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बॉडीगार्ड के साथ सेक्स करता दिखा तालिबान का मुल्ला अखुंद, समलैंगिक रिश्ते पर आम लोगों को पत्थर मार-मार कर दी जाती है मौत; video viral

बॉडी गार्ड से संबंध बनाता पकड़ा गया तालिबानी नेता (फोटो साभार: AamajNews)
अफगानिस्तान में तालिबानी शासन में समलैंगिक लोगों को पत्थर मार-मारकर मौत देने का कानून है। लेकिन तालिबान के एक नेता का समलैंगिक सेक्स का वीडियो सामने आने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह कथित वीडियो मुल्ला अहमद अखुंद का बताया जा रहा है। वह दा अफगानिस्तान ब्रेशना शेरकोट (DABS) का प्रमुख है।

कथित वीडियो में मुल्ला के साथ हमबिस्तर दिख रहा युवक उसका बॉडीगार्ड बताया जा रहा है। वीडियो वायरल होने के बाद भी तालिबान सरकार ने अखुंद को किसी प्रकार की सजा नहीं दी है। साथ ही वह अब भी अपने पद पर बना हुआ है।

वायरल वीडियो में मुल्ला अहमद अखुंद बिस्तर पर खड़े होकर कपड़े उतारता नजर आ रहा है। इसके बाद वह लेट जाता है। वहीं उसका बॉडीगार्ड भी कपड़े उतारकर अखुंद के साथ लेटा दिखाई दे रहा है। आमज न्यूज ने कहा है कि अखुंद जिस बॉडीगार्ड के साथ ‘हमबिस्तर’ नजर आ रहा है, वह 21 साल का है। साथ ही वह तालिबानी सरकार के उप रक्षा मंत्री मुल्ला फाजिल की कंपनी में भी देखा गया था। वह ब्रेशना शेरकट में तालिबान नेता के साथ काम करता था।

इस वीडियो के सामने आने के बाद से तालिबानी नेताओं के संबंधों और चरित्र को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। लोगों का कहना है कि महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने वाला तालिबान खुद मौज कर रहा है। नेटिजन्स की भी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। जितेन गजरिया नामक यूजर ने लिखा, “यह विडंबना है कि इस्लाम में समलैंगिकता के लिए मौत की सजा देना वाले तालिबान का टॉप कमांडर अपने बॉडीगार्ड के साथ संबंध बनाता पकड़ा गया।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “मुझे नहीं पता कि ऐसी खबर सामने क्यों आ रही है। तालिबान के अधिकांश लोग अपनी किशोरावस्था से ही समलैंगिक संबंध रखते हैं। अफगान समाज में लड़कों के साथ दुर्व्यवहार आम बात है। ‘बच्चा बाजी’ एक आम बात है। यह एक सड़ा हुआ समाज है। मदरसों में ऐसे लड़के होते हैं जिनके साथ 9 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। इन्हें बिना दाढ़ी वाले लड़के पसंद हैं।”

एक यूजर ने लिखा, “तालिबानी एक-दूसरे के साथ सो रहे हैं। यह अफगान परंपरा है। तालिबान एक कट्टरपंथी समलैंगिक आतंकवादी संगठन है। अब यह समझा जा सकता है कि महिलाओं और अन्य जातीय समूहों के खिलाफ इनमें नफरत कहाँ से आती है।”

एक ओर जहाँ तालिबानी सरकार ने अपने नेता मुल्ला अहमद अखुंद को किसी प्रकार की सजा नहीं दी है, वहीं जनवरी 2023 में समलैंगिकता के आरोप में कोड़े मारने और हाथ काटने की बात सामने आई थी। ऐसे में तालिबानी हुकूमत पर दोहरा रवैया अपनाने का भी आरोप लग रहा है।


अफगानिस्तान : एक और ‘तालिबानी’ फरमान: ब्यूटी पार्लर पर लगाया प्रतिबंध

                                                                                                       प्रतीकात्मक फोटो, साभार: NYPost
अफगानिस्तान में कब्जा करने के बाद से तालिबान ने वहाँ की महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। अब तालिबान ने महिलाओं के सभी सैलून और ब्यूटी पार्लर बंद करने का फरमान जारी किया है। तालिबान के वाइस और सदाचार मंत्रालय ने रविवार (2 जुलाई, 2023) को आदेश जारी कर सैलून मालिकों को एक महीने का समय दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तालिबान के सदाचार मंत्रालय ने कहा है, “महिलाओं द्वारा संचालित सभी ब्यूटी पार्लर को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। काबुल समेत सभी प्रांतों में हमारे आदेश का पालन किया जाए। आदेश का उल्लंघन करने वालों को कड़ी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।” वहीं मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा है कि इस फैसले के बारे में उसे 2 जुलाई को बताया गया था। इसके बाद सैलून और ब्यूटी पार्लर चलाने वालों को एक महीने का समय दिया गया। 

तालिबानी शासन के चलते अफगानिस्तान के भागकर अब तुर्की में रहने वाली एक अफगान महिला कार्यकर्ता जमीला ने ब्लूमबर्ग से हुई बातचीत में कहा है, “तालिबान का नया फरमान हजारों मेकअप आर्टिस्टों को प्रभावित करेगा। इस आदेश के चलते सैकड़ों ब्यूटी पार्लर बंद हो जाएँगे। तालिबान महिलाओं को इंसान के रूप में नहीं बल्कि दमन करने वाली वस्तु के रूप में देखता है।”

इससे पहले 1996 से लेकर 2001 तक अफगानिस्तान में शासन के दौरान भी तालिबान ने वहाँ ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया था। अब अगस्त 2021 में अफगानिस्तान पर एक बार फिर कब्जा करने के 2 साल के भीतर ही तालिबान ने ब्यूटी पार्लर पर बैन लगाने का फरमान जारी कर दिया है।

पुतलों पर नकाब

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद नकाब और हिजाब वाले पुतले वहाँ की पहचान बनते जा रहे हैं। दरअसल, तालिबान ने पुतलों को लेकर फरमान जारी किया था। इस फरमान में पुतलों को हटाने या फिर उनका गला काटने की बात कही गई थी।
इसके बाद दुकानदारों ने गुजारिश करते हुए कहा था कि यदि पुतले हट जाएँगे तो उन्हें कपड़े बेचने में समस्या होगी। इसलिए अब तालिबान ने कहा है कि सभी पुतलों पर नकाब होना चाहिए। इस आदेश के बाद दुकानदारों ने पुतलों के चेहरे को प्लास्टिक या एल्युमिनियम फाइल से ढँक दिया है।

प्रतिबंधों के बोझ तले दबी अफगान महिलाएँ

साल 2021 में अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने कहा था कि वह महिलाओं के अधिकारों की बात करेगा। हालाँकि, सत्ता में काबिज होने के बाद तालिबान ने महिलाओं के अधिकारों का लगातार हनन किया है। दुनिया भर में निंदा के बावजूद अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार आए दिन महिलाओं के खिलाफ नए-नए पाबंदियों वाले फरमान जारी करती रहती है। 
अफगानिस्तान में महिलाओं पर लगे प्रतिबंधों की लंबी फेहरिस्त है। अफगान महिलाओं को अकेले घर से बाहर निकलने की मनाही है। साथ ही, यदि कोई महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब के देखी जाती है तो उसके अभिभावक को जुर्माना और जेल की सजा होगी।
तालिबान ने हमेशा ही महिलाओं को शिक्षा से दूर रहने की वकालत की है। इसलिए, वहाँ छठी कक्षा के बाद लड़कियों की उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध लगा हुआ है। इसके अलावा, एनजीओ या किसी अन्य संस्थान में महिलाओं की नौकरी पर भी कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं।

खात्रा हाशमी को तालिबान ने बनाया ‘जिंदा लाश’

अफगानिस्तान की खात्रा हाशमी को तालिबानियों ने अँधा कर दिया,
अफगानिस्तान में तालिबान का राज आने के बाद महिलाओं की स्थिति खासी दयनीय हो गई है। तालिबान से पीड़ित रहीं एक महिला अधिकारी ने अपना दर्द बयाँ किया है। वो फ़िलहाल दिल्ली में रह रही हैं। पैसों के लालच में उसके अब्बू ने मात्र 7 साल की उम्र में बड़े उम्र के व्यक्ति के साथ उसकी शादी तय कर दी थी और 12 साला की उम्र में निकाह करा दिया था। अब्बू द्वारा न पढ़ाने-लिखाने के बावजूद वो अपनी मेहनत से अफगानिस्तान में पुलिस अधिकारी बनीं।

हालाँकि, अफगानिस्तान में एक महिला का इस तरह से तरक्की करना तालिबानियों को रास नहीं आया और वो फोन कॉल कर-कर के धमकियाँ देने लगे। 2020 के शुरुआत में पुलिस थाने से घर जाते समय उन पर गोलीबारी की गई। 9 गोलियाँ उनके शरीर पर लगीं। ये वो समय था, जब तालिबान मुल्क पर कब्जे की तरफ तेजी से बढ़ रहा था। उनके शरीर में 10 बार चाकू से वार किया गया। बेहोशी की हालत में उनकी दोनों आँखें निकाल ली गईं। महिला ने कहा कि अब वो ‘ज़िंदा लाश’ बन कर रह गई हैं।

उक्त महिला का नाम खात्रा हाशमी है, जो फ़िलहाल ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड (NAB)’ के लिए काम करती हैं। ‘दैनिक भास्कर’ से बात करते हुए उन्होंने बताया कि जब उनके साथ ये दरिंदगी हुई थी, तब वो गर्भवती थीं। जब उन्हें होश आया, तो वो पूरी तरह अंधी हो चुकी थीं। वो अपना पहला वेतन भी अपने आँखों से नहीं देख पाई थीं। मात्र 3 महीने की नौकरी के बाद उनके साथ ये वीभत्स्ता हुई थी। उनके शरीर में अब भी बुलेट के टुकड़ों की वजह से दर्द रहता है, जिसका इलाज भी चल रहा है।

 उनकी 2 साल की बेटी भी है, जो उनके साथ ही रहती है। उनका कहना है कि महिलाओं-बच्चों की तालिबान से हिफाजत के लिए ही पुलिस फ़ोर्स जॉइन किया था, लेकिन हुआ कुछ और ही। उनका कहना है कि तालिबानी ये नहीं चाहते कि महिलाएँ नौकरी करें, वो चाहते हैं कि लड़कियाँ घर में कैद रहें। 3 नकाबपोश तालिबानियों ने उन पर हमला किया था। उनके पहले पति, दो बेटे और एक बेटी अफगानिस्तान में ही रहती है।

तालिबानी उनसे पूछने आते हैं कि उनकी अम्मी लौटी या नहीं। दिल्ली में खात्रा हासमी ने दूसरी शादी भी की है। पहले पति की उम्र 80 साल से अधिक हो गई है और वो उन्हें तलाक भी दे चुके हैं। फिर भी वो और बच्चे पैदा करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि उन बच्चों से मिलने का उनका दिल करता है, लेकिन ये सम्भव नहीं हो पाता। खात्रा हाशमी को तालिबानी अब भी खोज रहे हैं। जब उन पर हमला हुआ था, तब उन्होंने अपनी साँसें रोक ली थीं और तालिबानी उन्हें मरा हुआ समझ कर चले गए थे।


‘चाचा… शरीयत में मत दे दखल’: जावेद अख्तर को इस्लामी कट्टरपंथियों ने घेरा

                                              जावेद अख्तर और तालिबान (साभार: कोईमोई/डक्कन हेराल्ड)
अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबान (Afghanistan, Taliban) शासन द्वारा वहाँ की लड़कियों की शिक्षा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इसको लेकर बॉलीवुड के गीतकार जावेद अख्तर ने सवाल उठाया है। जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर कट्टरपंथियों ने उन्हें घेर लिया।

जावेद अख्तर को कट्टरपंथी ही नहीं, अन्य भी घेर रहे हैं। अब इसे इनका दोगलापन कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं। ये वही जावेद है जो हिजाब और सर तन से जुदा आदि मुद्दों पर खामोश रहने वाले तालिबान के विरुद्ध किस आधार पर बोल रहे हैं? क्या सर तन से जुदा की मुहीम और तालिबान में कोई अंतर है?

जावेद अख्तर ने ट्वीट किया, “तालिबानियों ने इस्लाम के नाम पर सभी महिलाओं और लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों और नौकरियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारतीय मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और अन्य इस्लामिक विद्वानों ने इसकी निंदा क्यों नहीं की। क्यों। क्या वे तालिबानियों से सहमत हैं?”

इसको लेकर अल हिंद नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “श्याम बिहारी की चौथी पीड़ी तू ज़्यादा दख़ल ना दे शरीयत में।”

आदिल साइन नाम के यूजर ने लिखा, “जावेद भाई, अपने मुल्क की चुनौतियों को पहले समझ लें, फिर पड़ोसी मुल्क की बातों पर सोचा जाए। पर नहीं आप तो आप हैं… ऐसी उम्र में लोग थोड़े चिंतित हो ही जाते हैं.. उम्र का कसूर है आप तो मासूम हैं।”

सलमान नाम के यूजर ने लिखा, “भाई सब क्यों अपनी दुर्गति करवाने पर तुले हैं? आपका इस्लाम से कोई लेना देना है क्या?AIMPLB का तालिबान से कोई कनेक्शन बता रहे हो क्या? बेकार क्यों अपनी टाँग फैला रहे हो..जब किसी ने सपोर्ट नहीं किया है तो जरूरी है कि निंदा करें।”

नीलिमा पवार नाम की एक यूजर ने लिखा, “हाँ, भारत के 99% मुस्लिम सहमत हैं और वही शरिया यहाँ लाना चाहते हैं। इसलिए श्रद्धा के कितने भी टुकड़े हो चुप रहते हैं। गजवा-ए-हिंद के सपने देखते है। चाचा आप भी जाग जाओ, क्यूँकी शरिया में गैर मुस्लिम ही नहीं, जो शरिया ना माने वह भी काफिर है। पाकिस्तान में शिया, अहमदिया सभी काफिर हैं।”

संकेत एस जोशी ने लिखा, “मुझे हमेशा आश्चर्य होता है कि इन इस्लामिक देशों का किसी भी क्षेत्र के विकास में क्या योगदान है, जिससे मानव को लाभ होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान, उत्पाद विकास, कला, खेल, शिक्षा में कोई बड़ी भूमिका नहीं… लेकिन गोला-बारूद के संबंध में उन्नत तकनीक का उपयोग करने में अग्रणी।”

T. Burhagohain नाम की एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “इस्लाम में ईसाई और हिंदू धर्म की तरह एक मजबूत सुधार आंदोलन होना चाहिए। इस धर्म की शुरुआत से इस्लाम में कोई सुधार नहीं हुआ है।”

अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने 21 दिसंबर 2022 को एक फरमान जारी करते हुए कहा कि अब तालिबानी महिलाएँ नौकरी और पढ़ाई नहीं करेंगी। तालिबान ने तर्क दिया था, ”विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे कुछ विषय इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।” इसके साथ ही उसने यह भी कहा था कि लड़कियों पर पश्चिमी देशों का रिवाज हावी हो रहा है।

इस्लाम की भेंट चढ़ गया 33% भारत, 75% वाले गाँव में चाहिए शरिया

डेमोग्राफी में बदलाव के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, ये हिन्दुओं को अब समझ में आ रहा है। ऐसा नहीं है कि इतिहास में इसका खामियाजा हमें नहीं भुगतना पड़ा, बल्कि उस इतिहास को हम भूल चुके हैं। पाकिस्तान के रूप में हमारा 8 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और बांग्लादेश के रूप में डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हमसे छिन गया। अफगानिस्तान, जो पहले भारतवर्ष का हिस्सा हुआ करता था, आज उस साढ़े 6 लाख वर्ग किलोमीटर में शरिया चलता है।

यानी, कुल मिला कर ये 16 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हमारे हाथों से इस्लाम को फिसल गया। ये कोई छोटा क्षेत्र नहीं है, बल्कि भारत के वर्तमान क्षेत्रफल का लगभग आधा है। अर्थात, आधा भारत हमने खो दिया। वहाँ आज हिन्दू बेहाल हैं। पाकिस्तान में उनकी बहू-बेटियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण और निकाह करा दिया जाता है, अफगानिस्तान में गुरु ग्रन्थ साहिब सिर पर लाद कर भारत लाना पड़ता है और बांग्लादेश में एक झूठी अफवाह के कारण देश भर में दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले होते हैं।

ये होता है जनसांख्यिकी में बदलाव का असर। 1930 के दशक के कराची की तस्वीर देखिए। महाशिवरात्रि के मेले में भीड़ दिखेगी। आम हिन्दू वहाँ आते थे, समृद्ध हिन्दुओं की गाड़ियाँ पार्क हुई दिखेंगी। आज कराची में इस तरह के नज़ारे के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। क्यों? क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाका है। नेपाल, भूटान, तिब्बत या म्यांमार भी प्राचीन भारत से अलग हुए, लेकिन वहाँ हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं होते। कारण कि वहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक नहीं हैं।

अफगानिस्तान में शरिया लागू है। यहाँ तक कि सिनेमा और गीत-संगीत पर भी प्रतिबंध है। भगवान बुद्ध की प्रतिमा को बम से उड़ा दिया गया। गुरुद्वारों पर हमले होते हैं। बांग्लादेश में क़ुरान के अपमान की झूठी अफवाह से कैसे देश भर के मंदिरों पर हमले और आगजनी हुई, हमने देखा। तीनों देशों में अल्पसंख्यकों, खासकर हिन्दुओं की जनसंख्या पिछले कुछ दशकों में कई गुना कम हो गई। जो बचे-खुचे हैं, डर कर रहते हैं। डर कर रहना पड़ता है।

लेकिन, ये तो इस्लामी कट्टरवाद की बस 33% सफलता है। बाकी की सफलता उन्हें तब प्राप्त होगी, जब उनका ‘गजवा-ए-हिंदुस्तान’ का सपना पूरा होगा। पूरे भारत पर इस्लाम का राज। इसकी एक साजिश हमें तभी देखने को मिली थी, जब देश के बँटवारे के समय बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से लेकर पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ की माँग की गई थी। अर्थात, भारत के बीचोंबीच मुस्लिम जनसंख्या बढ़ा कर देश को और खंडित करना।

ये साजिश अभी भी चल रही है। बांग्लादेश से पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, यानी रास्ते में आने वाले सभी जिलों को मुस्लिम बहुसंख्यक बना दो। इससे न सिर्फ भारत के टुकड़े होंगे, बल्कि हिन्दू भी डर कर रहेंगे। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। पूर्व विधान पार्षद हरेंद्र प्रताप के इस मुस्लिम गलियारे के बारे में बताते हुए जानकारी दी थी कि कैसे इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ने की साजिश चल रही है।

उन्होंने आँकड़े गिनाए थे कि मुस्लिम बहुल इलाकों मुजफ्फरनगर (50.14%), मुरादाबाद (46.77%), बरेली (50.13%), सीतापुर (129.66%), हरदोई (40.14%), बहराइच (49.17%) और गोंडा (42.20%) से ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाने की साजिश है। कैराना से हिन्दुओं के पलायन और पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को उन्होंने इससे जोड़ कर देखा था। चिकेन्स नेक काटने की साजिश की तो शाहीन बाग़ में शरजील इमाम जैसों ने ही पोल खोल दी।

झारखंड की एक हालिया घटना को ही देख लीजिए। गढ़वा के एक विद्यालय में प्रधानाध्यापक पर इसीलिए इस्लामी नियम-कानून लागू करने का दबाव है, क्योंकि वहाँ मुस्लिम 75% हो गए हैं। ये अलग बात है कि देश के 8 राज्यों में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिन्दुओं को इसका फायदा नहीं मिलता और सुप्रीम कोर्ट भी इससे जुड़ी याचिका रद्द कर चुका है। मुस्लिम कहीं 100% हो जाएँ, फिर भी उन्हें सरकारी स्तर पर अल्पसंख्यकों वाली सारी सुविधाएँ मिलती रहेंगी।

गढ़वा में समुदाय के दबाव के चलते स्कूल की प्रार्थना बदल गई है। पहले यहाँ ‘दया का दान विद्या का…’ प्रार्थना करवाई जाती थी। हालाँकि अब ‘तू ही राम है तू ही रहीम’ प्रार्थना स्कूल में होने लगी है। इसके साथ स्कूल में बच्चों को हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने से भी मना कर दिया गया है। गाँव का मुखिया शरीफ अंसारी है। मुस्लिमों के हंगामे के कारण प्रिंसिपल को सलाह दी गई कि उनके कहे अनुसार चलाएँ। क्या आज तक हिन्दुओं ने किसी स्कूल में घुस कर हंगामा किया है कि वहाँ यज्ञ-हवन करवाएँ जाएँ।

ये इस तरह की अकेली घटना नहीं है। राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल तेली का सिर कलम किए जाने का मामला हो या महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की गर्दन में खंजर घोंप कर उनकी हत्या की घटना, इस्लामी कट्टरपंथ का प्रयास यही है कि हिन्दू डर कर रहें। कश्मीर में दशकों से आम नागरिक निशाना बनाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एक छोटी सी घटना पर निकली मुस्लिम भीड़ रेलवे की अरबों की संपत्ति का झटकों में नुकसान कर देती है।

खासकर जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है, वहाँ ऐसी घटनाएँ और ज्यादा होती हैं। अव्वल तो ये कि इन्हें तुरंत अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल जाता है। 50 से अधिक इस्लामी मुल्क हैं दुनिया में, ऊपर से कई देशों में वो बहुसंख्यक हैं और कइयों में प्रभावशाली स्थिति में हैं। फिर भी वो पीड़ित बन कर ही रहते हैं। मीडिया आतंकवाद और कट्टरपंथ के विरोध को ‘इस्लामोफोबिया’ कहता है। किसी हिन्दू का सिर जिहादी काट लें, फिर भी ‘TIME’ जैसे मैगजीन एक तरह से ये पूछते हैं कि ये हिन्दू बिना शोर मचाए क्यों नहीं मर रहे?

जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा नहीं है, वहाँ भी कई गली-मोहल्लों में ये एक साथ रहते हैं। ये इलाके फिर ‘संवेदनशील’ कहे जाते हैं। वहाँ मस्जिद होता है। सड़क सरकार की होती है, लेकिन वहाँ से हिन्दू त्योहारों के जुलूस नहीं गुजर सकते। डीजे बजाने पर पत्थरबाजी होती है। लेकिन, ये सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं। सार्वजनिक स्थान पर शांतिपूर्ण हनुमान चालीसा पाठ को ‘गुंडई’ बता दिया जाता है। यानी, इनकी मंशा है कि ये जहाँ भी रहें, मर्जी इनकी ही चले। शरिया का पालन मुस्लिम ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम भी करें।

उत्तराखंड में भी डेमोग्राफी बदलने की बात सामने आई है। पर्यटन और हिन्दू तीर्थाटन आधारित इस राज्य के उद्योग-धंधों में बाहरी मुस्लिमों का वर्चस्व हो गया है। पश्चिम बंगाल में तो लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिमों की होने जा रही है। तभी भाजपा कार्यकर्ताओं के नरसंहार पर मुस्लिमों की बदौलत सत्ता में आई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुप रहती हैं। हैदराबाद की सभी विधानसभा और लोकसभा सीटें असदुद्दीन ओवैसी को जाती हैं। बिहार के सीमांचल में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते हैं। ये होता है डेमोग्राफी में बदलाव का असर।

हम कश्मीर को कैसे भूल सकते हैं। लाखों की संख्या में जहाँ पंडित हुआ करते थे और डल झील के किनारे मंत्र जपते पंडित जिस राज्य की पहचान थे, वहाँ से उन्हें अपनी घर-संपत्ति छोड़ कर भागना पड़ा और अपने ही देश में शरणार्थी बन कर जीना पड़ रहा है। नरसंहार हुआ, बलात्कार हुआ, पलायन हुआ – बदल गई डेमोग्राफी। इसकी कोई गारंटी नहीं कि ये प्रक्रिया भारत के अन्य हिस्सों में नहीं दोहराई जाएगी। गुजरात में एक जैन कॉलोनी का इस्लामीकरण कर दिया गया, जहाँ अहिंसक जैन को कटते हुए पशुओं की चीखें सुननी पड़ती है, बहता खून देखना पड़ता है। यही तो है डेमोग्राफी चेन्ज की प्रक्रिया।

नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट को मिला तालिबान का साथ : ‘उसे माफ मत करो, फाँसी दो’

भारत के सुप्रीम कोर्ट को मिला तालिबान का साथ
(फाइल फोटो: जबीउल्लाह मुजाहिद)
नूपुर शर्मा मामले में अब भारत के सुप्रीम कोर्ट को तालिबान का साथ मिला है। तालिबान के प्रवक्ता ने सर्वोच्च न्यायलय के बयान का समर्थन किया है। एक हिन्दू नूपुर द्वारा शिवलिंग का अपमान करने पर इस्लामिक किताब के हवाले से टीवी पर बोलने पर बवाल मचाने वाले वही बात ज़ाकिर नाइक द्वारा कहे जाने पर क्यों खामोश थे? सिर्फ इसलिए कि ज़ाकिर एक हिन्दू नहीं एक मुसलमान है। नूपुर की जिस बात को कट्टरपंथी पैगम्बर का अपमान बता रहे हैं, बताएं "क्या उनकी इस्लामिक किताब में ऐसा नहीं लिखा?" दूसरे, चीन में दाढ़ी रखने, रोजा रखने और कई इस्लामिक प्रथाओं पर लगी पाबंदियों पर क्यों चुप हैं? फिर भारत में इस्लाम के खिलाफ बोलना इसलिए भी गुनाह बन जाता है कि इन्होने पहले जयचंदी हिन्दुओं को अपने जाल में फ़ांस हिन्दुओं को जातियों में विभाजित कर दिया। जबकि हिन्दुओं से अधिक फिरके मुसलमानों में हैं, लेकिन इस्लाम के नाम पर सब एक हैं। देखिए भारतरत्न डॉ भीमराव आंबेडकर के इस्लाम पर विचार:-

दरअसल किसी को न नूपुर के बयान से दिक्कत है, सबने सुना की नूपुर ने कौन-सी किताब हवाला देते हुए बोला है, न किसी किसान कानून, CAA से, इनकी सबसे बड़ी समस्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है, जो गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से सबकी आँखों का कांटा बना हुआ है। बस किसी तरह मोदी को हटाना है और कुछ नहीं। जनता है मोदी विरोधियों के मकड़जाल में फंस रहे हैं। और जो लोग सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर खुश हो रहे हैं देखिए हाई कोर्ट जज एस एन ढींगरा सुप्रीम कोर्ट जस्टिस पर क्या बोल रहे हैं:-




कई राज्यों में FIR का सामना कर रहीं नूपुर शर्मा को सुप्रीम कोर्ट ने उदयपुर में कन्हैया लाल का सिर कलम किए जाने की घटना का जिम्मेदार बताते हुए कहा था कि वो सीधा यहाँ आ गईं, जो उनके दम्भ को दिखाता है कि वो मजिस्ट्रेट को ‘छोटा’ समझती हैं। अब तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद का साथ सुप्रीम कोर्ट को मिला है।

असल में सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा को पूरे देश के सामने आकर माफ़ी माँगने की सलाह देते हुए कहा था कि उनके गैर-जिम्मेदाराना बयान के कारण देश में कई घटनाएँ हुईं। तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने इस बयान का समर्थन करते हुए ट्वीट किया है। जबीउल्लाह मुजाहिद अफगानिस्तान का सूचना एवं संस्कृति मंत्री भी है। अगस्त 2021 में मीडिया के सामने आने से पहले वो फोन और ईमेल वगैरह के जरिए ही बयान दिया करता था।

जबीउल्लाह मुजाहिद ने अपने ट्वीट के साथ एक तस्वीर भी शेयर की। इसमें एक कट्टरपंथी जूते से नूपुर शर्मा की फोटो को कुचलते हुए दिख रहा है। तस्वीर पर लिखा है, “नूपुर शर्मा को गिरफ्तार करो।” साथ ही उस पर जूते के निशान बने हुए हैं और हथकड़ी का चित्र भी है। जबीउल्लाह मुजाहिद ने लिखा कि नूपुर शर्मा को माफ़ी कतई नहीं मिलनी चाहिए, उन्हें फाँसी पर लटका दिया जाना चाहिए। उसने सुप्रीम कोर्ट के उस बयान का जिक्र किया कि नूपुर शर्मा की ढीली जबान ने पूरे देश में आग लगा दी।

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अविवाहित रिपोर्टर गई अफगानिस्तान में हो गई गर्भवती: महिला पत्रकार को एंट्री देने से न्यूजीलैंड का इनकार

रिपोर्टिंग के दौरान गर्भवती हुई पत्रकार अफगानिस्तान में शरण लेने को हुई मजबूर (फोटो साभार: शार्लोट बेलिस का ट्विटर हैंडल )
न्यूजीलैंड (New Zealand) की पत्रकार शार्लोट बेलिस (Charlotte Bellis) अफगानिस्तान में फँस गई हैं। वह गर्भवती हैं, इसके बावजूद न्यूजीलैंड सरकार ने कोरोनो महामारी प्रतिबंधों का हवाला देते हुए उनकी वापसी का आपातकालीन आवेदन खारिज कर दिया है।

गर्भवती पत्रकार ने बताया कि उसके देश ने वापसी का आवेदन ठुकरा दिया है। इसकी वजह से उन्हें तालिबान (Taliban) से मदद माँगने को मजबूर होना पड़ा। बेलिस ने ‘द न्यूजीलैंड हेराल्ड’ (The New Zealand Herald) में एक कॉलम लिखकर सबको अपनी आपबी​ती बताई। शनिवार (29 जनवरी 2022) को प्रकाशित कॉलम में उन्होंने लिखा, “अजीब विडंबना है कि पहले मैंने महिलाओं के प्रति बर्बरता दिखाने को लेकर तालिबान से सवाल पूछा था, लेकिन अब मैं यही सवाल अपनी सरकार से पूछ रही हूँ।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बेलिस अल-जज़ीरा में बतौर संवाददाता काम करती थीं, जो कतर में स्थित है। बेलिस पिछले साल अल जजीरा के लिए काम करते हुए उन्हें अफगानिस्तान से तालिबान और अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जुड़ी खबरों को दे रही थीं। अपने कॉलम में बेलिस ने कहा कि वह सितंबर में कतर लौटीं तो उन्हें पता चला कि वह अपने साथी और फ्रीलांस फोटोग्राफर जिम ह्यूलेब्रोक के साथ रहते हुए गर्भवती हो गई थीं।

जिम ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के लिए काम कर रहे थे। बेलिस मई में एक बच्ची को जन्म देने वाली हैं। चूँकि, कतर में विवाहेतर यौन संबंध अवैध हैं, इससे बेलिस को लगा कि कतर छोड़ने में ही उनकी भलाई है। इसके बाद उन्होंने नागरिकों की वापसी से जुड़ी लॉटरी-शैली प्रणाली के जरिए बार-बार न्यूजीलैंड वापस जाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

इसके बाद बेलिस ने नवंबर 2021 में अल जजीरा से इस्तीफा दे दिया और युगल ह्यूलेब्रोक के मूल देश बेल्जियम चली गईं, लेकिन वह वहाँ ज्यादा समय तक नहीं रह सकीं, क्योंकि वह वहाँ की निवासी नहीं थी। इस जोड़े के पास रहने के लिए सिर्फ अफगानिस्तान का वीजा था। इसके बाद बेलिस ने तालिबान के वरिष्ठ लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि अगर वह अफगानिस्तान लौटती हैं, तो वह ठीक रहेंगी।

सीमा पर बाड़ लगा रही पाकिस्तानी आर्मी को तालिबान ने खदेड़ा तो सामान छोड़कर भाग गयी

                                                             साभार: ट्विटर
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा रेखा को डूरंड लाइन (Doorand line) माना जाता है, लेकिन तालिबान (Taliban) इसे स्वीकार नहीं करता। तालिबान ने पाकिस्तान द्वारा सीमा पर कंटीले तारों से की जा रही बाड़बंदी का विरोध किया है। बाड़बंदी कर रहे पाकिस्तानी सैनिकों को तालिबानी लड़ाकों ने खदेड़ दिया। इसका एक वीडियो सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सैनिक अफगानिस्तान के निमरोज प्रांत के चार बोरजाक जिले से लगती सीमा पर बाड़ लगा रहे थे। इसकी खबर लगते ही बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके वहाँ पहुँच गए और पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ दिया। अफगानिस्तान के पत्रकार बिलाल सरवरी ने इस घटना को लेकर ट्वीट किया, “तालिबान के अधिकारियों ने मुझे बताया कि पाकिस्तानी सेना पश्चिमी अफगानिस्तान के निमरोज प्रांत के चार बोरजाक जिले में बाड़ लगाना चाहती थी। तालिबान वहाँ पहुँचे और पाकिस्तानी सेना अपने सारे उपकरण छोड़कर वहाँ से भाग गई।”

बिलाल ने अगले ट्वीट में कहा, “बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाके वहाँ पहुँचे। वे हाई अलर्ट पर हैं।” उल्लेखनीय है कि बिलाल द्वारा शेयर किए गए वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि वहाँ पर कारों में लदकर बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके पहुँचे। वहीं एक अन्य इमेज से पता चलता है कि घटनास्थल पर बड़ी संख्या में बाड़ लगाने के लिए लोहे के खंबे और तार पड़े हुए हैं।

इससे पहले 25 दिसंबर 2021 को तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच डूरंड लाइन पर बाड़बंदी को लेकर झड़प भी हुई थी। इसमें तालिबान के स्नाइपर ने पाकिस्तान के दो जवानों को मार गिराया था। हालाँकि, बाद में दावा किया गया कि दोनों देशों के बीच विवाद सुलझ गया है। दोनों में यह तय हुआ था कि बाड़ लगाने का काम अब आपसी सहमति से किया जाएगा।

लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने से तालिबान खफा, पैसे की कमी बता बंद की यूनिवर्सिटी

                                                  पाकिस्तान ने तालिबान को रूढ़िवादी बताया
सत्ताधारी तालिबान ने अफगानिस्तान में विश्वविद्यालयों को बंद करने की घोषणा की है। इसके पीछे तालिबान ने लड़के और लड़कियों के एक साथ पढ़ने वाली सह-शिक्षा व्यवस्था और आर्थिक तंगी को प्रमुख कारण बताया है। तालिबान ने महिलाओं को बिना किसी नजदीकी रिश्तेदार को साथ लिए लंबी दूरी की यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन फैसलों को लेकर पाकिस्तान ने तालिबान को रूढ़ीवादी और अपने मुल्क के लिए खतरा बता दिया है।

अफगानिस्तान के उच्च शिक्षा मंत्री अब्दुल बाकी हक्कानी ने रविवार (26 दिसंबर) को कहा कि विश्वविद्यालयों के बंद होने का कारण सह-शिक्षा और आर्थिक संकट है। उन्होंने कहा कि लड़कियों के लिए अलग कक्षाएँ बनानी होंगी और उनके लिए शिक्षकों को नियुक्त करना होगा। इसमें समय और पैसा दोनों की जरूरत है।

इसी साल 15 अगस्त को तालिबान ने अफगानिस्तान पर दोबारा कब्जा कर लिया था। मुल्क में सत्ता में आते ही तालिबान ने सह-शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया था और कहा था कि लड़कियों को यूनिवर्सिटी में लड़कों के साथ क्लास में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। 

इसके साथ ही तालिबान ने अफगानिस्तान की महिलाओं पर प्रतिबंधों को और कठोर करते हुए उन्हें अकेले बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। अपने आदेश में तालिबान ने कहा कि महिलाएँ अपने घर से अकेले बाहर भी नहीं निकल सकती। अगर उन्हें बाहर जाना है तो वे अपने किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ बाहर जा सकेंगी। वहीं, गाड़ी मालिकों को सिर्फ हिजाब पहनने वाली महिलाओं को गाड़ी में बैठाने का आदेश दिया है। इसके अलावा, महिला पत्रकारों को भी हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है।

महिलाओं के लिए इस तरह के आदेश जारी करने पर पाकिस्तान बिफर गया है। पाकिस्तान ने अब तालिबान को रूढ़िवादी सोच वाला और अपने लिए खतरा बताया है। पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने कहा, “हम अफगानिस्तान की आवाम की पूरी मदद करना चाहते हैं, लेकिन वो कह रहे हैं कि औरतें वहाँ अकेले सफर नहीं कर सकतीं, स्कूल नहीं जा सकतीं, कॉलेज नहीं जा सकतीं। तालिबान की इस तरह की पुरानी सोच पाकिस्तान के लिए खतरा है।”

चौधरी ने तालिबान पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि पाकिस्तान अतिवादी विचारों के खिलाफ है। भारत के बँटवारे के लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जिन्ना ने पाकिस्तान को इस्लामिक मुल्क बनाया, मजहबी मुल्क नहीं।

इतना ही नहीं, पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच सीमा विवाद उभर कर भी सामने आया है। पाकिस्तान द्वारा सीमा पर लगाए जा रहे कँटीले तारों की बाड़ को तालिबान लड़कों ने रोक दिया और तार को उठा कर लेते गए। इस दौरान तालिबान लड़ाकों ने पाकिस्तान के दो सैनिकों को गोली भी मार दी।

अवलोकन करें:-

अकेले बाहर नहीं जा सकेंगी महिलाएँ, महिला पत्रकारों को भी पहनना पड़ेगा हिजाब, गाड़ी में गाना नहीं ब
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अकेले बाहर नहीं जा सकेंगी महिलाएँ, महिला पत्रकारों को भी पहनना पड़ेगा हिजाब, गाड़ी में गाना नहीं ब

तालिबान को सत्ता में लाने के लिए हर तरह की मदद करने वाला पाकिस्तान अब तालिबान को रूढ़िवादी बताते हुए उसे पाकिस्तान के लिए खतरा बता रहा है। वर्तमान हालातों को देखकर ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

अकेले बाहर नहीं जा सकेंगी महिलाएँ, महिला पत्रकारों को भी पहनना पड़ेगा हिजाब, गाड़ी में गाना नहीं बजेगा : तालिबान का फरमान

अफगानिस्तान में तालिबान का शासन शुरू होने के बाद से ही वहाँ पर जन सामान्य के अधिकारों को कुचला जा रहा है। महिलाओं के अधिकारों पर पहरे बिठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में तालिबान एक और क्रूर आदेश आ गया है। इसके तहत तालिबान ने रविवार (26 दिसंबर 2021) को अफगानिस्तान की महिलाओं पर कड़ाइयाँ बढ़ाते हुए आदेश जारी किया कि अब महिलाएँ अपने घर से अकेले बाहर भी नहीं निकल सकती। अगर उन्हें बाहर जाना है तो वे अपने किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही जा सकेंगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के शिष्टाचार मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आदेश में इस्लामिक अमीरात के सभी गाड़ी मालिकों को केवल हिजाब पहनने वाली महिलाओं को ही गाड़ी में बैठाने का आदेश दिया गया है। इस बात की जानकारी तालिबान के शिष्टाचार मंत्रालय के प्रवक्ता सादिक अकिफ मुहाजिर ने दी। उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, “45 मील (72 किलोमीटर) से अधिक की यात्रा करने वाली महिलाओं को सवारी की पेशकश नहीं की जानी चाहिए, अगर उनके साथ परिवार का कोई सदस्य नहीं है।”

इसके साथ ही पत्रकारों के अधिकारों पर भी कैंची चलाई गई है। तालिबानी मंत्रालय ने सख्त आदेश में कहा है कि महिला टीवी पत्रकारों को हिजाब पहनकर रिपोर्टिंग करनी होगी। इसके अलावा मुहाजिर के मुताबिक, अब से गाड़ी मालिक अपनी गाड़ियों में गाने नहीं बजाएँगे। बता दें कि तालिबान की नजर में हिजाब का मतलब बालों को ढँकने से लेकर चेहरे के घूंघट या पूरे शरीर को ढंकने तक वाले कपड़े हैं। हालाँकि, अधिकांश अफगान महिलाएँ पहले से ही हेडस्कार्फ़ पहनती हैं।

तालिबान ने इसी साल अगस्त में अफगानिस्तान पर कब्जा किया था। इसके बाद उसने वादा किया था कि वो 90 के दशक वाले तालिबानी शासन से अलग इस बार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा। हालाँकि, हो इसका उल्टा रहा है।

तालिबान एक-एक करके अफगान नागरिकों के अधिकारों को खत्म कर रहा है। महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही उसने अफगान नागरिकों से उनका मतदान का अधिकार छीन लिया है। तालिबान सरकार ने देश के कुछ मंत्रालयों और चुनाव निकाय को खत्म कर दिया है। तालिबान का कहना है कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

अफ़ग़ानिस्तान : शरिया लागू ; छोटे पर्दे पर नहीं दिखेंगी औरतें, कॉमेडी और विदेशी फिल्में भी बैन

अफगानिस्तान में, तालिबान सरकार ने टीवी सीरियल में औरतों पर प्रतिबंध लगाने के लिए नए नियम जारी किए हैं। वहीं महिला पत्रकारों और एंकरों को भी स्क्रीन पर हेडस्कार्फ पहनने का आदेश दिया गया है। हालाँकि रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि किस तरह के स्कार्फ पहनने हैं।

तालिबान द्वारा अफगान टेलीविजन चैनलों को जारी किए गए नए दिशानिर्देशों में खासतौर से 8 महत्वपूर्ण बिंदू हैं।

इनमें शरिया के सिद्धांतों या इस्लामी कानून और अफगान मूल्यों के खिलाफ मानी जाने वाली फिल्मों पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल है।

कॉमेडी और मनोरंजन जिनसे इस्लाम का अपमान हो, या जो अफगानियों के लिए ऑफेन्सिव या भावनाएँ आहत करने वाला हो, उस पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है।

साथ ही तालिबान ने विदेशी सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली विदेशी फिल्मों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

अफगानिस्तान में पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन के एक सदस्य हुज्जतुल्लाह मुजद्देदी ने कहा कि नए प्रतिबंधों की घोषणा अप्रत्याशित थी। बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि कई नियम व्यावहारिक नहीं हैं और अगर इसे लागू किया जाता है, तो प्रसारकों को सीधे प्रोग्राम बंद करने के लिए मजबूर करना होगा।

अगस्त के मध्य में तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी और अब कई लोगों को डर है कि वे धीरे-धीरे कठोर प्रतिबंध लगा रहे हैं। लोगों में यह डर इसलिए भी है कि तालिबान ने अमेरिका और संबद्ध बलों के जाने के तुरंत बाद ही लड़कियों और युवतियों को घर में रहने का निर्देश दिया था। बता दें कि 1990 के दशक में तालिबान के पिछले शासन के दौरान, महिलाओं को स्कूल-कॉलेजों और कार्यस्थलों पर जाने से रोक दिया गया था।

मौत, रेप या फिर सेक्स स्लेव बनकर बच्चे पैदा करो; अफगानिस्तान में यौन दासता

पूरी दुनिया की नजर अफगानिस्तान में चल रहे संघर्ष की तरफ है। तालिबानियों ने 20 साल बाद फिर से अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया। काबुल में पूरी तरह से तालिबानी आतंकियों की पैठ मजबूत हो गई है। राष्ट्रपति भवन से लेकर हर सरकारी दफ्तर में बस तालिबानियों का कब्जा है। तालिबान के आतंकियों के खौफ खाए लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे है। वहीं इस बीच वहां कुछ ऐसा हो रहा है, जो बेहद डरा देने वाला है। 
ऐसे में प्रश्न होता है कि जब भारत में मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के कानून बनाए जाने पर टीवी चर्चाओं में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान की बात कहकर लोगों को भ्रमित करने वाले इस्लाम के जानकर क्यों खामोश हैं? क्या भारत और भारत से बाहर इस्लाम में फर्क है?  

अफगानिस्तान में यौन दासता

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो तालिबान लड़ाकों ने कथित तौर पर फिर से कब्जा किए गए शहरों से 12 साल की लड़कियों को ‘सेक्स गुलाम’ (Sex Slaves) बनाने के लिए घरों से उठाया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक कमांडरों ने इमामों को आदेश दिया है कि वे अपने सैनिकों की शादी के लिए 12 साल से ज्यादा उम्र की लड़कियां और 45 वर्ष तक विधवा महिलाओं को लाएं, क्योंकि उन्हें ‘कहानीमत’ या ‘युद्ध की लूट’ के तौर पर देखा जा रहा है। वहां के धार्मिक नेता तालिबान आतंकियों की शादी के लिए 15 से ज्यादा उम्र की लड़कियों और 45 वर्ष से कम उम्र की विधवा महिलाओं की लिस्ट बनाने के काम में जुटने का आदेश जारी कर दिया है। हालांकि इस काम को शुरू किया गया है या नहीं इस बारे में किसी तरह की कोई खबर सामने नहीं आई है। 

खौफजदा महिलाएं 

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की शबिया मंटू ने बताया कि मई से अब तक 250,000 से अधिक लोग अपने घरों से भागने के लिए मजबूर हो गए हैं और उनमें से 80 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे है। वहीं बताया जा रहा है कि ऐसे जबरन विवाह या सेक्स स्लेव के रूप में महिलाओं और लड़कियों को वजीरिस्तान (पाकिस्तान) ले जाया जाएगा और फिर से तामील देकर इस्लाम में कन्वर्ट किया जाएगा। दूसरी तरफ इस आदेश के बाद लड़कियों-महिलाओं सहित परिवारों में भयानक खौफ है। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे है। 

अफगानी महिला के आंसुओं ने खोल दी ऑंखें 

एक्टिविस्ट मासिह अलीनेजाद (Masih Alinejad) के ट्विटर अकाउंट से शेयर किए गए वीडियो में एक अफगानी लड़की (Afghani Girl Crying) जिस तरह बेबसी के आंसू रोती हुई दिख रही है, उसे देखकर आपका कलेजा भी कांप उठेगा। 45 सेकेंड की क्लिप में लड़की के चेहरे पर हज़ार भाव आते-जाते दिख रहे है। मानो उसे अपना भी भविष्य उन्हीं नकाबपोश लड़कियों में दिख रहा है, जिन्हें तालिबानी जानवरों (Taliban Treat Girls like Animals) की तरह समझते हैं। लड़की रोते हुए बताती है कि उसका जुर्म सिर्फ इतना है कि वो अफगानिस्तान (Afghanistan Taliban) में पैदा हुई है। वो कहती है- ‘हमारी गिनती ही नहीं होती, क्योंकि हम अफगानी लड़किया है। मैं सिर्फ रो सकती हूं क्योंकि हम इतिहास में धीरे-धीरे मर रहे है।  किसी को भी हमारी परवाह नहीं।' 

तालिबानियों की नज़र में महिला मात्र सम्भोग की चीज़ 

इस लड़की ने तो नहीं, लेकिन इसकी मां या घर की बड़ी महिलाओं ने साल 1996-2001 तक का तालिबानी शासन ज़रूर देखा होगा। इसने भी वो दास्तान सुनी होगी, तभी डर के मारे उसकी रूह कांप रही है। स्कूल-कॉलेज, दोस्त तो छोड़िए, महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता। तालिबानी राज में 12 साल के ऊपर की बच्चियां भी सेक्स स्लेव बना दी जाती हैं। अगर वो दहलीज़ से बाहर कुछ बेहतर करने का सोचती हैं तो तालिबानी उन्हें नेस्तनाबूत कर देते है। 

मौत, बलात्कार या सेक्स स्लेव बनकर बच्चे पैदा करो 

महिलाओं, लड़कियों और बच्चियों तक के नसीब में तालिबान सिर्फ तीन चीज़ें लिख देते हैं – मौत, रेप या फिर सेक्स स्लेव बनकर बच्चे पैदा करना। तालिबानी कब्ज़ा होने के बाद ही उन्होंने घर-घर जाकर 12 साल से ऊपर की बच्चियों को उठाना शुरू कर दिया है। उनका भविष्य निर्धारित किया जा चुका है- या तो उनकी शादी उम्र में दुगने या तिगुने शख्स के साथ कर दी जाएगी या फिर उन्हें सेक्स स्लेव के तौर पर बेच दिया जाएगा। इस खौफनाक सच्चाई को जानने के बाद अफगानी लड़कियों की आंखों में आंसू आना लाज़मी है। यूनाइटेड नेशंस तक ये हालात पहुंच रहे हैं, वे भी इसकी असलियत जानते हैं, लेकिन मानो इसका कोई हल किसी के पास बचा ही नहीं है। इन लड़कियों के आंसू बेमोल हैं और इनका भविष्य घने अंधकार है। 

अफगानिस्तान में मौत के डर से कई पूर्व महिला जज खुफिया जगहों पर छिपीं, उन्हें खोज रहे हैं जेल से छूटे तालिबानी कैदी

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद से वहाँ के नागरिक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 220 से अधिक अफगान महिला जज तालिबानियों की सजा के भय से अभी भी खुफिया जगहों पर छिपी हुई हैं। उनका कसूर केवल इतना है कि वह महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ी। ये उन लोगों की रक्षक रही हैं, जो देश में हाशिए पर थे और न्याय चाहते थे।

खुफिया जगहों से छह पूर्व महिला जजों ने बीबीसी से बात की है। मासूमा (बदला हुआ नाम) ने अपने जज के करियर के दौरान सैकड़ों पुरुषों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा, रेप, हत्या और प्रताड़ना के लिए सजा दी है, लेकिन जब से अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबानी आए हैं, उन्होंने जेल में बंद सभी कैदियों को रिहा कर दिया है। इसके बाद से उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं। उन्होंने बताया कि कई नंबरों से उनके फोन पर टैक्स्ट मैसेज, वॉयस नोट्स आए हैं। मासूमा ने बताया कि जब हमने यह सब सुना तब हम वहाँ से तुरंत भाग खड़े हुए। हमने अपना घर और सब कुछ वहीं छोड़ दिया।

बताया जा रहा है कि कई महीनों पहले एक दोषी को मासूमा ने 20 साल जेल की सजा सुनाई थी। वह तालिबान का सदस्य था, जिसने अपनी पत्नी की बेरहमी से हत्या की थी। वो कहती हैं, “मैं उस नौजवान महिला की सूरत अभी भी याद कर सकती हूँ। वो बहुत वीभत्स अपराध था।”

रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में बीते 20 सालों में 270 महिलाएँ जजों के रूप में काम कर चुकी हैं। इनमें से कई देश की प्रसिद्ध और ताकतवर महिलाएँ हैं, जिन्हें लोग जानते हैं। बीबीसी के मुताबिक, कम से कम 220 पूर्व महिला जज अफगानिस्तान के विभिन्न प्रांतों में ही छिपी हुई हैं। उन्होंने जिन छह पूर्व जजों से बात की है, उन सभी ने लगभग एक जैसी बातें बताई हैं।

इन सभी को तालिबानी जान से मारने की धमकी दे रहे थे। ये वही तालिबानी हैं, जिन्हें महिला जजों ने पहले सजा दी थी। इनमें से चार वो पुरुष थे, जिनको अपनी पत्नी की हत्या के मामले में जेल में बंद किया गया था। धमकी मिलने के बाद सभी पूर्व जज अपने नंबर बदल चुकी हैं। वे अलग-अलग जगहों पर छिपी हुई हैं और कुछ दिनों में अपनी जगह बदलती रहती हैं।

गौरतलब है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान के हालात अब तेजी से बदल रहे हैं। तालिबान ने शरिया कानूनों के तहत लोगों को बर्बर सजा देना भी शुरू कर दिया है। हाल ही में पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात शहर के मुख्य चौक में एक शख्स को तालिबान ने मारकर सार्वजनिक तौर पर क्रेन से लटका दिया था। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है। इसे टोलो न्यूज की पत्रकार जहरा रहीमी ने ट्वीट करते हुए लिखा, “अत्याचार वापस आ गया है। तालिबान ने अफगानिस्तान के पश्चिम में हेरात शहर में एक व्यापारी के अपहरण के आरोप में चार लोगों को लटका दिया है।”

महिलाओं पर कोड़े बरसा रहा तालिबान: मजार-ए-शरीफ में आपस में ही संघर्ष की खबरें

                            महिलाओं पर कोड़े बरसा रहे तालिबानी (साभार: वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट)
अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद महिलाओं के पास नाम के अधिकार भी नहीं बचे हैं। इसका ताजा सबूत एक वीडियो है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में दो शख्स कोड़े बरसाते नजर आ रहे हैं और महिला के चीखने की आवाज सुनाई दे रही है। महिला गाड़ी के पीछे छिपी हुई है।

दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो अफगानिस्तान का है। NRF (national resistance front) से जुड़ी खबरों को ट्विटर पर शेयर करने वाले पेज Panjshir_Province ने यह वीडियो शेयर किया है। इसमें तालिबान लड़ाकों द्वारा एक महिला को कोड़े मारते दिखाया जा रहा है। पेज पर लिखा गया, “यह बर्बर है। तालिबान एक महिला को बेरहमी से कोड़े मार रहा है, जबकि वह बेबस होकर चिल्ला रही है।”

वीडियो में देखा जा सकता है कि तालिबानी अफगान महिला पर कोड़े बरसा रहे हैं और वह दर्द से चीख रही है। वीडियो में एक गाड़ी और आसपास कुछ लोग खड़े देखे जा सकते हैं। अभी तक ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए जा चुके हैं जो तालिबान के अत्याचारों का दावा करते हैं। वहीं प्रदर्शनकारियों पर तालिबान को गोली बरसाते हुए भी देखा जा चुका है।

इस बीच अफगानिस्तान के बल्ख प्रांत की राजधानी मजार-ए-शरीफ में दो तालिबानी समूहों के बीच सशस्त्र संघर्ष की भी खबर आ रही है। तीन चश्मदीद ने अफगानी न्यूज चैनल से इसकी पुष्टि की है। हालाँकि इसमें किसी तरह की कोई हताहत नहीं होने की बात कही जा रही है।

इधर तालिबान के एक सुरक्षा अधिकारी का कहना है कि तालिबान सैनिकों ने बल्ख में पीडी8 मजार-ए-शरीफ में हथियारबंद अपहरणकर्ताओं को ढूँढने के लिए छापा मारा। इस दौरान 4 अपहरणकर्ताओं की गोली मारकर हत्या कर दी गई और 2 को हिरासत में लिया गया एवं बच्चों को मुक्त कर दिया गया। एक अफगानी रिपोर्टर ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी।

अफगानिस्तान की पंजशीर घाटी पर नियंत्रण हासिल करने के बाद तालिबान कत्लेआम मचा रहा है। कथित तौर पर वह रेजिस्टेंस फ्रंट के नेताओं के परिजनों और अन्य नागरिकों की हत्या कर रहा है। बीते हफ्ते तक यह इलाका रेजिस्टेंस फ्रंट के नियंत्रण में था। फ्रंट के नेताओं के पहाड़ियों में पनाह लेने के बाद से तालिबानी तेजी से गाँवों में घुस रहे हैं और जो भी मिलता है उसे प्रताड़ित और हत्याएँ कर रहे हैं।

हाल ही में पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह के भाई रोहुल्लाह सालेह की हत्या कर दी गई थी। तालिबान ने जब पंजशीर पर पूर्ण नियंत्रण का दावा किया उसके बाद पंजशीर का शेर और अफगान नायक कहे जाने वाले अहमद शाह मसूद के मकबरे को भी नष्ट कर दिया था।