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स्पेन में घुसे हजारों अफ्रीकी घुसपैठियों को संभालने के लिए सेना तैनात, SC का आदेश बना ढाल: 6 साल पहले कैसे तबाही की कगार पर पहुँचा था यूरोप, भारत में भी घुसपैठियों के पास कानूनी ढाल

                                     स्पेन पहुँचे हजारो मोरक्को के घुसपैठिए (फोटो साभार-x@foxnews)

यूरोप एक बार फिर अवैध शरणार्थियों के नाम से काँप रहा है। दरअसल अफ्रीकी देश मोरक्को से बड़ी संख्या में अवैध शरणार्थी स्पेन में घुस गए हैं। ये लोग समुद्र तैर कर या जमीनी बॉर्डर के जरिए अवैध तरीके से स्पेन में घुस रहे हैं। सेउटा में घुसने से माइग्रेंट स्पेन के इलाके और आगे चलकर EU के इलाके में आ सकते हैं, जहाँ वे शरण माँग सकते हैं।

इन शरणार्थियों ने 8 साल पहले सीरिया संकट की याद ताजा कर दी है, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी शरणार्थी के तौर पर आए थे। स्पेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी समेत कई देशों में इनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रशासनिक व्यवस्था चरमराने लगी। इसकी याद दिलाते हुए इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने शरणार्थियों के नए दौर पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि वे स्पेन के साथ शेंगेन समझौता रद्द कर सकते हैं।

क्या है मामला

सेउटा मोरक्को के उत्तरी तट पर स्पेन के कंट्रोल वाला एक छोटा सा इलाका है। इससे सटे मेलिला एन्क्लेव में अफ्रीका और यूरोपियन यूनियन का जमीनी बॉर्डर है। सेउटा में हजारों शरणार्थी ब्रेकवॉटर के आस-पास तैरकर या बॉर्डर की बाड़ तोड़कर घुस गए हैं, जिससे छोटा-सा यूरोपियन देश स्पेन पर काफी दबाव बढ़ गया है। यहाँ तक कि स्पेन को सेना और ज्यादा पुलिस बल तैनात करनी पड़ी है।

अवैध तरीके से घुस आए बेलगाम शरणार्थियों के चलते बवाल मच गया है। यहाँ बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। दरअसल अचानक हजारों शरणार्थी सीमा पार कर घुसने लगे। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, हजारों शरणार्थी मोरक्को की सीमा पार कर स्पेन के शहर सेउटा में दाखिल हुए। नए जत्थे में 1500 से ज्यादा शरणार्थी हैं, जो समुद्र के रास्ते शहर में दाखिल हो रहे हैं। सेउटा के प्रशासनिक अधिकारी जुआन जीसस विवास के मुताबिक, पिछले हफ्ते भर से शरणार्थियों का आना काफी बढ़ गया है और संसाधनों की कमी हो रही है।

स्पेन में घुस रहे शरणार्थियों का वीडियो भी सामने आया है। सैकड़ों लोग इन्फ्लेटेबल ट्यूब और दूसरे फ्लोटेशन डिवाइस का इस्तेमाल करके ब्रेकवाटर के आसपास तैरते हुए दिखे। हजारों लोग जमीनी सीमा के गेट से घुसते दिखाई दिए। इससे घबरा कर सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी घबरा कर भाग गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के सरकारी ब्रॉडकास्टर TVE ने अंदाजा लगाया है कि करीब 3000 लोग इस इलाके में घुसे हैं। समुद्र पार करते वक्त 9 शरणार्थियों की लाश भी पुलिस ने बरामद की है। इन शरणार्थियों में ज्यादातर मोरक्को के नागरिक हैं। दरअसल यूरोप में जमीन से घुसने का एकमात्र रास्ता मोरक्को और स्पेन की सीमा है। यहाँ तक कि सबसे आसान समुद्री रास्ता भी स्पेन तक ही जाता है। इसलिए 2021 के बाद 30 जुलाई 2026 को सबसे ज्यादा शरणार्थी स्पेन में घुस आए हैं। इसके साथ ही लगातार इनके आने का सिलसिला जारी है।

स्थानीय प्रशासन ने केन्द्र को आर्मी तैनात करने और नेशनल इमरजैंसी घोषित करने की माँग की है। स्पेन में आर्मी की हलचल तेज है। बख्तरबंद गाड़ियाँ घूमने लगी हैं। हालाँकि आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।

क्या कहा मेलोनी ने

स्पेन में बॉर्डर पर बवाल के बाद इटली भी सचेत हो गया है। अवैध शरणार्थियों के आने पर इटली ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि वह ‘कड़े उपायों’ पर विचार कर रही हैं। उन्होंने स्पेन के साथ शेंगेन समझौते (Schengen Agreement) को अस्थायी रूप से निलंबित करने की चेतावनी दी है।

यूरोपीय देशों के बीच सीमा खुला रखने से जुडा शेंगेन समझौता इसके सदस्य देशों के बीच 1985 में हुई थी। जिसके तहत सदस्य देशों ने अपनी आपसी सीमाओं पर नियंत्रण समाप्त कर दिया है यानी इटली ने अपनी सीमा सील करने की चेतावनी दी है।

मेलोनी ने X पर लिखा, “सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर दिखाती हैं कि बिना कंट्रोल के अवैध घुसपैठ यूरोप के बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है।”

उन्होंने कहा कि इटली इस पर विचार कर रहा है कि वह स्पेन के साथ शेंगेन एरिया को सस्पेंड कर दिया जाए। हालाँकि मेलोनी ने यह नहीं बताया कि ऐसा कैसे किया जाएगा।

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई शरणार्थियों की बाढ़

शरणार्थियों को लगता है कि यहाँ पहुँचने पर स्पेन के मुख्य भाग में एंट्री हो जाएगी और फिर यूरोपीय यूनियन के देशों तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

स्पेन का मानना है कि मोरक्को और दूसरे अफ्रीकी देशों से जो शरणार्थी आ रहे हैं, उसके पीछे तस्करी करने वाले नेटवर्क का हाथ है। हाल ही में स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने बिना सही प्रक्रिया के समुद्र के रास्ते सेउटा में आने वाले शरणार्थियों को तुरंत वापस लौटने पर रोक लगा दी थी। स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरक्को के रास्ते सेउटा-मेलिला आने वाले शरणार्थियों को पकड़े जाने पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीधा मोरक्को नहीं भेजा जा सकता है। इससे तस्करी करने वाले नेटवर्क को बढ़ावा मिला है।

शरणार्थी सेउटा पहुँचने से पहले मोरक्को के शहर फनीडेक में इकट्ठा हो रहे हैं। मोरक्को के सुरक्षा बल इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं और इन पर पानी की बौछारें की जा रही हैं, लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे।

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का के शुक्रवार को सेउटा जाकर लोकल अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से मुलाकात की है। साथ ही मोरक्को के साथ कोऑर्डिनेट कर जो लोग अवैध तरीके से आए हैं, उन्हें वापस भेजने को लेकर वार्ता करेंगे।

2011-21 के बीच सेउटा में घुस आए थे शरणार्थी

स्पेन के साथ डिप्लोमैटिक विवाद के बीच मई 2021 में मोरक्को ने सीमा पर ढील दे दी थी, जिससे मात्र दो दिनों में हजारों लोग सेउटा घुस आए थे। इन अवैध शरणार्थियों में कई नाबालिग शामिल थे। नई शरणार्थियों की घुसपैठ से स्पेन और मोरक्को के रिश्तों पर असर पड़ने की आशंका है। हालाँकि अभी तक दोनों देशों ने सहयोग करने की बात कही है।

साल 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध और आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए लाखों सीरियाई यूरोपीय यूनियन के देशों में शरणार्थी बन कर आए। इनके यूरोप पहुँचने के कई मार्ग थे, जिनमें मोरक्को से होते हुए स्पेन तक पहुँचना भी एक था। उस वक्त भी इनलोगों ने समुद्री और जमीनी रास्ते को वैसे ही चुना था, जैसा अभी हो रहा है।

यहाँ से यूरोप के दूसरे देशों में ये पहुँचे। जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों ने इनके लिए अपनी ‘मानवीयता’ दिखाई। इनलोगों को शरण दी गई। इसके बाद 2015 में यूरोप का प्रवासी संकट भी आया और यूरोप के ज्यादातर देशों में कट्टरपंथियों की जमात बढ़ गई। हालात ये है कि इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी समेत सारे देश अब क्राइम काफी बढ़ गया है। इस्लामी ग्रूमिंग गैंग लगातार स्थानीय नाबालिग लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। रेप, लूट-पाट, नशे की तस्करी जैसे क्राइम से निपटना स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घुसपैठियों को लेकर कहा है कि अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले घुसपैठिए यूरोपीय देशों और यूके के लिए खतरा हैं। ये लोग यूरोप की पहचान और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने इसको लेकर यूरोपीय नेताओं की आलोचना भी की थी कि उन्होंने नरमी बरती और कड़े कदम नहीं उठाए।

यूरोप की इस समस्या से भारत भी दो चार होता रहा है। यहाँ अवैध घुसपैठियों की वजह से दशकों से कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। असम से पश्चिम बंगाल तक बांग्लादेशी घुसपैठियों से सिर्फ आबादी ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त तरीके से डेमोग्राफी भी बदली है।

संसद में विदेश मामलों की स्थाई समिति ने बांग्लादेश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ पर चिंता जताते हुए इस पर ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप तैयार करने की बात कही है। ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि होने और उनके प्रत्यर्पण पर निगरानी रखने में आसानी हो। समिति के मुताबिक, अभी 2369 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता की पुष्टि के मामले बांग्लादेश सरकार के पास लंबित हैं।

ये तो उन नागरिकों की बात है, जिनके मामले सामने आए हैं। लेकिन भारत में ऐसे अवैध घुसपैठियों के मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनका पता सालों बाद चलता है। इनके वजह से भारत के संसाधनों पर असर पड़ता है और रोजगार प्रभावित होते हैं। चुनाव में ये लोग पार्टियों के वोट बैंक बन जाते हैं और उनके पास भारत के वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक पहुँच जाता है। ये लोग रोजगार पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं। चुनावों में इसका असर भी दिखता है।

न सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी इससे देश कमजोर होता है। घुसपैठियों के खिलाफ अभियान चलाने के दौरान कई बार मानवाधिकार की बात की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तक में कई ऐसे मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने घुसपैठियों को लेकर कहा है कि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर मिलने वाले फर्जी दस्तावेज और कानूनों की कुछ सीमाएं उन्हें अनौपचारिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत से आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे कागजात बन जाने के कारण पुलिस या प्रशासन के लिए तुरंत पहचान करना मुश्किल होता है। अगर पहचान हो भी गई तो कोर्ट में मामला लंबित रहता है। बड़े बड़े वकील से लेकर पूरा लिबरल इकोसिस्टम उन्हें बचाने में लग जाता है।

कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान


नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

 अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

नॉर्वे, स्पेन आयरलैंड से इजराइल ने कूटनीतिक रिश्ता तोड़ कर क्या सही किया? और क्या इन तीन देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देकर क्या गलत किया?

सुभाष चन्द्र

21 मई को नॉर्वे स्पेन और आयरलैंड ने फिलिस्तीन को मान्यता देने का फैसला किया जिसके विरोध में इज़रायल ने तीनों देशों से अपने राजदूत वापस बुलाकर कूटनीतिक रिश्ते समाप्त कर दिए। इन देशों को मान्यता देने के फैसले का हमास और OIC ने स्वागत किया, फिलिस्तीन 57 देशों के समूह OIC सदस्य है जो UN का सदस्य नहीं है बल्कि उसके पास 2012 से केवल Non-Member Observer का status है

लेखक 
चर्चित youtuber 
मेरे विचार से इज़रायल ने अपने राजदूतों को बुला कर सही कदम नहीं उठाया क्योंकि 50 देशों की यूरोपियन यूनियन के एक तिहाई सदस्य फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके है और विश्व के 193 में से अब इन तीनो को मिला कर 146 देश मान्यता दे चुके हैं। भारत तो मान्यता देने वाला पहला देश था। अब इतने मान्यता देने वाले देशों में बहुत के साथ इज़रायल के कूटनीतिक रिश्ते होंगे, फिर इन तीन से संबंध तोड़ने का क्या औचित्य है। 

अभी Belgium, Malta and Slovenia भी फिलिस्तीन को मान्यता देने पर विचार कर रहे हैं, इस बीच 11 मई को UN की जनरल असेंबली में प्रस्ताव पारित कर UNSC से कहा गया था कि फिलिस्तीन को सदस्य देश के रूप में UN में शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव के विरोध में केवल 9 वोट पड़े जबकि बाकी सभी 184 देशों ने समर्थन किया। विरोध करने वाले 9 देश थे, US, Argentina, the Czech Republic, Hungary, Israel, Micronesia, Nauru, Palau and Papua New Guinea. 

UNSC को इसलिए अनुमोदन किया गया क्योंकि वह ही किसी राष्ट्र को सदस्य का दर्जा देने के लिए सक्षम है। हालांकि UN ने स्वयं अभी तक फिलिस्तीन को सदस्य नहीं बनाया है और 1974 से केवल PLO को Observer का Status दिया था। 

मुझे आशा नहीं है कि फिलिस्तीन को UNSC भी सदस्य बनाएगा क्योंकि वहां अमेरिका का VETO हो सकता है

फिलिस्तीन 2007 में गाज़ा से अपना कंट्रोल हमास के हाथों गवां चुका था लेकिन आज भी विश्व भर में फिलिस्तीन और हमास को एक ही माना जाता है। आतंकी संगठन होने की वजह से कोई “हमास” का खुलकर समर्थन नहीं कर सकता और उसकी आड़ में फिलिस्तीन को समर्थन दिया जाता है। 

नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड में मुस्लिम विरोधी आंदोलन चरम पर रहते हैं। नॉर्वे में  55 लाख की आबादी में 3.3% मुस्लिम हैं; स्पेन में 4.7 करोड़ में 5.32% हैं और आयरलैंड में 5 करोड़ में 1.62% हैं। मान्यता देने के बाद और बढ़ सकते है। आयरलैंड के करीब ब्रिटेन पहले ही इस्लामोफोबिया से जूझ रहा है। इतना ही नहीं यूरोप के कई देश इस्लामिक ताकतों से परेशान है जिनमे फ्रांस, जर्मनी, बुल्गारिया, स्वीडन, डेनमार्क, थाईलैंड के अलावा नॉर्वे और जर्मनी भी शामिल हैं

जो वातावरण ईरान, हमास, हूती और हिज़्बुल्लाह के बीच चल रहा है, उसे देख कर लगता है ये युद्ध इस्लाम और ईसाई/यहूदी गठजोड़ के बीच बड़े स्तर का युद्ध होकर रहेगा। सभी इस्लामिक देशों के निशाने पर इज़रायल रहेगा  

स्पेन : कट्टरपंथ फैला रहे 14 पाकिस्तानियों को पुलिस ने पकड़ा, जिहादी नेटवर्क का खुलासा; धर्म परिवर्तन का रैकेट

                                                                                                                           प्रतीकात्मक: NYT
स्पेन पुलिस ने आतंक पर कार्रवाई करते हुए 14 पाकिस्तानियों को गिरफ्तार किया है। इन सभी को हमास के हमले से बढ़ाई गई सतर्कता के बाद गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि यह सभी स्पेन में एक बड़ा जिहादी नेटवर्क चला रहे थे।

जानकारी के अनुसार, यह सभी पाकिस्तानी आतंकी तहरीक-ए-लब्बैक से जुड़े हुए हैं। यह पार्टी पाकिस्तान में पूर्णतः शरिया लागू करने की माँग करती रहती है। इस पार्टी ने बीते कुछ समय में कई बड़े हिंसक प्रदर्शन भी किए हैं।

जानकारी के मुताबिक, ये सारे पाकिस्तानी स्पेन के राज्य कैटालूनिया, वालेंसिया, लोग्रोनो और विटोरिया जैसे राज्यों में रह रहे थे। यह जानकारी सामने आई है कि इन सभी आतंकियों ने एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जिससे कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार किया जाता था। यह लोग ऐसा मैटेरियल प्रसारित करते थे जिससे अन्य लोगों को कट्टरपंथी बनाया जा सके।

अब इन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा, अभी इनसे पूछताछ चल रही है। हमास के हमले के बाद स्पेन समेत तमाम यूरोपियन देशों में आतंकी खतरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है और जिहादियों पर कार्रवाई हो रही है। स्पेन के सबसे बड़े अखबार यूरो वीकली ने बताया है कि यह पाकिस्तानी धर्म परिवर्तन का रैकेट भी चला रहे थे।

पिछले महीने स्पेन की पुलिस ने कार्रवाई करके 4 संदिग्धों को पकड़ा था। इसमें से एक ऐसा शख्स सामने आया था जो कई ऐसे ही नेटवर्क को चला रहा था। इस आतंकी ने अपना नाम खलीफा रखा हुआ था। गिरफ्तार किए लोगों में एक दम्पति भी था जो कि इसी माध्यम से मिले थे।

एक जानकारी के अनुसार, स्पेन में लगभग 1 लाख पाकिस्तानी रहते हैं। इनमें से आधे से ज्यादा कैतालूनिया राज्य में रहते हैं। इनमें से अधिकतर वो लोग हैं जो रोजगार की तलाश में पाकिस्तान पहुँचे हैं। इनमें से बड़ी संख्या पाकिस्तानियों की भी है जो अवैध रूप से यूरोप पहुँचे है। बीते कुछ वर्षों में स्पेन में पाकिस्तानियों के प्रति लोगों में संदेह की भावना बढ़ी है।

मुस्लिम शासक ‘दोस्त’ फिर भी इस्लामी भीड़ ने मार डाले 4000 यहूदी, क्रॉस पर लटकाया: 956 साल पहले ग्रेनाडा में हुआ था एक नरसंहार

                                      ग्रेनाडा (प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: डैन पोराज का ट्विटर अकाउंट)
दुनियाभर के देश इस्लामिक हिंसा का शिकार रहे हैं। स्पेन का ग्रेनाडा भी इस्लामवादियों की हिंसा का गवाह रहा है। ग्रेनाडा में यहूदियों और इस्लामवादियों के बीच लंबे समय तक संघर्ष हुआ। लेकिन, 30 दिसंबर 1066 को, मुस्लिमों ने यहूदियों को टारगेट करते हुए भीषण नरसंहार किया।

स्पेन में मुस्लिम शासन और यहूदियों का नरसंहार

सिएरा नेवादा पहाड़ों की तलहटी में 4 नदियों के संगम पर स्थित ग्रेनाडा शहर, एक हजार से अधिक वर्षों तक प्रमुख शहरी बस्ती और स्पेन के अंडालूसी क्षेत्र की राजधानी रहा है। 711 ईस्वी की शुरुआत में मुस्लिम उमय्यद ने इबेरियन प्रायद्वीप पर जीत हासिल करते हुए यहाँ कब्जा कर लिया था। इबेरियन में यहूदियों की एक छोटी सी बस्ती प्राचीन काल से रह रही है।

11वीं शताब्दी में, ग्रेनाडा शहर मुस्लिमों के दो समूहों, उत्तरी अफ्रीकी अरब और बर्बर समुदाय के बीच राजनीतिक संघर्ष का केंद्र रहा। उत्तरी अफ्रीकी मुस्लिमों का बर्बर समूह जिसे जिरिड्स भी कहा जाता था, वह कॉर्डोबा के खलीफा का समर्थक था। यह समूह इस क्षेत्र में बस गया, इन लोगों को एल्विरा प्रांत का नियंत्रण दे दिया गया। 

1009 ईस्वी में खलीफा के पतन के बाद, जिरिड नेता ने अपने लिए एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जिसे ‘ग्रेनेडा का तैफा’ कहा गया। मुसलमानों, ईसाइयों और यहूदियों की मिश्रित आबादी वाला यह शहर धीरे-धीरे इस क्षेत्र की मुख्य शहरी बस्ती बन गया।

इसके बाद, 1020 ईस्वी में, सैमुअल हा-नागिद को मुस्लिम राजा हब्बस इब्न मकसन के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। सैमुअल हा-नागिद एक पढ़ा-लिखा यहूदी नेता था। जो खलीफा के पतन के बाद वह कॉर्डोबा से भाग गया था। सैमुअल हा-नागिद (अरबी में इस्माइल इब्न नघरेला) को न केवल टैक्स वसूलने बल्कि अगले शासक बद्दिस के शासन में सेना पर नियंत्रण सहित कई जिम्मेदारी सौंपी गईं।

जब सैमुअल सत्ता में था, तो ग्रेनाडा में यहूदियों को पूरी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता थी। यहाँ तक कि यहूदियों को दूसरे दर्जे के नागरिकों (मुस्लिम शासन के अंतर्गत रहने वाले गैर-मुस्लिम) के रूप में भी नहीं देखा गया। सैमुअल के पास ऐसी शक्ति थी कि मुस्लिम शासक को केवल एक व्यक्ति के रूप में देखा जाता था।

1056 ईस्वी में सैमुअल हा नागिद की मृत्यु हो गई। इसके बाद, उनका बेटा जोसेफ हा-नागिद (अरबी में जोसेफ इब्न नघरेला) वहाँ का वजीर बन गया। जोसेफ हा-नागिद मुस्लिम शासक बद्दीस का बेहद करीबी माना जाता था।

विश्वासघात के आरोप में इस्लामवादियों की भीड़ ने जोसेफ को पीट-पीट कर मार डाला

मुस्लिम शासक बद्दिस पर जोसेफ का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इस दौरान, ग्रेनाडा में बर्बर मुसलमानों के बीच जोसेफ के खिलाफ नाराजगी शुरू हो गई। मुस्लिमों ने जोसेफ को अभिमानी और सभी धर्मों के प्रति अनादर करने वाला बताया। जोसेफ पर ग्रेनेडा के विरोधियों और अलमीरा के पड़ोसी ताइफा के मुस्लिम शासक को पत्र भेजने का आरोप लगाया गया। 

अरबी रिकॉर्ड के अनुसार, जोसेफ ने खुद को शासक बनाने के लिए दुश्मनों के साथ सौदा किया था। इसके बदले उसने दुश्मनों के लिए शहर के द्वार खोलने की बात कही थी। हालाँकि, वह योजना में सफल नहीं हुआ। अलमीरा के ताइफा के शासक ने ऐन वक्त पर सौदे को नामंजूर कर दिया। इसक बाद, यह खबर लीक हो गई कि जोसेफ ने इस्लामिक शासक बद्दिस को मारने और दुश्मनों का समर्थन करने की योजना बनाई थी।

30 दिसंबर, 1066 को शहर के बहुसंख्यक बर्बर मुसलमानों की एक गुस्साई भीड़ ने शाही महल पर धावा बोलते हुए जोसेफ को पकड़ लिया और मार डाला। इसके बाद, उसके शरीर को एक क्रॉस से लटका दिया गया। हालाँकि, इस्लामवादी यहीं नहीं रुके, उन्होंने शहर के सभी यहूदी परिवारों को घेर लिया। यहूदियों के रिकॉर्ड बताते हैं कि उस एक दिन में 4000 से अधिक यहूदियों को मुसलमानों द्वारा क्रूरता से मार डाला गया था।

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि ग्रेनेडा में मुसलमानों द्वारा जोसेफ और यहूदियों के खिलाफ जहर उगला गया था। इस्लामवादी लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि ग्रेनाडा में यहूदियों को जो सम्मान मिल रहा है वह उसके लायक नहीं हैं। इतिहासकार बर्नार्ड लुईस द्वारा तैयार किए दस्तावेज और अबू इशाक द्वारा लिखित एक कविता में दर्शाया गया है कि यहूदी मुसलमानों से ‘हीन’ हैं और उन्हें मार दिया जाना चाहिए।

यह कविता है, “उन्हें (यहूदियों को) मारना मजहब का उल्लंघन मत समझो, उन्हें जीने देना मजहब का उल्लंघन होगा। उन्होंने हमारे साथ किए वादे को तोड़ा है फिर तुम ऐसे लोगों के विरुद्ध कैसे दोषी ठहराए जा सकते हो? जब हम अस्पष्ट हैं और वे प्रमुख हैं तो उनका कोई समझौता कैसे हो सकता है? अब हम उनके सत्य में विनम्र हैं, जैसे हम गलत थे और वे सही थे “

यूरोप में पहली बार हुआ यहूदियों का नरसंहार…

1066 ईस्वी में ग्रेनाडा में हुए नरसंहार को यहूदियों के खिलाफ यूरोप में हुई पहली हिंसा के रूप में बताया जाता है। यहूदी रिकॉर्ड के अनुसार, जोसेफ की पत्नी अपने बेटे के साथ शहर से भाग गई थी। इसके बाद, उसे दूसरे शहर में शरण मिल गई थी। हालाँकि, उसके बेटे की कम उम्र में ही मौत हो गई।

इस नरसंहार के बाद बचे हुए यहूदी अपनी संपत्ति बेचकर ग्रेनाडा और आसपास के क्षेत्रों को छोड़कर भाग गए। हालाँकि, बाद में कुछ लोग ग्रेनाडा लौट आए लेकिन उन्हें कभी भी वह सामाजिक दर्जा नहीं मिला, जो उन्हें सैमुअल हा-नागिद के दौर में मिला था।

ग्रेनाडा में 1492 तक इस्लामिवादी शासन करते रहे। हालाँकि इसके बाद, स्पेन के ईसाई शासक फर्डिनेंड और इसाबेला की सेना ने कई महीनों तक ग्रेनाडा की घेराबंदी कर रखी थी। इस घेराबंदी के बाद, ग्रेनाडा के मुस्लिम शासक ने हार मान ली और आत्मसमर्पण कर दिया। 

इस्लामिक शासन की समाप्ति के बाद 2 जनवरी 1492 को स्पेन के कुछ हिस्सों में कैथोलिक रिकोनक्विस्टा के रूप में मनाया गया। ईसाई आज भी कैथोलिक रिकोनक्विस्टा एक खुशी के रूप में मनाते हैं। वहीं, मुस्लिम इसे शोक के रूप में मनाते हैं। 1492 की शुरुआत में ग्रेनाडा में जो हुआ वह शहर के इतिहास में हिंसा की एक नई कहानी थी। इस कहानी में, हिंसा करने वाले ईसाई शासक इसाबेला के वफादार कैथोलिक कट्टरपंथियों ने मुस्लिमों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने फरमान जारी कर दिया। जिन मुस्लिमों ने ईसाई बनने से इनकार दिया उन्हें मार दिया गया। हालाँकि, कुछ लोग यहाँ से भागने में कामयाब रहे।(साभार)

स्पेन गए इटली के व्यक्ति को एक ही साथ हुआ मंकीपॉक्स, कोरोना और HIV

                                                                                                                           प्रतीकात्मक तस्वीर
इटली में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को चौंका दिया है। यहाँ का एक व्यक्ति एक साथ कोविड 19, मंकीपॉक्स और एचआईवी से संक्रमित पाया गया। ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई शख्स एक साथ इन तीनों वायरसों से संक्रमित हुआ है।

जर्नल ऑफ इन्फेक्शन में पब्लिश की रिपोर्ट के मुताबिक इटली का 36 वर्षीय व्यक्ति 5 दिनों की स्पेन यात्रा पर गया था। स्पेन में वह 16 से 20 जून तक रहा। यहाँ पर उसने कई पुरुषों के साथ असुरक्षित शारीरिक संबंध बनाए। स्पेन से देश वापस लौटने के करीब 9 दिन बाद उसे बाद उसे बुखार, गले में खरास, थकान, सिरदर्द और पीठ में सूजन जैसे लक्षण महसूस होने लगे। उसका 2 जुलाई को कोविड 19 टेस्ट किया गया जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई।

कोरोना संक्रमित पाए जाने के कुछ घंटे के भीतर पीड़ित व्यक्ति के हाथ-पैर में दाने निकल आए। फिर शरीर में छाले पड़ गए। कुछ ही दिनों में दाने पूरे शरीर में फैल गए। 6 जुलाई को उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया। यहाँ उसका फिर से कोरोना टेस्ट हुआ, जो पॉजिटिव आया। साथ ही शख्स का मंकीपॉक्स और HIV टेस्ट भी करवाया गया। इन दोनों की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये इकलौता ऐसा मामला है, जिसमें मंकीपॉक्स, कोरोना वायरस और HIV तीनों संक्रमण एक साथ मिले हैं। हालाँकि अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है कि इन संक्रमणों के एक साथ होने से उस व्यक्ति के शरीर पर क्या असर पड़ेगा। पीड़ित व्यक्ति बाइपोलर डिसऑर्डर से भी पीड़ित बताया जा रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्पेन ट्रिप के दौरान पुरुषों के साथ असुरक्षित शारीरिक संबंध बनाने की वजह से मंकीपॉक्स का संक्रमण हुआ है। इसके साथ ही शख्स एचाईवी-1 (HIV-1) संक्रमित पाया गया। मरीज की स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों का कहना है कि उसे HIV इन्फेक्शन हाल ही में हुआ है।

11 जुलाई तक मरीज के शरीर पर उभरे मंकीपॉक्स के दाने सूख गए और उसकी कोरोना रिपोर्ट भी निगेटिव आ गई। उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन कुछ दिनों के लिए आइसोलेट रहने की सलाह दी गई। रिसर्चर्स ने बताया कि कोरोना और मंकीपॉक्स के लक्षण ओवरलैप हो सकते हैं। साथ ही मरीज मंकीपॉक्स होने के 20 दिन बाद भी पॉजिटिव आ सकता है, इसलिए इलाज खत्म होने पर सतर्कता बरतना जरूरी है।