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वक़्फ़ कोई इस्लामिक नहीं बल्कि जमीन लूट बोर्ड ; सरकारी प्रॉपर्टी पर नहीं कर सकेंगे दावा, बोर्ड में होंने गैर मुस्लिम भी, खैरात देने के लिए इस्लाम का 5 साल पालन जरूरी

                                                                                                                वक्फ की प्रतीकात्मक तस्वीर 
दुनियां में किसी भी मुस्लिम देश में कोई वक़्फ़ बोर्ड नहीं फिर भारत में क्यों? यह बात मुसलमान को समझना होगी। वक़्फ़ मुस्लिम हक़ में नहीं बल्कि मुस्लिम वोटबैंक है। इस बोर्ड से जितने मुस्लिम पीड़ित हैं कोई और नहीं। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों को पागल बनाया जा रहा है। सेकुलरिज्म का ढोल पीटने वालों को शायद सेकुलरिज्म का अर्थ भी नहीं मालूम। यह कटु सत्य है। वरना इन पाखंडियों से पूछो क्या सेकुलरिज्म का मतलब तुष्टिकरण करना है? वक़्फ़ बोर्ड की स्थापना और 1995 में संशोधन करने से कांग्रेस और यूपीए से मुसलमान दूरी बनाता रहा है, क्यों? वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में 9000+ लंबित केस 90% मुस्लिमों के ही है क्यों? दरअसल इस्लाम की आड़ में मुसलमानों को उसी तरह भड़काया जा रहा जैसा CAA मुद्दे को लेकर भड़काया गया था। 

बात 1993 की है जब सिविल लाइन्स में एक कब्रिस्तान पर फ्लैट बनने पर दरिया गंज में बच्चा घर में स्थित दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड जाने पर दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों ने अपने कटु अनुभव साझा किए थे। जिसे सुन रोंगटे खड़े हो गए थे। 2 दिन तक सारा स्टाफ ऑफिस में कैद रहा। तत्कालीन थानाध्यक्ष ने अपनी जेब अथवा सरकारी खर्चे से सुबह नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक का प्रबंध किया था। उन्होंने वक़्फ़ जमीनों के असली लुटेरों के नाम भी बताए जो इनकी जान के दुश्मन बन गए थे। जिन्हे मुसलमान अपना बहुत बड़ा मजहबी मानते हैं। धन्य हो दरिया गंज पुलिस स्टेशन का जिसने हस्तक्षेप कर उन्हें जिंदगी बक्शी। 

आज चर्चा यह भी है कि जब मुसलमान को गरीब कहा जाता है फिर मुसलमानों ने इतनी जमीन कहाँ से वक़्फ़ कर दी? जब मुस्लिम कट्टरपंथी फंसे होते है तब संविधान की बात करते है वरना शरीयत स्थापित करने की कवायत में लगे रहते हैं।       

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 लगातार चर्चा में है। संसद में इसके पास होने से पहले यह जान लीजिए कि ये पुराने कानून से किस तरह अलग है और इसमें क्या क्या बड़े बदलाव किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, प्रशासन और संरचना में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रस्तावित किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम 1995 और वक्फ संशोधन विधेयक 2024 के बीच अंतर

वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम मूल रूप से ‘वक्फ अधिनियम-1995’ था, जो उस समय के कानून की संरचना और सीमित दायरे को प्रतिबिंबित करता था। यह मुख्य रूप से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और विनियमन पर केंद्रित था। दूसरी ओर वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में इस अधिनियम का नाम बदलकर ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम, 1995’ कर दिया गया है।

वक्फ की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम में वक्फ का गठन तीन तरीकों से संभव था: घोषणा, उपयोगकर्ता (लंबे समय तक उपयोग के आधार पर) और बंदोबस्ती (वसीयत या दस्तावेज के जरिए)। यह प्रावधान लचीलापन प्रदान करता था, लेकिन अस्पष्टता और दुरुपयोग की संभावना को भी बढ़ाता था, जैसे कि बिना औपचारिक दस्तावेज के संपत्तियों को वक्फ घोषित करना। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ के प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया है।
अब वक्फ केवल औपचारिक घोषणा या बंदोबस्ती के जरिए ही बनाया जा सकता है और इसके लिए दानकर्ता को कम से कम पाँच साल से प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होना अनिवार्य है। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि पारिवारिक वक्फ में महिला उत्तराधिकारियों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बदलाव दुरुपयोग को रोकने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक कदम है।

सरकारी संपत्ति पर नहीं हो सकेगा दावा

वक्फ अधिनियम-1995 में सरकारी संपत्तियों को वक्फ के रूप में घोषित करने या उन पर दावे को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इस अस्पष्टता के कारण कई सरकारी और निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्डों ने अपने अधिकार क्षेत्र में लेने की कोशिश की, जिससे विवाद बढ़े। उदाहरण के लिए दिल्ली और कर्नाटक में सरकारी भूमि पर दावे देखे गए। वहीं साल 2024 के संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ के रूप में मान्य नहीं होगी। यदि ऐसी संपत्ति पर वक्फ का दावा किया जाता है, तो जिला कलेक्टर इसकी जाँच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। यह प्रावधान सरकारी संपत्तियों पर अनुचित दावों को रोकने और विवादों को कम करने के लिए लाया गया है।

संपत्तियों के सर्वे की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम के तहत वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण सर्वेक्षण आयुक्तों और अपर आयुक्तों की जिम्मेदारी थी। हालाँकि इस प्रक्रिया में देरी, विशेषज्ञता की कमी और समन्वय का अभाव आम समस्याएँ थीं, जिसके कारण कई राज्यों में सर्वे अधूरा रहा। इसके उलट साल 2024 के विधेयक में सर्वेक्षण का दायित्व जिला कलेक्टरों को सौंपा गया है, जो राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार काम करेंगे। यह बदलाव सर्वेक्षण को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए किया गया है, क्योंकि कलेक्टरों के पास पहले से ही भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुँच होती है। इससे सर्वेक्षण की गुणवत्ता और समयबद्धता में सुधार की उम्मीद है।

केंद्रीय वक्फ परिषद (CWC) की संरचना

1995 के अधिनियम में केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्यों का मुस्लिम होना अनिवार्य था, जिसमें कम से कम दो महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान था। यह संरचना समुदाय-केंद्रित थी, लेकिन इसमें विविधता और बाहरी दृष्टिकोण की कमी थी। 2024 के संशोधन विधेयक में CWC की संरचना में बदलाव करते हुए दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव है। अब सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए मुस्लिम होना जरूरी नहीं होगा, हालाँकि मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि, इस्लामी कानून के विद्वान और वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष जैसे सदस्यों के लिए यह शर्त बरकरार रहेगी। इसके अलावा मुस्लिम सदस्यों में से दो महिलाएँ होना अनिवार्य रहेगा। यह बदलाव समावेशिता और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिए किया गया है।

राज्य वक्फ बोर्ड (SWB) की संरचना

साल 1995 के अधिनियम में राज्य वक्फ बोर्ड में दो निर्वाचित मुस्लिम सांसद, विधायक या बार काउंसिल सदस्य शामिल होते थे और कम से कम दो महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य थी। यह संरचना सीमित थी और इसमें विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं था। 2024 के विधेयक में SWB को अधिक विविध बनाया गया है। अब राज्य सरकार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों, शिया, सुन्नी, बोहरा, आगाखानी, और पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि को नामित करेगी। साथ ही कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की नियुक्ति की शर्त बरकरार रहेगी। यह बदलाव बोर्ड को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने का प्रयास है, ताकि विभिन्न हितधारकों की आवाज सुनी जा सके।

वक्फ न्यायाधिकरण की संरचना और अपील

1995 के अधिनियम में वक्फ न्यायाधिकरण में एक जज, अपर जिला मजिस्ट्रेट और मुस्लिम कानून का विशेषज्ञ शामिल होता था। इसके फैसलों को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की सीमित संभावना थी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती थी। 2024 के संशोधन विधेयक में न्यायाधिकरण की संरचना में बदलाव किया गया है। अब इसमें मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ को हटाकर जिला न्यायालय के जज (अध्यक्ष) और एक संयुक्त सचिव स्तर के राज्य सरकार के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ 90 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की अनुमति दी गई है। यह बदलाव विवाद समाधान को अधिक निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए है।

केंद्र सरकार की शक्तियाँ

साल 1995 के अधिनियम में केंद्र सरकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत सीमित थीं। राज्य सरकारें वक्फ खातों का ऑडिट कर सकती थीं, लेकिन केंद्र का कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अब केंद्र को वक्फ पंजीकरण, खातों, और लेखा परीक्षा (CAG या नामित अधिकारी के जरिए) से संबंधित नियम बनाने का अधिकार होगा। यह प्रावधान केंद्रीकृत निगरानी और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है, ताकि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सके।

पुरानी मस्जिदों, दरगाहों, मजहबी स्थलों से छेड़छाड़ नहीं

सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने साफ कर दिया है कि पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल से छेड़छाड़ नहीं होगी। यह सुझाव सहयोगी दल जेडीयू ने दिया था, जिसे बीजेपी ने मान लिया। इसका मतलब है कि यह कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने का फैसला कई लोगों को नागवार गुजर रहा है। धारा 11 के तहत अब दो गैर-मुस्लिम सदस्य (हिंदू या अन्य धर्मों के लोग) बोर्ड में शामिल हो सकते हैं। साथ ही, राज्य सरकार का एक अधिकारी भी इसमें होगा।

कम से कम 5 साल इस्लाम का पालन

विवाद की एक और बड़ी वजह है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या का प्रस्ताव, जिसे बिल में शामिल कर लिया गया। इसके मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति वक्फ में तभी खैरात (दान) कर सकेगा, जब वह कम से कम 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा हो। साथ ही दी गई संपत्ति में धोखाधड़ी न हो, इसका सबूत भी देना होगा।

ट्रिब्यूनल में बदलाव

वक्फ ट्रिब्यूनल में भी बदलाव हुआ है। पहले इसमें दो सदस्य होते थे, लेकिन अब तीसरा सदस्य एक इस्लामिक स्कॉलर होगा। पहले कलेक्टर वक्फ संपत्तियों की जाँच करता था, लेकिन अब यह जिम्मा किसी वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाएगा, जिसे राज्य सरकार चुनेगी। वक्फ संपत्तियों की सूची को गजट में छपने के 90 दिनों के अंदर ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

जेपीसी की सिफारिशों को किया गया शामिल

इस बिल को तैयार करने में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों का बड़ा हाथ है। जेपीसी ने 36 बैठकें कीं, 10 शहरों में दौरे किए और 97 लाख से ज्यादा ज्ञापन हासिल किए। मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद से लेकर पटना और लखनऊ तक, समिति ने हर कोने से लोगों की राय ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलमा-ए-हिंद और दारुल उलूम देवबंद जैसे संगठनों से भी बात हुई। सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों को डिजिटल बनाने, सर्वे को तेज करने और गरीबों के कल्याण के लिए है।
इन सबके बीच सवाल यह है कि क्या यह बिल वाकई वक्फ संपत्तियों का भला करेगा? देश में करीब 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित करने के मामले सामने आए हैं। आँकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2024 तक, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों के आँकड़ों से पता चलता है कि 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित किया गया है। इनमें से कुछ के उदाहरण देख सकते हैं…
सितंबर 2024 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, 108 संपत्तियाँ भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में हैं, 130 संपत्तियाँ दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है और मुकदमेबाजी में लाया गया है।

वक्फ घोषित की गई अन्य गैर-मुस्लिम संपत्तियों के उदाहरण

तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गाँव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गाँव पर दावे के कारण अपनी जमीन नहीं बेच पाया। इस अप्रत्याशित आवश्यकता ने उसे अपनी बेटी की शादी के लिए लोन चुकाने के लिए अपनी जमीन बेचने से रोक दिया।
गोविंदपुर गाँव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूरे एक गाँव पर दावे ने सात परिवारों को प्रभावित किया, जिसके कारण पटना उच्च न्यायालय में मामला चला। मामला विचाराधीन है।
केरल: सितंबर 2024 में, एर्नाकुलम जिले के लगभग 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।
कर्नाटक: वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ भूमि के रूप में नामित किए जाने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद हुए। हालाँकि सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी। इसके साथ ही कर्नाटक में 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें कृषि भूमि, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश और पंजाब: यूपी वक्फ बोर्ड द्वारा कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें की गई हैं। तो पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की भूमि पर दावा किया है।
नए बिल में कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को संपत्तियों की जाँच का अधिकार दिया गया है, ताकि गलत दावों पर लगाम लगे। बहरहाल, गरीबों के लिए भी इस बिल से उम्मीदें हैं। डिजिटल पोर्टल से वक्फ संपत्तियों की निगरानी होगी, जिससे कुप्रबंधन और अतिक्रमण रुकेगा। इससे होने वाली आय को शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे कल्याणकारी कामों में लगाया जाएगा। लेकिन गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी और इस्लाम पालन की शर्त जैसे मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है।

मध्य प्रदेश : वक्फ बिल के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को घेरने गए मुस्लिमों में ही मची मारकाट, काली पट्टी को लेकर चाकूबाजी

                                         रायसेन में भिड़े दो पक्ष (फोटो साभार: YT/Zee News)
भारत को आज़ादी मिलने से पहले ही कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां मुसलमानों को गुमराह कर मुसलमानों की वोट लेकर सत्ता की मलाई चाटने में मस्त रहे और मुसलमान अपनी बदहाली से खुद ही झुझता रहा। आये दिन देश में कहीं न कहीं दंगे होते रहे, परन्तु दंगा का इलज़ाम मुसलमान पर होने के बावजूद मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों को ही अपना रहनुमा मानता रहता है। संक्षेप में, 2002 में गुजरात दंगे का दोष तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर डाल मालपुए खाते रहे और आज भी खा रहे हैं। कालचक्र घूम रहा है, आज जब मुस्लिम गुजरात दंगों का इतिहास देखता तो महसूस कर रहा है कि मोदी ने मुसलमानों को अकाल मौत से बचाया है। लेकिन गुजरात से बाहर मूर्ख मुसलमान सच्चाई जानने से दूर भागता रहता है। 

खैर, अब वक़्फ़ बिल को लेकर मुसलमानों को गुमराह करने में मुस्लिम नेता ही नहीं, मुस्लिम वोट के भूखे हिन्दू नेता और उनकी पार्टियां भी लगी हुई हैं। वक़्फ़ ऑफिस में काम करने वाले चपरासी से लेकर उच्च अधिकारी तक जानते हैं कि वक़्फ़ जमीन की लूटमार करने वाले ही अपनी रोटी पानी छीनने के डर से इसका विरोध करने मुसलमानों को भड़काने में लगे हैं।     

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में रमजान के आखिरी जुमे की नमाज के दौरान बड़ा हंगामा हो गया। बेगमगंज की मकबरा मस्जिद में वक्फ संशोधन बिल 2024 के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान दो मुस्लिम पक्षों में झड़प हो गई। प्रदर्शनकारी पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को निशाना बना रहे थे, लेकिन काली पट्टी बाँधने को लेकर 2 पक्षों में भिडंत हो गई। इस झड़प में चाकूबाजी हुई, जिसमें चार लोग घायल हो गए। पुलिस ने तीन हमलावरों – शकील अहमद पठान, लईक पठान और नवेद पठान को गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार (28 मार्च 2025) को दोपहर करीब 1 बजे जोहर की नमाज के लिए लोग मस्जिद में जमा थे। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने एक दिन पहले वक्फ बिल के खिलाफ काली पट्टी बाँधकर विरोध करने की अपील की थी।

सैयद सावेश अली और उनके साथियों ने इस अपील पर काली पट्टी बाँधी, जिसका मुस्लिम त्योहार कमेटी के अध्यक्ष शकील अहमद पठान ने विरोध किया। उन्होंने सावेश से कहा कि मस्जिद में पीएम मोदी और अमित शाह के खिलाफ राजनीतिक विरोध के लिए काली पट्टी बाँधने से पहले कमेटी से इजाजत लेनी चाहिए थी।

सावेश ने उनकी बातों का विरोध किया, जिसके बाद बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते बहस हाथापाई में बदल गई। शकील अहमद पठान और उनके भाइयों लईक पठान और नवेद पठान ने सावेश और उनके साथियों पर चाकुओं से हमला कर दिया। इस हमले में सैयद सावेश अली, सैयद नवेद अली, सैयद अहद अली और सैयद शारिक अली घायल हो गए। सैयद नवेद अली को गंभीर हालत में रायसेन जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि बाकी तीन का इलाज बेगमगंज के सिविल अस्पताल में चल रहा है।

चाकूबाजी की वजह से मस्जिद में भगदड़ मच गई। खून से फर्श लाल हो गया, जिसके चलते अलविदा की नमाज एक घंटे देर से पढ़ी गई। सावेश अली की शिकायत पर पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया।

बेगमगंज थाना प्रभारी राजीव उइके ने बताया कि शकील अहमद पठान, लईक पठान और नवेद पठान को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनके खिलाफ धारा 296, 115(2), 118(1), 351(2) और 3(5) बीएनएस के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच चल रही है।