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करोड़ों का इनाम, जेल से शुरुआत… ट्रंप ने जिस आतंकी संगठन ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को बताया ‘खून का प्यासा’ के सरगना नीनो गुएरेरो को US ने किया ढेर

        आतंकी संगठन 'ट्रेन डी अरागुआ' का मुख्य सरगना नीनो गुरेरो को US ने मार गिराया (फोटो साभार : BBC)
जुर्म का अंत हमेशा बुरा होता है। अपराधी चाहे कितना भी ताकतवर हो, वह बच नहीं सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सीधे आदेश ने इस बात को सच साबित कर दिया है। उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने एक बड़ा हवाई हमला किया। इस हमले में वेनेजुएला का सबसे खूंखार गैंगस्टर नीनो गुएरेरो मारा गया है। नीनो गुएरेरो ‘ट्रेन डी अरागुआ’ नाम के खतरनाक आतंकी संगठन का मुख्य सरगना था। ट्रंप ने इस गैंग को ‘खून का प्यासा’ बताया। उसका खूनी साम्राज्य लातिन अमेरिका से लेकर अमेरिका तक फैला हुआ था। ट्रंप ने इस सफलता का खुद एलान किया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अब दुनिया में कहीं भी इन अपराधियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है।

ट्रंप का सीधा आदेश और पेंटागन का बड़ा एक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े सैन्य ऑपरेशन की जानकारी दी। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना के ‘साउदर्न कमांड’ ने यह हमला किया था। यह हमला बेहद तेज और जानलेवा था। इस हमले का मुख्य मकसद ‘ट्रेन डी अरागुआ’ के कुख्यात लीडर नीनो गुएरेरो को खत्म करना था। ट्रंप ने इस संगठन को धरती का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी गिरोह बताया है।
पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताया। यह हवाई हमला इसी सप्ताह की शुरुआत में किया गया था। पूरी जाँच के बाद अब साफ हो चुका है कि गुएरेरो इस हमले में मारा गया है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई का एक Video भी जारी किया है। इस Video में तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है।

वेनेजुएला सरकार की पुष्टि और संयुक्त खुफिया ऑपरेशन

इस खूंखार आतंकी को ढेर करने में वेनेजुएला सरकार ने भी अमेरिका का साथ दिया है। वेनेजुएला के सूचना और संचार मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि यह एक साझा ऑपरेशन था। सुरक्षाबलों और इस आपराधिक संगठन के बीच काफी देर तक भीषण मुठभेड़ चली। इस मुठभेड़ के दौरान ही आतंकी नीनो गुएरेरो को ‘न्यूट्रलाइज’ यानी हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।
यह पूरा ऑपरेशन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों की गहरी सूझबूझ का नतीजा था। इसमें आधुनिक तकनीक और हाई-टेक सपोर्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। वेनेजुएला की सरकार ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर इस खूंखार अपराधी की हर हरकत पर नजर रखी थी। इसके बाद सही मौका मिलते ही इस पर अंतिम प्रहार किया गया।

न्यूयॉर्क कोर्ट में काला चिट्ठा और 41 करोड़ का इनाम

नीनो गुएरेरो लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के निशाने पर था। पिछले साल दिसंबर में न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस पर नार्को-आतंकवाद, जबरन वसूली, हत्या की साजिश और आतंकियों को हथियार और पैसा सप्लाई करने जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। वह एक दशक से ज्यादा समय से इन वारदातों को अंजाम दे रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने गुएरेरो की गिरफ्तारी या उसके बारे में सही जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया था। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 41 करोड़ रुपए बैठती है। अमेरिकी वकीलों के मुताबिक, नीनो गुएरेरो का यह गैंग (खून का प्यासा) पूरे उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के कई देशों में अनगिनत हत्याओं और ड्रग्स की तस्करी के लिए जिम्मेदार था।

जेल से चला साम्राज्य और ‘डॉन’ का जन्म (2013)

इस खूंखार गैंग ‘ट्रेन डी अरागुआ’ की शुरुआत साल 2005 में एक मजदूर संगठन के रूप में हुई थी। वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के राज में एक रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों ने मिलकर एक यूनियन बनाई। लेकिन जल्द ही इन मजदूरों के मन में लालच आ गया। उन्होंने ठेकेदारों को डराना और उनसे पैसे ऐंठना शुरू कर दिया। साल 2011 में जब सरकार ने यह रेलवे प्रोजेक्ट बंद किया, तो वो मजदूर पूरी तरह एक क्रिमिनल गैंग बन चुके थे। नाम पड़ा- ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (अरागुआ की ट्रेन)।

साल 2013 में इस गैंग की कमान मिली हेक्टर रस्टेनफोर्ड गुएरेरो उर्फ नीनो गुएरेरो को। नीनो वेनेजुएला की सबसे बदनाम ‘तोकोरॉन जेल’ (Tocorón Prison) में बंद था। लेकिन वह मामूली कैदी नहीं था, वह वहाँ का ‘प्रान’ (जेल का डॉन) बन गया। उसने जेल के अंदर ही ऐश-ओ-आराम का महल बनाया। वहीं बैठे-बैठे उसने पूरे देश में ड्रग्स, जबरन वसूली और इंसानों की तस्करी का धंधा फैला दिया।

मजबूरी का फायदा और सरहदें पार

साल 2015 में वेनेजुएला में भयंकर गरीबी और भुखमरी फैल गई। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। नीनो गुएरेरो ने इस मजबूरी को धंधा बना लिया। उसके गैंग ने बॉर्डर पर कब्जा किया और भागने वाले गरीबों से टैक्स वसूलने लगे। इतना ही नहीं, इस गैंग के शातिर अपराधी आम शरणार्थियों के भेष में कोलंबिया, पेरू, चिली और अमेरिका जैसे देशों में घुस गए।

इन देशों में जाकर उन्होंने वेनेजुएला के ही प्रवासियों को अपना शिकार बनाना शुरू किया। उन्होंने वहाँ महिलाओं की तस्करी की और छोटे स्तर पर ड्रग्स बेचने का धंधा शुरू कर दिया। लातिन अमेरिका की पुलिस के मुताबिक, इस गैंग ने कई देशों में अपनी परमानेंट सेल (गुप्त ठिकाने) बना ली थीं।

चिली में पूर्व सैन्य अधिकारी की हत्या से मचा था हड़कंप

‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अपनी बेरहमी और खौफनाक हत्याओं के लिए जाना जाता है। मार्च 2023 में इस गैंग ने चिली में एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे दो देशों के बीच तनाव बढ़ गया। गैंग के शूटरों ने वेनेजुएला की सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट और सरकार के विरोधी रोनाल्ड ओजेडा का अपहरण कर लिया। इसके बाद उनकी बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।

यह गैंग पनामा से लेकर ब्राजील तक फैल चुका था। अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, सुपारी लेकर हत्या करना और बड़े-बड़े मॉल में डकैती डालना इनका रोज का काम था। साल 2023 में जब वेनेजुएला की सेना ने इनकी तोकोरॉन जेल पर धावा बोला, तो गुएरेरो जेल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग से अपने साथियों के साथ भाग निकला था। तब से वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था।

अमेरिका के ऑरोरा में घुसपैठ और ट्रंप का चुनावी मुद्दा

पिछले साल अगस्त में अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ऑरोरा शहर से एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ हथियारबंद वेनेजुएला के प्रवासी एक अपार्टमेंट की बिल्डिंग में जबरन घुसते दिखे थे। इस घटना के बाद वहाँ के मकान मालिक और नेताओं ने दावा किया कि ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने अमेरिका की सोसायटियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने ऑरोरा शहर में एक बड़ी रैली की थी और मंच पर इन अपराधियों के पोस्टर लगाए थे। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वह राष्ट्रपति बनते ही देश में अवैध रूप से रह रहे इन अपराधियों को तुरंत बाहर निकालेंगे। ट्रंप की इस आक्रामक नीति को जनता का भारी समर्थन मिला था।

राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से कनेक्शन और अमेरिकी सेना का एक्शन

राष्ट्रपति ट्रंप का हमेशा से आरोप रहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने जानबूझकर अपने देश के कैदियों को अमेरिका भेजा ताकि वहाँ अपराध बढ़ सके। हालाँकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में इस बात के सीधे सबूत नहीं मिले थे। इसके बावजूद, अमेरिकी सेना ने इसी साल जनवरी में एक बेहद गुप्त ऑपरेशन चलाकर निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से उठा लिया था। मादुरो पर फिलहाल अमेरिका में नार्को-आतंकवाद का केस चल रहा है।

अदालत में पेश की गई नई चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि मादुरो सरकार और नीनो गुएरेरो का गैंग आपस में मिलकर काम कर रहे थे। वे मिलकर ड्रग्स के धंधे से मोटा मुनाफा कमा रहे थे। ट्रंप ने गुएरेरो की मौत पर कहा कि जो बाइडेन की कमजोर नीतियों के कारण अमेरिका की सीमाएं असुरक्षित हो गई थीं। लेकिन अब उनकी सरकार इन राक्षसों को चुन-चुनकर खत्म कर रही है।

जोसलीन और लेकन रीली की मौत का लिया बदला

अमेरिका में अवैध प्रवासियों द्वारा की गई कुछ हत्याओं ने पूरे देश को नाराज कर दिया था। 12 साल की मासूम बच्ची जोसलीन नुंगारे और 22 साल की छात्रा लेकन रीली की बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों ने हत्या कर दी थी। ट्रंप ने नीनो गुएरेरो की मौत का ऐलान करते हुए इन दोनों बच्चियों का विशेष रूप से नाम लिया।

ट्रंप ने अपने बयान में लिखा कि अमेरिकी सेना ने इन मासूम बच्चियों और उनके परिवारों के साथ पूरा न्याय किया है। इस खूंखार गैंग के सरगना को मारकर सेना ने उनकी मौतों का बदला ले लिया है। ट्रंप ने साफ किया कि उनके राज में अपराधियों को कोई माफी नहीं मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

‘एलियन एनिमीज एक्ट’ और मास डिपोर्टेशन की तैयारी

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। उन्होंने देश के 200 साल पुराने ‘एलियन एनिमीज एक्ट’ का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। यह कानून सरकार को यह ताकत देता है कि वह किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को बिना किसी अदालती सुनवाई के तुरंत गिरफ्तार करके देश से बाहर निकाल सकती है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह गैंग कोई मामूली चोर-उचक्कों का ग्रुप नहीं है, बल्कि यह एक हमलावर विदेशी सेना की तरह है। ट्रंप सरकार ने इस गैंग के कई संदिग्ध सदस्यों को बिना कोर्ट की मंजूरी के अल साल्वाडोर की सबसे खतरनाक ‘सेकोट जेल’ में भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि अदालतों ने इस पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं, लेकिन सरकार अपनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने कमजोर था यह गैंग

भले ही अमेरिका में इस गैंग को लेकर काफी डर का माहौल बनाया गया हो, लेकिन खोजी संस्था ‘इनसाइट क्राइम’ की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अमेरिका के अंदर उतना मजबूत नहीं है। अमेरिका के ड्रग मार्केट पर पहले से ही मैक्सिको के बेहद खतरनाक ‘सिनालोआ कार्टेल’ और ‘जालिस्को न्यू जनरेशन कार्टेल’ का पूरी तरह कब्जा है।

वेनेजुएला का यह गैंग मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने बहुत छोटा और कमजोर है। अमेरिकी सीमा पर इस गैंग के गुर्गे खुद को बचाने के लिए मैक्सिकन माफियाओं के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं। अमेरिकी गृह मंत्रालय के अनुसार, पूरे अमेरिका में इस गैंग के केवल 600 के करीब एक्टिव मेंबर्स हैं। यह संख्या अमेरिका में रहने वाले 7 लाख अच्छे और शांतिप्रिय वेनेजुएला के प्रवासियों का बहुत छोटा हिस्सा है।

इस बड़े सैन्य एक्शन का आगे क्या असर होगा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े और आक्रामक कदम ने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि वे इन क्रूर हत्यारों और ड्रग तस्करों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूँढ निकालेंगे। अमेरिकी साउदर्न कमांड का यह एक्शन दिखाता है कि अमेरिका अब अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने वेनेजुएला की जेल से निकलकर कई देशों में मौत और खौफ का जो खेल शुरू किया था, उसका अंत अब नजदीक है। इसके मुख्य सरगना नीनो गुएरेरो की मौत ने इस पूरे गैंग की कमर तोड़ दी है।

कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान


नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

 अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

इराक से वेनेजुएला तक हर ऑपरेशन में NYT, WaPo और दूसरे US मीडिया के बड़े चैनल फैलाते रहे प्रोपेगैंडा: करते रहे अमेरिका के लिए काम

      US मीडिया: US सरकार की प्रोपेगैंडा मशीन, अपनी आज़ादी के दावों के बावजूद, इराक पर कॉलिन पॉवेल का झूठ
US मिलिट्री ने वेनेजुएला के खिलाफ 3 जनवरी 2026 की सुबह, ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व नाम का एक बड़ा ऑपरेशन चलाया। इस दौरान US एयरक्राफ्ट ने वेनेजुएला के अहम सैन्य ठिकानों पर गोला-बारूद बरसाए, जबकि डेल्टा फोर्स की एक टीम वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ कर ले गई।

मादुरो और फ्लोरेस को कस्टडी में लेकर वेनेजुएला से न्यूयॉर्क ले जाया गया, और US प्रेसिडेंट ट्रंप ने जल्द ही घोषणा की कि उन पर नार्को-टेररिज्म और दूसरे आपराधिक मामले चलेंगे।

इस ऑपरेशन ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह अचानक हुआ, बल्कि इसलिए कि ये एक देश की संप्रुत्ता के खिलाफ आक्रमण था।

ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व में एलीट डेल्टा फोर्स कमांडो, 150 से ज़्यादा एयरक्राफ्ट, एयरस्ट्राइक के अलावा महीनों से CIA द्वारा की जा रही निगरानी का परिणाम था। मादुरो को हथकड़ी पहनाकर US फोर्स द्वारा घुमाए जाने की तस्वीरें दशकों तक लोगों को अमेरिकी दादागिरी की याद दिलाती रहेगी। इसके जियोपॉलिटिकल असर को अभी पूरी तरह से समझना बाकी है।

ट्रंप प्रशासन की दुस्साहस के बीच, कई सवाल उठ रहे हैं। कई देशों ने इस घटना की निंदा की है। मादुरो चाहे कितने भी बड़े तानाशाह क्यों न हों, वह एक आज़ाद देश के मुखिया थे। US का मादुरो को पकड़ना उस आज़ादी की अनदेखी थी।

मजे की बात यह है कि US मीडिया, जो ह्यूमन राइट्स, डेमोक्रेसी और जस्टिस का ग्लोबल चैंपियन है और नियमित रूप से पूरी दुनिया को उपदेश देता है, इस काम की तारीफ कर रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, US मीडिया के कुछ बड़े मीडिया को मादुरो को पकड़ने के प्लान के बारे में पहले से पता था, लेकिन उन्होंने ‘नेशनल सिक्योरिटी’ के लिए चुप रहना पसंद किया। सेमाफोर की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से पता चला है कि NYT और वाशिंगटन पोस्ट दोनों को रेड शुरू होने से पहले ही इसकी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने चुप रहना चुना और ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के ‘रिक्वेस्ट’ पर इसके बारे में कुछ भी पब्लिश करने में देरी की।

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर संपर्क और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट ने जो बात मानी है, वह अहम है। असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

लेकिन, ये ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब अमेरिका को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के पक्ष में होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

NYT और WaPo का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर सहमति और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और WaPo ने जो बात मानी है, वह ज़रूरी है, क्योंकि असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

हालाँकि, यह बात मानना ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब व्हाइट हाउस को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के चैंपियन होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

इराक पर US का हमला और ‘बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार’ का झूठ: US में पुराने मीडिया ने न सिर्फ व्हाइट हाउस के लिए ‘सीक्रेट कीपर’ का रोल निभाया है, बल्कि वे US सरकार के लिए भी बहुत एक्टिव होकर ढोल पीटने वाले रहे हैं।

2000 के दशक की शुरुआत में, USA में पुराने मीडिया ने दुनिया में हर किसी को उस दशक के सबसे बड़े झूठ के बारे में समझाने के लिए अपने सारे रिसोर्स लगा दिए, कि इराक बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार छिपा रहा था, और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाना बहुत ज़रूरी था।

कवरेज इतना वफ़ादार था कि US मीडिया के बड़े नामों ने कभी भी US सरकार से उन दावों की सच्चाई पर सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई।

उन्होंने इराक में जिन लोगों को सद्दाम हुसैन ने ‘देश निकाला’ दे दिया था, उनके हवाले से अमेरिका ने जो कुछ भी कहा, उसका समर्थन किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने तो ऐसी स्टोरीज़ भी चलाईं जिनमें रोकी गई एल्युमिनियम ट्यूब्स को इराक के न्यूक्लियर प्रोग्राम का ‘सबूत’ बताया गया। दूसरे बड़े नाम, जैसे फॉक्स वगैरह, पूरे जोश में देशभक्ति दिखाते हुए चिल्लाने लगे कि USA के लिए इराक पर हमला करना और ‘दुनिया को बचाना’ कितना जरूरी है।

ऊपर दिए गए उदाहरण तो बस एक सैंपल हैं। US मीडिया के बड़े नाम, जैसे NYT और WaPo असल में US सरकार के प्रोपेगैंडा के हथियार रहे हैं। उनका यकीन और पत्रकारिता का स्टैंड अक्सर US की सुविधा, US के हितों और यहाँ तक कि व्हाइट हाउस की शॉर्ट और लॉन्ग टर्म प्राथमिकताओं के मुताबिक होता है।

ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के दौरान, CIA ने कोल्ड वॉर की कहानी बनाने में मदद के लिए पत्रकारों को हायर किया। COVID के सालों में, बड़ी चिंताओं और एक्सपर्ट एनालिसिस के बावजूद, पुराने मीडिया ने बस वही दोहराया जो बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा। इसने न सिर्फ लैब-लीक की बात को खारिज कर दिया, बल्कि कुछ नामों को बचाने के लिए गलत जानकारी फैलाने में भी लग गया, वुहान में US सरकार की चल रही गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च में फौसी और पीटर दासजक के शामिल होने के किसी भी दावे को खारिज कर दिया। साथ ही सभी विरोधियों को झूठा करार दे दिया।

एलन मस्क के ट्विटर, जिसे अब X के नाम से जाना जाता है, को खरीदने के बाद, कई खुलासों ने पूरी दुनिया को बताया कि कैसे बड़े सोशल मीडिया दिग्गज बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन से सीधे ऑर्डर ले रहे थे। यहाँ तक ​​कि अपने ही देश के नागरिकों को गुमराह भी किया जा रहा था।

इन बड़े मीडिया हाउस के विदेशी कवरेज भी US के हितों का ध्यान रखते थे। जबकि दूसरे देशों को ‘पिछड़ा’ करार देते थे। भारत को अक्सर इन मीडिया हाउस ने बदनाम करने की कोशिश की। इसके लिए कैंपेन चलाया गया। भारत अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने के बजाए खुद की फॉरेन पॉलिसी पर चलना जारी रखा। ये अमेरिका को नागवार गुजरा।

इराक, लीबिया, वेनेजुएला, सीरिया जैसे देशों में सरकार बदलने वाले ऑपरेशन्स अमेरिका ने सीधी तौर पर चलाए। इसमें तथाकथित ‘फ्री प्रेस’ का सपोर्ट इन्हें मिला।

बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता?

                               US द्वारा वेनेज़ुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो को पकड़ कर ले जाया गया
दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।

वेनेजुएला के ऊर्जा और तेल भंडारों का नियंत्रण होगा अमेरिका के पास: राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप ने किया ऐलान, बोले- अनिश्चितकाल तक यहाँ करेंगे शासन

    मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप का बड़ा ऐलान: अनिश्चितकाल तक अमेरिका चलाएगा वेनेजुएला (साभार: आज तक, न्यूज 18)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका अनिश्चितकाल तक वेनेजुएला को चलाएगा। उन्होंने सत्ता हस्तांतरण को लेकर कोई समय-सीमा नहीं बताई और साफ किया कि जब तक अमेरिका को सुरक्षित, सही और उचित नहीं लगेगा, तब तक वह नियंत्रण अपने हाथ में रखेगा। फ्लोरिडा स्थित अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रंप ने इस पूरे सैन्य अभियान और आगे की रणनीति पर विस्तार से बात की।

राष्ट्रपति मादुरो गिरफ्तारी के बाद सामने आई फोटो में दिख रहा है कि मादुरो की आँखों को काली शील्ड से ढका हुआ है। उनके हाथ बँधे हुए हैं और हाथ में एक पानी की बोतल पकड़ाई गई है, जो मादुरो ठीक से पकड़ भी नहीं पा रहे हैं। तस्वीर में वे ग्रे रंग का ट्रैकसूट पहने हुए हैं।

ट्रंप का ऐलान: सुरक्षित बदलाव तक अमेरिका का नियंत्रण

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वेनेजुएला में तब तक रहेगा, जब तक वहाँ सही और सुरक्षित सत्ता परिवर्तन नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि किसी और को सत्ता देकर फिर वही हालात पैदा हों, जो बीते वर्षों में रहे। ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला वेनेजुएला की जनता के हित में लिया गया है, ताकि अगला नेता देश के भले को ध्यान में रखे। हालाँकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह व्यवस्था कितने समय तक चलेगी।

 ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि वेनेजुएला के ऊर्जा और तेल के भंडारों का नियंत्रण अब अमेरिकी तेल कंपनियों को दिया जाएगा। उनका दावा है कि अमेरिका की सबसे बड़ी तेल कंपनियाँ अरबों डॉलर का निवेश करेंगी, खराब हो चुके तेल के बुनियादी ढाँचों की मरम्मत करेंगी और देश के लिए कमाई शुरू करेंगी। ट्रंप ने कहा कि इससे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा, “हमारी बहुत बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियाँ, जो दुनिया में कहीं भी सबसे बड़ी हैं, वहाँ जाएँगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, बुरी तरह से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे, तेल के बुनियादी ढाँचे की मरम्मत करेंगी और देश के लिए पैसा कमाना शुरू करेंगी।”

मादुरो की गिरफ्तारी का सैन्य ऑपरेशन

ट्रंप ने मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर अमेरिकी सेना की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन इतना प्रभावी था कि कराकस के कई हिस्सों में बिजली गुल हो गई। उन्होंने दावा किया कि इस मिशन में अमेरिका के किसी भी सैनिक की मौत नहीं हुई और न ही कोई सैन्य उपकरण खोया गया।

इस अभियान में अमेरिकी विमान और हेलिकॉप्टर समेत बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा, “अंधेरा था, कराकस की बत्तियाँ हमारे विशेष कौशल के कारण लगभग पूरी तरह से बंद थीं। अँधेरा था और स्थिति बेहद खतरनाक थी।”

मादुरो पर चलेगा केस

अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी ने कहा है कि मादुरो और उनकी पत्नी पर नारको-टेररिज्म, कोकेन जैसे ड्रग्स की तस्करी की साजिश और हथियारों से जुड़े आरोप हैं। 2020 से चले आ रहे इंडिक्टमेंट को अपडेट कर नया अभियोग दायर किया गया है। जहाँ वे मैनहैटन की एक संघीय कोर्ट में आरोपों का सामना करेंगे।

बता दें कि वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया है। दूसरी ओर अमेरिका में भी इस कार्रवाई पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने ट्रंप के कदम को गैरकानूनी और अविवेकपूर्ण बताते हुए कहा कि यह कार्रवाई तेल और सत्ता के लिए है, न कि लोकतंत्र या कानून के लिए।

रेवड़ी कल्चर ने तेल संपन्न सबसे अमीर देश वेनेजुएला को पहुंचा दिया बर्बादी के कगार पर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के समय कहा था कि हमें रेवड़ी कल्चर से सावधान रहना होगा। रेवड़ी कल्चर वाले कभी आपके लिए नए एक्सप्रेसवे नहीं बनाएंगे, नए एयरपोर्ट या डिफेंस कॉरिडोर नहीं बनाएंगे। ऐसे लोगों को लगता है कि मुफ्त की रेवड़ी के बदले उन्होंने जनता जनार्दन को खरीद लिया है। उन्होंने कहा, ‘हमें देश की रेवड़ी कल्चर को हटाना है। रेवड़ी बांटने वाले कभी विकास के कार्यों जैसे रोड नेटवर्क, रेल नेटवर्क का निर्माण नहीं करा सकते। ये अस्पताल, स्कूल और गरीबों को घर नहीं बनवा सकते।’ यानी रेवड़ी कल्चर से देश तरक्की नहीं कर सकता, उल्टा देश बर्बादी की ओर बढ़ेगा।

पीएम नरेंद्र मोदी ने तो चिंता जताते हुए यहां तक कहा कि रेवड़ी कल्चर देश को कहीं का नहीं छोड़ेगा। इससे पहले रिजर्व बैंक भी ‘फ्री’ अर्थव्यवस्था से खड़े नुकसानों को लेकर आगाह कर चुका है। लेकिन देश में मौजूद कुछ राजनीतिक पार्टियां रेवड़ी कल्चर को चुनाव में जीत की गारंटी समझने लगी हैं। इस अवसरवादी राजनीति और फ्री की रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा देने में आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सबसे पहले नंबर पर हैं। आश्चर्य की बात है अपने को पढ़़े-लिखे इंजीनियर कहने वाले केजरीवाल भी इस फ्री की रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन इसके लिए दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को दोषी करार करने से पहले नगर निगम से लेकर लोक/राज्य सभा तक समस्त नेताओं को वर्षों से मिलने वाली पेंशन, फ्री में मिलने वाली सरकारी सुविधाओं को बंद करनी चाहिए, क्योकि charity begins at home, केजरीवाल ने तो कुछ ही वर्षों पूर्व ही जनता को देनी शुरू की है। निर्वाचित सदस्य तो वर्षों से फ्री की रेवड़ियों का आनंद ले रहे हैं। देश में महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण नेताओं को मिल रही सरकारी सुख-सुविधाएं भी हैं। जिसका रिज़र्व बैंक और सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेना चाहिए। जनता को मिल रही फ्री की रेवड़ी से क्यों परेशानी हो रही है? नेता फ्री की रेवड़ी खाएं तो पुण्य,जनता खाए तो पाप।    
अब आइए समझते हैं कि फ्री की रेवड़ी किसी देश या राज्य के लिए कितनी तबाही ला सकता है। दक्षिणी अमरीका महाद्वीप में एक देश है वेनेज़ुएला। यह देश एक समय काफी अमीर था, लेकिन आज लोग यहां पाई-पाई को मोहताज हैं। इस देश में कच्चे तेल (Crude Oil) का विशाल भंडार है। यहां पेट्रोल (गैसोलिन) की कीमत 2 रुपये लीटर से भी कम (1.88 रुपये/लीटर) है। यहां तेल तो प्रचुर मात्रा में है लेकिन फ्री की रेवड़ी बांटने की वजह से महंगाई चरम पर पहुंच गई है। महंगाई का आलम यह है कि यहां एक कॉफी 25 लाख में मिलती है। एक ब्रेड लेने के लिए चार घंटे लाइन में लगना पड़ता है। फ्री की चीजें मिलने से लोगों ने मेहनत करना छोड़ दिया। खेती यहां समाप्त हो गई। तेल संपन्न देश वेनेजुएला आज फ्री की रेवड़ी की वजह से बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है। अब हर चीज आयात होती है। अगर भारत के कुछ राज्य नहीं चेते तो कुछ इसी तरह के हालात उनके भी होने वाले हैं।

 रेवड़ी संस्कृति लोकतंत्र और अर्थतंत्र का बेड़ा गर्क कर रही

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ दिनों में दो बार देश का ध्यान इस ओर आकर्षित कर चुके हैं कि रेवड़ी संस्कृति किस तरह लोकतंत्र और अर्थतंत्र का बेड़ा गर्क कर रही है। यह वही संस्कृति है, जिसे मुफ्तखोरी की राजनीति भी कहा जाता है। यह राजनीति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली भी है। यह किसी से छिपा नहीं कि रेवडिय़ां बांटने की राजनीतिक संस्कृति ने न जाने कितने देशों को तबाह किया है।

वेनेजुएला में एक कॉफी की कीमत 25 लाख हो गई

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था 95 फीसदी तेल निर्यात पर निर्भर थी और जब तक तेल की कीमतें ऊंचाईयां छूती रहीं, वेनेजुएला की सत्ता पर काबिज समाजवादी सरकारों ने तेल की आमदनी से लबालब खजाने को पानी की तरह बहाया और लोगों को मुफ्त बिजली, पानी, अस्पताल और शिक्षा दी गई। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में शुमार वेनेजुएला वर्तमान में दिवालिया होने के कगार पर है, जिसके पीछे की वजह थीं, वहां की समाजवादी नीतियां और फ्री रेवड़ी कल्चर, जिसका असर वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पर तब पड़ना शुरू हुआ, जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरनी शुरू हो गईं। वेनेजुएला की समाजवादी सरकार ने जैसे ही जनता के लिए सबकुछ मुफ्त मुहैया करना शुरू किया, वहां के मेहनतकश किसानों और काश्तकारों को मेहनत करना भारी पड़ गया और उन्होंने किसानी से भी तौबा कर लिया। जब तक तेल की कीमतें ऊंची रहीं, तब तक फ्री की योजनाएं चली, लेकिन जैसे ही तेल की कीमतें गिरी सरकार की नीतियां फेल हो गईं, क्योंकि सरकार खजाने पर दवाब बढ़ गया और महंगाई चरम पर पहुंच गई। आज वेनेजुएला में 100 फीसदी से अधिक महंगाई है, गरीबी रेखा के नीचे 94 फीसदी आबादी, कुपोषण के शिकार 75 फीसदी लोग हैं और लाखों लोग देश छोड़कर भाग चुके हैं। ये फ्री की रेवड़ी बांटने के कारण हुई। वेनेजुएला में आज बाजार और वहां की करेंसी सब नष्ट हो चुकी है। एक लाख बोलेबियन करेंसी की कीमत 1000 गुना नीचे गिर गई है। आज वहां एक कॉफी की कीमत 25 लाख हो गई है।

वेनेजुएला में एक ब्रेड खरीदने के लिए लाइन में 4 घंटे करना पड़ता है इंतजार

वेनेजुएला ने बढ़ती महंगाई को देखते हुए 10 लाख बोलीवर (वहां की करेंसी) का नोट जारी किया। इस 1000000 वेनेजुएला की करेंसी की भारत में कीमत मात्र ₹36 है। वेनेजुएला में पेट्रोल दुनिया में सबसे सस्ता है इतना सस्ता कि उसके पड़ोसी देशों जैसे कोलंबिया, ब्राजील, पराग्वे इत्यादि को तेल की खूब स्मगलिंग होती है। भारतीय रुपए में लगभग डेढ़ रुपए लीटर पेट्रोल है। आज वेनेजुएला में एक ब्रेड खरीदने के लिए भी 4 घंटे की लाइन लगती है। वेनेज़ुएला जहां सऊदी अरब से भी ज्यादा क्रूड है जहां की जमीनें शानदार है जहां काफी अच्छी खेती होती है जिसने दुनिया को सबसे ज्यादा विश्व सुंदरी दिया है, उसकी यह हालत सिर्फ केजरीवाल के मॉडल पर हो गयी। यानी एक वामपंथी नेता ने लोकप्रिय बनने के चक्कर में जनता को सब कुछ फ्री देने का स्कीम चलाया और नतीजा यह हुआ कि आज वेनेजुएला में महिलाएं वेश्यावृत्ति करने के लिए पड़ोसी देशों में जाती है। इसीलिए बिजली फ्री, पानी फ्री, लोन फ्री आदि को तुरंत बंद करने की जरूरत है क्योंकि शार्ट टर्म में ये बड़े अच्छे लगते हैं लेकिन लॉन्ग टर्म में यह हमें बर्बाद कर देते हैं।

वेनेज़ुएला से क्यों भाग रहे हैं लाखों लोग?

वेनेज़ुएला में लाखों की संख्या में लोग देश छोड़कर जा रहे हैं, महंगाई हज़ारों गुना बढ़ गई है, अर्थव्यवस्था डूबने की कगार पर है और लोगों के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं है। महामंदी के दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था और इन भयावह हालातों के ​लिए कई लोग राष्ट्रपति निकोलस माडुरो और उनकी सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। लेकिन, देश में ये हालात बने कैसे। मंदी से निकलने की कोशिशों के बावजूद सुधार क्यों नहीं हो रहा है? वेनेज़ुएला के लोगों के लिए इस वक़्त सबसे बड़ी समस्या महामहंगाई कहा जा रहा है। विपक्ष के नियंत्रण वाली वेनेज़ुएला की राष्ट्रीय असेंबली के अनुसार औसतन हर 26 दिन बाद क़ीमत दोगुनी हो रही है। वहां सालाना महंगाई दर 83,000% तक पहुंच गई थी। इसके चलते वेनेज़ुएला के लोगों के लिए खाने-पीने का सामना और कुछ मूलभूत ज़रूरत की चीज़ें ख़रीदना भी मुश्किल हो गया है।

वेनेजुएला मुफ्तखोरी में हो चुका है बर्बाद

मुफ्त की ये राजनीति कैसे एक अमीर देश को कंगाल कर सकती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वेनेजुएला। वेनेजुएला से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं-

एक ज़माने में Venezuela की गिनती दुनिया के सबसे अमीर देशों में होती थी. कहा जाता था कि Venezuela के पास जब तक तेल के बड़े बड़े भंडार हैं, तब तक उसका बुरा समय आ ही नहीं सकता।

प्राकृतिक रूप से Venezuela आज भी इतना सम्पन्न देश है कि वहां दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार मौजूद है।

इसके अलावा Venezuela की 88 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है, इसलिए इसे Urban Country भी कहा जाता है।

हालांकि आज इस Urban Country की हालत ये है कि यहां की 83 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. वहां एक करोड़ लोग, दिन में एक समय का खाना भी खरीद कर नहीं खा सकते।

Venezuela की ये हालत इसलिए हुई क्योंकि वहां भी सरकारों ने एक समय वोटों के लिए लोगों को मुफ्त योजनाओं का लाभ देना शुरू किया था।

बात वर्ष 1999 की है, जब Venezuela के लोगों ने सोशलिस्ट पार्टी के लीडर Hugo Chávez (ह्युगो चावेझ) को अपना राष्ट्रपति चुना।

ह्युगो चावेझ का मानना था कि Venezuela को दुनिया में तेल बेच कर जितना भी पैसा मिलता है, वो पैसा वहां के लोगों पर खर्च होना चाहिए।

जब वो राष्ट्रपति बने, उन्होंने इस अमीर देश में अमीर लोगों के लिए सबकुछ मुफ्त कर दिया. पानी, बिजली, स्कूल की फीस, अस्पताल का इलाज और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सबकुछ मुफ्त हो गया।

Venezuela के लोग इतने अमीर थे कि उन्हें इस मुफ्त सेवा और सुविधाओं की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन वोटों की राजनीति की वजह से उन्हें ये सुविधाएं लेनी पड़ी और सरकार की इन गलत नीतियों का परिणाम ये हुआ कि वहां लोग परिश्रम करने से बचने लगे और वहां से बड़ी बड़ी कम्पनियां अपनी Manufacturing Unit दूसरे देशों में ले गईं। इससे Venezuela पर आर्थिक बोझ बढ़ा और वहां चीजें महंगी होने लगी। इस आर्थिक मॉडल ने Venezuela को बर्बाद कर दिया।

इन्हीं नीतियों की वजह से ह्युगो चावेझ 2013 तक सत्ता में बने रहे। इससे ये पता चलता है कि मुफ्त की राजनीति, नेताओं का ही विकास करती है। नागरिकों का नहीं।

एक समय Venezuela का एक Bolívar (बोलिवर), भारत के सात रुपये के बराबर था. लेकिन आज भारत के 25 रुपए लगभग 1 लाख बोलिवर से ज्यादा के बराबर है। आज Venezuela में महंगाई इतनी ज्यादा है कि वहां टीवी खरीदने के लिए भी लोगों को बोरों में भर कर पैसा ले जाना पड़ता है और ऐसा भी मुट्टीभर लोग ही कर पाते हैं।

मुफ्तखोरी से पड़ोसी श्रीलंका हो गया बर्बाद

श्रीलंका की इस बदहाली की सबसे बड़ी वजह है, मुफ्तखोरी (Freebies) की राजनीति है। वर्ष 2019 में जब श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव हुए थे, तब श्रीलंका के राजपक्षे परिवार ने ये ऐलान किया था कि अगर चुनाव में उनकी पार्टी जीत गई तो वो देश में वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए जाने वाले Value Added Tax यानी VAT को आधा कर देगी। जब चुनाव में राजपक्षे परिवार की पार्टी जीती तो वादे के तहत VAT को 15 प्रतिशत से घटा कर 8 प्रतिशत कर दिया गया, जिससे श्रीलंका को उसकी GDP के 2 प्रतिशत के बराबर नुकसान हुआ। आज श्रीलंका अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुज़र रहा है। आज श्रीलंका पर साढ़े 6 लाख करोड़ रुपये कर्ज है।

चीजें मुफ्त देने पर निकल जाता है दिवाला

रेवड़ी कल्चर को एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए, शहर में आपकी एक छोटी सी दुकान है और वो दुकान आप एक ऐसे व्यक्ति को चलाने के लिए दे देते हैं, जो लोकप्रिय होना चाहता है। वो आपकी दुकान पर रखे सामान की बहुत ही कम कीमत में या मुफ्त में बिक्री शुरू कर देता है। इससे आपकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ तो जुट जाएगी लेकिन उस दुकान का दिवाला निकल जाएगा। अब आप इसी दुकान की जगह पर एक राज्य को रख कर देखिए और सोचिए अगर आपके राज्य में एक ऐसी सरकार आ जाती है, जो लोकप्रिय होने के लिए मुफ्तखोरी (Freebies) की राजनीति शुरू कर देती है। आपको बिजली-पानी मुफ्त मिलने लगता है। महिलाओं और युवाओं को हर महीने आर्थिक मदद मिलने लगती है। बसों और रेल में सफर मुफ्त कर दिया जाता है तो उस राज्य का क्या हाल होगा। उस राज्य का भी इस दुकान की तरह दिवाला निकल जाएगा और इस समय हमारे देश के कुछ राज्यों में यही हो रहा है।

रेवड़ी कल्चर से भारत में राज्यों की सेहत बिगड़ने लगी

भारत में सुप्रीम कोर्ट में मुफ्तखोरी या ‘रेवड़ी कल्चर’ पर सुनवाई चल रही है। सवाल है कि मुफ्तखोरी की सियासी परंपरा कब और कैसे खत्म होगी। मुफ्तखोरी के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर मुद्दा बताया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को सियासी दलों को फ्री वाले चुनावी वादों करने से रोकने के लिए जरूरी समाधान खोजने और हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके नुकसान के बारे में पहले ही बताया था और लोगों को इससे बचने की सलाह दी थी। ‘रेवड़ी कल्चर’ भले ही चुनाव में लोगों को आकर्षित करने की गारंटी बन चुका हो, लेकिन इसका नतीजा यह हो रहा है कि राज्यों की आर्थिक सेहत बिगड़ने लगी है और वो कर्ज की बोझ तले दबने लगे हैं। जाहिर है अगर खर्च ज्यादा हो और आमदनी कम हो, फिर कर्ज तो लेना ही पड़ेगा। भारतीय राजनीति में ‘रेवड़ी कल्चर’ का छोटे स्तर पर कई राजनीतिक दलों ने पहले भी इस्तेमाल किया लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘रेवड़ी कल्चर’ को चुनाव जीतने की गारंटी के तौर पर अपनाया और इसे व्यापक तौर पर बढ़ावा दिया। केजरीवाल ने फ्री बिजली, फ्री पानी के वादे के बाद फ्री शराब भी शुरू कर दिया था लेकिन वहां वे घोटाले में फंस गए तो इसे बंद करना पड़ा। यानी ये जितनी भी फ्री की बातें हो रही हैं दरअसल उसके पीछे मंशा कुछ और ही होती है- अपनी पार्टी के लिए काली कमाई जुटाना, अपने रिश्तेदारों, जानने वालों को लाभ पहुंचाना। अब इसी कड़ी में देश की राष्ट्रीय राजनीति में उतरने की ताल ठोंकने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता ने दशहरा के मौके पर लोगों को फ्री की रेवड़ी बांटी।

रेवड़ी कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट कर रहा सुनवाई

यह अच्छा है कि उच्चतम न्यायालय उस जनहित याचिका की सुनवाई कर रहा है, जिसमें रेवड़ी संस्कृति पर लगाम लगाने की मांग की गई है। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका पर केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया कि मुफ्तखोरी की राजनीति देश को आर्थिक तबाही की ओर ले जा रही है। उच्चतम न्यायालय ने इस विषय को गंभीर मानते हुए एक ऐसी समिति बनाने का सुझाव दिया, जिसमें केंद्र सरकार, चुनाव आयोग के साथ नीति आयोग, रिजर्व बैंक और विभिन्न दलों के प्रतिनिधि शामिल हों।

क्या है ‘रेवड़ी कल्चर’ ?

देश के दक्षिण राज्यों खासकर तमिलनाडु में सबसे पहले मुफ्त बांटने की सियासत शुरू हुई। यहां चुनाव जीतने के लिए मंगलसूत्र, टीवी, प्रेशर कुकर, वॉशिंग मशीन और साड़ी फ्री में बांटी जाने लगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के कार्यकाल में अम्मा कैंटीन खूब फली-फूली। दक्षिण भारत के बाद अब यह उत्तर भारत के साथ-साथ पूरे देश में वोट पाने का एक शॉर्टकट जरिया बन चुका है। वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली-पानी, अनाज, लैपटॉप, मोबाइल, स्कूटी और बेरोजगारी भत्ता को हथियार बनाया। इसका नतीजा ये हुआ कि आज कई राज्यों की अर्थव्यवस्था कर्ज के बोझ तले दबने लगी है।

रेवड़ी कल्चर पर आगाह कर चुका है RBI

इससे पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी ‘रेवड़ी कल्चर’ से देश को होने वाले नुकसान को लेकर आगाह कर चुका है। ‘स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस’ नाम से आई आरबीआई की रिपोर्ट की मानें तो पंजाब, राजस्थान, केरल, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की हालत डांवाडोल है। कैग (CAG) के डेटा के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी पर राज्य सरकारों के खर्च में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जिससे कर्ज बढ़ता जा रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में सब्सिडी पर राज्यों ने कुल खर्च का 11.2% खर्च किया था। जो 2021-22 में बढ़कर 12.9% हो गया। सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च ओडिशा, झारखंड, केरल और तेलंगाना ने किया। वहीं पंजाब, गुजरात और छत्तीसगढ़ सरकार ने सब्सिडी पर अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर का 10% से ज्यादा खर्च किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त दे रहीं हैं। जिससे फ्री पानी, फ्री बिजली, बिल माफी और कर्ज माफी से सरकारों को कोई कमाई नहीं हो रही है। उल्टे सरकार को इस पर खर्च करना पड़ रहा है। RBI के मुताबिक कुछ ऐसे राज्य हैं जिनका कर्ज 2026-27 तक सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 30% से ज्यादा हो सकता है। ऐसे राज्यों में पंजाब की हालत ज्यादा खराब होगी। पंजाब सरकार पर GSDP का 45% से ज्यादा कर्ज होने का अनुमान है। तो वहीं राजस्थान, केरल और पश्चिम बंगाल का कर्ज भी 35% तक होने की संभावना है।

‘रेवड़ी कल्चर’ से राज्यों की सेहत पर बुरा असर

‘रेवड़ी कल्चर’ से जहां राज्यों की आर्थिक सेहत पर बुरा असर हो रहा है तो वहीं दूसरे स्तर पर भी साइड इफेक्ट्स देखने को मिल रहे हैं। पंजाब में साल 1971 में सिर्फ 1,92,000 ट्यूबवेल थे। लेकिन बिजली बिल में माफी और सब्सिडी मिलने से इसकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। आज यहां ट्यूबवेल की संख्या 14.1 लाख तक पहुंच गई है। इससे भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। आलम यह है कि अधिक दोहन के चलते भूजल 20 से 30 मीटर नीचे चला गया है। जिससे पंजाब बहुत बड़े जलसंकट की ओर बढ़ रहा है।

देश में सबसे ज्यादा खराब हालत में पंजाब, फिर भी बांटी जा रही फ्री की रेवड़ियां

हमारे देश के कई राज्यों में भी आज ऐसा ही हो रहा है। इनमें पंजाब की स्थिति सबसे खराब है। वित्त वर्ष 2021-22 में पंजाब पर उसकी GDP के 53 प्रतिशत हिस्से के बराबर कर्ज था और ये पूरे देश में सबसे ज्यादा था। इसे ऐसे समझिए कि अगर पंजाब की GDP 100 रुपये है तो 53 रुपये उस पर कर्ज है। मौजूदा समय की बात करें तो इस समय पंजाब पर 2 लाख 82 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। अगर इस कर्ज को पंजाब की 3 करोड़ आबादी में बांटे दें तो इस हिसाब से राज्य के हर व्यक्ति पर लगभग 95 हजार का कर्ज हुआ। इसके बावजूद पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान उन मुफ्त स्कीम को पंजाब में लागू कर रहे हैं, जिनका ऐलान चुनाव के दौरान हुआ था। पंजाब में चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने ऐलान किया था कि वो सरकार बनने पर 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त (Freebies) कर देगी। हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से इस मुफ्त स्कीम को लागू कर दिया है, जिससे पंजाब पर सालाना 1800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान है। सोचिए, जिस राज्य पर उसकी GDP के 53 प्रतिशत हिस्से के बराबर कर्ज है, उस राज्य की सरकार लोगों को मुफ्त बिजली देकर अपने कर्ज को और बढ़ा रही है। ये तो बस अभी शुरुआत है।

पंजाब 100 रुपये में से 20 रुपये पुराना कर्ज चुकाने पर खर्च कर रहा

आम आदमी पार्टी ने चुनाव में ऐलान किया था कि वो 18 साल से ऊपर की सभी महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपए की आर्थिक मदद देगी। पंजाब में 18 साल से ऊपर की लगभग एक करोड़ महिलाएं हैं। यानी केवल इस वादे को ही पूरा करने के लिए सरकार को हर महीने एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। ये राशि कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि पंजाब सरकार हर महीने पंजाब पुलिस पर भी इतना पैसा खर्च नहीं करती। 2021-2022 में पंजाब पुलिस का सालाना बजट लगभग 5 हज़ार 700 करोड़ रुपये था। इसी तरह आम आदमी पार्टी ने चुनाव में वादा किया था कि वो आम लोगों को 400 यूनिट तक के बिजली बिल पर 50 प्रतिशत की छूट देगी। किसानों को 12 घंटे मुफ्त बिजली दी जाएगी और कारोबारियों- दूसरे बड़े उद्योगों को भी सस्ते दामों पर बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। अगर पंजाब सरकार इस वादे को भी पूरा करती है तो इससे उस पर सालाना 5 से 8 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाएगा। पंजाब सरकार केन्द्र से कर्ज लेकर इन चुनावी वादों को पूरा करना चाहती है। जबकि सच ये है कि पंजाब पहले से हर 100 रुपये में से 20 रुपये अपना पुराना कर्ज चुकाने पर खर्च कर रहा है।

राजस्थान आर्थिक संकट के मुहाने पर

आरबीआई ने राजस्थान सहित 10 राज्यों के वित्तीय हालत पर चिंता जताई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के अलावा बिहार, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य कर्ज के भारी बोझ तले दबे हैं। पंजाब को एक्ट्रा बजटरी बोरोइंग देने के लिए आरबीआई ने बैंकों को ही मना कर दिया है। अब राजस्थान भी इसी राह पर चल पड़ा है। प्रदेश का कर्ज बढ़कर 4.77 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है। इसमें 82 हजार करोड़ रुपये का गारंटेड लोन भी शामिल कर दें तो प्रदेश पर कुल कर्ज 5.59 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। साल 2019 तक बजट में शामिल कर्ज 3.39 लाख करोड़ रुपये था। इसके अलावा 61 हजार करोड़ से ज्यादा का गारंटेड लोन था।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना भी इस दौड़ में पीछे नहीं

आन्ध्र प्रदेश में मुफ्त सरकारी योजनाओं की सूची बहुत लम्बी है। आन्ध्र प्रदेश में 27 लाख आदिवासी महिलाओं को सालाना 15 हज़ार रुपये की आर्थिक मदद मिलती है। बुजुर्गों को वृद्धा पेंशन के रूप में हर महीने 2250 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा हाल ही में वहां की सरकार ने राज्य के डेढ़ करोड़ लोगों का मुफ्त में Health Insurance करवाया है और कॉलेज में पढ़ने वाले 14 लाख छात्रों की फीस भी माफ की है। आन्ध्र प्रदेश की सरकार अपने लोगों को मुफ्त (Freebies) का ये लाभ तब दे रही है, जब उस पर 3 लाख 98 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। इसी तरह तेलंगाना पर 3 लाख 12 हज़ार करोड़ रुपये और पश्चिम बंगाल पर 5 लाख 62 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज है। लेकिन इतना भारी भरकम कर्ज होने के बावजूद ये राज्य वही गलती कर रहे हैं, जो श्रीलंका ने की। यानी ये मुफ्त की राजनीति से अपने राज्यों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हमें बेसिक सुविधाए चाहिए या मुफ्तखोरी, फैसला हमारा

दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां मुफ्त (Freebies) योजनाओं और सुविधा के नाम पर लोगों के वोट तो हासिल कर लेती हैं। लेकिन इसके नाम पर ये पार्टियां आपको उस हक से वंचित कर देती हैं, जिस पर आपका सबसे पहले अधिकार बनता है। असल में लोगों को मुफ्त बिजली और पानी नहीं चाहिए बल्कि लोगों को एक ऐसी व्यवस्था और सिस्टम चाहिए, जो उनके जीवन को आसान बनाए। लोगों को अच्छी सड़कें चाहिए, अच्छा Drainage सिस्टम चाहिए, 24 घंटे बिजली-पानी चाहिए, अच्छे स्कूल और अस्पताल चाहिए और ऐसी कानून व्यवस्था चाहिए, जिसमें उनका हित हो। लेकिन क्या ये सब आपको मिलता है? ऐसे में आप एक बार फिर से सोचिए कि आपको मुफ्त बिजली चाहिए या आपको अपने शहर और इलाक़े में अच्छा Drainage सिस्टम और सड़कें चाहिए?