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‘हिंदुओं को खत्म कर… मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाना है’: उमर खालिद के खिलाफ सरकारी वकील ने पेश किए और सबूत

                                                      साभार: बार एंड बेंच
देश की राजधानी दिल्ली में साल 2020 में हुए हिंदू विरोधी दंगों (Delhi Anti Hindu Riots) के आरोपित और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद समेत 6 अन्य आरोपितों की जमानत याचिका पर गुरुवार (3 फरवरी 2022) को भी दिल्ली की अदालत ने सुनवाई की। इस दौरान पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अमित प्रसाद ने अदालत में मुस्लिमों का साजिश के बारे में बताया कि गवाहों ने गवाही दी है कि आरोपित मुस्लिमों के लिए एक अलग देश बनाना चाहते थे। इसी के चलते इन्होंने हिंसा भड़काने की साजिश रची थी।

अमित प्रसाद ने 3 फरवरी को जारी जमानत की सुनवाई के दौरान एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत की पीठ को बताया कि उनके पास गवाहों के रिकॉर्ड हैं, जिसमें एक आरोपितों ने कहा था कि ‘मुस्लिमों के लिए अलग देश’ बनाना है। उनके पास रिकॉर्ड पर गवाह हैं कि आरोपित ने एक बयान दिया था जिसमें कहा गया था कि ‘मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र बनाना है’। एसएसपी ने कहा कि इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने डॉ अपूर्वानंद नाम के एक प्रोफेसर का एक और बयान पेश किया, जिसमें उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने कहा था कि दिल्ली दंगों के आरोपितों ने कथित तौर पर कहा था कि ‘सरकार को झुकाना और, हिंदू-मुसलमान करना है।’

इसके साथ ही प्रसाद ने विक्टर नाम के एक और गवाह के बयान को पेश किया। जिसमें लिखा था, “चाँद बाग में हिंदुओं को खत्म करना है के नारे लग रहे थे।” पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने इस ओर संकेत दिया कि अब आरोपितों के खिलाफ UAPA एक्ट और देशद्रोह के तहत कार्रवाई करने के पर्याप्त सबूत हैं।

एसपीपी अमित प्रसाद ने कहा, “सभी आरोपितों की साजिश के हर हिस्से में रोल प्ले करने की जरूरत नहीं होती। जब लोगों के बीच समझौता होता है तो वे एक-दूसरे के एजेंट बन जाते हैं।” उन्होंने अदालत में कहा कि कई लोग दंगे वाली जगहों से उमर खालिद को रिपोर्ट कर रहे थे।

इसके साथ ही अभियोजन पक्ष ने ये भी आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन इन्ही आरोपितों में से एक है। उस पर दिल्ली कि हिंदू विरोधी दंगे भड़काने के लिए व्हाइट मनी को ब्लैक करने के भी आरोप है।

इससे पहले बुधवार को पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अमित प्रसाद ने कहा था कि एक गवाह ने बताया, “विरोध प्रदर्शन के लिए डंडे, पत्थर, लाल मिर्च और तेजाब इकट्ठे किए गए।” अमित प्रसाद ने सवाल किया, आखिरकार लाठी, डंडे और लाल मिर्च के साथ किया गया विरोध प्रदर्शन किस प्रकार से शांतिपूर्ण हो सकता है?

हिंदू-विरोधी दंगों के लिए हुई थी टेरर फंडिंग

अमित प्रसाद ने कड़कड़डूमा कोर्ट को बताया, “आतंकवादी संगठनों से फंडिंग की गई थी। ताहिर हुसैन के पैसे को व्हाइट से ब्लैक करने के भी सबूत हैं। यह बहुत ही असामान्य सी बात है कि हमारे पास सबूतों की एक पूरी चेन है। पैसे को ब्लैक करने की क्यों जरूरत पड़ी? यह पैसा साइटों पर गया।”

इसके साथ ही उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने इस बात की पुष्टि की, “विरोध के लिए कुछ पैसे जामिया से आता था, कुछ आतंकवादी देते थे।” प्रसाद ने ये भी बताया कि दिल्ली दंगों की आरोपितों में जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट मीरान हैदर को एनजीओ ‘नई शिक्षा कल्याण संगठन’ से फंडिंग हुई थी। बहरहाल कोर्ट ने फैसला किया है कि वो इस मामले में अगले सप्ताह भी सुनवाई करेगा।

इसके साथ ही पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने उमर खालिद की जमानत याचिका का विरोध करते हुए कई अन्य सबूत भी पेश किए। पिछले साल उमर खालिद ने खुद अपने आरोपों को स्वीकार किया था कि उसने मुस्लिम संगठनों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी।

हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों को लेकर अदालत ने ‘दंगाइयों’ के वकील महमूद प्राचा को फटकारा

दिल्ली की एक अदालत ने राजधानी में हिंदू विरोधी दंगो के आरोपितों के वकील महमूद प्राचा को फटकार लगाई है। यह फटकार महमूद प्राचा को इसलिए लगाई गई है, क्योंकि उसने अदालत में तर्क दिया था, “2020 के दिल्ली दंगों के दौरान केवल मुसलमानों को निशाना बनाया गया था और झूठे मामलों में उन्हें फँसाया गया था।” प्राचा ने यह भी कहा था कि दिल्ली के दंगे वास्तव में सांप्रदायिक दंगे नहीं थे।

आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? 
जब कभी कहीं भी दंगे में मुस्लिम गिरफ्तार किए जाते हैं, इनके सरगना हमेशा मुस्लिम मजहब के नाम पर 
गरीब, मजलूम और नसमझ कहकर victim card खेलने लगते हैं। जब प्रदर्शनों में हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में भारत को इस्लामिक देश बनाने और fuck hindutva के नारे कोई गरीब, मजलूम और नासमझ लगा सकता है? इन साम्प्रदायिक नारे लगाए जाने के पीछे कौन सी सोंच थी? किन लोगों के कहने पर देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का षड़यंत्र काम कर रहा था? क्यों नहीं इन साम्प्रदायिक नारों का विरोध किया गया? 
देखिए जनवरी 29, 2020 को लिखा सर्वाधिक पढ़ा गया लेख, जो उनको भी गंभीरता से पढ़ना चाहिए जो सेकुलरिज्म का राग अलापते रहते हैं, आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? :-
सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने 11 नवंबर को आरोपित आरिफ की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए वकील महमूद प्राचा की जमकर खिंचाई की। उन्होंने कहा, “पुलिस ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया, सांप्रदायिक आधार पर नहीं। एक चश्मदीद गवाह को आरोपित द्वारा धमकाया जा सकता है। आपके तर्क बेबुनियाद हैं।” इसके बाद अदालत ने आरोपित आरिफ को जमानत देने से इनकार कर दिया।

यह मामला 25 फरवरी, 2020 को शिव विहार तिराहा के पास आलोक तिवारी की हत्या से संबंधित है, जिसे कई गंभीर चोटें आई थीं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक को धारदार और नुकीले हथियारों से 13 चोटें आई थीं। दंगों के दौरान हुई हत्या के दो अलग-अलग मामलों में भी आरोपित आरिफ की जाँच चल रही है।

लिबरल गिरोह के वकील महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है।

 जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य भी है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। साथ ही जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

तिहाड़ में हिन्दू आरोपितों को मारने की साजिश : परफ्यूम की बोतल में थर्मामीटर का पारा, ISIS कनेक्शन

जनवरी 2021 का पहला हफ्ता। तिहाड़ जेल से किए गए एक कॉल ने दिल्ली पुलिस के कान खड़का दिए। कॉल पर जो डिमांड की गई थी, वह जेल में बंद एक कैदी की ओर से अपने परिचित या परिजनों से किया जाने वाला सामान्य डिमांड नहीं था। जेल में बंद कैदी ने मर्करी (पारा) की डिमांड की थी।

टाइम्स आफ इंडिया ने तिहाड़ में हिन्दू आरोपितों की हत्या से जुड़ी साजिश को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित कर यह जानकारी दी है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस साजिश का पर्दाफाश करते हुए शाहिद और उसके साथी असलम को गिरफ्तार किया था। शाहिद के निशाने पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों में गिरफ्तार हुए दो हिन्दू आरोपित थे। इनको मारने के लिए शाहिद ने असलम से मर्करी की डिमांड की थी।

शक गहराने पर पुलिस ने असलम पर नजर रखनी शुरू की। पाया कि वह काफी थर्मामीटर खरीद रहा है और उसे तोड़कर मर्करी परफ्यूम की छोटी बोतल में इकट्ठा कर रहा है। पुलिस ने उसके हिरासत में लेकर पूछताछ की। उसने बताया कि शाहिद दो लोगों की हत्या करना चाहता है। लेकिन, ये लोग कौन हैं यह उसे पता नहीं।
इसके बाद स्पेशल सेल ने शाहिद को रिमांड पर लिया। पूछताछ में पता चला कि उसके सम्पर्क में अजीमुशान और अब्दुस शमी नाम के दो ISIS ऑपरेटिव्स थे। उन्होंने ही उसे जेल में बंद उन दो लोगों को मारने का काम दिया था, जिन पर कथित तौर पर मस्जिद को नुकसान पहुँचाने व समुदाय विशेष के लोगों को मारने का आरोप था।

शाहिद ने बताया कि उसे जो बातें बताई गईं उनसे वह काफी प्रभावित हुआ। उसे इस्लामिक स्टेट की विचारधारा पसंद आई। वह फौरन काम करने को तैयार हो गया। उनकी योजना थी कि जब कैदी इकट्ठा होंगे तो उसको मर्करी दिया जाएगा। उसने बताया कि उन तीनों की मुलाकात जेल नंबर 3 में हुई थी। वहीं प्लान भी बना। पूछताछ में पुलिस को पता चला कि अजीमुशान का आईएस मॉड्यूल का एक साथी यूनानी डॉक्टर था, उसी ने बताया था कि मर्करी कितना खतरनाक होता है।

अभी इस केस में पुलिस ने आईएस के दोनों ऑपरेटिव्स को नहीं पकड़ा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, पुलिस ने बताया कि पड़ताल चल रही है। वह जाँच पूरी होने के बाद जानकारी साझा करेंगे।
आईएस ऑपरेटिव्स के बारे में पता चला है कि शमी उन 15 लोगों में से एक है जिसे आईएस केस की जाँच में दोषी पाया गया था। अजीमुशान भी एक आतंकी मामले में गिरफ्तार हुआ था। दोनों अमरोहा से हैं। 2013 और 2015 में आईएस आतंकियों ने  शमी और अजीमुशान को अपने साथ जोड़ा था। इन्हें हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम और जुनूद-उल-खिलाफा-फिल-हिंद का नाम दिया गया था।
तिहाड़ जेल में बंद शाहिद ने पर आरोप है कि साल 2015 में दिल्ली के ख्याला में महिला से बलात्कार किया था। उसके बाद महिला और उसके 2 बच्चों की हत्या कर दी थी। 
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 23 से 25 फरवरी के दौरान हिंदू विरोधी दंगों में करीब 53 लोग मारे गए थे। 200 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। मारे गए लोगों में 15 साल के लड़के से लेकर आईबी के कॉन्स्टेबल तक थे। कुछ ने अपनी आँखों के सामने जीवन भर की कमाई को स्वाहा होते देखा। दंगाइयों ने न हिन्दुओं की संपत्ति को छोड़ा था न उनके धार्मिक स्थलों को।
दंगों की अब तक की जॉंच से यह बात सामने आई है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा को अंजाम देने की पूरी प्लानिंग की गई थी। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान दंगों को लेकर पहले से ही तैयारी की गई थी। ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी सहित 18 के खिलाफ दंगों के सिलसिले में पिछले दिनों ही दिल्ली की एक अदालत ने यूएपीए के तहत आरोपों का संज्ञान लिया था।

दिल्ली दंगों का 1 साल: मस्जिदों को राशन, पीड़ित हिन्दुओं को लंबी कतारें, प्रत्यक्षदर्शी ने किया खालसा व केजरीवाल सरकार की करतूत का खुलासा

                                दिल्ली में 1 साल पहले भड़की थी हिंसा (फाइल फोटो साभार: The Tribune)
दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को एक साल पूरा हो चुका है। महीनों तक चला यह हिंसक CAA विरोधी उपद्रव भयावह रूप से हिंसक हो पड़ा था। लगभग 3 दिनों तक चली इस हिंसा में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। अब जब इस हिंसा को एक वर्ष पूरे हो चुके हैं, ऑपइंडिया ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के स्थानीय लोगों से बातचीत की, जिन्होंने हमारे साथ इस एक साल के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने हमें दिल्ली के AAP सरकार के दोहरे रवैये के बारे में भी बताया।

दिल्ली दंगों के एक पीड़ित ने हमें बताया कि खालसा ऑर्गनाइजेशन के लोगों ने मदद देते समय हिन्दुओं और मुस्लिमों में खासा भेदभाव किया, अधिकतर हिन्दुओं को नज़रअंदाज़ किया गया। ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए राहुल शर्मा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि खालसा वालों ने केवल मुस्लिमों की ही सहायता की और हिन्दुओं को मदद के नाम पर टोकन दे दिया। वो चांँदबाग इलाके के रहने वाले हैं।

चाँदबाग वही क्षेत्र है, जहाँ आईबी अधिकारी रहे अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उन्हें ‘अल्लाहु अकबर’ का मजहबी नारा लगाती हुई भीड़ घसीट कर ले गई थी। दिल्ली की गलियों में हो रही इस हिंसा में इस्लामी भीड़ ने ऐसा क्रूर प्रदर्शन किया है, जैसा हाल के दिनों में नहीं देखने को मिला है। अंकित शर्मा और दिलबर नेगी की हत्या का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में आया था। दिलबर नेगी को ज़िंदा आग में झोंक दिया गया था।

एक पीड़ित ने बताया, “दिल्ली में हुए दंगों के कुछ महीनों बाद खालसा वालों को सहायता बाँटते हुए देखा गया था। उन्होंने पीड़ितों के पुनर्वास का जिम्मा उठाया हुआ था। हालाँकि, उनका समर्थन भेदभाव से भरा हुआ था। खालसा वालों ने हिन्दुओं के खिलाफ भेदभाव किया और मुस्लिमों को सहायता दी।” उसने यहाँ तक दावा किया कि 100 में से 90% के औसत से उन्होंने मुस्लिमों की मदद की और हिन्दुओं को नज़रअंदाज़ किया।

दंगे के प्रत्यक्षदर्शियों ने दिल्ली में चल रही अरविंद केजरीवाल की AAP सरकार पर भी पक्षपात के आरोप लगाए। इस व्यक्ति ने कहा कि दिल्ली सरकार ने भी हिन्दू पीड़ितों पर ध्यान नहीं दिया। उसने बताया कि केजरीवाल सरकार ने मस्जिदों में अनाज और फल भेजे, जबकि हिन्दुओं को दुकानों के बाहर लंबी लाइनें लगा कर संघर्ष करना पड़ा। प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि मस्जिदों में सरकार से आई सामग्रियों का मुस्लिमों में वितरण किया गया।

प्रत्यक्षदर्शी ने ये भी बताया कि इलाके में अभी भी शांति कायम नहीं है, बल्कि तनाव और हिन्दुओं के बीच डर का माहौल है। उसने हमें बताया कि मुस्तफाबाद में मुस्लिम भीड़ ने बाइक से जा रहे एक हिन्दू युवक की पिटाई की, जिसके बाद तनाव फ़ैल गया। उसने बताया कि इस खबर को मीडिया ने भी प्राथमिकता नहीं दी। हिन्दुओं को वहाँ जाना पड़ा, ताकि मामला शांत हो।

दिल्ली दंगों के दौरान ‘शिव विहार’ के लोगों ने भी बताया था कि चौक के पास की सड़क के एक तरफ मुस्लिमों के घर सलामत थे, दूसरी तरह हिन्दुओं की दुकानें ख़ाक में मिली हुई थीं। लोगों ने बताया था कि हमले इन्हीं मुस्लिमों के घर से हुए थे और मुस्लिम महिलाएँ भी अपनी छतों पर खड़े होकर पुलिस बलों पर एसिड से हमले कर रही थीं। बताया गया कि राजधानी स्कूल की छत पर काफ़ी ऊँचाई पर थे, जहाँ से हिन्दू ही अधिकतर निशाना बने।(साभार)

दिल्ली दंगों में पुलिस पर पिस्तौल तानने वाले शाहरुख को जमानत नहीं : ‘तस्वीर उसकी करनी बता रही’

2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान जाफराबाद में हेड कॉन्स्टेबल दीपक दहिया पर पिस्तौल तानने के आरोपित शाहरुख पठान को कड़कड़डूमा कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत की कोर्ट ने आरोपित की तस्वीर उस दिन घटना में उसकी संलिप्तता और उसके व्यवहार के बारे में बताती हैं।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत की अदालत ने शाहरुख की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपित का आचरण जमानत देने लायक नहीं है। यह तीसरा मौका है जब उसकी जमानत याचिका खारिज हुई है। अभियोजन पक्ष की तरफ से पेश वकील डीके भाटिया ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि पिछले वर्ष 24 फरवरी को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन और मौजपुर चौक के बीच 66 फुट रोड पर एक गुट जाम लगा रहा था। वहीं दूसरा गुट उन्हें जाम लगाने से रोकने का प्रयास कर रहा था। इसी दौरान दोनों गुट भिड़ गए थे और पथराव होने लगा था। इसी बीच कुछ लोग हवा में पिस्तौल लहराते हुए पुलिस कर्मियों पर फायरिंग करने लगे थे।

वजीराबाद पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के हेड कॉन्स्टेबल दीपक दहिया ने बहादुरी दिखाते हुए फायरिंग कर रहे दंगाइयों को रोकने का प्रयास किया तो उन पर गोली चला दी गई। किसी तरह झुक कर उन्होंने जान बचाई। फिर भी हाथ में पिस्तौल लिए एक युवक उनकी तरफ बढ़ गया। उन्होंने बताया कि जाँच के दौरान वीडियो के जरिए हेड कॉन्स्टेबल पर पिस्तौल तानने वाले युवक की पहचान अरविंद नगर निवासी शाहरुख पठान के रूप में हुई थी। उसे शामली बस अड्डे से गिरफ्तार किया गया था।

कलीम नामक शख्स ने उसे घर में पनाह दी थी। उसे भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। जिस कार में शाहरुख पठान फरार हुआ था, वह कार भी शामली के कैराना से बरामद की गई थी। कोर्ट को यह भी बताया गया कि दिसंबर 2019 में शाहरुख ने मेरठ के बाबू वसीम से 35 हजार रुपए में पिस्तौल और 20 कारतूस खरीदे थे।

अभियाेजन पक्ष की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि आरोपित के परिवार का आपराधिक इतिहास रहा है। उसका पिता साबिर अली नशीले पदार्थ के साथ वर्ष 1994 व 1995 में गिरफ्तार हो चुका है। शाहरुख की अम्मी के भी ड्रग तस्करों से ताल्लुकात हैं। साथ ही मौसा भी ड्रग तस्कर है। अभियोजन पक्ष पहले ही साक्ष्य के रूप में वीडियो फुटेज, आरोपित के घर से बरामद पिस्तौल और उसके कपड़े कोर्ट में पेश कर चुका है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने आरोपित की जमानत अर्जी खारिज कर दी।

शाहरुख पठान के खिलाफ धारा 147, 148, 149, 216, 186, 307, 353 और 34 आईपीसी और धारा 25 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के विरोध में 23 और 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे से ठीक पहले उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई थी। इस दौरान जाफराबाद-मौजपुर इलाके में लोगों को भड़काने और पुलिस पर पिस्तौल तानने के आरोपित शाहरुख को यूपी के शामली से 3 मार्च को गिरफ्तार किया गया था।

हिंसा के दौरान शाहरुख ने जाफराबाद इलाके में 8 राउंड फायरिंग की थी। उसके पास से एक पिस्तौल तथा दो कारतूस जब्त किए गए थे। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दिल्ली में शाहरुख के घर से पिस्टल और तीन कारतूस बरामद किए थे। 

‘पिंजरा तोड़’ की देवांगना को जमानत देने से कोर्ट का इनकार

दिल्ली की एक अदालत ने जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की ‘छात्रा’ और ‘पिंजरा तोड़’ की सदस्य देवांगना कलिता की दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में जमानत याचिका खारिज कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एडिशनल सेशन जज) अमिताभ रावत ने देवांगना की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उन पर लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही लगते हैं। 

देवांगना को फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे और सीएए-एनआरसी से जुड़े दंगे भड़काने के आरोप में गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था।

 

दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगे भड़काने में सक्रिय भूमिका निभाने के चलते दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 23 मई 2020 को देवांगना कलिता को गिरफ्तार किया था। देवांगना, पिंजरा तोड़ की संस्थापक सदस्यों में एक हैं, जो कथित तौर पर लैंगिक समानता के लिए कार्य करता है। देवांगना पर दंगों की साज़िश रचने के लिए यूएपीए के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। जमानत पर रिहा होने के ठीक बाद दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) ने देवांगना को मई में गिरफ्तार किया था।जाफराबाद पुलिस थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं, आर्म्स एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति अधिनियम के विध्वंस की रोकथाम के अंतर्गत दर्ज एफ़आईआर में भी कलिता का नाम मौजूद है। 28 जनवरी 2021 को दिल्ली की अदालत ने पिंजरा तोड़ की एक अन्य ‘कार्यकर्ता’ नताशा नरवाल की जमानत याचिका खारिज की थी।

इन जमानत याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए अदालत ने कहा कि रास्ते जाम करना जिससे आवश्यक सेवाएँ बाधित होती हैं, पुलिसकर्मियों पर हमला और दंगों को भड़काना यूएपीए के प्रावधानों के अंतर्गत आतंकवादी गतिविधि के दायरे में आता है। 

दंगे भड़काने वाला वामपंथी समूह ‘पिंजरा तोड़’ 

सीलमपुर और जाफराबाद के तमाम निवासियों ने पिंजरा तोड़ समेत तमाम सिविल सोसाइटी समूहों पर देश की राजधानी में दंगे भड़काने का आरोप लगाया था। पिंजरा तोड़ छात्राओं का समूह होने दावा करता है जो विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों और सुविधाओं के लिए लड़ता है, लेकिन ऐसे तमाम प्रदर्शन और अभियान में शामिल रहा है जो उग्रवादी मानसिकता से प्रेरित थे। 

अवलोकन करें:-

केजरीवाल सरकार दिल्ली दंगो के आरोपितों को बचा रही, जमानत के लिए छिपाई जानकारी: दिल्ली पुलिस

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केजरीवाल सरकार दिल्ली दंगो के आरोपितों को बचा रही, जमानत के लिए छिपाई जानकारी: दिल्ली पुलिस

वकील महमूद प्राचा का कच्चा चिट्ठा : मस्जिदों में बंदूक चलाने की ट्रेनिंग का सपना देखने वाला, दंगाइयों-आतंकियों को कोर्ट में बचाने वाला

                   महमूद प्राचा ने CAA विरोध आंदोलन के दौरान घूम-घूम कर मुस्लिमों को भड़काया था
सोशल मीडिया पर लिबरल गिरोह के वकील महमूद प्राचा के समर्थन में अभियान चला रहा है। आइए खोलते हैं इसका कच्चा चिट्ठा कि आखिर ये आदमी है कौन। वो दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।

NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।

अब आइए जानते हैं कि किन-किन किस्म के संगठनों के साथ उसका नाम जुड़ा हुआ है। जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

‘आर्गेनाईजेशन फॉर प्रमोशन ऑफ लीगल अवेयरनेस’ का वो मुखिया है। साथ ही वो ‘संविधान सुरक्षा समिति’ का संयोजक है। इसी संगठन के एक अन्य संयोजक का नाम है चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण। इस संगठन ने न सिर्फ CAA विरोधी आंदोलनों को देश भर में हवा दी, बल्कि प्रदर्शनकारियों को कानूनी सहायता भी मुहैया कराई। वजाहत हबीबुल्लाह इसका संस्थापक है, जो भारत का चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष रहा है।

दिल्ली के बाटला हाउस के नूह मस्जिद में वकील महमूद प्राचा

उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।

तब उसने देश में खतरा होने की बात बताते हुए कोरोना के दौरान भी मुस्लिम महिलाओं को धरनास्थल पर बैठे रहने को कहा था और उन्हें बचाव के लिए लौंग और हल्दी खाने की सलाह दी थी। उसने तब कहा था कि वो CAA विरोधी आंदोलन का कानूनी सलाहकार है और पुलिस-प्रशासन पर मुस्लिमों को तंग करने का आरोप लगाया था। उसने जनप्रतिनिधियों की ‘लगाम टाइट कर के रखने’ को कहा था और भड़काते हुए कहा था कि जब हमने CAA कानून बनाने का अधिकार इन नेताओं को नहीं दिया तो ये कैसे बन गया?

दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था और बाटला हाउस की नूह मस्जिद में केंद्र की मोदी सरकार पर मनुवाद चलाने का आरोप लगाया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।

इसी तरह उसने पूरे भारत में घूम-घूम कर केंद्र सरकार के कानूनों के खिलाफ भ्रम फैलाया। साथ ही वो मुस्लिम-दलित एकता की बातें करते हुए अपने हर भाषण में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का राम लेना भी नहीं भूलता है। दिल्ली दंगों में भी उसने जम कर अफवाहें फैलाई थीं और दावा किया था कि मुस्लिमों के घर बम लगा कर उड़ा दिए गए। उसने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिल्ली पुलिस पूरी ताकत लगा कर दंगा कराने में जुटी हुई थी। वो दिल्ली दंगों में हिन्दुओं को जेल भिजवाने का दावा भी करता है।

NPR को लेकर भी मुस्लिमों को भड़काया था

दिल्ली दंगों के बाद भी उसने घूम-घूम कर ‘मुस्लिम पीड़ितों’ के वीडियो बनवाए थे और हिन्दुओं पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए थे। जब दिल्ली के तुगलकाबाद में रविदास मंदिर के टूटने के बाद ‘रावण’ ने इस मुद्दे पर उपद्रव किया था, तब भी वो उसके समर्थन में था और दावा किया था कि इस मंदिर के लिए 96 भक्त जेल गए हैं। 2019 में जब ‘मॉब लिंचिंग’ को लेकर अफवाहें फैला जा रही थीं, तो इसमें भी महमूद प्राचा पूरी तरह शामिल था।

उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।

चुनाव के दौरान वो दिल्ली के दिवंगत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का भी समर्थक रहा है और नामांकन में उनके साथ रहा था। 2019 लोकसभा चुनाव में उसने भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ‘मिल्लत टाइम्स’ नामक इस्लामी मीडिया संस्थान को संरक्षण दिया था। 2010 पुणे जर्मन बेकरी बम ब्लास्ट मामले में वो आतंकी मिर्ज़ा हिमायत को कोर्ट में डिफेंड कर चुका है। इजरायल दूतावास हमले में वो आरोपित सैयद मुहम्मद अहमद काजमी का वकील रहा है।

उसने उस आरोपित को कार्रवाई से बचा भी लिया और आज उसके द्वारा चलाए जाने वाले मीडिया संस्थानों में वो बड़ी हैसियत रखता है। 2008 दिल्ली सीरियल बम ब्लास्ट मामले में वो मुहम्मद मंसूर असगर का वकील रहा है। उसने बेअंत सिंह हत्या मामले में खालिस्तानी आतंकी जगतार सिंह की भी कोर्ट में मदद की। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने उसे एक बार निकाल बाहर भी किया था और कहा था कि वो इन मामलों पर ठीक से फोकस नहीं कर रहा है।

2014 में वो इराक के लिए निकला था और दावा किया था कि वो आतंकी संगठन ISIS द्वारा अपहृत किए गए भारतीयों को छुड़ाने के लिए गया है। IB ने उसके व उसके साथ जा रहे 6 लोगों के पासपोर्ट जब्त किए थे, जिसके बाद उसने IB पर ही उसके मानवाधिकार कार्य में बाधा पहुँचाने का आरोप लगाते हुए कोर्ट में केस कर दिया था। उसने IB की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसका गठन कानून के तहत नहीं हुआ है।

हाल ही में दिल्ली पुलिस की एक विशेष सेल ने अदालत से वारंट लेकर दिसंबर 24, 2020 को दिल्ली दंगों के मामले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य महमूद प्राचा के ऑफिस की तलाशी ली। वकील प्राचा पर एक सरकारी कर्मचारी को आपराधिक बल का प्रयोग करके कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने का आरोप लगा। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 186, 353 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की है।

क्या इस किसान आंदोलन के पीछे हनी ट्रैप है? कौन-कौन इस हनी ट्रैप में लिप्त है?

   क्या इस आंदोलन के पीछे हनी ट्रैप का खेल है? सोशल मीडिया पर वायरल फोटो 
प्रदर्शनकारी किसान जहां नए कृषि कानूनों को हर हाल में वापस लेने की मांग पर अड़े हैं, वहीं मोदी सरकार कानूनों को किसानों के हित में बताकर उन्हें समझाने की कोशिश कर रही है। सरकार की दलील है कि नए कानून के तहत किसान मंडियों की गुलामी से मुक्त हो सकेंगे और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी कीमत पर अपना कृषि उत्पाद बेच सकेंगे। सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। दिल्ली की सीमाओं पर जमे आंदोलनकारी किसानों में बड़ी संख्या पंजाब के किसानों की है, जहां की मंडियों का कुल शुल्क सबसे ज्यादा है।

किसान आंदोलन से अधिक चर्चा इस गंभीर बात को लेकर हो रही है कि आखिर पंजाब मुख्यमंत्री किस आधार पर पाकिस्तानी डिफेंस पत्रकार के साथ लिवइन रिलेशन में हैं? इसके अलावा किस-किस पार्टी के कितने नेता हनी ट्रैप में लिप्त हैं? क्योकि नागरिकता संशोधक कानून विरोध से लेकर चल रहे किसान आंदोलन में वही सब मुद्दे यानि मांगें उठ रही हैं, जिन्हे लेकर पाकिस्तान भारत के विरुद्ध प्रचार करता रहता है। सरकार को इस हनी ट्रैप की गंभीरता से जाँच कर इस ट्रैप में लिप्त नेताओं पर नकेल डालनी पड़ेगी। 

किसानों की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार कानून में आवश्यक संशोधन का आश्वासन दे रही है। इसके बावजूद किसान अपनी जिद पर अड़े हुए और हंगामा हर रोज बढ़ता जा रहा है, क्योंकि देश विरोधी ताकतें किसानों को बहकाने का कोई मौका नहीं चूक रहीं। ये ताकतें आंदोलन की आड़ में अपना हित साधने में लगी है। इसकी पुष्टि इस ‘आंदोलन’ में दिख रही उमर खालिद, शरजील इमाम, वरवरा राव जैसे लोगों की तस्वीरों से होती है।

मंडी लॉबी की मार का सबसे बड़ा भुक्तभोगी केंद्र सरकार

केंद्र सरकार को होता है बड़ा नुकसान जीएसटी से पहले एफसीआई अनाज खरीद के लिए जो मंडियों को विभिन्न लेवी का भुगतान करती थी, वह कई बार एमएसपी का औसतन 13 प्रतिशत तक होता था। पंजाब में तब यह 14.5 प्रतिशत तक था। मंडी लॉबी की इस मार का सबसे बड़ा भुक्तभोगी केंद्र सरकार ही रही है। मसलन, 2019-20 में केंद्र ने एफसीआई और दूसरी एजेंसियों के जरिए जो सिर्फ धान और गेहूं की खरीद की थी, उसकी एवज में उसे 7,600 करोड़ रुपये सिर्फ मंडी टैक्स और आढ़तियों के कमीशन के रूप में देने पड़ गए।

प्रदर्शन के दौरान भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) ने अपने स्टेज पर एक कार्यक्रम किया और इसमें उमर खालिद, शरजील इमाम, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव और आनंद तेलतुंबडे जैसे लोगों के पोस्टर-बैनर नजर आए। ये कार्यक्रम टिकरी बॉर्डर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर हो रहा था। पोस्टर-बैनर के जरिए मांग की जा रही थी कि गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाए। गौरतलब है कि इनमें से कई लोगों पर संगीन मामलों के तहत केस दर्ज हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिन पर UAPA के तहत केस दर्ज है। जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोग शामिल हैं। 

इन पोस्टरों को देखकर लगता है कि किसानों को गुमराह कर जहां सियासी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, वहीं टुकड़े-टुकड़े गैंग अपने एजेंडे को लागू करने में लगा है। सरकार द्वारा कई मांगों को माने जाने के बावजूद किसान सरकार की सुनने को तैयार नहीं है। वह सिर्फ कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि इस प्रदर्शन के पीछे बड़ी साजिश है। टुकड़े-टुकड़े गैंग चाहता है कि नए कृषि कानूनों के रद्द होने पर सीएए को रद्द करने की मांग तेज की जाएगी।

जिस तरह से इस प्रदर्शन में देश विरोधी ताकतों की भूमिका बढ़ती जा रही है। उससे धीरे-धीरे यह प्रदर्शन राजनीति से प्रेरित लगने से ज्यादा खतरे की घंटी नजर आने लगा है। वही खतरे की घंटी जिसे शाहीन बाग के दौरान नजरअंदाज किया जाता रहा और अंत में उसका भीषण रूप उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के रूप में देखने को मिला। इसी तरह किसानों की आड़ में भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा सकता है। 

उमर खालिद और शरजील इमाम के साथ गौतम नवलखा और वरवरा राव की तस्वीरें इस ओर इशारा करती है कि शाहीन बाग का वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह सक्रिय है। महिला किसानों के हाथों में इनके पोस्टर देखकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इनका किसानों के आंदोलन से क्या लेनादेना है। अब लोग आंदोलन की असल मंशा पर ही प्रश्न उठाने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि उस शरजील इमाम को रिहा क्यों करवाना चाहेगी जो अपने भाषण में असम को भारत से काटने की बात कह रहा था? दिल्ली में दंगे करवाने के लिए गुपचुप ढंग से बैठकें करने वाले और जाकिर नाइक से मिलने वाले  उमर खालिद से आखिर किसान प्रदर्शन का क्या लेना-देना? अर्बन नक्सलियों से कृषि कानून का क्या संबंध ?

हिन्दू-विरोधी दंगों में गिरफ्तार दंगाइयों को रिहा करने की मांग करने वाले क्या किसान हैं?

                                             दंगाइयों को रिहाई करने वाले क्या किसान हो सकते हैं?

कथित तौर पर किसान कानूनों के विरोध में दिल्ली में चल रहे कथित किसान आंदोलन को गैर-राजनीतिक होने के दावों के विपरीत, भारतीय किसान यूनियन (BKU उगराह) ने मानवाधिकार दिवस पर दिसंबर 10, 2020 को माओवादी-नक्सलियों के साथ संबंध के आरोप में  ‘गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन विधेयक (यूएपीए) UAPA के तहत गिरफ्तार किए गए कई आरोपितों की रिहाई की माँग की है।

इन प्रदर्शनकारियों की मांग यह सिद्ध कर रही है कि कृषि बिल के विरोध में हो रहा यह उपद्रव वास्तव में नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में गिरफ्तार हुए दंगाइयों को रिहा करवाने के लिए है। ये है प्रदर्शनकारियों का असली चेहरा। इनका कृषि बिल से कोई लेना-देना नहीं, अपनी असलियत खुद ही सामने ला दी। शायद इसीलिए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस खुलकर इनके समर्थन में आये हुए हैं और अकाली दल इनके चक्रव्यूह में फंस गया। क्योकि इन दंगों में आरोपित अधिकतर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के ही लोग हैं।   

हर भारतीय को 1965 भारत-पाक युद्ध के दौरान मौहम्मद रफ़ी के उस गैर-फ़िल्मी गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल कर रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से...." को। जो उस समय भी सार्थक सिद्ध हुई थी और आज 55 वर्ष उपरांत सिद्ध होने जा रही है। वरना कृषि बिल की आड़ में बैठे अराजक दंगाइयों की रिहाई की मांग नहीं करते। इनका एजेंडा शुरू से जगजाहिर होने लगा था, उसके बावजूद संविधान की दुहाई देने वाले और जनप्रतिनिधि का स्वांग रच जनता को मुर्ख बना रहे लोग इनके पीछे खड़े नहीं होते।  

‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसमें जिन लोगों की रिहाई की माँग की गई है, उसमें शामिल यूएपीए के तहत बुक किए गए असम को भारत से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम, उमर खालिद, गौतम नवलखा, पी वरवरा राव, वर्नन गोंज़ाल्वेस, अरुण फरेरा और कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज सहित 20 से अधिक आरोपितों की तस्वीरें टिकरी सीमा के पास एक मंच पर लगाई जाएँगी। बताया जा रहा है कि कई मानवाधिकार समूहों के भी इसमें भाग लेने की उम्मीद है।

एक ट्विटर यूजर ने धरने पर बैठे किसानों का एक वीडियो भी ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा है कि जो लोग इस तस्वीर को फेक बता रहे थे उन्हें यह वीडियो देखना चाहिए।

वहीं, बीकेयू (उगराह) के वकील और समन्वयक एनके जीत ने कहा कि यह पहले दिन से ही उनकी माँग रही है कि जेलों में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने कहा है कि शहरी नक्सलियों, कॉन्ग्रेस और खालिस्तानियों द्वारा कृषि आंदोलन को भड़काया गया है। एनके जीत ने कहा कि शहरी नक्सल लोगों पर मुकदमा चलाने का यह एक बहाना है और पंजाब में लोगों को स्टेट टेररिज्म और आतंकवादियों के बीच फंसाया जाता है जबकि नक्सलवाद ने आदिवासी लोगों को उनके अधिकार दिलाने में मदद की है।”

अपनी माँगों पर अडिग रहकर केंद्र द्वारा पेश 20 पेज के प्रस्ताव को किसान संघों ने बुधवार को खारिज कर दिया है। किसानों ने दिल्ली की ओर जाने वाले राजमार्गों को अवरुद्ध करके अपने आंदोलन को तेज करने की धमकी दी है। उन्होंने कहा कि 14 दिसंबर को भाजपा नेताओं, मंत्रियों और कार्यालयों के आवासों को घेरा जाएगा, और देश भर के जिला मुख्यालयों पर धरने होंगे। इस के साथ ही दक्षिणी राज्यों में विरोध अनिश्चित काल तक जारी रहेगा।

इस साल की शुरुआत में ही दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में 53 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, जिसमें कई कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अर्बन नक्सल समूहों पर दंगा भड़काने का आरोप भी लगा है। ऐसे समूहों के कुछ लोगों को जनता को गुमराह करने और सड़क पर उतरकर दंगा करने के लिए उकसाने के आरोप के तहत UAPA गिरफ्तार किया गया है।

फेसबुक के पूर्व कर्मचारी का खुलासा- रोका जा सकता था दिल्ली दंगा

राजनीति भी विचित्र है, जो रंग बदलने में गिरगिट को भी पूर्णरूप से बहुत पीछे छोड़ रही है। जन विरोधी सारे खेल खेलने के बाद बेनकाब होते हैं, आरोप दूसरे पर छाड़ दूध के धुले कहें या दूध से ज्यादा सफ़ेद बताने सामने आ जाते हैं। 

नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में अब तक पकडे गए आरोपियों से जो सच्चाई सामने आ रही है, उससे घबरा कर अब मोदी विरोधी सारा दोष फेसबुक पर डाल अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने में लग गए हैं, क्योंकि दिल्ली और बंगाल चुनाव अति निकट हैं। क्या फेसबुक ने नेताओं अथवा निर्वाचित सदस्यों को बोला था कि "जाओ दंगा करो"? इन बेशर्मों से पूछा जाए कि "मरने वाला मर गया, किसी का घर/कार एवं स्कूटर जलाकर राख कर दिया, ये जो नुकसान हुआ, किसी और का नहीं हिन्दुस्तानियों का हुआ है। कौन है इन बिकाऊ दंगाइयों के पीछे? किसने पेट्रोल, एसिड, पत्थर, गुलेल और छुरे-चाकुओं का प्रबंध किया और किसने इस काम के लिए धन दिया?" 
राजधानी दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को रोका जा सकता था, अगर फेसबुक ने सही समय पर दंगों को भड़काने वाले कंटेंट को रोका होता। यह दावा फेसबुक के पूर्व कर्मचारी मार्क एस लकी ने दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भाव समिति के सामने किया है। उन्होंने बताया कि कई बार वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारों पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके चलते कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि फेसबुक पर पहले भी दक्षिणपंथ के प्रति पूर्वग्रह रखने के आरोप लगते रहे हैं।

दिल्ली विधानसभा की इस कमेटी के अध्यक्ष विधायक राघव चड्ढा हैं। समिति ने गुरुवार (नवम्बर 12, 2020) को फेसबुक के अधिकारियों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली सामग्री को जानबूझकर नजरअंदाज करने से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करते हुए एक बैठक बुलाई थी। दरअसल समिति का मानना है कि दिल्ली दंगों को भड़काने में फेसबुक का भी बहुत बड़ा हाथ था।

बैठक के दौरान पूर्व कर्मचारी लकी ने फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर राजनीतिक दलों के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए। लकी ने अपने बयान में कहा कि अगर समय रहने फेसबुक पर दिल्ली में दंगे भड़काने वाले कंटेंट को रोका गया होता जो शायद इतनी ​बड़ी घटना नहीं होती। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि अगर फेसबुक ने सही समय पर कार्रवाई की होती तो म्यांमार जनसंहार और श्रीलंका में हुए दंगों को आसानी से रोका जा सकता था।

लकी ने राजनीतिक पार्टियों और फेसबुक के बीच के कनेक्शन के बारे में खुलासा करते हुए यह भी बयान दिया कि फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारे पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके अलावा फेसबुक के वरिष्ठ अधिकारी और क्षेत्रीय प्रमुख उन देशों में राजनीतिक दलों से दोस्ती बनाकर रखते हैं, जहाँ फेसबुक को काफी ग्राहक हैं। इस सब की वजह से कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। जिसका फायदा भी होता है और नुकसान भी झेलना पड़ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि फेसबुक कंटेंट मॉडरेशन के संबंध में ऐसी नीतियां बना रहा है, जो पारदर्शी नहीं हैं।

 बिज़नेस के सिलसिले को उजागर करते हुए मार्क ने बताया कि फेसबुक के लिए भारत के बाद अमेरिका दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन भारत को इसका कोई खास फायदा नहीं मिलता। क्योंकि फेसबुक भारत में अमेरिका जितना संसाधन खर्च नहीं करता है, जिससे भारत को अपेक्षाकृत नुकसान है। फेसबुक के दिशानिर्देशों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अगर अधिकारी कंपनी के कर्मचारियों को वास्तविक गाइडलाइंस के मुताबिक काम करने दें तो समाज में ज्यादा शांति और सद्भाव रहेगा।

बेंगलुरु दंगे : आरोपितों की ‘बेगुनाह’ छोड़ने की माँग के लिए जज को भेजा विस्फोटक से भरा पार्सल

कर्नाटक में फिल्मी शख्सियतों से जुड़े ड्रग्स के एक मामले और बेंगलुरु दंगों की सुनवाई कर रहे एक एनडीपीएस विशेष न्यायाधीश को बेंगलुरु में सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को दो धमकी भरे पत्रों के साथ एक विस्फोटक सामग्री वाला पार्सल मिला। इस पार्सल के साथ आए पत्रों में सैंडलवुड ड्रग केस की आरोपित रागिनी द्विवेदी और संजना गरलानी की रिहाई की माँग की गई है। इसमें बेंगलुरु में दंगा करने वाले लोगों को ‘बेगुनाह’ कहकर छोड़ने की बात भी कही गई।

पत्र में जज से कहा गया कि वह आरोपितों को बेल दें और जेसीपी संदीप पाटिल को कहा गया कि वह इस केस दूर रहें। वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार धमकी भरा पत्र भेजने के सिलसिले में दो व्यक्तियों को राज्य के तुमकुरु जिले में हिरासत में लिया गया है।

पत्र लिखने वाले व्यक्ति ने चेतावनी दी थी कि माँगे पूरी नहीं होने पर एक विस्फोट किया जाएगा। बाद में जाँच से पता चला कि पार्सल में कोई विस्फोटक नहीं बल्कि डराने के लिए मात्र कुछ तारें थीं जिससे ऐसा लगा कि यह एक डेटोनेटर है। 

रिपोर्ट के अनुसार, सिटी सिविल कोर्ट के हॉल नंबर 37 के बाहर पार्सल छोड़ा गया था। जब कोर्ट स्टाफ ने पार्सल खोला तो उन्हें विस्फोटक जैसा पदार्थ मिला। उन्होंने हलासुरुगेट पुलिस को फोन किया और बॉम्ब स्क्वॉयड भी वहाँ पहुँची। ज्वाइंट कमिश्नर संदीप पाटिल ने कहा कि इस केस में अज्ञात के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। वहीं दूसरी ओर पुलिस ने अपनी जाँच भी शुरू कर दी है। पता लगाया जा रहा है कि आखिर पत्र आया कहाँ से?

हलासुरुगेट (Halasurugate) के पुलिस अधिकारी अब सीसीटीवी कैमरा फुटेज की जाँच कर रहे हैं और हाउसकीपिंग स्टाफ व मुख्य सुरक्षाकर्मियों से भी पूछताछ कर रहे हैं। इस बीच, पुलिस बम के खतरों के मद्देनजर उक्त मजिस्ट्रेट की सुरक्षा बढ़ाने पर भी विचार कर रही है।

बेंगलुरु दंगों में कांग्रेस की भूमिका

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ कांग्रेस पार्टी बेंगलुरु दंगों में अपनी किसी भी प्रकार की भूमिका से इंकार कर रही है वहीं समाचार चैनल ‘टाइम्स नाउ’ ने इस पूरे केस में पार्टी के लिंक निकाले हैं। रिपोर्ट बताती है कि दंगों के मुख्य आरोपित और कांग्रेस के पूर्व मेयर संपथ राय के बीच हुई बातचीत के कॉल रिकॉर्ड सामने आए हैं जिसे टाइम्स नाउ ने एक्सेस किया है।

इनसे मालूम पड़ता है कि दंगाइयों व कांग्रेस नेता के बीच काफी गहरी बातचीत थी। रिपोर्ट की मानें तो इन कॉल डिटेल्स के सामने आने से स्पष्ट हो रहा है कि दंगों में संपथ रॉय की कुछ न कुछ भूमिका थी। उनके कई करीबियों के नंबर से भी ऐसे लोगों को फोन किया गया जो हिंसा के समय घटनास्थल पर थे।

बेंगलुरु में अभी हाल में एक फेसबुक पोस्ट के कारण आगजनी का भीषण नजारा देखने को मिला था। इस पूरे हमले में केजी हल्ली, डीजे हल्ली और पुल्केशी नगर सबसे अधिक प्रभावित हुए थे। सैंकड़ों की तादाद में संप्रदाय विशेष की भीड़ ने स्थानीय विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर को घेर कर तोड़फोड़ की थी। उनका आरोप था कि विधायक के रिश्तेदार ने पैगम्बर मुहम्मद को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट किया।

इस मामले में पुलिस ने 5 ऐसे लोगों के नाम दर्ज किए थे जिन्होंने भीड़ का नेतृत्व किया। उस दिन भड़की हिंसा में 3 लोगों की मौत हुई थी और 60 से अधिक घायल हुए थे। दंगाई भीड़ ने 10 वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया था और डीजे हल्ली थाने के सामने उनमें आग लगा दी थी।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : ताहिर ने जुटाए लिए थे 10 करोड़ रूपए , 1.25 करोड़ से पेट्रोल, तेजाब, पिस्तौल, गोली, तलवार…

आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद और दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) को आरोप-पत्र दायर किया है, जिसमें उसके द्वारा की गई ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ का ब्यौरा है। ED ने खुलासा किया है कि ताहिर हुसैन ने दिल्ली दंगों में इस्तेमाल किए जाने के लिए 1.25 करोड़ रुपए सिर्फ हथियार खरीदने के लिए लगाए थे।

कड़कड़डूमा स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत की अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के साथ ही सह-आरोपी अमित गुप्ता के खिलाफ दाखिल आरोप-पत्र पर संज्ञान लिया। ‘हिंदुस्तान’ में प्रकाशित खबर के अनुसार, ED ने अपनी जाँच के दौरान पाया कि दिल्ली दंगों के लिए मनी लॉन्ड्रिंग की गई थी और ताहिर हुसैन व उसके गुर्गों द्वारा हेरफेर की गई कुल राशि करीब 10 करोड़ रुपए हो जाती है।

दंगों के लिए इकट्ठा की गई इस धनराशि को शेल व डमी कंपनियों के माध्यम से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में चल रहे धरना-प्रदर्शनों में लगाया गया। दंगों के लिए घातक हथियार जैसे पेट्रोल, तेजाब, पिस्तौल, गोली, तलवार व चाकू जैसे हथियार खरीदने के लिए सवा करोड़ रुपयों का इस्तेमाल हुआ। इन दंगों की तैयारी काफी पहले से चल रही थी। इस मामले में उसका साथ अमित गुप्ता ने दिया, जिसके नाम पर सारी फर्जी कम्पनियाँ खोली गईं।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन के खिलाफ ED की चार्जशीट में धारा 3 (धनशोधन), धारा 70 (कंपनियों द्वारा अपराध), और धनशोधन (रोकथाम) अधिनियम 2002 की धारा 4 के तहत आरोप तय किए गए हैं। अमित गुप्ता के खिलाफ समन और ताहिर हुसैन के खिलाफ प्रोडक्शन वारंट जारी किया गया है। अब जेल प्रशासन सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मुख्य आरोपित को अदालत में पेश करेगा।

चूँकि इस मामले की जाँच समाप्त नहीं हुई है, इसीलिए ED का कहना है कि पूरा आरोप-पत्र (सप्लीमेंट्री चार्जशीट) भी दायर की जा सकती है। वहीं ताहिर के वकील रिजवान और केके मेनन ने अपने मुवक्किल को ‘परिस्थितियों का शिकार’ बताते हुए कहा कि उसे कई मामलों में आरोपित बना दिया गया है, वो एक ही साथ इतनी जगह कैसे उपस्थित रह सकता है? उन्होंने इसे ‘राजनीतिक द्वेष’ के तहत की गई साजिश करार दिया।

ED के विशेष अधिवक्ता एन के माट्टा ने अदालत को जानकारी दी कि कि ताहिर पर धोखाधड़ी, दस्तावेजों से जालसाजी और आपराधिक साजिश का भी आरोप है। उसके घर व दफ्तर सहित कई ठिकानों पर छापेमारी के दौरान आपत्तिजनक सामग्रियाँ जब्त की गई हैं। इनमें दस्तावेजों के अलावा डिजिटल साक्ष्य भी जब्त किए गए हैं। दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

इस मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट का कहना है, “अभियुक्तों की संलिप्तता के बारे में प्रथम दृष्टया पर्याप्त भड़काऊ सामग्री है।” इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (अक्टूबर 16, 2020) को इस साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगे के मामलों में दाखिल चार आरोप-पत्रों पर संज्ञान लिया था। इनमें से दो आरोप पत्र आम आदमी पार्टी से बर्खास्त पार्षद ताहिर हुसैन और दो आरोप-पत्र निजी स्कूल मालिक फैसल फारूक के खिलाफ थे।