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दिल्ली दंगा-2020: योगी की राह चली अब दिल्ली भी

                                                             साभार - ANI
सोशल मीडिया पर कुछ समय से उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए UP+YOGI=उपयोगी  बहुत चल रहा है। जो वास्तव में चरितार्थ भी हो रहा है। जिस सख्ती से नागरिकता संशोधक कानून और अन्य दूसरे मुद्दों को लेकर उत्तर प्रदेश में दंगे कर योगी सरकार को बदनाम करने की कोशिश की, उन पर नकेल डाल योगी जिस साहस का परिचय दिया, वही आज दूसरे राज्यों के मार्ग-दर्शक बन रहा है। 

योगी ने दंगाइयों द्वारा सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचाने पर उन्हीं से उसकी भरपाई करवाने और दंगाइयों के छुपने पर सार्वजनिक स्थानों पर उनके चित्र लगाकर, जनता से उन्हें पकड़वाने में सहायता करने की अपील को अब अन्य राज्य भी अपनाने लगे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि केजरीवाल की दिल्ली भी उसी राह पर चल निकली है। जैसे दंगे के बाद लोग कहते नज़र आते थे कि "बाहर के लोग आते हैं और दंगा कर यहाँ रहने वालों के बीच निफ़ाक़ करवा जाते हैं", लेकिन योगी की इस कार्यवाही से अब किसी में यह कहने की हिम्मत नहीं। वरना शराफत की आड़ में शैतानी खेल यही खेलते थे, और बदनाम बाहर वालों को करते थे। कोई इनसे पूछे कि बाहर वाले को क्या मालूम की हिन्दू का मकान या दुकान कौन सी है। पुलिस के आते ही किन लोगों के मकानों में छुपते थे या छुपाया जाता था?  

सार्वजनिक स्थानों पर दिल्ली पुलिस लगाएगी 20 दंगाइयों की तस्वीरें, जानकारी देने वालों को ईनाम

देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में हुए ‘हिन्दू विरोधी दंगों’ को लेकर दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाया है। इस साल 2020 में फरवरी महीने के दौरान हुए इन दंगों को दिल्ली पुलिस ने ‘आतंकवादी गतिविधि’ बताया है। इसके अलावा दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के कुल 20 आरोपितों की तस्वीर जारी की है। दिल्ली दंगों के इन आरोपितों की तस्वीरें राजधानी के तमाम क्षेत्रों में लगाई जाएगी।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ दिल्ली दंगों के आरोपितों की तस्वीर सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाने के अलावा दिल्ली पुलिस ने एक और अहम बात कही है। दंगों के आरोपितों से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी साझा करने वाले व्यक्ति को दिल्ली पुलिस की तरफ से ईनाम भी दिया जाएगा। बहुत जल्द दिल्ली पुलिस द्वारा राजधानी के अनेक इलाकों में इन 20 आरोपितों की तस्वीर सार्वजनिक स्थानों पर लगा दी जाएगी।

साल 2020 फरवरी महीने के दौरान दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में हिन्दू विरोधी हिंसा भड़की थी। जिसमें सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, शिव विहार, बदरपुर और चाँद बाग़ मुख्य थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ हिंसा और दंगों की इन सिलसिलेवार घटनाओं में लगभग 50 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवाई थी और लगभग 700 लोग घायल भी हुए थे। 

24 से लेकर 26 फरवरी के बीच नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के विरोध की आड़ में दंगाइयों ने पूरी राजधानी में हिंसा भड़काई थी। इन हिन्दू विरोधी दंगों की प्राथमिक जाँच के बाद दिल्ली पुलिस ने इस संबंध में चार्जशीट भी दायर की थी जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों को ‘आतंकवादी गतिविधि’ करार दिया था। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस की तरफ से दंगों के इस मामले पर कार्रवाई जारी है। 

दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में और भी कई अहम बातों का ज़िक्र किया है। चार्जशीट के मुताबिक़, “हिंसक दंगों के दौरान तमाम हथियार बरामद किए गए थे, जिनका इस्तेमाल अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों पर किया गया था। नतीजतन दंगों की इन घटनाओं में लगभग 208 पुलिसकर्मी बुरी तरह घायल हुए थे सिर्फ एक क़ानून का विरोध करने के लिए। इसे किसी भी सूरत में आतंकवादी गतिविधि से हट कर कुछ और नहीं कहा जा सकता है।”

सार्वजनिक स्थानों पर छिपे हुए दंगाइयों के फोटो लगाए जाने पर ट्विटर पर लोगों की प्रक्रियाएं:-

 

हाल ही में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों और हिंसा को लेकर गृह मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने बड़ा ऐलान किया था। ऐलान के मुताबिक़ जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम पर गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमा चलाने को हरी झंडी दिखा दी गई है। यानी उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी। 

इसके अलावा दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट में उमर खालिद को लेकर कहा गया था कि उसने केवल नास्तिक होने का ढोंग किया, वस्तुत: वह कट्टर मुस्लिम है जो भारत को तोड़ना चाहता था। उमर ऐसा मानता था कि हिंसक राजनीतिक इस्लाम (violent political Islam) को फ्रंटल पॉलिटिकल पार्टियों के साथ मिलना चाहिए ताकि भारत को अपने हिस्से में लिया जा सके। 


अब ब्लूम्सबरी से नहीं छपेगी’ – लेखकों ने रद्द किया कॉन्ट्रैक्ट

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ब्लूम्सबरी प्रकाशन को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली दंगों के साज़िशकर्ताओं के कहने अथवा दबाव में पुस्तक के प्रकाशन को रोकना उसे किस आर्थिक कठिनाई की धकेल सकता है। ब्लूम्सबरी को अच्छी तरह मालूम होगा कि जब पुस्तक में जो लिखा जाता है, वह एक दस्तावेज बन जाता है। और प्रकाशक ने दबाव में आकर जो निर्णय लिया है, वह भविष्य में बहुत भारी पड़ने वाला है। जिस कारण इसे जिस आर्थिक संकट से गुजरना पड़ेगा, कोई इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी इसकी सहायता के लिए आगे नहीं आएगा। ये तो डूब ही रहे हैं, साथ में ब्लूम्सबरी को भी डुबो रहे हैं। 
जैसे ही प्रकाशन संस्था ब्लूम्सबरी ने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोकने का फैसला किया, भारत के कई लेखकों ने उसके साथ अपने करार को ख़त्म कर दिया। लेखकों ने इस निर्णय के विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी आने वाली पुस्तकों के लिए ब्लूम्सबरी को प्रकाशक के रूप में हटा दिया। कई लेखकों ने प्रकाशन संस्था की इस मनमानी का विरोध किया है।
ब्लूम्सबरी ने इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी के आगे झुकते हुए ये फैसला लिया। जेएनयू के प्रोफेसर और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन को ब्लूम्सबरी ने एडवांस में रुपए दिए हैं, ताकि वो उनकी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार पा सके। रंगनाथन ने घोषणा की है कि अगर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन रोकने का फैसला वापस नहीं लिया जाता है वो और उनके सह-लेखक उस धनराशि को वापस लौटा देंगे और अपनी आगामी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार भी उससे छीन लेंगे।
उन्होंने कहा कि कम्पनी ने जिस तरह से वामपंथी और इस्लामी लॉबी के आगे घुटने टेके हैं, इससे वो चकित हैं। उन्होंने कहा कि फासिस्ट ताकतों के दबाव में ब्लूम्सबरी द्वारा लिए गए इस निर्णय का हर एक लेखक और पाठक को विरोध करना चाहिए। ब्लूम्सबरी की वेबसाइट के अनुसार, आनंद और शीतल रंगनाथन की पुस्तक ‘फॉरगॉटन हीरोज ऑफ़ इंडियन साइंस’ जुलाई 2021 में रिलीज होने वाली है।
इससे पहले कम्पनी ने इन्हीं लेखक (आनंद रंगनाथन) के उपन्यास ‘द रैट ईटर’ को प्रकाशित किया था। लेखक संदीप देव ने भी घोषणा की है कि वो इस प्रकाशन संस्था से वो सारी किताबों के प्रकाशन अधिकार वापस ले रहे हैं, जो भविष्य में आने वाली थी। उन्होंने कम्पनी की ताज़ा हरकत को विचारों की हत्या करार देते हुए कहा कि उसने वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगाई है।
संदीप देव की अब तक 6 पुस्तकें ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है और आगे 9 ऐसी पुस्तकें आने वाली थीं, जिनका प्रकाशन उक्त कम्पनी को ही करना है। उन्होंने उन सभी 9 किताबों के प्रकाशन का अधिकार ब्लूम्सबरी से छीन लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वो इस कम्पनी के साथ अब भविष्य में कभी काम नहीं करेंगे। वो अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी और मराठी में कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं।
आईएएस अधिकारी संजय दीक्षित ने भी Nullifying Article 370और Enacting CAA नामक पुस्तकों को ब्लूम्सबरी से प्रकाशित न कराने का फैसला लिया है। ये पुस्तकें 20 सितम्बर को ही रिलीज होने वाली थी। उन्होंने प्रकाशन संस्था के सेंशरशिप को अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि वो उनके साथ अपने संबंधों को ख़त्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कम्पनी को भी दर्द होना चाहिए, इसीलिए वो पब्लिशिंग हटाने वाला पत्र उसे लिख रहे हैं।
संजय दीक्षित ने तो उसके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हैरी पॉटर सीरीज की किताबों का भी सम्पूर्ण बहिष्कार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि रोज के 10-15 करोड़ रुपए तो कम्पनी इसी टाइटल से कमा लेती है, इसीलिए हमें इन किताबों को न खरीदने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने एक यूजर की सलाह पर ये भी कहा कि अगर कम्पनी अगले कुछ दिनों में इस निर्णय को वापस नहीं लेती है तो हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से जलाया जाना चाहिए।
अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने घोषणा की है कि वो ब्लूम्सबरी से अपनी किसी भी पुस्तक का प्रकाशन नहीं कराएँगे। उन्होंने कहा कि प्रकाशन जगत में चंद लोगों का बड़ा प्रभाव और एक लॉबी के एकाधिकार को लेकर उन्होंने पहले भी आवाज़ उठाई है। उन्होंने इसे वैचारिक सेंशरशिप करार दिया। हरसद मधुसूदन ने भी ऐसा ही ऐलान किया है। इस बीच गरुड़ प्रकाशन ब्लूम्सबरी से हटाई गई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए आगे आया है।
वहीं फाइनेंस प्रोफेशनल और संस्कृत विशेषज्ञ नित्यानंद मिश्रा ने भी ऐलान किया है कि उन्होंने ‘सुनामा: ब्यूटिफुल संस्कृत नेम्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी से न कराने का फैसला लिया है। इससे पहले इसका प्रकाशन वही करने वाली थी। उन्होंने कहा एक संगठित लॉबी एक विचारधारा के विरुद्ध है और दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के लेखकों के प्रति समर्थन जताते हुए वो ये निर्णय ले रहे हैं।



वो अब तक ब्लूम्सबरी के साथ 5 पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं और छठी आने वाली थी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा भी कई अन्य पुस्तकों को लेकर बातचीत चल रही थी, जो अब उक्त प्रकाशन संस्था के साथ नहीं आएगी। हालाँकि, इस कारण उनकी अगली पुस्तक कुछ हफ़्तों बाद रिलीज हो सकेगी। उन्होंने दूसरे पब्लिशरों को उनसे संपर्क करने को कहा है और पाठकों से देरी के लिए माफ़ी माँगी है।
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प्रकाशन रुकवाने वाला विलियम डेलरिम्पल आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे की सच्चाई स...
इधर आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

दिल्ली दंगा : उमर खालिद और ताहिर हुसैन की मीटिंग करवाने वाला खालिद सैफी गिरफ्तार

Police Arrest Jamia Student In Connection With Delhi Riots
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मामले में एसआईटी (SIT) ने आज (जून 9, 2020) खालिद सैफी को गिरफ्तार किया है। खालिद सैफी को चांद बाग में हुई हिंसा की साजिश में शामिल होने के आरोप में अरेस्ट किया गया है। इससे पहले AAP के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हो चुकी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, क्राइम ब्रांच ने दावा किया है कि खालिद सैफी ने ही दिल्ली दंगों से पहले उमर खालिद और ताहिर हुसैन की मीटिंग करवाई थी। ये मीटिंग 8 जनवरी को शाहीन बाग में हुई थी। इसमें उमर खालिद, ताहिर हुसैन और खालिद सैफी शामिल थे।

मीटिंग में उमर खालिद ने कहा था कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में होंगे तो कुछ बड़ा करना है। वित्तीय सहायता पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के लोग देंगे। बता दें कि खालिद सैफी यूनाइटेड अगेंस्ट हेट नाम का संगठन चलाता है। इसका जिक्र गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में भी किया हुआ है।
सैफी को इससे पहले 26 फरवरी को खुरेजी खास से गिरफ्तार किया गया था। मगर, अब इस मामले में आगे की कार्रवाई करते हुए क्राइम ब्रांच की एसआईटी ने खालिद सैफी को अपनी हिरासत में लिया है। साथ ही टाइम्स नाउ के अनुसार, पुलिस ने यह भी बताया है कि सैफी का नाम पहले से चार्जशीट में है।
चार्जशीट में सैफी पर आरोप है कि उसने प्रदर्शन में सबको इकट्ठा करने का काम किया था। इसके अलावा उमर खालिद और ताहिर हुसैन दोनों से अच्छे संबंध होने के कारण उसने दोनों की मीटिंग भी करवाई थी।
क्राइम ब्रांच द्वारा में खालिद सैफी की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर उसकी बहुत सी तस्वीरे घूम रही हैं। एक तस्वीर में वह मनीष सिसोदिया के साथ नजर आ रहा है। एक में रवीश कुमार के साथ और एक में कन्हैया कुमार के साथ। इसके अलावा कुछ अन्य तस्वीरें भी हैं, जिसमें वह अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई, आरफा खानुम जैसे मीडिया गिरोह के लोगों के साथ भी सेल्फी ले रहा है।
बीते 2 जून को इससे पहल दिल्ली पुलिस ने दंगों के मामले में 2 चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ताहिर को मुख्य आरोपित बनाया गया था। चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कहा है दंगे कराने के लिए ताहिर हुसैन ने करोड़ों ख़र्च किए थे। इस दौरान वह जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद से लगातार संपर्क में था।

नलिनी श्रीहरण: राजीव गाँधी की हत्या की दोषियों में से एक, जब गिरफ्तार की गई तो 2 महीने की गर्भवती थी

नलिनी श्रीहरण
नलिनी श्रीहरण 
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक आत्मघाती बम धमाके से हत्या कर दी गई थी। उनके साथ 13 अन्य लोगों ने भी अपनी जानें गँवाई थी। राजीव गाँधी हत्याकांड की एक दोषी नलिनी श्रीहरण अभी उम्र कैद की सजा काट रही है। बता दें कि राजीव गॉंधी की हत्या के आरोप में नलिनी को जब गिरफ्तार किया गया था, वह दो महीने की गर्भवती थी।
नलिनी ने जेल में रहने के दौरान ही अरिथ्रा मुरुगन नाम की बच्ची को जन्म दिया। कुछ समय तक अरिथ्रा उसके साथ जेल में रही। फिलहाल अरिथ्रा यूनाइटेड किंगडम में डॉक्टर है। इधर नलिनी ने राजीव गाँधी हत्याकांड मामले में अपनी भूमिका को लेकर लगभग तीन दशकों से जेल में बंद है।
मिनहाज मर्चेंट ने राजीव गाँधी की बॉयोग्राफी में नलिनी श्रीहरण की भूमिका के बारे में बताया है। बॉयोग्राफी के अनुसार, नलिनी उस कोर ग्रुप का हिस्सा थी, जिसने हत्या की साजिश रची थी। इस ग्रुप में श्रीनिवासन, मुरुगन, अरिवु, धनु, शुभा के साथ ही तीन स्थानीय लोग- भाग्यनाथन, नलिनी और पद्मा थे। जानकारी के मुताबिक धनु ने आत्मघाती हमलावर की भूमिका निभाई थी। इस कोर ग्रुप के पास प्लान की हर मिनट की खबर होती थी।
2019 में नलिनी को अपनी बेटी की शादी की व्यवस्था करने के लिए 30 दिन की पैरोल दी गई थी। उसने बताया कि वो 28 साल से जेल में है और इस दौरान उसे कभी भी एक महीने की छुट्टी का लाभ नहीं मिला, जो कि उम्र कैद की सजा काटने वाले मुजरिमों को मिलती है। इससे पहले उसने यह भी कहा था कि उसे राजीव गाँधी की हत्या का पछतावा है।
नलिनी, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या में खुद की संलिप्तता से पूरी तरह से इनकार करती है। जब प्रियंका गाँधी वाड्रा उससे मिलने गई थी और पूछा था कि उसने उनके पिता को क्यों मार दिया तो नलिनी ने बताया कि उसे प्लान के बारे में कुछ भी नहीं पता था। उसकी हत्या में कोई भूमिका नहीं थी, उसे तो ‘हालात’ ने कैदी बना दिया।
तमिलनाडु सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत सभी सात दोषियों- एजी पेरारिवलन, वी श्रीहरण उर्फ मुरुगन, टी सुतेन्द्रराज उर्फ संथान, जयकुमार, रॉबर्ट पायस, रविचंद्रन और वी श्रीहरण की पत्नी नलिनी श्रीहरण को रिहा करने का आदेश दिया है। मगर यह आदेश अभी भी राज्यपाल के पास लंबित है। इन दोषियों में से श्रीहरण, संथान, रॉबर्ट पायस और जयकुमार श्रीलंका के नागरिक हैं।
राजीव गाँधी हत्याकांड में भूमिका को लेकर शुरुआत में नलिनी को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी, लेकिन फिर उसकी बेटी की जन्म की वजह से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उसकी फाँसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की अपील की थी। इसके बाद नलिनी की फाँसी की सजा उम्रकैद में बदल दी गई।
21 मई 1991 को जब तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में आत्मघाती बम हमले में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या कर दी गई थी, तब उनके साथ-साथ 13 अन्य लोगों की भी जान चली गई थी। और जब कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी सहित राजीव गाँधी के परिवार ने दोषियों को ‘माफ’ कर दिया और कहा कि हत्यारों को रिहा करने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, तो राजीव गाँधी के साथ मरने वालों के परिजन उनके इस कदम से खुश नहीं थे। राजीव गाँधी के साथ जान गँवाने वालों 13 लोगों के परिजनों की तरफ से सोनिया गाँधी या उनके बच्चे कैसे फैसला ले सकते हैं?
दंगा फड़काने के आरोप में सफूरा जरगर गिरफ्तार 
जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर फिलहाल दिल्ली में सीएए-विरोधी दंगों में कथित संलिप्तता के लिए जेल में बंद है। सफूरा के गर्भवती होने के बावजूद जेल में बंद करने को लेकर सोशल मीडिया पर काफी उछाला गया। तरह-तरह की दलीलें दी जा रही है, रिहा करने के लिए ट्रेंड चलाए जा रहे हैं। जबकि कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं है।
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कपिल शर्मा को दोषी बताने वाले उस समय कहाँ थे, जब CAA विरोध की आड़ में हिन्दुत्व, मोदी और योगी की कब्र खोदने के नारे लग रहे थे? साम्प्रदायिक रंग कौन दे रहा था? कहाँ  था #mob lynching, #award vapasi, #not in my name, #intolerence और एमनेस्टी आदि गैंग? विरोध CAA का था या हिन्दुत्व का? दंगाई चाहे जो बोले और करें, लेकिन प्रतिक्रिया होने पर अपना दामन बचाकर सारा दोष दूसरे पर डाल दो, कहाँ का इंसाफ है? कहते थे "कागज नहीं दिखाएंगे", लेकिन आज कोरोना के कारण लॉक डाउन में बंट रहे राशन को लेने के लिए कागज हाथों में लिए लाइनों में खड़ा हो रही एवं रहे हैं।

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दिल्ली पुलिस ने ‘द वायर’ को एक फर्जी रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए फटकार लगाई है। दिल्ली दंगों की आरोपित सफूरा जरगर...
इसके बावजूद सोशल मीडिया पर सफूरा के गर्भवती होने का हवाला देकर तत्काल रिहाई की माँग की जा रही है। जबकि राजीव गाँधी हत्याकांड मामले में देखा जा सकता है कि गर्भवती महिला को गिरफ्तार भी किया गया और उसके अपराध के लिए दोषी भी ठहराया गया।

जामिया हिंसा : हर दंगाई के पास पहले से थे पत्थर, पेट्रोल बम: दिल्ली पुलिस

जामिया हिंसा, दिल्ली पुलिस
जामिया दंगे में जलती बस 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
1976 से लेकर 2020 तक दिल्ली में इतने दंगे हुए, लेकिन कभी इतनी गंभीरता से जाँच नहीं हुई, जितनी गंभीरता से आज हो रही है। वास्तव में केन्द्र में मोदी सरकार से पूर्व जितनी भी सरकारें रहीं, तुष्टिकरण के कारण किसी दंगे की सघन जाँच नहीं हुई, जिस कारण दंगाइयों के हौसले बुलंद रहे। समय ने ऐसी करवट ली, दंगाई दंगा करते वक़्त यह नहीं सोंच रहे कि "आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?" 
लाल कुआँ दिल्ली में जब उग्र मुस्लिमों ने मन्दिर पर हमला करने के अलावा घरों में घुसकर हिन्दू महिलाओं को प्रताड़ित करते समय "ला इला इल्ललला", नारा ए तकबीर, अल्लाह हु अकबर" आदि नारों से लाल कुआँ क्षेत्र गूंज उठा था, हौज़ काज़ी थाने को घेर लिया गया था, परन्तु जैसे ही दिल्ली सरकार नहीं बल्कि केन्द्र सरकार हरकत में आयी, वही लाल कुआँ क्षेत्र "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" और "गंगा-जमुना तहजीब" के नारों से गूंजने लगा था। 
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, दंगाई कोई भी हो, किसी भी धर्म अथवा जाति से बक्शा नहीं जायेगा। बेगुनाहों के खून की होली खेलने वालों को उनके उचित स्थान पर पहुँचाया जाएगा। दंगे में साज़िशकर्ताओं के घर के पक्षी तक को कुछ नहीं होता, मरने वाला बेगुनाह होता है।   
जून 4, 2020 को जामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह ये एक सुनियोजित घटना थी। हर दंगाई के पास पहले से पत्थर, लाठी और पेट्रोल बम थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में बीते साल 13 और 15 दिसंबर को हिंसा हुई थी। दिल्ली पुलिस के वकील अमित महाजन और रजत नैयर ने जामिया हिंसा मामले में इस दौरान 6 याचिकाओं पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भीड़ का इरादा केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करना था।
दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की।
क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

जामिया हिंसा में छात्र नहीं बाहरी लोग 
जामिया हिंसा पर दायर 3 एफआईआर के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट साकेत कोर्ट में दाखिल हुई है। इनमें से कोई भी यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं है।
जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि स्थानीय नेताओं और राजनेताओं ने भड़काऊ नारे लगाकर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का काम किया।
पुलिस ने बताया, “जामिया हिंसा में दंगाइयों ने गाड़ी के टायर जलाए और पुलिस की ओर फेंके। एक एंबुलेंस, जिससे एक मरीज को यूनिवर्सिटी के रास्ते ले जाया जा रहा था, उसे भी क्षतिग्रस्त किया गया। कानून को तोड़ते हुए इस भीड़ के कई समूहों ने कैंपस में एंटर किया और फोर्स के ऊपर पत्थरबाजी की।”
दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट से ये भी अपील की कि जामिया हिंसा मामले में अलग से जाँच करने की कोई जरूरत नहीं है। वह पहले से ही इस संबंध में व्यापक जाँच कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में पुलिस ने उन याचिकाओं को खारिज करने की भी माँग की, जिसमें छात्रों की गिरफ्तारी और चिकित्सा सहायता न दिए जाने का हवाला देकर फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी के गठन की माँग हुई थी।
पुलिस ने दिल्ली हाइकोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज करने की माँग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि जामिया में हुआ प्रदर्शन सिर्फ़ एक छात्र विरोध था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जो कि पूर्ण रूप से झूठ है, इसलिए इन दलीलों को अस्वीकार किया जाए।
दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के संबंध में कुछ याचिका नबीला हसन, स्नेहन मुखर्जी और सिद्धार्थ द्वारा दाखिल की गई थी। इसके अलावा कुछ याचिकाएँ हिंसा के आरोपितों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए विभिन्न वकीलों, जामिया छात्रों, ओखला निवासियों और यहाँ तक की जामा मस्जिद के इमामों द्वारा दायर की गई थी।
दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा कि असहमति के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कानून हाथ में लेने, हिंसा भड़काने, आगजनी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगों की फंडिंग का इंटरनेशनल कनेक्शन : इंडोनेशिया-दुबई-पाकिस्तान-लश्कर-ए-तैयबा

दिल्ली दंगा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारतीय जाँच एजेंसियों ने दिल्ली दंगों के नाम पर धन जुटाने के लिए इंडोनेशिया के एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) को चिन्हित किया है। इस NGO का पूर्व में पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा की तथाकथित चैरिटी विंग फलाह-ए-इन्सानियत (FIF) के साथ लिंक था। 
यह पैसा 24-25 फरवरी को दिल्ली में हुए दंगों के दौरान पीड़ित मुस्लिमों को भेजा जाना था। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये पैसे उन मुस्लिमों को भेजे जाने थे, जो या तो इन दंगों में अपने परिवार के सदस्य को खो देते, घायल हो जाते या फिर जिनकी संपत्तियाँ नष्ट हो जाती। बता दें कि इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे, जबकि 500 से अधिक घायल हो गए थे।
जानकारी के मुताबिक यह धन दिल्ली दंगों के नाम पर और इंटरनेट पर उपलब्ध फोटो और मैसेज को प्रोपेगेंडा की तरह इस्तेमाल करके जुटाए गए थे। यह धन हवाला के जरिए दुबई से भारत भेजा जा रहा था।
इसका खुलासा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिए बयान के बाद हुआ है। अमित शाह ने संसद में कहा था कि दिल्ली में दंगा भड़काने के लिए विदेशों से पैसे भेजे गए थे। उन्होंने बताया कि दंगे से पहले धन बाँटने के लिए पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके साथ ही अमित शाह ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया अकाउंट ऐसे थे, जो दंगों से पहले शुरू किए गए और हिंसा के बाद बंद कर दिए गए। इनसे दंगा, नफरत और घृणा फैलाने का काम किया गया। 
उन्होंने कहा, “दिल्ली में हुए दंगों की जाँच पड़ताल में सोशल मीडिया में 60 ऐसे अकाउंट मिले हैं, जो 22 फरवरी को शुरू हुए और 26 फरवरी को बंद हो गए। अगर ये लोग सोचते हैं कि अकाउंट बंद करके वो बच जाएँगे तो मैं बता दूँ कि वो जहाँ पर भी हैं, पुलिस उनको ढूँढ निकालेगी।”
मिली जानकारी के मुताबिक इंडोनेशिया स्थित यह NGO दिल्ली दंगा पीड़ितों को 25 लाख रुपए भेजने की कोशिश में था। इसके लिए संस्था के ट्रस्टी ने दिल्ली के स्थानीय मुस्लिम संस्थानों से संपर्क भी किया था, ताकि वो उनको सहायता प्रदान कर सकें। 
यह NGO अपने ट्विटर हैंडल और अन्य प्लेटफार्मों के माध्यम से दंगा से संबंधित चुनिंदा फोटो एवं मैसेज को अपने प्रोपेगेंडा के हिस्से के रूप में प्रसारित कर रहा है। इसके अलावा यह NGO इंडोनेशिया से एक टीम को भी भेजने की योजना बना रहा है, ताकि ये यहाँ पर आकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की समीक्षा कर सके और ‘पीड़ितों’ को आर्थिक मदद दे सके।
इस NGO को एक अत्यधिक कट्टरपंथी ग्रुप माना जाता है और संस्था अपनी इस्लामी प्रसार के हिस्से के रूप में विभिन्न देशों में मुस्लिम समुदायों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इसने म्यांमार की सीमा के पास सांप्रदायिक झड़पों के बाद बांग्लादेश में कॉक्स बाजार में विस्थापित रोहिंग्या मुसलमानों के लिए एक शिविर भी स्थापित किया था।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में करीब तीन महीने पहले सीएए विरोध के नाम पर शुरू हुए धरना प्रदर्शन से एक नई मा.....
इसके अलावा इस NGO ने 2015 में लश्कर के मूल संगठन जमात-उद-दावा (JUD) को इंडोनेशिया के बांदा आचे क्षेत्र में रोहिंग्या शिविरों में बाहरी गतिविधियों को अंजाम देने में भी मदद की थी। NGO के इस तरह की गतिविधियों के फोटोग्राफिक रिकॉर्ड इनके ट्विटर हैंडल पर उपलब्ध हैं। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि लश्कर ए तैयबा रोहिंग्या समुदाय और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच अपना विस्तार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

AAP सांसद संजय सिंह, कांग्रेस नेता उदित राज के संपर्क में था दिल्ली दंगे कराने वाला PFI सरगना: दिल्ली पुलिस सूत्र

संजय सिंह, उदित राज
दिल्ली दंगों में शामिल लोगों को मिला था राजनीतिक संरक्षण? 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज गुरुवार (मार्च 12, 2020) को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने कट्टरपंथी संगठन पीएफआई के सरगना परवेज़ और सेक्रेटरी इलियास को धर-दबोचा। दोनों पर शाहीन बाग प्रदर्शन की फंडिंग और दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को भड़काने का आरोप है। हाल ही में गिरफ्तार किए गए आईएसआईएस से जुड़े दंपति के लगातार संपर्क में भी दोनों थे। अब जाँच की आँच आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तक पहुँच रही है। आप के सांसद संजय सिंह और ख़ुद को सबसे बड़ा दलित नेता बताने वाले कांग्रेस के उदित राज से भी परवेज़ लगातार संपर्क में था। पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि संजय सिंह के तार दंगाइयों से जुड़े हैं।
इसके अलावा पीएफआई और दंगाइयों की फंडिंग की भी जाँच की जा रही है। पीएफआई ने 73 बैंक एकाउंट्स खोल रखे थे, जिनमें 120.5 करोड़ रुपए जमा किए गए। रेहाब इंडिया फाउंडेशन से भी इसके लिंक जुड़े हुए हैं। 17 विभिन्न बैंकों में एकाउंट्स खोले गए थे। पीएफआई के बारे में ये बात भी पता चली है कि पिछले कुछ महीनों में उसे अधिकतर डोनेशन कैश के रूप में मिले हैं। इनमें से दो तिहाई धन बैंक में जमा किया गया था। चौंकाने वाली बात ये है कि एक तिहाई धन पीएफआई के शाहीन बाग़ स्थित मुख्यालय में रखा गया था।
पीएफआई के लोग देश भर में घूम कर अपने लोगों से डोनेशन के रूप में कैश पेमेंट लेते थे। इसके बाद इन रुपयों को वो हर क्षेत्र में अपने ख़ास हैंडलर्स के हवाले कर दिया करते थे। वो सभी एरिया हैंडलर्स दिल्ली के शाहीन बाग़ स्थित पीएफआई के मुख्यालय आकर उन रुपयों को जमा कर देते थे। मोहम्मद परवेज़ आलम पीएफआई दिल्ली का सरगना है और उसने सीएए विरोधी प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। पीएफआई की फंडिंग का अधिकतर हिस्सा सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन, उपद्रव और दंगों पर खर्च करने की बात कही जा रही है।


दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और कांग्रेस नेता उदित राज से पीएफआई के सरगना की लगातार बातचीत होती थी। इसके लिए कॉल, मैसेज और व्हाट्सप्प का इस्तेमाल किया जाता था। कपिल मिश्रा कई बार कहते रहे हैं कि अगर दंगाई ताहिर हुसैन के कॉल डिटेल की जाँच हो तो ये साफ़ हो जाएगा कि दंगों के समय वो संजय सिंह से लगातार संपर्क में था। दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने बताया है कि मोहम्मद परवेज़ कांग्रेस के कई नेताओं से संपर्क में था। मोहम्मद परवेज़ कई भड़काऊ व्हाट्सप्प ग्रुप्स से भी जुड़ा हुआ है, जो दंगा फैलाने का काम करते हैं।
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दिल्ली हिन्दू विरोधी हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस की पूछताछ में एक आरोपित से बड़ा खुलासा हुआ है। PFI के सदस्य दानिश ने ....
परवेज़ एक ‘भीम आर्मी टॉप-100’ नामक व्हाट्सप्प ग्रुप से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा वो एक ‘यूनिफिकेशन ऑफ मुस्लिम लीडरशिप’ नाम के ग्रुप से भी जुड़ा हुआ था। अब देखना ये है कि ताबड़तोड़ हुई गिरफ़्तारियों के बाद और कितने राज़ खुलते हैं और कितने सफेदपोशों की पोल खुलती है। ये तो स्पष्ट हो गया है कि इन दंगो के पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक संरक्षण था, जो सीएए विरोध से उपजा था।

दिल्ली दंगों के लिए PFI ने जुटाया था धन, दंगाइयों को बाँटे हथियार : गिरफ्तार दानिश का बड़ा खुलासा

दिल्ली हिन्दू विरोधी हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस की पूछताछ में एक आरोपित से बड़ा खुलासा हुआ है। PFI के सदस्य दानिश ने दिल्ली पुलिस की पूछताछ में खुलासा करते हुए कहा है कि PFI ने शाहीन बाग और दिल्ली हिंसा के लिए धन जुटाया था और साथ ही PFI ने दंगाइयों को हथियार भी सौंपे थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस हिंसा में PFI की संदिग्ध भूमिका की जाँच में जुट गई है।
दरअसल, दिल्ली हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस ने PFI के दानिश नाम के एक शख्स को गिरफ्तार किया था। जानकारी के मुताबिक अभी तक दिल्ली पुलिस को दानिश से की गई पूछताछ में कई खुलासे सामने आए हैं, दिल्ली पुलिस की पूछताछ में दानिश ने बताया है कि शाहीन बाग के लिए PFI ने लोगों से धन एकत्र किया था इसके बाद दिल्ली में हुई हिंसा के लिए पहले को धन जुटाया और फिर दंगाइयों को PFI ने हथियार भी उपलब्ध कराए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के दंगों में PFI की भूमिका की जाँच शुरू कर दी है। जानकारी के मुताबिक दानिश की शिनाख्त के आधार पर इस आंदोलन की फंडिंग और हिंसा भड़काने में शामिल रहे अन्य लोगों की धरपकड़ के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही है। साथ ही इन दंगों में शामिल दंगाइयों के खिलाफ सबूत जुटाने का काम भी दिल्ली पुलिस द्वारा किया जा रहा है।

पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर CAA विरोध के नाम पर की गई हिंसा के पीछे PFI का हाथ मिला था। इसके बाद सरकार ने इस संगठन के संचालन को प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद 100 से अधिक PFI के सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था। साथ ही सरकार ने कहा था कि यह संगठन देश को तोड़ने का काम कर रहा है, जिसे देश हिंत में बंद किया जाना बेहद जरूरी है।
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लोकसभा में दिल्ली हिंसा पर बोलते गृहमंत्री अमित शाह आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार विपक्षी पार्टियों द्वारा लंबे स....
वहीं लोकसभा में अमित शाह द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक अब तक दिल्ली हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा 700 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं और 2,647 लोगों को हिरासत में लिया गया है या गिरफ्तार किया गया है। पुलिस की ओर से जारी बयान के मुताबिक आर्म्स एक्ट के तहत 48 मामले दर्ज किए गए हैं। दिल्ली में 23 से 25 फरवरी तक सीएए विरोध के नाम पर की गई हिन्दू विरोधी हिंसा में अब तक 53 लोगों की मौत हो चुकी है। साथ ही इस हिंसा में 300 से अधिक लोग घायल हुए हैं।