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कनाडा : महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा का अपमान, हमास समर्थकों ने लगाया फिलिस्तीन का झंडा

फिलिस्तीनियों ने कनाडा में महाराजा रणजीत की प्रतिमा खंडित की (साभार: रिपब्लिक)
कनाडा के ब्रैम्पटन प्रांत में मुँह बाँधे कुछ फिलिस्तीनी उपद्रवियों ने महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति पर तोड़फोड़ करने की कोशिश की। उन्होंने महाराजा की प्रतिमा पर फिलिस्तीन का झंडा तक लगा दिया। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल हुआ है। वीडियो को कनाडा के एक पत्रकार ने शेयर किया है। पत्रकार ने उपद्रवियों को जिहादी कहकर संबोधित किया है।

वायरल हो रहा यह वीडियो करीब 37 सेकेंड का है। इसमें महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के प्लेटफॉर्म पर चढ़कर 2 आरोपित उनके घोड़े पर फिलिस्तीन का झंडा लगाते दिख रहे हैं। दोनों उपद्रवियों ने चेहरे पर नकाब बाँध रखा है। वहीं, नीचे कई व्यक्ति खड़े हैं। वीडियो में एक व्यक्ति महाराजा रणजीत सिंह के घोड़े पर कपड़ा बाँधता हुआ नजर आ रहा है।

इस घटना का कई लोगों ने वीडियो बनाया है। इस मामले में पुलिस से शिकायत की जा चुकी है। मामले की कनाडा पुलिस जाँच कर रही है। फिलिस्तीन के समर्थन के लिए निकाले गए विरोध प्रदर्शन के दौरान फिलिस्तीन समर्थकों ने इस घटना को अंजाम दिया। बताया जा रहा है कि प्रतिमा को खंडित करने वाले उपद्रवी का नाम होशाम हमदान है।

कनाडा का ब्रैम्पटन वही शहर है, जहाँ खालिस्तान समर्थक पर भी बड़ी संख्या में रहते हैं और भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। कई मौकों पर उन्होंने इसका प्रदर्शन किया है। हालाँकि, फिलिस्तीनी द्वारा महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को अपवित्र करने के बावजूद अभी तक उनकी तरफ से कोई बयान नहीं आया है।

कौन थे महाराजा रणजीत सिंह?

महाराजा रणजीत सिंह भारतीय इतिहास के प्रभावशाली राजाओं में से एक थे। वे सिख धर्म के एक महान राजा थे। उनका जन्म 13 नवंबर 1780 को पंजाब के गुजरांवाला में (अब पाकिस्तान में) हुआ था। सिर्फ 10 साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा था। मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने राजगद्दी सँभाली और 18 साल की उम्र में लाहौर को जीत लिया था।
महाराजा रणजीत सिंह ने 40 वर्षों के अपने शासनकाल में कई मुस्लिम शासन को खत्म किया। वहीं, अंग्रेजों को वे अपने साम्राज्य के आसपास भी फटकने भी नहीं दिया। महाराजा रणजीत सिंह जब 12 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। 12 साल की उम्र में उन्होंने गद्दी संभाली, लेकिन पंजाब के महाराजा के रूप में उनकी तापोशी 20 साल होने के बाद 12 अप्रैल 1801 को की गई।
ताजपोशी के बाद 1802 में उन्होंने अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया और 1807 में अफगानी शासक कुतुबुद्दीन को हराकर कसूर पर कब्जा कर लिया। उन्होंने सन 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने शक्तिशाली अफगानों को भी हरा दिया था। उन्हें प्रशासन में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और यूरोपीय भी शामिल थे।
बचपन में चेचक के कारण वे एक आँख से देख नहीं पाते थे। वे एक महान शासक, योद्धा और रणनीतिकार थे। उनकी उदारता की कई कहानियाँ भी प्रचलित हैं। उन्होंने सिख साम्राज्य की स्थापना की थी। इस कारण उन्हें ‘पंजाब का शेर’ कहा जाता था। महाराजा रणजीत सिंह की 27 जून 1839 को निधन हो गया था।

पाकिस्तानी फौजियों ने करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की बेअदबी, माँस पकाया, डांस करवाया, जमकर पी शराब : सामने आया वीडियो

करतारपुर साहिब में बेअदबी का मामला सामने आया है (चित्र साभार: @Msirsa/X & NDTV)
पाकिस्तान में स्थित सिखों के पवित्र स्थान करतारपुर साहिब गुरुद्वारे में बेअदबी का मामला सामने आया है। गुरुद्वारे के भीतर पार्टी का आयोजन किया गया और माँस-मछली खाया गया। इसके पश्चात गुरूद्वारे में नाच गाना भी हुआ।

भाजपा नेता और दिल्ली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धन कमिटी के पूर्व अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने यह जानकारी एक्स (पहले ट्विटर) पर दी है। उनका कहना है कि गुरुद्वारे के अंदर यह कार्यक्रम 18 नवम्बर को आयोजित हुआ।

सिरसा ने बताया कि करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की प्रबन्धन समिति PMU (Project Management Unit) के अध्यक्ष सैयद अबू बकर कुरैशी ने गुरुद्वारे के भीतर 18 नवम्बर पार्टी का आयोजन किया जिसमें माँस परोसा गया। इस पार्टी में 80 लोग शामिल हुए जिसमें नारोवाल जिले (जहाँ यह गुरुद्वारा स्थापित है) के जिलाधिकारी मोहम्मद शाहरुख और पुलिस अधिकारी भी थे।

इस पार्टी के दौरान माँस परोसने के लिए अलावा नाच गाना भी हुआ। सिरसा का कहना है कि पूरी दुनिया में रहने वाला सिख समुदाय इससे व्यथित है। उन्होंने पाकिस्तान की सरकार से इस मामले में जल्द कार्रवाई करने की माँग की है। उन्होंने इस बेअदबी की निंदा भी की है।

इस मामले पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमिटी, जो कि पूरे देश में गुरुद्वारों का प्रबन्धन करने वाली सबसे बड़ी संस्था है, के प्रवक्ता गुरुचरण ग्रेवाल ने बयान जारी किया है। उन्होंने इस बेअदबी की घटना को दुखद बताते हुए पाकिस्तान की सरकार से कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने करतारपुर साहिब गुरुद्वारे के जत्थेदार से भी इस मामले पर रुख स्पष्ट करने की अपील की है।

इस मामले में यह जानकारी भी सामने आई है कि इस कार्यक्रम का आयोजन पाकिस्तान रेंजर्स ने किया था। इस कार्यक्रम में करतारपुर साहिब के ग्रंथी भी शामिल हुए थे। यह कार्यक्रम करतारपुर PMU के क्षेत्र में किया गया। यह गुरुद्वारे का ही इलाका है। जहाँ कार्यक्रम आयोजित किया गया वहाँ पर चेकपॉइंट है।

करतारपुर साहिब, भारत की सीमा के काफी निकट पाकिस्तानी पंजाब के नरोवाल जिले में स्थित है। यह गुरुद्वारा सिखों के लिए काफी पवित्र जगह है, इस गुरुद्वारे की स्थापना सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरुनानक देव ने की थी, यह गुरुद्वारा रावी नदी के तट पर है।

अगस्त 2022 में भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी जिसमें कहा गया था कि करतारपुर कॉरिडोर में काम करने वाले कर्मचारियों ने गुरुद्वारे के भीतर माँस खाया और शराब पी। उन्होंने यहाँ नाच गाने का आयोजन भी किया।

करतारपुर साहिब जाने के लिए भारतीयों को वीजा की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ था। इसके अंतर्गत करतारपुर साहिब कॉरिडोर की स्थापना की गई थी। इस कॉरिडोर को नवम्बर 2019 में श्रद्धालुओं के लिए खोला गया था।

इस कॉरिडोर की देखरेख करतारपुर PMU करती है। इसका अध्यक्ष एक मुस्लिम को बनाया गया है। सैयद अबू बकर इस करतारपुर PMU के अध्यक्ष हैं। जिनकी नियुक्ति पर भी प्रश्न उठे थे कि एक सिख धर्मस्थल का अध्यक्ष मुस्लिम को कैसे बनाया जा सकता है।

लोग यह भी प्रश्न उठा रहे हैं कि दिन भर सिखों के लिए बोलने का दावा करने वाले पन्नू जैसे खालिस्तानी अब करतारपुर साहिब पर क्यों चुप हैं? क्या वह इस बेअदबी को सही मानते हैं जो उन्होंने कोई बयान जारी नहीं किया है।


पंजाब : डंडे-तलवारों के साथ चर्च पर हमला, दावा- निहंगों ने की बाइबिल की बेअदबी भी: ईसाई पक्ष ने भी चलाए ईंट-पत्थर

पंजाब के अमृतसर स्थित चर्च पर ईसाइयों की प्रार्थना के दौरान निहंगों का हमला (साभार- @paramaulakh02)
पंजाब के अमृतसर में रविवार (21 मई, 2023) को लोगों द्वारा चर्च पर हमला किया गया। हमलावरों को निहंग सिख बताया जा रहा है। यह हमला चल रही ईसाई प्रार्थना के दौरान किया गया। इस वजह से दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए और हालात तनावपूर्ण हो गए। घटनास्थल पर नारेबाजी और पत्थरबाजी भी हुई। मौके पर पहुँची पुलिस ने स्थिति को काबू किया। ईसाइयों ने निहंगों पर बाइबिल की बेअदबी का आरोप लगा कर कार्रवाई की माँग की है।

वहीं हमलावरों ने सिखों की वेशभूषा में ईसाईयत के प्रचार पर एतराज जताया है। पुलिस की मानें तो अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हमलावर निहंग ही थे या कोई और। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। घटना रविवार (21 मई, 2023) की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला अमृतसर के गाँव राजेवाल का है। यहाँ के सिखपाल राणा मिनिस्ट्रीज चर्च में 21 मई को दोपहर के समय प्रार्थना चल रही थी। प्रार्थना के ही दौरान निहंगों के वेश में लगभग 25 हमलावर अपने चेहरों को ढँक के आ धमके।

उनके हाथों में डंडे और तलवारें थीं। आरोप है कि हमलावरों ने आते ही चर्च में मौजूद लोगों से मारपीट शुरू कर दी। बाहर खड़ी गाड़ियों में भी तोड़फोड़ की गई और चर्च में रखी बाइबिल की भी बेअदबी हुई। इस अचानक हुए हमले से पहले तो अफरातफरी मची गई और बाद में दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। इस से हालात तनावपूर्ण हो गए।

बताया जा रहा है कि निहंगों के हमले के जवाब में ईसाई पक्ष से भी ईंट-पत्थर चलाए गए। इस दौरान दोनों तरफ से धार्मिक नारेबाजी भी की गई। हमलावरों का आरोप था कि चर्च के अंदर सिखों के वेश में प्रार्थना करवाई जाती है जिस पर उन्हें एतराज है। घटना की जानकारी मिलते ही मौके पर पुलिस पहुँची। पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग-अलग किया और समझाया। अमृतसर ग्रामीण के एसएसपी सतिंदर सिंह के मुताबिक अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर के जाँच की जा रही है।

‘लाइव हिंदुस्तान’ की रिपोर्ट के अनुसार निहंग समूहों ने इस घटना में अपनी संलिप्तता से इनकार किया है। साथ ही उन्होंने ऐसे हमलों के लिए निहंगों की पोशाक पहनने पर भी आपत्ति जताई है। अमृतसर ग्रामीण सतिंदर सिंह के मुताबिक, केस दर्ज कर के जाँच की जा रही है। हमलावरों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, पुलिस की जांच हमले का मकसद पता करना भी शामिल है।

इस हमले का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में दौड़ रहे निहंगों के हाथों में हथियार और डंडे देखे जा सकते हैं। कुछ लोग खुले मैदान और कुछ सड़क की तरफ भाग रहे हैं। ईसाई पक्ष खुद को पीड़ित बताते हुए अपने टूटे वाहन दिखा रहा है। पादरी जॉन का कहना था कि वो लोग चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे कि अचानक ही हमला कर दिया गया। उन्होंने निहंगों पर सख्त कार्रवाई न होने पर पूरे पंजाब में चक्का जाम करने और उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होने का एलान किया।

घटना के बाद ईसाई समुदाय के लोगों ने ण्डली ने जंडियाला गुरु-तरनतारन मार्ग पर दो घंटे तक विरोध प्रदर्शन किया और ट्रैफिक जाम किया। पंजाब अल्पसंख्यक आयोग सुभाष थोबा ने भी घटनास्थल का जायजा लिया। ईसाई समूहों का कहना है कि वो इस मामले को मुख्यमंत्री भगवंत मान के आगे उठाएँगे।

गौरतलब है साल 2021 में, SGPC ने पंजाब में हो रहे धर्मांतरण को रोकने के लिए डोर-टू-डोर अभियान की शुरुआत की थी। इसी के साथ पंजाब में चर्चों पर हमलों में भी वृद्धि हुई है। अगस्त 2022 में अमृतसर के ददुआना गाँव में एक ऐसी ही घटना में निहंगों ने जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप में ईसाइयों के एक कार्यक्रम को बाधित कर दिया था।


‘एक दिन सारे बदबूदार सिखों को मुस्लिम बनाएँगे, तैयार है प्लान’: पाकिस्तान के मौलाना डॉक्‍टर मोहम्‍मद सुलेमान ने गुरु नानक को भी कहे अपशब्द

पाकस्तानी मौलाना सुलेमान (साभार: NBT)
जिस तरह पाकिस्तान से भारत विरोधी बयानबाज़ी सामने आ रही है, कि पाकिस्तान कंगाली के कगार पर नहीं, बल्कि कंगाली के नाम पर भारत विरोधियों से धन एकत्रित कर आतंकियों और डॉ मोहम्मद सुलेमान जैसे ढोंगी सूफी संत मौलानाओं को पोषित करने के लिए सोंची-समझी सियासत को अंजाम दिया जा रहा है। 

सुलेमान ने सिख धर्म के विरुद्ध जिस मानसिकता को दर्शाया है, समस्त सिख समाज को पाकिस्तान से अपना विरोध दर्ज करवाकर ऐसे पाखंडी सूफी संतों पर सख्त कार्यवाही की मांग को लेकर प्रदर्शन करने चाहिए। 

भारत मे एक तरफ खालिस्तान की माँग को लेकर अमृतपाल सिंह जैसे लोग उत्पात मचा रहे हैं तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के मौलानाओं द्वारा सिखों को लेकर कई तरह के आपत्तिजनक बयान सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान के एक सूफी संत मौलाना डॉक्‍टर मोहम्‍मद सुलेमान का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह गुरुनानक देव के बारे में कई आपत्तिजनक बातें कह रहा है। वह उन्हें धर्मांतरित करने की बात कह रहा है।

डॉक्टर सुलेमान सिखों को गंदा और बदबूदार बता रहा है। उसका कहना है कि एक दिन सभी सिखों को इस्‍लाम कबूल करवाकर ही वह दम लेगा। इससे पहले भी एक मौलवी का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह गुरुनानक देव पर कई तरह की विवादित टिप्‍पणियाँ कर रहा है।

वीडियो में सुलेमान कहता है, “मुझे सिखों के काफी फोन आते हैं। अब जो है सो है, लेकिन मैं बहुत हैरान हूँ। हमारे पैगंबर ने तो हमसे बगल के बाल भी साफ करने को कहा है। मैं लाहौर में पढ़ता था, इसलिए मैंने इन्‍हें देखा है। अल्‍लाह मुझे माफ करे, ये सिख इतने गंदे हैं। इनके दाढ़ी होती है। हम इन सिखों को एक दिन मुसलमान बनाएँगे।”

नवभरात टाइम्स के अनुसार, सुलेमान आगे कह रहा है, “हमारे पास पूरा एक प्‍लान है और अभी इसे आगे न लेकर जाएँ।” सुलेमान यहीं नहीं रुकता है।। उसने यहाँ तक कह दिया कि सिखों के जो गुरु थे, पता नहीं वो क्‍या थे। सुलेमान कहना है कि पैगंबर उनसे अधिक महान थे। सुलेमान कहता है कि सिख अपने गुरु के पीछे भाग रहे हैं और फिर भी गंदे-गंदे काम करते हैं।

सुलेमान से पहले पाकिस्‍तान के एक मौलवी की क्लिप शेयर किया गया था। इस क्लिप में मौलवी ने सिखों के गुरु, गुरुनानक के बारे में कई बातें कही थीं। मौलवी का कहना था कि गुरुनानक ने कलमा नहीं पढ़ा था और इस्‍लाम कबूल नहीं किया था। इसलिए वह अच्‍छे इंसान नहीं हो सकते थे। उनका कहना था कि भले ही गुरुनानक, बाबा फरीद को पसंद करते थे मगर ऐसा करने से तो वह मुसलमान नहीं हो जाते। सच्‍चा मुसलमान वही है जो कलमा पढ़े।

माउंट कार्मेल में सिख छात्रा से पगड़ी उतारने को कहा: हिजाब वाली लड़कियाँ कर रहीं विरोध

 बेंगलुरु में पगड़ी पहनीं सिख लड़की को रोका
कर्नाटक में बुर्के पर चल रहे विवाद (Karnataka Hijab Row) के बीच एक सिख छात्रा को पगड़ी उतारने के लिए कहे जाने का मामला सामने आया है। घटना बेंगलुरु के माउंट कार्मेल पीयू कॉलेज की है। रिपोर्टों के अनुसार कॉलेज प्रशासन ने हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए सिख छात्रा से पहली बार 16 फरवरी 2022 को पगड़ी उतारने को कहा गया था। बताया जा रहा है कि छात्रा के पगड़ी पहनने से कॉलेज प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन हिजाब पहनने वाली छात्राओं के विरोध के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के मुताबिक जिस सिख छात्रा को पगड़ी उतारने को कहा गया, वह छात्र संगठन की अध्यक्ष भी है। छात्रा के परिवार ने अब कर्नाटक सरकार और हाई कोर्ट से निर्देश जारी करने की माँग की है। छात्रा के पिता का नाम गुरचरण सिंह है जो IT कम्पनी में बड़े अधिकारी हैं। उन्होंने पगड़ी हटाने से साफ मना कर दिया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरी बेटी को अब तक कॉलेज में किसी भी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा है। लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब परिस्थितियाँ विषम हैं। कोर्ट के आदेश में कहीं भी सिख पगड़ी का जिक्र नहीं हुआ है। हम इस मामले में सिख समुदाय और वकीलों के सम्पर्क में हैं। हमने कॉलेज प्रशासन से भी बेटी को पगड़ी के साथ पढ़ाई करने की अनुमति देने की माँग की है।”

वहीं कॉलेज प्रशासन ने इस मामले में छात्रा और उनके परिजनों से मिल कर हाई कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया है। कॉलेज के प्रवक्ता ने बताया, “हमने सभी छात्र-छात्राओं को 16 फरवरी को ही कोर्ट के आदेश से अवगत करवा दिया था। इसके बाद गतिविधियाँ सामान्य रहीं। मंगलवार को प्री-यूनिवर्सिटी एजुकेशन (नॉर्थ) के डिप्टी डायरेक्टर कॉलेज आए थे। वहाँ पर हिजाब पहने लड़कियों का समूह खड़ा था। उन्होंने सभी लड़कियों को ऑफिस में बुला कर उच्च न्यायालय से आदेश से अवगत करवाया।”

कॉलेज प्रवक्ता ने आगे कहा, “हमें सिख पगड़ी पहनने वाली छात्रा से कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन हिजाब वाली लड़कियों ने सिख लड़की के पगड़ी पहनने पर आपत्ति जताई। उन्होंने किसी भी लड़की के किसी भी धार्मिक चिन्ह का विरोध किया। ऐसे में हमने लड़की के पिता से फोन पर बात कर के उन्हें ई मेल भी किया। सिख छात्रा के पिता ने पगड़ी को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बताया, लेकिन जब दूसरी लड़कियों ने सभी को एक जैसे नियम की बात कही तब हमने उन्हें इससे अवगत करवाया।” डिप्टी डायरेक्टर जी श्रीराम के मुताबिक, “हमें इस मामले को और आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। हाई कोर्ट के आदेश का पालन किया जाएगा। लड़कियाँ अब मान गईं हैं। किसी को कोई दिक्कत नहीं है।”

बॉलीवुड अदाकारा सोनम कपूर ने सिख पगड़ी को की तुलना हिजाब से की

बॉलीवुड अभिनेत्री सोनम कपूर (Sonam Kapoor) द्वारा सिख पगड़ी पर शेयर की गई एक तस्वीर विवादों का विषय बन गई है। सोनम कपूर ने हिज़ाब और पगड़ी की तुलना करते हुए इंस्टाग्राम पर पगड़ी पहने एक सिख और हिजाब पहनी हुई एक महिला की तस्वीर शेयर की। इस पर विवाद बढ़ने और इसकी आलोचनाओं होने के बाद उन्होंने यह स्टोरी डिलीट कर दी।
                                                 सोनम कपूर द्वारा किया गया इंस्टाग्राम पोस्ट

भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा (Manjinder Singh Sirsa) ने ट्विटर पर सोनम कपूर को टैग करते हुए लिखा, “दस्त-ए-यार यानि कि भगवान का हाथ। ये चॉइस नहीं, बल्कि गुरू गोबिंद सिंह जी का आशीर्वाद और सिख पहचान का अभिन्न अंग है। इस संदर्भ में दस्तर और हिजाब की तुलना गलत और अवांछित है। हर मामले में सिखों की भावानाओं को चोट पहुँचाना बंद करो।”

मनजिंदर सिंह सिरसा ने एक वीडियो में कहा, “सोनम कपूर ने एक बेहद विवादित पोस्ट अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट डाला। ये दिखाया कि जो दस्तार है, इसकी च्वॉइस हो सकती है देश में, लेकिन हिजाब की नहीं है। सोनम कपूर को कहना चाहता हूँ कि 2 धर्मों को आपस में भिड़ाना गलत है। दस्तार सिख के लिए जरूरी है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने ये जो हमें बख्शीश दी है, ये हर सिख के लिए जरूरी है और ये हमारे शरीर का हिस्सा है, कोई पहनावा नहीं है। सब धर्मों की अपनी मान्यताएँ हैं, जो कायम रहनी चाहिए। सोनम कपूर ने ये जो शरारत की है, जो ये जान-बूझ कर लोगों को उकसाया जा रहा है, ये बहुत गलत है। मैं सोनम कपूर को कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा काम कलाकार वाला है। तुम अपना कलाकार वाला काम करो, लेकिन ऐसे मसलों के अंदर जो बड़े संवेदनशील मुद्दे हो सकते हैं उनमें तुम्हारी दखलंदाजी ये दिखाती है कि तुम किसी पार्टी के एजेंडे पर काम कर रही हो। ये गलत है। हिसाब और दस्तार की तुलना की मैं निंदा करता हूँ।”

भारत सरकार के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने भी सोनम कपूर के तर्क को गलत बताया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “गलत तर्क। सिखों के लिए पगड़ी अनिवार्य है। धर्मनिरपेक्ष भारत में हिजाब का प्रोपोगेंडा चलाया जा रहा है, खासतौर पर इस्लामी एजेंडे के तहत। इसे स्कूलों में मान्यता नहीं दिया जा सकता।”

भारतीय जनता पार्टी दिल्ली के नेता विकास प्रीतम सिन्हा ने लिखा, “मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा और उनके शोषण के मुद्दे पर कभी आती हैं ये बिकिनी ब्रिगेड आगे? ख़ुद भी शिक्षित नहीं हैं इसलिए कपड़ों से ऊपर किसी मुद्दे पर कभी इनका कोई ओपिनियन हो ही नहीं सकता।” उन्होंने कहा कि ऐसी ही जिद और जाहिलियत रही तो आने वाले सालों में भारत में सेक्युलरिज्म इतना बढ़ जाएगा कि ‘पृथ्वी गोल है’ पढ़ाना भी कम्युनल माना जाने लगेगा।

स्वदेशी जागरण मंच के अश्वनी महाजन ने लिखा, “बिलकुल सत्य। कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में साफ़ आदेश दे दिया है। इसलिए इस मामले को अब विराम देना चाहिए।”

उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP व रिटायर्ड सीनियर IPS अधिकारी प्रकाश सिंह ने कहा कि यदि कोई यह नहीं जानता की वह क्या कर रहा है तो उस पर कार्रवाई करना मूर्खता है।

इसी के साथ सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर कई नेटीजेन्स सोनम कपूर को ट्रोल कर रहे हैं।

‘बुल्ली बाई (Bulli Bai)’ ऐप पर मुस्लिम महिलाओं की नीलामी: अपलोड के पीछे खालिस्तानी कनेक्शन

                                                         'सुल्ली डील्स' के बाद 'बुल्ली बाई' ऐप
मुस्लिम महिलाओं की फोटो चोरी-छुपे सेव करके अपलोड करने और इंटरनेट पर उन्हें नीलाम करने वाले विवादास्पद सुल्ली डील ऐप (Sulli Deals app) के महीनों बाद एक और ऐसा ही ऐप आया है ‘बुल्ली बाई’ (Bulli Bai App) नाम से। यह ओपन-सोर्स कोड रिपॉजिटरी गिटहब (GitHub) पर दिखाई दिया है।

नए साल (1 जनवरी 2022) पर गिटहब पर ‘बुल्ली बाई’ (Bulli Bai App) नाम से एक ऐप बनाया गया है, जिसमें अज्ञात लोगों ने सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं की फोटो अपलोड की है। बुल्ली बाई ऐप के पीछे खालिस्तानी आंदोलन के स्वघोषित समर्थकों का हाथ बताया जा रहा है। ये गिरफ्तार खालिस्तानी आतंकवादियों की रिहाई की माँग कर रहे हैं। ज्ञात हो कि पिछले साल ‘सुल्ली फॉर सेल’ ऐप पर मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों का दुरुपयोग करने वाले आरोपित अभी तक नहीं पकड़े गए हैं और ना ही उनकी पहचान कभी सामने आई।

इस ऐप को Bullibai.github.io URL से होस्ट किया गया। हालाँकि, सोशल मीडिया पर इस ऐप की आलोचना होने के बाद और कुछ अधिकारियों से संपर्क करने के बाद अब इसे हटा दिया गया है। इसके साथ ही ऐप से जुड़े एक ट्विटर अकाउंट को भी सस्पेंड कर दिया गया है।

यह मामला तब सामने आया जब ‘द वायर’ की एक महिला पत्रकार इस्मत आरा (Ismat Ara) ‘बुल्ली बाई’ का निशाना बन गईं, जिन्होंने इसे नए साल की सबसे खराब शुरुआत बताया। उन्होंने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि एक मुस्लिम महिला के रूप में आपको अपने नए साल की शुरुआत इस डर और घृणा की भावना के साथ करनी पड़ रही है। बेशक यह बिना कहे चला जाएगा। #sullideals के इस नए वर्जन ने अकेले मुझे ही निशाना नहीं बनाया है।”

दिल्ली पुलिस ने इस मामले पर संज्ञान लिया है और संबंधित अधिकारियों को उचित कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया है।

इस्मत आरा ने दिल्ली पुलिस के साइबर सेल में ऐप के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई। उन्होंने इसकी जानकारी अपने ट्विटर हैंडल पर देते हुए माँग की, “सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं की नीलामी के पीछे जिन लोगों का हाथ है, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करें और सख्त कार्रवाई करें।”

पत्रकार ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि ‘बुल्ली बाई’ शब्द अपने आप में अपमानजनक है और गिटहब पर यह ऐप मुस्लिम महिलाओं का अपमान करने के उद्देश्य से बनाया है, क्योंकि ‘बुल्ली’ शब्द का इस्तेमाल विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के लिए किया जाता है। उन्होंने लिखा कि ऐसा लगता है कि पूरी वेबसाइट को मुस्लिम महिलाओं को शर्मिंदा करने और उनका अपमान करने के इरादे से डिजाइन किया गया है।

इस्मत आरा ने आगे लिखा, “आज के लिए तुम्हारी बुल्ली बाई @IsmatAraa वाला ट्वीट देखकर मैं बहुत परेशान हुई थी। इसमें मेरी फोटो के साथ छेड़छाड़ की गई थी। उसने पुलिस से आईपीसी की धारा 153ए, 153बी, 354ए, 506, 509 और आईटी एक्ट की धारा 66 और 67 के तहत एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया है।”

‘बुल्ली बाई’ एक ऐसा एप्लिकेशन है जो गिटहब एपीआई पर बनाया गया है और ‘सुल्ली डील’ ऐप के जैसे काम करता है। गिटहब ऐप पर बुल्ली बाई (Bulli Bai app on GitHub) नाम से बनाए गए ऐप पर मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों को अपलोड कर उनको नीलाम किया जा रहा है।

                                                                            साभार : ट्विटर

‘बुल्ली बाई’ के ट्विटर हैंडल को सस्पेंड कर दिया गया है। इसके बायो में लिखा था, “बुल्ली बाई खालसा सिख फोर्स (केएसएफ) के एक समुदाय द्वारा संचालित ओपन-सोर्स ऐप है।” ध्यान दें कि बुल्ली बाई ट्विटर अकाउंट में एक हैशटैग #FreeJaggiNow का इस्तेमाल किया गया है। इसकी बैकग्राउंड इमेज में भी वही हैशटैग है।

ट्विटर लोकेशन स्टेटस से पता चलता है कि यह अकाउंट यूएसए से संचालित किया जा रहा है। इसे हाल ही में (दिसंबर 2021) भारत सरकार पर जगतार सिंह जोहल को रिहा करने के लिए दबाव डालने के इरादे से बनाया गया है, जिसे ‘जग्गी’ के नाम से जाना जाता है।

पिछले साल जुलाई में ओपन सोर्स प्लेटफ़ॉर्म पर सुल्ली डील नाम का एक मोबाइल एप्लीकेशन बनाया गया था। इस एप्लीकेशन में सोशल मीडिया से कई मुस्लिम महिलाओं की फोटोज को उठाया गया था और उन्हें मोबाइल एप्लीकेशन पर अपलोड किया गया था। इस एप्लीकेशन में इन सभी मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों, उनके नाम और उनके ट्विटर हैन्डल की जानकारी दी गई थी। एप्लीकेशन में दिए गए लिंक पर क्लिक करने के बाद इन महिलाओं की सारी जानकारी यूजर के साथ साझा की जा रही थी।

कृषि कानूनों की वापसी: BJP को उनकी ही वेबसाइट पर मौजूद ये पुस्तक पढ़नी चाहिए, जानिए क्यों

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (19 नवंबर, 2021) को राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अचानक से तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा कर दी। इन कानूनों को कृषि सुधार के लिए लाया गया था। भारत में जिस तरह से कृषि उत्पादों को किसान उपजाते और फिर बेचते हैं, ये कानून उस प्रक्रिया के विविधीकरण और उसमें आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए लाए गए थे। इस घोषणा से सभी को हैरानी हुई। सत्ताधारी दल के कई समर्थक भी बेचैन हो गए। कम से कम ऑनलाइन तो ऐसा ही देखने को मिला। अब जब लोगों का गुस्सा और चर्चाओं का बाजार थमता नजर आ रहा है, मैं पिछले एक वर्ष में हुई घटनाओं का विश्लेषण करने का खतरा मोल ले रहा हूँ।

 

सबसे पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को सामने आईं। सत्ता और पार्टी के लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला लिया गया, क्योंकि खालिस्तानी ताकतों ने ‘किसान आंदोलन’ में घुसपैठ करने में कामयाबी पा ली थी। जबकि, विपक्ष और यहाँ तक कि मोदी समर्थकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ऐसा किया गया। बता दें कि अगले 4 महीनों में इन दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

पहले दूसरी वाली प्रतिक्रिया की बात करते हैं, जिसमें कहा गया है कि ये चुनाव जीतने के लिए लिया गया फैसला था। विपक्ष तो ऐसा कहेगा ही, लेकिन कुछ भाजपा समर्थक भी ऐसी ही राय रख रहे हैं। मुझे ऐसे लोगों की कोई गलती नजर नहीं आती, क्योंकि बाहर से देखने पर कई चीजें समझ में नहीं आ रही हैं।

1 वर्ष पहले जब किसान प्रदर्शनकारी दिल्ली के लिए निकले थे, तभी इस आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की उपस्थिति का स्पष्ट रूप से पता चल गया था। एक सिख व्यक्ति का अंग्रेजी में एक पुलिस अधिकारी से बहस करते हुए वीडियो भी सामने आया था। मीडिया के गिरोह विशेष ने तुरंत उसे ‘आधुनिक शिक्षित किसान’ बताते हुए अपने सिर पर बिठा लिया, लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही उसे ‘भाजपा एजेंट’ बताते हुए लिबरलों ने अजीबोगरीब ढंग से उससे नाता तोड़ लिया। उसने जनरैल सिंह भिंडरवाला की निंदा करने से इनकार कर दिया था। याद दिला दें कि भिंडरवाला वही व्यक्ति है, जिसने 80 के दशक में सिख अलगावाद और खालिस्तानी विचारधारा को पुनर्जीवित किया था। इसका परिणाम हमें पंजाब में हिन्दुओं के नरसंहार के रूप में देखने को मिला। फिर ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ हुआ।

वापस ‘किसान आंदोलन’ पर लौटें तो शुरू से ही इसमें भिंडरवाला की तस्वीरों वाले के पोस्टर-बैनर्स, ट्रैक्टर्स, टीशर्ट्स इसमें दिख रहे थे। कई बार आंदोलनकारियों ने अलगाववादी और हिन्दू विरोधी नारे लगाए, इस तरह की बातें की। कुछ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी तरह हत्या करने की धमकी दी, जिस तरह इंदिरा गाँधी की हुई थी। इसके बाद गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 2021) को लाल किला सहित दिल्ली में जो हिंसा हुई, वो हम सबने देखा। अगर खालिस्तानी खतरे के कारण कृषि कानूनों को वापस लिया गया है तो सरकार इतने दिनों से क्या कर रही थी? ये खतरा तो पिछले 10 महीने से यूँ ही दिख रहा है, फिर इस पर क्या किया गया?

इसीलिए, ये सारा का सारा टाइमिंग का खेल है और मैं इसे पूरी तरह समझ रहा हूँ। जब खालिस्तानी खतरा शुरू से ही किसानों के आंदोलन में मौजूद था, फिर अब कृषि कानूनों को चुनाव से पहले वापस लिए जाने की घोषणा क्यों हुई? क्या इससे इशारा नहीं मिलता कि चुनाव जीतने के लिए ऐसा किया गया है?

कृषि कानूनों की वापसी विधानसभा चुनावी जीत के लिए?

इस घोषणा का जो समय है, वही इस बात को बल देता है कि 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फायदे के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया गया। लेकिन, घोषणा की टाइमिंग ही ऐसा भी इशारा करती है कि ये कारण नहीं भी हो सकता है। अगर पंजाब-यूपी विधानसभा चुनाव जीतने ही इस फैसले का कारण है, फिर तो काफी खराब समय पर घोषणा की गई।
4 महीना भारतीय लोकतंत्र में एक लंबा समय होता है और कोई मंझा हुआ राजनेता विपक्ष को फिर से रणनीति बनाने के लिए इतना लंबा समय नहीं दे सकता। ममता बनर्जी ने इसी चतुराई को अपना कर भाजपा को मात दी थी, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी एक हमले में उनका पाँव टूट गया है। पैरों में प्लास्टर लगा कर वो अस्पताल में भर्ती हुईं और वहाँ से कई तस्वीरें मीडिया में सामने आईं। भाजपा समझ नहीं पाई कि इस ‘पीड़िता महिला कार्ड’ के जवाब में उनकी पोल खुले जाए, उनका मजाक उड़ाया जाए या फिर किसी अन्य महिला नेता को आगे कर के इसे ड्रामा साबित किया जाए। लेकिन, अगर आप कुछ हैरानी भरा लेकर सामने आना चाहते हैं तो इसके लिए उचित समय किसी चुनाव से कुछ ही दिन पूर्व तक होता है। ये वो समय होता है, जब विरोधी भी लड़खड़ा जाते हैं।
दूसरी बात ये है कि राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए टीवी पर ये घोषणा क्यों की जाएगी? ये आपके लिए खुद परेशानी भरा होगा, क्योंकि आप इससे और कमजोर नजर आएँगे। चुनाव के तारीखों की घोषणा होने के बाद किसी रैली में जनता के सामने भी तो ऐसा किया जा सकता है? लोहरी के दिन पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ पंजाब की किसी रैली में भी तो ये घोषणा की जा सकती थी? लोहरी का त्योहार जब और कृषि से जुड़ा हुआ है। साथ ही ये ऐसे समय पर आ रहा है, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव नजदीक होगा। भाजपा और अमरिंदर सिंह की नई पार्टी के गठबंधन के साथ ये घोषणा हो सकती थी। ऐसा कुछ कर के आप अपने विपक्ष को बड़ा झटका दे सकते हैं। विपक्ष और आपके समर्थक इस फैसले पर वैसे भी आपकी आलोचना करते, फिर कम से कम टाइमिंग तो सही होती?
भाजपा के रणनीतिकार, जिन पर अक्सर आरोप लगते रहते हैं कि वो चुनाव जीतने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, निश्चित रूप से इस घोषणा के फायदों और नुकसान पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। अगर पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंतुष्ट किसानों को मनाना इस घोषणा का लक्ष्य है, फिर तो इसकी टाइमिंग बिलकुल भी सही नहीं है।
कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर है, जिस कारण चुनाव से इतना पहले ही भाजपा ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की अचानक से घोषणा करने को मजबूर कर दिया। इस महीने की शुरुआत में हुए कुछ राज्यों के उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन मिलाजुला रहा था। वहाँ से भी कुछ ऐसा इशारा नहीं मिलता कि उपचुनावों के परिणाम के कारण ऐसा हुआ होगा।
हालिया उपचुनाव के दौरान एकमात्र विधानसभा क्षेत्र जहाँ किसान प्रदर्शनकारियों का असर था, वो था हरियाणा का एलेनाबाद। यहाँ के विधायक INLD के अभय सिंह चौटाला ने कृषि कानूनों का विरोध करते हुए ही अपने पद से इस्तीफा दिया था। फिर से उनकी ही जीत हुई। लेकिन, भाजपा का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा जितना यहाँ 2019 के विधानसभा चुनाव में रहा था। उलटा उसे पहले से ज्यादा ही वोट मिले। इसके परिणाम उतने हैरान करने वाले नहीं थे कि आपात स्थिति में भाजपा इस तरह की कोई घोषणा कर दे। केवल पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश से भाजपा के लिए बुरी खबर आई। हिमाचल प्रदेश में भाजपा को एक भी सीट नसीब नहीं हुई। हालाँकि, इन दोनों ही राज्यों में ‘किसान आंदोलन’ का कोई असर नहीं था और हार का कारण कृषि कानून नहीं थे।

घोषणा की टाइमिंग पंजाब से ज्यादा सिखों को लेकर

अगर इरादा पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनावों को जीतने का है तो ये समय ठीक नहीं है। हालाँकि समय ये बताता है कि क्या प्राप्त करने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस घोषणा के लिए गुरु परब का अवसर चुना, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के जन्मदिन वाला दिन। ये विचार सिख भावना से जुड़ने का या उन्हें खुश करने का है।
अब कोई ये भी तर्क दे सकता है कि अगर उद्देश्य पंजाब चुनाव नहीं जीतना है तो सिख भावना और जाट-सिख भावना को किस वजह से खुश किया जा रहा है? ये जरूरी नहीं। अगर ऐसा होगा तो ये बीजेपी के लिए बोनस होगा (मुझे नहीं लगता कि इससे पार्टी को लाभ होगा और ये हम आज से आने वाले 4-5 माह में देख लेंगे), लेकिन पहला उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं है क्योंकि जैसे मैंने ऊपर समझाया कि ये समय उस लक्ष्य प्राप्ति का नहीं।
सरकार खालिस्तानी हैंडलर के बहकावे में आ गई है? या ये ख़ुफ़िया विफलता है? ख़ुफ़िया एजेंसियों को कैसे नहीं पता था कि खालिस्तानी इस किसान प्रदर्शन को अपना एजेंडा चलाने के लिए इस्तेमाल करेंगे? इसके मिश्रित जवाब हैं।
जाहिर तौर पर सरकार ने इसे होते नहीं देखा और वे इसे मानने की स्थिति में भी नहीं हैं। ये वो बदलाव थे जो हर पार्टी माँग रही थी और हर पार्टी ने इसके लिए वादा दिया। लेकिन बाद में ये लोग पलट गए। यहाँ तक कि तथाकथित बुद्धिजीवी भी सिर्फ ‘सरकार के बर्ताव’ में गलतियाँ निकाल पा रहा था न कि लाए गए कृषि कानूनों में। शिरोमणि अकाली दल ने भी यू टर्न लिया और एक मुद्दा पूरे पंजाब का मुद्दा बन गया और कुछ ही समय बाद इसे खालिस्तानियों द्वारा सिख मुद्दा बना दिया गया जो लंबे समय से ‘जनमत संग्रह 2020’ पर काम कर रहे थे। हमें लगा कि ये कुछ हास्यास्पद सी चीज है कि कुछ सिख लंदन और कनाडा में बैठकर इसके सपने देख रहे हैं। लेकिन हम गलत थे।
सरकारी एजेंसियों को निश्चित तौर पर खालिस्तानी खतरा महसूस हुआ, उन्होंने इसे गौर भी करवाया लेकिन जब उन्होंने ये सब किया तो उस समय उनपर किसानों को बदनाम करने का आरोप लग गया। हम लोग नहीं जानते कि शुक्रवार को गुरु परब के दिन किसानों के सामने हार मानने से पहले इतने महीनों में कितनी बार इस (खतरे) को निपटाने की कोशिश हुई। हम शायद कभी नहीं जान पाएँगे, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों और विशेष रूप से इसका मुकाबला करने की रणनीतियों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की जाती है। वर्गीकृत सूचनाएँ और, इससे दूसरों को अपनी थ्योरी बुनने के अवसर मिलेंगे।
जो जानकारी पब्लिक डोमेन में है वो एक ऐसे परिदृश्य को चित्रित करती है जहाँ सरकार ने इस खतरे- पंजाब में खालिस्तानियों की वापसी, से निपटने के लिए पीछे हटने को सबसे अच्छा तरीका समझा। ये फैसला या तो बड़ी जीत की ओर जाना चाहिए या फिर युद्ध को जीतने के लिए एक लड़ाई हारने पर। और वह बड़ी जीत चुनावों में जीत नहीं हो सकती है या कोई ऐसा बैकडोर भी नहीं हो सकती जिसके जरिए दोबारा कानून को पेश किया जा सके। अगर ये पीछे हटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हुआ है, तो बड़ी जीत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए होनी चाहिए।
और यहीं पर असली चुनौती है। ये रणनीति खालिस्तानी तत्वों को प्रोत्साहित ही करेगी। अगर मुस्लिमों का तुष्टिकरण कभी काम नहीं आया तो जाट सिखों का तुष्टिकरण क्यों काम आएगा?

हिंदू-सिख संबंध

मुझे पता है कि ऐसी चिंताएँ हैं कि यह एक गलत मिसाल कायम कर सकता है। गलत मिसाल मसलन अन्य समूह भी अपनी माँगों को पूरा करने के लिए हिंसा और भीड़तंत्र वाली शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर देंगे। दुर्भाग्य से हमारा देश हमेशा से ऐसा ही रहा है।
विभिन्न समूहों के लिए आरक्षण या किसी भी क्षेत्र की माँग हमेशा से व्यापक हिंसा के बाद लगभग पूरी हुई ही है। संविधान में किया गया पहला संशोधन ही एक तरह से हिंसा को वैध बना दिया। इसी के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाने की व्यवस्था की गई, क्योंकि कुछ लोग किसी अन्य की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बाद पागल होकर बसों को जलाने निकल पड़ते थे। उसके बाद यह नियम तो नहीं बना लेकिन पैटर्न जरूर सेट हो गया।
मेरी चिंता इस बारे में नहीं है कि दूसरे समूह भी इसका अनुसरण करेंगे, वे पहले से ही कर चुके हैं। CAA को लेकर पहले दिन से ही हिंसा हो रही थी। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य जगहों पर हिंसक घटनाएँ हुईं और फिर 2020 के दिल्ली दंगे भी हुए। मैं कुछ ऐसा लिख जाऊँगा, जो प्रकाशित ही नहीं होगा लेकिन संक्षेप में कहूँ तो अगर कोई सरकार सोचती है कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं, तो चलती हैं (न केवल सरकारें, यहाँ तक कि पत्रकार भी सोचते हैं कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं)। जैसा होता आया है, मौजूदा सरकार सिखों के साथ वह जोखिम नहीं उठाना चाहती। और मेरी चिंता यही है – आगे क्या? हमने निश्चित रूप से रक्तपात होने के समय को कुछ देर के लिए टाल दिया है, लेकिन क्या हमने इस विकराल समस्या को हल करने की योजना भी बना ली है?
खालिस्तानी समस्या को हल करना मृत-समान है और पहले इसे हल करने की सोच से अब यह आगे जा चुका है… और हमारी आँखें खोलने के लिए हमें ‘किसान को धन्यवाद’ जरूर कहना चाहिए। फिर भी अगर कोई इसकी कोशिश कर रहा है तो निश्चित रूप से वो सिख वर्चस्ववादी मानसिकता के मुद्दे को हल करने की कोशिश कर रहा है, जो हिंदू-सिख संबंधों को लेकर विकृत दृष्टिकोण रखता है। मुझे नहीं पता कि इसके लिए सरकार या भाजपा की क्या योजना है, लेकिन मुझे आशा है कि वे राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” पढ़ेंगे, जो संयोग से पार्टी की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
यह पुस्तक पूरे इतिहास के उस हिस्से को विस्तार से बताती है कि कैसे सिख धर्म का एक प्रमुख हिस्सा हिंदू धर्म के एक संप्रदाय होने से दूर होता गया। इतना ही नहीं, हिंदू धर्म से दूर होते-होते यह ऐसा रूप ले लिया, जिसमें अब्राहमिक धर्म (एक खुदा, एक भगवान वाला) की छवि दिखने लगी। इतना ही नहीं, इस पुस्तक से आप जान पाएँगे कि कुछ सिखों, विशेषकर जाट सिखों के बीच यह वर्चस्ववादी मानसिकता क्यों मौजूद है।
यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई थी, जब पंजाब में सिख उग्रवाद चरम पर था। संयोग से इसमें यह उल्लेख भी है कि कैसे कृषि मुद्दों ने तब पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी (और जैसा कि कहते हैं, इतिहास दोहराता है, अब हमारे सामने फिर से ‘कृषि कानून’ के माध्यम से वही एजेंडा बढ़ाया जा रहा है)। मैं इस पुस्तक के केवल तीन पैराग्राफ आपके सामने रख रहा हूँ, ये एक तरह से वर्तमान समस्या के साथ-साथ आने वाली चुनौती को भी दर्शाते हैं:
पिछले दो दशकों में, अलगाव करने वाला एक अन्य कारक भी चुपचाप काम कर रहा है। हरित क्रांति और कई अन्य कारकों की वजह से सिख अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हो गए हैं। इसके बाद उन्होंने यह देखना-समझना शुरू कर दिया है कि हिंदुओं के साथ बंधन (मतलब हिंदू धर्म का ही संप्रदाय) उनके लिए पर्याप्त नहीं है। इसी सोच के साथ वे अपने नाम और प्रतीकों में आसानी से उपलब्ध नई पहचान की तलाश करने लगे। यह एक मानवीय कमजोरी है, अप्रत्याशित या अचंभित होने जैसा कुछ नहीं।
“आप हमारे रक्षक रहे हैं” – यह बात हिंदू सिखों को बताते रहे हैं। लेकिन वर्तमान समय में (या कह लें वर्तमान मनोविज्ञान काल में), प्रशंसा से केवल अवमानना मिलती है – और मेरा मानना गलत नहीं है। आत्म-निराशा किसी मित्र या भाई को खोने का पक्का तरीका है। यह हिंदुओं के साथ हुआ। दूसरी ओर सिखों को इससे अलग लेवल के आत्म-मूल्यांकन (अतिरेक वाला) का मौका मिला।
इस मनोविज्ञान के दबाव में – बनावटी शिकायते गढ़ी गईं; ऐसे चरमपंथी नारों को लाया गया, जिसके साथ नरमपंथी तबकों को भी चलना पड़ा। पिछले कुछ सालों में हत्या की राजनीति भी शुरू हो गई। कहीं कोई रोक नहीं, कहीं से कोई शिकंजा नहीं… अंततः इसे कहाँ रुकना है… नहीं पता था; यह अपने आप में एक कानून बन गया; यह हुक्म चलाने लगा, धमकाने लगा।                         -- राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” से
और अब हम सब इसी समस्या के सामने खड़े हैं। इस खौफ पर कैसे काबू पाया जाए, यह अभी का सबसे बड़ा सवाल है। सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि हिंदू समुदाय को भी इस समस्या को समझने की जरूरत है। मुझे आशा है कि इसके लिए एक योजना तो है। और मुझे यह आशा भी है कि जिनके पास यह योजना है, उन्होंने राम स्वरूप को पढ़ा होगा। और हाँ, मेरे प्रिय पाठक, आप भी पढ़ सकते हैं।
(यह लेख OpIndia पर राहुल रौशन के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। )

फ़्लैट बेंचकर शाहीन बाग़ में लंगर चलाने वाले सरदार जी से लोगों ने पूछा, अफगानिस्तान से आये सिखों के लिए क्या व्यवस्था किये हो?


नागरिकता संसोधन कानून (CAA) के विरुद्ध दिल्ली के शाहीन बाग़ में सड़क जाम करके साल 2020 में हजारों मुस्लिमों ने कई महीनों तक विरोध प्रदर्शन किया। सरदार डीएस बिंद्रा अपना फ़्लैट बेंचकर शाहीन बाग़ में लंगर लगाते थे, लोग अब सरदार जी से पूछ रहे हैं कि अफगानिस्तान से जो सिख भाई-बहन आये है उनके लिए क्या व्यवस्था किये हो?

उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान पर इस्लामिक आतंकी गुट तालिबान ने कब्जा कर लिया है, लोग अब वहां से जान बचाकर भाग रहे हैं और दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं, अफगानिस्तान के बहुत से सिख और हिन्दू भी भारत आये हैं, अफगानिस्तान के एकमात्र सिख सांसद नरेंदर सिंह खालसा भी अफगानिस्तान में अपना घर-बार छोड़कर जान बचाकर भारत चले आये हैं। दिल्ली पहुंचने पर नरेंदर सिंह ने अफगानिस्तान से सुरक्षित निकालने के लिए भारत सरकार तथा प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद किया है। अफगानिस्तान से आये लोगों की भारत सरकार पूरी मदद कर रही है। 

लेकिन अब सोशल मीडिया पर लोग शाहीन बाग़ में लंगर चलाने वाले सरदार डीएस बिंद्रा से पूछ रहे हैं कि क्या मानवता के नाम पर अफगान से आये सिख बहन-भाइयों के लिए भी लंगर लगाएंगे, बता दें कि शाहीन बाग़ में लंगर लगाने के लिए सरदार डीएस बिंद्रा ने अपना फ़्लैट तक बेंच दिया था, डीएस बिंद्रा पेशे से दिल्ली हाई कोर्ट में वकील हैं। उन्होंने कहा, लोगों की सेवा करने के लिए उन्होंने अपना फ्लैट तक बेच दिया है। सरदार डीएस बिंद्रा का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह खुद को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का सिपाही बता रहे थे। 

पंजाब : राजीव गाँधी की प्रतिमा पर पेट्रोल डालकर निहंग सिख ने लगाई आग

                                               राजीव गाँधी की मूर्ति को सिख निहंग ने जलाया
लुधियाना में पीरू बांदा मोहल्ला के पास एक पब्लिक पार्क में जुलाई 7, 2021 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की प्रतिमा में आग लगाने के मामले में एक निहंग सिख समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया गया।

घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर भी सामने आया। इसमें निहंग सिख रमनदीप सिंह अपने साथी सतपाल नवी के साथ प्रतिमा पर पेट्रोल डालते और आग लगाते नजर आ रहा है। अपनी वीडियो में रमनदीप ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर शहर में कहीं भी उन्हें राजीव गाँधी की प्रतिमा दिखी तो वो इसी तरह उसमें आग लगा देंगे।

निहंग सिख ने यह हरकत कांग्रेस नेता गुरसिमरन सिंह मंड की एक घोषणा के बाद की, जिसमें उन्होंने राजीव गाँधी की और मूर्तियाँ शहर भर में लगवाने का ऐलान किया था। रमनदीप अपनी वीडियो में कहते सुनाई पड़ रहे हैं, “हम राजीव गाँधी की मौजूदा प्रतिमाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं और वह (मंड) ऐसी और मूर्तियाँ और लगाने की बात कर रहा है… यह उसको जवाब है… राजीव गाँधी की हर प्रतिमा का यही हश्र होगा।”

सलेम तबरी थाना पुलिस ने इस मामले को आईपीसी की धारा आईपीसी की धारा 435 व 153ए, आईटी अधिनियम, संपत्ति अधिनियम के तहत दर्ज किया है। वहीं, कांग्रेस नेता मंड ने इस घटना के बाद भावुक होकर प्रशासन से आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। वीडियो में दिख रहा है कि मंड अपनी सिर पर बंधे पग से राजीव गाँधी के बुत को साफ कर रहे हैं और राजीव गाँधी अमर रहें के नारे लगा रहे हैं।

साल 2018 में भी एक ऐसी घटना सामने आई है। उस समय यूथ अकाली नेता अध्यक्ष गुरदीप गोशा और मीतपाल दुगरी ने राजीव गाँधी की इसी प्रतिमा पर कालिख पोत दी थी। इसके बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हंगामा कर उन्हें गिरफ्तार करवाया था। उस समय गुरदीप गोशा का कहना था कि 1984 में हुए कत्लेआम के कारण उनकी ओर से यह कदम उठाया गया है।

हरसिमरत बादल बेनकाब : फर्जी दावों के साथ किसानों के विरोध प्रदर्शन को हिंदू बनाम सिख मुद्दे में बदलने की कोशिश

तीन तलाक से लेकर कृषि कानून तक बने समस्त कानूनों पर सरकार का विरोध कर रहे मोदी विरोधियों के असली चेहरे सामने आ गए हैं। हकीकत यह है कि ये ही पार्टियां अपने-अपने मैनिफेस्टो में इन मुद्दों का जिक्र करते रहे हैं। जबकि जिन मुद्दों पर सरकार का विरोध करना चाहिए था, उनमें से एक भी मुद्दे पर 2014 से आज तक उठाने की हिम्मत नहीं हुई, क्यों? भ्रष्टाचार से लेकर बेरोजगारी तक इतने मुद्दे हैं, उन्हें क्यों नहीं उठाया जाता? आज सरकार में कितने प्रतिशत कर्मचारी कार्यरत हैं? उठाया किसी ने इस मुद्दे को? क्यों सेवानिर्वित कर्मचारियों को रखा जा रहा? हर चुनाव में भ्रष्टाचार दूर करने का दावे किये जाते हैं, जो चुनाव संपन्न होते ही, ठंठे बस्ते में चले जाते हैं, क्यों?  
पूर्व मंत्री और शिरोमणि अकाली दल की नेता हरसिमरत बादल ने 9 फरवरी, 2021 को लोकसभा में भाषण दिया। बादल कृषि कानून और चल रहे किसान विरोध पर अपना विचार प्रस्तुत कर रही थीं। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत गुरु नानक देव के नाम से किया, जो सिखों के पहले गुरु थे। गुरु नानक देव ने तीन बड़ी सीख दी थी- कीरत करो, नाम जपो और वंड छको। इसका मतलब है कि कड़ी मेहनत से कमाएँ, भगवान से प्रार्थना करें और जो आपके पास जो है या कमाया है, उसे दूसरों में भी बाँटें।

शुरुआती भाषण में वह किसानों के लिए चिंतित नजर आईं, लेकिन जल्द ही उन्होंने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए हिंदुओं पर सांप्रदायिक टिप्पणी की। उनका भाषण जल्द ही हिंदू-सिख विभाजन की तरफ मुड़ गया।

किसानों को गोलियों का सामना करना पड़ा : हरसिमरत 

बादल ने दावा करते हुए आरोप लगाया कि नवंबर में जब किसानों ने सिंघु बॉर्डर से दिल्ली में प्रवेश करने की कोशिश की तो झड़प के दौरान सुरक्षा बलों ने किसानों पर वाटर कैनन और आँसू गैस के गोले के साथ गोलियाँ चलाई। हालाँकि, सच्चाई यह है कि सुरक्षा बलों ने किसानों के साथ हुई किसी भी झड़प के दौरान एक भी गोली नहीं चलाई, चाहे वो नवंबर 2020 हो या 26 जनवरी, 2021।

पुलिस ने निहत्ते किसानों पर हमला किया : बादल 

अपने भाषण के दौरान बादल ने कहा कि पुलिस ने झड़प के दौरान निहत्थे किसानों पर हमला किया। नवंबर और जनवरी दोनों के दौरान पुलिस कर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, किसानों ने पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेडिंग को तोड़ने के लिए ट्रैक्टर सहित अपने भारी-भरकम वाहनों का इस्तेमाल किया। 26 जनवरी की हिंसा के दौरान, पुलिस कर्मियों पर डंडों और तलवारों से हमला किया गया।

कुछ प्रदर्शनकारियों को जब रोका गया तो उन्होंने पुलिस कर्मियों को ट्रैक्टरों से रौंदने का प्रयास किया। लाल किले में, ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की गई, डंडों से पीटा गया, लात मारी गई और एक दीवार से धक्का दे दिया गया। हजारों प्रदर्शनकारी हथियार और तलवारों से लैश थे। एक प्रदर्शनकारी 26 जनवरी को असाल्ट राइफल लहराते हुए भी देखा गया था। 

सरकार जिद्दी है और किसानों से बात नहीं कर रही : बादल 

भाषण के दौरान बादल ने एक विचित्र दावा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार किसानों से बात करने में दिलचस्पी नहीं रखती है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार जिद्दी है और 75 से अधिक दिनों में प्रदर्शनकारियों के दिल्ली पहुँचने के बाद, एक भी मंत्री ने किसानों से संपर्क नहीं किया। उसने यह भी दावा किया कि सितंबर से पंजाब में हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान किसानों के साथ मुद्दों पर चर्चा करने की कोई कोशिश नहीं की गई।

उनके बयान के विपरीत, किसानों के दिल्ली की तरफ कूच करने से पहले केंद्र सरकार ने पंजाब में किसानों से बात करने के लिए कई प्रयास किए। रिपोर्टों से पता चलता है कि किसान यूनियनों ने हर बार एक नई माँग के साथ सरकार द्वारा चर्चा के लिए मार्ग खोलने से इनकार कर दिया। जब किसान दिल्ली की ओर बढ़ने लगे, तो बैठक के लिए पहले से ही तारीख तय कर दी गई थी और यूनियनें केंद्र सरकार द्वारा दी गई तारीख का इंतजार कर सकती थीं। हालाँकि, उन्होंने अराजकता की स्थिति पैदा करते हुए दिल्ली की ओर मार्च करने का फैसला किया।

दिसंबर 2020 में चर्चा के पहले दौर के बाद से, सरकार अब तक किसान संघों के साथ चर्चा के 11 दौर की वार्ता कर चुकी है। सरकार ने उन्हें समस्याओं की एक सूची देने और कानूनों को क्लॉज-बाय-क्लॉज पर चर्चा करने के लिए कहा है। किसान यूनियनों ने मामले में हठ दिखाया और माँग की है कि सरकार को कानूनों को निरस्त करना चाहिए।

निशान साहब को कटघरे में खड़ा किया गया : बादल 

बादल ने दावा किया कि लाल किले पर जो झंडा फहराया गया था, वह निशान साहिब था और यह गुरुद्वारों की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री और कई विदेशी नेताओं द्वारा धारण किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि इसे तिरंगे के लिए अपमान का कार्य बताकर, हर कोई निशान साहिब को कठघरे में खड़ा कर रहा है। हालाँकि, निशान साहिब, जो सिख समुदाय के पवित्र प्रतीक के साथ एक त्रिकोणीय झंडा है, एकमात्र ध्वज नहीं था जो गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर फहराया गया था। एक अन्य आयताकार झंडा भी वहाँ पर फहराया गया था, जो कि खालिस्तान समूहों के झंडे से काफी मिलता-जुलता था।

बादल ने विवाद को हिन्दू बनाम सिख बनाते कहा: हमारे गुरुओं ने जनेऊ और तिलक की रक्षा में अपना बलिदान दिया 

अपने भाषण के अंत में, बादल हिंदुओं के लिए जहर उगलने से नहीं कतराई। उन्होंने दावा किया कि सिख गुरुओं ने तिलक और जनेऊ पहनने वालों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उन्होंने दावा किया कि सिखों ने हमेशा हिंदुओं को बचाया है और अब हिंदू सिख गुरुओं का अपमान कर रहे हैं। 

वास्तव में, कोई भी सिखों के खिलाफ नहीं है। राज्यसभा में भी अपने हालिया भाषण के दौरान, पीएम मोदी ने भारत की प्रगति में सिख समुदाय द्वारा किए गए योगदान का उल्लेख किया था। किसान विरोध की बहस और मीडिया प्रचार के दौरान, सिख विरोधी कोई टिप्पणी नहीं की गई है। वास्तव में, प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ अलगाववादी तत्वों ने भारत विरोधी और हिंदू विरोधी टिप्पणी की थी, जो कि पाकिस्तान द्वारा प्रोत्साहित किए गए अलगाववादी खालिस्तानी भावनाओं को भड़का रहा था।

“आपके जनेऊ और तिलक को बचाने के लिए हमारे गुरु ने शहादत दी” says @HarsimratBadal_
Leftist-Izlamists hate Hindus, so does Khalistaπis.
Lady speaking the language of ISI trained Trolls pic.twitter.com/pqurhcBiSf

— Mihir Jha ✍️ (@MihirkJha) February 9, 2021

प्रधानमंत्री ने किसानों को परजीवी कहा : बादल 

बादल ने अपने भाषण के दौरान एक अन्य फर्जी दावा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की सीमाओं पर विरोध कर रहे किसानों को परजीवी कहा। दरअसल, पीएम मोदी ने उन लोगों का जिक्र किया, जो हमेशा विरोध में मौजूद रहते हैं, भले ही विरोध का एजेंडा कुछ भी हो।

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पीएम मोदी ने कहा कि ये लोग विरोध प्रदर्शनों पर जोर देते हैं और अक्सर प्रदर्शनों को दुष्प्रचार में बदल देते हैं। ऐसे पेशेवर प्रदर्शनकारियों को परजीवियों की संज्ञा देते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि उनकी पहचान करना आवश्यक है क्योंकि वे राष्ट्र के लिए परेशानी का कारण हैं। पीएम की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि यह किसानों के खिलाफ नहीं है, लेकिन कुछ राजनीतिक व्यक्ति विरोध प्रदर्शन को राजनैतिक प्रासंगिकता के लिए हाइजैक कर रहे हैं।