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मैं हिंदुओं को सबक सिखाना चाहता था, दंगों से पहले तुड़वा दिए थे सारे कैमरे: ताहिर हुसैन

ताहिर हुसैन, दिल्ली दंगादिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन ने न्यायिक हिरासत के दौरान पुलिस के समक्ष अपना बयान दर्ज कराया था, जिसमें उसने जानकारी दी है कि वो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अमरोहा का निवासी है। उसके तीन और भाई हैं, जिनके नाम हैं- नजर अली, शाह आलम और शाने आलम। 8वीं तक पढ़ा ताहिर हुसैन 1993 में अपने पिता के साथ दिल्ली आया था और दोनों पिता-पुत्र बढ़ई का काम करते थे।
शुरुआत में उसने अपने ही मकान में फर्नीचर कि फैक्ट्री खोली थी, जिसके माध्यम से वो विभिन्न कंपनियों के शोरूम तैयार करता था। बिजनेस बढ़ने के साथ उसने ग्रेटर नोएडा, बेंगलुरू और कोलकाता में भी अपनी फैक्ट्री के ब्रांच खोले। साथ ही उसने 2012-13 में दिल्ली के खजूरी खास में अपने लिए मकान खरीदा और वहाँ फैक्ट्री भी स्थापित की। उसी इमारत मे वो रहता भी था और साथ ही उसका दफ्तर भी उसी में था।
अपने बयान में ताहिर हुसैन ने बताया है कि वो आम आदमी पार्टी से निगम पार्षद चुना गया लेकिन पार्टी ने अभी उसे निलंबित कर रखा है। उसने बड़ा खुलासा किया है कि वो CAA के समर्थकों को सबक सिखाना चाहता था। उसके कबूलनामे के अनुसार, उसने कहा कि जिस तरह से CAA के विरोध मे दंगे हो रहे थे। इसके समर्थन मे भी धरनों कि तैयारी थी। दंगों कि साजिश ने बारे में उसने बताया है:
 चार्जशीट का एक भाग
“मेरा घर इलाके में सबसे ऊँचा था। CAA समर्थकों को सबक सिखाने के लिए मैंने अपने सहयोगियों के साथ पहले ही साजिश रच ली थी। घर में कन्स्ट्रक्शन का काम भी चल रहा था, ऐसे में ईंट-पत्थर इत्यादि समान पहले ही जमा कर लिए गए थे। मेरी लाइसेंसी पिस्टल थाने में जमा थी, जिसे मैं दंगों के 2-3 दिन पहली ही छुड़ा कर लाया था। पुलिस के हाथ सबूत न लगे, इसीलिए मैंने पहले ही क्षेत्र के सारे सरकारी व प्राइवेट CCTV कैमरे तोड़वा दिए थे। मैंने अपने समर्थकों को हर तरीके से तैयार रहने कह दिया था।”
ताहिर का कबूलनामा 
ताहिर हुसैन ने पुलिस को बताया कि जब वो फरवरी 24, 2020 को अपने भाइयों एवं समर्थकों संग अपने दफ्तर मे बैठा था, तभी माहौल तनावपूर्ण हो गया और भीड़’ अल्लाहु अकबर’ व ‘मारो काफिरों को’ जैसे नारे लगाते हुए लाठी-डंडे से मुस्तैद थी। उसके समर्थकों ने ताहिर को बताया कि ‘हिन्दू लोग मुसलमानों के घरों मे आग लगा रहे हैं’, जिसके बाद उसे गुस्सा आ गया और उसने अपने साथियों से कहा कि अब हिंदुओं को सबक सिखाने का वक्त आ गया है।
यानी उसने ‘काफिरों को मारने’ और ‘हिन्दुओं को सबक सिखाने’ के लिए ये सब किया। आपको पता है कि अपने बयान के अंत में ताहिर हुसैन ने क्या कहा- ‘मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए।‘ ऑपइंडिया ने आईबी में कार्यरत रहे अंकित तिवारी हत्याकांड में भी ताहिर हुसैन की संलिप्तता को लेकर कई लेख और ख़बरें प्रकाशित की थी। अब चार्जशीट के बाद इसकी एक के बाद एक परत खुल रही है।
ताहिर हुसैन ने जानकारी दी कि उसने मुस्लिम भीड़ को अपनी छत पर खड़े होकर गोलीबारी और पत्थरबाजी करने को कहा क्योंकि उसे लगता था कि उसका घर ऊँचा है तो वो हिंदुओं को आसानी से निशाना बना सकता है। उसने कबूल किया है कि भीड़ पेट्रोल बम लेकर आई थी। उसने बताया कि उसके भाई शाह आलम ने समर्थकों संग मिल कर महक सिंह की पार्किंग में आग लगाई थी।
‘द वायर’ ने की थी ताहिर हुसैन को बचाने की कोशिश
ताहिर हुसैन ने ये भी बताया है कि कैसे उसने सबूत अपने पक्ष मे बनाने के लिए चालाकियाँ कीं। उसने चाँदबाग पुलिस स्टेशन और PCR को अपने मोबाईल से कई कॉल्स किए। बकौल ताहिर, उसे पता था कि उसके बुलाने के बावजूद पुलिस नहीं आएगी क्योंकि मुस्लिम भीड़ इतनी मुस्तैद थी कि वो भारी से भारी पुलिस बल को भी मार के भगा सकती थी। उसने करावल नगर में हिंदुओं के दुकानों को आग के हवाले करने की बात भी कबूल की है। उसने कहा कि चारों ओर धुआँ ही धुआँ था।
उसने बताया कि शाम को जब पुलिस आई थी तो हिन्दू समुदाय के लोग ‘दिल्ली पुलिस ज़िन्दाबाद’ के नारे लगा रही थी और मुस्लिम लोग ‘अल्लाहु अकबर’ बोल रहे थे। इस दौरान ताहिर हुसैन जाकिर नगर मे अपने परिचित तारिक मोइन रिजवी के घर मे छिपा हुआ था। फिर वो मूँगा नगर में इलियास के घर में छिपा। वो इस दौरान भीड़ को फिर से भड़काने की साजिश रचता रहा। अगले दिन भी वो अपने घर गया लेकिन अर्धसैनिक बलों के जवानों को देख वापस लौट गया।
ताहिर हुसैन ने स्वीकार किया है कि चाँदबाग पुलिस के पास फरवरी 25, 2020 को उसके इशारे पर ही हजारों मुसलमानों की भीड़ जमा हुई थी। इसके बाद हिंदुओं की दुकानों को आग के हवाले किया जाने लगा, लूटा जाने लगा और पत्थरबाजी चालू हो गई। ताहिर ने कहा कि इस दौरान वो बार-बार पुलिस को फोन कर के अपने बचने की भूमिका भी तैयार कर रहा था। पूरे कांड को अंजाम देने के बाद वो छिपता फिरता रहा।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली और उत्तर प्रदेश में बेगुनाहों के खून की होली खेलने वालों के साथ सख्ती से पेश आन...
चार्जशीट में पुलिस ने ताहिर के यहाँ काम करने वाले दो कर्मचारियों को मुख्य गवाह बनाया है। इन दोनों की पहचान गिरिष पाल और राहुल कसाना के रूप में हुई है। दोनों ने पुलिस को बताया है कि वे 24 फरवरी को खजूरी खास इलाके में हुसैन के कार्यालय में ही मौजूद थे। इन्होंने पुलिस को दिए बयान में बताया कि आखिर दंगों के दिन ताहिर हुसैन क्या कर रहा था और उस दिन उन लोगों ने क्या-क्या देखा।

RTI से खुलासा : दिल्ली दंगों के दौरान 13 धार्मिक स्थलों को बनाया गया था निशाना

दिल्ली दंगाउत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी माह के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिन्दू विरोधी हिंसा में दंगाइयों ने 13 धार्मिक स्थलों को अपना निशाना बनाते हुए उनको नुकसान पहुँचाया था। दिल्ली पुलिस ने इन मामलों में 13 प्राथमिकी दर्ज करते हुए 33 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसका खुलासा दिल्ली पुलिस द्वारा RTI के तहत दिए जवाब से हुआ है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त एवं जन सूचना अधिकारी एम.ए रिज़वी के हस्ताक्षर से जारी जवाब में बताया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान एक समुदाय विशेष के 11 धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। पुलिस ने इन घटनाओं के संबंध में 11 प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं और 31 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से सात को जमानत मिल गई है और चार मामलों में आरोप-पत्र दाखिल कर दिए गए हैं।

दूसरे आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि अन्य समुदाय विशेष के दो धर्मस्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। इस बाबत दो प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस संबंध में गिरफ्तार किसी भी आरोपी को ज़मानत नहीं मिली है, जबकि एक मामले में आरोप-पत्र दायर कर दिया गया है।
अन्य आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि जाफराबाद, कर्दमपुरी और चाँदबाग में सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और दंगों के सिलसिले में ज्योतिनगर, दयालपुर और जाफराबाद थानों में कुल 190 प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और 357 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी नहीं है कि कितने गिरफ्तार लोगों को जमानत पर छोड़ा गया है, लेकिन पुलिस का कहना है कि 25 मामलों में आरोप-पत्र दायर कर दिए गए हैं।

आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि 23 फरवरी को मौजपुर चौक पर सीएए के समर्थन में हुए प्रदर्शन के सिलसिले में वेलकम थाने में तीन प्राथमिकियाँ दर्ज की गईं और 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से सात को जमानत मिल गई है।
वकील यूनुफ नकी द्वारा RTI के तहत माँगी गई के जानकारी में दिल्ली पुलिस से दंगों के दौरान दर्ज की गई प्राथमिकियों की प्रति और गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम भी माँगे थे। लेकिन पुलिस ने किसी भी आरोपी का नाम, प्राथमिकियों की प्रति और दंगाइयों द्वारा बनाए गए धार्मिक स्थलों का पता देने से साफ इनकार कर दिया। पुलिस ने इस मामले के पीछे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ होना बताया और इसके लिए आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा आठ (1) (ए,जी,जे और एच) का हवाला दिया है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुए हिंदू विरोधी दंगों में कुल 53 लोगों की मौत हो गई थी और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं संसद में दंगों पर चर्चा के दौरान मार्च महीने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया था कि हिंसा के दौरान 371 दुकानों और 142 घरों को आग लगाई गई थी। शाह के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने दंगों के संबंध में 700 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की है।
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उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को लेकर मीडिया का एक धड़ा शुरुआत से ही इन कोशिशों में जुटा हुआ है कि ...
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उत्तर प्रदेश के कुख्यात पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने एक बार फिर से अपनी गंदी जुबान का परिचय देते हुए हिन्दू देवी-देव...

डीएस बिंद्रा के ‘लंगर’ से क्विंट की मोहब्बतें

द क्विंट, डीएस बिंद्रा
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को लेकर मीडिया का एक धड़ा शुरुआत से ही इन कोशिशों में जुटा हुआ है कि किसी तरह इसे मुस्लिम विरोधी दंगा साबित किया जाए। इसी क्रम में मीडिया गिरोह न केवल मुस्लिम समुदाय के अपराधों को छिपाने का प्रयास कर रहा है, बल्कि दंगों को उकसाने वाले लोगों को निर्दोष साबित करने की भी कोशिश कर रहा है।
ताजा कारनामा द क्विंट ने किया है। द क्विंट ने अपने लेख के जरिए डीएस बिंद्रा नाम के उस आरोपित को बचाने का प्रयास किया है, जिस पर बकायदा चार्जशीट में आरोप लगा है कि उसने उन दंगों को भड़काने का काम किया, जिसमें कॉन्स्टेबल रतनलाल की जान गई थी।
दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की चार्जशीट पर अपनी हालिया एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में हमने आपको बताया था कि हलफनामे में क्या आरोप लगाए गए हैं। चार्जशीट में लिखा था कि षड्यंत्रकारी ये बात पहले से जानते थे कि दंगे हो सकते हैं। इसलिए उन्होंने सभी प्रदर्शनकारियों को हथियार से लैस रहने को कहा था।
चार्जशीट में कहा गया, “23 फरवरी को संयोजकों, षड्यंत्रकारियों, दंगाइयों की चांद बाग में एक बैठक हुई। इस बैठक में उन्हें लोहे की रॉड, डंडे, पेट्रोल बम आदि के साथ तैयार रहने को कहा गया। अगले दिन 24 तारीख को 1 बजे, प्लान के मुताबिक दंगे शुरू हुए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर हमला किया। कई पुलिस वाले उस हमले में घायल हुए। कॉन्स्टेबल रतनलाल इसमें मारे गए।”
दिल्ली के हालातों को देखते हुए घटना से पहले बीट अधिकारियों को नियमित रूप से इलाके में तैनात किया गया था, ताकि कानून-व्यवस्था को सुनिश्चित किया जा सके। रतनलाल की हत्या के बाद, इन्हीं दो बीट अधिकारियों से पूछताछ हुई और उनके बयानों से तथ्यों का पता लगाया गया। उन्होंने खुलासा किया कि सलीम खान, सलीम मुन्ना, डीएस बिंद्रा, सुलेमान सिद्दीकी, अयूब, अतहर, शादाब, उपासना, रविशंद अन्य लोग आयोजक थे।
The Quint article shielding DS Bindraलेकिन, ऑपइंडिया के रिपोर्ट करने के बाद, द क्विंट ने दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा दायर चार्जशीट पर न केवल रिपोर्ट की, बल्कि डीएस बिंद्रा को बेक़सूर साबित करने की कोशिश की।
क्विंट ने अपने आर्टिकल की हेडलाइन दी- “क्या लंगर लगाना जुर्म है?: डीएस बिंद्रा का नाम दंगों से जोड़ा जा रहा है।” अपने इस लेख में द क्विंट ने केवल उन्हीं लोगों की बात पेश की है जिन्होंने डीएस बिंद्रा की भूमिका केवल लंगर बाँटने या फिर प्रोटेस्ट आयोजित करने तक बताई। लेकिन यहाँ उन बिंदुओं को बिलकुल दरकिनार कर दिया गया जिसके कारण डीएस बिंद्रा का नाम चार्जशीट में है।
उदहारण के लिए लेख में नज्म उल हसन का बयान जोड़ा गया। उसने बताया कि डीएस बिंद्रा ने स्थानीय लोगों से सीएए के ख़िलाफ प्रदर्शन का अनुरोध किया था और कहा, “मैं लंगर और मेडिकल कैंप लगाऊँगा। पूरा सिख समुदाय आपके साथ है। अगर आप लोग आगे नहीं आओगे तो आप लोगों की किस्मत भी वैसी ही हो जाएगी जैसे 1984 में सिखों की हुई थी।”
दिलचस्प बात ये है कि इस लेख में द क्विंट ने ऑपइंडिया का नाम भी शामिल किया और कहा कि हमने अपनी रिपोर्ट में केवल डीएस बिंद्रा पर लगे आरोपों के बारे में बात की है। साथ ही यह बताया है कि बिंद्रा AIMIM का सदस्य है, जबकि बिंद्रा के अनुसार तो उनका कनेक्शन किसी राजनैतिक पार्टी से है ही नहीं।
ऑपइंडिया ने जिस चार्जशीट के संबंध में रिपोर्ट की थी वह 1100 पन्नों की है और इसका एक हिस्सा ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किया गया था। शायद ये बात तो द क्विंट के पत्रकार भी जानते ही होंगे कि किसी भी लंबी चार्जशीट के बारे में एक बार में रिपोर्ट करना संभव नहीं है। हाँ, ये बात और है कि अगर वह हिस्सों में बँटी है, तो उसे आसानी से समझा जा सकता है।
क्विंट ने डीएस बिंद्रा की टिप्पणी को आपने आर्टिकल में जोड़ा। इसमें बिंद्रा ने आरोप लगाया था कि ऑपइंडिया ने उनसे बात करने की कोशिश नहीं की। जबकि आरोपों पर सफाई देना उनका अधिकार है। यहाँ बता दें कि हमारी रिपोर्ट दिल्ली क्राइम ब्रांच की एफआईआर पर थी। अगर, बिंद्रा अपने आप को डिफेंड करना चाहते ही हैं तो उन्हें पुलिस के सामने या फिर कोर्ट के सामने खुद के बचाव में बोलना चाहिए। चार्जशीट पर रिपोर्ट करते हुए हमें क्या आवश्यकता कि हम आरोपित से उसका पक्ष जानें। हमने केवल वह बातें लिखीं थी, जो चार्जशीट में कही गई।
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ताहिर का दंगों में नाम आने पर केजरीवाल ने अपना पल्ला झाड़ लिया उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों से संबंधित दो और ....
द क्विंट की ऐसी हरकत ज्यादा हैरान करने वाली नहीं है। लेकिन इन प्रयासों में यह गौर करने वाली बात जरूर है कि पूरे वामपंथी मीडिया ने क्यों चार्जशीट पर रिपोर्ट करते हुए इस बात का जिक्र तक नहीं किया कि इसमें डीएस बिंद्रा का नाम भी शामिल है।
प्रदर्शन के दौरान लंबे समय से डीएस बिंद्रा की तारीफों के पुलिंदे मीडिया में बाँधे जा रहे थे। मगर, चार्जशीट से संबंधित सभी जानकारी होने के बाद भी इस पूरे लेफ्ट इकोसिस्टम ने अपने पाठकों के सामने सत्य बताने की कोशिश नहीं की। इसका मतलब साफ है कि वह केवल दंगाइयों को, षड्यंत्रकारियों को बचाने का प्रयास कर रहे।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : ताहिर हुसैन ने मजहब का हवाला दे भीड़ को ‘काफिरों’ की हत्या के लिए उकसाया

ताहिर हुसैन
ताहिर का दंगों में नाम आने पर केजरीवाल ने अपना पल्ला झाड़ लिया 
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों से संबंधित दो और मामलों में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने शुक्रवार (जून 19, 2020) को अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किए। दोनों ही आरोप-पत्रों में आम आदमी पार्टी (AAP) के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन को मुख्य आरोपित बनाया गया है।
पहला चार्जशीट चाँदबाग के एक पार्किंग लॉट में आगजनी और दंगे से संबंधित है। इसमें कम से कम सौ वाहनों में आग लगा दी गई थी। दूसरा मामला करावल नगर इलाके में एक गोदाम में लूटपाट और आगजनी से संबंधित है। दोनों ही घटनाओं में ताहिर हुसैन को मास्टरमाइंड बताया गया है।
आरोप पत्र चश्मदीदों के बयान के आधार पर तैयार किया गया है। साथ ही इलाके के सीसीटीवी फुटेज और आरोपितों के फोन कॉल रिकार्ड को भी आधार बनाया गया है। पुलिस के अनुसार चश्मदीदों का कहना है कि ताहिर हुसैन घटना वाले दोनों दिनों में 40-50 गुंडों की भीड़ का नेतृत्व कर रहा था।
दिल्ली पुलिस ने गवाहों के बयान का हवाला देते हुए चार्जशीट में बताया कि ताहिर ने भीड़ को मजहब के नाम पर उकसाया। हुसैन ने अपनी बिल्डिंग भीड़ के हवाले कर दिया और उनसे ‘काफिरों’ को मारने के लिए कहा।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि दोनों आरोप-पत्रों में ताहिर हुसैन, उसके छोटे भाई शाह आलम और कम से कम दस अन्य लोगों पर दंगा करने, घातक हथियारों से लैस होने, आग या विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल करने, गैर कानूनी सभाएँ करने और आपराधिक षड्यंत्र का आरोप लगाया गया है।
दोनों घटनाएँ 24 फरवरी को हुईं और 27 फरवरी को दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं। पुलिस की ओर से कोर्ट में दाखिल पहली चार्जशीट के मुताबिक ताहिर हुसैन ने एक भीड़ का नेतृत्व करते हुए करावल नगर स्थित एक गोदाम को लूटा और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। गोदाम के मालिक का कहना था कि इस आगजनी में उसके कई जरूरी कागजात जलकर राख हो गए और उसे करीब 25-30 लाख रुपए का नुकसान हुआ। बाद में ताहिर हुसैन और पाँच अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया।
दूसरे चार्जशीट में उल्लेख किया गया है कि हुसैन और उसके छोटे भाई शाह आलम आठ अन्य लोगों के साथ प्रदीप पार्किंग लॉट के पास पहुँचे और उसका शटर तोड़ दिया। इसके बाद वे पहली मंजिल पर पहुँच गए और वहाँ मौजूद लोगों के पैसे और कीमती सामान लूट लिए। वहाँ एक शादी समारोह के लिए भोजन की तैयारी चल रही थी। हुसैन और अन्य लोगों ने तैयार किए गए भोजन को भी बर्बाद कर दिया और फिर पार्किंग लॉट में पेट्रोल बम फेंक दिया, जहाँ उस समय कई वाहन खड़े थे। बम ने प्रदीप पार्किंग में खड़े सभी वाहनों को अपनी चपेट में ले लिया। ताहिर हुसैन के खिलाफ इससे पहले भी चार्जशीट दाखिल हो चुकी है।
ताहिर हुसैन फिलहाल आईबी स्टाफ अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली हिंसा में संलिप्तता के चलते गिरफ्तार है। आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा की हत्या करने के बाद उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मामले में गिरफ्तार अन्य आरोपित सलमान ने बताया था कि दंगाइयों ने अंकित का मजहब जानने के लिए उनके कपड़े उतारे थे। धर्म पुख्ता कर उन्हें चाकुओं से गोद डाला। सलमान ने बताया कि उसने खुद अंकित पर 14 बार चाकू से वार किए। अंकित के चेहरे पर काला कपड़ा डाल उन्हें आप के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन के घर में ले जाया गया था। अंकित का शव 26 फरवरी को चॉंदबाग के नाले से मिला था।
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उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी, जबक....
सीएए, एनआरसी विरोध के नाम पर 23-24 फरवरी को दिल्ली में शुरू हुई हिंदू विरोधी हिंसा में 53 लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस दौरान दंगाइयों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, घोंडा, चांदबाग, शिव विहार, भजनपुरा, यमुना विहार इलाकों में सरकारी और निजी संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचाया था।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा: हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या वाले चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम

योगेंद्र यादव
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी, जबकि आईपीएस अमित शर्मा और अनुज कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था। रतन लाल की हत्या मामले में दाखिल चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम है।
दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के अलावा छात्र नेता कंवलप्रीत कौर और वकील डीएस बिंद्रा के नाम का भी उल्लेख किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये तीनों 17 अभियुक्तों में तो शामिल नहीं हैं, लेकिन चार्जशीट में कहा गया है, “चाँद बाग में धरना प्रदर्शन के आयोजकों के संबंध डीएस बिंद्रा (AIMIM), कंवलप्रीत कौर (AISA), देवांगना कालिता (पिंजड़ा तोड़ ग्रुप), सफूरा जगरगर और योगेंद्र यादव जैसे लोगों से मिले हैं, जो कि साफ इशारा करते हैं कि हिंसा के पीछे कोई छुपा हुआ एजेंडा था।”
पुलिस के मुताबिक, चाँद बाग का प्रदर्शन मध्य-जनवरी से चल रहा था। 24 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गंभीर सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें, हेड कॉन्सटेबल रतन लाल समेत 53 लोगों की जान गई। इस मामले में 750 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। चार्जशीट के मुताबिक 17 आरोपितों की उम्र 18 से 50 के बीच है और उनमें से ज्यादातर चाँद बाग के ही रहने वाले हैं, जबकि कुछ पड़ोसी मुस्तफाबाद, जगत पुरी और प्रेम नगर में रहते हैं।
चार्जशीट में कहा गया है, “रतन लाल और एसीपी (गोकुलपुरी) और डीसीपी (शाहदरा) और कुछ अन्य पुलिसकर्मी चाँद बाग के धरना स्थल पर मौजूद थे। इसी दौरान उन पर भीड़ ने हमला कर दिया। रतन लाल वजीराबाद रोड पर स्थित डिवाइडर को कूदकर पार नहीं कर सके और गोली तथा पत्थर लगने से वहीं गिर पड़े। बताया गया कि रतन लाल को लाठी-डंडों से भी पीटा गया। उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनका पोस्टमार्टम 25 फरवरी को हुआ। रतन लाल की मौत गोली लगने से हुई। इसके अलावा उनके शरीर पर 21 जगह चोट के निशान थे।”
चार्जशीट में कहा गया है कि विरोध स्थल पर उपस्थित एक गवाह ने भी अपने बयान में योगेंद्र यादव का नाम लिया था। गवाह ने बताया कि विरोध स्थल पर बाहर से लोगों को बुलाया जाता था। यहाँ पर भानु प्रताप, डीएस बिंद्रा, योगेंद्र यादव, जेएनयू, जामिया और डीयू के कई छात्र आते थे, जो सरकार और NRC के खिलाफ बोलते थे और कहते थे कि मुसलमानों को चिंतित होना चाहिए। यह सब जनवरी से 24 फरवरी तक, यानी 50 दिनों तक जारी रहा।
वहीं योगेन्द्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में कहा, “मैंने जो कुछ भी कहा है वह पब्लिक डोमेन में है और कोई एक घटना बता दीजिए जब मैंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से हिंसा को भड़काने की बात कही।”
उल्लेखनीय है कि चार्जशीट में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया, “आरोपित व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से खुलासा किया कि चाँद बाग दंगो के पीछे की साजिश में उनके साथ डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, अतहर, शाहदाब, उपासना, तबस्सुम, रवीश और अन्य लोग शामिल थे।”
इसके अलावा, गिरफ्तार अभियुक्त शाहनवाज़ और इब्राहिम ने यह खुलासा किया कि इस दंगे के आयोजक डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, सुलेमान (सलमान), सलीम खान और सलीम मुन्ना थे। यह दंगा इन्हीं लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई साजिश का हिस्सा था।

जामिया हिंसा : हर दंगाई के पास पहले से थे पत्थर, पेट्रोल बम: दिल्ली पुलिस

जामिया हिंसा, दिल्ली पुलिस
जामिया दंगे में जलती बस 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
1976 से लेकर 2020 तक दिल्ली में इतने दंगे हुए, लेकिन कभी इतनी गंभीरता से जाँच नहीं हुई, जितनी गंभीरता से आज हो रही है। वास्तव में केन्द्र में मोदी सरकार से पूर्व जितनी भी सरकारें रहीं, तुष्टिकरण के कारण किसी दंगे की सघन जाँच नहीं हुई, जिस कारण दंगाइयों के हौसले बुलंद रहे। समय ने ऐसी करवट ली, दंगाई दंगा करते वक़्त यह नहीं सोंच रहे कि "आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?" 
लाल कुआँ दिल्ली में जब उग्र मुस्लिमों ने मन्दिर पर हमला करने के अलावा घरों में घुसकर हिन्दू महिलाओं को प्रताड़ित करते समय "ला इला इल्ललला", नारा ए तकबीर, अल्लाह हु अकबर" आदि नारों से लाल कुआँ क्षेत्र गूंज उठा था, हौज़ काज़ी थाने को घेर लिया गया था, परन्तु जैसे ही दिल्ली सरकार नहीं बल्कि केन्द्र सरकार हरकत में आयी, वही लाल कुआँ क्षेत्र "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" और "गंगा-जमुना तहजीब" के नारों से गूंजने लगा था। 
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, दंगाई कोई भी हो, किसी भी धर्म अथवा जाति से बक्शा नहीं जायेगा। बेगुनाहों के खून की होली खेलने वालों को उनके उचित स्थान पर पहुँचाया जाएगा। दंगे में साज़िशकर्ताओं के घर के पक्षी तक को कुछ नहीं होता, मरने वाला बेगुनाह होता है।   
जून 4, 2020 को जामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह ये एक सुनियोजित घटना थी। हर दंगाई के पास पहले से पत्थर, लाठी और पेट्रोल बम थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में बीते साल 13 और 15 दिसंबर को हिंसा हुई थी। दिल्ली पुलिस के वकील अमित महाजन और रजत नैयर ने जामिया हिंसा मामले में इस दौरान 6 याचिकाओं पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भीड़ का इरादा केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करना था।
दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की।
क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

जामिया हिंसा में छात्र नहीं बाहरी लोग 
जामिया हिंसा पर दायर 3 एफआईआर के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट साकेत कोर्ट में दाखिल हुई है। इनमें से कोई भी यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं है।
जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि स्थानीय नेताओं और राजनेताओं ने भड़काऊ नारे लगाकर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का काम किया।
पुलिस ने बताया, “जामिया हिंसा में दंगाइयों ने गाड़ी के टायर जलाए और पुलिस की ओर फेंके। एक एंबुलेंस, जिससे एक मरीज को यूनिवर्सिटी के रास्ते ले जाया जा रहा था, उसे भी क्षतिग्रस्त किया गया। कानून को तोड़ते हुए इस भीड़ के कई समूहों ने कैंपस में एंटर किया और फोर्स के ऊपर पत्थरबाजी की।”
दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट से ये भी अपील की कि जामिया हिंसा मामले में अलग से जाँच करने की कोई जरूरत नहीं है। वह पहले से ही इस संबंध में व्यापक जाँच कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में पुलिस ने उन याचिकाओं को खारिज करने की भी माँग की, जिसमें छात्रों की गिरफ्तारी और चिकित्सा सहायता न दिए जाने का हवाला देकर फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी के गठन की माँग हुई थी।
पुलिस ने दिल्ली हाइकोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज करने की माँग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि जामिया में हुआ प्रदर्शन सिर्फ़ एक छात्र विरोध था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जो कि पूर्ण रूप से झूठ है, इसलिए इन दलीलों को अस्वीकार किया जाए।
दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के संबंध में कुछ याचिका नबीला हसन, स्नेहन मुखर्जी और सिद्धार्थ द्वारा दाखिल की गई थी। इसके अलावा कुछ याचिकाएँ हिंसा के आरोपितों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए विभिन्न वकीलों, जामिया छात्रों, ओखला निवासियों और यहाँ तक की जामा मस्जिद के इमामों द्वारा दायर की गई थी।
दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा कि असहमति के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कानून हाथ में लेने, हिंसा भड़काने, आगजनी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : मुसलमान होने की मिली है सजा : अमानतुल्लाह खान, केजरीवाल का विधायक

ताहिर हुसैन, अमानतुल्लाह खान
आर.बी.एल निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में चार्जशीट दाखिल होने के बाद आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन का बचाव किया है। ताहिर के कुकृत्यों पर मजहब का पर्दा डालने की उसने कोशिश की है।
अमानतुल्लाह खान ने ट्वीट कर कहा, “दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में ताहिर हुसैन को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड बनाया है, जबकि पूरा देश जानता है कि दंगे किसने कराए। असल दंगाइयों से अभी तक पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की। मुझे लगता है कि ताहिर हुसैन को सिर्फ मुसलमान होने की सज़ा मिली है।”
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया है, “अमानतुल्लाह खान, दिल्ली पुलिस ने अभी ताहिर हुसैन को पकड़ा है तो इतनी बौखलाहट। तब क्या हाल होगा तुम्हारा जब पर्दे के पीछे के असली किरदार पकड़े जाएँगे। चिंता मत करो, दिल्ली पुलिस ईमानदारी से कार्य कर रही है। दिल्ली जलाने वाले 1 भी व्यक्ति को छोड़ेंगे नहीं।”
2 जून को दिल्ली पुलिस ने दंगों के मामले में 2 चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ताहिर को मुख्य आरोपित बनाया गया है। चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कहा है दंगे कराने के लिए ताहिर हुसैन ने करोड़ों ख़र्च किए थे। इस दौरान वह जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद से लगातार संपर्क में था।
उसने उमर खालिद से कहा था कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत आने वाले हैं, तब कुछ बड़ा होने वाला है, जिसके लिए सबको तैयार रहना है। उसने अपने समर्थकों को ‘बड़े एक्शन’ के लिए तैयार रहने को कहा था। उसने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच भी रुपए बाँटे थे। 
अमानतुल्लाह ने इससे पहले भी मार्च महीने में एक ट्वीट कर ताहिर का बचाव किया था। जिसमें उन्होंने ताहिर के खिलाफ़ होती कार्रवाई को देखकर कहा कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ताहिर एक मुसलमान है।
ऐसे में ज्वलंत प्रश्न यह भी होता है कि मुसलमान कोई भी गैर-संवैधानिक काम करे, गैर-मुस्लिमों को चाहे जितना प्रताड़ित करे, अगर पकडे जाने पर उस पर कोई कार्यवाही होने पर Muslim victim card खेलकर उसे निर्दोष सिद्ध करने का छद्दम धर्म-निरपेक्ष और गंगा-जमुना तहजीब की बात करने वाले उठ खड़े होते हैं। अपने आपको गरीब, मज़लूम और नसमझ सिद्ध करने में एकजुट होते नज़र आने लगते हैं। स्थिति विपरीत होने पर ये ही लोग सड़क से लेकर संसद तक आसमान सिर पर उठा लेते हैं, अब इसे दोगली चाल न कहा जाये तो क्या नाम दिया जाए? 


अमानतुल्लाह ने कहा था,  “आज ताहिर हुसैन सिर्फ इस बात की सजा काट रहा है कि वो एक मुस्लिम है। शायद आज हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा गुनाह मुस्लिम होना है। ये भी हो सकता है कि आने वाले वक्त में ये साबित कर दिया जाए कि दिल्ली की हिंसा ताहिर हुसैन ने कराई है।”
अमानतुल्लाह शुक्र मनाओ तुम हिन्दुस्तान में हो, वरना जितनी निर्भीकता से इस संगीन मुद्दे पर अपराधी का बचाव कर रहे हैं, शायद यही प्रयास किसी मुस्लिम देश में किया होता, अपराधी के साथ-साथ अमानतुल्लाह को भी उचित जगह पहुंचा दिया होता। 
हैरानी इस बात पर भी होती है, अरविन्द केजरीवाल इस मुद्दे पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? क्या किसी अपराधी का बचाव करना उचित है?
हालाँकि, स्पष्ट हो कि न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच अपने मुसलमान होने को लाने वाले अमानतुल्लाह जैसे लोग आज तक यह साबित नहीं कर सके हैं कि अगर सिर्फ मुस्लिम होने के कारण किसी को निशाना बनाया जाता है तो फिर उन्हीं के जैसे दंगाई मानसिकता के लोग बाहर खुले घूमकर इस तरह का जहर कैसे उगलते आ रहे हैं?
गत फरवरी माह में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की लगभग सभी परतें खुल चुकी हैं। इसमें यह भी स्पष्ट हो चुका है कि किस तरह से शाहीनबाग से लेकर जामिया, JNU के उग्रवादियों ने इसमें अहम भूमिका निभाई।
वही शाहीनबाग, जहाँ ‘फक हिन्दुत्व’ से लेकर गाय और गोमूत्र के बहाने हिन्दुओं की आस्था का उपहास बनाया गया। फ़ैज़ और इकबाल के बहाने काफिरों के खिलाफ तमाम बातें की गईं।
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जब यही शाहीनबाग दंगों के रूप में बाहर आया, तब ‘काफिरों’ पर तमाम क्रूरता की हदों को लांघा गया। महज 20 साल के दिलबर नेगी के हाथ और पाँव काटकर शरीर के भाग को जिंदा जलती आग में झोंक दिया गया। IB अधिकारी अंकित शर्मा को इसी दंगाई ताहिर हुसैन के घर के बाहर मारा गया। उनके शरीर पर घाव के 51 गहरे निशान थे।