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स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज से गूंजेगी संसद; धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

आज हर बीतते दिन के साथ भारत का वह धूमिल इतिहास सामने आने लगा है, जिसे मुस्लिम वोटबैंक और मुस्लिम कट्टरपंथियों के क़दमों में घुटने टेक चुके नेताओं और उनकी पार्टियों ने जनता के सामने नहीं आने दिया। इन मुस्लिम वोट के भूखे नेताओं ने उस राष्ट्रीय गीत को ही खंडित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऊर्जा दी थी। जो नेता और पार्टियां अपने राष्ट्रीय गीत को ही खंडित कर दे क्या उनसे देशप्रेम की उम्मीद की जा सकती है और करनी भी नहीं चाहिए। 

याद हो कुछ समय जब भगवा ध्वज पर विवाद होने पर TimesNow नवभारत पर एंकर सुशांत सिन्हा ने भगवा ध्वज के राष्ट्रीय झंडे पर खुलकर प्रकाश डालते हुए बताया था कि जब सामने स्वतंत्रता दिखनी शुरू होने पर राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमे कई सुझाव भी आए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने 1906 में भगवा झंडे का सुझाव दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया था। लेकिन कट्टरपंथी महात्मा गाँधी के पास गए और नेहरू का सुझाया भगवा ध्वज को नज़रअंदाज़ कर आखिर में विवश होकर तिरंगा रखा गया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

 लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।
बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”
यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

वंदे मातरम सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि मां भारती की आराधना, एक संकल्प और मंत्र है जो भविष्य का हौसला देता है- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज, 07 नवंबर 2025 को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर सालभर चलने वाले उत्सव का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने स्मारक डाक टिकट और विशेष सिक्का भी जारी किया।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि वंदे मातरम सिर्फ शब्द नहीं, एक संकल्प है, मां भारती की आराधना है, एक ऐसा मंत्र है जो भविष्य का हौसला देता है। उन्होंने कहा कि हर गीत का अपना भाव होता है और वंदे मातरम का मूल भाव है भारत – मां भारती की शाश्वत संकल्पना।

महान स्वतंत्रता सेनानी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में अक्षय नवमी के दिन इस गीत की रचना की थी, जो बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। पीएम मोदी ने कहा कि यह गीत उस समय लिखा गया था जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, लेकिन इसके शब्द कभी गुलामी में कैद नहीं हुए। प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम गुलामी के अंधकार में आशा की ज्योति बन गया और स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत बना।

उन्होंने बताया कि 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया था, और 1905 में बंगाल विभाजन के समय यह गीत देश को जोड़ने वाला नारा बन गया। हर आंदोलन में, हर क्रांतिकारी के होंठों पर वंदे मातरम था। महात्मा गांधी ने इसे संपूर्ण भारत का प्रतीक बताया, जबकि श्री अरविंदो ने इसे आत्मबल जगाने वाला मंत्र कहा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वंदे मातरम में भारत माता को सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में देखा गया है- मां जो ज्ञान भी देती है, समृद्धि भी और शक्ति भी। उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्र को मां के रूप में देखने की परंपरा प्राचीन है। वेदों में कहा गया है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” यानी यह धरती हमारी मां है, और हम उसके पुत्र हैं। इसी भावना ने स्वतंत्रता संग्राम में स्त्री-पुरुष दोनों की समान भागीदारी सुनिश्चित की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भारत वंदे मातरम के स्वप्न को साकार कर रहा है। विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था में भारत नई ऊंचाइयां छू रहा है। उन्होंने कहा कि जब भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश बनता है, जब हमारी बेटियां फाइटर जेट उड़ाती हैं, तब हर भारतीय का नारा होता है वंदे मातरम! उन्होंने यह भी कहा कि नया भारत मानवता की सेवा में कमला और विमला का रूप है, तो आतंकवाद के विनाश में दशप्रहरणधारिणी दुर्गा का।

उन्होंने कहा कि 1937 में वंदे मातरम के कुछ पदों को अलग कर देने का निर्णय दुखद था, क्योंकि इससे राष्ट्रगीत की आत्मा को विभाजित किया गया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम के विभाजन ने देश के विभाजन के बीज बो दिए। आज की पीढ़ी को यह जानना जरूरी है, क्योंकि वही विभाजनकारी सोच आज भी देश के सामने चुनौती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आनंदमठ में जब संतान भवानंद वंदे मातरम गाता है, तो पूछा जाता है कि तुम अकेले क्या कर पाओगे? उसका उत्तर है जिस माता के इतने करोड़ पुत्र हों, वह अबला कैसे हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज भारत माता की 140 करोड़ संताने हैं, यानी 280 करोड़ भुजाएं। यह भारत का सामर्थ्य है, और हमें खुद पर विश्वास करना होगा। वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि मां भारती के प्रति 140 करोड़ भारतीयों के अटूट प्रेम, आत्मविश्वास और संकल्प का प्रतीक है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने उस प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया, जो वन्देमातरम् की ऐतिहासिक यात्रा और उसके सांस्कृतिक महत्त्व को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करती है।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने किए थे ‘वन्दे मातरम’ के टुकड़े’

कोई व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है, स्वयं शिक्षित होने के साथ, परिवार और समाज को शिक्षित करने के लिए, लेकिन भारत विश्व में ऐसा अनूठा देश है, जहां आज शिक्षित ही सर्वाधिक अशिक्षित बने हुए हैं। भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास को धूमिल करने वाले शिक्षित ही है। इन्ही शिक्षित इतिहास विरोधियों ने कुर्सी के भूखे नेताओं/पार्टियों के हाथ अपने जमीर को बेच देश को गलत इतिहास पढ़वा दिया। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अगस्त, 2023 को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में कांग्रेस और उसकी सहयोगी दलों को जमकर लताड़ लगाई। इसी दौरान उन्होंने संसद में दिए गए राहुल गाँधी के बयान ‘भारत माता की हत्या’ पर जवाब देते हुए वन्दे मातरम का इतिहास बताया। उन्होंने बताया कि कैसे 
कांग्रेस ने वन्दे मातरम के टुकड़े कर बहुत पहले ही देश के विभाजन की नींव रख दी थी। 

वन्दे मातरम पर कांग्रेस ने कैंची क्यों चलाई थी? राजनीतिक वजह से, धार्मिक वजह से या किसी व्यक्ति को खुश करने के लिए? पूरी बात समझने के लिए वन्दे मातरम के इतिहास की तरफ मुड़ते हैं। समझते हैं कि यह कब पहली बार अस्तित्व में आया… कब इस पर किसी ने आपत्ति जताई और कब कांग्रेसियों ने इसे खंडित ही कर दिया।

वन्दे मातरम का इतिहास

वन्दे मातरम की रचना सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा पाँच छंदों की कविता के रूप में 7 नवंबर 1875 को की गई थी। ऐसा माना जाता है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को वन्दे मातरम का आइडिया तब आया था, जब वह डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के रूप में अंग्रेजों की सेवा में थे।
इसी वन्दे मातरम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में बंगाली उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित किया। 1896 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इसे गीतबद्ध किया था। इसके बाद यह उस समय क्रांति का तराना बन गया था। हर क्रन्तिकारी, अमर बलिदानी के जुबान पर यही गीत थी। 

क्रांतिगीत वन्दे मातरम का विरोध क्यों?

दरअसल, ‘वन्दे मातरम’ का देश विरोधी ताकतों और मुस्लिम लीग द्वारा विरोध शुरू किया गया। जिन आधारों पर विरोध शुरू किया गया, उसी रास्ते पर आगे चल कर देश का बँटवारा भी हुआ। पूरी बात समझने के लिए आपको जानना होगा कि कब और क्यों इसका विरोध शुरू हुआ? फिर नेहरू और कांग्रेस द्वारा कैसे सिर्फ मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए इसे खंडित कर इसके एक छोटे हिस्से को राष्ट्रगीत घोषित किया गया?
एक समय था जब पूरा देश इस गीत को गुनगुना रहा था। श्री अरबिंदों ने तो इसे राष्ट्रवाद का मंत्र बता दिया था। लाला लाजपत राय ‘वंदे मातरम’ नाम से उर्दू साप्ताहिक निकाल रहे थे। मैडम भीकाजी कामा ‘वंदे मातरम’ लिखा भारतीय झंडा विदेश में लहरा चुकी थीं। तब मुस्लिम लीग क्या कर रहा था? वो कर रहा था इसका विरोध… 1908 से ही मुस्लिम लीग ने वन्दे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया था।
विरोध की वजह थी – इस गीत में मातृभूमि की वंदना और देवी-देवताओं का जिक्र। मुस्लिमों ने इस पर नाराजगी दिखानी शुरू कर दी। अमृतसर में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दूसरे अधिवेशन में 30 दिसंबर 1908 को अध्यक्षीय भाषण देते हुए सैयद अली इमाम ने वंदे मातरम का विरोध किया। इसके बाद खिलाफत आंदोलन के जरिए यह भावना प्रबल होती गई कि वंदे मातरम इस्लाम विरोधी है।

वंदे मातरम और कांग्रेस 

क्रांति का तराना वंदे मातरम अब विवादास्पद हो गया था क्योंकि मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग गीत में वर्णित देवी दुर्गा की स्तुति का विरोध कर रहा था। कांग्रेस भला पीछे कैसे रहती? मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ने तब जो काम किया, वो आज तक कर रही है।
वंदे मातरम को लेकर 1937 में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। इसमें मुस्लिम प्रतिनिधि के तौर पर मौलाना अबुल कलाम आजाद को शामिल किया गया। आजाद ने गीत को पढ़ा और पाया कि इसके शुरुआती दो छंद इस्लाम विरोधी नहीं हैं। उनके अनुसार, इन दो छंदों के बाद हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है।
समिति के विचार-विमर्श के बाद एक फैसला लिया गया। नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यसमिति ने 26 अक्टूबर 1937 में एक लंबा बयान जारी कर इस गीत के टुकड़े कर दिए। फैसले के एक भाग को पढ़िए और समझिए: “इसमें मुस्लिम बंधुओं का विरोध देख अपील की गई थी कि वंदे मातरम को आनंदमठ से अलग करके पढ़ा जाए और इसके केवल दो ही छंद इस्तेमाल हों, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख नहीं बल्कि मातृभूमि के सौन्दर्य और गुण की चर्चा है।”

वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस ने जो फैसला लिया, उसका असर क्या हुआ? 5 छंद के गीत को काट कर सिर्फ 2 छंद कर देने से क्या मामला शांत हो गया? नहीं हुआ। बल्कि मुहम्मद अली जिन्ना जैसे कट्टरपंथी लोगों को और बल मिल गया। जिन्ना ने 1 मार्च 1938 को इस गीत के विरोध में फिर से एक मुहिम छेड़ा और द न्यू टाइम्स ऑफ लाहौर में लेख लिखा। कट्टरपंथी मुस्लिमों की भावनाओं को भड़काना, जिन्ना के कट्टरपंथी विचारों को कांग्रेस द्वारा पोषित किया जाना ही भारत के विभाजन का मुख्य कारण बना।

आजादी के बाद वंदे मातरम और कट्टरपंथी मुस्लिम

आजादी के बाद 2 छंदों वाले टुकड़े किए गए वंदे मातरम को ही 24 जनवरी 1950 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रगीत घोषित किया। उन्होंने इस गीत को लेकर तब कहा था: “वन्दे मातरम गीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन-गण-मन के समान सम्मानित किया जाएगा और इसे समान दर्जा दिया जाएगा।”
सवाल यह है कि इस गीत पर कैंची चलाने के बाद भी कांग्रेसी मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर पाए? अव्वल दर्जे से असफल हुए… क्योंकि कट्टरपंथी मुस्लिमों को तो छोड़िए, मुस्लिम विधायक-सासंद भी वंदे मातरम नहीं गाते/बोलते हैं।

उत्तर प्रदेश : सुविधानुसार संविधान की दुहाई देने वाले शांतिदूतों द्वारा राष्ट्रगान का अपमान

                                  मुज़फ्फरनगर में राष्ट्रगीत के दौरान बैठी रहीं मुस्लिम पार्षद
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में नगरपालिका की बैठक में मुस्लिम पार्षदों पर राष्ट्रीय गीत के अपमान के आरोप लगे हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब ‘वन्दे मातरम्’ बजाय जा रहा है, तब सभी पार्षद राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े हैं लेकिन 4 बुर्कानशीं मुस्लिम महिलाएँ बैठी हुई हैं। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इसे राष्ट्रगीत का अपमान करार दिया। बैठक में केंद्रीय पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन विभाग मंत्री संजीव बालियान भी मौजूद थे।

संजीव बालियान मुज़फ्फरनगर के स्थानीय सांसद भी हैं। नगरपालिका बोर्ड की बैठक में मुस्लिम महिला पार्षदों द्वारा राष्ट्रगीत के अपमान का मामला तूल पकड़ रहा है। शनिवार (18 जून, 2022) को दोपहर में नगरपालिका सभागार में हुई बैठक में उत्तर प्रदेश सरकार वोकेशनल एजुकेशन एवं स्किल डेवलपमेंट मंत्री कपिलदेव अग्रवाल भी मौजूद थे, जो मुज़फ्फरनगर नगरपालिका के अध्यक्ष भी रहे हैं। कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ऐसा हुआ।

जिस बैठक में शहर के विकास के लिए 196 करोड़ रुपए का प्रस्ताव पास हुआ, उसमें महिला मुस्लिम सभासदों के अलावा पूरा सदन राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान में खड़ा हुआ। सदन के लोग भी इस हरकत से नाराज़ दिखे। कार्यवाही शुरू होने से पहले राष्ट्रगीत बजाया गया था। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने सभी को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सम्मान की सलाह दी। पार्षदों ने इस पर चर्चा भी की। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब महिला ही राष्ट्रीय गीत का अपमान करेगी तो समाज को कैसे मजबूत करेगी?

राष्ट्रगीत को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का माला अदालत में चल रहा है और मई 2022 के अंतिम हफ्ते में दिल्ली उच्च-न्यायालय ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार की राय भी माँगी थी।

भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस सम्बन्ध में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत को लेकर कोई दिशानिर्देश न होने के कारण असभ्य रूप से इसका इस्तेमाल हो रहा है और फिल्मों-पार्टियों में भी इसका अपमान किया जा रहा है।

उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘वंदे मातरम’ गीत ने भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी और इसे ‘जन-गण-मन’ के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा सभी संस्थानों में दोनों को समान रूप से बजाने की माँग की है।

राष्ट्रगीत को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का माला अदालत में चल रहा है और मई 2022 के अंतिम हफ्ते में दिल्ली उच्च-न्यायालय ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार की राय भी माँगी थी। भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस सम्बन्ध में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत को लेकर कोई दिशानिर्देश न होने के कारण असभ्य रूप से इसका इस्तेमाल हो रहा है और फिल्मों-पार्टियों में भी इसका अपमान किया जा रहा है।