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दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे: हथियार के साथ एक और हत्यारा मुस्तकीम सैफी गिरफ्तार

राहुल सोलंकी
राहुल सोलंकी (साभार: NDTV)
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने हिन्दू विरोधी दंगे के दौरान शिव विहार में राहुल सोलंकी की हत्या के आरोप में मुस्तकीम सैफी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके पास से हथियार भी बरामद किए हैं।
इससे पहले दिल्ली पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और रिकॉर्ड के आधार पर राहुल सोलंकी की हत्या के आरोप में सात मुस्लिम युवकों को आरोपित ठहराया था। अब पुलिस ने मुस्तकीम सैफी को गिरफ्तार किया है।
राहुल सोलंकी की फरवरी में दिल्ली के शिव विहार में हिन्दू विरोधी दंगों के दौरान मुस्लिम भीड़ ने हत्या कर दी थी। जून में, दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने 27 वर्षीय राहुल सोलंकी की हत्या मामले में आरोप-पत्र दायर किया था।
आरोप-पत्र में कहा गया था कि 24 फरवरी को शाम 5 बजे के आसपास शिव विहार के पास हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान सोलंकी की दयालपुर इलाके में उनके घर के पास हत्या कर दी गई थी।
सैफी के गिरफ्तार होने पर छद्दम सेक्युलरिस्ट्स Victim Card लेकर बाहर आएंगे और गरीब, मजलूम, असहाय, शांतिप्रिय और भटका हुआ सिद्ध करने की नौटंकी करते नज़र आएंगे। 
गरीब, मजलूम, असहाय, डरे हुए और शांतिप्रिय के पास से हथियार बरामद होने पर :-
शिव विहार निवासी राहुल सोलंकी गाजियाबाद के एक निजी कॉलेज से एलएलबी कर रहे थे। वह दूध लेने के लिए अपने घर से निकले थे, तभी दंगाइयों ने उनके गले के पास दाहिने कंधे में गोली मार दी थी। जब दंगाइयों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी, उस समय वह राजधानी स्कूल से सटे पाल डेयरी गली के पास खड़े थे।
इससे पहले, आरोपितों में से एक, सलमान ने पुलिस को बताया था कि वह राहुल को अच्छी तरह से जानता था क्योंकि राहुल का भाई रोहित उसके ग्रुप के साथ क्रिकेट खेलता था। सलमान ने पुलिस से कहा था कि वह हिंसक मुस्लिम भीड़ में शामिल हो गया और दिल्ली की सड़कों पर ‘इस्लाम को बचाने के लिए’ आतंक फैलाया। 24 फरवरी को मुस्लिम भीड़ ने एक और हिन्दू युवक दिलबर सिंह नेगी की अनिल स्वीट्स के पास जलाकर हत्या कर दी थी।
शिव विहार : हिन्दू विरोधी दंगों का सबसे अधिक प्रभावित 
शिव विहार ऐसा इलाक़ा था जहाँ के हालात दंगों के वक्त बदतर  थे। शिव विहार तिराहा तीन पुलिस थानों के अंतर्गत आता है। करावल नगर, दयालपुर और गोकुलपुरी। शिव विहार तिराहे की एक सड़क मुस्तफाबाद की तरफ जाती है जो कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है। दूसरी सड़क शिव विहार और बाबू नगर की तरफ जाती है, जहाँ मिली-जुली आबादी रहती है। जिन क्षेत्रों में हिन्दू आबादी ज़्यादा है, वहाँ भी मुस्लिमों के घर बने हुए हैं। शिव विहार तिराहे पर हुई हिंसा हिन्दुओं के लिए भयावह थी।
24 फरवरी की दोपहर में जिस पहले व्यक्ति का शव मिला था, वह था दिलबर नेगी। उसके हाथ-पैर काट दिए गए थे और राजधानी स्कूल के सामने स्थित अनिल स्वीट्स में उसे जला दिया गया था।  
हिंसा के दौरान भयावह नज़ारा सामने आया शिव विहार चौराहे स्थित राजधानी स्कूल की छत से। इस स्कूल के मालिक का नाम है फैजल फारुख। इस स्कूल की छत से इस्लामी भीड़ ने गोलियाँ चलाई, एसिड की बोतलें फेंकी और पत्थर भी चलाए। दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में जो पहली चार्जशीट दायर की गई थी, उसका संबंध राजधानी स्कूल में हुई हिंसा की घटनाओं और 24-25 फरवरी के दिन हुई घटनाओं से भी था। इस मामले में यतेन्द्र शर्मा ने शिकायत दर्ज कराई थी जो की डीआरपी स्कूल के मालिक हैं। डीआरपी स्कूल, राजधानी स्कूल के ठीक बगल में स्थित था। 

अब ब्लूम्सबरी से नहीं छपेगी’ – लेखकों ने रद्द किया कॉन्ट्रैक्ट

ब्लूम्सबरी, लेखकों, पुस्तकों, दिल्ली'
ब्लूम्सबरी प्रकाशन को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली दंगों के साज़िशकर्ताओं के कहने अथवा दबाव में पुस्तक के प्रकाशन को रोकना उसे किस आर्थिक कठिनाई की धकेल सकता है। ब्लूम्सबरी को अच्छी तरह मालूम होगा कि जब पुस्तक में जो लिखा जाता है, वह एक दस्तावेज बन जाता है। और प्रकाशक ने दबाव में आकर जो निर्णय लिया है, वह भविष्य में बहुत भारी पड़ने वाला है। जिस कारण इसे जिस आर्थिक संकट से गुजरना पड़ेगा, कोई इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी इसकी सहायता के लिए आगे नहीं आएगा। ये तो डूब ही रहे हैं, साथ में ब्लूम्सबरी को भी डुबो रहे हैं। 
जैसे ही प्रकाशन संस्था ब्लूम्सबरी ने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोकने का फैसला किया, भारत के कई लेखकों ने उसके साथ अपने करार को ख़त्म कर दिया। लेखकों ने इस निर्णय के विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी आने वाली पुस्तकों के लिए ब्लूम्सबरी को प्रकाशक के रूप में हटा दिया। कई लेखकों ने प्रकाशन संस्था की इस मनमानी का विरोध किया है।
ब्लूम्सबरी ने इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी के आगे झुकते हुए ये फैसला लिया। जेएनयू के प्रोफेसर और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन को ब्लूम्सबरी ने एडवांस में रुपए दिए हैं, ताकि वो उनकी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार पा सके। रंगनाथन ने घोषणा की है कि अगर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन रोकने का फैसला वापस नहीं लिया जाता है वो और उनके सह-लेखक उस धनराशि को वापस लौटा देंगे और अपनी आगामी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार भी उससे छीन लेंगे।
उन्होंने कहा कि कम्पनी ने जिस तरह से वामपंथी और इस्लामी लॉबी के आगे घुटने टेके हैं, इससे वो चकित हैं। उन्होंने कहा कि फासिस्ट ताकतों के दबाव में ब्लूम्सबरी द्वारा लिए गए इस निर्णय का हर एक लेखक और पाठक को विरोध करना चाहिए। ब्लूम्सबरी की वेबसाइट के अनुसार, आनंद और शीतल रंगनाथन की पुस्तक ‘फॉरगॉटन हीरोज ऑफ़ इंडियन साइंस’ जुलाई 2021 में रिलीज होने वाली है।
इससे पहले कम्पनी ने इन्हीं लेखक (आनंद रंगनाथन) के उपन्यास ‘द रैट ईटर’ को प्रकाशित किया था। लेखक संदीप देव ने भी घोषणा की है कि वो इस प्रकाशन संस्था से वो सारी किताबों के प्रकाशन अधिकार वापस ले रहे हैं, जो भविष्य में आने वाली थी। उन्होंने कम्पनी की ताज़ा हरकत को विचारों की हत्या करार देते हुए कहा कि उसने वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगाई है।
संदीप देव की अब तक 6 पुस्तकें ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है और आगे 9 ऐसी पुस्तकें आने वाली थीं, जिनका प्रकाशन उक्त कम्पनी को ही करना है। उन्होंने उन सभी 9 किताबों के प्रकाशन का अधिकार ब्लूम्सबरी से छीन लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वो इस कम्पनी के साथ अब भविष्य में कभी काम नहीं करेंगे। वो अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी और मराठी में कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं।
आईएएस अधिकारी संजय दीक्षित ने भी Nullifying Article 370और Enacting CAA नामक पुस्तकों को ब्लूम्सबरी से प्रकाशित न कराने का फैसला लिया है। ये पुस्तकें 20 सितम्बर को ही रिलीज होने वाली थी। उन्होंने प्रकाशन संस्था के सेंशरशिप को अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि वो उनके साथ अपने संबंधों को ख़त्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कम्पनी को भी दर्द होना चाहिए, इसीलिए वो पब्लिशिंग हटाने वाला पत्र उसे लिख रहे हैं।
संजय दीक्षित ने तो उसके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हैरी पॉटर सीरीज की किताबों का भी सम्पूर्ण बहिष्कार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि रोज के 10-15 करोड़ रुपए तो कम्पनी इसी टाइटल से कमा लेती है, इसीलिए हमें इन किताबों को न खरीदने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने एक यूजर की सलाह पर ये भी कहा कि अगर कम्पनी अगले कुछ दिनों में इस निर्णय को वापस नहीं लेती है तो हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से जलाया जाना चाहिए।
अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने घोषणा की है कि वो ब्लूम्सबरी से अपनी किसी भी पुस्तक का प्रकाशन नहीं कराएँगे। उन्होंने कहा कि प्रकाशन जगत में चंद लोगों का बड़ा प्रभाव और एक लॉबी के एकाधिकार को लेकर उन्होंने पहले भी आवाज़ उठाई है। उन्होंने इसे वैचारिक सेंशरशिप करार दिया। हरसद मधुसूदन ने भी ऐसा ही ऐलान किया है। इस बीच गरुड़ प्रकाशन ब्लूम्सबरी से हटाई गई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए आगे आया है।
वहीं फाइनेंस प्रोफेशनल और संस्कृत विशेषज्ञ नित्यानंद मिश्रा ने भी ऐलान किया है कि उन्होंने ‘सुनामा: ब्यूटिफुल संस्कृत नेम्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी से न कराने का फैसला लिया है। इससे पहले इसका प्रकाशन वही करने वाली थी। उन्होंने कहा एक संगठित लॉबी एक विचारधारा के विरुद्ध है और दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के लेखकों के प्रति समर्थन जताते हुए वो ये निर्णय ले रहे हैं।



वो अब तक ब्लूम्सबरी के साथ 5 पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं और छठी आने वाली थी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा भी कई अन्य पुस्तकों को लेकर बातचीत चल रही थी, जो अब उक्त प्रकाशन संस्था के साथ नहीं आएगी। हालाँकि, इस कारण उनकी अगली पुस्तक कुछ हफ़्तों बाद रिलीज हो सकेगी। उन्होंने दूसरे पब्लिशरों को उनसे संपर्क करने को कहा है और पाठकों से देरी के लिए माफ़ी माँगी है।
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प्रकाशन रुकवाने वाला विलियम डेलरिम्पल आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे की सच्चाई स...
इधर आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : दंगा भड़काने के पर्याप्त सबूत होने के बाद भी केजरीवाल की ताहिर हुसैन पर देशद्रोह मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं, क्यों?

ताहिर हुसैन, कोर्ट, दंगों
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में इस साल फरवरी में भड़के हिन्दू विरोधी दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर ही मुस्लिम समुदाय उग्र हुआ और उन्होंने हिन्दू समुदाय के लोगों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कोर्ट ने अगस्त 21, 2020 को आईबी में कार्यरत रहे अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दायर की गई चार्जशीट को संज्ञान में लेते हुए उक्त टिप्पणी की।
हालाँकि, कोर्ट को ये भी सूचित किया गया कि दिल्ली पुलिस अब तक ताहिर हुसैन के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाने के लिए सम्बंधित प्राधिकरण से मँजूरी नहीं ले सकी है। यही हाल दिल्ली दंगों के अन्य आरोपितों के मामले में भी है। बता दें कि देशद्रोह का मामला चलाने के लिए दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार से मँजूरी लेनी पड़ती है। अभी तक आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस मामले में मँजूरी नहीं दी है।
केजरीवाल जी जब CAA विरोध में ये हिन्दू विरोधी
नारेबाजी हो रही थी, क्यों चुप रहे?
क्या  आप हिन्दू नहीं?
           साभार :सोशल मीडिया 
मुफ्त की रेवड़ियां खाने वाले हिन्दुओं अब खुले दिमाग और आंख से अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का हिन्दू विरोधी चेहरा देख लो। आखिर क्या कारण है कि ताहिर के विरुद्ध इतने सबूत होने के बावजूद उस पर और उसके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अरविन्द केजरीवाल क्यों नहीं दे रहे इजाजत? जब ताहिर का नाम दंगों में आने पर पार्टी से निकाल दिया था, फिर किस कारण दिल्ली पुलिस को इजाजत नहीं दी जा रही? अगर दंगे मुस्लिम विरोधी होते और पुलिस हिन्दुओं के विरुद्ध देशद्रोही मुकदमा चलाने की इजाजत मांगती, क्या तब भी आना-कानी करते? उस स्थिति में तुरंत कार्यवाही करने के लिए पूरी पार्टी जी-जान लगा देती। आखिर ये ड्रामा क्यों? कब तक अपनी नौटंकी से दिल्ली वालों को बेवकूफ बनाकर उनकी लाशों पर मालपुए सेकते रहोगे? क्या नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में विरोध प्रदर्शन, धरने और दंगे तुम्हारे इशारे पर हुए थे, अगर नहीं फिर इजाजत में टालमटोल क्यों? यही ड्रामा जेएनयू मुद्दे पर भी किया था। 
दिल्ली में लाल कुआँ में जब मंदिर पर हमला करने के अलावा हिन्दू महिलाओं को घर में घुसकर प्रताड़ित करने पर भी चुप्पी रहे, शर्म करो। मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में सही, वोट तुम्हें हिन्दुओं ने भी दिया था। मुख्यमंत्री होते हुए तुम्हें यह भी मालूम होगा की नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हिन्दू विरोधी नारेबाजी होने के साथ, भारत को इस्लामिक बनाने पर काम हो रहा था, जैसाकि पुलिस पूछताछ में आरोपी बता रहे हैं। जिस धर्म-निरपेक्षता की दुहाई दी जा रही है, दंगाइयों का असली चेहरा प्रदर्शनों में उजागर हो गया था, जब हिन्दुओं की गैर-हाजिरी में मुस्लिमों को भारत को इस्लामिक देश बनाने पर काम करने के निर्देश दिए जाते थे, विस्तार से जानने के लिए नीचे दिए लिंक देखिए:-    


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की अक्सर उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति और मुस्लिम आरोपितों के प्रति नरम रुख रखने के कारण आलोचना होती रही है। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने कहा कि दिल्ली सरकार से मँजूरी लेने के लिए कोई निश्चित समयावधि का प्रावधान नहीं है। हालाँकि, वो ये कहने से भी नहीं चूके कि इस मामले की सुनवाई में होने वाली किसी भी प्रकार की देरी उस उद्देश्य को ही गैर-ज़रूरी रूप से ख़त्म कर देगी, जिसके लिए स्पेशल कोर्ट का गठन हुआ।
दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया था। स्पेशल कोर्ट को दिल्ली दंगों से जुड़े सभी मामलों को संज्ञान में लेने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित के खिलाफ पर्याप्त सबूत और साक्ष्य हैं, जिससे आरोपितों के खिलाफ ट्रायल (देशद्रोह का) चलाने के लिए अनुमति ली जा सके। जाँच अधिकारी ने कोर्ट को बताया है कि 22 जून को ही इस मामले में अनुमति के लिए पत्र भेज दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि मँजूरी मिलने में कितना समय लगेगा, इस सम्बन्ध में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इन दंगों की तैयारी योजनाबद्ध तरीके से की गई और फिर एक बड़ी साजिश के तहत अंजाम दिया गया। साथ ही ताहिर हुसैन को दंगाई भीड़ का नेता भी करार दिया, जिसके इशारों पर भीड़ ने दंगे किए। कोर्ट ने कहा कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर ही मुस्लिम समुदाय ने हिन्दुओं के घरों में आगजनी की और उनके प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।
24-25 फ़रवरी को चाँदबाग़ पुलिया के नजदीक स्थित मस्जिद के पास से ताहिर हुसैन दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रहा था और अपने छत पर भी दंगाइयों को सामग्रियाँ उपलब्ध कराई, जिससे दूसरे समुदाय की संपत्ति और जान-माल को खासा नुकसान पहुँचा। इस दौरान हसी, नाजिम, कासिफ, समीर, अनस, फिरोज, जाएद, गुलफाम और शोएब जैसे दंगाई उसके साथ शामिल थे। साथ ही भीड़ ने खतरनाक हथियारों से अंकित शर्मा की हत्या कर सबूत मिटाने के उद्देश्य से उनकी लाश को फेंक दिया।
50 पेज की चार्जशीट में ताहिर हुसैन को मुख्य आरोपित बनाया गया है। बताया गया है कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर उनकी पीट-पीट कर हत्या की गई थी। उस पर दंगा, अपराध के समय भड़काते हुए उपस्थित रहने, आगजनी की सामग्रियाँ इस्तेमाल करने, सबूत मिटाने और आपराधिक षड्यंत्र सहित कई मामले दर्ज किए हैं। कहा गया कि ताहिर हुसैन ने वहाँ के निवासियों के मन में डर का माहौल बनाया।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....
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साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
इसी साल फ़रवरी में खबर आई थी कि जेएनयू में 2016 में देश विरोधी नारे लगाने के मामले में तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाने की अनुमति दिल्ली सरकार नहीं दे रही है। इस संबंध में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने केजरीवाल सरकार के गृह मंत्रालय को पत्र लिखा था। पत्र दिल्ली की एक अदालत द्वारा इस संबंध में राज्य सरकार को रिमाइंडर भेजने का निर्देश दिए जाने के बाद लिखी गई थी। हालॉंकि बाद में दिल्ली सरकार ने इजाजत दे दी थी।

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा: जमानत के लिए बीवी ने बनवाए फर्जी सर्टिफिकेट

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा, गुलेल
दंगाई भीड़ की पनाहगार बना था यही फैसल फारुख का राजधानी स्कूल
वोट के भूखे नेता और पार्टियां जिन दंगाइयों को गरीब, नादान, मजलूम, नासमझ और ना जाने कितने नामों से सम्बोधित कर इनको बचाने का प्रयास करते हैं, देखो इन्हीं गरीब, मजलूम और नासमझ लोगों का दिमाग कितना शातिर है कि जमानत मंजूर नहीं होने पर फर्जी बीमारी के सर्टिफिकेट बनवाये जाते हैं। अगर ये शातिर गरीब और मजलूम नहीं होते, फिर तो पता नहीं क्या सकते थे, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। और इनके समर्थकों का जब कोई बस नहीं चलता, Victim Card खिलवा देते हैं, कि 'मुसलमान होने पर जबरदस्ती फंसाया जा रहा है। गंगा-जमुना तहजीब जैसे धूर्त नारों से जनता को पागल बनाया जाता है।' जब किसी स्कूल का मालिक ही फर्जी सर्टिफिकेट बनवाएगा, अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को क्या तालीम दी जाती होगी?      
दिल्ली पुलिस ने राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुख, उसकी पत्नी, डॉक्टर और वकील के खिलाफ फर्जी दस्तावेज जमा करने का केस दर्ज किया गया है। फर्जी दस्तावेज इस साल फरवरी में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मामले में जमानत पाने के लिए जमा किए गए थे।
एक हफ्ते पहले, दिल्ली के दंगों के मुख्य आरोपित फैजल फारुख ने फर्जी मेडिकल प्रमाण पत्र के आधार पर जमानत पाने की कोशिश की थी। वहीं फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने वाले डॉक्टर को दिल्ली मेडिकल काउंसिल की तरफ से पहले भी इस तरह के जाली दस्तावेज बनाने के कारण निलंबित किया गया था।
डॉक्टर ने फैजल की पत्नी के नाम से एक फर्जी मेडिकल प्रमाण-पत्र बनाया था, जिसमें लिखा गया था कि cyst निकालने के लिए उनका ऑपरेशन करना जरूरी है। फैजल ने अपने आवेदन में कहा कि उनकी पत्नी की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर उन्हें अंतरिम जमानत मिलनी चाहिए। दिल्ली दंगे में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद अदालत उसकी जमानत याचिका दो बार रद्द कर चुकी है।
जब फैजल ने अदालत में जमानत याचिका को मेडिकल प्रमाण-पत्र और कुछ दस्तावेजों के साथ “बेहद जरूरी मामला” के रूप में प्रस्तुत किया, तो अदालत ने दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा से दस्तावेजों की वैधता की जाँच करने के लिए कहा।
जब जाँच अधिकारियों ने सर्टिफिकेट जारी करने वाले डॉ. गजेंद्र नायर से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने मामले में कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद जाँच अधिकारियों ने ग्रेटर नोएडा के बिसरख गाँव रोड स्थित उसके नर्सिंग होम का दौरा किया। वहाँ उन्हें पता चला कि फैजल की पत्नी के नाम पर नर्सिंग होम में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे।
पुलिस ने अपनी जाँच रिपोर्ट में यह भी कहा कि उसकी पत्नी दिल्ली के यमुना विहार में रहती है। यह जगह नर्सिंग होम जगह से बहुत दूर है और दिल्ली में बहुत बेहतर और सस्ती मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
पुलिस के मुताबिक, जब उन्होंने डॉक्टर के बारे में और जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की, तो उन्हें पता चला कि उनके लाइसेंस को पिछले साल दिल्ली मेडिकल काउंसिल ने निलंबित कर दिया था।
दिल्ली मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार डॉ. गिरीश त्यागी ने पुलिस को बताया कि उन्होंने पूर्व में दो बार डॉ. गजेंद्र के खिलाफ कार्रवाई की थी। पहली बार उन्हें 6 महीने का निलंबन और दूसरी बार एक साल के लिए निलंबित किया गया था। वर्तमान में, वह एक निलंबित लाइसेंस पर काम कर रहा था। उसके निलंबन की अवधि नवंबर 2020 में समाप्त होगी।
जब क्राइम ब्रांच ने डॉ. गजेंद्र नायर ने पूछताछ की तो उसने स्वीकार किया कि जमानत दिलाने में मदद करने के लिए वो पहले भी कई लोगों का फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बना चुका है।
डॉक्टर ने यह भी स्वीकार किया कि उसने फैजल की पत्नी को कभी देखा भी नहीं है। एक ब्रोकर बुर्का पहने महिला के साथ आया और उससे महिला के पति की जमानत के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने के लिए कहा। फिलहाल पुलिस ने फर्जी दस्तावेजों को तैयार करने में शामिल सभी के खिलाफ विभिन्न आरोपों के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान फैजल फारुख के राजधानी स्कूल का इस्तेमाल अटैक बेस की तौर पर किया गया था। स्कूल की छत पर एक बड़ा गुलेल लगाया था। इसकी मदद से हिंदुओं और उनकी संपत्तियों और पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया था। दंगों में इस स्कूल को कोई नुकसान नहीं पहुॅंचा था। लेकिन इस ठीक बगल में स्थित स्कूल तबाह हो गया था।



राजधानी पब्लिक स्कूल की छत से बड़ी गुलेल के जरिए पत्थर और एसिड बम आदि फेंके गए थे। फैजल दंगों से ठीक पहले निजामुद्दीन मरकज के प्रभावशाली लोगों के साथ ही जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी, देवबंद के कई मौलवियों-आलिमों, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के कई नेताओं, पिंजरा तोड़ ग्रुप के संपर्क में था। स्कूल से सभी मुस्लिम बच्चों को पहले ही निकाल दिया गया था और फिर इसी स्कूल में शेष हिंदुओं के बच्चों को बंधक भी बनाया गया था।
राजधानी स्कूल दिल्ली दंगा
‘आज देख लेंगे हिंदुओं को… शाहरुख भाई वो रहा हिंदू, मारो साले को’
जैसाकि सर्वविदित है कि डीआरपी स्कूल का मालिक एक हिंदू व्यक्ति था। राजधानी स्कूल की छत पर मौजूद भीड़ ने डीआरपी स्कूल को काफी नुकसान पहुँचाया था। उस दिन पुलिस कंट्रोल रूम को जितने भी फोन किए गए थे, उसमें ज़्यादातर डीआरपी स्कूल से धर्मेश शर्मा ने ही किए थे। पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट में डीआरपी स्कूल के गार्ड का बयान भी दर्ज है। इससे दिल्ली दंगों के दौरान हिंदुओं के खिलाफ़ रची गई साज़िश का खुलासा होता है।
गार्ड ने अपने बयान में कहा, “जैसे ही वह डीआरपी स्कूल का मुख्य द्वार बंद करने गया तभी उसने देखा राजधानी स्कूल के सामने भारी संख्या में मुस्लिम लोग खड़े थे। उनके साथ राजधानी स्कूल का मालिक फैजल फारुख भी था। फैज़ल उस वक्त अपनी दो पहिया गाड़ी पर बैठा था। उसने राजधानी स्कूल के गार्ड (जो खुद हिन्दू था और उसकी पहचान छुपाई गई है) से कहा कि मुस्लिमों को स्कूल में दाखिल होने दिया जाए।”
इसके बाद डीआरपी स्कूल के गार्ड ने जो कहा वह हैरान कर देने वाला था। उसने फैज़ल को यह कहते हुए सुना “आज देख लेंगे हिंदुओं को।” इसके बाद फैज़ल के साथ मौजूद मुस्लिमों की भीड़ कई तरह के हथियारों के साथ डीआरपी स्कूल में दाखिल हुई। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों ने उसकी तरफ देखा और एक ने चीखते हुए कहा “शाहरुख भाई वह रहा हिंदू, मारो साले को।” इसी तरह एक और चश्मदीद ने (उसकी पहचान भी इस रिपोर्ट में छुपाई जा रही है) अपना बयान दर्ज कराया था। 
उसने भी गार्ड के बयान से अलग कुछ नहीं बताया, दोनों ने लगभग एक घटनाक्रम ही बताया। उसने बयान में कहा कि उसने 24 फरवरी की दोपहर 2 बजे के आसपास फैज़ल को उसके कई मुस्लिम साथियों के साथ राजधानी स्कूल के सामने देखा। इसके बाद फैज़ल के साथियों ने राजधानी स्कूल के भीतर दाखिल होने की बात कही। इसके अलावा चश्मदीद ने फैज़ल को यह कहते हुए सुना “आज देख लेंगे हिंदुओं को।” एक चश्मदीद ने फैज़ल के उस ड्राइवर की भी पहचान की जिसने दंगों के दौरान डीआरपी स्कूल को तबाह करने में अहम भूमिका निभाई थी।
हिंदुओं के खिलाफ़ लॉन्च पैड की तरह इस्तेमाल किए गए राजधानी स्कूल के हिंदू गार्ड ने भी घटनास्थल पर कई मुस्लिमों के साथ फैजल की मौजूदगी की पुष्टि की थी। उसने कई बार स्कूल के भीतर दाखिल होने की बात कही थी। जैसे ही गार्ड ने मुस्लिम भीड़ को आते हुए देखा और अपने परिवार वालों के साथ वहाँ से भाग निकला।
चार्जशीट के मुताबिक़ एक खबरी की जानकारी के आधार पर पुलिस ने शाहरुख को पकड़ा था। गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान उसने दंगों में फैज़ल के शामिल होने की बात कबूल की। इसके अलावा उसने दंगों में खुद भी शामिल होने की बात स्वीकार की थी। सबसे रोचक बात यह थी कि उसने फैज़ल की पहचान उस वक्त की जब पुलिस उससे दूसरे मामले में पूछताछ कर रही थी। शाहरुख ने पुलिस की पूछताछ के दौरान यह भी बताया कि फैज़ल उससे एक बात हमेशा कहता था, अगर सीएए और एनआरसी लागू हो गया तो सारे मुस्लिम देश के बाहर कर दिए जाएँगे।  
शाहरुख का कहना था कि फैज़ल ने उससे कह दिया था कि वह अपनी कौम के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहे। शाहरुख के मुताबिक़ फैज़ल ने उसे हिंदुओं को ख़त्म करने के लिए 5 हज़ार रुपए दिए थे। उसने यह भी बताया कि फैज़ल के देवबंद से संबंध बहुत अच्छे थे और वह अक्सर वहाँ जाता रहता था।

चार्जशीट में इस बात भी भी ज़िक्र है कि राजधानी स्कूल के नज़दीक से जितने हथियार मिले थे उन्हें एक दिन में जमा नहीं किया जा सकता था। इतना ही नहीं फैज़ल अपने इलाके का नेता था, क्योंकि वह अमीर था और उसके पास संसाधन मौजूद थे। ऐसे लगभग हर मौकों पर वह मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए योजना तैयार करता था। राजधानी स्कूल की इमारत बड़ी थी, इसलिए इसका इस्तेमाल हिंदुओं पर हमला करने के लिए किया गया। 
पूछताछ के दौरान फैजल फारुख ने खुद यह बात स्वीकार की कि सीएए और एनआरसी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ़ थे। इसलिए वह दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में जारी विरोध-प्रदर्शन का सक्रिय रूप से हिस्सा बना रहा। चार्जशीट के मुताबिक़ उसने तमाम मौलवियों, पिंजरा तोड़, जेसीसी और इस्लामी आतंकी समूह पीएफआई के सदस्यों की बैठक की बात भी स्वीकार की। वह हर तरह की मदद और सहयोग के लिए पूरी तरह आश्वस्त था।
फैज़ल जेसीसी के माध्यम से सफूरा ज़रगर के संपर्क में भी था। जब सफूरा को दंगों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया तब उसे बहुत सहानुभूति भी मिली। उस वक्त वह गर्भवती भी थी। इसके अलावा पिंजरा तोड़ के माध्यम से दिव्यांगना और नताशा नरवाल से फैज़ल मिला। अंत में उसकी मुलाक़ात पीएफआई दिल्ली के मुखिया मोहम्मद इलियास से भी हुई। 
चार्जशीट के मुताबिक़ फैज़ल दंगों से एक दिन पहले 23 फरवरी की तारीख को देवबंद उत्तर प्रदेश गया था। वह सुबह 7 बजे दिल्ली से निकला था और रात 8 बजे वापस आ गया था। देवबंद इस्लामी कट्टरपंथियों का गढ़ माना जाता रहा है। साथ ही दारुल-उल-देवबंद का घर भी माना जाता है जहाँ से सुन्नी देवबंद इस्लामिक आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। 
दिल्ली दंगों के मामले में यह पहली ऐसी चार्जशीट जो दिल्ली पुलिस की तरफ से दायर की गई थी। इसके जरिए ज़रिये तमाम तरह की जानकारी सामने आई है। यह बात खुद में कितनी हैरान कर देने वाली है कि कैसे महीनों पहले इन दंगों की योजना तैयार की गई। इसके बाद 24 और 25 फरवरी के दिन देश की राजधानी में इन दंगों को अंजाम दिया गया। 

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों का दुष्प्रभाव : ‘धर्म विशेष से डर के कारण यह मकान बिकाऊ है’

दिल्ली, हिंदू पलायन को मजबूर
इस साल फरवरी में किस तरह उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था। अब समुदाय विशेष के डर की वजह से प्रभावित इलाके के हिंदू अपना घर बेचकर जाने को मजबूर हैं।
यह कोई नया समाचार नहीं। भाजपा सहित जितनी भी पार्टियों में हिन्दू हैं, सभी से ज्वलंत प्रश्न : "दिल्ली की चार दीवारी हिन्दुओं से क्यों और कब खाली हुई? रामजन्मभूमि मुद्दा उठने पर हुए दंगों में हिन्दुओं पर हुए हमलों ने हिन्दुओं को मुस्लिम बहुल क्षेत्र छोड़ने को विवश होना पड़ा, और यही पलायन आज तक जारी है। कभी किसी मीडिया तक ने इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा करने का साहस नहीं किया, क्योंकि इस पर चर्चा से उनकी TRP नहीं बढ़ती। उनकी TRP बढ़ती है, मजहब देखकर चर्चा करने पर। हमारे नेता 'गंगा-जमुना तहजीब' और 'हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई' की लॉलीपॉप दे देकर कब तक जनता को पागल बनाते रहेंगे और जनता भी पागल बनती रहेगी? आखिर कब देश को इन धूर्त नारों से मुक्ति मिलेगी? जनता को भी चाहिए कि मजहब देख सियासत करने वाली पार्टी से दूरी बनाने का प्रयत्न करें। क्योंकि धर्म की बात करने वालों को छद्दम धर्म-निरपेक्षों को साम्प्रदायिकता नज़र आती है, संविधान खतरे में नज़र आता है। आखिर कब तक हिन्दू मुस्लिम एक-दूसरे को नफरत से देखते रहेंगे?  
हिन्दू बहुल क्षेत्रों में हिन्दू हितैषी बन घूमने वाले नेता मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पहुँचते ही भीखी बिल्ली बन जाते हैं। यह आरोप नहीं कटु सत्य है। देखिए 1991 में स्वतंत्र पत्रकारिता करते मेरा प्रकाशित लेख। क्या तब से लेकर आज तक क्या दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं आयी? 
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मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मोहनपुरी, मौजपुर और नूर-ए-इलाही इलाके में रहने वाले हिंदुओं ने घरों पर ‘धर्म विशेष से डर के कारण यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगाए हैं। ये इलाके बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में पड़ते हैं। यहाँ से दिल्ली की आप सरकार के मंत्री गोपाल राय विधायक हैं।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांसद और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी इस संबंध में ट्वीट किया है। उन्होंने शुक्रवार (31 जुलाई 2020) को प्रभावित इलाकों का दौरा भी किया।
तिवारी ने बताया है कि अपने संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले मोहनपुरी और मौजपुरी का दौरा करने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखा है। इसमें इलाके में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई है।




पत्र में तिवारी ने दिल्ली सरकार पर हिंदुओं के साथ भेदभाव का आरोप भी लगाया है। उन्होंने कहा है कि दौरा करने के दौरान पता चला कि कुछ हिस्सों में सुरक्षा के लिए लोगों को अपने पैसे से गेट लगवाने पड़े हैं, जबकि बगल के इलाकों में दिल्ली सरकार ने करदाताओं के पैसे से गेट लगाए हैं। साथ ही कहा है कि इस इलाके में एक खास समुदाय का प्रभाव है। पीड़ितों ने बताया कि स्थानीय विधायक और मंत्री ने आज तक न तो उनकी सुध ली है और न उन्हें अब तक मुआवजा मिला है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि दिल्ली सरकार एक ही समुदाय के लोगों को कानूनी मदद मुहैया करा रही है। उन्होंने केजरीवाल से इस भेदभाव की वजह पूछी है। तिवारी ने पूछा है कि हिंसा में सभी पीड़ित हुए हैं तो फिर मुआवजे के नाम पर दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है? सरकार चेहरा और नाम पूछकर भेदभाव क्यों कर रही है?
रिपोर्टों के अनुसार विशेष समुदाय की धमकियों से हिंदू परिवार परेशान हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार समुदाय विशेष के कुछ लोग रात में उनके घरों का दरवाजा खटखटाते हैं। धमकियाँ देते हैं।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी को हिंदू विरोधी दंगों की शुरुआत हुई थी। हालॉंकि इसकी पूरी योजना जनवरी में ही तैयार हो गई थी। 23 फरवरी को जाफराबाद में हिंसा की पहली घटना हुई और इसके अगले दिन सुनियोजित तरीके से दंगे भड़के थे।
इन दंगों पर ऑपइंडिया की विस्तृत रिपोर्ट अब अमेज़न के किंडल पर उपलब्ध है। इसमें दंगों में जान-माल की भारी क्षति और हिन्दुओं को किस तरह निशाना बनाया गया, उसका पूरा विवरण है।
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पीड़िता जिसे समीर ने दी थी धमकी दिल्ली के बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित मौजपुर का मोहनपुरी इलाका, जहाँ हिन्दु....
हालाँकि, लिबरल गैंग द्वारा पूरा प्रयास किया गया था कि इन दंगों के लिए हिन्दुओं को अपराधी दिखा कर पेश किया जाए, असली इस्लामी कट्टरवादी दंगाइयों को बचाया जाए और मुसलमानों को पीड़ित घोषित किया जाए। लेकिन, पुलिस की चार्जशीट और ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट्स ने सच्चाई सामने ला दी। मेनस्ट्रीम मीडिया इन दंगों को केंद्र सरकार द्वारा ‘मुस्लिमों के माँगों की अनदेखी’ का परिणाम बता कर पेश करता रहा है।