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ये कैसे किसान जो छिपा रहे ‘पहचान’, फूल बरसे तो फेंके पत्थर: शंभू बॉर्डर पर ही ठहर गया दिल्ली मार्च, ‘101 जत्थे’ में नाम किसी का… घुसने की कोशिश में कोई और था; क्या कोई और नाम से घुसने वाले गुंडे थे?

                                        फूल बरसाती पुलिस और प्रदर्शन करते किसान (फोटो साभार: ANI)
पंजाब से आए किसानों ने रविवार (8 दिसम्बर, 2024) को भी शंभू बॉर्डर पर खूब हंगामा काटा। हरियाणा पुलिस ने किसानों पर फूल बरसाए लेकिन उसका जवाब ने पत्थर से दिया दिया। पुलिस ने जब उन 101 किसानों की पहचान चेक करने की कोशिश की, जिनकी दिल्ली जाने के लिए लिस्ट दी गई थी, तो इस पर भी बवाल हुआ। पुलिस ने हंगामा काट रहे किसानों को तितर बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले चलाए। किसानों ने रविवार का जत्था वापस ले लिया।

हरियाणा पुलिस के अनुसार, जिन 101 किसानों की लिस्ट उन्हें सौंपी गई थी, वह उन किसानों से मेल नहीं खा रही थी जो दिल्ली जा रहे थे। पुलिस ने उनकी पहचान किए गए बगैर आगे जाने की अनुमति देने से मना कर दिया। पुलिस ने यह भी कहा कि इन किसानों को दिल्ली जाने की अनुमति नहीं दी गई है।

वहीं इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि किसान किसी भी त्याग के लिए तैयार हैं और वह पुलिस से सहयोग करेंगे। सरवन सिंह पंढेर ने बताया कि उनकी समस्याओं का हल पीएम मोदी के पास ही है। हरियाणा पुलिस ने इस बवाल के चालू होने से पहले किसानों के ऊपर फूल बरसाए।

हरियाणा पुलिस के एक जवान ने बताया कि उन्होंने किसानों पर फूल बरसाए लेकिन जवाब में उनके ऊपर पत्थर मारे गए और जालियाँ तोड़ने की कोशिश हुई। पुलिसकर्मी ने बताया कि उन्होंने किसानों को समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माने, उन्होंने अपनी आईडी और परमिशन भी नहीं चेक करवाई।

पुलिसकर्मी ने बताया कि जब पुलिस पर हमला हुआ तब उन्होंने हल्का बल प्रयोग किया। पुलिसकर्मी ने कहा कि वह लगातार किसानों से विनती करते रहे लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए लगाई गई जाली पर भी हमला हुआ। काफी देर तक चले हंगामे के बीच रविवार का जत्था वापस हो गया।

सरवन सिंह पंढेर ने दावा किया कि रविवार को हवा किसान जिस दिशा में हैं, उस तरफ बह रही है, इसलिए पुलिस अधिक आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। उन्होंने दावा किया कि रविवार को पुलिसिया कार्रवाई के चलते एक 8 किसान घायल हुए हैं। सरवन सिंह पंढेर ने कहा है कि अब दोबारा बातचीत करके रणनीति तैयार की जाएगी।

बीते कुछ दिनों से लगातार किसान फिर से दिल्ली जाने का प्रयास कर रहे हैं। इस बार किसानों ने कहा है कि वह पैदल ही दिल्ली की तरफ जाना चाहते हैं। वहीं हरियाणा पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए पंजाब और हरियाणा के बॉर्डर पर ही बैरीकेडिंग लगा दी है और रास्ता रोक दिया है। बीते लगभग एक वर्ष से यही स्थिति बनी हुई है।

बैठक छोड़ निकले CM केजरीवाल : ‘370 हटाने का समर्थन क्यों किया? ये किसानों का मुद्दा है’

                                                                                                                                        साभार 
पंजाब में किसानों के साथ मिलने गए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बैठक बीच में छोड़ कर निकलना पड़ा। अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के समर्थन पर किसानों ने उन्हें घेरा। ‘आम आदमी पार्टी’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल फ़िलहाल गोवा के दौरे पर हैं। इससे पहले वो पंजाब गए थे। दोनों ही राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और AAP वहाँ पाँव पसारने की जुगत कर रही है। दोनों ही राज्यों में भाजपा और कॉन्ग्रेस से उसकी टक्कर है।

पंजाब में अरविंद केजरीवाल ने किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की, लेकिन इस बैठक में जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के भाजपा सरकार के फैसले का मुद्दा उठा। किसान नेताओं ने अरविंद केजरीवाल से पूछा कि उन्होंने अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन क्यों किया था? दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इसे ‘राजनीतिक सवाल’ करार दिया और कहा कि इन सवालों पर वो बाहर जवाब देंगे।

अरविंद केजरीवाल ने बैठक में कहा, “दिल्ली की सारी शक्तियाँ तो इन्होंने पहले से ही छीन रखी है। मैं किसी राज्य के अधिकार छीनने का समर्थन क्यों करूँगा? मैं रोज लड़ रहा हूँ दिल्ली के लिए और हमने सुप्रीम कोर्ट में केस कर रखा है। किसानों के सम्बन्ध में आपके पास प्रश्न हैं तो पूछ सकते हैं, राजनीतिक प्रश्नों का जवाब बाहर दूँगा। अगर मैं किसानों के हक़ में नहीं हूँ तो देश का कोई नेता नहीं है। बड़ी से बड़ी क़ुरबानी देने के लिए तैयार हूँ। हमारी सरकार ने 7 वर्षों में दिल्ली के लिए जितना किया है, मुझे नहीं लगता किसी अन्य सरकार ने किया होगा।”

इस दौरान सांसद भगवंत मान भी उनके साथ मौजूद थे। केजरीवाल अपनी व्यस्तता का हवाला देकर बैठक से निकल गए, जिसके बाद भगवंत मान किसान नेताओं का माँ-मनव्वल करते नजर आए। ‘पंजाब किसान यूनियन’ के जिला उपाध्यक्ष गुरजंत सिंह मनसा ने केजरीवाल से ये सवाल पूछा था। केजरीवाल ने पूछा कि ये किसानों का मसला कैसे हैं? इस पर किसान नेताओं ने कहा कि ये किसानों और राज्यों के अधिकार का मसला है, इसे लागू करने वाले वही लोग हैं जो तीनों कृषि कानून लेकर आए।

‘किसान’ आंदोलन में भीड़ बढ़ाने का तरीका: लालच देकर लाई गई 3 महिलाओं ने खोला काला चिट्ठा, लौटना चाहती हैं घर

                         किसान आंदोलन में परेशान घूम रही महिलाएँ (साभार: दैनिक जागरण)

जिस तरह नागरिकता संशोधक कानून को मुसलमानों के विरुद्ध बताकर धन, बिरयानी और बढ़िया नाश्ता देकर तमाशा किया गया था, उसी तर्ज़ पर वर्तमान में किसान आंदोलन के समाचार आने शुरू हो चुके हैं। दोनों में अंतर केवल इतना ही पात्र बदल गए हैं, लेकिन पटकथा लेखक वही है।नारों में भी लगभग समानता है, देखिए : 

नागरिकता संशोधक विरोध                                 किसान आंदोलन 

योगी तेरी कब्र खुदेगी, मोदी तेरी                            मोदी को भी ठोकेंगे 

कब्र खुदेगी 

हिन्दुत्व तेरी कब्र खुदेगी                                     खालिस्तान 

बिरयानी, नाश्ता और चाय-पानी                            पिज़्ज़ा, मेवा, टीवी, बंध टेंट, मशीनों से                                                                रोटियां, ट्रैक्टर वैनिटी, ट्रैक्टर वैनिटी                                                                 (ब्यूटी पार्लर) मोबाइल बाथरूम टॉयलेट

,बॉडी मसाज पार्लर, पिज़्ज़ा पार्लर, जिम

,धोबी और कपड़ों को प्रेस करने 

की सुविधा,ऑटोमेटिक जूता पोलिश मशीनें

मोदी हमारे पास आकर बात करें                        मोदी आये बात करे 

CAA रद्द करो                                            तीनो कानून रद्द करों 

‘किसान’ आंदोलन के नाम पर प्रदर्शन स्थल पर बैठी 3 महिलाओं की पीड़ा जानने के बाद अब इस प्रदर्शन की मंशा पर सवाल उठना लाज़मी हो गया है। इन महिलाओं के नाम वीनू, सुनीता और पप्पी हैं। तीनों का आरोप है कि इन्हें एक व्यक्ति बरेली के फरीदपुर से यूपीगेट तक लाया और फिर वहाँ इन्हें बैठा कर गायब हो गया।

दैनिक जागरण में दिसंबर 19, 2020 को प्रकाशित हुई खबर के मुताबिक, यूपीगेट पर भीड़ बढ़ाने के लिए इन लोगों को लालच दिया गया और अब तीनों महिलाओं को इस लालच में फँसने का अफसोस हो रहा है।

महिलाएँ आपबीती सुनाते हुए उस व्यक्ति को कोसती हैं, जो उन्हें यूपी गेट तक लाया। वह कहती हैं कि इससे अच्छी तो वह फरीदपुर में ही थीं। सरकार ने उन्हें रहने के लिए घर दिया था। हर महीने राशन मिल रहा था। फैक्ट्री में नौकरी भी चल रही थी। लेकिन अब यूपीगेट में कुछ भी नही हैं।

महिलाओं के अनुसार उन्हें इलाज के लिए पैसे चाहिए थे, इसलिए जब उन्हें पैसे देने को कहा गया तो वह उस व्यक्ति के साथ चल दीं। हालाँकि अब उनके पास सर्दी में ठिठुरने की बजाय कोई रास्ता नहीं है। खबर के अनुसार, महिलाओं के पास न कंबल है और न उन्हें गर्म कपड़े मिले हैं।

तीनों महिलाओं की अलग-अलग परेशानियाँ हैं, जिसका इस्तेमाल उन्हें यूपीगेट तक लाने के लिए किया गया। जैसे सुनीता के अनुसार, एक हादसे में उनके शरीर के कुछ हिस्से जल गए थे, जिस वजह से वह काफी परेशान हैं। वहीं पप्पी को पथरी हो गई थी और उन्होंने हाल में अपना ऑपरेशन करवाया था। वीनू कहती हैं कि उनके पति के हाथ में फ्रैक्चर है, जिसकी वजह से वह कई दिन से चारपाई पर पड़े हैं।

महिलाएँ बताती हैं कि उन्हें इलाज और रुपया दोनों का लालच दिया गया। इसी कारण वह बरेली से यूपीगेट आ गईं। वह कहती हैं कि जब इस आंदोलन से उनका कोई लेना-देना नहीं है और उनकी कोई मदद भी नहीं हो रही तो आखिर उनको यहाँ क्यों लाया गया। तीनों महिलाएँ सुरक्षित अपने घरों को वापस लौटना चाहती हैं। वहाँ जाकर वह अपना वही जीवन फिर से जीना चाहती हैं।

उल्लेखनीय है कि वीनू, सुनीता और पप्पी नाम की तीनों महिलाएँ एक ओर जहाँ इस आंदोलन के नाम पर ठगा हुआ महसूस कर रही हैं, वहीं केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे ‘किसानों’ ने आज (दिसंबर 21, 2020) से सभी धरना स्थलों पर 24 घंटे की क्रमिक भूख हड़ताल करने का ऐलान किया है।

‘किसानों’ ने कहा है कि वो 25-27 दिसंबर तक हरियाणा के सभी टोल नाकों को मुफ्त कर देंगे और दो दिनों तक हरियाणा के नाकों पर टोल नहीं वसूलने दिया जाएगा। जबकि, पंजाब में पहले से ही कई नाकों पर टोल की वसूली नहीं हो रही है। 

नेताओं के दोगलेपन में पिसती जनता


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन की आड़ में राजनीतिक दोलों को अपनी सियासी रोटियां सेकेंने का मौका मिल गया है। एनडीए सरकार के विरोधी तमाम पार्टियां प्रदर्शनकारी किसनों को खुलकर समर्थन दे रही हैं। लेकिन ये पार्टियां खुद ऐसे कानून लागू करने की मांग कर चुकी हैं। यहां तक कि सरकार में रहते इसके लिए राज्य सरकारों को सुझाव भी दे चुकी हैं।

कांग्रेस के घोषणा-पत्र में शामिल थे नए कानून के प्रावधान 

कांग्रेस पार्टी आज नए कृषि सुधार कानूनों का मुखर विरोध कर रही है और किसानों को गुमराह कर रही है। उसी कांग्रेस पार्टी ने इस कानून को 2019 के घोषणापत्र में शामिल किया था। उनके घोषणापत्र में साफ-साफ लिखा था, “कांग्रेस Agricultural Produce Market Committees Act को निरस्त कर देगी और कृषि उत्पादों के व्यापार की व्यवस्था करेगी… जिसमें निर्यात और अंतर-राज्य व्यापार भी शामिल होगा, जो सभी प्रतिबंधों से मुक्त होगा।” उनका यह घोषणापत्र अब भी उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं। ये बातें उनके मेनिफेस्टो में पेज नंबर 17 के प्वॉइंट नंबर 11 में दर्ज है।


कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में वादा किया था कि वह Essential Commodities Act को खत्म कर उसकी जगह ECA 1955 के नाम से नया कानून लेकर आएगी। इसे भी उनके घोषणा पत्र के पेज नंबर 18 में देखा जा सकता है। 27 दिसंबर, 2013 को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि कांग्रेस शासित राज्य APMC Act के तहत फलों और सब्जियों को delist कर देंगे, ताकि उनके दाम कम किए जा सकें। मगर आज जब हमारी सरकार ने ऐसा कर दिया तो किसानों को भड़काने में राहुल गांधी ही सबसे आगे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र 

कृषि सुधार बिल पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोगला चरित्र सामने आ गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जब यूपीए सरकार में देश के कृषि मंत्री थे, तब ये इन कृषि सुधारों को लागू करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे थे, परंतु आज अपने ही फैसले से यू टर्न लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दे रहे हैं।

इसके लिए पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने अगस्त 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था। उन्होंने बार-बार Model APMC एक्ट को लागू करने और State APMC Acts में संशोधन के लिए कहा था। उन्होंने मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था, ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।

अगस्त 2010 में लिखी चिट्ठी में शरद पवार जी ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत है और इस जरूरत को Model APMC एक्ट पूरा करता है। वहीं नवंबर 2011 में लिखी चिट्ठी में उन्होंने फिर से यही बात दोहराई और निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए।

मई 2012 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार का राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दर्ज है। इसमें उन्होंने खुलकर Agriculture Marketing Reforms का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि “कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे Agri-procurement के उदारीकरण का प्रस्ताव… हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से APMC एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।” लेकिन वही शरद पवार आज इन कृषि सुधारों का न केवल विरोध कर रहे हैं, बल्कि किसानों को इसके लिए भड़का भी रहे हैं।

शिव सेना ने भी पहले अध्यादेश को लागु कर, दबाव में वापस लिया 

10 अगस्त, 2020 को महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए किसान बिल के तीनों अध्यादेशों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। महाराष्ट्र उन शुरुआती राज्यो में था, जो किसान बिल के तीनों अध्यादेश को तत्काल और सख्ती से लागू करने के आदेश दिया था। दो पेज पेज के इस ऑर्डिनेंस को 10 अगस्त, 2020 के दिन मार्केटिंग के स्टेट डायरेक्टर सतीश सोनी ने सभी बाजार समिति को सख्ती से लागू करने को कहा था। लेकिन बाद में कांग्रेस और एनसीपी के दबाव के बाद उद्धव सरकार ने अपने 10 अगस्त के विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी। अब शिवसेना भी किसानों के आंदोलन और भारत बंद को पूरा समर्थन दे रही है।

डीएमके ने भी बिचौलियों से मुक्ति का वायदा किया था   

डीएमके आज मोदी सरकार के कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रही है। और इस मुद्दे पर भारत बंद का भी समर्थन कर रही है, लेकिन यही डीएमके 2016 के विधानसभा चुनाव में कृषि सुधार बिल को अपने घोषणापत्र में शामिल कर चुकी है। डीएमके ने उस समय अपने मेनिफोस्टो में वादा किया था कि सरकार में आने पर वो किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी एक्ट में संशोधन करेगी, ताकि किसान बिना किसी बिचौलिए के अपनी उपज को अधिक से अधिक दाम पर बेच सकें। यही नहीं, इसके लिए उसने Comprehensive Agriculture Produce Marketing Exchange बनाने का भी वादा किया था।

केजरीवाल ने भी अध्यादेश को लागु करने के बावजूद विरोध 

किसानों के आंदोलन से आज दिल्ली वाले ही सबसे ज्यादा परेशान हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का दोहरा रवैया जगजाहिर हो चुका है। खास बात ये है कि किसानों को भड़काने में और भारत बंद का आगे बढ़कर समर्थन करने वाले केजरीवाल की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। एक तरफ तो आम आदमी पार्टी नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही है और दूसरी तरफ उसने इस कानून को 23 नवंबर को ही लागू भी कर दिया। और इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी।

स्वराज्य पार्टी के योगेंद्र यादव की नौटंकी 

किसान आंदोलन में घुसकर चेहरा चमकाने वाले और भारत बंद का ऐलान करने वाले योगेंद्र यादव बिन पेंदी का लोटा साबित हुए हैं। स्वराज पार्टी बनाने वाले योगेंद्र यादव कुछ समय पहले तक कृषि सुधारों के नाम पर हमारी सरकार को घेरते थे, आज वो कृषि सुधार किए जाने के बाद किसानों को न केवल भड़काने में जुटे हुए हैं, बल्कि भारत बंद के नाम पर आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई को भी रोकने पर आमादा हैं। मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया था कि सरकार एपीएमसी एक्ट को लेकर कुछ नहीं कर रही है। लेकिन आज वही योगेंद्र यादव यूटर्न लेकर इस पर राजनीति करने में जुट गए हैं।

अकाली दल द्वारा अध्यादेश का समर्थन, कानून का विरोध 

कृषि सुधार कानूनों पर अकाली दल का आज जो रवैया है, वो कुछ दिनों तक पहले तक नहीं था। 12 दिसंबर, 2019 को एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में अकाली दल के सांसदों के बोल कुछ अलग ही थे। उस दिन उन्होंने कहा था कि एपीएमसी भ्रष्टाचार और राजनीति का अड्डा बन चुकी है और वहां बिचौलियों और दलालों का बोलबाला रहता है। यही नहीं उन्होंने कहा था कि एपीएमसी किसानों के हित में नहीं है। इसके बाद 3 जून, 2020 को जब इस पर अध्यादेश लाया गया, तब भी अकाली दल सरकार के उस फैसले के साथ था। अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर उस निर्णय का हिस्सा थी। उस समय अकाली दल ने कोई विरोध नहीं किया था। लेकिन आज अकाली दल के सुर एकदम अलग हैं।

मुलायम सिंह ने भी APMC का विरोध किया था 

समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद मुलायम सिंह यादव ने एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी में की रिपोर्ट में 12 दिसंबर, 2019 को सुझाव दिया था कि APMC में भी भ्रष्टाचार और राजनीति है। बिचौलियों और दलालों का बोलबाला होने से किसानों को सही लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए APMC किसानों के हित में नहीं है। 

ममता पहले ही केंद्र से मिलता-जुलता कानून लागु कर चुकी हैं 

जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसानों के आंदोलन के समर्थन की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अपने राज्य में इससे मिलता-जुलता एक कानून 2014 में ही पारित कर लिया था। ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में ‘एग्रीकल्चर मार्केटिंग बिल’ विधानसभा में पास कराया था। अब वो मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं।

ममता बनर्जी ने कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार को या तो कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए, या फिर इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने डेरेक ओ ब्रायन सहित तृणमूल कॉन्ग्रेस के अपने कुछ वफादार नेताओं को सिंघु सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के पास भेजा भी और प्रदर्शनकारी नेताओं से बातचीत की। इस दौरान योगेंद्र यादव भी देखे गए। मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को किसान संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है जिसे कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया है।

मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी भेजने की छूट मिलती है, साथ ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ की स्थिति में प्राइवेट कंपनियों की मनमानी पर भी लगाम लगती है। इसमें क्षति की स्थिति में खरीददार पर ही सारी जिम्मेदारी डाल दी गई है और किसान इन सबसे मुक्त है। रुपए के भुगतान के लिए समयसीमा भी दी गई है। बावजूद इसके भ्रम फैला कर किसानों को बरगलाया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2014 में जो ‘एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग (रेगुलेशन) बिल’ पास कराया था, दावा किया गया था कि इससे किसानों को अपने उत्पादों के उचित दाम मिलेंगे। ममता बनर्जी सरकार ने कहा था कि बिचौलियों की गतिविधियों को रोकने के लिए ऐसा किया गया है। साथ ही कहा था कि बिचौलियों से निपटने के कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और उनसे निपटने में ये कानून सहायक सिद्ध होगा।

आज जब मोदी सरकार यही कर रही है तो ममता बनर्जी सहित पूरे विपक्ष को दिक्कत है। पश्चिम बंगाल के उस कानून के अनुसार, इससे किसानों की पहुँच एक नए बाजार तक होगी और वो सीधे उपयोगकर्ताओं तक अपने उत्पाद बेच सकेंगे। ग्राहकों और किसानों, इसे दोनों के लिए सरकार ने लाभदायक बताया था। साथ ही कहा गया था कि दोनों को ज्यादा भरोसेमंद सिस्टम का हिस्सा बनाना राजकोष के लिए भी अच्छा होगा।

ठीक इसी तरह, NCP के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार आज ‘किसानों’ के आंदोलन को समर्थन देते हुए कृषि कानूनों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। शरद पवार यूपीए सरकार में लगातार 10 वर्षों तक केंद्रीय कृषि मंत्री थे और तब वो इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी कर रहे थे, जिनके विरोध में आज वो खड़े हैं। उन्होंने APMC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था। उन्होंने तब इन सबके लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी पर जोर दिया था, जबकि आज ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर किसानों की जमीनें ले लेंगे और उन्हें रुपए नहीं देंगे।

दिल्ली दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काने वाला संगठन ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को पहुँचा रहा भोजन: 25 मस्जिद काम में लगे

                                 UAH का संस्थापक खालिद सैफी (बाएँ) CAA विरोधी दंगों में सक्रिय था
कहते हैं चोर अपने क़दमों के निशान छोड़ ही जाता है, वही बात किसान आन्दोलन में भी नज़र आ रही है। कांग्रेस शासित राज्य से निकले किसान का चोला ओढ़े उपद्रवियों की असलियत समय से पूर्व ही उजागर हो गयी। अपनी ज़िंदगी में अनगिनत धरने और प्रदर्शन देखे, लेकिन 2020 में नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में और अब हो रहे किसानों के नाम पर उपद्रवियों के आन्दोलन जिस तरह हिन्दू, हिन्दुत्व विरोधी, योगी और मोदी विरोधी नारेबाजी देखने को मिल रही है, किसी अन्य धरने अथवा प्रदर्शन में देखने अथवा सुनने को नहीं मिला। 

सोशल मीडिया पर वायरल 
दूसरे, नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में बने शाहीन बाग़ में ओवैसी की पार्टी के दिल्ली पदाधिकारी डी एस बिंद्रा ने फ्लैट बेचकर लंगर लगाकर खूब वाहवाही लूटी, लेकिन वो भांडा भी बहुत जल्दी फूट गया। पार्टी फण्ड से ख़रीदा गया था फ्लैट। उसी तर्ज पर किसानों के नाम हो रहे प्रदर्शन में खाने का प्रबंध भी अराजक ही कर रहे हैं, और इस काम में मस्जिदों का भी इस्तेमाल हो रहा है। पंजाब और पंजाब से बाहर सिख समुदाय को इस षड़यंत्र को समझ सिख प्रदर्शनकारियों को सचेत करना होगा। शंका है, कहीं अराजक तत्व इन्हें उकसा कर किसी हिंसक घटना को अंजाम दिलवा कर हिन्दू-सिख दंगा करवाकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयत्न करेंगे। क्योंकि प्रदर्शनकारी जिस तरह के उत्तेजक नारेबाजी कर रहे हैं, वह अच्छे चिन्ह नहीं दिखाई पड़ते। उससे हिन्दू और सिख दोनों ही समुदायों को एकजुट रहकर किसी भी अनहोनी को पैरों तले मसलना होगा। 

इन प्रदर्शनकारियों को इनके आयोजकों और समर्थकों ने अच्छी तरह हर पहलू से सचेत करवाकर दिल्ली भेजा है। जिस तरह की नारेबाजी हो रही है, उसका इस प्रदर्शन के आयोजक और समर्थकों को जवाब देना होगा।    

पंजाब में कथित किसान आंदोलन को लेकर देश भर में बहस चल रही है। खालिस्तानी संगठनों के साथ-साथ ‘यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (UAH)’ संगठन के भी इसमें शामिल होने और इसे समर्थन देने के आरोप हैं। ये वही इस्लामी संगठन है, जिस पर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में शामिल होने के भी आरोप हैं। UAH ने किसान आंदोलनकारियों को भोजन व अन्य चीजें पहुँचाने का जिम्मा उठा रखा है।

UAH की पूरी कोशिश है कि दिल्ली पहुँचे ‘किसान’ आंदोलनकारी ज्यादा से ज्यादा दिनों तक यहाँ रहें और लंबे समय तक हंगामा करें। इसलिए, उसने दिल्ली की 25 मस्जिदों के साथ मिल कर आंदोलनकारियों को न सिर्फ खाने-पीने की चीजें, बल्कि रहने के लिए जगह भी मुहैया कराने का जिम्मा उठा लिया है। UAH के मुखिया नदीम खान ने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को मदद पहुँचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है।

UAH ग्रुप का व्हाट्सप्प स्क्रीनशॉट वायरल हुआ था

उन्होंने बताया कि 4 किचन पूरे 24 घंटे चलाए जा रहे हैं, ताकि आंदोलनकारियों को भोजन मुहैया कराया जा सके। हौज खास, रोहतक, ओखला और ओल्ड दिल्ली में ये किचन स्थापित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इन 4 जगहों के अलावा आंदोलनकारियों को उनकी माँग के हिसाब से पार्सल भी पहुँचाए जा रहे हैं। गाड़ियों का इस्तेमाल कर भोजन पैकेट्स आंदोलनकारियों तक पहुँचाया जा रहा है।

UAH की स्थापना खालिद सैफी ने की थी। वो एक इस्लामी कट्टरपंथी है, जिस पर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काने के आरोप हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी संसद में इस दंगे पर बोलते हुए इस संगठन का नाम लिया था। उन्होंने कहा था कि कैसे UAH ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे से पहले सड़कों को जाम करने की बात की थी। उसे गिरफ्तार कर उस पर UAPA भी लगाया गया था।

सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें भी वायरल हुई थीं, जिसमें खालिद सैफी दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, रवीश कुमार से लेकर JNU के छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ देखा गया था। इनमें खालिद सैफी को वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की आरफा खानम, धान को गेहूँ बताने वाले यूट्यूबर अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के साथ देखा गया था।

UAH का एक व्हाट्सप्प ग्रुप भी था, जिसमें कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और विदेश से फंड्स पाने वाले NGO के साथ संबंधों के बारे में पता चला था। इस ग्रुप के एक स्क्रीनशॉट में निकिता चतुर्वेदी नाम की एक महिला ‘खालिद भाई, उमर और नदीम भाई’ का नाम लेती हैं, जिसके जवाब में लिखा जाता है कि ये तीनों प्रदर्शन में आ रहे हैं। निकिता फिर लिखती हैं कि लोग आपका इंतजार कर रहे हैं। अब दिल्ली दंगों का आरोपित संगठन UAH ‘किसान’ आंदोलन को हवा दे रहा है।


यही नदीम खान अब आंदोलनकारियों के लिए सारी व्यवस्थाएँ कर रहा है। CAA विरोधी उपद्रव के दौरान UAH के एक कार्यक्रम में योगेंद्र यादव और शरजील इमाम जैसे विवादित चेहरों ने लोगों को सम्बोधित किया गया था। अब फिर से वही ‘सिख-मुस्लिम एकता’ की बातें की जा रही है। एक सिख व्यक्ति ने CAA विरोधी प्रदर्शनकारियों को लंगर खिलाया था, तब भी ये प्रोपेगेंडा चलाया गया था। बाद में पता चला कि वो AIMIM का नेता है।

जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे। : किसान प्रदर्शन में खालिस्तानी नारेबाजी

पंजाब और हरियाणा के किसान केंद्र सरकार के कृषि सुधार क़ानून के विरोध में ‘दिल्ली चलो मार्च’ निकाल रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ प्रदर्शनकारी किसान करनाल से देश की राजधानी दिल्ली की तरफ बढ़ रहे थे। इस बीच पुलिस प्रशासन ने भी स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया था। लेकिन विरोध प्रदर्शन के दौरान कई पहलू सामने आ रहे हैं जिसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है किसान आंदोलन का हिंसक पहलू। कथित तौर पर ऐसी तमाम तस्वीरें और वीडियो सामने आए जिसमें प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान के समर्थन की बात सामने आ रही है।

इसी तरह का एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे।

ट्विटर पर साझा किए गए एक समाचार चैनल के वीडियो में व्यक्ति कहता है, “अभी हमारी सरकार के साथ एक मीटिंग है अगर उसमें कुछ हल निकलता है तो ठीक है। मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे। हमारे शहीद उधम सिंह कनाडा की धरती पर जाकर उन्हें (अंग्रेज़ों को) ठोक सकते हैं तो दिल्ली कुछ भी नहीं है हमारे लिए। जब इंदिरा ठोक दी तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।” 

इसी वीडियो के अगले हिस्से में लोगों को यह कहते हुए भी सुना जा सकता है कि सरकार के साथ 3 दिसंबर को होने वाली बैठक में कोई नतीजा नहीं निकलता है। तब वहाँ मौजूद लोगों के पास बैरीकेडिंग तोड़ने और हिंसक होने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा। ज़मीन पर हो रहे प्रदर्शन के अलावा सोशल मीडिया पर भी किसान आंदोलन को लेकर काफी प्रतिक्रिया सामने रही हैं। एक पंजाबी मीडिया समूह द्वारा साझा किए गए वीडियो में तमाम यूज़र्स ने टिप्पणी की है और टिप्पणी में वह इस आंदोलन को हिंसक बनाने की बात कह रहे हैं।

वह प्रदर्शन कर रहे किसानों को उग्र और हिंसक होकर अपनी बातें रखने का आह्वान कर रहे हैं।

 एक टिप्पणी में यूज़र किसानों के हाथों में एके-47 देने की बात कह रहा है। एक और यूज़र टिप्पणी करते हुए कहता है कि यह सार्वजनिक संपत्ति ही तो है, किसी के बाप की जागीर नहीं है। इसके अलावा तमाम टिप्पणियों में प्रधानमंत्री और सरकार के लिए अपशब्द भी कहे गए हैं। 

किसानों के प्रदर्शन के नाम पर इस तरह की हिंसक विचारधारा और खालिस्तानी आतंकवाद को बढ़ावा देने पर कई तरह के सवाल खड़े होते हैं। ट्विटर पर ऐसी तमाम तस्वीरें साझा की गई जिसमें खालिस्तान समर्थक पोस्टर लेकर प्रदर्शन करते हुए देखे जा सकते हैं।

पोस्टर और तस्वीरों में ‘राज करेगा खालिस्तान’ जैसे नारे भी लिखे हुए हैं,

कुछ पोस्टर में तो भिंडारवाले की तस्वीर भी लगी हुई है।

असल मायनों में इस प्रदर्शन का मकसद किसान हित है तो इसमें हिंसा का समर्थन और ‘इंदिरा को ठोका और मोदी को भी ठोक देंगे’ इस तरह के जहरीले बयानों का क्या अर्थ बनता है। आंदोलन की आड़ में हिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने और खालिस्तान का समर्थन करने से किसानों का भला होने से रहा। बशर्ते आम नागरिकों के हिस्से की असुविधा और माहौल बिगड़ना ज़रूर सुनिश्चित हो जाएगा। ऐसे में सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रदर्शन के दौरान ऐसी अराजक ताकत प्रासंगिक न होने पाएँ।

पंजाब और हरियाणा के किसानों का ‘दिल्ली चलो’ प्रदर्शन अंबाला-पटियाला सीमा पर उग्र हो गया था। यहाँ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने बैरीकेडिंग तोड़ कर आगे बढ़ने का प्रयास किया था और पथराव की ख़बरें भी सामने आ रही थीं। इसके अलावा पुलिस ने इन पर आँसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल भी किया था और इस बीच किसान कई दिनों का राशन लेकर दिल्ली की तरफ कूच कर रहे थे। इस मुद्दे पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने बयान दिया था, उन्होंने किसानों से प्रदर्शन नहीं करने की अपील की थी और 3 दिसंबर को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है।

केंद्रीय कर्मचारियों और किसानों को मोदी सरकार का तोहफा, यस बैंक के री-स्‍ट्रक्‍चर प्‍लान को मिली मंजूरी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों, पेंशनधारियों और किसानों को बड़ी सौगात दी है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले किए गए। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने फैसलों के बारे में जानकारी दी। जहां कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता बढ़ाने को मंजूरी दी गई। वहीं यस बैंक के खाताधारकों को भी बड़ी राहत दी गई है।
मोदी सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता 4 प्रतिशत बढ़ाने को मंजूरी दी है । इसका फायदा करीब 48 लाख कर्मचारियों और 65 लाख पेंशनर्स को होगा। बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता 1 जनवरी 2020 से लागू होगा। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मोदी सरकार ने 1 जनवरी, 2016 को 7वें वेतन आयोग का फैसला लिया था, तब भी लोगों की सैलरी में अच्छा इजाफा हुआ था। अब डीए 17 से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया है। इसके लिए सरकार को कुल 14,595 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे।
केंद्रीय कर्मचारियों के डीए में 4 फीसदी की बढ़ोतरी से मंथली सैलरी में 720 रुपये से 10,000 रुपये के बीच बढ़ोतरी हो सकती है। इससे पहले, मोदी सरकार की तरफ से 10 अक्टूबर, 2019 को भी केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई भत्ता में इजाफा किया गया था। उस वक्त सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों का डीए 12​ फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी कर दिया था।
केंद्रीय मंत्री जावडेकर ने कहा कि कोपरा जो खासकर दक्षिण भारत में तैयार किया जाता है, उसके एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है, पहले इसकी दर 9521 रुपये थी लेकिन अब इसमें 439 रुपये की बढ़ोतरी के साथ इसकी दर 9960 रुपये होगी। इससे 30 लाख किसान को लाभ मिलेगा।

जावड़ेकर ने कहा कि हमारे देश के यूरिया का निर्यात ज्यादा बढ़े, जिससे हमें आयात पर निर्भर ना रहना पड़े इसके लिए यूरिया का देशी उत्पादन बढ़ेगा। संशोधित नई मूल्य निर्धारण योजना-III 2 अप्रैल, 2014 को अधिसूचित की गई थी। संशोधित एनपीएस-III के लागू होने से मौजूदा यूरिया इकाइयों को प्रस्‍ताव में उल्लिखित सीमा के अनुसार निर्धारित लागत में उनकी वास्‍तविक वृद्धि की सीमा तक लाभ मिलेगा। इससे यह सुनिश्चित भी होगा कि किसी भी इकाई को अनुचित रूप से लाभ न मिले। इससे यूरिया इकाइयों के लगातार संचालन में मदद मिलेगी जिसके परिणामस्‍वरूप किसानों को यूरिया की निरंतर और नियमित आपूर्ति सुलभ होगी।
इस फैसले से उन यूरिया इकाइयों को 150 रूपये/मीट्रिक टन का विशेष मुआवजा भी मिलेगा जो 30 साल से अधिक पुरानी हैं और गैस में परिवर्तित हैं। इस मुआवजे से इन इकाइयों को प्रोत्‍साहन मिलेगा ताकि वे सतत उत्‍पादन के लिए व्‍यवहार्य बनी रहें।
केंद्र सरकार के कैबिनेट मीटिंग में यस बैंक के री-स्‍ट्रक्‍चर प्‍लान को मंजूरी मिल गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यस बैंक में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 49 प्रतिशत शेयर खरीदेगा। उन्होंने कहा कि 26 प्रतिशत शेयर में 3 साल का लॉक इन है। वहीं निजी निवेशकों के लिए भी 3 साल का लॉक इन पीरियड होगा। निर्मला सीतारमण ने बताया कि री-स्‍ट्रक्‍चरिंग प्‍लान का नोटिफिकेशन जल्‍द जारी कर दिया जाएगा।