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‘चाचा… शरीयत में मत दे दखल’: जावेद अख्तर को इस्लामी कट्टरपंथियों ने घेरा

                                              जावेद अख्तर और तालिबान (साभार: कोईमोई/डक्कन हेराल्ड)
अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबान (Afghanistan, Taliban) शासन द्वारा वहाँ की लड़कियों की शिक्षा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इसको लेकर बॉलीवुड के गीतकार जावेद अख्तर ने सवाल उठाया है। जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर कट्टरपंथियों ने उन्हें घेर लिया।

जावेद अख्तर को कट्टरपंथी ही नहीं, अन्य भी घेर रहे हैं। अब इसे इनका दोगलापन कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं। ये वही जावेद है जो हिजाब और सर तन से जुदा आदि मुद्दों पर खामोश रहने वाले तालिबान के विरुद्ध किस आधार पर बोल रहे हैं? क्या सर तन से जुदा की मुहीम और तालिबान में कोई अंतर है?

जावेद अख्तर ने ट्वीट किया, “तालिबानियों ने इस्लाम के नाम पर सभी महिलाओं और लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों और नौकरियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारतीय मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और अन्य इस्लामिक विद्वानों ने इसकी निंदा क्यों नहीं की। क्यों। क्या वे तालिबानियों से सहमत हैं?”

इसको लेकर अल हिंद नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “श्याम बिहारी की चौथी पीड़ी तू ज़्यादा दख़ल ना दे शरीयत में।”

आदिल साइन नाम के यूजर ने लिखा, “जावेद भाई, अपने मुल्क की चुनौतियों को पहले समझ लें, फिर पड़ोसी मुल्क की बातों पर सोचा जाए। पर नहीं आप तो आप हैं… ऐसी उम्र में लोग थोड़े चिंतित हो ही जाते हैं.. उम्र का कसूर है आप तो मासूम हैं।”

सलमान नाम के यूजर ने लिखा, “भाई सब क्यों अपनी दुर्गति करवाने पर तुले हैं? आपका इस्लाम से कोई लेना देना है क्या?AIMPLB का तालिबान से कोई कनेक्शन बता रहे हो क्या? बेकार क्यों अपनी टाँग फैला रहे हो..जब किसी ने सपोर्ट नहीं किया है तो जरूरी है कि निंदा करें।”

नीलिमा पवार नाम की एक यूजर ने लिखा, “हाँ, भारत के 99% मुस्लिम सहमत हैं और वही शरिया यहाँ लाना चाहते हैं। इसलिए श्रद्धा के कितने भी टुकड़े हो चुप रहते हैं। गजवा-ए-हिंद के सपने देखते है। चाचा आप भी जाग जाओ, क्यूँकी शरिया में गैर मुस्लिम ही नहीं, जो शरिया ना माने वह भी काफिर है। पाकिस्तान में शिया, अहमदिया सभी काफिर हैं।”

संकेत एस जोशी ने लिखा, “मुझे हमेशा आश्चर्य होता है कि इन इस्लामिक देशों का किसी भी क्षेत्र के विकास में क्या योगदान है, जिससे मानव को लाभ होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान, उत्पाद विकास, कला, खेल, शिक्षा में कोई बड़ी भूमिका नहीं… लेकिन गोला-बारूद के संबंध में उन्नत तकनीक का उपयोग करने में अग्रणी।”

T. Burhagohain नाम की एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “इस्लाम में ईसाई और हिंदू धर्म की तरह एक मजबूत सुधार आंदोलन होना चाहिए। इस धर्म की शुरुआत से इस्लाम में कोई सुधार नहीं हुआ है।”

अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने 21 दिसंबर 2022 को एक फरमान जारी करते हुए कहा कि अब तालिबानी महिलाएँ नौकरी और पढ़ाई नहीं करेंगी। तालिबान ने तर्क दिया था, ”विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे कुछ विषय इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।” इसके साथ ही उसने यह भी कहा था कि लड़कियों पर पश्चिमी देशों का रिवाज हावी हो रहा है।

‘RSS की तालिबान से तुलना स्वीकार्य नहीं, यह हिंदू संस्कृति का अपमान’: शिवसेना का जावेद अख्तर को जवाब

जब कभी देश पर किसी भी प्रकार की आपदा आई हो, जावेद अख्तर या अन्य संघ का घोर विरोधी बताए, कौन सा संगठन सबसे आगे आकर पीड़ितों की सहायता को आया। देशभक्ति की बातें सभी करने आ जाते हैं, लेकिन विपदा आने पर अपनी जेब से खर्च करने वाला कोई नहीं। मार्ग सुगम होने पर बहुत संस्थाएं आती है लेकिन केवल अपने मजहब के लिए, जबकि आरआरएस विपदा के समय कोई धर्म, मजहब अथवा जाति नहीं देखता। जावेद अख्तर अगर RSS तालिबान जैसा होता, तो 1962 इंडो-चीन युद्ध के बाद RSS को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल नहीं किया जाता। 1963 में तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान बीजेपी कहीं सत्ता में नहीं थी और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। युद्ध के दौरान इनकी सेवाभावना से प्रभावित होकर तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू के विशेष अनुरोध पर संघ की बटेलियन शामिल हुई थी। 

केंद्र सरकार को चाहिए कि भारत में जितने भी तालिबान समर्थक हैं, सबको परिवार सहित कुछ वर्षों के लिए अफ़ग़ानिस्तान भेज दे, फिर वहीं से इनके समर्थक चैनल पूछे कि कैसा अनुभव कर रहे हो?   

26 जनवरी 1963 को राजपथ पर RSS स्वयंसेवक 
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार जावेद अख्तर द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की तुलना तालिबान से करने पर शिवसेना ने उन पर हमला बोला है। शिवसेना ने 6 सितंबर को जावेद अख्तर की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की तुलना ‘हिंदू संस्कृति के लिए अपमानजनक’ है। अपने मुखपत्र सामना में शिवसेना ने इस तरह की तुलना करने वालों से ‘अपने विचारों पर पुन: विचार करने’ को कहा।

शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में जावेद अख्तर पर बसरते हुए कहा, ”इन दिनों कुछ लोग किसी की तुलना तालिबान से कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे समाज और मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। पाकिस्तान और चीन, जो लोकतांत्रिक देश नहीं हैं, वो भी अफगानिस्तान में तालिबान का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि इन दोनों देशों में मानवाधिकारों का कोई स्थान नहीं है। हालाँकि, हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं जहाँ एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है। इसलिए, तालिबान से आरएसएस की तुलना करना गलत है। भारत हर तरह से बेहद सहिष्णु है।”

संपादकीय में आगे कहा गया है कि आरएसएस और विहिप जैसे संगठनों के लिए हिंदुत्व एक ‘संस्कृति’ है। इसमें कहा गया है, ”आरएसएस और विहिप चाहते हैं कि हिंदुओं के अधिकारों का दमन न किया जाए। इसके अलावा, उन्होंने कभी भी महिलाओं के अधिकारों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। वहीं, अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति बेहद भयावह है। लोग दहशत में हैं। तालिबानियों से डर कर अपने ही देश से भाग गए और वहाँ महिलाओं के अधिकारों का दमन किया जा रहा है।”

सामना ने अपने संपादकीय में अख्तर को ऐसे व्यक्ति के रूप में चिन्हित किया है, जो अपने विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं। साथ ही उन्होंने मुस्लिम समाज के चरमपंथी विचारों पर भी हमला किया है। इसमें आगे लिखा गया है, ”संघ की तुलना तालिबान से स्वीकार्य नहीं है। हमारे देश में ज्यादातर लोग धर्मनिरपेक्ष हैं और तालिबान की विचारधारा को स्वीकार नहीं करेंगे। भारत में हिंदू बहुसंख्यक है, इसके बावजूद यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है।”

3 सितंबर को एनडीटीवी के एक शो में अख्तर ने कहा था, “आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल का समर्थन करने वालों की मानसिकता भी तालिबान जैसी ही है।” उन्होंने कहा, ”जिस तरह तालिबान एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है। उसी तरह कुछ लोग हमारे सामने हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पेश करते हैं।” जावेद अख्तर ने आगे कहा, “इन लोगों की मानसिकता एक जैसी है। तालिबान हिंसक हैं। जंगली हैं। उसी तरह आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल का समर्थन करने वाले लोगों की मानसिकता एक जैसी है।” 

खुर्शीद द्वारा राहुल गाँधी को ‘लोकतंत्र का राजा’ बताने पर जावेद अख्तर ने कहा- ‘यह ख्वाब, मोदी को बनाएगा हमेशा के लिए PM’

कांग्रेस में, वास्तव में, चापलूसों की कमी नहीं। पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने मई 21, 2021 को ट्वीट कर राहुल गाँधी को लोकतंत्र के भविष्य का राजा (प्रधानमंत्री) बता डाला। खुर्शीद ने राहुल और राजीव गाँधी की कोलाज फोटो शेयर करते हुए ट्वीट किया, ”भारतीय लोकतंत्र के पूर्व और भविष्य के राजा।” हालाँकि, उनकी यह बात कई लोगों के गले नहीं उतरी, जिसको लेकर उन्हें सोशल मीडिया पर जम कर ट्रोल किया गया। वैसे भी मुंगेरी लाल सपने देखने में क्या जाता है, जो यूपीए के 10 सालों में मंत्री तक नहीं बन सका, चापलूस उसे सब्जबाग दिखा रहे हैं। इतनी चापलूसी एक परिवार की करने की बजाए पार्टी की होती, कांग्रेस की इतनी बुरी हालत नहीं हुई होती। 

वहीं, बॉलीवुड के लेखक व गीतकार जावेद अख्तर सलमान खुर्शीद की इस बात से असहमत नजर आए। अख्तर ने खुर्शीद के ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मशहूर लेखक ने कहा कि लोकतंत्र का राजा कहना अपने आप में विरोधाभास है। राहुल गाँधी अच्छे विपक्षी नेता हो सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नहीं। वैसे भी, जब राहुल को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा जोरों पर भी, तब योगी आदित्यनाथ ने कहा, "जितनी जल्दी हो राहुल को अध्यक्ष बनाइए।" जिसे कांग्रेस के किसी भी नेता ने गंभीरता से नहीं लिया कि आखिर विपक्ष यानि भाजपा क्यों राहुल के अध्यक्ष बनने पर खुश हो रही है? 

अख्तर ने ट्वीट किया, ”मिस्टर सलमान खुर्शीद आपका विरोधाभास, ‘लोकतंत्र का राजा’ बेहद निराशाजनक है। राहुल गाँधी एक विपक्षी नेता के तौर पर स्वीकार्य हैं, लेकिन जो कोई भी उनके प्रधानमंत्री बनने का सपना देखता है वो नरेंद्र मोदी को हमेशा के लिए भारत का प्रधानमंत्री बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।”

जावेद अख्तर का यह ट्वीट भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा द्वारा खुर्शीद को लताड़ने के बाद आया है। खुर्शीद की बिना सिर पैर की इस बात के जवाब में पात्रा ने पूर्व सांसद को याद दिलाया कि भारत एक लोकतंत्र है, वंश नहीं। पात्रा ने कहा कि खुर्शीद द्वारा घोषित लोकतंत्र में राजा नहीं होते, बल्कि राजवंशों के राजा होते हैं।

दरअसल, खुर्शीद की यह टिप्पणी राजीव गाँधी की पुण्यतिथि के दिन आई थी। राजीव गाँधी की 21 मई, 1991 को एक आत्मघाती हमलावर ने हत्या कर दी थी, जब वे तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा में थे।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, जो अब केरल के वायनाड से एक सांसद के रूप में विपक्ष में हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में वह कांग्रेस के गढ़ अमेठी से हार गए थे। राहुल जब पार्टी में अध्यक्ष के पद पर थे, तब कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनावों में भी करारी हार का सामना करना पड़ा था।

उनकी पार्टी को सिर्फ 52 सीटें ही मिली थी। इसके चलते राहुल गाँधी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया था और पार्टी ने अभी तक इस पद के लिए चुनाव नहीं कराया है। इस पद पर सोनिया गाँधी को अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त किया गया, जो डेढ़ साल से अधिक समय से इस पद पर हैं। ऐसे में कॉन्ग्रेस के नेताओं का राहुल गाँधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में देखना खुद से बेमानी करने जैसा है।

मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव ?

Image may contain: 7 peopleडॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत
Image may contain: 2 people, text that says 'ISTORY MYSTEJO जब अकबर ने भरे दरबार में जहांगीर को जूते से पीटा'Image may contain: textअक्टूबर 2017 में बीबीसी ने उपरोक्त शीर्षक से एक समीक्षा भारत के इतिहास के संबंध में प्रस्तुत की थी । जिसमें उसने यह स्थापित करने का प्रयास किया था कि भारत में मुगलों से पहले ऐसा कोई शासक नहीं हुआ जिसने देश की जीडीपी को बढ़ाने के लिए और लोगों के आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए इतना गंभीर प्रयास किया हो । उस समय ताजमहल की ऐतिहासिकता को लेकर भारतवर्ष में गंभीर चर्चा चल रही थी कि इसका वास्तविक निर्माता कोई हिंदू शासक है या फिर तथाकथित रूप से शाहजहां ही इसका वास्तविक निर्माता है ? तब भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर धब्बा बताया था तो केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप करने की मांग कर डाली थी । तब औरंगज़ेब रोड का नाम अब्दुल कलाम रोड किया जा चुका था ।उसी वर्ष मई में बीजेपी नेता शायना एनसी ने मुग़ल शासक अकबर की तुलना हिटलर से की थी । शायना ने ट्वीट कर कहा था, ''अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप मार्ग कर देना चाहिए । कल्पना कीजिए कि इसराइल में किसी सड़क का नाम हिटलर पर रहे ! हम लोगों की तरह कोई भी देश दमनकारियों को सम्मान नहीं देता है।''वास्तव में भारत के इतिहास के तथ्यों को बहुत अधिक तोडा मरोड़ा गया है । पिछले 70 - 72 वर्ष के काल में हमारी दूसरी तीसरी पीढ़ी इस इतिहास को पढ़ते - पढ़ते अत्यधिक भ्रमित कर दी गई है। प्रचलित इतिहास को पढ़कर वास्तव में ऐसा लगता है जैसे भारत में अंग्रेजों और मुसलमानों के आने से पहले ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर भारत गर्व और गौरव कर सके।
हमें भ्रमित करने के लिए विदेशी विद्वानों के लेख और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। जबकि समकालीन भारतीय विद्वानों , लेखकों या कवियों के संदर्भों को सांप्रदायिक कहकर या पूर्वाग्रह ग्रस्त मानकर छोड़ दिया जाता है । पता नहीं यह कौन सी कसौटी है कि हमारे विद्वानों के साथ इतना अन्याय कर उनके तथ्यों को उपेक्षित कर दिया जाता है और विदेशी विद्वानों की मिथ्या धारणाओं को सत्य के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है ।
बीबीसी ने अपनी उपरोक्त समीक्षा में एक विदेशी विद्वान को उदधृत कर ऐसे ही भ्रामक तथ्यों को हम पर थोपने का प्रयास करते हुए लिखा था कि जर्मन-अमरीकी इतिहासकार एंड्रे गंडर फ्रैंक ने 'रीओरिएंट: ग्लोबल इकॉनमी इन द एशियन एज' नाम की किताब 1998 में लिखी थी । फ्रैंक का कहना था कि अठारहवीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन का आर्थिक रूप से दबदबा था । स्पष्ट है इसी दौर में सारे मुस्लिम शासक भी हुए।"
उन्होंने इस किताब में लिखा है कि पूरे संसार पर दोनों देश हावी थे । यहीं से कई इतिहासकारों ने इस बात को आगे बढ़ाया । ज़्यादातर इतिहासकारों का यही मत है कि 18वीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन हावी रहे । स्थिति तब बदली जब यूरोप का विस्तार आरम्भ हुआ और कई देशों में उपनिवेश बने । इसी दौरान अंग्रेज़ों का भारत पर क़ब्ज़ा हुआ।"
हमारा मानना है कि 1998 में जिस लेखक ने उपरोक्त पुस्तक लिखी उस पुस्तक को अकबर के समकालीन इतिहासकार और कवियों की अपेक्षा प्राथमिकता देना मूर्खता है। यदि उपरोक्त लेखक बात इतिहास का एक अंग है तो अकबर के विषय में इतिहासकार विंसेंट स्मिथ का यह कथन इतिहास का एक अंग क्यों नहीं हो सकता कि - "अकबर भारत में एक विदेशी शासक था । उसकी धमनियों में भारतीय रक्त की एक बूंद भी नहीं थी।"
अकबर के चरित्र के बारे में स्मिथ हमें बताता है कि "पुनीत ईसाई धर्म प्रचारक अक्वाबीबा ने अकबर को स्त्रियों से उसके कामुक संबंधों के लिए बुरी तरह फटकार लगाने का साहस किया था।"
जो लोग यह मानते हैं कि भारत में राजा के लिए कोई नियमावली या आचार धर्म नहीं था । उन्हें "याज्ञवल्क्य स्मृति" को पढ़ना चाहिए । जिसमें राजा के बारे में लिखा गया है कि - ''राजा को शक्ति संपन्न, दयावान, दानी , दूसरों के कर्मों को जानने वाला, तपस्वी , ज्ञानी एवं अनुभवी लोगों के विचारों को सुनकर निर्णय देने वाला , मन एवं इंद्रियों को अनुशासित रखने वाला , अच्छे एवं बुरे भाग्य में समान स्वभाव रखने वाला, कुलीन , सत्यवादी , मनसा वाचा , कर्मणा पवित्र , शासन कार्य में दक्ष, शारीरिक , मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सबल , व्यवहार एवं वाणी में मृदुल , आचार्य आदि प्रतिपादित वर्ण एवं आश्रम धर्मों का पोषक , अकृत्य कर्मों से अलग रहने वाला , मेधावी , साहसी , गंभीर , गुप्त बातों तथा दूतों के संदेशों एवं अपनी कमी की गोपनीयता की रक्षा करने वाला , शत्रुओं पर दृष्टि रखने वाला , भेदनीति का ज्ञाता , दुर्गुणों का रक्षक, तर्क शास्त्र , अर्थशास्त्र एवं शासन शास्त्र में प्रवीण होना चाहिए।"
इसके अतिरिक्त वेदों व अन्य आर्षग्रंथों सहित विदुर नीति , विष्णु नीति , आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र जैसे अन्य कई ग्रंथ भी राजा के बारे में उसका धर्म निर्धारित करने की बात करते हैं । हमारा मानना है कि भारतवर्ष में मुगलों , अंग्रेजों या किसी भी विदेशी आक्रमणकारी शासक के शासनकाल में राजा के लिए इस प्रकार का एक भी नियम या उसके आचार व्यवहार को निर्धारित करने वाला उसका धर्म प्रतिपादित नहीं किया गया , जैसा भारतवर्ष में किया गया था ।
अकबर सहित प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी शासक के शासनकाल में हिंदुओं पर लगाया जाने वाला जजिया कर ही एक ऐसा प्रमाणिक साक्ष्य है जो इन सारे शासकों को पक्षपाती , अन्यायी और अत्याचारी सिद्ध कर देता है।
अत्याचारी शासकों से मुक्ति प्राप्त करना भारत के लोगों का प्रथम कर्तव्य था और ऐसा होना भी चाहिए कि विदेशी शासकों के शासन से कोई भी देश अपनी मुक्ति की योजना पर काम करे। अकबर भारत के लिए कभी महान नहीं था । पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में उसे महान कह कर संबोधित किया है । जबकि अकबर के बारे में बदायूंनी हमें बहुत अच्छे ढंग से बताता है अकबर में वे सारी कमजोरियां थीं जो इस्लाम को मानने वाले शासक में होनी चाहिए । बदायूनी के उन विवरणों को कहीं पर भी उल्लेखित नहीं किया जाता। हमारे लिए अकबर के बारे में प्रमाणित सूचना देने वाला केवल अबुलफजल जैसा चाटुकार दरबारी ही पर्याप्त है। उसी चाटुकार के विवरणों के आधार पर वर्तमान इतिहास हमें पढ़ाया जाता है और विदेशी विद्वान भी उसी के आधार पर अपनी विद्वता झाड़ लेते हैं।
जब अकबर ने चित्तौड़ को जीता तो उसकी विजय को उसने विशेष महत्व दिया । इस बात का पता इससे चलता है कि अकबर की इस विजय के लिए एक पुस्तक अलग से तैयार की गई थी । जिसका नाम 'फतेहनामा ए चित्तौड़' दिया गया था । इस पुस्तक के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने चित्तौड़ को किस प्रकार 'जिहादी भावना' से प्रेरित होकर जीता था ? 'फतहनामा' में लिखा गया था - अल्लाह की ख्याति बढ़े , जिसने अपने वचन को पूरा किया। अकेले ही संयुक्त शक्ति को पराजित करा दिया और जिसके पश्चात कहीं भी कुछ भी नहीं है , सर्वशक्तिमान जिसने कर्तव्य परायण मुजाहिदों को बदमाश अविश्वासियों को अर्थात हिंदुओं को अपनी बिजली की भांति चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर देने की आज्ञा दी थी । उसने बताया था कि उनसे युद्ध करो । अल्लाह उन्हें तुम्हारे हाथों में दंड देगा और वह नीचे गिरा देगा । वध कर धराशाई कर देगा और तुम्हें उनके ऊपर विजय दिला देगा। (कुरान सूरा 9 आयत 14 ) हमने अपना बहुमूल्य समय अपनी शक्ति से सर्वोत्तम ढंग से जिहाद में ही लगा दिया है और अमर अल्लाह के सहयोग से जो हमारे सदैव बढ़ते जाने वाले साम्राज्य का सहायक है, अविश्वासियों के अधीन बस्तियों , निवासियों , दुर्गों व शहरों को विजय कर अपने अधीन करने में लिप्त हैं । कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और तलवार के प्रयोग द्वारा इस्लाम के स्तर को सर्वत्र बढ़ाते हुए और बहुदेवतावाद के अंधकार और हिंसक पापों को समाप्त करते हुए उन सभी का विनाश कर दे । हमने पूजा स्थलों को उन स्थानों में मूर्तियों को और भारत के अन्य भागों में विध्वंस कर दिया है। अल्लाह की ख्याति बढ़े जिसने हमें इस उद्देश्य के लिए मार्ग न दिखाया होता तो हमें इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मार्ग ही न मिला होता - - -।"
इस तथाकथित महान बादशाह की मृत्यु के पश्चात जब इसका बेटा सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बना तो उसने अपने बाप की महानता को स्पष्ट करते हुए अपनी खुद की किताब में लिखवाया - "अकबर और जहांगीर के शासनकाल में 5 से 6 लाख तक की संख्या में हिंदुओं का वध हुआ था।" ( तारीखे - सलीमशाही अनु. प्राइस - 225 - 226 )
जिसके शासनकाल में लाखों हिंदुओं का वध किया गया हो उसे एक दयालु शासक के रूप में महान कैसे माना जा सकता है ?
देश के हिंदू समाज को जागना पड़ेगा । यदि नहीं जागे तो इन पर विदेशी शासकों के इतिहास को इस प्रकार थोप दिया जाएगा की फिर उसे ये चाह कर भी अपने कंधे से उतार नहीं पाएंगे। एक समय ऐसा आएगा जब हमें अपने महान क्रांतिकारियों के आजादी मांगने के विचार तक से भी घृणा हो जाएगी। यह लगेगा कि जब यहां पर सब कुछ अंग्रेजों व मुगलों ने ही किया है तो फिर उनसे आजादी लेने के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने मूर्खतापूर्ण कार्य क्यों किया ?

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जिस समय बीबीसी ने अपना उपरोक्त समीक्षात्मक परन्तु भ्रमात्मक लेख प्रकाशित किया था उसी समय इन विवादों के बीच फ़िल्मकार और गीतकार जावेद अख़्तर ने कई ट्वीट किए थे । उनके ट्वीट की जानकारी देते हुए बीबीसी ने ही लिखा था कि जावेद अख़्तर ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए पूछा है कि उसके पास मुग़लों से जुड़ी जो जानकारियां हैं वो कहाँ से आती हैं ? उन्होंने लिखा है कि ज्ञान, बुद्धि और शालीनता की सीमा हो सकती है पर किसी चीज़ की उपेक्षा करना तो बेवक़ूफ़ी है और अभी ऐसा ही हो रहा है ?
हमारी दृष्टि में जावेद अख्तर के इस प्रश्न का उत्तर यही है कि डॉक्टर विंसेंट स्मिथ और बदायूँनी जैसे लेखकों को समझकर अकबर का 'सच' अब न केवल भारत अपितु सारे संसार की समझ में आने लगा है। उसके हृदय में हिंदुओं के प्रति वैसी ही घृणा का भाव था जैसा भाव अन्य मुस्लिम शासकों के भीतर मिलता है।
दूसरे , जावेद साहब को यह भी समझना चाहिए था कि पराधीनता चाहे कैसी भी हो , उसका विरोध होना चाहिए । ऐसे विरोध को करने का अधिकार प्रत्येक समाज और प्रत्येक राष्ट्र के पास सुरक्षित रहता है। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि अकबर और उसके पूर्वज सभी विदेशी थे ।जिन्होंने यहाँ पर आकर जबरन अपना राज्य स्थापित किया और लोगों पर अत्याचार किए । उन अत्याचारों का सही निरूपण करना और ऐसे अत्याचारी शासकों का विरोध करना आज इतिहासकार का धर्म है तो उस समय अत्याचारों को झेल रहे हमारे तत्कालीन पूर्वजों का धर्म था । जिसे उन्होंने बहुत उत्तमता से निर्वाह किया था । यदि उन्होंने अपने धर्म का समय उत्तमता से निर्वाह किया तो उस उत्तमता को इतिहास में उत्तम स्थान देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है । अतः अकबर कभी भी महान नहीं कहा जा सकता । क्योंकि उसका विरोध करने के लिए उसके सामने महाराणा प्रताप हमारे इतिहासनायक के रूप में उपलब्ध हैं । ऐसा कभी नहीं हो सकता कि अत्याचारी भी महान हो और अत्याचारी का विरोध करने वाला भी महान हो । दोनों में से कोई एक ही महान हो सकता है । निश्चित रूप से जो राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग हैं उनके लिए महाराणा प्रताप ही महान हैं और जो दोगली मानसिकता के लोग हैं या भारत के सम्मान के साथ धोखा करने वाले लोग हैं उनके लिए अकबर महान हो सकता है।
जावेद अख़्तर ने आगे लिखा , ''संगीत सोम द्वारा इतिहास की उपेक्षा हैरान करने वाला है। क्या उन्हें कोई छठी क्लास के स्तर के इतिहास की किताब देगा ? सर थॉमस रो जहांगीर के वक़्त में आए थे ? उन्होंने लिखा है कि हम भारतीयों का जीवन स्तर औसत अंग्रेज़ों से अच्छा था।''इस पर भी जावेद अख्तर साहब को समझना चाहिए था कि भारत ज्ञान में , धन में और सांस्कृतिक समृद्धि में अर्थात प्रत्येक क्षेत्र में अंग्रेजों से ही नहीं मुगलों से भी श्रेष्ठ था । उस समय तक मुगलों से पूर्व के तुर्कों द्वारा मचाई गई भरपूर लूट के उपरान्त भी भारत की आर्थिक समृद्धि समाप्त नहीं हुई थी। यही स्थिति मुगलों के समय में भी बनी रही । अपनी आर्थिक समृद्धि के कारण ही लोग अपना जीवन व्यापार चलाते रहे और समय-समय पर विदेशी शासकों का विरोध करने के लिए अपने लोगों की आर्थिक सहायता भी करते रहे । साथ ही यदि अवसर मिला तो बड़ी-बड़ी सेनाएं एकत्र कर विदेशी शासकों का क्रांतिकारी विरोध भी किया । इतिहास के उस सच को छुपा देना सचमुच भारत के लिए दुख का विषय है। जब जावेद अख्तर 'उपेक्षा' शब्द का प्रयोग करते हैं तो उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि इतिहास के इस सच की वह भी 'उपेक्षा' न करें।
जब भारत के 'सच' की की गई 'उपेक्षा' उनकी समझ में आ जाएगी तो मुगलों या उनके अपने चहेते अकबर की 'उपेक्षा' होना कितना स्वाभाविक है ?- यह भी उनकी समझ में आ जाएगा।
जावेद अख़्तर ने अगले ट्वीट में लिखा , ''मेरे लिए हैरान करने वाली बात यह है कि जो अकबर से नफ़रत करते हैं, उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव से समस्या नहीं है। जो जहांगीर से नफ़रत करते हैं उन्हें वॉरेन हेस्टिंग से दिक़्क़त नहीं है जबकि वो वास्तविक लुटेरे थे।''
इस पर भी जावेद अख्तर साहब को भ्रान्ति रही। वास्तव में भारतवर्ष में राष्ट्रवादी चिंतन के लोग जितनी अकबर से घृणा करते हैं उतनी ही लॉर्ड क्लाइव से घृणा करते हैं और जितनी जहांगीर से घृणा करते हैं उतनी ही वारेन हेस्टिंग से भी करते हैं । भारत के इतिहास में यह सारे ही लुटेरे थे । उन्होंने भारत के सम्मान को लूटा और सबसे बड़ी लूट किसी देश , समाज और राष्ट्र के सम्मान की लूट ही होती है । यदि अकबर और जहांगीर वास्तव में मानवीय दृष्टिकोण रखने वाले शासक थे तो उन्हें भारतीय समाज की परंपराओं का ध्यान रखते हुए और भारत के वेदों , उपनिषदों , गीता आदि का सम्मान करने वाली राजाज्ञा जारी करनी चाहिए थीं । इसके अतिरिक्त भारत में आकर भारत से ही सीखकर भारत को भारत की आत्मा के अनुसार चलाने का प्रयास करते ना कि शरीयत के अनुसार जजिया लगाकर।
जावेद अख्तर जैसे लोगों को यह पता होना चाहिए कि हमारे वेद शास्त्र और रामायण आदि ग्रंथ हमें प्रारंभ से ही स्वतंत्रता प्रेमी और लोकतंत्र प्रिय बनाकर रखने में सफल रहे हैं । इनमें दिए हुए विचारों से प्रेरित होकर हमने कभी किसी भी विदेशी को अपना शासक स्वीकार नहीं किया । वीर सावरकर जी ने रामायण की ऐसी ही विशेषता से प्रेरित होकर लिखा है - ''अगर मैं देश का डिक्टेटर होता तो सबसे पहला काम यह करता कि महर्षि बाल्मीकि रामायण को जब्त करता । जब तक यह ग्रंथ भारतवासी हिंदुओं के हाथों में रहेगा तब तक न तो हिंदू किसी दूसरे ईश्वर या सम्राट के सामने सर झुका सकते हैं और न उनकी नस्ल का ही अंत हो सकता है ।
अंततः क्या है रामायण में ऐसा कि वह गंगा की भांति भारतवासियों के अंतः करण में आज तक बहती ही आ रही है ? - मेरी सम्मति में रामायण लोकतंत्र का आदी शास्त्र है , ऐसा शास्त्र जो लोकतंत्र की कहानी ही नहीं लोकतंत्र का प्रहरी , प्रेरक और निर्माता भी है । इसीलिए तो मैं कहता हूं कि अगर मैं इस देश का डिक्टेटर होता तो सबसे पहले रामायण पर प्रतिबंध लगाता ।
जब तक रामायण यहां है तब तक इस देश में कोई भी डिक्टेटर पनप नहीं सकता । रामायण की शक्ति कौन कहे ? क्या काही नजर आता है ऐसा सम्राट ? साम्राज्य , अवतार या पैगंबर जो राम की तुलना में ठहर सके । सबके खंडहर आर्त्तनाद कर रहे हैं , किंतु रामायण का राजा , उसका धर्म , उसके द्वारा स्थापित रामराज्य , भारतवासियों के मानस में आज तक भी ज्यों का त्यों जीवंत है ? चक्रवर्ती राज्य को त्याग वल्कल वेश में भी प्रसन्न वदन , राजपुत्र किंतु वनवासी शबरी के बेर , अहिल्या का उद्धार कर लंका जीती । मगर फूल की तरह उसे विभीषण को अर्पण कर दिया । जिसने अपने भाई का विरोध कर प्रजातंत्र का ध्वज फहराया था । ऐसे थे रामायण के राम । जिनकी जीवन गाथा रामायण में अजर अमर है। इस देश को मिटाने के लिए बड़ी बड़ी ताकतें आयीं । मुगल , शक , हूण आये , किन्तु इसे वे मिटा ना सके। कैसे मिटाते ? - पहले उन्हें रामायण को मिटाना चाहिए था । "( विनायक दामोदर सावरकर : पृष्ठ 22 )
जावेद अख्तर जैसे लोगों को यह पता होना चाहिए कि हमारी मौलिक चेतना सदैव वेदों और रामायण जैसे ग्रंथों से चेतनित रही। यही संस्कृति बोध ब। हमें आज भी अकबर को विदेशी आक्रमणकारी और महाराणा प्रताप को महान हिंदू योद्धा कहने के लिए प्रेरित करता है।

जावेद अख्तर गद्दार है, इस्लाम पर धब्बा है: माइक पर अजान को लेकर आपत्ति जताने के बाद भड़के कट्टरपंथी

जावेद अख्तर, अजान

माइक पर अजान को लेकर आपत्ति जताने के बाद जावेद अख्तर पर कट्टरपंथी भड़क उठे हैं। उन्हें सोशल मीडिया पर जमकर निशाना बनाया जा रहा है।
उनके इस ट्वीट को लेकर बयानबाजी करते हुए ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता सैयद असीम वकार ने तो यहाँ तक कह दिया कि जावेद अख्तर मुस्लिम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अल्लाह ने बहुत जल्दी दिखा दिया कि इस लंबे से कुर्ते के नीचे जो ज्ञान है, वह खाकी निकर से निकल कर आ रहा है।
उनका कहना है कि जावेद अख्तर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ कनेक्शन हैं और वह मुसलमानों के खिलाफ इसलिए बोल रहे हैं, क्योंकि वह मौजूदा सरकार में राज्यसभा सीट चाहते हैं।
ट्वीट किए गए वीडियो में उन्होंने जावेद अख्तर को मुनफिक (नापाक) कहा और साथ ही मुसलमानों से जावेद अख्तर को लकब से नवाजने की गुजारिश की। AIMIM के नेता ने कहा कि उनकी लोगों से गुजारिश है कि वो अपने-अपने तरीकों से, अपने-अपने अल्फाजों से, जो भी लकब (पदवी) सही लगे, उसका इस्तेमाल करके विरोध करें।

जावेद अख्तर ने शनिवार(मई 9) को किए अपने ट्वीट में कहा था, “भारत में तकरीबन 50 साल तक लाउडस्पीकर पर अजान हराम थी। इसके बाद ये हलाल हो गई और इस कदर हलाल हुई कि इसकी कोई सीमा ही नहीं रही। अजान करना ठीक है, लेकिन लाउडस्पीकर पर इसे करना दूसरों के लिए दिक्कत का सबब बन जाता है। मुझे उम्मीद कि कम से कम इस बार वो दूसरों को हो रही परेशानी को समझते हुए लाउडस्पीकर पर अजान देना खुद ही बंद कर देंगे।”

AIMIM नेता द्वारा की गई अपील के बाद कट्टरपंथियों ने भी जावेद अख्तर को निशाने पर लेते हुए गालियाँ देनी शुरू कर दी।
शेख हमजा नाम के एक यूजर ने लिखा, “वह (जावेद अख्तर) मुस्लिम और इस्लाम पर धब्बा है। जिसे भी अजान से दिक्कत है, उसे इस्लाम से निकाल फेंकना चाहिए। ऐसे इंसान को हम आस्तीन का साँप और गद्दार बोल सकते हैं।”
एक अन्य यूजर ने लिखा, “जावेद अख्तर आरएसएस का दलाल और *** है। अल्लाह उसको जल्द से जल्द सजा देगा। आमीन।”

जावेद अख्तर के ट्वीट पर एक यूजर ने लिखा, “आपके बयान से असहमत हूँ। कृपया इस्लाम और उसके विश्वास से जुड़े बयान मत दीजिए। आप जानते हैं कि हम ऊँची आवाज में गाने नहीं चला रहे हैं और ना ही कोई खराब काम कर रहे हैं। अजान प्रार्थना के लिए और सही रास्ते पर चलने के लिए बेहद खूबसूरत पुकार है।”

यूजर ने बयान का जवाब देते हुए जावेद अख्तर ने लिखा, “तो आप ये कह रहे हैं कि वो सभी इस्लामिक जानकार जिन्होंने 50 साल तक लाउडस्पीकर को हराम करार दे रखा था वो गलत थे। उन्हें नहीं पता था कि वो क्या कह रहे हैं? अगर आपको यकीन है तो आप एक बार कहिए। फिर मैं आपको उन जानकारों के नाम भी बताऊँगा।” 
इससे पहले जावेद अख्तर ने कोरोना संकट खत्म होने तक मस्जिदों को बंद रखने की माँग का समर्थन करते हुए कहा था कि अगर काबा और मदीना की मस्जिद बंद की जा सकती है तो भारत की मस्जिदों को क्यों बंद नहीं किया जा सकता?

‘खान मार्केट गैंग’ को जावेद अख्तर का जवाब

17 जुलाई को झारखंड में रांची की अदालत ने 19 वर्षिया ऋचा भारती को जमानत लेने के लिए अजीबो-गरीब शर्त लगा दी। न्यायाधीश मनीष सिंह ने ऋचा भारती से कहा कि उसे जमानत लेने के लिए पांच कुरान बांटने की शर्त पूरी करनी होगी। जमानत के लिए अदालत द्वारा लगाई गई इस शर्त को मानने के लिए ऋचा भारती तैयार नहीं हुईं। उनका कहना था कि यह उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। अदालत के इस फैसले पर मीडिया और सोशल मीडिया पर हंगामा खड़ा हो गया।
खान मार्केट गैंग का चेहरा
वहीं सोशल मीडिया पर ‘खान मार्केट गैंग’ के पत्रकार इस फैसले को सही बताते हुए सेक्युलरिज्म की दुहाई देने लगे। ऐसी ही एक पत्रकार अरफा खानम शेरवानी ने कहा कि अदालत का यह निर्णय सही है और पश्चिमी देशों में सेवा करने की सजा अक्सर अदालतें देती रहती हैं। उन्होंने Tweet में लिखा-

खान मार्केट गैंग को जावेद अख्तर का जवाब
अरफा खानम शेरवानी को जावेद अख्तर ने सच का आईना दिखाया। यह जावेद अख्तर वही हैं जो अक्सर ‘खान मार्केट गैंग’ के साथ खड़े रहते हैं। जावेद अख्तर ने रांची की अदालत के इस निर्णय को ‘साम्प्रदायिकता बढ़ाने वाला’ कहकर अरफा को गलत बताते हुए Tweet में लिखा-

खान मार्केट गैंग का गिरगिटिया रंग
सबसे आश्चर्य की बात है कि अरफा खान और जावेद अख्तर तो ऋचा भारती को लेकर सोशल मीडिया पर बहस करते हैं, लेकिन उस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते जो कोलकाता में इशरत जहां के साथ हुई। कोलकाता में इशरत जहां को उसके मकान मालिक ने इसलिए घर से बाहर निकाल दिया क्योंकि वह अपने घर में हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं। इशरत जहां के खिलाफ जिस तरह से मुस्लिम समुदाय खड़ा हो गया उसकी भर्त्सना करने के बजाय ‘खान मार्केट गैंग’ ने चुप्पी साध ली, किसी ने भी एक Tweet नहीं किया। हद तो तब हो गई जब जाने माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी इशरत जहां के मामले में चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन ऋचा भारती को ‘ कट्टर सोच’ वाला बताने में पीछे नहीं रहते हैं। अपने Tweet मे राजदीप लिखते हैं-

खान मार्केट कैसे बनाता है नैरेटिव
घटनाओं को जोड़कर अपने मनमाफिक नैरेटिव कैसे तैयार किया जाता है, इसका बेहतरीन नमूना ऋचा भारती का मामला है। जब न्यायालय को अपनी शर्तों की जटिलता का अहसास हुआ तो, न्यायालय ने शर्त को वापस ले लिया लेकिन इसे अरफा खानम ने अपने वीडियो के जरिए एक नैरेटिव बनाया कि भारत में दक्षिणपंथी हावी होते जा रहे हैं, अदालतें भी उनके सामने झुक जाती हैं, ऐसे माहौल में मुसलमानों को भय में जीना पड़ रहा है। इस तरह से अरफा खानम ने एक घटना से पूरे भारत की भयावह तस्वीर खींच डाली। इसे अरफा खानम का तर्क नहीं कुतर्क कहें तो अधिक उचित होगा। अपने Tweet के साथ इस वीडियो में अपने पूरे नैरेटिव को सेट करने का प्रयास किया है-

नैरेटिव देश को बदनाम करता है
इस नैरेटिव के जरिए ‘खान मार्केट गैंग’ पूरी दुनिया में भारत की सत्ताधारी पार्टी भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ऐंजड़ा चलता है। इस ऐंजडे को आगे बढ़ाने के लिए The Carvan पत्रिका के संपादक विनोद जोश ने लंदन में 10 और 11 जुलाई को आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह बताया कि किस तरह भारत में असहिष्णुता के बढ़ने से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है। इस बारे में विनोद जोश ने अपने Tweet में लिखा-


Why was the Ranchi Judge made to withdraw his order of distributing copies of Quran ? And why no one wants to talk about a 19 year old radicalised woman who wrote communal posts. I explain here : https://youtu.be/hjSu9ugKZiY 

बुर्का और घूंघट दोनों पर लगे रोक : जावेद अख्तर

Javed Akhtar on burqa ban
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक 
जब कभी मुस्लिम सम्बन्धित किसी भी बात पर चर्चा होती है, तुरन्त #metoo, #not in my name, #moblynching, #award vapsi, #intolerance आदि गैंग के जनविरोधी विधवा-विलाप शुरू करने लगते हैं, ये लोग स्वयं इतने संकुचित मानसिकता के हैं, उसी संकुचित मानसिकता में मुस्लिम जनमानस को भी रख अपनी तिजोरियाँ भरने में व्यस्त हो जाते हैं, और मुस्लिम जनमानस को भ्रमित करते हैं।       
वरिष्ठ गीतकार जावेद अख्तर ने मई 2 को कहा कि वह बुर्के पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ नहीं हैं बशर्ते कि यह रोक राजस्थान में जारी महिलाओं की घूंघट प्रथा पर भी लगनी चाहिए। हालांकि, गीतकार ने शुक्रवार को सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। बता दें कि श्रीलंका में आत्मघाती हमले के बाद शिवसेना ने भारत में बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। जावेद अख्तर ने बाद में कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
जावेद अख्तर ने कहा, 'यदि आप बुर्का पहनने पर रोक लगाने के लिए कानून लाना चाहते हैं तो इस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि राजस्थान में अंतिम चरण के चुनाव से पहले सरकार को वहां घूंघट प्रथा पर भी रोक की घोषणा करनी चाहिए। घूंघट और बुर्का दोनों पर रोक लगने से मुझे खुशी होगी।' अख्तर ने कहा,'कुछ लोग मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने कहा है कि हो सकता है कि श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध सुरक्षा कारणों से लगाया गया हो लेकिन वास्तव में यह महिला सशक्तिकरण के लिए जरूरी है। चेहरे को नकाब अथवा घूंघट से ढंकने पर रोक लगनी चाहिए।'
इस मामले पर अपनी बात रखते हुए गीतकार ने कहा, 'भाइयों, मुझे बुर्के के बारे में कम जानकारी है क्योंकि मेरे घर में कामकाजी महिलाएं थीं इसलिए मैंने अपने घर में बुर्के का प्रचलन नहीं देखा।' उन्होंने आगे कहा, 'इराक एक बहुत ही कट्टर देश है लेकिन वहां महिलाएं अपना चेहरा नहीं ढंकतीं। श्रीलंका में जो नया आदेश आया है वह भी चेहरे को ढकने की मनाही करता है।'
शिवसेना ने कहा-बुर्के पर लगे प्रतिबंध
शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में बुर्के पर रोक लगाने की मांग की है। पार्टी ने कहा कि 'रावण के लंका में यदि बुर्के पर प्रतिबंध लग सकता है तो राम की अयोध्या में इस पर रोक कब लगेगी।' शिवसेना नेता संजय राउत ने अपनी पार्टी के रुख को साफ करते हुए कहा कि इस मांग के जरिए शिवसेना का मकसद किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं है। यह कोई धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला रहा है। बुर्का हटाने की बात इस्लाम विरोधी नहीं है। 
श्रीलंका में चेहरा ढंकने पर लगी है रोक
श्रीलंका में इस्टर संडे हमले के बाद मुस्लिम महिलाओं के चेहरा ढंकने पर रोक लग गई है। इस आपात कानूनों के तहत लागू किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि इससे आतंक विरोधी कार्रवाई के दौरान लोगों की पहचान करने में सहूलियत मिलेगी। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि चेहरा न ढंकने का फरमान थोड़े समय के लिए है। लेकिन मुस्लिम समुदाय का मानना है कि अगर यह रोक लंबे समय तक रही तो उनके समुदाय इसके खिलाफ असंतोष पैदा हो सकता है। बता दें कि गत 21 अप्रैल को श्रीलंका के होटलों एवं चर्चों में हुए आत्मघाती हमलों में 250 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।
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श्रीलंका सीरीयल ब्लास्ट में मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहे हैं. तस्वीर साभार: रायटर कोलंबो: श्रीलंका में गिरजाघरों औ...

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देश भर में बुर्का पर चल रहे बहस के बीच केरल के एक मुस्लिम कॉलेज ने गुरुवार (02 मई 2019) को बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया है। ....

श्रीलंका हमले के बाद केरल में पकड़े गए हैं आईएस के संदिग्ध
श्रीलंका में हमलों के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने रियास अबूबकर को आतंकवादी साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया है। कासरगोड में तीन संदिग्धों के घरों पर भी छापेमारी की गई। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि अबूबकर और उसके साथी प्रतिबंधित आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल होने के लिए भारत छोड़कर गए थे। छापे के दौरान जांच एजेंसी ने उनके पास से कई मोबाइल फोन, सिम कार्ड, मेमोरी कार्ड, पेन ड्राइव, मलयालम व अरबी में लिखी डायरियों के साथ-साथ जाकिर नाइक के भाषण वाली कई डीवीडी व उसकी किताबें जब्त कीं।