी सूर्या की हत्या करने की भी योजना बनाई थी। ढेर सारे ऐसे सबूत हैं, जो 2020 में दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों में पीएफआई की स्पष्ट भूमिका की ओर इशारा करते हैं।

इसके अलावा, 14 अप्रैल को जब गोवा, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में रामनवमी की शोभा यात्रा के दौरान हिंसा भड़की तो मध्य प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष वीडी शर्मा ने दावा किया कि खरगोन में दंगे और पथराव के लिए पीएफआई जिम्मेदार है।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा गृह मंत्रालय को एक संपूर्ण डोजियर सौंपे जाने के बाद 2017 में PFI पर प्रतिबंध लगाने की माँग को नया बल मिला। इसमें एजेंसी ने इस इस्लामिक समूह के आतंकवाद से संबंध को सूचीबद्ध किया गया था। जाँच एजेंसी ने पीएफआई और उसकी राजनीतिक शाखा SDPI को बेंगलुरू विस्फोट, केरल के प्रोफेसर का हाथ काटने और केरल में लव जिहाद सहित अन्य मामलों में संदिग्ध माना है।

‘चचा जान और अब्बा जान वाले सुन लें, माहौल खराब किया तो…’ : ओवैसी के ‘शाहीनबाग धमकी’ के बाद योगी आदित्यनाथ की चेतावनी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने असदुद्दीन ओवैसी को खुली चेतावनी दी है। मुख्यमंत्री योगी ने कहा है कि अगर राज्य में दोबारा से सीएए के नाम पर भावनाएँ भड़काने की कोशिश हुई तो इस बार उनसे सख्ती से निपटा जाएगा।

कानपुर में बूथ अध्यक्ष सम्मेलन के दौरान पहुँचे योगी आदित्यनाथ ने ओवैसी पर निशाना साधते हुए कहा, “आज मैं चेतावनी दूँगा उस व्यक्ति को जो यहाँ पर सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के तहत भावनाओं को भड़काने की कोशिश कर रहा है।”

वह बोले, “चचा जान और अब्बा जान के अनुयायी सावधान होकर सुन लें, अगर प्रदेश में भावनाओं को भड़काकर माहौल खराब करोगे तो उत्तर प्रदेश सरकार सख्ती के साथ निपटना जानती है।”

सीएम योगी ने ओवैसी को सपा का एजेंट बताया और कहा कि वह सिर्फ भावना भड़काने आए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश को लेकर कहा कि अब राज्य को दंगों के कारण नहीं बल्कि दंगामुक्त होने के कारण पहचाना जाता है। जनता ने विकास और नए भारत, नए उत्तर प्रदेश का संकल्प लिया है। प्रदेश में दंगा और माफियाओं की सरकार नहीं है। माफियाओं पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार है।

उन्होंने याद दिलाया कि कैसे प्रदेश 2017 से पहले दंगों के लिए जाना जाता था। उन्होंने कहा कि प्रदेश में परिवारवादी, जातिवादी, वंशवादी सोच के लोगों ने न केवल सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया, बल्कि अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस क्षेत्र के विकास को भी बाधित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी।

ओवैसी के शब्द

एआईएमआईएम प्रमुख ओवैसी ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में कहा था, “मैं पीएम मोदी और बीजेपी से सीएए को कृषि कानूनों की तरह वापस लेने की अपील करता हूँ क्योंकि ये संविधान के खिलाफ है। अगर वे एनपीआर और एनआरसी पर कानून बनाएँगे तो हम सड़कों पर उतरेंगे और यहाँ एक और शाहीन बाग बनेगा।”

उत्तर प्रदेश : 35 साल पहले निकाह में शामिल होने कराची से आई, फर्जी आधार-वोटर कार्ड बनवाया, ग्राम प्रधान बनी

                                  पाकिस्तानी नागरिक बानो बेग़म (साभार: hindustantimes)
नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में जगह-जगह बने शाहीन बाग़ों की सच्चाई सामने आने लगी है। चुटकी भर पैसों, बिरयानी और नाश्ते के लालच में दूध पीते बच्चों को कड़क ठंठ में बैठने वाली महिलाएं एवं इनको ये सब मुहैय्या करवाने वालों की गंभीरता से जाँच जरुरी हो गयी है। उत्तर प्रदेश के एटा के एक गांव ने शाहीन बाग़ के नाटक का भांडा फोड़ दिया है। शाहीन बाग़ का ड्रामा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्यों को बचाने के लिए किया गया था। 

कागज निकाल कर रख लो 

न्यायालय, केंद्र एवं राज्य सरकारों को चाहिए कि शाहीन बाग़ों के आयोजन करवाने वालों और इकट्ठे हुए लोगों के बैंक खातों के साथ-साथ चल और अचल संपत्ति की गंभीरता से जाँच करनी चाहिए। बहुत हुआ गरीब, मजलूम और नासमझ का ड्रामा। इतना ही नहीं, बानो बेगम का फर्जी आधार कार्ड आदि बनाने वाले नेता एवं अधिकारियों पर भी सख्त कार्यवाही करनी चाहिए। केस पुराना है, इस स्थिति में यदि वह नेता और अधिकारी जीवित हैं तो कार्यवाही में लेशमात्र भी संकोच नहीं करना चाहिए। ताकि भविष्य में होने वाले शाहीन बाग़ जैसे ड्रामों से जनता को होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिल सके।   

पाकिस्तानी महिला बानो बेग़म 35 साल पहले एक शादी में शामिल होने के लिए भारत आई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश स्थित एटा के एक गाँव की ग्राम प्रधान बन गई। वह कराची से यहाँ आई थी और फिर अख्तर अली से निकाह कर लिया। तब से वह अपने दीर्घकालिक वीज़ा की अवधि कई बार बढ़वा चुकी है। 

बेगम बानो ने लड़ा था पंचायत चुनाव 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बानो बेग़म ने 2015 में ग्राम पंचायत चुनाव लड़ा था और उसमें जीत दर्ज की थी। उसे एटा स्थित जलेसर तहसील के गुदऊ गाँव की ग्राम पंचायत का सदस्य चुना गया था। 9 जनवरी 2020 को पूर्व ग्राम प्रधान शहनाज़ बेग़म का निधन हो गया। नतीजतन सियासी समीकरणों की वजह से बानो बेग़म को ग्राम प्रधान चुन लिया गया। इसके बाद गाँव के निवासी कुवैदान खान ने 10 दिसंबर 2019 को डिस्ट्रिक्ट पंचायत राज ऑफिसर (डीपीआरओ) आलोक प्रियदर्शी से शिकायत की।

शिकायत में उन्होंने कहा था कि बानो बेग़म पाकिस्तान की नागरिक है। इस बात के सामने आते ही पूरे गाँव में हडकंप मच गया। फिर बानो बेग़म ने ग्राम प्रधान पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। डीपीआरओ आलोक प्रियदर्शी ने पूरे प्रकरण के बारे में ग्राम पंचायत सचिव और एटा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सुखलाल भारती को सूचित किया। मजिस्ट्रेट सुखलाल भारती ने बानो बेग़म पर मामला दर्ज करने और जाँच शुरू करने का आदेश दिया है। 

फर्जी बनवाए दस्तावेज 

जाँच के कुछ ही समय बाद यह पता चला कि बानो बेग़म भारत की नागरिक नहीं है। उसने नकली वोटर आईडी और आधार कार्ड बनवाए थे। आरोपों के मुताबिक़ गुदऊ ग्राम पंचायत सचिव ध्यान सिंह ने प्रधान पद के लिए बेग़म बानो के नाम का सुझाव दिया था। उन लोगों के खिलाफ़ भी जाँच की जा रही है जिन्होंने बेग़म को नकली दस्तावेज़ उपलब्ध कराने में मदद की। 

कोरोना : बीजेपी का आरोप :केजरीवाल के हाथों में कमान आते ही दिल्ली में कोरोना ने तोड़ा 40 दिन का रिकॉर्ड

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कोरोना से पीड़ित होने के बाद जैसे ही कमान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हाथों में आई, कोरोना ने फिर रफ्तार पकड़ ली। कोरोना ने पिछले 40 दिनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि केजरीवाल का पूरा ध्यान कोरोना की जगह उत्तराखंड चुनाव और दिल्ली दंगे का मास्टरमाइंड ताहिर हुसैन को बचाने पर है।
जैसाकि सर्वविदित है कि दिल्ली में नगर निगम चुनाव निकट आ रहे हैं, तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। दिल्ली सरकार अपनी नाकामी केंद्र पर डाल रही है, लेकिन इस पुरे खेल में नगर निगम कहीं नहीं है। क्योकि वहां भाजपा सत्ता में है, आम आदमी पार्टी नहीं। आरोप लगाओ, खूब लगाओ, लगाने भी चाहिए, लेकिन उनका आधार होना चाहिए। अमित शाह गृहमंत्री और समस्त देश उनके गृह के सामान है, फिर केवल दिल्ली को ही क्यों उछाला जा रहा है? महाराष्ट्र और अन्य राज्यों जहाँ कोरोना ने जीवन दूबर कर रखा है, उन पर क्यों नहीं ध्यान दिया जा रहा? 
जहाँ तक उत्तर प्रदेश की बात है, इस प्रदेश का क्षेत्रफल और जनसंख्या अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है, उसके बावजूद वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कमर कस कोरोना को नियंत्रण में रखे हुए हैं। जबकि वहां दंगे भी हुए।  
किसको नहीं मालूम कि अरविन्द केजरीवाल अपने काम की बजाए मुफ्त की रेवड़ियां बांट तीनों बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और नगर निगम चुनाव में भी टक्कर दी। शंका है कि इन्ही मुफ्त की रेवड़ियों की लॉलीपॉप देकर तीनों नहीं तो दो नगर निगमों पर कब्ज़ा न कर ले। और मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में जनता दिल्ली में हुए लाल कुआँ और पश्चिम दिल्ली के दंगों को भूल जाएगी। और ये होने वाला है, कोई नहीं रोक पाएगा। यह कहना कि केजरीवाल का कोरोना की बजाए हिन्दू विरोधी दंगे के आरोपी ताहिर हुसैन को बचाने में लगे हुए हैं। सबकुछ ठीक है, केंद्र जेएनयू और दिल्ली दंगों के आरोपियों के विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाने में असहाय क्यों? क्या कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि अगर राज्य सरकार इजाजत नहीं देने स्थिति में कोर्ट कुछ नहीं कर सकती? 
पिछले 10 दिन के अंदर 12 हजार लोग संक्रमित
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 40 दिन पहले 16 जुलाई को दिल्ली में एक दिन में 1652 कोरोना संक्रमित मिले थे। इसके बाद कल यानि 26 अगस्त को कोरोना के 1693 मरीज सामने आए। दिल्ली में पिछले 10 दिन के अंदर 12 हजार लोग संक्रमित हुए हैं। जुलाई मध्य के बाद से दिल्ली में 24 घंटे में मिलने वाले कोरोना के मामलों में गिरावट आने लगी थी। अगस्त की शुरुआत में ये और कम होती चली गई। उसके बाद 24 घंटे में 500-600 संक्रमित मिलने लगे और दिल्ली का रिकवरी रेट बढ़ने लगा। दिल्ली में संक्रमित होने वालों से ज्यादा ठीक होने वालों की संख्या बढ़ने लगी।

फिर 24 घंटे के अंदर हजार से ज्यादा केस
लेकिन बीते दस दिनों से दिल्ली में फिर 24 घंटे के अंदर हजार से ज्यादा केस आने लगे हैं। वहीं बीते 3 दिन देखें तो 24 अगस्त को दिल्ली में 1061 केस सामने आए, 25 अगस्त को 1544 केस सामने आए और 26 अगस्त को 1693 केस सामने आए। इसी प्रकार से अप्रैल-मई के बीच में दिल्ली में संक्रमितों की संख्या बढ़ी थी। और कोरोना ने दिल्ली में स्थिति को भयावह कर दिया था।

सीएम केजरीवाल ने की आपात बैठक
कोरोना के मामलों को बढ़ता देख दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के साथ अन्य आला अधिकारियों की बुधवार को आपात बैठक बुलाई। इस बैठक के बाद सीएम केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दी कि दिल्ली में टेस्टिंग डबल की जाएगी।

दिल्ली में 1.65 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित
यहां बुधवार को 24 घंटों में कोरोना के 1693 नए मामले सामने आए हैं और एक दिन में 17 मरीजों की जान गई है। इसके साथ ही राजधानी में संक्रमण के कुल मामले 1 लाख 65 हजार 764 हो गए हैं। संक्रमण के कुल मामलों में सक्रिय मामलों की संख्या 12,520 है। वहीं 1,48,897 लोग कोरोना को मात देकर ठीक हो चुके हैं। यहां अब तक 4,347 लोगों की जान जा चुकी है।

कोरोना से ज्यादा उत्तराखंड और ताहिर पर है केजरीवाल सरकार का ध्यान-बीजेपी

जब दिल्ली सरकार कोरोना की बढ़ती रफ्तार पर ब्रेक लगाने में नाकाम रही, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कमान संभाली। उनके नेतृत्व में कोरोना को नियंत्रित करने में काफी सफलता मिली। खुद केजरीवाल ने माना कि लगातार डेढ़ महीने तक दिन-रात मेहनत कर केस को बढ़ने से रोक लिया गया। दिल्ली बीजेपी ने आरोप लगाया है कि अमित शाह ने दिल्ली में स्थिति को काबू में लाकर सीएम केजरीवाल के हाथों में दिया था, लेकिन सीएम केजरीवाल अपने प्रचार-प्रसार, उत्तराखंड चुनाव और दंगाई ताहिर को बचाने में ज़्यादा व्यस्त हैं। एक बार फिर केजरीवाल ने जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : इस्लामी देश बनाना चाहता था भारत को’ – जामिया छात्र आसिफ इक़बाल का कबूलनामा

आसिफ इकबाल तन्हा
गिरफ्तार आसिफ इकबाल तन्हा (साभार: सियासत)
जैसे-जैसे नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में हुए दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों की जाँच आगे बढ़ रही है, दंगाइयों के नापाक मंसूबे उजागर होने पर उन समस्त हिन्दुओं को शर्म आनी चाहिए, जो चंद सिक्कों और मुफ्त की कोरमा, बिरयानी  की खातिर उन्हीं के कंधे सवार होकर उन्हीं के विनाश का खेल खेल रहे थे। 
शंका है, जो लोग हिन्दू विरोधी षड्यंत्र को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर स्वांग रच रहे थे, बकरा या चिकन के साथ उस मांस को मिश्रित कर दिया हो, जो हिन्दुओं में प्रतिबंधित है। इनकी नापाक हिन्दू विरोधी हरकतों से ये लालची हिन्दू तब भी नहीं चेते, जब प्रदर्शनों और धरनों में हिन्दू एवं हिन्दुत्व विरोधी नारे लग रहे थे। और लालची हिन्दू गंगा-जमुनी तहजीब और सेकुलरिज्म जैसे भ्रमिक नारों की आड़ में अपने ही खिलाफ रची जा रही साज़िश का हिस्सा बन रहे थे। समस्त देशप्रेमी संगठनों को एकजुट होकर इन नारों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। शर्म उन नेताओं को भी आनी चाहिए जो संविधान की शपथ लेकर, देश को तोड़ने वालों का समर्थन कर रहे थे/कुछ किसी न किसी प्रकार से अभी भी कर रहे हैं। जनता को चाहिए आने वाले चुनावों में ऐसे नेताओं और उनकी पार्टियों का बहिष्कार कर ईंट का जवाब पत्थर से दें।   
खूब अपना फ्लैट बेचकर लंगर लगाने के स्वांग को मीडिया भी हवा दे रहा था, जबकि पार्टी फण्ड से ख़रीदे फ्लैट को बेचकर ये नौटंकी की गयी थी। इस्लामिक राष्ट्र बनाने वाले साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शांति के दुश्मन बेचारे गरीब, मजलूम और शांतिदूत इतने शातिर दिमाग के थे कि हिन्दुओं के सामने कुछ बयान और हिन्दुओं के पीछे इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए जद्दोजहद करने पर कवायत की जाती थी। (पढ़िए नीचे दिए लिंक) जब इन हिन्दू विरोधी दंगाइयों को पकड़ा जा रहा था, तब तुष्टिकरण और सेकुलरिज्म का शोर मचा कर Victim Card खेला जा रहा था। इनके समर्थक मुस्लिम होने की सजा देने का जहर फैलाकर वास्तविकता को छुपाने का घिनौना खेल खेल कर देश को गुमराह कर रहे थे। अब किसी की आवाज़ नहीं निकल रही कि इन पर देशद्रोह का केस दर्ज कर सख्त से सख्त सजा दी जाए। लेकिन वोट बैंक के डर से कोई नहीं बोलेगा।  
बहुत शोर मचाया जा रहा था कि "देखो मोदी देश को तोड़ रहा है, बर्बाद कर रहा है, क्या जरुरत थी इस बिल को लाकर कानून बनाने की?" आदि आदि, लेकिन दंगों की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, असली मंसूबे सामने आ रहे हैं, वैसे तो नीयत प्रदर्शन और धरनों में ही नज़र आ गयी थी, लेकिन मीडिया ने भी अपनी TRP को बनाये रखने के लिए नज़रअंदाज करती रही। मुफ्त में कोरमा, बिरयानी और स्वादिष्ट फलों से भरपूर नाश्ता और दिनभर की दहाडी भी ने इन दंगाइयों का हौंसला आफजाई करती रही। 
UAPA के तहत गिरफ्तार जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस पूछताछ के दौरान कुछ बड़े खुलासे करते हुए बताया है कि किस तरह से नागरिकता कानून (CAA) और NRC के विरोध के नाम पर उन्होंने लोगों को भड़काने के साथ बसों और घरों को जलाया था। आसिफ इकबाल तन्हा ने कहा कि वो देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता था और इसीलिए हिंदुओं को तंग कर धार्मिक भावनाएँ आहत करने की साज़िश रची।
जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) के सदस्य और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस को दिए बयान में बताया की जब CAA/NRC बिल आया, तो उसे ये बिल मुसलमानों के खिलाफ लगा, जिसके बाद आसिफ इस बिल का विरोध करने के लिए जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ जुड़ गया। आरोपित आसिफ जामिया यूनिवर्सिटी का छात्र है और 2014 से स्टूडेंट इस्लामिस्क ऑर्गेनाइजेशन (SIO) का सदस्य भी है।
दिल्ली पुलिस के हवाले से जी न्यूज़ की इस रिपोर्ट में बताया गया है- “आरोपित आसिफ इकबाल ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि ’12 दिसंबर को हम 2500-3000 लोग जामिया यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर 7 पर मार्च कर रहे थे, उसके बाद 13 दिसंबर को शरजील इमाम भड़काऊ भाषण देते हुए चक्का जाम करने की बात कहता है। मैंने खुद लोगों को उकसाया। जामिया मेट्रो से पार्लियामेंट तक मार्च की कॉल दी, जिसमें कई संगठन हमें समर्थन देते हैं। जब हम मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने हमें बैरिकेड लगाकर रोक लिया। तभी मैंने कहा कि तुम आगे बढ़ो, पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं, जो हमें रोक ले। फिर इसी दौरान जब हम जबरदस्ती आगे बढ़े, तो पुलिस ने हमें रोक लिया और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें पुलिस और छात्रों को चोट भी आई।”
जी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने कबूलनामे में बताया, “हमने प्लानिंग के तहत 15 दिसंबर को पार्लियामेंट तक मार्च का ऐलान किया, जिसका नाम हमने गाँधी पीस मार्च दिया, ताकि दिखने में ठीक लगे। फिर उसके बाद हम मार्च को जामिया से लेकर जाकिर नगर, बटला हाउस से होते हुए जामिया ले आए। फिर सूर्या होटल के पास पुलिस बैरिकेड लगे थे। हम जबरन बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ गए, पुलिस हमें रोकने की कोशिश की। भीड़ बेकाबू हो गई और पथराव शुरू हो गया। बसों में आग लगा दी जाती है, बहुत दंगा फसाद हो जाता है। इस दौरान JMI के कई छात्र समेत पुलिस वाले घायल हो जाते हैं।”
आरोपित आसिफ इकबाल ने कहा कि जामिया में हुई हिंसा के बाद जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी (JCC) का गठन किया गया था, जिसमें AISA, JSF, SIO, MSF, CYSS, CFI, NSUI जैसे संगठन से जुड़े लड़के शामिल थे। आसिफ ने कहा कि SIO (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन) के कहने पर उसने दिल्ली से बाहर के अन्य कई राज्यों में भारत सरकार के खिलाफ मुस्लिमों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया था और जरूरत पड़ने पर हिंसक प्रदर्शन के लिए भी कहा था।
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साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
आसिफ इकबाल ने दंगों को लेकर होने वाली फंडिंग पर खुलासा किया कि एलुमिनाई एसोसिएशन ऑफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (AAJMI) भी इस मूवमेंट में जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी के साथ थी और AAJMI और PFI से ही इस योजना की फंडिंग होती थी।