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योगेंद्र यादव की काशी-मथुरा पर हिंदुओं को धमकी : 500 साल बाद मुस्लिम लेंगे बदला

                                                                                                                         फोटो साभार: Mint
काशी में ज्ञानवापी मस्जिद का अंजाम क्या होगा, भविष्य के गर्भ में छुपा है, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ सुरताल वह लोग मिला रहे हैं जो चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा सकता। बाबरी विवाद में भी यही हुआ था जब मुस्लिमों से अधिक भारतीय संस्कृति के दुश्मन जयचन्दी हिन्दू विरोध कर रहे थे। ठीक वही स्थिति अब काशी और मथुरा में भारतीय संस्कृति को संजोयने के विरुद्ध देखने को मिल रहा है। 

विवादित ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे में मिले शिवलिंग और मंदिर होने के अपार साक्ष्य मिलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के जेहादी चेहरा उजागर देखने को मिल रहा है। बौखलाहट में इन्हें नहीं मालूम कि क्या बोलना है। Republic Bharat पर चर्चा पर एक मुस्लिम वकील ने ज्ञानवापी को अरबी का ही लब्ज बताने पर तुरन्त हिन्दू पक्ष की साध्वी ने बताया "वकील साहब यह किसी अरबी, फ़ारसी, सऊदी अरब, तुर्की या मुगलिस्तान का नहीं संस्कृत शब्द है। दूसरे, India TV पर सौरभ शर्मा के शो में इस्लामिक स्कॉलर ने यह कहते हुए कि "अब एक इंच भी जमीन नहीं देंगे", नारा-ए-तकबीर के नारे लगा दिए; यह वही शख्स है जिसने तीन तलाक कानून पर किसी चैनल पर चल रही चर्चा के दौरान तीन तलाक कानून के समर्थक को जूता दिखाया था। इसी चैनल पर मीनाक्षी जोशी के शो में भी एक मुस्लिम स्कॉलर ने कहा कि "80%(हिन्दू) इस्लाम कबूलेंगे।" लेकिन कोई भी मस्जिद पक्षकार एक बात का जवाब देने में पूर्णरूप से असफल रह रहे हैं कि "वह विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता के साथ हैं या विरुद्ध?"     

एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने 19 May 2022 को यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि हिंदू समुदाय जब बहुमत में नहीं रहेंगे तो उन्हें अपने पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर को फिर से हासिल करने को लेकर इस्लामवादियों के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है।

NDTV की न्यूज एंकर निधि राजदान से बात करते हुए योगेंद्र ने दावा किया, “जब उन्होंने (मुस्लिमों ने) शासन किया तो हम 500 वर्षों तक इनकी अवहेलना करते रहे और आज शासन है तो हम तय करेंगे कि क्या होगा। हमें मत रोको, क्योंकि 500 साल पहले आप किसी और को नहीं रोक सकते थे।”

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “मैं उन सभी दोस्तों और उत्साही लोगों से हाथ जोड़कर कहना चाहता हूँ कि कृपया याद रखें, यदि आप आज कुछ करना चाहते हैं क्योंकि आप बहुमत में हैं और आप अपना 500 साल पुराने अतीत को हासिल करना चाहते हैं। कृपया उसके बारे में सोचें, जब इसके 500 साल बाद क्या हो सकता है।”

योगेंद्र यादव ने जोर देकर कहा कि वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी मस्जिद पर दावा करने के कारण 500 साल बाद इस्लामवादियों के हाथों हिंदुओं को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने पूछा, “क्या हम चाहते हैं कि इस खेल में हमारे बच्चे, हमारी आने वाली पीढ़ियाँ साल 2022 में जो हुआ उसकी कीमत चुकाएँ?।”

सीएए विरोधी उपद्रव, जिसके कारण दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे हुए, उसमें सक्रिय भागीदार रहे एक्टिविस्ट यादव ने इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा हिंदू मंदिरों के विध्वंस पर भी पर्दा डालने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कई मंदिर पवित्र बौद्ध और जैन मंदिरों के खंडहरों पर बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई कहता है कि जैन मंदिरों पर कई हिंदू मंदिर बने हैं तो क्या यह माँग करनी चाहिए कि सत्य की खोज के लिए उनकी खुदाई की जाए?

योगेंद्र यादव ने कहा कि इस देश को कहीं एक रेखा खींचनी है और वह रेखा 15 अगस्त 1947 होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “इस देश को कहना चाहिए कि हम अतीत में जाना बंद करें। उस समय जो कुछ भी हुआ- अच्छा या बुरा, वहां मौजूद है और हमें आगे बढ़ना चाहिए।”

इस बयान के बाद उन्होंने हिंदुओं को अपनी उन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों को, जिन्हें मुगलों ने ध्वस्त और बर्बाद कर दिया, फिर से हासिल करने के लिए परोक्ष रूप से धमकी दी। योगेंद्र यादव ने हिंदुओं को उस दौरान प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी, जब देश में मुस्लिम 500 साल पहले की तरह बहुसंख्यक हो जाएँगे। दरअसल, यादव हिंदुओं को अपनी धार्मिक विरासत को पुनः प्राप्त करने की कोशिश करने के लिए डरा रहे थे।

दिलचस्प बात यह है कि योगेंद्र यादव द्वारा हिंदुओं को परोक्ष धमकी देने के बाद नकली हार्वर्ड प्रोफेसर निधि राजदान ने कहा कि वह यह बहस इसलिए नहीं कर रही हैं, कि उनका हिंदुओं या उनकी आस्था के प्रति कोई विशेष संबंध नहीं है, बल्कि इसलिए कि उन्हें ‘अंतर्धार्मिक सद्भाव’ की चिंता है।

सिंपल गणित से आहत हुए अमेरिकी 'Woke', वुमेन्स मार्च को माँगनी पड़ी माफी, योगेंद्र यादव को भी लगा था ऐसा ही झटका

अमेरिकी वोक आहत हैं तो दूसरे वोक्स ने बाकी बचे वोक को ठेस पहुँचाने के लिए माफी माँगी है, वजह है चंदे का एक बहुत ही साधारण सा गणित।

नहीं समझ आया तो आइए बताते हैं कि मामला क्या है?

कहने को वुमेन्स मार्च एक विरोध प्रदर्शन है, जिसकी शुरुआत 21 जनवरी 2017 को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह के बाद शुरू हुआ था। अब बुधवार (24 नवंबर, 2021) को वुमेन्स मार्च ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर अपने एक मेल के लिए माफी माँगी है, जिसे उन्होंने सब्सक्राइबर को भेजा था।

दरअसल, वुमेन्स मार्च ने भेजे गए उस ईमेल के लिए माफ़ी माँगी है जिसमें उल्लेख किया गया था कि इस सप्ताह का औसत डोनेशन मात्र 14.92 अमेरीकी डालर था। उन्होंने कहा कि यह सब तब हुआ जब यह वर्ष नेटिव इंडिजिनस लोगों के लिए उपनिवेशवाद, विजय और नरसंहार को याद करने का है। यह विशेष रूप से थैंक्सगिविंग से पहले’ से लोगों से कनेक्शन नहीं बनाने की हमारी एक भूल थी।

जैसे ही ये बात औरों को पता चली, अमेरिका में लोग इस बात से परेशान हो गए कि विमेंस मार्च को औसतन 14.92 अमेरीकी डालर का डोनेशन मिला। क्योंकि 1492 वह वर्ष है जब इतालवी खोजकर्ता क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी जबकि वह भारत की तलाश में निकला था। वह पहली बार 12 अक्टूबर, 1492 को अमेरिका पहुँचा और बाद में उपनिवेशों की स्थापना की।

मामला यह है कि चूँकि वुमेन्स मार्च के वोक प्राप्त डोनेशन राशि को कोलंबस के अमेरिका पहुँचने के वर्ष से कनेक्ट नहीं कर पाए, इस बात ने दूसरे वोक को इतना आहत कर दिया कि बाकि वोक को माफी माँगनी पड़ी।

चीजों को ठीक ढंग से समझने के लिए, ऐसे समझते है कि अगर इच्छाधारी प्रदर्शनकारी से वर्तमान में ‘किसान’ बने योगेंद्र यादव अपने दम पर एक फण्डरेजर का आयोजन करते हैं और मान लेते हैं कि 125 लोग इसमें 2,480 रुपए का योगदान करते हैं, तो यह औसतन 19.84 रुपए प्रति व्यक्ति की डोनेशन राशि होगी। अगर योगेंद्र यादव को वूमेन मार्च से जोड़ते हुए देखें, तो वह इसे वर्ष 1984 से जोड़ते जब इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को स्वर्ण मंदिर, अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत मारा गया, विरोध में इंदिरा गाँधी की हत्या हुई और उसके बाद पूरे भारत में सिख विरोधी दंगे भड़के।

मौसम के अनुसार विभिन्न कारणों से तमाम तरह से विरोध-प्रदर्शन करने के बावजूद, आज भी योगेंद्र यादव की स्थिति यह है कि अपने दम पर 100 रुपए भी नहीं जुटा पाएँगे। यह तथ्य इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि कैसे उनका फण्डरेजर कैम्पेन, उनके विरोध-प्रदर्शनों की तरह ही एक बड़ा मजाक साबित हुआ है।

बात दरअसल, 2019 की है जब हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले, योगेंद्र यादव ने ‘पर्यावरणविद्’ तेजपाल यादव को अपनी पार्टी के उम्मीदवारों में से एक के रूप में समर्थन देते हुए खड़ा किया था। ट्विटर पर एक कैम्पेन को आगे बढ़ाते हुए हुए, उन्होंने अपने तमाम चहेते फॉलोवर्स से आर्थिक सहायता की गुहार लगाई। लेकिन, जब उन्हें अपनी कथित ‘ग्रीन राजनीति’ के लिए केवल ₹50 रुपया ही मिला तो उन्हें गहरा सदमा लगा था। जिसका जिक्र उन्होंने बड़े ही निराश मन से अपने एक ट्वीट में भी किया था।


टिकरी बॉर्डर : आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव को बलात्कार की जानकारी थी

जब कोई आंदोलन जनहित की बजाए केवल विरोध पर आधारित होकर लम्बे समय तक चलता है, उसमें बलात्कार जैसी घटनाओं पर हैरान नहीं होना चाहिए। जिन धरनों में हर तरह की सुख-सुविधाओं का प्रबंध हो, वहां इस तरह की घटनाओं का होना स्वाभाविक ही है। हाँ, जब तक पर्दा पड़ा रहे, लेकिन इन स्थानों पर हुई ऐसी घिनौनी हरकतें कभी नहीं परदे में रह ही नहीं सकती। शाहीन बाग में क्या हुआ, लेकिन वहां की घटनाएं हिन्दू विरोधी दंगों में दब गयी। ऐसे में प्रश्न होता है कि इन आंदोलनों को समर्थन देने वाली सियासती पार्टियां क्यों खामोश हैं? क्यों नहीं अपराधियों को दण्डित करने की आवाज़ उठाई जाती?
दिल्ली के टिकरी बॉर्डर स्थित ‘किसानों’ के प्रदर्शन स्थल पर बंगाल से आई युवती की कोरोना से मृत्यु के बाद मामले में 
नया मोड़ आया है। युवती के पिता का कहना है कि उन्हें उनकी बेटी ने खुद फोन पर कहा था कि उसका शारीरिक शोषण किया गया था। इस मामले ने अब नया मोड़ लिया है। खबर आ रही है कि युवती के साथ रेप सहित अन्य धाराओं में 6 लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन 6 लोगों में 2 किसान नेता, 2 आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और किसान आंदोलन से जुड़ी 2 महिला वॉलंटियर शामिल हैं।
कहाँ हैं, फर्जी किसान नेता, टिकैत, योगेन्द्र यादव, बलबीर सिंह राजोवाल जो 10 दिन तक 6 बलात्कारीयों  बचाते रहे। 
विदेशी फंडिग से चलने वाले इस फर्जी आदोंलन का एकमात्र उद्देश्य मोदी सरकार को अस्थिर करना था।
बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर राहुल, सोनिया, केजरीवाल, ममता, अमरिंदर सिह सुखबीर और हरसिमरत कौर, हुड्डा,चौटाला जैसे लोगों की जुबान मे Fevicol जम गया है।
एक आरोपी अनूप तोआम आदमी पार्टी, हिसार का अध्यक्ष है। इस आंदोलन मे दिल्ली सरकार का फंड फूंकने वाले केजरीवाल और सिसोदिया की जुबान पर ताला लग गया है।

गैंगरेप के इस मामले के आरोपितों में से दो आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता हैं। इतना ही नहीं, दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में दावा किया गया है योगेंद्र यादव को किसानों के टेंट में हुई इस घटना के बारे में पता था।

पिता की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 120बी, 342, 354,365, 376D और 506 के तहत 6 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है। इनमें किसान नेता और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हैं। कहा जा रहा है कि घटना की जानकारी योगेंद्र यादव तक को थी। लेकिन उन्होंने पीड़िता की मृत्यु के बाद भी इसे पुलिस से साझा नहीं किया।

30 अप्रैल को झज्जर के अस्पताल में युवती की मृत्यु के बाद उसके पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। अब पुलिस मामले में जाँच कर रही है। बहादुरगढ़ थाने के पुलिस अधिकारी विजय कुमार का कहना है,”युवती की मृत्यु कोरोना से हुई। उसका उपचार कोरोना मरीजों की तरह किया गया। हमने दस्तावेजों के लिए अप्लाई किया है। जैसे ही कुछ डॉक्यूमेंट हमें मिलते हैं हम तभी पुष्टि कर पाएँगे कि ये मौत कोरोना संबंधी थी।”

पीड़िता के पिता की शिकायत 

                                                          पीड़िता के पिता की शिकायत
                             दैनिक भास्कर के रोहतक संस्करण में 10 मई 2021 को प्रकाशित संबंधित खबर
मृतका के पिता ने अपनी शिकायत में 6 लोगों का नाम लिया। इनकी पहचान अनिल मलिक, अनूप सिंह छनौत, अंकुर सांगवान, कविता आर्या, जगदीश ब्रार और योगिता सुहाग के तौर पर हुई है। ये सारे लोग संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से बंगाल गए थे। वहीं इनकी मुलाकात लड़की और उसके पिता से हुई थी। लड़की ने इनके सामने प्रदर्शन में शामिल होने की इच्छा जताई। इसके बाद वह उनके साथ 11 अप्रैल को हावड़ा से रवाना हो गई।

शिकायत के अनुसार, युवती ने पिता को बताया कि अनिल और अनूप अच्छे लोग नहीं हैं। यात्रा के दौरान जब सब सो रहे थे तब उनमें से अनिल ने पास आकर उसे जबरन चूमा। उसने हड़बड़ी में उसे अपने से दूर होने को कहा और दोबारा हरकत न दोहराने की चेतावनी दी। मगर, इसके बाद अनिल और अनूप उसे ब्लैकमेल करने लगे, उस पर प्रेशर बनाने लगे।

पिता के मुताबिक, उनकी बेटी के साथ ट्रेन में भी जबरदस्ती हुई और बाद में प्रदर्शनस्थल पर भी उसे आरोपितों के साथ जबरदस्ती टेंट शेयर करने को कहा गया। युवती ने जब सारी आपबीती पिता को बताई तो उन्होंने उसे सलाह दी कि वह कुछ महिलाओं को विश्वास में लेकर अपनी बातें बताए।
16 अप्रैल को उसने योगिता और जगदीश को घटना के बारे में बताया, जिसके बाद उसका बयान वीडियो में कैद किया गया। पिता ने फोन कर ये वीडियो माँगी। 17 अप्रैल को बताया गया कि युवती को यूरीन के साथ खून आया है। इसके बाद 18 अप्रैल को उसे महिलाओं के साथ टेंट में शिफ्ट कर दिया गया। 21 अप्रैल को उसमें कोविड के लक्षण दिखने लगे और हल्का बुखार भी आया। 24 अप्रैल उसे साँस लेने में दिक्कत हुई और 26 अप्रैल उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया।
आप से आरोपियों का सम्बन्ध  
रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में आरोपित बनाया गया अनूप सिंह हिसार क्षेत्र में AAP का सक्रिय कार्यकर्ता है। वहीं अनिल मलिक दिल्ली में AAP का कार्यकर्ता है। आप विधायक सुशील कुमार का इस मामले में कहना है कि उन्हें इस घटना का कुछ नहीं पता लेकिन ये दोनों किसान प्रदर्शनस्थल पर सक्रिय थे। किसान सोशल बैनर आर्मी के बैनर तले ये साइट पर काम कर रहे थे। लेकिन जब से युवती की मृत्यु हुई, तभी से अनूप प्रदर्शनस्थल से फरार है। 
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आरोपित अनूप सिंह हिसार क्षेत्र का है और आम आदमी पार्टी (AAP) का सक्रिय कार्यकर्ता भी है जिसकी पुष्टि आप सांसद सुशील गुप्ता ने की। अनिल मलिक भी दिल्ली में AAP का कार्यकर्ता बताया जा रहा है।
इससे पहले भी किसान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगते आए हैं। इनमें मोहम्मद जुबेर, वरुण चौहान (ट्रॉली टाइम्स का सदस्य), अंतरप्रीत सिंह (स्टूडेंट फॉर सोसायटी का नेता) और स्वराज फॉर यूथ का अध्यक्ष मनीष कुमार भी शामिल है।
आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव को थी जानकारी  
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, युवती की मृत्यु के बाद उसके पिता द्वारा कराई गई एफआईआर में संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य योगेंद्र यादव का नाम भी सामने आया है। पिता का कहना है कि योगेंद्र यादव को इस बात की जानकारी थी कि किसान नेता युवती के साथ गलत कर रहे हैं। वह 24 अप्रैल से युवती के संपर्क में रहे, लेकिन उसकी मौत से पहले या बाद में पुलिस को पूरे घटनाक्रम की सूचना नहीं दी।
संयुक्त किसान मोर्चा का बयान 
कोरोना संक्रमण के चलते युवती की 30 अप्रैल को मौत हो गई थी। इसके बाद किसान नेताओं ने सभी कोविड नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए उसे शहीद करार दिया और उसका शव खुली जीप में रखकर घुमाया। हालाँकि, बाद में युवती के साथ रेप वाला एंगल उजागर हुआ, जिसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने इस संबंध में बयान जारी किया।
बयान में कहा गया कि वह आरोपितों के विरुद्ध कार्रवाई करेंगे। उन्होंने किसान सोशल आर्मी का टेंट भी कथित तौर पर प्रदर्शनस्थल से हटा दिया है। पंजाब किसान यूनियन के नेता ने कहा, “ये गंभीर चिंता का विषय है जिस पर बात होनी चाहिए। यहाँ प्रदर्शन पर पुरुष और महिलाओं में कोई अंतर नहीं है। महिलाएँ बड़े तादाद में भाग ले रही हैं। किसान मामले में पड़ताल कर रहे हैं और सुनिश्चित कर रहे हैं कि दोबारा ऐसा न हो।”
यौन उत्पीड़न का पहला मामला किसान आंदोलन के बीच प्रदर्शनस्थल से नहीं आया है। इससे पहले मोहम्मद जुबेर, वरुण चौहान, अंतरप्रीत सिंह और मनीष कुमार का नाम भी यौन उत्पीड़न केस में उछला था। इन लोगों ने कथित तौर पर कई पीड़िताओं का शोषण किया था।

'किसान आंदोलन राजनीतिक है, इसका उद्देश्य PM मोदी को हराना है' : आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव ने कबूली सच्चाई

2014 में मोदी सरकार द्वारा लिए जा रहे किसी भी निर्णय को जन-विरोधी बताकर हंगामा करना, धरने एवं प्रदर्शन कर मोदी विरोध की सच्चाई आन्दोलनजीवी योगेंद्र यादव ने कबूल कर ली। संभव है कि अब जनता कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल और आन्दोलनजीवियों द्वारा अपनी रोटियां सेकने के लिए मोदी विरोधी किस तरह जनता को भ्रमित कर रहे हैं। 
नरेंद्र मोदी, जब से 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आए, वामपंथी समूहों से लेकर पूरे विपक्ष ने उनके प्रति लगातार घृणा और आक्रोश का एक खतरनाक चक्रव्यूह रचा है। जिसका अक्सर समापन हिंसा के रूप में होता आया है। इसी कड़ी में ताजा घटनाक्रमों का चक्र तथाकथित किसानों के विरोध के रूप में जारी है। जो केंद्र सरकार द्वारा तीन कानूनों को पारित करने के बाद भड़क गया था या सुनियोजित रूप से भड़काया गया था। वैसे तीनों कानून वास्तव में किसानों को लाभान्वित करेंगे और उन्हें बिचौलियों की घातक जकड़ से मुक्त करेंगे।

जबकि किसान आंदोलन के नाम पर कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट संगठनों और दलों, खालिस्तानियों और यहाँ तक ​​कि भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर यहाँ के आम लोगों को भड़काने में लगे असामाजिक तत्वों की भी ज़बरदस्त भागीदारी देखने को मिल रही थी। हालाँकि, सबसे लंबे समय तक इसे देश के अन्नदाताओं द्वारा जारी विरोध प्रदर्शनों का दावा करते हुए, इस आंदोलन को ऑर्गेनिक और गैरराजनितिक बताने की कोशिश भी लिबरल्स की दूरगामी विध्वंशक योजना का हिस्सा ही है।

अब किसानों के विरोध प्रदर्शन के लगभग 4 महीने बाद और गणतंत्र दिवस की हिंसा के एक महीने बाद, यह प्रायोजित आंदोलन, अपने पुराने ढकोसलों से बाहर आता हुआ नजर आ रहा है। ‘आन्दोलनजीवी’ प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव, जो संभवतः हर आंदोलन में इच्छाधारी प्रदर्शनकारी नेता के रूप में अलग-अलग किरदार में मौजूद रहते हैं, ने यह खुलकर स्वीकार किया है कि किसानों का यह विरोध, वास्तव में राजनीतिक है। इसका एक मात्र उद्देश्य मोदी सरकार को सत्ता से हटाना और हराना है।

योगेंद्र यादव ने द प्रिंट में एक लेख लिखा जिसका हेडलाइन है, ”Farmers’ movement can’t and shouldn’t be apolitical. That’s not a democracy” अर्थात “किसानों का आंदोलन गैरराजनीतिक नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए। यह लोकतंत्र नहीं है या ऐसा लोकतंत्र में नहीं होता।

                                         ‘द प्रिंट’ में छपा योगेंद्र यादव का लेख
लेख में, योगेंद्र यादव स्पष्ट रूप से दावा करते हैं कि किसानों का विरोध गैरराजनीतिक नहीं है। वह आगे यह भी दावा करते हैं कि इसे गैरराजनीतिक होना भी नहीं चाहिए और इसका गैरराजनीतिक होना लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

लेख को संयुक्त किसान-मोर्चा (एसकेएम) के उस राजनीतिक निर्णय के बचाव करने के स्पष्ट इरादे के साथ लिखा गया है। जिसका उद्देश्य है कि अब तथाकथित ‘अराजनीतिक’ किसान चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ चुनावी मोर्चाबंदी करते नजर आएँगे। तथाकथित देश के अन्नदाता चुनावी राज्यों में वोटबैंक की राजनीति करते नजर आएँगे। इसका मतलब और उद्देश्य जो भी है वो आपको साफ नजर आ रहा होगा कि अब ये किसकी भूमिका बनाने की कोशिश हो रही है।

योगेंद्र यादव ने संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के फैसले की बात करते हुए लेख में कहा कि चुनावी राज्यों में जाकर बीजेपी के खिलाफ हमें प्रचार करना चाहिए। वह लिखते हैं, “हमने बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में मतदाताओं से अपील करने का निर्णय लिया है कि वे किसान विरोधी कानूनों के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चुनावी तौर पर सज़ा दें। बीजेपी द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए, अपने राज्य मशीनरी का उपयोग कर आंदोलन को ख़त्म करने या उसका अपराधीकरण और भाजपा के अतिरंजित अहंकार के लिए उसे दण्डित करें। अब यह मतदाताओं को तय करना है कि वे इस सजा को भाजपा को कैसे देना चाहते हैं। इसके लिए SKM आपको यह सुझाव नहीं दे रहा है कि आप किसे वोट दें।”

अनिवार्य रूप से, यहाँ ‘आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि किसानों का राजनीतिकरण केवल ‘सही’ उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, न कि उस बात के लिए पूरे आंदोलन को बदनाम किया जाना चाहिए। वे केवल बीजेपी को हराना चाहते हैं और उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि कौन जीतता है। यहाँ तक कि अब्बास सिद्दीकी के बंगाल जीतने पर भी वे खुश हैं। उनका दावा है कि जब तक मोदी और भाजपा को अनिवार्य रूप से सत्ता से बाहर रखा जाता है। तब तक ही सही मायने में लोकतंत्र है।

यह कहते हुए कि राजनेता किस तरह राजनीति को एक गंदा शब्द बना रहे हैं, यह माँग करते हुए कि किसानों को ‘अराजनीतिक’ होना चाहिए। इच्छाधारी आंदोलकारी योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसान स्वयं अपने संगठनों को “अराजनीतिक” कहकर अपना नुकसान कर रहे हैं। वह आगे स्वीकार करते हैं कि अधिकांश किसान संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं और यह संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के लिए भी उतना ही सही है, जिसमें स्वयं के भीतर कई ऐसे संगठन हैं जो राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं।

यहाँ दिलचस्प है यह जानना भी कि वह जो साफ-साफ़ उल्लेख करने से बच रहे हैं, यह भी हो सकता है कि वह यह मान कर चल रहे हों कि हर कोई उनके बारें में जानता होगा, क्योंकि वह खुद एसकेएम की समन्वय समिति के एक सदस्य हैं। यहाँ तक कि योगेंद्र यादव, स्वराज अभियान नामक एक राजनीतिक पार्टी भी चलाते हैं। बाकी अन्य किसान नेता भी कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट दलों से जुड़े हैं।

इसके अलावा, SKM द्वारा बनाए गए कानूनी सेल में 4 सदस्य हैं – कॉलिन गोंसाल्विस (Colin Gonsalves), दुष्यंत दवे (dushyant Dave), प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) और एच एस फूलका (SH Phoolka)।

ये लोग कौन हैं, कोई पूछ सकता है? प्रशांत भूषण एक ‘कुख्यात’ वकील हैं जो AAP के संस्थापकों में से एक थे। एचएस फूलका खुद AAP नेता हैं जिन्होंने हाल ही में पद छोड़ दिया है। दुष्यंत दवे खुद कई प्रसिद्द मामलों के वकील हैं, उनमें से एक राम जन्मभूमि पर हिंदू अधिकारों के खिलाफ लड़ने का मामला भी है और कॉलिन गोंसाल्विस एचआरएलएन के संस्थापक हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर जामिया में पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जाँच की माँग की थी। यहाँ यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि HRLN को जॉर्ज सोरोस ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट से भी भारी मात्रा में धन प्राप्त होता है। यह PUCL और HRLN की संयुक्त जोड़ी अक्षय पात्र पर ‘सिविल सोसायटी’ के नाम पर हमले में भी शामिल था।

अब आखिर बचता ही क्या है? बीकेयू के राकेश टिकैत, जिन्होंने खुद रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन अभी किसान नेता बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस के सहयोगी रहे, दर्शन पाल जो माओवादी पीडीएफआई के संस्थापक थे और योगेंद्र यादव जैसे ‘आन्दोलनजीवी’ तत्वों की भागीदारी। जब नेता पहले से ही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी आदि से जुड़े थे तो तथाकथित किसानों का यह प्रायोजित विरोध शुरू से ही राजनीतिक रहा है।

जबकि योगेंद्र यादव का कहना है कि ‘राजनीतिक’ होना लोकतंत्र का एक हिस्सा है और इससे कोई भी सहमत होगा। यह भी सच है कि जब इस तरह के हर विरोध-प्रदर्शन में यही समान आन्दोलनजीवी तत्व दिखाई देते हैं। और जब वे इधर-उधर की फालतू बातें करते हुए खुलेआम झूठ बोलते हैं, दूसरे आम और मासूम लोगों को भड़काते हैं, तो यह उनका राजनीतिक एजेंडा है जो उनके किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने का केंद्रीय कारण है न कि तथाकथित असंतोष या मूल्यों की लड़ाई। वो कोई भी झूठा दावा करें लेकिन मूल कारण राजनीति ही होती है। बाकी सभी मुद्दे उनके लिए महज राजनीतिक हथकंडा है।

एंटी-सीएए दंगों के दौरान भी आपने देखा होगा कि किस तरह से यही लोग यह झूठा दावा करते हुए नजर आते हैं कि यह कानून मुस्लिम विरोधी था। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। किसानों के विरोध के दौरान भी वही तत्व फिर से यह दावा करते हैं कि किसान कानून किसानों के हितों के खिलाफ हैं। जबकि जिसने भी उन तीनों कानूनों को पढ़ा और जाना है उसमें किसानों के अहित की कोई बात नहीं है। दोनों ही मामलों में, वैश्विक वामपंथियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत और विशेष रूप से, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में शामिल हो गया था। दोनों ही मामलों में राजधानी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी।

योगेंद्र यादव यह कहते हुए गलत नहीं है कि हर विरोध और वास्तव में, प्रत्येक व्यक्ति की एक राजनीतिक प्राथमिकता होती है और वास्तव में लोकतंत्र का फायदे उठाते हुए निहित राजनीतिक हितों के लिए केंद्रित यह समूह देश को जलाना शुरू कर देता है क्योंकि वे सुनिश्चित करना चाहते हैं एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को हिंसा और प्रोपेगेंडा द्वारा सत्ता से बाहर कर दिया जाए। यह लोकतंत्र नहीं है बल्कि यह उन राजनीतिक दलों के राजनीतिक हित हैं, जिनकी वे सेवा करते हैं।

योगेन्द्र यादव जैसे लोगों का झूठ पर आधारित यह निहित राजनीतिक स्वार्थ है न कि यह लोकतंत्र, जो हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर देश के आम लोगों को भ्रमित और भड़काकर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ऐसे प्रायोजित विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं। जिसमें देश-विरोधी वो तमाम ताकतें शामिल है जो भारत को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहतीं। यह निश्चित रूप से लोकतंत्र तो नहीं है।

द प्रिंट में लिखें इस ओपिनियन पीस के साथ, योगेंद्र यादव ने एक बात बहुत स्पष्ट कर दी है कि – तथाकथित किसानों का विरोध, जिसके दम पर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के खिलाफ विद्रोह और उसे अस्थिर करने का प्रयास किया गया और अब राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक पार्टी यानी बीजेपी के खिलाफ जिस अभियान की बड़े पैमाने पर तैयारी की गई है। उसका कृषि कानूनों से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि यह लोकतान्त्रिक शक्ति को क्षीण कर हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर न सिर्फ एक सरकार को बल्कि समूचे देश को अस्थिर और कमजोर करने की गहरी साजिश है। इसके लिए राष्ट्र-विरोधी ताकतें हर हथकंडा अपनाने को तैयार हैं।

केजरीवाल को ‘क्रांतिकारी’ सलाह देने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी की सलाह - मौकापरस्ती छोड़ें और साथ आएँ

देश में अराजकता फ़ैलाने में कुछ पत्रकार भी अराजक तत्वों के हाथ का खिलौना बन जनता को गुमराह करते रहते हैं। आजतक पर अरविन्द केजरीवाल का साक्षात्कार को क्रन्तिकारी बनाने की सलाह देने वाले अंश का सार्वजनिक होने पर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने केवल अपनी ही नहीं,बल्कि आजतक चैनल को भी बहुत क्षति पहुंचाई थी। और अब वही प्रसून एक बार फिर अरविन्द और योगेंद्र यादव को सलाह देते नज़र आ रहे हैं। 
तथाकथित ‘किसान’ आंदोलन के टुकड़े-टुकड़े होते नज़र आ रहे हैं। ख़ासकर, 26 जनवरी 2021 को प्रदर्शन की आड़ में हुए उपद्रव के बाद। लेकिन वामपंथी जमात ‘प्रदर्शन की चिंगारी’ को उन्माद की हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। ऐसी ही उन्मादी तत्परता नज़र आई ‘क्रांतिकारी’ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी में, जब उन्होंने ट्विटर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और इच्छाधारी आंदोलनकारी योगेन्द्र यादव को इस मुद्दे पर मशविरा दिया। 

पुण्य प्रसून ने अपने ट्वीट में लिखा कि AAP के मुखिया किसान आंदोलन का समर्थन करते हैं। योगेन्द्र यादव किसान आंदोलन के नेता हैं लेकिन दोनों एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। लिब्राट समुदाय के विराट पत्रकार वाजपेयी जी ने सुझाव दिया कि दोनों को अपने मतभेद भुलाकर साथ आना चाहिए तभी यह आंदोलन सफल होगा। इसके बाद वाजपेयी जी ने ट्वीट में लिखा, “बंटने से बचें, मौकापरस्ती छोड़ें और साथ आएँ। तभी सफल होंगे।”

हाल ही में गणतंत्र दिवस के मौके पर हुई हिंसा के बाद तमाम कृषि संगठनों ने ‘किसान’ आंदोलन से पल्ला झाड़ा और प्रदर्शन स्थल को अलविदा कह दिया। लाल किले पर तिरंगे का अपमान करने के बाद आस-पास के स्थानीय लोगों ने भी प्रदर्शनकारियों का खुल कर विरोध किया। विरोध-प्रदर्शन दो महीने से जारी है जिसकी वजह से कई बड़े रास्ते भी जाम हैं, नतीजतन स्थानीय लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दो दिन पहले हरियाणा के कई गाँव वालों ने दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर प्रदर्शनकारियों को अल्टीमेटम जारी किया कि वह जल्द से जल्द आवागमन का रास्ता खाली करें। बीते दिन (29 जनवरी 2021) को सिंघु बॉर्डर पर स्थानीय लोगों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटना हुई थी। यह वही स्थानीय लोग हैं जो प्रदर्शनकारियों को खाने और पानी की मदद देकर आंदोलन का समर्थन कर रहे थे।

ऐसी ख़बरें सामने आने का सीधा अर्थ है कि आंदोलन की ज़मीन खोखली हो रही है। यानी पुण्य प्रसून वाजपेयी सरीखे वामपरस्त पत्रकारों की चिंता में इज़ाफा। इसलिए उन्होंने देश के इच्छाधारी और अवसरवादी राजनेताओं को सलाह देना शुरू कर दिया है।

योगेन्द्र यादव आम आदमी पार्टी के नेता और इसके राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रह चुके हैं। इन्होंने 2014 के आम चुनावों में आप के टिकट पर गुरुग्राम संसदीय क्षेत्र से चुनाव भी लड़ा था, जिसमें इनकी जमानत जब्त हो गई थी। कुछ समय बाद अरविन्द केजरीवाल और योगेन्द्र यादव के रिश्तों में खटास आ गई थी और इच्छाधारी आंदोलनकारी को 2015 में ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के चलते बाहर कर दिया गया था। इनके साथ साथ पार्टी के वकील प्रशांत भूषण को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, जब उन्होंने केजरीवाल के ‘तानाशाही रवैये’ पर खुल कर बात की थी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी को तब से ‘क्रांतिकारी’ कहा जाता है जब उन्होंने केजरीवाल के साक्षात्कार की व्याख्या करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था। वह केजरीवाल को साक्षात्कार के बाद इसके बारे में बता रहे थे, हालाँकि सब कुछ कैमरे में रिकॉर्ड हो गया था। वीडियो वायरल हुआ और दोनों की ‘संयुक्त क्रांति’ धराशायी हो गई। 

भारत के लिए खतरा है देशद्रोही योगेंद्र यादव: सोसायटी के लोग

योगेन्द्र यादव की सोसायटी के लोग उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं
‘देशद्रोही’ योगेन्द्र यादव को उनकी सोसायटी से लोग बाहर निकालने के लिए सड़क पर उतर आए हैं। इन लोगों ने संयुक्त किसान मोर्चा के नेता और किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे योगेंद्र यादव पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने का आरोप लगाया है।

गौतम अग्रवाल ने इसकी जानकारी देते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, “भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किसान यूनियन नेता योगेंद्र यादव के निवास के बाहर आईपी एक्सटेंशन दिल्ली के निवासियों द्वारा विरोध प्रदर्शन। लोगों ने अपनी सोसायटी की प्रबंध समिति से कहा है कि वह अपना फ्लैट खाली करवा लें क्योंकि वह भारत के लिए खतरा है।”

प्रदर्शन कर रहे सोसायटी के लोग ‘योगेंद्र यादव मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हुए उसकी तस्वीरों को जला भी रहे हैं और नारे लगाते हुए उन्हें पैरों से कुचल रहे हैं।

दिल्ली में हुई हिंसा के बाद बृहस्पतिवार (जनवरी 28, 2021) को ही लोगों के विरोध से डरकर योगेंद्र यादव अपने फेसबुक पेज से लाइव कर वीडियो में रोते हुए ये कहते सुने गए थे कि लोग उनके घर पर हमला करने वाले हैं। इस वीडियो में यादव ने कहा कि जो लोग मुझे राष्ट्रवाद पर लेक्चर दे रहे हैं, उन्हें मेरे परिवार की विरासत के बारे में कोई जानकारी नहीं।

किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस ने योगेंद्र यादव और बलबीर सिंह राजेवाल सहित लगभग 20 किसान नेताओं को नोटिस जारी किया है। पुलिस ने उन्हें तीन दिनों के भीतर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अधिकारी ने कहा कि इन किसान नेताओं को नोटिस जारी किए गए हैं क्योंकि उन्होंने मंगलवार को ट्रैक्टर परेड के लिए निर्धारित शर्तों का पालन नहीं किया था।

गणतंत्र दिवस को ट्रैक्टर परेड हिंसक हो पड़ी और किसानों ने दिल्ली पुलिस पर हमला बोलते हुए वाहनों को पलट दिया। यही नहीं, उपद्रवियों ने लाल किले की प्राचीर पर एक धार्मिक झंडा भी फहरा दिया। दिल्ली पुलिस ने बुधवार को कहा कि हिंसा के संबंध में 25 आपराधिक मामले दर्ज किए गए, जिसमें 394 पुलिसकर्मी घायल हुए और 30 पुलिस वाहन क्षतिग्रस्त हुए।

नेताओं के दोगलेपन में पिसती जनता


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन की आड़ में राजनीतिक दोलों को अपनी सियासी रोटियां सेकेंने का मौका मिल गया है। एनडीए सरकार के विरोधी तमाम पार्टियां प्रदर्शनकारी किसनों को खुलकर समर्थन दे रही हैं। लेकिन ये पार्टियां खुद ऐसे कानून लागू करने की मांग कर चुकी हैं। यहां तक कि सरकार में रहते इसके लिए राज्य सरकारों को सुझाव भी दे चुकी हैं।

कांग्रेस के घोषणा-पत्र में शामिल थे नए कानून के प्रावधान 

कांग्रेस पार्टी आज नए कृषि सुधार कानूनों का मुखर विरोध कर रही है और किसानों को गुमराह कर रही है। उसी कांग्रेस पार्टी ने इस कानून को 2019 के घोषणापत्र में शामिल किया था। उनके घोषणापत्र में साफ-साफ लिखा था, “कांग्रेस Agricultural Produce Market Committees Act को निरस्त कर देगी और कृषि उत्पादों के व्यापार की व्यवस्था करेगी… जिसमें निर्यात और अंतर-राज्य व्यापार भी शामिल होगा, जो सभी प्रतिबंधों से मुक्त होगा।” उनका यह घोषणापत्र अब भी उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं। ये बातें उनके मेनिफेस्टो में पेज नंबर 17 के प्वॉइंट नंबर 11 में दर्ज है।


कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में वादा किया था कि वह Essential Commodities Act को खत्म कर उसकी जगह ECA 1955 के नाम से नया कानून लेकर आएगी। इसे भी उनके घोषणा पत्र के पेज नंबर 18 में देखा जा सकता है। 27 दिसंबर, 2013 को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि कांग्रेस शासित राज्य APMC Act के तहत फलों और सब्जियों को delist कर देंगे, ताकि उनके दाम कम किए जा सकें। मगर आज जब हमारी सरकार ने ऐसा कर दिया तो किसानों को भड़काने में राहुल गांधी ही सबसे आगे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र 

कृषि सुधार बिल पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोगला चरित्र सामने आ गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जब यूपीए सरकार में देश के कृषि मंत्री थे, तब ये इन कृषि सुधारों को लागू करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे थे, परंतु आज अपने ही फैसले से यू टर्न लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दे रहे हैं।

इसके लिए पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने अगस्त 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था। उन्होंने बार-बार Model APMC एक्ट को लागू करने और State APMC Acts में संशोधन के लिए कहा था। उन्होंने मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था, ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।

अगस्त 2010 में लिखी चिट्ठी में शरद पवार जी ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत है और इस जरूरत को Model APMC एक्ट पूरा करता है। वहीं नवंबर 2011 में लिखी चिट्ठी में उन्होंने फिर से यही बात दोहराई और निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए।

मई 2012 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार का राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दर्ज है। इसमें उन्होंने खुलकर Agriculture Marketing Reforms का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि “कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे Agri-procurement के उदारीकरण का प्रस्ताव… हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से APMC एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।” लेकिन वही शरद पवार आज इन कृषि सुधारों का न केवल विरोध कर रहे हैं, बल्कि किसानों को इसके लिए भड़का भी रहे हैं।

शिव सेना ने भी पहले अध्यादेश को लागु कर, दबाव में वापस लिया 

10 अगस्त, 2020 को महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए किसान बिल के तीनों अध्यादेशों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। महाराष्ट्र उन शुरुआती राज्यो में था, जो किसान बिल के तीनों अध्यादेश को तत्काल और सख्ती से लागू करने के आदेश दिया था। दो पेज पेज के इस ऑर्डिनेंस को 10 अगस्त, 2020 के दिन मार्केटिंग के स्टेट डायरेक्टर सतीश सोनी ने सभी बाजार समिति को सख्ती से लागू करने को कहा था। लेकिन बाद में कांग्रेस और एनसीपी के दबाव के बाद उद्धव सरकार ने अपने 10 अगस्त के विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी। अब शिवसेना भी किसानों के आंदोलन और भारत बंद को पूरा समर्थन दे रही है।

डीएमके ने भी बिचौलियों से मुक्ति का वायदा किया था   

डीएमके आज मोदी सरकार के कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रही है। और इस मुद्दे पर भारत बंद का भी समर्थन कर रही है, लेकिन यही डीएमके 2016 के विधानसभा चुनाव में कृषि सुधार बिल को अपने घोषणापत्र में शामिल कर चुकी है। डीएमके ने उस समय अपने मेनिफोस्टो में वादा किया था कि सरकार में आने पर वो किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी एक्ट में संशोधन करेगी, ताकि किसान बिना किसी बिचौलिए के अपनी उपज को अधिक से अधिक दाम पर बेच सकें। यही नहीं, इसके लिए उसने Comprehensive Agriculture Produce Marketing Exchange बनाने का भी वादा किया था।

केजरीवाल ने भी अध्यादेश को लागु करने के बावजूद विरोध 

किसानों के आंदोलन से आज दिल्ली वाले ही सबसे ज्यादा परेशान हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का दोहरा रवैया जगजाहिर हो चुका है। खास बात ये है कि किसानों को भड़काने में और भारत बंद का आगे बढ़कर समर्थन करने वाले केजरीवाल की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। एक तरफ तो आम आदमी पार्टी नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही है और दूसरी तरफ उसने इस कानून को 23 नवंबर को ही लागू भी कर दिया। और इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी।

स्वराज्य पार्टी के योगेंद्र यादव की नौटंकी 

किसान आंदोलन में घुसकर चेहरा चमकाने वाले और भारत बंद का ऐलान करने वाले योगेंद्र यादव बिन पेंदी का लोटा साबित हुए हैं। स्वराज पार्टी बनाने वाले योगेंद्र यादव कुछ समय पहले तक कृषि सुधारों के नाम पर हमारी सरकार को घेरते थे, आज वो कृषि सुधार किए जाने के बाद किसानों को न केवल भड़काने में जुटे हुए हैं, बल्कि भारत बंद के नाम पर आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई को भी रोकने पर आमादा हैं। मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया था कि सरकार एपीएमसी एक्ट को लेकर कुछ नहीं कर रही है। लेकिन आज वही योगेंद्र यादव यूटर्न लेकर इस पर राजनीति करने में जुट गए हैं।

अकाली दल द्वारा अध्यादेश का समर्थन, कानून का विरोध 

कृषि सुधार कानूनों पर अकाली दल का आज जो रवैया है, वो कुछ दिनों तक पहले तक नहीं था। 12 दिसंबर, 2019 को एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में अकाली दल के सांसदों के बोल कुछ अलग ही थे। उस दिन उन्होंने कहा था कि एपीएमसी भ्रष्टाचार और राजनीति का अड्डा बन चुकी है और वहां बिचौलियों और दलालों का बोलबाला रहता है। यही नहीं उन्होंने कहा था कि एपीएमसी किसानों के हित में नहीं है। इसके बाद 3 जून, 2020 को जब इस पर अध्यादेश लाया गया, तब भी अकाली दल सरकार के उस फैसले के साथ था। अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर उस निर्णय का हिस्सा थी। उस समय अकाली दल ने कोई विरोध नहीं किया था। लेकिन आज अकाली दल के सुर एकदम अलग हैं।

मुलायम सिंह ने भी APMC का विरोध किया था 

समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद मुलायम सिंह यादव ने एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी में की रिपोर्ट में 12 दिसंबर, 2019 को सुझाव दिया था कि APMC में भी भ्रष्टाचार और राजनीति है। बिचौलियों और दलालों का बोलबाला होने से किसानों को सही लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए APMC किसानों के हित में नहीं है। 

ममता पहले ही केंद्र से मिलता-जुलता कानून लागु कर चुकी हैं 

जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसानों के आंदोलन के समर्थन की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अपने राज्य में इससे मिलता-जुलता एक कानून 2014 में ही पारित कर लिया था। ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में ‘एग्रीकल्चर मार्केटिंग बिल’ विधानसभा में पास कराया था। अब वो मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं।

ममता बनर्जी ने कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार को या तो कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए, या फिर इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने डेरेक ओ ब्रायन सहित तृणमूल कॉन्ग्रेस के अपने कुछ वफादार नेताओं को सिंघु सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के पास भेजा भी और प्रदर्शनकारी नेताओं से बातचीत की। इस दौरान योगेंद्र यादव भी देखे गए। मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को किसान संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है जिसे कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया है।

मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी भेजने की छूट मिलती है, साथ ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ की स्थिति में प्राइवेट कंपनियों की मनमानी पर भी लगाम लगती है। इसमें क्षति की स्थिति में खरीददार पर ही सारी जिम्मेदारी डाल दी गई है और किसान इन सबसे मुक्त है। रुपए के भुगतान के लिए समयसीमा भी दी गई है। बावजूद इसके भ्रम फैला कर किसानों को बरगलाया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2014 में जो ‘एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग (रेगुलेशन) बिल’ पास कराया था, दावा किया गया था कि इससे किसानों को अपने उत्पादों के उचित दाम मिलेंगे। ममता बनर्जी सरकार ने कहा था कि बिचौलियों की गतिविधियों को रोकने के लिए ऐसा किया गया है। साथ ही कहा था कि बिचौलियों से निपटने के कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और उनसे निपटने में ये कानून सहायक सिद्ध होगा।

आज जब मोदी सरकार यही कर रही है तो ममता बनर्जी सहित पूरे विपक्ष को दिक्कत है। पश्चिम बंगाल के उस कानून के अनुसार, इससे किसानों की पहुँच एक नए बाजार तक होगी और वो सीधे उपयोगकर्ताओं तक अपने उत्पाद बेच सकेंगे। ग्राहकों और किसानों, इसे दोनों के लिए सरकार ने लाभदायक बताया था। साथ ही कहा गया था कि दोनों को ज्यादा भरोसेमंद सिस्टम का हिस्सा बनाना राजकोष के लिए भी अच्छा होगा।

ठीक इसी तरह, NCP के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार आज ‘किसानों’ के आंदोलन को समर्थन देते हुए कृषि कानूनों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। शरद पवार यूपीए सरकार में लगातार 10 वर्षों तक केंद्रीय कृषि मंत्री थे और तब वो इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी कर रहे थे, जिनके विरोध में आज वो खड़े हैं। उन्होंने APMC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था। उन्होंने तब इन सबके लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी पर जोर दिया था, जबकि आज ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर किसानों की जमीनें ले लेंगे और उन्हें रुपए नहीं देंगे।

योगेंद्र यादव करेंगे पंजाब के किसानों के ‘चक्का जाम’ को लीड, दूध-फल-सब्जी भी नहीं आने देंगे

इस तथाकथित किसान आंदोलन में एक नया किसान पैदा हुआ, जिसका नाम है योगेंद्र यादव। ये आदमी कब से किसान हो गया, इस बहरूपिए की पृष्ठभूमि देखनी होगी। लेकिन 2014 में मोदी लहर को रोकने जब सोनिया गाँधी ने अपनी समिति के अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन करवाया था, तब मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और योगेंद्र यादव आदि सभी अराजक तत्व सोनिया गाँधी की समिति में थे, और उन दिनों हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आप" और अगले अंक में शीर्षक "कांग्रेस और आप का DNA Positive" रिपोर्ट प्रकाशित की थी, लेकिन तब भी इनके किसान होने की दूर तक कहीं कोई नामोनिशान नहीं मिला।  
खैर, इस नए बने किसान के सामने सरसों, पालक, गाजर आदि के बीज रख पूछा जाए कि कौन-सा बीज किसका है? नहीं बता पायेगा ये बहरूपिया तथाकथित किसान। दूसरे, जिन कृषि बिलों को लेकर इन अराजक तत्वों ने इतना उधम मचाया हुआ, बताएं कि "यदि पूर्व के बिल किसानों के हित में थे, तब क्यों किसान भूख और कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहा था? ये विदेशी चंदे से दिल्ली को बंधक बनाकर दिल्लीवासियों की ज़िंदगी दूबर करके क्या मिल रहा है। यह वही दिल्ली है, जिसने योगेंद्र यादव की स्वराज पार्टी को इतनी शर्मनाक हार दी थी कि कोई उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाया, क्या योगेंद्र उस अपमानजनक हार का बदला ले रहे हैं? चुनाव के दौरान खुद के बचपन में सलीम होने की वोटरों को दुहाई देकर भी करारी शिकस्त को नहीं टाल पाए योगेंद्र यादव सहूलियत के हिसाब से चोला ओढ़ लेते हैं। कभी राजनीतिक विश्लेषक की, कभी राजनैतिक दल के नेता की तो कभी किसान नेता की।

फिलहाल विफल राजनेता और पेशेवर प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव पंजाब के किसानों के विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। पंजाब के किसान नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। दिसंबर 6, 2020 को एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, योगेंद्र यादव ने कहा कि बंद के दौरान आवश्यक वस्तुओं के वितरण की भी अनुमति नहीं होगी। उन्होंने कहा कि दोपहर 3 बजे तक चक्का जाम रहेगा। किसान संगठनों ने 8 दिसंबर को भारत बंद का आह्वान कर रखा है।

जनता में होते रोष का भी इनको सामना करना पड़ेगा। जो तथाकथित नेता दूध, सब्जी आदि को बंद कर दे,उसे नेता कहना नेता की गरिमा का अपमान है, इसलिए इन तथाकथित नेताओं को चुनावों में नकार रही हैं, देखिए ट्विटर पर जनता का गुस्सा:-

हालाँकि योगेंद्र यादव ने कहा कि विवाह और इमरजेंसी सेवाओं की अनुमति होगी। दूध, फल, सब्जियों और अन्य सेवाओं की डिलीवरी बंद रहेगी। सिंघु बॉर्डर पर संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “8 तारीख को सुबह से शाम तक भारत बंद रहेगा। चक्का जाम शाम तीन बजे तक रहेगा।

वैसे योगेंद्र यादव खुद किसान नहीं हैं। उन्हें हाल ही में किसानों और केंद्र सरकार के बीच इस मामले पर चर्चा में शामिल होने से रोका गया, क्योंकि वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। यादव ने दावा किया कि गृह मंत्री अमित शाह ने खुद उनकी उपस्थिति पर आपत्ति जताई थी।दूध-फल-सब्ज़ी पर रोक रहेगी। शादियों और इमरजेंसी सर्विसेज़ पर किसी तरह की रोक नहीं होगी।”

योगेंद्र यादव ने अपने बहिष्कार को लेकर कहा था, “हालाँकि किसान यूनियन ने फैसला किया कि बैठक का निमंत्रण तभी स्वीकार किया जाएगा जब चार प्रतिनिधि भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल किए जाएँगे। मुझे सूचित किया गया कि अमित शाह ने व्यक्तिगत रूप से इसका हिस्सा होने पर आपत्ति जताई थी। सरकार ने कहा कि मैं राजनीतिक व्यक्ति हूँ। किसान संघ बैठक का बहिष्कार करने के लिए तैयार थे, लेकिन वे मेरी जिद पर आगे बढ़ गए।”

योगेंद्र यादव जैसों के ‘इच्छाधारी’ चोले और विरोध-प्रदर्शनों में कथित तौर पर की गई सांप्रदायिक टिप्पणी को लेकर लोग विरोध-प्रदर्शनों के पीछे की मंशा पर सवाल उठाने लगे हैं।

पिछले दिनों किसान संगठन और केंद्र सरकार के बातचीत में शामिल प्रतिनिधिमंडल में स्वराज पार्टी (Swaraj Party) के नेता योगेंद्र यादव (Yogendra yadav) का भी नाम था। मगर बाद में केंद्र सरकार के कहने के पर उनका नाम हटा दिया गया। सरकार ने कहा था कि वह ऐसा इसलिए कर रही है क्योंकि वह नहीं चाहती कि कोई राजनीतिक व्यक्ति इसमें शामिल हो।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा: हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या वाले चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम

योगेंद्र यादव
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी, जबकि आईपीएस अमित शर्मा और अनुज कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था। रतन लाल की हत्या मामले में दाखिल चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम है।
दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के अलावा छात्र नेता कंवलप्रीत कौर और वकील डीएस बिंद्रा के नाम का भी उल्लेख किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये तीनों 17 अभियुक्तों में तो शामिल नहीं हैं, लेकिन चार्जशीट में कहा गया है, “चाँद बाग में धरना प्रदर्शन के आयोजकों के संबंध डीएस बिंद्रा (AIMIM), कंवलप्रीत कौर (AISA), देवांगना कालिता (पिंजड़ा तोड़ ग्रुप), सफूरा जगरगर और योगेंद्र यादव जैसे लोगों से मिले हैं, जो कि साफ इशारा करते हैं कि हिंसा के पीछे कोई छुपा हुआ एजेंडा था।”
पुलिस के मुताबिक, चाँद बाग का प्रदर्शन मध्य-जनवरी से चल रहा था। 24 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गंभीर सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें, हेड कॉन्सटेबल रतन लाल समेत 53 लोगों की जान गई। इस मामले में 750 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। चार्जशीट के मुताबिक 17 आरोपितों की उम्र 18 से 50 के बीच है और उनमें से ज्यादातर चाँद बाग के ही रहने वाले हैं, जबकि कुछ पड़ोसी मुस्तफाबाद, जगत पुरी और प्रेम नगर में रहते हैं।
चार्जशीट में कहा गया है, “रतन लाल और एसीपी (गोकुलपुरी) और डीसीपी (शाहदरा) और कुछ अन्य पुलिसकर्मी चाँद बाग के धरना स्थल पर मौजूद थे। इसी दौरान उन पर भीड़ ने हमला कर दिया। रतन लाल वजीराबाद रोड पर स्थित डिवाइडर को कूदकर पार नहीं कर सके और गोली तथा पत्थर लगने से वहीं गिर पड़े। बताया गया कि रतन लाल को लाठी-डंडों से भी पीटा गया। उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनका पोस्टमार्टम 25 फरवरी को हुआ। रतन लाल की मौत गोली लगने से हुई। इसके अलावा उनके शरीर पर 21 जगह चोट के निशान थे।”
चार्जशीट में कहा गया है कि विरोध स्थल पर उपस्थित एक गवाह ने भी अपने बयान में योगेंद्र यादव का नाम लिया था। गवाह ने बताया कि विरोध स्थल पर बाहर से लोगों को बुलाया जाता था। यहाँ पर भानु प्रताप, डीएस बिंद्रा, योगेंद्र यादव, जेएनयू, जामिया और डीयू के कई छात्र आते थे, जो सरकार और NRC के खिलाफ बोलते थे और कहते थे कि मुसलमानों को चिंतित होना चाहिए। यह सब जनवरी से 24 फरवरी तक, यानी 50 दिनों तक जारी रहा।
वहीं योगेन्द्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में कहा, “मैंने जो कुछ भी कहा है वह पब्लिक डोमेन में है और कोई एक घटना बता दीजिए जब मैंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से हिंसा को भड़काने की बात कही।”
उल्लेखनीय है कि चार्जशीट में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया, “आरोपित व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से खुलासा किया कि चाँद बाग दंगो के पीछे की साजिश में उनके साथ डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, अतहर, शाहदाब, उपासना, तबस्सुम, रवीश और अन्य लोग शामिल थे।”
इसके अलावा, गिरफ्तार अभियुक्त शाहनवाज़ और इब्राहिम ने यह खुलासा किया कि इस दंगे के आयोजक डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, सुलेमान (सलमान), सलीम खान और सलीम मुन्ना थे। यह दंगा इन्हीं लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई साजिश का हिस्सा था।

मजदूरों को मुफ्त ट्रेन नहीं… सांसदों को मिलेगा 49000 रूपए महीना भत्ता : योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव सांसद भत्ता
झूठ फ़ैलाने में सिद्धहस्त 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जैसाकि सर्वविदित है कि 2014 में मोदी लहर को रोकने के लिए आम आदमी पार्टी के गठन से पूर्व योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक सभी तत्कालीन एवं वर्तमान कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य थे। जिसका उल्लेख उन दिनों एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते पहले शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आप" और फिर अरविन्द केजरीवाल के विरुद्ध न छापने की धमकी के बाद शीर्षक "कांग्रेस और आप का Positive DNA" लेखों में विस्तार से लिख चुका हूँ। जनता ने देखा कि जिस तरह चुनावों में कांग्रेस को भला-बुरा कहा जाता था, तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विरुद्ध 370 सबूत चुनावी रैलियों में दिखाए जाते थे, लेकिन सत्ता हाथ आते ही सब आरोप छूमंतर हो गए और कांग्रेस पवित्र। यानि जिस तरह कांग्रेस नितरोज जनता को भ्रमित करती रहती है, उसी भांति यही ग्रुप आज तक जनता को भ्रमित कर अपनी रोटियां सेंक रहा है। 
योगेंद्र यादव को चाहिए ये था कि 70,000 रूपए से कम हुए 49,000 रूपए को बढ़ावा बताकर जनता को गुमराह कर सरकार के विरुद्ध आक्रोश खड़ा करने की बजाए, भूतपूर्व और वर्तमान पार्षद से लेकर सांसद को मिलने वाली पेंशन को बंद करने का मुद्दा उठाना था। इस समय देश को धन की जरुरत भी है, क्योकि इस पेंशन में हर माह करोड़ों बर्बाद होता है। दूसरे यह कि जनसेवकों को वेतन एवं पेंशन क्यों? यह खुली लूट है। इसे बंद होना चाहिए।   
योगेंद्र यादव ने दावा किया है कि सरकार ने ‘चुपचाप’ सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र भत्ते (Salary Allowance) में बढ़ोतरी कर दी है। ‘स्वराज इंडिया’ के संस्थापक ने आदेश की प्रति शेयर करते हुए ऐसा दावा किया। उन्होंने लिखा कि जब सरकार को मजदूरों के लिए मुफ्त में ट्रेनें चलानी चाहिए थी, उसने ‘चुपके से’ सांसदों को मिलने वाले निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को बढ़ा कर 49,000 रुपए कर दिया है। ये आदेश अप्रैल 7, 2020 को आया।
हालाँकि, इस दौरान योगेंद्र यादव ये बताना भूल गए कि सांसदों के भत्ते को कितने रुपए से बढ़ा कर 49,000 रुपए किया गया है। अगर वो ये बात बता देते तो उनकी पोल खुल जाती। इसीलिए, उन्होंने आदेश की एक कॉपी शेयर कर दी और लोगों को भ्रम की स्थिति में डालने के उद्देश्य से झूठ फैलाया। योगेंद्र यादव इससे पहले भी सीएए और एनआरसी को लेकर ऐसी हरकतें कर चुके हैं। अजीबोगरीब पोल प्रेडिक्शन तो उनका पेशा ही है, जो सच ही नहीं होता।
दरअसल, सांसदों को पहले निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (Salary Allowance) के रूप में 70,000 रुपए मिलते थे, जिसमें 30% की कटौती की गई। कटौती के बाद उनका भत्ता 21,000 रुपए कम हो गया और अब ये 49,000 रुपए प्रति महीने आएगा। संसद की जॉइंट कमिटी ने ये सिफारिश की थी, जिसे राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वीकार कर लिया था।

इस आदेश को ‘Members of Parliament (Constituency Allowance) Amendment Rules, 2020’ नाम दिया गया है। अब आते हैं इससे पहले के भी एक फ़ैसले पर। कंस्टिटूएंसी अलाउंस से पहले MPLADS फण्ड (सांसद निधि) को भी सस्पेंड कर दिया गया था। अगले दो साल तक ये सस्पेंड रहेगा। यानी 2020-21 और 2021-22 में सांसदों को सांसद निधि की रकम नहीं दी जाएगी। ये रकम कोविड-19 से लड़ने में ख़र्च होगी। कई लोगों द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बावजूद योगेंद्र यादव ने अपना ट्वीट डिलीट नहीं किया।
इससे सरकार के पास 7900 करोड़ रुपए बचेंगे, जिसे कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया में डाला जाएगा। ये रकम कोरोना आपदा के बीच जनता की भलाई के लिए ख़र्च होगी। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सभी राज्यों के राज्यपालों से स्वेच्छा से ‘पे कट’ का फ़ैसला लिया और इसे सामाजिक दायित्व बताया। एक ख़बर के अनुसार, सरकार हर महीने एक सांसद पर औसतन 2.7 लाख रुपए ख़र्च करती है। संसद में फिलहाल कुल 795 सदस्य हैं, जिनमें से 545 लोकसभा में हैं और 250 राज्यसभा में।
फ़रवरी 2020 में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एक इवेंट में मंच साझा करते हुए मंच से ही योगेंद्र यादव ने यह कह सनसनी फैला दी थी कि, “भारत हिंदी, हिन्दू , हिन्दुस्तान से नहीं बनेगा, हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान देश को तोड़ देगा… आज यह करने की कोशिश हो रही है।” राम मंदिर पर फ़ैसले को लेकर उन्होंने कहा था कि राम मंदिर कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ भारत में सेक्युलर पॉलिटिक्स की परीक्षा होगा।