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आदिपुरुष के टीजर से गुस्से में प्रभास?

              आदिपुरुष के टीजर रिलीज के बाद 'गुस्से' में दिखे प्रभास (फोटो साभार: वायरल वीडियो स्क्रीनग्रैब)
साउथ इंडियन एक्टर प्रभास के लीड रोल वाली ‘आदिपुरुष’ का टीजर (2 अक्टूबर 2022) को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में रिलीज किया गया। इस फिल्म को लेकर फैंस को काफी उम्मीदें थीं। हालाँकि, टीजर दर्शकों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका।

80 के दशक में निर्माता राम दयाल की वेश्यवृत्ति पर आधारित फिल्म "प्रभात" में नायक और नायिका के नाम राम और सीता होने पर विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विरोध करने पर तुरन्त फिल्म प्रदर्शन रोक फिल्म का पुनः संपादन में रमेश और सरिता कर प्रदर्शित करने पर कनॉट प्लेस में प्लाजा सिनेमा की रेनोवेशन के बाद उद्घाटन इसी फिल्म से किया गया था। दूसरे, 70 के दशक में मक्का फिल्म्स की हज पर आधारित फिल्म "खाना-ए-खुदा" के प्रदर्शन से पूर्व नामी इमामों, मुस्लिम विद्वानों और चर्चित लोगों को महादेव ऑडिटोरियम में दिखाकर उनकी सहमति के बाद ही सिनेमा हॉल पर प्रदर्शित की गयी थी। इस स्पेशल शो का आयोजन और प्रतिष्ठित लोगों को पिताश्री एम बी एल निगम द्वारा किया गया था। फिल्म सफलतापूर्वक आठवें सप्ताह में प्रवेश करने के बाद मेरठ से प्रदर्शन का विरोध नहीं विनती की गयी कि फिल्म के पोस्टर और रील पुरानी होने पर कूड़े में जाने से हमारे काबे का अपमान होगा। उनकी विनती को सम्मान देते हुए प्रदर्शन को तुरंत रोक दिया गया और आज तक फिल्म का पुनः प्रदर्शन नहीं हुआ, जबकि कई फिल्मों को काबा को दिखाया जा रहा है। 

रामायण पर आधारित फिल्म आदिपुरुष में जिस प्रकार से हनुमान, रावण आदि का उपहास किया गया है, इसका जिम्मेदार सिर्फ डायरेक्टर ओम राउत ही नहीं बल्कि समस्त यूनिट चाहे वह राम की भूमिका निभाने वाला प्रभास ही क्यों न हो। इतना ही नहीं, फिल्म वितरक भी उतना ही दोषी है। पत्रकारिता का श्रीगणेश फिल्म लेखों से करने के कारण फिल्म निर्माण से लेकर फिल्म के रिलीज़ होने तक किसकी क्या भूमिका होती है,का ज्ञान है। दूसरे, यह कि पिताश्री एम बी एल निगम 50 के दशक के चर्चित फिल्म वितरकों में शुमार थे। फिल्म की जब भी शूटिंग होती है, फिल्म वितरक और ब्रोकर तक को आमंत्रित किया जाता है। खैर, ये लम्बी कहानी है। 

‘आदिपुरुष’ टीजर के वीएफएक्स से लेकर भगवान राम, भगवान हनुमान और दशानन के लुक को लेकर लगातार ट्रोल किया जा रहा है। इस ट्रोल के बीच प्रभास का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह ‘गुस्से’ में फिल्म के डायरेक्टर ओम राउत को अपने कमरे में बुलाते नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा वीडियो ‘आदिपुरुष’ के टीजर रिलीज होने के बाद होटल की लॉबी का बताया जा रहा है। इस वीडियो में प्रभास कुछ लोगों से घिरे हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद, वह किसी से यह पूछते हुए नजर आते हैं कि ओम (फिल्म के डायरेक्टर ओम राउत) कहाँ है? इस पर उन्हें जवाब मिलता है ‘पता नहीं कहाँ हैं’।

वायरल वीडियो में प्रभास को दोबारा ओम राउत को अपने कमरे में बुलाते हुए सुना जा सकता है। जिस पर ओम कहते हैं ‘हाँ मैं आपके कमरे में आ रहा हूँ’।

‘आदिपुरुष’ का टीजर रिलीज होते ही सोशल मीडिया में फिल्म को लेकर मीम्स की बाढ़ आ गई। इसलिए, नेटिजेन्स को यह लगता है कि फिल्म का टीजर खराब होने के कारण प्रभास ने डायरेक्ट ओम राउत को अपने कमरे में बुलाया वो भी ‘गुस्से’ में। प्रभास का यह वीडियो फेसबुक से लेकर ट्विटर व इंस्टाग्राम में तेजी से वायरल हो रहा है। जहाँ लोग यह कहते हुए नजर आ रहे हैं कि उन्होंने प्रभास को पहली बार गुस्से में देखा है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की शौर्यगाथा पर आधारित फिल्म ‘आदिपुरुष’ का टीजर अयोध्या में रिलीज किया गया। टीजर रिलीज से पहले सरयू नदी में फिल्म का खास पोस्टर लॉन्च किया गया। इस दौरान पोस्टर पानी से निकलता हुआ ऊपर आया, जिसमें आदिपुरुष (प्रभास) का धमाकेदार अवतार देखने को मिला।

इस फिल्म में प्रभास को भगवान श्रीराम, कृति सेनन को माँ जानकी और सैफ अली खान को दशानन (रावण) के रूप में दिखाया गया है। इस फिल्म का टीजर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग सैफ अली खान (दशानन) के लुक को तैमूर और औरंगजेब की तरह बता रहे हैं।

वहीं, भगवान श्रीराम के रूप में नजर आने वाले प्रभास के हाथ में बंधी हुई बेल्ट जैसी चीज पर भी लोग बेहद नाखुश नजर आ रहे। फिल्म में भगवान हनुमान को बिना गदा और लेदर के कपड़ों में दिखाया गया है। इसलिए लोग लगातार फिल्म को ट्रोल कर रहे हैं।

‘सिखों को हमेशा कमजोर करना चाहते हैं मुस्लिम’: आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ पर मोंटी पनेसर, इंग्लैंड का पूर्व क्रिकेटर

                                                                    'लाल सिंह चड्ढा सेना' सेना और सिखों का अपमान करती है
देश के साथ अब विदेश में भी आमिर खान (Aamir Khan) की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ (Lal Singh Chaddha) के बायकॉट की माँग की जा रही है। इसी बीच इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटर मोंटी पनेसर ने आमिर खान की फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर किया है। उन्होंने दावा किया है कि ये फिल्म भारतीय सेना और सिखों का अपमान करती है। मोंटी ने इस फिल्म के बायकॉट की माँग भी की है।

मोंटी ने फिल्म के रिलीज होने के बाद गुरुवार (11 अगस्त 2022) को सिलसिलेवार कई ट्वीट्स करते हुए आमिर खान की फिल्म की कड़ी निन्दा की। उन्होंने अपने पहले ट्वीट में लिखा, “फॉरेस्ट गंप (Forrest Gump) अमेरिकी सेना पर फिट बैठती है, क्योंकि अमेरिका उस दौर में वियतनाम वार के लिए सेना को भरने के लिए कम आईक्यू वाले लोगों की भर्ती भी कर रहा था। पर ये फिल्म भारतीय सशस्त्र बलों, भारतीय सेना और सिखों का अपमान करती है। अपमानजनक शर्मनाक।”

इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटर ने अपने दूसरे ट्वीट में आमिर खान को आड़े हाथों लेते हुए तीखी टिप्पणी की है। मोंटी ने लिखा, “‘लाल सिंह चड्ढा में आमिर ने एक मंदबुद्धि इंसान का किरदार निभाया है। फॉरेस्ट गंप भी एक मंदबुद्धि इंसान था। अपमानजनक और शर्मनाक है।”

इसके बाद मोंटी ने एक और ट्वीट किया। इसमें उन्होंने फिल्म को बॉयकॉट करने की अपील की है। पनेसर ने अपने ट्वीट में कुछ आँकड़े भी दिए हैं। इनमें लिखा है, “एक पद्मविभूषण, एक पद्मभूषण, 21 इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट्स, 14 विक्टोरिया क्रॉस, दो परम वीर चक्र, चार अशोक चक्र, आठ महावीर चक्र, 24 कीर्ति चक्र, 64 वीर चक्र, 55 शौर्य चक्र, 375 सेना मेडल।”

यही नहीं उन्होंने मोहम्मद आदिल नाम के यूजर को रिप्लाई करते हुए लिखा, “मुस्लिम हमेशा से सिखों को कमजोर करना चाहते हैं। इस फिल्म का बहिष्कार करें।”

आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ हॉलीवुड स्टार टॉम हैंक्स की फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ का हिंदी रीमेक है। वहीं कमाल आर खान उर्फ केआरके ने आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्डा’ का का मजाक उड़ाते हुए अभिनेता को पागल, बेवकूफ और मेंटल बताया है। उन्होंने फिल्म के डायलॉग्स को बेहद खराब बताया है। केआरके ने फिल्म की लीड एक्ट्रेस करीना कपूर खान (Kareena Kapoor Khan) को ‘आंटी’ बताया है। केआरके ने कहा, “फिल्म बहुत स्लो और बोरिंग है। ट्रेन में बैठा आमिर खान पागलों जैसी हरकतें कर रहा है। मैं आमिर खान से सिर्फ इतना पूछना चाहता हूँ कि जब आपको फिल्म में पागल का ही रोल करना था फिर आपका सरदार बनना जरूरी क्यों था। क्या आप ये साबित करना चाहते हैं कि सरदार पागल होते हैं।”

लाल सिंह चड्डा के पोस्टर्स 

आमिर खान ने बुढ़ापे के रोल में पगड़ी पहनी हुई है, वहीं आर्मी यूनिफार्म में क्लीन शेव व बिना पगड़ी के है... इससे क्या सन्देश देने की कोशिश की गयी है??? यही ना, कि आर्मी ने उस पर जबरन अपने नियम थोपे होंगे?

जबकि आर्मी ने कभी सिखों को बाल काटने या शेव के लिए मजबूर नहीं किया

इसके कंधे पर लगा insignia देखिए....PARA लिखा है.... ये insignia हर किसी को नहीं मिलता.... सेना के भी गिने चुने कुछ हजार लोगों को सौभाग्य मिलता है यह Insignia लगाने के काबिल होने का....इसको तो यह भी नही पता की ये स्पेशल फ़ोर्स वाले लगाते हैं जो सर्जिकल स्ट्राइक किया करते हैं... Para वाले इंसान नहीं होते.... महामानव होते हैं.... जबकि यह चूहा टेढ़े मेढ़े मुँह बना कर Para कमांडो बना घूम रहा है.

अब इसके बांह पर लगी तलवार देखिए... curved तलवारें पाकिस्तान की सेना का sign है, जबकि भारतीय थल सेना हमेशा सीधी तलवार का इस्तेमाल करती है.

कुल मिलाकर फ़िल्म यह दिखाना चाह रही है, कि यह एक ढोंगी है, एक मंदबुद्धि है, जिसे भारत सरकार ने आर्मी में recruit कर लिया... फिर इसको para special forces में भेज दिया... और इसकी दाढ़ी मूंछ कटवा दीं... उसके बाद पाकिस्तान का insignia लगवा दिया..... वाह बेटे वाह.

और दुनिया इस अधकचरे अनपढ़ फर्जी अभिनेता को Perfectionist कहती है..... अब कृपया यह मत कहना कोई कि आमिर खान तो सिर्फ एक एक्टर है... उसे क्या पता इन सब के बारे में.....दुनिया को पता है आमिर का कितना दखल रहता है फ़िल्म में.

महाराष्ट्र सरकार का अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला ;अघोषित आपातकालीन

शिवसेना-रिपब्लिक टीवी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
महाराष्ट्र सरकार द्वारा रिपब्लिक भारत पर पाबन्दी कांग्रेस द्वारा 1975 में लगाई आपातकाल की याद करवा दी है। इस दौरान प्रेस सेंसरशिप के साथ गायक किशोर कुमार द्वारा संजय गाँधी के एक कार्यक्रम में जाने से मना करने की वजह से किशोर के रेडियो और फिल्मों में गायन पर पाबन्दी के साथ संजीव कुमार और सुचित्रा सेन अभिनीत फिल्म "आंधी" पर प्रतिबन्ध केवल इसलिए लगाया कि नायिका इंदिरा गाँधी की छवि प्रस्तुत कर रही थी, अभिनेता-निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार की फिल्म "रोटी कपडा और मकान" एक गीत "हाय महंगाई मार गयी...." को फिल्म से निकलवाने के साथ-साथ रेडियो प्रसारण पर भी पाबन्दी इसलिए लगाई कि यह चर्चित हो रहा था। इस गीत के रेडियो प्रसारण पर भी पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। फिल्म "किस्सा कुर्सी का" को सेंसर से पास नहीं होने दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के विरुद्ध बोलने वाले नेताओं को जेलों में डाल दिया था। यानि जिस तरह कांग्रेस ने आपातकाल में व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर पूर्णरूप से पाबन्दी लगा दी थी, उसी राह पर कांग्रेस के सहयोग से चल रही शिव सेना सरकार चल पड़ी है। 
पत्रकारों और मीडिया नेटवर्क को धमकाने, डराने के अपने काम को जारी रखते हुए, शिवसेना ने सितम्बर 10, 2020 को महाराष्ट्र में स्थानीय केबल ऑपरेटरों को ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा है। संजय राउत को अपना मार्गदर्शक बताते हुए, शिवसेना ने ऐसा ना करने पर इसका ‘अंजाम भुगतने’ तक की भी धमकी दी है।
बृहस्पतिवार को जारी एक पत्र में शिवसेना से जुड़े ‘शिव केबल सेना’ ने महाराष्ट्र में केबल टीवी ऑपरेटरों से रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने को कहा है। शिवसेना ने केबल ऑपरेटरों को अर्नब गोस्वामी के नेतृत्व वाले मीडिया नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने या परिणाम भुगतने जैसी धमकियाँ भी जारी की हैं।
शिवसेना द्वारा ‘रिपब्लिक टीवी’ के खिलाफ उठाया गया यह कदम बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर रिपब्लिक टीवी द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग के बीच आई है। इसके अलावा, हाल ही में अभिनेत्री कंगना रानौत के ऑफिस में द्वारा BMC द्वारा किए गए विवादास्पद नुकसान को लेकर भी महाराष्ट्र कि शिवसेना घिरती हुई नजर आ रही है और रिपब्लिक टीवी ने इसे भी प्रमुखता से अपने समाचार चैनल पर जगह दी है।
                शिव सेना द्वारा महाराष्ट्र के केबल ऑपरेटर्स
को लिखा गया पत्र
शिवसेना द्वारा प्रमुख टीवी केबल ऑपरेटर हैथवे, डेन, इन केबल, जीटीपीएल, सेवन स्टार, सिटी केबल्स को लिखे पत्र में कहा है कि ‘रिपब्लिक टीवी’ ने सीएम उद्धव ठाकरे, गृह मंत्री के लिए अपमानजनक भाषा का बार-बार इस्तेमाल कर पत्रकारिता की नैतिकता और दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया है।
इसमें कहा गया है कि अर्नब गोस्वामी ने न्यूज़रूम में एक ‘समानांतर अदालत’ बना ली है। इस पत्र में कंगना राउत को ‘हरामखोर’ कहने वाले शिवसेना नेता संजय राउत को ‘मुख्य मार्गदर्शक’ बताया गया है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला 
शिवसेना द्वारा रिपब्लिक टीवी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के प्रयासों के बाद, रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने एक बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि शिवसेना केबल, जो कि शिवसेना विंग का हिस्सा है, ने ‘संजय राउत के मार्गदर्शन’ के तहत एक आदेश जारी किया। रिपब्लिक टीवी ने कहा कि यह आदेश पूरे महाराष्ट्र में केबल ऑपरेटरों के लिए एक खुला खतरा है।


रिपब्लिक टीवी ने इस पर बयान देते हुए कहा, “किसी समाचार चैनल को उसके दर्शकों तक पहुँचने से रोकने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी मशीनरी और डराने के तरीकों का उपयोग करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत उल्लंघन है। रिपब्लिक भारत को रोकने करने का यह प्रयास एक स्वतंत्र प्रेस पर हमला है और एक आपातकालीन मानसिकता को दर्शाता है जो हमारे समय में एक अराजकतावाद है और इस महान लोकतंत्र के लिए एक विडंबना है।”
मीडिया नेटवर्क ने अपने बयान में कहा, “वे हर घर में दर्शकों तक पहुँचने के अपने रिपोर्ट के अधिकार और बचाव के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। मीडिया नेटवर्क ने कहा कि वे रिपब्लिक के सवालों को बंद करना चाहते हैं और रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टिंग को रोकना चाहते हैं। हालाँकि, वे रिपब्लिक टीवी को ब्लॉक नहीं कर सकते क्योंकि भारत के लोग हमारे साथ हैं।”
महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग की घटना के कवरेज के बाद से ही रिपब्लिक टीवी चैनल महाराष्ट्र सरकार के निशाने पर है। इसके बाद बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के घर पर बीएमसी द्वारा की गई तोड़फोड़ कि कवरेज के दौरान भी मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक चैनल के पत्रकारों से धक्का-मुक्की की और उन्हें गिरफ्तार भी किया।

#DemolishPriyankaHimachalHome यूजर्स की मांग ‘एक धक्का और दो इस घर को तोड़ दो’

हिमाचल में प्रियंका का बंगला 
अंग्रेजी में एक कहावत है "You show me the man, I will show you the rule", यह बात पता नहीं कितनी चरितार्थ हो चुकी है और हो भी रही है। कानून का डंडा चलता है आम नागरिकों पर, लेकिन सियासतखोरों के पास कानून फटकता तक नहीं। कार्यवाही केवल राजनीतिक बदले में ही होती है, अन्यथा कानून इन्हें छू भी नहीं पाता। उदाहरणार्थ गाँधी परिवार और मायावती आदि पर कितने घोटालों के आरोप हैं, यदि यही आरोप किसी आम नागरिक पर होते, क्या वह इस तरह खुला घूम रहा होता? इसमें कोई दो राय नहीं कि सुशांत की हत्या का मुख्य कारण उजागर हो या न हो, लेकिन राजनीतिक संरक्षण में बॉलीवुड में चल रहे कांडों से पूर्णरूप से पर्दा हटेगा, इस बात पर भी शक है।
   
सुशांत मामले में मुखर अभिनेत्री कंगना रनौत के मुंबई दफ्तर पर बीएमसी की कार्रवाई के बाद हर सोशल मीडिया पर लोग शिमला में प्रियंका गांधी की अवैध संपत्ति को ध्वस्त करने की मांग कर रहे हैं। बीएमसी की कार्रवाई के बाद ट्विटर पर #DemolishPriyankaHimachalHome ट्रेंड हो रहा है। लोगों का कहना है कि एक गैर हिमाचली व्यक्ति राज्य में घर नहीं खरीद सकता, इसलिए प्रियंका का शिमला के छराबड़ा स्थित घर अवैध है। इसे हटाया जाए या फिर हर भारतीय को अधिकार दे दिया जाए कि वह हिमाचल में संपत्ति खरीद सकते हैं। इसके साथ ही यूजर्स यह भी कह रहे हैं कि कानून सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। अगर कंगना की संपत्ति को अवैध कहकर तोड़ा गया तो अवैध संपत्ति तो तोड़ी ही जा सकती है।
आज प्रियंका की संपत्ति पर जो भी लोग ऊँगली उठा रहे हैं, अब से पहले कहां थे? क्यों नहीं पहले आवाज़ उठी? अब इसे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक बदला ही कहा जाएगा। प्रियंका ने हिमाचल में क्या आज संपत्ति बनाई है, जो उस पर ऊँगली उठाई जा रही है? यानि प्रियंका ने जो भी संपत्ति बनाई राजनीतिक संरक्षण में बनाई और राजनीतिक संरक्षण मिलता भी रहेगा, जनता चाहे जितना सिर पटक ले। 


मुंबई में अभिनेत्री कंगना रनौत के कार्यालय पर बीएमसी की कार्रवाई के बाद हर जगह महाराष्ट्र सरकार की आलोचना हो रही है। कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के गठबंधन वाली महाविकास अघाड़ी सरकार पर द्वेषपूर्ण राजनीति करने के आरोप लग रहे हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर भी कंगना के समर्थकों ने एक नई माँग उठा दी है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश की सरकार से गुहार लगाई है कि शिमला में प्रियंका गाँधी की अवैध संपत्ति को फौरन ध्वस्त कर दिया जाए, या उस पर कार्रवाई हो।
कंगना के मुंबई स्थित ऑफिस पर बीएमसी की कार्रवाई के बाद ट्विटर पर #DemolishPriyankaHimachalHome ट्रेंड हो रहा है। खबर लिखने तक इस हैशटैग के अंतर्गत 15 हजार से ज्यादा ट्वीट हो चुके थे। इन ट्विट्स में यूजर्स प्रियंका गाँधी की उस प्रॉपर्टी को गिराने की माँग हिमाचल सरकार से उठा रहे हैं, जिसके लिए 3 साल पहले भी हाईकोर्ट ने उन्हें नोटिस भेजा था।




जानकारी के मुताबिक, कोर्ट ने यह नोटिस प्रियंका गाँधी को आशी भट्टाचार्या की याचिका पर जारी किया था। इस याचिका में आरटीआई कार्यकर्ता ने प्रियंका की जमीन का विवरण और हिमाचल प्रदेश किराएदारी और भूमि सुधार अधिनियम के तहत राज्य सरकार से मिलने वाली अनुमति की जानकारी माँगी थी।

लोगों का कहना है कि एक गैर हिमाचली, प्रदेश में घर नहीं खरीद सकता है, इसलिए यह घर अवैध है। इसे जल्द से हटाया जाए या फिर हर भारतीय को अधिकार दे दिया जाए कि वह हिमाचल में संपत्ति खरीद सकते हैं।
एक यूजर लिखते हैं, “शिवसेना और कॉन्ग्रेस की तरह भाजपा राजनीतिक प्रतिशोध के लिए नहीं जानी जाती है। इसलिए यही बढ़िया है कि प्रियंका गाँधी के घर को छोड़ दिया जाए। क्योंकि हमें कॉन्ग्रेस का साल 2024 में पूरा सफाया चाहिए। ऐसे में गाँधी परिवार को आराम करने के लिए घर की जरूरत पड़ेगी।”

कंगना की संपत्ति पर इस तरह का हमला देखने के बाद लोगों का कहना है कि कानून सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। अगर कंगना की संपत्ति को अवैध कहकर तोड़ा गया तो अवैध संपत्ति तो तोड़ी ही जा सकती है। कुछ लोग इस हैशटैग पर प्रियंका के बंगले की तस्वीर शेयर करके लिख हिमाचल सरकार को टैग करके लिख रहे हैं, “एक धक्का और दो, इस घर को तोड़ दो।”
प्रियंका गाँधी के पास शिमला के छराबड़ा में एक घर है। यह घर शिमला के वीवीआईपी इलाके में बनाया गया है। हिमाचल प्रदेश किराएदारी और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 118 का हवाला देकर इस संपत्ति पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। इस धारा के अंतर्गत प्रावधान है कोई भी बाहरी प्रदेश में हिमाचल प्रदेश में जमीन नहीं ले सकता है।
यदि कोई इच्छुक भी हो, तो उसे भूअधिनियम की धारा 118 के तहत अनुमति लेनी होती है। इसकी परमिशन राज्य सरकार कैबिनेट में देती है। हालाँकि, कहा जाता है कि प्रियंका ने इस प्रक्रिया का पालन किया है। पर, फिर भी कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं की माँग ये है कि इस जमीन से जुड़े दस्तावेज ऑन रिकॉर्ड लेकर आए जाएँ
#DemolishPriyankaHimachalHome के अलावा इस समय कुछ लोग अवैध रूप से बनाए गए मस्जिद-मजार तोड़ने की माँग भी उठाने लगे हैं जिन्हें हाईवे और सड़क के बीच में खड़ा करके देश की प्रगति को रोका गया। लोगों का कहना है कि कानून तो सबके लिए समान होना चाहिए।
लोगों की माँग है कि महाराष्ट्र सरकार की करनी का जवाब हिमाचल सरकार ऐसे अवैध निर्माणों पर कार्रवाई करके दे। वहीं कुछ लोग हैं जो कंगना रनौत के मामले में पीएमओ से दखल करने की अपील कर रहे हैं। साथ ही इस पूरे फैसले को कंगना रनौत और महाराष्ट्र सरकार के बीच चल रही तनातनी बता रहे हैं। इसके अलावा कुछ लोग मीम्स शेयर करके ये बताना चाह रहे हैं कि अवैध प्रॉपर्टी पर बीएमसी की कार्रवाई सुन कर कॉन्ग्रेस अपनी कई संपत्तियों को लेकर सोच में हैं।

सुशांत सिंह राजपूत : कभी गुजरात दंगों पर ‘प्रोपेगेंडा’ से रोटियॉं सेकने वाले अब रिया में अपनी TRP की तलाश

राजदीप-रिया
न्यूज़ रूम से समाचार पढ़ना और अपने विचार थोप देना एक समय तक भारतीय मीडियाकारों की सच्चाई रहा है। लेकिन तब बाजार में आज की तरह प्रतिस्पर्धा, संचार के मध्यम और सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म भी मौजूद नहीं थे। राजदीप सरदेसाई जैसे तथाकथित पत्रकारों ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उन्हें न्यूज़रूम में बने बनाए माहौल के अलावा कभी दोहरे संचार के लिए भी लोगों के बीच होना होगा और जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन वो लोगों के साथ मुक्केबाजी करते नजर आए।
24×7 समाचार पढ़ने और सोशल मीडिया के कारण हर शब्द के लिए जनता के प्रति जवाबदेही से राजदीप सरदेसाई जैसे लोग बौखलाए हुए हैं। दरअसल, इस हर समय जनता के सामने और जनता के बीच होने की वजह से इन पत्रकारों का वास्तविक चेहरा भी अब सबके सामने है क्योंकि हर समय आप अपने शब्दों के चयन और अपने व्यवहार के लिए न्यूज़रूम के बनाए बनाए माहौल और स्क्रिप्ट के अनुसार नहीं चल सकते।
राजदीप सरदेसाई जैसे लोग, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता का करियर ही 2002 के गुजरात दंगों में नरेन्द्र मोदी को विलेन साबित करने और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ खुद ही न्यायधीश बनकर बनाया है, आज बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह की मौत में उनके परिवार द्वारा मुख्य आरोपित बताई गई रिया चक्रवर्ती का मीडिया मैनेजमेंट कर रहे हैं।
इसके साथ ही राजदीप सरदेसाई अपने निष्पक्ष होने का भी दावा करना चाहते हैं और साथ ही तटस्थ रिपोर्टर होने का भी दावा करते हैं। उससे भी बड़ी विडंबना यह कि रिया चक्रवर्ती जैसी एक विफल अभिनेत्री में राजदीप अपनी पत्रकारिता का भविष्य तलाश रहे हैं।
नरेंद्र मोदी की खरी-खरी 
यह 2014 के आम चुनावों से ठीक पहले की ही बात है जब भाजपा ने पार्टी के चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी को चुना और भारत अपने अगले युग के राजनितिक बदलाव की तैयारियाँ कर रहा था। राजदीप सरदेसाई इस समय सीएनएन-IBN के न्यूज़ रिपोर्टर हुआ करते थे।
राजदीप सरदेसाई ने शायद ही सोचा होगा कि उन्हें अपनी वर्षों पुरानी रोजी-रोटी के जुगाड़ की कहानी को ही फिर से दोहराने के लिए नरेंद्र मोदी की ओर से इतना स्पष्ट जवाब मिलेगा। रैली के दौरान ही राजदीप सरदेसाई ने अपने लिए नरेंद मोदी के पास जगह बनाई और माइक पर उनसे सवाल किया कि क्या 2002 के दंगे उनके भविष्य की राजनीति की राह में बाधक साबित होंगे?
इस पर नरेंद्र मोदी ने जो जवाब दिया था उसके स्वर आज तक राजदीप के कानों में गूँजते होंगे। नरेंद्र मोदी ने कहा – “मैं राजदीप सरदेसाई को शुभकामना देता हूँ कि वो पिछले दस साल से इसी मुद्दे के भरोसे जी रहे हैं।”
इस पर जब राजदीप ने अपने भावों को नियंत्रित करते हुए नरेंद्र मोदी को टोकने का प्रयास किया तो नरेंद्र मोदी ने उनसे कहा- “नहीं, सुनना पड़ेगा। इसी मुद्दे से आपकी रोजी-रोटी चलती है। और मैंने तो ऐसा भी सुना है कि मोदी को गाली देने वालों को राज्यसभा की सीट मिलती है, पद्म भूषण और अन्य पुरस्कार मिलते हैं। मेरी राजदीप को शुभकामना है कि आप अपना यह अभियान जारी रखिए और ऐसे मित्रों की मदद से राज्यसभा पहुँच जाइए…पद्म भूषण, पद्म विभूषण कुछ प्राप्त करिए।”
राजदीप ने फिर अपना घटिया और घिसा-पिटा सवाल जारी रखा और ‘कहीं ना कहीं’ को कई बार दोहराते हुए फिर कहा कि 2002 मोदी के राजनीतिक जीवन में रुकावट पैदा कर सकता है।
इस पर नरेंद्र मोदी ने उन्हें फिर उसी भाषा में जवाब देते हुए कहा – “राजदीप सरदेसाई आपके पास आपका न्यूज़ चैनल है। आप घंटों तक इस पर डिबेट चलाइए।” नरेंद्र मोदी तब भी आज जितने ही अपने पूरे नियंत्रण में थे, जबकि राजदीप के चेहरे और आवाज में आज जितना ही छिछोरापन!
राजदीप सरदेसाई और नरेंद्र मोदी के बीच बातचीत के इस दुर्लभ क्षण को इस लिंक पर देखा सकते हैं –


इसके बाद नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में जो कुछ घटा है, वह सब हम सबके सामने है। और राजदीप के साथ क्या कुछ घटित हो रहा है वह भी हम सब देख रहे हैं। राजदीप को आज एक बॉलीवुड की ऐसी अभिनेत्री का मीडिया मैनेजमेंट करके जीवन यापन करना पड़ रहा है, जिसके खाते में उसके द्वारा की गई फिल्मों से ज्यादा उस पर एक सफल अभिनेता की मौत से जुड़े आरोप लग चुके हैं।
यह भी वास्तविकता है कि राजदीप सरदेसाई को ना ही रिया चक्रवर्ती से और ना ही सुशांत सिंह राजपूत से ही संवेदना है। वह बस TRP की रेस में किसी तरह खुद को खबरों में बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। और उन्होंने रिया चक्रवर्ती का प्रायोजित इंटरव्यू कर साबित कर दिया है कि इसके लिए वो किसी भी हद तक गुजरने के लिए भी तैयार हैं।
राजदीप के लिए यह कोई समझौते वाली बात भी नहीं है, वास्तव में यही उनका वास्तविक नजरिया है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही मानो राजदीप सरदेसाई पर वज्रपात हो गया। इसके रुझान न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर पर उनके द्वारा मोदी समर्थकों के साथ की गई मुक्केबाजी थी। इसी बीच उन्होंने राज ठाकरे से भी इंटरव्यू के दौरान डाँट भी खाई। लेकिन यही राजदीप का स्वभाव है और यही उनकी फितरत है।
उन्हें तो अब यह महसूस होना भी बंद हो गया होगा कि वह अपने इस स्वभाव, जिसे वो पत्रकारिता कहते हैं, के कारण उन्हीं के पूर्व सहयोगी रवीश कुमार द्वारा ‘दुकानदार’ तक कह दिया गया। रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यू के बाद वह हमेशा से ही विवादित बरखा दत्त से भी फटकार खा चुके हैं। जनता उन्हें रोज ही भली-बुरी बातें सुना रही है।
यही वो राजदीप सरदेसाई भी है, जो आज भी मौका मिलते ही पीएम मोदी पर गुजरात दंगों का आरोप लगाने का अवसर नहीं गँवाते। सुप्रीम कोर्ट कब की पीएम मोदी पर लगे आरोपों के बाद उन्हें दोषमुक्त भी घोषित कर चुकी है। लेकिन राजदीप की अपनी एक निजी अदालत है ; यह अदालत सस्ती लोकप्रियता और TRP के लिए उन्हें कभी न्यायधीश तो कभी वादी और कभी प्रतिवादी बना रही है। यही वजह है कि वो एक ऐसे व्यक्ति की मौत की जाँच तक को समय की बर्बादी बताने से नहीं चूकते, जो अभी अपने अभिनय के करियर के शुरूआती दिनों में ही था।
राजदीप ने सोहराबुद्दीन केस में मांगी थी माफ़ी 
इसके अलावा, राजदीप की पत्रकारिता के खोजी संस्करणों में एक बड़ी उपलब्धि तब जुड़ी थी, जब उन्होंने मई 2007 में, सीएनएन-आईबीएन के तत्कालीन प्रधान संपादक रहते सोहराबुद्दीन मामले पर एक कार्यक्रम चलाया था, जिसका शीर्षक था ’30 मिनट – सोहराबुद्दीन, द इनसाइड स्टोरी।’
सोहराबुद्दीन केस में झूठी रिपोर्टिंग के लिए ‘पत्रकार’ राजदीप सरदेसाई को कोर्ट से बिना शर्त माफी माँगनी पड़ी थी। दरअसल, इस कार्यक्रम में राजदीप सरदेसाई द्वारा पेश की गई न्यूज रिपोर्ट में कहा गया था, “पुलिस सूत्रों का कहना है कि वंजारा और पांडियन ने हैदराबाद स्पेशल इंवेस्टिगेशन यूनिट के एसपी राजीव त्रिवेदी की मदद से बीदर में सोहराबुद्दीन और कौसर बी को पकड़ा। राजीव त्रिवेदी ने फर्जी नंबर प्लेट वाली कारें मुहैया कराईं, जिसमें सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद लाया गया और फिर एक फर्जी मुठभेड़ में मारा गया।
इस कार्यक्रम के बाद आंध्र प्रदेश स्टेट द्वारा राजदीप सरदेसाई और सीएनएन-आईबीएन के 10 अन्य पत्रकारों के खिलाफ हैदराबाद की एक अदालत में शिकायत दर्ज की गई। आईपीएस राजीव त्रिवेदी को बिना शर्त माफी जारी करते हुए राजदीप सरदेसाई ने कहा, “मैंने महसूस किया कि इसमें कोई साक्ष्य नहीं है कि स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव यूनिट के एसपी राजीव त्रिवेदी की मदद से वंजारा और पांडियन ने सोहराबुद्दीन और कौसर बी को बीदर में पकड़ा। श्री राजीव त्रिवेदी, आईपीएस के बारे में यह झूठी खबर थी।”
मोदी की कुत्ते से तुलना की थी 
इसके अलावा पीएम मोदी के लिए राजदीप की नफरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह उनके नाम की तुलना एक कुत्ते तक से कर चुके हैं। आम चुनाव प्रचार के दौरान, जब समर्थकों ने नरेंद्र मोदी के लिए ‘नमो’ और राहुल गाँधी के लिए ‘रागा’ जैसे नामकरण करने शुरू किए थे, तो राजदीप ने फरवरी 08, 2014 को एक ट्वीट में अपने पालतू कुत्ते का नाम ‘निमो’ रखा और भारतीय पीएम उम्मीदवार की कुत्ते से तुलना करते हुए भड़काऊ ट्वीट किए।

पत्रकारिता की आड़ में वर्षों से एक परिवार और उसके कार्यकर्ताओं की ‘स्वामिभक्ति’ करने वाले राजदीप अपने अन्नदाताओं के प्रति कितने निष्ठावान हैं इस बात का उदाहरण इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पी चिदंबरम सीबीआई से भाग रहे थे, तब राजदीप ने कहा था कि चिदंबरम राजनीतिक साजिश का शिकार बनाए गए हैं। चिदंबरम तिहाड़ में थे और राजदीप न्यूज़रूम में।
2010 में जब सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में अमित शाह को जेल भेजा गया था, तब राजदीप सरदेसाई ने इसे क़ानून की जीत बताया था। जबकि इसी राजदीप को चिदंबरम को जेल भेजे जाने पर उन्हें साजिश नज़र आ रही है।
आज यही राजदीप रिया चक्रवर्ती को निर्दोष साबित करने के लिए सुबह शाम सोशल मीडिया पर और बची हुई कसर अपने न्यूज़ चैनल पर पूरी करते देखे जा सकते हैं। वर्ष 1993 के मुंबई बम धमाके में दाउद इब्राहिम का नाम आने पर रिया चक्रवर्ती की ही तरह का ‘कवर-अप’ करते हुए राजदीप ने उसे निर्दोष बताने के लिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लेख तक लिखा था।
गैर-कॉन्ग्रेसी प्रधानमंत्री से नफरत और दक्षिणपंथियों का विरोध ही राजदीप सरदेसाई की पत्रकारिता का असली चेहरा है। इसके अलावा जो कुछ है, वह सब आडम्बर और प्रासंगिक बने रहने की चाह है।

जगदीप : क्या अभिनय किया सुरमा भोपाली का !

Sholay's 'Soorma Bhopali' Jagdeep turned 79 on Thursday, says ...कोई फिल्मी या मंचीय किरदार जब जिंदगी की हकीकत से एकाकार हो जाए तो समझिए कि उस कलाकार ने समय पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। वरना बतौर कामेडियन बाॅलीवुड की चार सौ फिल्मों में दसियों किरदार निभाने के बाद भी हास्य कलाकर जगदीप को वो पहचान न मिली, जो अकेले ‘शोले’ के ‘सूरमा भोपाली’ ने उन्हें बख्शीे। शायद इसलिए भी कि इस ‘सूरमा भोपाली’ ने जब जगदीप की शक्ल धारण कर ली तो उस शहर भोपाल ने उसमें अपना चेहरा देखा, जिसमें असली ‘सूरमा भोपाली’ भी हुआ करते थे। खास बात यह है कि जगदीप न तो असली बर्रूकाट भोपाली थे, न ही उनकी जबान भोपाली थी। वो उस दतिया शहर के थे, जहां ग्वालियर-चंबल की बुंदेली बोली जाती है। वहां का कल्चर और पानी भी भोपाल के तालाब के पानी भोपाली तहजीब से जुदा है। लेकिन ‘सूरमा भोपाली’ का अद्भुत कैरेक्टर लेखक सलीम-जावेद ने रचा और जगदीप ने उसे पूरी शिद्दत से निभाया। लगा कि यही हैं असली पटिएबाज भोपाली। ऐसा बेयरिंग लेना आसान नहीं होता। क्योंकि दिलीप कुमार ‘गंगा जमना’ में भोजपुरी हीरो का किरदार कुशलता से निभाते हुए भी रहते अंतत: दिलीप कुमार ही हैं। लेकिन जगदीप, सूरमा भोपाली के चरित्र में घुस जाने के बाद जगदीप नहीं रह जाते। दर्शकों को केवल बतोलेबाज ‘सूरमा’ ही याद रहता है। यही किसी कलाकार की कामयाबी है। इस अर्थ में यादगार एक्शन फिल्म शोले का हर पात्र अपने आप में एक किंवदंती है।
‘सूरमा भोपाली’ का चरित्र भी जावेद अख्तर ने भोपाल की एक चर्चित शख्सियत नाहर सिंह बघेल से प्रेरित होकर रचा था। नाहर सिंह भोपाल नगर निगम में नाकेदार हुआ करते थे। उनके एक भाई हाॅकी‍ खिलाड़ी भी थे। भोपाल के ही सेफिया काॅलेज में पढ़े नाहरसिंह अपनी खास ‘बतोलेबाजी’ (लंबी हांकने) के लिए मशहूर थे। कहते हैं कि उन्हें ‘सूरमा’ ‍का खिताब भोपाल के पूर्व नवाब ने दिया था। लेकिन जब यही असली और अपने लाजवाब हुनर से बेखबर सूरमा जब सिनेमा के पर्दे पर नमूदार हुए तो नाहरसिंह खासे खफा हुए। उन्हें और उनके परिवार को लगा कि ‘सूरमा भोपाली’ के रूप में उनका ही मजाक उड़ाया गया है। बाद में उन्होंने इसी बात को लेकर सलीम-जावेद पर कोर्ट में केस भी कर दिया था। हालांकि असली सूरमा भोपाली भी कब के दुनिया से रूखसत हो चुके हैं और उस शख्सियत को अमर कर देने वाले जगदीप ने भी अब दुनिया को अलविदा कह दिया है।
जगदीप (असली नाम सैयद इश्तियाक जाफरी तथा 3 पत्नियों और 6 बच्चों के पिता ) की निजी और फिल्मी जिंदगी की तह में जाने के बजाए इस बात पर गौर करें कि ‘शोले’ में सूरमा भोपाली के उस छोटे से रोल के फ्रेम में भी जगदीप ने मध्याप्रदेश की राजधानी भोपाल के पुराने हिस्से की अनोखी संस्कृति को उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जिससे खुद भोपाली भी जानकर अनजान थे। यहां सवाल उठता है कि ‘भोपाली संस्कृति’ और ‘भोपाली जबान’ आखिर है क्या? यह मप्र के ही दूसरे अंचलों से किस मायने में अलग है? इसका मिजाज मुख्तलिफ क्यों है?
भोपाली संस्कृति ( हालांकि अब मेट्रो कल्चर आने के बाद अब यह धीरे-धीरे सिमटती जा रही है) दरअसल एक आत्मसंतोषी और आत्ममुग्ध समाज की जीवन शैली है, जिसकी दुनिया भोपाल के चौक और जामा मस्जिद से शुरू होकर भोपाल के बड़े तालाब पर खत्म हो जाती है। पान का शौकीन बर्रूकाट भोपाली दुनिया-जहान की बातें करने के बाद भी भोपाल को ही जन्नत मानकर यहीं जीना और मरना चाहता है। यहां हिंदू और मुस्लिम कल्चर भी काफी कुछ गड्डमड्ड-सा है। उसमें अपनी अलग पहचान कायम रखते हुए भी शेयरिंग का सुंदर आग्रह है।
इससे भी अहम है भोपाली जबान। यह वो लहजा है, जो भोपाल शहर और आसपास के गांवों में बोला जाता है। गहराई से देखें तो भोपाली जबान मालवी, बुंदेली, उर्दू और हिंदी का अजीब सा काॅकटेल है। मसलन इसमें मालवी की तरह ‘ऐ’ और ‘औ’ की मात्रा नहीं होती। यानी ‘मैं’ को ‘में’, ‘रहा’ को ‘रिया’, ‘पास’ को ‘कने’ कहने का चलन है। लेकिन उसके विपरीत ‘श’ और ‘ष’ का उच्चारण साफ किया जाता है। इसमे बुंदेली की तरह ‘क्ष’ को ‘क्छ’ तथा कई बार शब्दों को अनावश्यक रूप से अनुनासिक ढंग से उच्चारित करने का रिवाज भी है, मसलन हाथ को हांथ या भूख को भूंख।
लेकिन मुस्लिम रियासत होने की वजह से भोपाली जबान में नुक्ते वाले अक्षर जैसे .क, .ख, .ग और .ज के उच्चारण साफ किए जाते हैं, जो मालवी और बुंदेली में नहीं होते। लेकिन भोपाली उर्दू भी वैसी नफीस नहीं होती, जैसी कि लखनऊ या अलीगढ़ की होती है। इसका कारण कुछ शब्दों को अनावश्यक खींच कर अथवा गले से बोला जाता है। उदाहरण के लिए ‘आ गया’ अथवा ‘चला गया’ बोलने का भोपाली अंदाज सिर्फ सुनकर ही समझा जा सकता है। दूसरी खास बात है प्राय: हर बातचीत की शुरूआत ‘को, खां’ से करना। यह ऐसा तकियाकलाम है, जो प्रत्यय भी है और उपसर्ग भी बीच-बीच में ‘मियां’ का प्रयोग भी होता है। यह खांटी भोपाली होने की पहचान भी है। तीसरी बात है आम बोलचाल में भी गालियों का प्रचुर इस्तेमाल।वो भी खास भोपाली शैली की बहुवचनीय और एक अर्थ में अ-प्राकृतिक भी। मूल गालियों का अजब संक्षिप्तीकरण भी भोपाली जबानी की खुसूसियत है ( जो यहां नहीं लिखी जा सकतीं)। अलबत्ता ये गालीयुक्त संवाद दोस्ताना गुफ्तगू में भी इतनी सहजता से चलता है कि गाली खाने वाला भी इसे बुरा नहीं मानता। बस जवाब में कोई नई या धांसू गाली आ सकती है। इसका कारण शायद भोपाल में लंबे समय तक रही पर्दा प्रथा भी है। इसीलिए पुराने भोपाल के कल्चर का अहम हिस्सा रही पटिएबाजी भी पुरूषों के कारण ही आबाद रहती थी। जाहिर है कि महिलाअों की मौजूदगी में ऐसी बेबाक गालियां देना और उन्हें यूं ‘एंज्वाय’ करना मुमकिन न था। भोपाली जबान के अपने खास मुहावरे और प्रतीक रहे हैं। मसलन ‘उस्तरे चल गए’ यानी हिंसक झगड़ा हो गया। या ‘आप खूंटे पे बेठना’ यानी खुद मुसीबत मोल लेना वगैरह। भोपाली मिजाज मूलत: मस्त मौला होने का है। भोपाली जबान भी हिंदू-मुस्लिम-जैन सब एक जैसी ही बोलते हैं। अब इसमें एक साम्प्रदायिक दरार पड़ गई है, लेकिन अलमस्ती का अभी बाकी है।
भोपाली लहजे की एक खूबी अतिशयोक्ति से लबरेज होना है। इसमें भोपाल का ताल बाॅम्बे के समंदर से बड़ा हो सकता है। अापसी गपबाजी में भोपाली एक से बढ़कर एक डींगे हांकने में कोताही नहीं करते। फिर वह सुलेमानी चाय का ठीया हो , तालाब किनारे सुकून से मछली मारना हो या फिर चौक की पटिएबाजी हो। जब संचार के साधन सीमित थे, भोपाली बतोलेबाजी ही सूचनाअों के आदान-प्रदान और मनोरंजन का बड़ा साधन हुआ करती थी।
जगदीप ने सूरमा भोपाली के रोल में इसी खांटी भोपालीपन को पूरी ताकत से निभाया था। पान रचा मुंह, डींगे हांकती लंबी जबान, गोल-मटोल आंखें और चेहरे पर अविश्वसनीय आत्मविश्वास का भाव, जिसे देखकर सामने वाला भी चौंक जाए। इसके बाद भी उसे अपने कहे पर कोई मलाल नहीं। यानी ऐसा शख्स जो भीतर से डरा हुआ है, लेकिन दिखावा जंग बहादुर का करने में गुरेज नहीं करता।

भोपाली जबान और संस्कृति पर बहुत ज्यादा लिखा नहीं गया है ( अगर हो तो अप-डेट करें)। जाने-माने भोपाली श्याम मुंशी ने जरूर चंद भोपाली शख्सियतों पर एक ‍अच्छी किताब लिखी है। लेकिन भोपाली जबान में ज्यादा कुछ शायद ही रचा गया है। खुद भोपाली भी साहित्य रचना उर्दू या हिंदी में करते रहे हैं, ठेठ भोपाली में लिखने वाले बिरले ही होंगे और अब तो शहर के विस्तार के साथ ‘भोपाली जबान’ का जलवा भी कम होता जा रहा है।

मैंने ‘नईदुनिया’ में रहते हुए गैर भोपाली ( मातृभाषा की दृष्टि से अहिंदी भी ) होने के बावजूद भोपाली लहजे में एक साप्ताहिक स्तम्भ ‘ ‘झोले बतोले’ ( ऊंची नीची हांकना) लिखना शुरू किया था। यह मैं ‘बतोलेबाज’ के नाम से लिखता था, जो काफी लोकप्रिय हुआ था। कई लोग मुझे बर्रूकाट भोपाली समझने लगे थे (‘बर्रूकाट’ से तात्पर्य उस बर्रू (बोरू) घास से है, ‍जो किसी जमाने में भोपाल में बड़े पैमाने पर पाई जाती थी और जिसकी कटाई कर पुराने भोपाल की बसाहट का विस्तार हुआ था। इसी घास से तब ‍बर्रू बना करते थे, जिसे स्याही में डुबोकर लिखने का काम किया जाता था)। उसी ‘बतोलेबाज’ पर जाने-माने रंगकर्मी स्व. अलखनंदन ने संजीदा टिप्पणी की थी ‍कि जब भी ‘भोपाली जबान’ का इतिहास लिखा जाएगा, आपके ‘बतोलेबाज’ को याद किया जाएगा। पता नहीं भोपाली जबान का इतिहास कोई लिखेगा या नहीं, लेकिन ये शहर ‘सूरमा भोपाली’ उर्फ जगदीप को खिराजे-अकीदत जरूर पेश करता रहेगा कि ‘सूरमा’ की सूरत में अपने आप में सिमटी भोपाली तहजीब और भोपाली जबान को उन्होंने पूरी दुनिया में शोहरत दिला दी।

‘आखिर हिंदुओं को कब तक ये सब झेलना पड़ेगा’: नेटफ्लिक्स की नई फिल्म Krishna & His Leela में धार्मिक भावनाओं का अपमान

कृष्णा एंड हिज लीला सीरिजआर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक 
हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित कर चर्चित होना कुछ साम्प्रदायिक तत्वों का मूलमंत्र रहा है। 80 के दशक में स्मरण कीजिए, पेंटर एम.एफ.हुसैन चर्चित हुआ, हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग्स बनाकर। इतना ही नहीं, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उसे राष्ट्रीय पुरस्कार देकर सम्मानित किया था। लेकिन हिन्दू संगठनों ने सख्ती से विरोध नहीं किया, जिस कारण कुछ यूरोपीय उत्पादनों ने अंडरवियर, जूते और चप्पलों पर हिन्दुओं देवी-देवताओं के चित्र बनाने शुरू कर दिए, जो हिन्दुओं द्वारा घोर विरोध करने पर उनको अपने उत्पाद बाजार से वापस लेने पड़े, परन्तु यही नीच काम किसी अन्य धर्म के साथ किया होता, भगवान ही जाने उत्पादकों का क्या हाल होता?
पिताश्री एम.बी.एल.निगम(सीधे हाथ पर)
महादेव ऑडिटोरियम में विशेष अतिथियों के साथ  
स्मरण हो, 70 के दशक में मक्का फिल्म्स ने हज पर आधारित "खाने-खुदा" का निर्माण किया था, जिसे वितरित(रिलीज़) करने से पूर्व मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम के सहयोग से महादेव ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में विशेष शो आयोजित कर, प्रतिष्ठित इमामों, उलेमाओं और विद्वानों से उनकी प्रतिक्रिया लेने उपरांत ही सिनेमा हॉलों पर प्रदर्शित किया गया था, लेकिन जब फिल्म हॉउसफुल में अपने आठवें सप्ताह में ही थी, कि मेरठ, उत्तर प्रदेश से विरोधी स्वर मुखरित होते ही, फिल्म का प्रदर्शन रोक दिया गया, जो आज तक पुनः प्रदर्शित नहीं हुई। उनका केवल इतना ही कहना था कि फिल्म के पोस्टर और फिल्म घिसने पर इसकी कटिंग कूड़े अथवा पैरों में आएगी, जिस कारण हमारे काबा का अपमान होगा। जबकि उसके बाद कई फिल्में आयीं, जिनमें काबा को फिल्माया गया है।  
लेकिन अब ऑनलाइन सीरीज के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं पर घृणित सामग्री प्रसारित करने का कारोबार धड़ल्ले से जारी है। ताजा कारनामा नेटफ्लिक्स (Netflix) ने अपनी नई सीरीज कृष्णा एंड हिज लीला (Krishna & His Leela) में दर्शाया है।
ओटीटी प्लैटफॉर्म नेटफ्लिक्स एक बार फिर लोगों के निशाने पर है. ट्विटर पर तेजी से #BoycottNetflix ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। कृष्ण एंड हिज़ लीला एक तेलुगु फ़िल्म है जिसे रविकांत पेरेपु ने डायरेक्ट किया है। लोगों का कहना है कि भगवान कृष्ण का अपमान किया गया है। इस फिल्म से धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचती है
इस फिल्म पर हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप है
आजकल जहां धर्म से जुड़ी छोटी से छोटी बातों को भी मुद्दा बना दिया जाता है। ऐसे में नेटफ्लिक्स का इस फिल्म को रिलीज करना बड़ा किसी प्रमोशन से कम नहीं लगता। आखिर विवाद और फिल्मों का लंबा नाता रहा है। खैर, अब फिल्म को लेकर विवाद काफी बढ़ चुका है
आरोप है कि फ़िल्म में हिंदुओं के भगवान श्री कृष्ण का मज़ाक उड़ाया गया है। उनके नाम वाले एक किरदार को वुमेनाइज़र दिखाया गया है। उनका कहना ये भी है कि नेटफ्लिक्स सेक्सुअल कंटेंट दिखाकर हमारी संस्कृति और धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है। वहीं, फिल्म में कृष्णा की एक्स गर्लफ्रेंड का नाम राधा है. इस बात को देखते हुए लोगों का गुस्सा भड़क गया है
कृष्ण एंड हिज़ लीला एक तेलुगु फ़िल्म है, जिसे रविकांत पेरेपु ने डायरेक्ट किया है। 
इस सीरीज में एक कृष्णा नाम के लड़के के कई लड़कियों से शारीरिक संबंध होते है। इनमें से एक लडक़ी का नाम राधा भी होता है

 
अब इसी प्लॉट को आधार बनाकर सोशल मीडिया पर इस सीरिज की आलोचना हो रही है। इसे बॉयकॉट करने की माँग की जा रही है। लोगो का पूछना है कि आखिर क्यों हिंदू देवी-देवताओं को लेकर अभद्रता के मामले बढ़ते जा रहे हैं? क्यों हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया जा रहा है? क्या इसका कारण नेटफ्लिक्स का हिंदूफोबिक होना है?
फ़िल्म में सिद्धू जोनलगड्डा और श्रद्धा साईंनाथ मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह कृष्ण नाम के एक युवक की कहानी है, जो प्रेम में उलझा है। फ़िल्म में दो फीमेल किरदारों के नाम सत्यभामा और राधा हैं
इस फिल्म के प्रोड्यूसरों में एक राणा दग्गुबाती भी हैं। उन्हें भी लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ रहा है।वहीं, ट्विटर पर मीम्स भी खूब वायरल हो रहे हैं। मजाक उड़ाने वाले लोगों के हिसाब से नेटफ्लिक्स का विवाद में फंसना आम बात है
हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, राधा-कृष्ण को हमारे समाज में प्रेम का प्रतीक माना जाता है और भगवान कृष्ण की प्रत्येक लीला भी कोई न कोई जीवन संदेश देती है है। बावजूद इन सभी पहलुओं के जानबूझकर ऐसी सामग्री दर्शकों के बीच लाना इस सीरीज के निर्माताओं की मंशा पर स्वत: ही सवाल उठाता है।
इस सीरीज के अलावा इस समय सोशल मीडिया पर नेटफ्लिक्स और अनुष्का शर्मा दोनों को हिंदूफोबिक सामग्री दर्शाने के लिए नपसंद किया जा रहा है। एक यूजर इन सीरीज के पोस्टर और कुछ क्लिप शेयर करते हुए पूछती हैं कि आखिर हिंदुओं को कब तक ये सब झेलना पड़ेगा? अगर ये सब किसी और मजहब में हुआ होता तो अब तक मूवी को बैन कराने के लिए हल्ला मच गया होता।
पाताललोक को लेकर भी हुआ था विवाद 
अभी इससे पहले अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई वेब सीरीज पाताल लोक भी हिंदू घृणित सामग्री दर्शाने के कारण काफी विवादों का हिस्सा बनी थी।
इस सीरीज के आने के बाद न केवल हिंदूवादी संगठनों ने इसपर अपना आक्रोश दिखाया था, बल्कि सिखों व भाजपा नेता ने भी आरोप लगाया था कि इस सीरीज में उनकी छवि को बिगाड़ने का प्रयास हुआ है। इस फिल्म को लेकर अभिनेत्री अनुष्का शर्मा इतना ज्यादा फँस गईं थी कि कोर्ट ने भी उनसे पिछले दिनों नोटिस भेजकर जवाब माँगा था। 

टेरर फंडिंग और भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल बॉलीवुड का पाकिस्तानी ‘इवेंट मैनेजर’ रेहान सिद्दीकी बैन

रेहान सिद्दीक़ी
रेहान सिद्दीकी 
पाकिस्तानी मूल के इवेंट मैनेजर रेहान सिद्दीकी पर भारत सरकार ने बैन लगा दिया है। वह​ बॉलीवुड कलाकारों का विदेश में शो आयोजित करवाता है।
रेहान पर टेरर फंडिंग का आरोप है। भारत विरोधी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता पाई गई है। 17 फरवरी को शिवसेना सांसद राहुल शेवाले ने इस मसले पर प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था।
इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया है कि इस मुद्दे की जाँच और ह्यूस्टन के कांसुलेट जनरल की सलाह पर रेहान सिद्दीकी, राकेश कौशल और दर्शन मेहता को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि वॉशिंगटन डीसी में भारत के दूतावास और ह्यूस्टन में भारत के कांसुलेट जनरल से भी अनुरोध किया गया है कि वे प्रसिद्ध लोगों, कल्चरल बॉडीज, बॉलीवुड से संबद्ध’ स्थानीय संस्थाओं से भारतीय एक्टर और कलाकारों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों दूर रहने का सन्देश दे।
कौन है रेहान सिद्दीकी?
यह मुद्दा इस साल की शुरुआत में सामने आया जब रेहान सिद्दीकी का संबंध बॉलीवुड के इवेंट्स का आयोजन करने के साथ भारत विरोधी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार करने और कश्मीर में आतंक बढ़ाने के लिए उसके द्वारा किए जा रहे फंडिंग का पता चला।
फरवरी में रेहान सिद्दीकी बॉलीवुड सेलेब्रिटी एवेंट्स के जरिये मिलने वाले राजस्व से कश्मीर में भारत विरोधी तत्वों को कथित रूप से सहायता करने को लेकर भारतीय अधिकारियों के रडार पर था।
रेहान सिद्दीक़ी पाकिस्तानी है। वह ह्यूस्टन में एक रेडियो चैनल का मालिक है। वह रेडियो चैनल का दुरुपयोग कर नियमित रूप से कश्मीर और भारत में आतंकवादी गतिविधियों की जासूसी करता है और पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देता है। रेहान सिद्दीकी के पास संगीत और रेडियो उद्योग में व्यापक अनुभव था। इसके साथ दक्षिण एशिया, विशेषकर बॉलीवुड के सितारों के साथ रेहान सिद्दीकी ने 400 से भी ज़्यादा कॉन्सर्ट्स का सफलतापूर्वक आयोजन कराया है।
ह्यूस्टन में एक भारतीय सदस्य ने बताया कि “वह एक रेडियो चैनल का मालिक है और भारतीय कलाकारों को ह्यूस्टन आमंत्रित कर बॉलीवुड सिंगिंग इवेंट्स का आयोजन करता है। अपने रेडियो चैनल का इस्तेमाल वो भारत विरोधी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने के लिए करता है”।
संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने वाले भारतीयों ने सिद्दीकी का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने भारत सरकार से आईएसआई (ISI) एजेंट द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में बॉलीवुड हस्तियों को भाग लेने से मना करने का आग्रह भी किया था। उन्होंने माँग की है कि सरकार को बॉलीवुड हस्तियों को शो में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा है कि सिद्दीकी और अन्य पाकिस्तानी नागरिक सीएए को लेकर ह्यूस्टन में इसका विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वे ह्यूस्टन के सिख समुदाय में खालिस्तानी विचारधारा के लिए हमदर्दी पैदा करने का काम भी करते हैं। सिद्दीकी के रेडियो चैनल पर पुलवामा हमले और उसके बाद हुए बालाकोट हमले के मद्देनजर भारत विरोधी प्रचार चलाने का भी आरोप है।
2019 में, FWICE ने गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ को पाकिस्तानी रेहान सिद्दीकी द्वारा प्रचारित शो में नहीं परफॉर्म करने के लिए कहा गया था। इसके बाद दोसांझ ने ट्विटर पर एक पोस्ट डाल कर यह जानकारी दी थी कि वह शो और किसी पाकिस्तानी नागरिक के बीच किसी भी लिंक से इनकार करते हुए अपने अमेरिकी दौरे को स्थगित कर देंगे। उन्होंने संदेश दिया, “मैं अपने देश से प्यार करता हूँ और राष्ट्र के हित के लिए हमेशा खड़ा रहूँगा।”
वहीं फरवरी 2020 में, बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने भी रेहान सिद्दीकी के खिलाफ लगाए गए आतंकी फंडिंग के आरोपों की वजह से अपने कार्यक्रम को रद्द कर दिया था।

मशहूर कोरियाग्राफर सरोज खान का निधन

सरोज खानबॉलीवुड की मशहूर कोरियाग्राफर सरोज खान का शुक्रवार (3 जुलाई, 2020) देर रात निधन हो गया है। वह 71 साल की थीं। सरोज खान को साँस लेने में तकलीफ थी। जिसके चलते 17 जून को ही उन्हें मुंबई के गुरु नानक अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। जहाँ आज रात 1.52 बजे दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। अस्पताल में भर्ती होने के बाद उनका कोविड 19 टेस्ट भी हुआ था, जोकि निगेटिव आया था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सरोज खान का अंतिम संस्कार शुक्रवार को मुंबई स्थित चारकोप कब्रिस्तान में किया जाएगा। कोरोना वायरस काल में सरोज खान का निधन फिल्मी सितारों की दुनिया के लिए एक और झटका है। सरोज खान के परिवार से जुड़े एक सूत्र ने दावा किया था कि सरोज के स्वास्थ्य धीरे-धीरे सुधार हो रहा था। जल्द ही उन्हें डिस्चार्ज करने की भी बात कहीं गई थी। लेकिन अचानक देर रात उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका।


चार दशक के लंबे करियर में सरोज खान को 2,000 से ज्यादा गानों की कोरियोग्राफी करने का श्रेय हासिल है। सरोज खान को अपनी कोरियोग्राफी के चलते 3 बार नेशनल अवॉर्ड मिल चुका था। जिसमें फिल्म देवदास का डोला-रे-डोला, माधुरी दीक्षित की फिल्म तेजाब के यादगार आइटम सॉन्ग एक-दो-तीन और साल 2007 में आई फिल्म जब वी मेट के सॉन्ग ये इश्क… गाने शामिल हैं।
सरोज खान काफ़ी समय से फ़िल्मी दुनिया से अलग रहीं मगर अभी हाल ही में उन्होंने मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झाँसी और कलंक में एक-एक गाना कोरियोग्राफ किया था। करण जौहर की फिल्म कलंक में तबाह हो गए गाने को कोरियोग्राफ किया था। जोकि उनका अंतिम गाना है। इस गाने में माधुरी दीक्षित नजर आई थीं। यह फिल्म 2019 में रिलीज हुई थी।
सरोज खान ने महज 3 साल की उम्र से से ही नृत्य करना शुरू कर दिया था। करियर की शुरुआत में वो बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम करती थी। उन्हें 1974 में ‘गीता मेरा नाम’ के साथ एक स्वतंत्र कोरियोग्राफर के रूप में पहला ब्रेक मिला। सरोज खान का असली नाम निर्मला नागपाल था। परिवार में उनके पति बी. सोहनलाल है और एक बेटा और दो बेटियाँ थी। जिनका नाम हामिद खान, हिना खान और सुकना खान हैं।
सरोज खान ने 1986 से लेकर 2019 तक हजारों की संख्या में बॉलीवुड फिल्मों में गानों को कोरियोग्राफ किया था, जिसमें ‘निंबुड़ा-निंबुड़ा’, ‘एक दो तीन’, ‘डोला रे डोला’, ‘काटे नहीं कटते’, ‘हवा-हवाई’, ‘ना जाने कहाँ से आई है’, ‘दिल धक-धक करने लगा’, ‘हमको आजकल है इंतजार’, ‘चोली के पीछे’ जैसे कई सुपरहिट और आइकोनिक गाने शामिल हैं।
सरोज खान ने ‘तेजाब’, ‘खलनायक’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘चालबाज’, ‘नगीना’, ‘चाँदनी’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘देवदास’ जैसी कई हिट फिल्मों के गानों को कोरियोग्राफ किया था। फ़िल्मी सेलेब्रिटीज़ के साथ-साथ आम जनता भी उनसे डांस सीखने के लिए हमेशा बेताब रहती थी।

हॉटनेस से भरपूर शर्लिन चोपड़ा

कामसूत्र मूवी से लेकर प्लेबॉय मैगजीन के लिए न्यूज फोटोशूट कराने को लेकर चर्चा में रहने वाली एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा हमेशा ही अपने हॉटनेस से इंटरनेट पर आग लगाती रहती है. शर्लिन इतनी बोल्ड है कि उनकी सेक्सी फोटो वीडियो देख लोगों के पसीने छूट जाते हैं.शर्लिन सोशल मीडिया पर अपने इसी अंदाज के लिए फेमस है और फैंस भी उनके हॉट वीडियो को काफी पसंद करते हैं.
सोशल मीडिया पर अश्लीलता परोसने को लेकर शर्लिन सबसे आगे हैं. इस मामले में वह सभी को मात देती है.यही कारण है कि आज लोग उन्हें सोशल मीडिया सेंसशन के रूप में पहचान मिल चुकी है. क्योंकि शर्लिन अपनी हर फोटो वीडियो से सोशल मीडिया पर सनसनी मचा देती है और उनके पोस्ट तेजी से इंचरनेट पर वायरल होने लगते हैं. अपनी कातिलाना अंदाओं से लोगों के पसीने छुड़ाने वाली शर्लिन ने इस बार भी कुछ ऐसा किया कि, आप उनकी सेक्सी फिगर की तारीफ करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे.
शर्लिन चोपड़ा के फोटो वीडियो सोशल मीडिया पर काफी फेमस हैं. लेकिन वह खुद भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है. इंस्टाग्राम से लेकर यूट्यूब तक वह अपनी हॉट फोटो वीडियो फैंस के साथ शेयर करती रहती है. लेकिन इसके साथ ही उनका खुद का एप भी ,जिसमें वह सेक्सी वीडियो पोस्ट किया करती है. बात करें शर्लिन के इंस्टाग्राम की तो उनका इंस्टाग्राम अश्लील और न्यूड फोटो वीडियो से भरा पड़ा है.


हैदराबाद में जन्मी शर्लिन चोपड़ा मोना चोपड़ा के नाम से भी जानी जाती है. 36 साल की शर्लिन आज काफी फेमस है लेकिन उन्हें पहचान अंग प्रदर्शन से हासिल हुई. उन्होंने भले ही एक एक्ट्रेस के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी. लेकिन दर्शकों को उनकी एक्टिंग से ज्यादा उनके हॉट बोल्ड सीन पसंद आए. टाइमपास से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाली शर्लिन आज बोल्डनेस के लिए जानी जाती हैं.