नागरिकता संसोधन कानून (CAA) के विरुद्ध दिल्ली के शाहीन बाग़ में सड़क जाम करके साल 2020 में हजारों मुस्लिमों ने कई महीनों तक विरोध प्रदर्शन किया। सरदार डीएस बिंद्रा अपना फ़्लैट बेंचकर शाहीन बाग़ में लंगर लगाते थे, लोग अब सरदार जी से पूछ रहे हैं कि अफगानिस्तान से जो सिख भाई-बहन आये है उनके लिए क्या व्यवस्था किये हो?
फ्लैट बेचकर शाहीनबाग में लंगर चलाने वाले सरदारजी अफगान से बहुत सिख भाई बहन आये है उनके लिए क्या व्यवस्था किये हो ?? 🤔🤔
फ्लैट बेचकर शाहीनबाग में लंगर चलाने वाले सरदारजी अफगान से बहुत सिख भाई बहन आये है उनके लिए क्या व्यवस्था किये हो ?? 🤔🤔
— Kavita Jawla (जीना सिर्फ देश के लिए) (@KavitaJawla1) August 25, 2021
उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान पर इस्लामिक आतंकी गुट तालिबान ने कब्जा कर लिया है, लोग अब वहां से जान बचाकर भाग रहे हैं और दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं, अफगानिस्तान के बहुत से सिख और हिन्दू भी भारत आये हैं, अफगानिस्तान के एकमात्र सिख सांसद नरेंदर सिंह खालसा भी अफगानिस्तान में अपना घर-बार छोड़कर जान बचाकर भारत चले आये हैं। दिल्ली पहुंचने पर नरेंदर सिंह ने अफगानिस्तान से सुरक्षित निकालने के लिए भारत सरकार तथा प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद किया है। अफगानिस्तान से आये लोगों की भारत सरकार पूरी मदद कर रही है।
लेकिन अब सोशल मीडिया पर लोग शाहीन बाग़ में लंगर चलाने वाले सरदार डीएस बिंद्रा से पूछ रहे हैं कि क्या मानवता के नाम पर अफगान से आये सिख बहन-भाइयों के लिए भी लंगर लगाएंगे, बता दें कि शाहीन बाग़ में लंगर लगाने के लिए सरदार डीएस बिंद्रा ने अपना फ़्लैट तक बेंच दिया था, डीएस बिंद्रा पेशे से दिल्ली हाई कोर्ट में वकील हैं। उन्होंने कहा, लोगों की सेवा करने के लिए उन्होंने अपना फ्लैट तक बेच दिया है। सरदार डीएस बिंद्रा का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह खुद को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का सिपाही बता रहे थे।
दिल्ली में 1 साल पहले भड़की थी हिंसा (फाइल फोटो साभार: The Tribune) दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को एक साल पूरा हो चुका है। महीनों तक चला यह हिंसक CAA विरोधी उपद्रव भयावह रूप से हिंसक हो पड़ा था। लगभग 3 दिनों तक चली इस हिंसा में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। अब जब इस हिंसा को एक वर्ष पूरे हो चुके हैं, ऑपइंडिया ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के स्थानीय लोगों से बातचीत की, जिन्होंने हमारे साथ इस एक साल के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने हमें दिल्ली के AAP सरकार के दोहरे रवैये के बारे में भी बताया।
दिल्ली दंगों के एक पीड़ित ने हमें बताया कि खालसा ऑर्गनाइजेशन के लोगों ने मदद देते समय हिन्दुओं और मुस्लिमों में खासा भेदभाव किया, अधिकतर हिन्दुओं को नज़रअंदाज़ किया गया। ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए राहुल शर्मा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि खालसा वालों ने केवल मुस्लिमों की ही सहायता की और हिन्दुओं को मदद के नाम पर टोकन दे दिया। वो चांँदबाग इलाके के रहने वाले हैं।
चाँदबाग वही क्षेत्र है, जहाँ आईबी अधिकारी रहे अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उन्हें ‘अल्लाहु अकबर’ का मजहबी नारा लगाती हुई भीड़ घसीट कर ले गई थी। दिल्ली की गलियों में हो रही इस हिंसा में इस्लामी भीड़ ने ऐसा क्रूर प्रदर्शन किया है, जैसा हाल के दिनों में नहीं देखने को मिला है। अंकित शर्मा और दिलबर नेगी की हत्या का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में आया था। दिलबर नेगी को ज़िंदा आग में झोंक दिया गया था।
एक पीड़ित ने बताया, “दिल्ली में हुए दंगों के कुछ महीनों बाद खालसा वालों को सहायता बाँटते हुए देखा गया था। उन्होंने पीड़ितों के पुनर्वास का जिम्मा उठाया हुआ था। हालाँकि, उनका समर्थन भेदभाव से भरा हुआ था। खालसा वालों ने हिन्दुओं के खिलाफ भेदभाव किया और मुस्लिमों को सहायता दी।” उसने यहाँ तक दावा किया कि 100 में से 90% के औसत से उन्होंने मुस्लिमों की मदद की और हिन्दुओं को नज़रअंदाज़ किया।
जितने भी राष्ट्र विरोधी ताकतें उनका समर्थन देने और हिंदुस्तान को कमजोर करने के लिए @ArvindKejriwal "शहरी नक्सली" हमेशा एक पैर पर खड़ा रहता है !! pic.twitter.com/Re0VYxici5
मेरठ की इस जिहादी को गिरफ्तार कर लिया गया है पर विचारणीय बात यह है कि जिहाद मानसिकता इनको बचपन से ही उनके मस्तिष्क में भर दी जाती है जिससे यह गैर मुस्लिमों से नफरत करना बचपन से ही सीख जाते हैं pic.twitter.com/mwBbhle6kh
दंगे के प्रत्यक्षदर्शियों ने दिल्ली में चल रही अरविंद केजरीवाल की AAP सरकार पर भी पक्षपात के आरोप लगाए। इस व्यक्ति ने कहा कि दिल्ली सरकार ने भी हिन्दू पीड़ितों पर ध्यान नहीं दिया। उसने बताया कि केजरीवाल सरकार ने मस्जिदों में अनाज और फल भेजे, जबकि हिन्दुओं को दुकानों के बाहर लंबी लाइनें लगा कर संघर्ष करना पड़ा। प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि मस्जिदों में सरकार से आई सामग्रियों का मुस्लिमों में वितरण किया गया।
प्रत्यक्षदर्शी ने ये भी बताया कि इलाके में अभी भी शांति कायम नहीं है, बल्कि तनाव और हिन्दुओं के बीच डर का माहौल है। उसने हमें बताया कि मुस्तफाबाद में मुस्लिम भीड़ ने बाइक से जा रहे एक हिन्दू युवक की पिटाई की, जिसके बाद तनाव फ़ैल गया। उसने बताया कि इस खबर को मीडिया ने भी प्राथमिकता नहीं दी। हिन्दुओं को वहाँ जाना पड़ा, ताकि मामला शांत हो।
दिल्ली दंगों के दौरान ‘शिव विहार’ के लोगों ने भी बताया था कि चौक के पास की सड़क के एक तरफ मुस्लिमों के घर सलामत थे, दूसरी तरह हिन्दुओं की दुकानें ख़ाक में मिली हुई थीं। लोगों ने बताया था कि हमले इन्हीं मुस्लिमों के घर से हुए थे और मुस्लिम महिलाएँ भी अपनी छतों पर खड़े होकर पुलिस बलों पर एसिड से हमले कर रही थीं। बताया गया कि राजधानी स्कूल की छत पर काफ़ी ऊँचाई पर थे, जहाँ से हिन्दू ही अधिकतर निशाना बने।(साभार)
महमूद प्राचा ने CAA विरोध आंदोलन के दौरान घूम-घूम कर मुस्लिमों को भड़काया था सोशल मीडिया पर लिबरल गिरोह के वकील महमूद प्राचा के समर्थन में अभियान चला रहा है। आइए खोलते हैं इसका कच्चा चिट्ठा कि आखिर ये आदमी है कौन। वो दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।
NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।
अब आइए जानते हैं कि किन-किन किस्म के संगठनों के साथ उसका नाम जुड़ा हुआ है। जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।
‘आर्गेनाईजेशन फॉर प्रमोशन ऑफ लीगल अवेयरनेस’ का वो मुखिया है। साथ ही वो ‘संविधान सुरक्षा समिति’ का संयोजक है। इसी संगठन के एक अन्य संयोजक का नाम है चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण। इस संगठन ने न सिर्फ CAA विरोधी आंदोलनों को देश भर में हवा दी, बल्कि प्रदर्शनकारियों को कानूनी सहायता भी मुहैया कराई। वजाहत हबीबुल्लाह इसका संस्थापक है, जो भारत का चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष रहा है।
दिल्ली के बाटला हाउस के नूह मस्जिद में वकील महमूद प्राचा
उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।
तब उसने देश में खतरा होने की बात बताते हुए कोरोना के दौरान भी मुस्लिम महिलाओं को धरनास्थल पर बैठे रहने को कहा था और उन्हें बचाव के लिए लौंग और हल्दी खाने की सलाह दी थी। उसने तब कहा था कि वो CAA विरोधी आंदोलन का कानूनी सलाहकार है और पुलिस-प्रशासन पर मुस्लिमों को तंग करने का आरोप लगाया था। उसने जनप्रतिनिधियों की ‘लगाम टाइट कर के रखने’ को कहा था और भड़काते हुए कहा था कि जब हमने CAA कानून बनाने का अधिकार इन नेताओं को नहीं दिया तो ये कैसे बन गया?
दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था और बाटला हाउस की नूह मस्जिद में केंद्र की मोदी सरकार पर मनुवाद चलाने का आरोप लगाया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।
इसी तरह उसने पूरे भारत में घूम-घूम कर केंद्र सरकार के कानूनों के खिलाफ भ्रम फैलाया। साथ ही वो मुस्लिम-दलित एकता की बातें करते हुए अपने हर भाषण में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का राम लेना भी नहीं भूलता है। दिल्ली दंगों में भी उसने जम कर अफवाहें फैलाई थीं और दावा किया था कि मुस्लिमों के घर बम लगा कर उड़ा दिए गए। उसने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिल्ली पुलिस पूरी ताकत लगा कर दंगा कराने में जुटी हुई थी। वो दिल्ली दंगों में हिन्दुओं को जेल भिजवाने का दावा भी करता है।
NPR को लेकर भी मुस्लिमों को भड़काया था
दिल्ली दंगों के बाद भी उसने घूम-घूम कर ‘मुस्लिम पीड़ितों’ के वीडियो बनवाए थे और हिन्दुओं पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए थे। जब दिल्ली के तुगलकाबाद में रविदास मंदिर के टूटने के बाद ‘रावण’ ने इस मुद्दे पर उपद्रव किया था, तब भी वो उसके समर्थन में था और दावा किया था कि इस मंदिर के लिए 96 भक्त जेल गए हैं। 2019 में जब ‘मॉब लिंचिंग’ को लेकर अफवाहें फैला जा रही थीं, तो इसमें भी महमूद प्राचा पूरी तरह शामिल था।
उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।
चुनाव के दौरान वो दिल्ली के दिवंगत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का भी समर्थक रहा है और नामांकन में उनके साथ रहा था। 2019 लोकसभा चुनाव में उसने भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ‘मिल्लत टाइम्स’ नामक इस्लामी मीडिया संस्थान को संरक्षण दिया था। 2010 पुणे जर्मन बेकरी बम ब्लास्ट मामले में वो आतंकी मिर्ज़ा हिमायत को कोर्ट में डिफेंड कर चुका है। इजरायल दूतावास हमले में वो आरोपित सैयद मुहम्मद अहमद काजमी का वकील रहा है।
उसने उस आरोपित को कार्रवाई से बचा भी लिया और आज उसके द्वारा चलाए जाने वाले मीडिया संस्थानों में वो बड़ी हैसियत रखता है। 2008 दिल्ली सीरियल बम ब्लास्ट मामले में वो मुहम्मद मंसूर असगर का वकील रहा है। उसने बेअंत सिंह हत्या मामले में खालिस्तानी आतंकी जगतार सिंह की भी कोर्ट में मदद की। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने उसे एक बार निकाल बाहर भी किया था और कहा था कि वो इन मामलों पर ठीक से फोकस नहीं कर रहा है।
2014 में वो इराक के लिए निकला था और दावा किया था कि वो आतंकी संगठन ISIS द्वारा अपहृत किए गए भारतीयों को छुड़ाने के लिए गया है। IB ने उसके व उसके साथ जा रहे 6 लोगों के पासपोर्ट जब्त किए थे, जिसके बाद उसने IB पर ही उसके मानवाधिकार कार्य में बाधा पहुँचाने का आरोप लगाते हुए कोर्ट में केस कर दिया था। उसने IB की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसका गठन कानून के तहत नहीं हुआ है।
हाल ही में दिल्ली पुलिस की एक विशेष सेल ने अदालत से वारंट लेकर दिसंबर 24, 2020 को दिल्ली दंगों के मामले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य महमूद प्राचा के ऑफिस की तलाशी ली। वकील प्राचा पर एक सरकारी कर्मचारी को आपराधिक बल का प्रयोग करके कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने का आरोप लगा। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 186, 353 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की है।
सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान भाषण देता आसिफ़ इकबाल तन्हा साभार - इंडियन एक्सप्रेस
भारत में दिल्ली एवं अन्य राज्यों में हो रहे नागरिकता संशोधक कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर सेकुलरिज्म का नंगा नाच सबने देखा। मोदी विरोधी पार्टियों और कुछ हिन्दुओं ने भी किसी न किसी कारण इन साम्प्रदायिकताओं का खुलकर साथ दिया। कुछ बिकाऊ मीडिया, जो अपने आपको गंभीर एवं खोजी पत्रकारिता का दावा करने वाले इन धरनों और प्रदर्शनों के पीछे की देश विरोधी गतिविधियों पर आंखें मूंदे रहे। योगी और मोदी के विरुद्ध ओछी भाषा का इस्तेमाल करने के साथ-साथ हिन्दुत्व विरोधी लग रहे नारों पर भी बेशर्म खामोश रहे। आस्तीन के साँपों के लिए लंगर लगा रहे थे, जिसे देखो बिकाऊ लोगों द्वारा दिए जा रहे धरनों को जनहित में बताने वाले अब क्यों खामोश हैं? किसी ने इतनी भी बुद्धि का इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की कि "विरोध केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही क्यों हो रहा है? यह कहना हिन्दू भी साथ दे रहे हैं, फिर हिन्दू क्षेत्रों में क्यों नहीं हुआ? दूसरे, इन अराजक तत्वों ने पुनः 15 अगस्त के बाद से नागरिकता संशोधक कानून धरनों को पुनः प्रारम्भ करने को थे, अब सितम्बर शुरू हो चूका है, लेकिन गीदड़ भबकी लग रही है। ऐसा लगता है कि अब उनको बिकाऊ लोगों का अभाव होगा, क्योकि दंगों में पकडे गए आरोपियों का लगभग एक ही बयान "भारत को इस्लामिक देश बनाने की मंशा" प्रमुखता से निकल कर आ रही है। CAA विरोध मात्र एक बहाना था। जिन्हें गरीब, मजलूम, असहाय और डरा हुआ प्रस्तुत किया जा रहा था, देखिए किस तरह CAA की आड़ में देश का भूगोल बदलने का षड़यंत्र खेला जा रहा था। दिल्ली दंगों एक आरोपित आसिफ़ इक़बाल तन्हा ने दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के सामने स्वीकार किया था कि वह भारत को इस्लामिक मुल्क में तब्दील करना चाहता था। 2 सितंबर 2020 को दिल्ली की एक अदालत ने आसिफ़ की जमानत खारिज कर दी थी। आसिफ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का छात्र है और साल 2014 से स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन (SIO) का सदस्य भी है। आसिफ़ पर फरवरी महीने में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की साज़िश रचने और उनमें शामिल होने का आरोप है। जिसके बाद उसे गैर क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन विधेयक (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि आसिफ़ षड्यंत्र रचने से लेकर चक्का जाम की गतिविधि में शामिल था। इन दो घटनाओं की वजह से उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगों की रफ़्तार अनियंत्रित हुई। इस मामले के एक अहम गवाह ने बयान दिया है कि आसिफ़ दंगों की साज़िश रचने वाले मुख्य लोगों में शामिल था। घटना के संबंध में गवाहों के बयान विस्तृत न होने के चलते न्यायाधीश ने कहा, “वर्तमान हालातों में गवाहों की विश्वसनीयता को यूँ ही नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। गवाहों ने अपने बयान में जिस तरह दिल्ली दंगों में आसिफ़ और अन्य की भूमिका का उल्लेख किया है। उसके आधार पर मुझे यह बात कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है कि ऐसी तमाम वजहें हैं जिनके आधार पर लगाए गए आरोपों को प्राथमिक रूप से सत्य माना जाएगा।” इस मामले में अमिताभ रावत ने कहा कि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन उस स्वतंत्रता का भी एक दायरा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा पूरे घटनाक्रम में उल्लेखनीय है कि जिस तरह असहमति जताई गई है। उससे इतना ज़रूर साफ़ होता है कि घटना के पीछे किसी न किसी तरह की साज़िश ज़रूर है। अदालत ने इन आरोपों का ज़िक्र करते हुए कहा ऐसी गतिविधि जिससे देश की एकता पर प्रभाव पड़े। किसी की जान को ख़तरा हो या कोई घायल हो, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हो या लोगों के मन में दहशत फैले। इस तरह की सभी गतिविधियाँ यूएपीए की धारा 15 और 18 के दायरे में आती हैं। इसलिए आरोपित पर यूएपीए के यह प्रावधान लगाए जा रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा, “क्योंकि मामला दंगों की साज़िश से जुड़ा हुआ है इसलिए बयान और सबूत पूरी तरह पढ़े और समझे जाएँगे। इस तरह दावे भी किए गए थे कि आरोपित किसी भी तरह की हिंसा में खुद शामिल नहीं हुआ था लेकिन ऐसे दावे के आधार पर इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि आसिफ़ समेत कई लोगों ने खुद पूरे दंगों का षड्यंत्र रचा।” ख़बरों के अनुसार आसिफ़ ने यह बात मानी कि उसने पहले दंगों को बढ़ावा दिया। इसके बाद उसने जामिया मिलिया इस्लामिया के गेट नंबर 7 से निकली 2500-3000 लोगों की भीड़ को दिशा निर्देश दिए। दोनों घटनाएँ 12 दिसंबर की हैं। आसिफ़ ने यह बात भी मानी कि शर्जील इमाम ने 13 दिसंबर को भड़काऊ भाषण दिए। जिससे प्रदर्शन में शामिल हुए लोग चक्काजाम करें। आसिफ़ ने 15 दिसंबर को गाँधी पीस मार्च का आयोजन कराने की बात भी स्वीकार की। यह मार्च जामिया मेट्रो स्टेशन से शुरू हुई फिर जाकिर नगर और बाटला हाउस होते हुए संसद तक चली। उसने इस मार्च का नाम महात्मा गाँधी इसलिए रखा जिससे मार्च में ज़्यादा भीड़ इकट्ठा हो। दिल्ली पुलिस ने सूर्या होटल के पास बैरीकेडिंग तक लगा दिए थे जिससे प्रदर्शनकारियों को वहीं पर रोका जा सके। इसके बाद आसिफ़ ने माना कि उसने प्रदर्शनकारियों को बैरीकेडिंग तोड़ने के लिए भी भड़काया और कहा कि पुलिस के पास उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं है। लेकिन वह अपने इरादों में कामयाब नहीं हो पाया क्योंकि पुलिस ने भीड़ को अलग करने के लिए लाठी चार्ज कर दिया। इसके बाद जामिया के छात्रों ने पत्थर चलाना शुरू कर दिया, बसों में आग लगाई और दिल्ली की सड़कों पर निर्दोष लोगों से हाथापाई की। जिसकी वजह से पुलिस वाले और प्रदर्शनकारी दोनों ही घायल हुए था। अंत में आसिफ़ इक़बाल ने यह भी बताया कि उसने देश के कई शहरों में भड़काऊ भाषण दिए। जिसमें कोलकाता, लखनऊ, कोटा, इंदौर, कानपुर, उज्जैन, जयपुर, पटना, सब्ज़ीबाग़ अररिया, समस्तीपुर और अहमदाबाद जैसे शहर शामिल हैं। उसने मुस्लिम समुदाय के लोगों से इस बात का निवेदन किया वह बड़े पैमाने पर विरोध करें और हिंसा की ज़रूरत पड़ने पर हिंसा भी करें। उसने कहा कि सड़क पर चक्का जाम करने की बात जेएनयू के एक्टिविस्ट उमर खालिद ने कही थी। अवलोकन करें:-
सुदर्शन न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने कुछ दिनों पहले अपने चैनल पर एक सीरीज लाने का ऐलान किया। उन्हो.....
सारी योजनाएं ठीक उस दौरान तैयार की गई थीं जब डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर थे। इस पूरी योजना को अंजाम देने वालों में मीरान हैदर और सफूरा ज़रगर अहम नाम थे जिसके वजह से बाद में हिंसात्मक दंगे हुए थे। आसिफ़ भारत को न सिर्फ इस्लामिक देश में बदलना चाहता था बल्कि उसका कहना था कि सीएए मुस्लिम विरोधी है। नतीजतन उसने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ मिल कर साज़िश रची।
आखिर क्या कारण है कि देशहित और जनहित की दुहाई देने वाली कांग्रेस उलटे-पुल्टे बयानों से जनता को भ्रमित कर रही है। आतंकवाद को संरक्षण देकर, जनमानस के दिमाग में पाकिस्तान का एक डर बैठ गया था, उस डर को नेस्ताबूत कर पाकिस्तान को विश्व में अलग-थलग कर उसे आतंकवाद की आरामगाह सिद्ध करने में सफल होना कांग्रेस और इसके समर्थकों को रास नहीं आया। ठीक यही स्थिति चीन को लेकर है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी को कोरोना संकट को लेकर केंद्र सरकार पर तंज कसना भारी पड़ा। राहुल के ट्वीट पर पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हीं के अंदाज में कटाक्ष किया। प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर कहा कि राहुल गांधी जी अपने पिछले 6 महीने की उपलब्धियों पर आप भी ध्यान दें… फरवरी: शाहीन बाग और दंगे मार्च: ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्य प्रदेश को गंवाना अप्रैल: प्रवासी मजदूरों को उकसाना मई: कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की छठी सालगिरह जून: चीन का बचाव करना जुलाई: राजस्थान में कांग्रेस पतन के कगार पर
.@RahulGandhi note your achievements in the last 6 months - February: Shaheen Bagh and Riots; March: Losing Jyotiraditya and MP April: Instigating migrant labourers;
— Prakash Javadekar (@PrakashJavdekar) July 21, 2020
May: 6th anniversary of the historic defeat of the Congress; June: Defending China; July: Congress on virtual collapse in Rajasthan@BJP4India@JPNadda@BJP4Maharashtra@INCIndia
— Prakash Javadekar (@PrakashJavdekar) July 21, 2020
जावड़ेकर ने एक के बाद एक ट्वीट करते हुए राहुल गांधी पर जमकर निशाना साधा। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि राहुल बाबा आप कोरोना के खिलाफ जंग में भारत की उपलब्धियां भी लिख लें। भारत में अमेरिका, यूरोप और ब्राजील की तुलना में सबसे कम औसत मामले, सक्रिय मामले और मृत्यु दर है। आपने मोमबत्तियां जलाने का मजाक उड़ाकर देशवासियों और कोरोना वारियर्स का अपमान किया है।
Rahul Baba note India’s achievements in "war against #Corona".India has the least average cases, active cases and death rate than the US, Europe and Brazil. By making fun of candle lights, @RahulGandhi ji you have insulted the people of India & brave Corona warriors.@BJP4India
— Prakash Javadekar (@PrakashJavdekar) July 21, 2020
नड्डा ने भी लगाई फटकार एक दिन पहले ही बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि एक खानदान वर्षों से पीएम मोदी को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। यह उनके लिए दुखद बात है कि पीएम मोदी का 130 करोड़ भारतीयों के साथ गहरा लगाव है। वे उनके लिए काम करते हैं और उन्हीं के लिए जीते हैं। जो उन्हें बर्बाद करना चाहते हैं, वो अपनी ही पार्टी को खत्म कर देंगे।
For years, one dynasty has been trying to destroy PM @narendramodi. Sadly for them, PM Modi’s connect with 130 crore Indians is deep-rooted. He lives and works for them. Those who want to destroy him will end up only further destroying their own party.
We saw yet another (failed) edition of ‘Project RG Relaunch’ today.@RahulGandhi Ji was, as usual, weak on facts and strong on mudslinging. Attempts to politicise defence and foreign policy matters shows one dynasty’s desperation to wash their past sins of 1962 and weaken India.
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल के वीडियो मैसेज को एक बार फिर राहुल की असफल लॉन्चिंग बता डाला। उन्होंने कहा कि हमने एक और बार राहुल गांधी के रिलॉन्च का विफल संस्करण देखा। राहुल गांधी हमेशा की तरह तथ्यों पर कमजोर थे। रक्षा और विदेश नीति के मामलों का राजनीतिकरण किया जा रहा है। यह दिखाता है कि एक खानदान किस तरह 1962 के पाप को धोना चाहता है और भारत को कमजोर करने की हताशा को दर्शाता है।’
Since the 1950’s, China has made strategic investments in one dynasty that has given them rich dividends. Remember 1962, giving away of a UNSC seat, losing lot of land to China in the UPA years, MoU Signed with much fanfare in 2008, funds to RGF and more.
In recent years, be it Doklam or the present, @RahulGandhi Ji prefers briefings from the Chinese instead of believing India’s armed forces. Why does one dynasty want a weak India and a strong China? Many leaders in Congress also disapprove of one dynasty’s shenanigans!
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने आरोप लगाया कि 1950 के दशक से ही चीन ने एक वंश में रणनीतिक निवेश किया है जिसने उन्हें लाभांश भी मिला है। 1962 में UNSC सीट छोड़ देना, यूपीए शासनकाल में चीन के हाथों जमीन खोना, 2008 में MoU साइन करना, राजीव गांधी फाउंडेशन को चंदा और अन्य इसके उदाहरण हैं। नड्डा के आरोप लगाया कि चाहे डोकलाम का मामला हो या अभी राहुल गांधी का सेना पर विश्वास करने के बजाय चीन की ओर से दी गई जानकारी में ज्यादा दिलचस्पी रखना। क्यों एक खानदान भारत को कमजोर और चीन को मजबूत करनाना चाहता है? कांग्रेस के भी कई नेता ने एक वंश को नकार दिया है।
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने पहले कार्यकाल में राज्यपाल और केंद्र सरकार से लड़ाई में पूरे 5 साल गुजार दिए। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कोरोना वायरस पर केंद्र सरकार का क्रेडिट खाने और मिसमैनेजमेंट में बीता दिया। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर हुसैन का नाम दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में आया और पार्टी के एक अन्य नेता अमानतुल्लाह खान उनका खुलेआम बचाव करते रहे। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में चार्जशीट दाखिल होने के बाद आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन का कई बार बचाव किया। ताहिर के कुकृत्यों पर मजहब का पर्दा डालने की उसने कोशिश की थी। अमानतुल्लाह खान ने ट्वीट कर कहा था, “दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में ताहिर हुसैन को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड बनाया है, जबकि पूरा देश जनता है कि दंगे किसने कराए। असल दंगाइयों से अभी तक पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की। मुझे लगता है कि ताहिर हुसैन को सिर्फ मुसलमान होने की सज़ा मिली है।” दरअसल, कांग्रेस के गर्भ से जन्मी आम आदमी पार्टी (जब इस पार्टी का जन्म हुआ था, उन दिनों (2014 में ) एक हिन्दी पाक्षिक का सम्पादन करते शीर्षक "कांग्रेस और आप का DNA Positiveमें विस्तार से प्रकाशित किया था। जिसका किसी पक्ष ने आज तक खंडन नहीं किया। केजरीवाल के विरुद्ध समाचार प्रकाशित करने पर फ़ोन पर धमकी मिलने पर उक्त स्टोरी की थी।) अनेक प्रमाणों में प्रमुख है, "दिल्ली चुनावों के समय केजरीवाल और प्रशांत भूषण तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विरुद्ध 370 आरोप लिए घूमते थे, लेकिन सत्ता हाथ आते ही सारे आरोप ठन्डे बस्ते में चले गए।" कहने का अभिप्राय यह है किजिस तरह कांग्रेस अपनी कुर्सी की खातिर छद्दम धर्म-निरपेक्षता की आड़ में हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत बीज बोए, उसी तर्ज पर केजरीवाल पार्टी चल रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया था, “अमानतुल्लाह खान, दिल्ली पुलिस ने अभी ताहिर हुसैन को पकड़ा है तो इतनी बौखलाहट। तब क्या हाल होगा तुम्हारा जब पर्दे के पीछे के असली किरदार पकड़े जाएँगे। चिंता मत करो, दिल्ली पुलिस ईमानदारी से कार्य कर रही है। दिल्ली जलाने वाले 1 भी व्यक्ति को छोड़ेंगे नहीं।” 2 जून को दिल्ली पुलिस ने दंगों के मामले में 2 चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ताहिर को मुख्य आरोपित बनाया गया है।
जबकि CAA के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों के उग्र होने पर अक्सर अपने ब्लॉग पर गोधरा दोहराये जाने की शंका व्यक्त करता था, जो एक-एक दंगाई को पकडे जाने से सिद्ध हो रही है। कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर को दंगे का आरोपी कहने वाले जवाब दें :"क्या इतना असला( ईंट, पत्थर, पेट्रोल बम और एसिड) क्या एक ही दिन में जमा हो गया था? दूसरे, जब CAA प्रदर्शनों में हिन्दू, योगी और मोदी आदि की कब्र खोदने की बात कौन कर रहा था? तब "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" और "गंगा-जमुना तहजीब" की बातों से भ्रमित करने वाले क्यों मुंह में दही जमाए बैठे थे? इससे पूर्व लाल कुआँ क्षेत्र में हिन्दू मंदिर को क्षति और हिन्दू महिलाओं को घर में घुसकर प्रताड़ित किया जा रहा था और हौज़ काज़ी थाने पर जमा होकर "नारा-ओ-तकबीर, अल्लाहु अकबर" के नारों से शोर मचाया जा रहा था, कोई छद्दम धर्म-निरपेक्ष बाहर नहीं आया, सबके कानों में सीसा भरा हुआ था, लेकिन जैसे ही क्षेत्रीय सांसद डॉ हर्षवर्धन, केन्द्रीय मंत्री, हरकत में आए, सबको "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई और गंगा-जमुना तहजीब" याद आ गयी। क्या यह छद्दमवाद नहीं? अब सवाल उठता है कि केजरीवाल ने अमानतुल्लाह खान द्वारा बार-बार दंगा आरोपित का बचाव किए जाने पर केजरीवाल चुप क्यों हैं? उन्होंने अमानतुल्लाह पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसका मतलब हो सकता है कि सब कुछ उनकी इच्छा से हो रहा हो क्योंकि कपिल मिश्रा पहले से ही आप नेता संजय सिंह पर ताहिर हुसैन का क़रीबी होने का आरोप लगाते रहे हैं। केजरीवाल का इस सम्बन्ध में कोई बयान नहीं आया। केजरीवाल ने सर्जिकल स्ट्राइक के भी सबूत माँगे थे लेकिन जन आक्रोश को देखते हुए उन्होंने अपने हाथ वापस खींच लिए थे। आपको याद होगा कि कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली से प्रवासियों के भारी पलायन को लेकर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल को चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी में उन्होंने इस पलायन पर नाराजगी जताई थी। वहीं इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी लॉकडाउन के बीच हुए पलायन पर केजरीवाल से गहरी चिंता व्यक्त कर चुके थे। अनिल बैजल ने कड़े शब्दों में पत्र लिखते हुए केजरीवाल से कहा था कि लॉकडाउन को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए दिल्ली सरकार के पास सभी शक्तियाँ थीं, फिर भी ऐसा नहीं हो सका। केंद्र इस बात से नाराज था कि दिल्ली सरकार ने प्रवासियों को बसों के जरिए सीमा पर छोड़ दिया। जिसके मद्देनजर गृह सचिव अजय भल्ला ने दिल्ली के मुख्य सचिव को इस मामले में लापरवाही के लिए दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को सस्पेंड करने का आदेश दिया था। पिछले ही सप्ताह (जून 21 को न्यूज़18 पर) आप नेता संजय सिंह ने कहा था कि "हमने 5000-5000 रूपए बांटे" जबकि मेरे मौहल्ले में बंटे मात्र 2000 रूपए। ऐसे में प्रश्न यह होता है कि जब पार्टी या दिल्ली सरकार ने 5000 रूपए दिए थे, फिर 3000 रूपए किसने रखे?
अभी की ही एक हालिया घटना को उदाहरण के रूप में लेते हैं। जब केजरीवाल सरकार की नाकामी के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मैदान में उतरे और उन्होंने कोरोना से निपटने की तैयारियों का जिम्मा सम्भाला, तब आम आदमी पार्टी की सरकार केंद्र द्वारा किए जा रहे कार्यों का क्रेडिट खाने के मूड में भी है। भाजपा सरकार के काम की क्रेडिट लेना तो दूर की बात थी, आप नेता संजय सिंह ने तो एक क़दम और आगे बढ़ कर केंद्र सरकार द्वारा किए गए काम को लेकर केंद्र को ही कोसना शुरू कर दिया।
उन्होंने दावा किया कि जहाँ लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की स्मृति में भाजपा ने सबसे ऊँची प्रतिमा बनवाई, वहीं आप सरकार ने सबसे बड़ा अस्पताल बनवाया। जबकि सच्चाई ये है कि दोनों काम केंद्र सरकार ने ही कराए हैं। उससे पहले अमित शाह ने केजरीवाल को ट्वीट कर पहले ही कहा थाकि ये पहले ही बैठक में निर्णय लिया जा चुका है कि 10,000 बेड्स का अस्पताल बनवाया जाएगा। जब सीएम केजरीवाल ने उन्हें अस्पताल के इंस्पेक्शन के लिए आमंत्रित किया था, तब शाह ने उन्हें जवाब देते हुए ये बात लिखी थी। कुल मिला कर देखा जाए तो अरविन्द केजरीवाल अब तक दिल्ली में सारी समस्याओं के मामले में टालमटोल ही करते आए हैं या फिर जब केंद्र ने किया तो उन्होंने उसका क्रेडिट खाया है। अब तो दिल्ली में टिड्डियों की समस्या भी आ गई है। हाँ, दिन-रात टीवी पर दिखने और बयान देने में उनका कोई सानी नहीं है। वो चाहते हैं कि दिल्ली के लोग सोते-जागते उनका ही चेहरा देखें। खैर, असली मूल्यांकन तो कोरोना समस्या ख़त्म होने के बाद ही होगा। अवलोकन करें:-
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 1976 से लेकर 2020 तक दिल्ली में इतने दंगे हुए, लेकिन कभी इतनी गंभीरता से जाँच नहीं हुई, जितनी गंभीरता से आज हो रही है। वास्तव में केन्द्र में मोदी सरकार से पूर्व जितनी भी सरकारें रहीं, तुष्टिकरण के कारण किसी दंगे की सघन जाँच नहीं हुई, जिस कारण दंगाइयों के हौसले बुलंद रहे। समय ने ऐसी करवट ली, दंगाई दंगा करते वक़्त यह नहीं सोंच रहे कि "आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?" लाल कुआँ दिल्ली में जब उग्र मुस्लिमों ने मन्दिर पर हमला करने के अलावा घरों में घुसकर हिन्दू महिलाओं को प्रताड़ित करते समय "ला इला इल्ललला", नारा ए तकबीर, अल्लाह हु अकबर" आदि नारों से लाल कुआँ क्षेत्र गूंज उठा था, हौज़ काज़ी थाने को घेर लिया गया था, परन्तु जैसे ही दिल्ली सरकार नहीं बल्कि केन्द्र सरकार हरकत में आयी, वही लाल कुआँ क्षेत्र "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" और "गंगा-जमुना तहजीब" के नारों से गूंजने लगा था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, दंगाई कोई भी हो, किसी भी धर्म अथवा जाति से बक्शा नहीं जायेगा। बेगुनाहों के खून की होली खेलने वालों को उनके उचित स्थान पर पहुँचाया जाएगा। दंगे में साज़िशकर्ताओं के घर के पक्षी तक को कुछ नहीं होता, मरने वाला बेगुनाह होता है। जून 4, 2020 को जामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह ये एक सुनियोजित घटना थी। हर दंगाई के पास पहले से पत्थर, लाठी और पेट्रोल बम थे। जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में बीते साल 13 और 15 दिसंबर को हिंसा हुई थी। दिल्ली पुलिस के वकील अमित महाजन और रजत नैयर ने जामिया हिंसा मामले में इस दौरान 6 याचिकाओं पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भीड़ का इरादा केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करना था। दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की। क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”
जामिया हिंसा में छात्र नहीं बाहरी लोग जामिया हिंसा पर दायर 3 एफआईआर के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट साकेत कोर्ट में दाखिल हुई है। इनमें से कोई भी यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं है। जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि स्थानीय नेताओं और राजनेताओं ने भड़काऊ नारे लगाकर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का काम किया। पुलिस ने बताया, “जामिया हिंसा में दंगाइयों ने गाड़ी के टायर जलाए और पुलिस की ओर फेंके। एक एंबुलेंस, जिससे एक मरीज को यूनिवर्सिटी के रास्ते ले जाया जा रहा था, उसे भी क्षतिग्रस्त किया गया। कानून को तोड़ते हुए इस भीड़ के कई समूहों ने कैंपस में एंटर किया और फोर्स के ऊपर पत्थरबाजी की।” दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट से ये भी अपील की कि जामिया हिंसा मामले में अलग से जाँच करने की कोई जरूरत नहीं है। वह पहले से ही इस संबंध में व्यापक जाँच कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में पुलिस ने उन याचिकाओं को खारिज करने की भी माँग की, जिसमें छात्रों की गिरफ्तारी और चिकित्सा सहायता न दिए जाने का हवाला देकर फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी के गठन की माँग हुई थी। पुलिस ने दिल्ली हाइकोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज करने की माँग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि जामिया में हुआ प्रदर्शन सिर्फ़ एक छात्र विरोध था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जो कि पूर्ण रूप से झूठ है, इसलिए इन दलीलों को अस्वीकार किया जाए। दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के संबंध में कुछ याचिका नबीला हसन, स्नेहन मुखर्जी और सिद्धार्थ द्वारा दाखिल की गई थी। इसके अलावा कुछ याचिकाएँ हिंसा के आरोपितों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए विभिन्न वकीलों, जामिया छात्रों, ओखला निवासियों और यहाँ तक की जामा मस्जिद के इमामों द्वारा दायर की गई थी। दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा कि असहमति के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कानून हाथ में लेने, हिंसा भड़काने, आगजनी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
गुपचुप तरीक से फिर शुरू हो सकते हैं धरना प्रदर्शन, पुलिस बल तैनात (तस्वीर साभार-जागरण )
दिल्ली स्थित शाहीन बाग़ इलाके में एक बार फिर हलचल तेज होती नजर आ रही हैं। बुधवार (जून 03, 2020) सुबह से ही शाहीन बाग के साथ ही जामिया, बटला हाउस में भी भारी पुलिसबल तैनात किया गया है। शाहीन बाग़ पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को प्राप्त सूचना के अनुसार, नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ शाहीन बाग में लोग एक बार फिर दोबारा धरना-प्रदर्शन शुरू करने जा रहे हैं, यह सूचना मिलते ही पुराने धरनास्थल पर भारी मात्रा में पुलिसबल तैनात कर दिया गया। लॉकडाउन का फ़ायदा उठाने की कोशिश रिपोर्ट्स के अनुसार, देशव्यापी लॉकडाउन में ढील मिलते ही कुछ महिलाएँ इस इलाके में इकट्ठा भी हो गईं थीं। जिन्हें पुलिस ने समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। इस मौके पर ज्वाइंट सीपी देवेश श्रीवास्तव भी मौजूद हैं। गुपचुप तरीके से धरना-प्रदर्शन शुरू करने की सूचना मिलते ही पहुँची पुलिस ने भी मोर्चा संभाल लिया है। मौके पर फिलहाल तकरीबन 100 पुलिसवालों ने मोर्चा संभाल लिया है। किसी भी प्रकार की अनहोनी और भगदड़ की आशंका के चलते पुलिस ने शाहीन बाग के साथ ही जामिया और उसके आसपास भी भारी मात्र में सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के गेट नंबर 7 और सुखदेव विहार मेट्रो स्टेशन के नीचे भी पुलिस तैनात कर दी गई है। इसके साथ ही खुफिया विभाग को भी अलर्ट जारी कर दिया गया है। गत फरवरी माह में दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में पुलिस ने चार्जशीट दायर कर दी है, जिसमें शाहीन बाग़ का भी बहुत बड़ा योगदान बताया गया है। इसी को देखते हुए उत्तर पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद इलाके में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पिछले वर्ष दिसम्बर माह से ही देशभर में नागरिकता कानून के बहाने तमाम भारत और हिन्दू विरोधी अभियान जगह-जगह पर आयोजित किए गए। इसी शाहीन बाग़ के साजिशकर्ता शर्जील इमाम को भी राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि हिन्दू विरोधी दंगों के खिलाफ शुरू की गई न्यायिक कार्रवाई के विरोध में एक राष्ट्रव्यापी अभियान का आयोजन करने की तैयारी हो रही है। फिर से आंदोलन की तैयारी लॉकडाउन में मिली ढील का फायदा उठाते हुए नागरिकता कानून विरोधी दल अपने आंदोलन को फिर से खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। इसी के चलते 3 जून को दोपहर 12 बजे शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी एक बार फिर एकजुट होने का ऐलान कर रहे हैं। ‘सब याद रखा जाएगा’ के नाम से शुरू हुए इस विरोध प्रदर्शन में एक पोस्टर के जरिए पूरे देश में CAA के खिलाफ माहौल बनाने की तैयारी की जा रही है। सीएए के विरोधियो ने अपने लोगों से अपने-अपने कैंपस में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। प्रदर्शनकारी सीएए का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों की रिहाई की भी माँग कर रहे हैं। नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनकारी असम को देश से काट कर अलग कर देने की बात करने वाले शरजील इमाम और पिंजरा तोड़ आंदोलन की एक्टीविस्ट नताशा नरवाल की रिहाई की भी माँग कर रहे हैं, जिन्होंने दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के दौरान लोगों को भड़काया और इस पूरे दिल्ली दंगों की प्लानिंग की। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पिंजरा तोड़ एक्टिविस्ट देवांगना कलिता (30) और नताशा नरवाल (32) को इस साल फरवरी में नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन में उनकी भूमिका के आरोप में गिरफ्तार किया है। ताजा जानकारी के अनुसार, प्रदर्शन कर रहे लोग ‘सब याद रखा जाएगा’ और ‘स्क्रैप यूएपीए’ के नारे लगाने के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ भी नारेबाजी की जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यूएपीए जैसे कानूनों का उपयोग लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ राज्य में निहित शक्तियों का स्पष्ट दुरुपयोग है। यह विरोध प्रदर्शन ऐसे समय में दोबारा जारी किए जा रहे हैं, जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है और नागरिकता कानून से लेकर तमाम मुद्दों पर शाहीन बाग़ और देशभर में विरोधी दलों द्वारा उठाए गए तमाम मुद्दे ठन्डे-बस्ते में डाले जा चुके हैं।