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ऐसे 150 वकीलों की हरकत पर उनके लाइसेंस रद्द होने चाहिये, केजरीवाल के लिए ऐसे जजों पर आरोप लगाने वालों के पीछे कौन सी ताकत है? जांच “न्याय बिंदु” की हो

सुभाष चन्द्र

Rouse Avenue कोर्ट की स्पेशल जज “न्याय बिंदु” के केजरीवाल को दिए गए जमानत आदेशों पर रोक लगाने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर कुमार जैन को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट और निचली अदालतों के 150 वकीलों ने चीफ जस्टिस को पत्र लिख कर “स्यापा” करने की कोशिश की है और जस्टिस सुधीर जैन पर उंगली उठाई है। 

मुझे याद है 12 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर निशाना साधते हुए  पूरे सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर सवाल उठाए थे जिसका हल कुछ नहीं निकला क्योंकि वह विपक्ष और कुछ निहित स्वार्थी तत्वों का एक प्रायोजित कार्यक्रम था।

अब केजरीवाल का जेल में बैठे हुए प्रायोजित कार्यक्रम सामने आया है जिसमें 150 वकील केजरीवाल की जमानत पर “रोक लगने” पर रुदाली कर रहे हैं। ये लोग आरोप लगा रहे हैं कि “हाई कोर्ट के न्यायाधीश वकीलों की दलील अपने Orders में नहीं लिख रहे हैं और यह अदालत के इतिहास में पहली बार हो रहा है। यह भी कहा कि ‘unprecedented practices’ चल रही हैं अदालतों में”। इतना ही नहीं जजों पर दबाव बनाने के लिए यहां तक कहा कि जस्टिस सुधीर जैन ED के वकील अनुराग जैन के सगे भाई हैं। उन 4 जजों ने भी सुप्रीम कोर्ट में जो चल रहा था उसे “Unprecedented” कहा था।

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यदि ये लोग क्या चाहते हैं कि सुधीर जैन काम करना ही बंद कर दें क्योंकि वो अनुराग जैन के भाई हैं, अगर ऐसा है तो इससे बड़ी तानाशाही क्या हो सकती है और यही चाहता है केजरीवाल। कोई बड़ी बात नहीं 150 वकीलों के पत्र की पीछे मास्टरमाइंड अभिषेक मनु सिंघवी ही हो। 

“मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू”, यह नजरिया है ऐसे वकीलों का, यानी “न्याय बिंदु” ने केजरीवाल को गलत जमानत दे दी, वह ठीक था लेकिन सुधीर जैन ने रोक दी तो आसमान सिर पर उठा लेंगे। ये केजरीवाल के 150 चाटुकार बात करते हैं वकीलों की दलीलें आदेशों में न लिखने की लेकिन “न्याय बिंदु” ने तो बिना कागज पढ़े और बिना ED को मौका दिए ही जमानत दे दी। किस दबाव में "न्याय बिंदु" ने ED द्वारा कोर्ट में दर्ज documents को नहीं पढ़ा? यह किसी भी जज/न्यायाधीश की भयंकर गलती है, जो न्याय प्रक्रिया में सबसे बड़ा अपवाद है, जिसके लिए उसे जवाबदेही होना चाहिए। यह भयंकर भूल नज़रअंदाज़ नहीं की जानी चाहिए।  

अब मेरे विचार से 2 जांच होनी चाहिए - एक तो स्पेशल जज “न्याय बिंदु” के बारे में कि उसने केजरीवाल को जो जमानत दी उसका राज क्या था और क्या कुछ सौदेबाजी हुई थी और दूसरी जांच होनी चाहिए इन 150 वकीलों की लॉ डिग्री की। ऐसी जांच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज दीपक गुप्ता की Committee कर रही है।

ये 150 वकील CJI से क्या चाहते हैं जब सुप्रीम कोर्ट में बहुत कुछ वह होता है जो आरोप ये वकील लगा रहे हैं। याद कीजिए जस्टिस RF Nariman सुप्रीम कोर्ट में जज थे और उनके पिता फाली नरीमन भी सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे। उनके आपस के संबंधों का वे क्या लाभ उठाते होंगे ये तो वो ही जाने।

CJI इस बात पर क्या विचार करेंगे कि जज वकीलों की दलील अपने Orders में नहीं लिख रहे लेकिन ये काम तो सुप्रीम कोर्ट के जज भी करते हैं। सुनवाई के दौरान अशोभनीय और गैर जरूरी भाषा बोलते हैं लेकिन कभी orders में उनका जिक्र नहीं होता। जस्टिस पारडीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने तो सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे भयंकर “Hate Speech” दी थी नूपुर शर्मा के लिए लेकिन एक शब्द भी order में नहीं लिखा। CJI खुद माहिर है मर्जी के अनुसार अपना रुख बदलने के लिए, जैसे कहीं कहते हैं कोई सूचना Sealed Cover में नहीं दी जाएगी  जबकि अनेक मामलों में खुद ही Sealed Cover में सरकार से जानकारी मांगते हैं। बस सरकार की ऐसी तैसी होनी चाहिए।

अगर 150 वकीलों की बात पर संज्ञान लेते हैं चंद्रचूड़ तो उन 600 वकीलों के पत्र का क्या हुआ जिसमें उन्होंने अदालतों पर दबाव डालने की कोशिश की बात कही थी?

7 दिन और बढ़ा दें बेल: सुप्रीम कोर्ट से अरविंद केजरीवाल की नई गुहार, AAP का दावा- जेल में CM का वजन 7 किलो कम हुआ, यह गंभीर बीमारी का संकेत; क्या Melord फिर से मेहरबान होंगे?

जिस बात की जमानत मिलने के बाद से शंका व्यक्त की जा रही थी, वह सच होती दिख रही है, अब यह देखना है कि Melord फिर से मेहरबान होंगे? दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जमानत अवधि बढ़ाने के लिए याचिका लगाई है। उन्होंने अपनी जमानत को 8 जून, 2024 तक बढ़ाने की माँग सुप्रीम कोर्ट से की है। उन्होंने इसके लिए अपने स्वास्थ्य का हवाला दिया है।

केजरीवाल पर मीलॉर्ड चुनाव प्रचार करने के लिए मेहरबान हुए, लेकिन तिहाड़ से बाहर आकर दुर्योधन बन महाभारत शुरू कर दी। मतलब जिस तरह दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण किया था, वही अपने शीश महल में कलयुगी दुर्योधन ने स्वाति मालीवाल के साथ किया। दोनों नारियों में समानताएं : केश पकड़ना और माहवारी। 

केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि 1 जून, 2024 को खत्म हो रही उनकी चुनाव प्रचार के लिए दी गई जमानत को एक सप्ताह के लिए बढ़ा दिया जाए। उन्होंने कहा है कि उन्हें इस एक सप्ताह में कुछ मेडिकल चेकअप करवाने हैं, जिसके लिए उन्हें यह बढ़ी हुई जमानत चाहिए।

 AAP नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री आतिशी ने इस विषय में बताया है कि केजरीवाल के शरीर में कीटोन का स्तर अधिक पाया गया है और जेल में 7 किलो वजन घटा है। आतिशी ने बताया कि उनका वजन भी अचानक कम हुआ है, ऐसे में डॉक्टरों ने इससे किडनी को नुकसान और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बताया है।

आतिशी ने बताया है कि डॉक्टरों ने उन्हें गंभीर मेडिकल चेकअप करवाने की सलाह दी है, उन्हने पूरे शरीर का PET स्कैन करवाने को कहा गया है। इसी कारण से अरविन्द केजरीवाल को एक सप्ताह की अतिरिक्त जमानत चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 10 मई, 2024 को अरविन्द केजरीवाल को 1 जून तक लोकसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए अंतरिम जमानत दी थी। उन्हें 2 जून को कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करना था। उन्हें मार्च, 2024 में दिल्ली शराब घोटाला मामले में गिरफ्तार किया गया था । अब उन्होंने स्वास्थ्य आधार पर फिर से जमानत बढ़ाने की माँग की है।

इससे पहले भी वह जेल में स्वास्थ्य को लेकर कई दावे कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि तिहाड़ जेल में ले जाए जाने के बाद CM केजरीवाल का वजन 4.5 किलोग्राम कम हो हुआ था। हालाँकि, इस दावे को तिहाड़ प्रशासन ने नकारते हुए बताया था कि वह जेल में 65 किलोग्राम के आए थे और उतने ही बने रहे थे।

केजरीवाल को गिरफ्तार करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट को बताया था कि वह अपना स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए आम और मिठाई खा रहे थे। ऐसा वह जेल के भीतर पाना स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए कर रहे थे ताकि उन्हें स्वास्थ्य आधार पर जमानत मिल सके।


मी लॉर्ड! कहीं अरविन्द केजरीवाल को जमानत सुप्रीम कोर्ट के लिए ही सिरदर्द न बन जाए? आखिर किस दबाव में घोटाले को नज़रअंदाज़ कर चुनाव प्रचार पर जोर दिया गया?


सुप्रीम कोर्ट ने 10 मई 2024 को दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को 1 जून तक अंतरिम जमानत दे दी। अरविंद केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के प्रचार के लिए दिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल की अंतरिम जमानत का विरोध किया था कहा था कि इससे गलत परंपरा होगी। जिसका मी लॉर्ड पर बिलकुल भी असर नहीं हुआ। क्योकि 
मी लॉर्ड तो पहले से ही मन बनाए बैठे थे। जो गंभीर जाँच का विषय है और इस जाँच का अधिकार मुख्य मी लॉर्ड को है। 

मी लॉर्ड ने केजरीवाल से पूछना चाहिए कि गिरफ्तार होने पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया? लोक सभा की कितनी सीटों पर आपकी पार्टी चुनाव लड़ रही है? आखिर किस प्रभाव या दबाव के चलते मी लॉर्ड को चुनाव प्रचार के लिए केजरीवाल को Interim relief देनी पड़ी? चर्चा यह भी है कि केजरीवाल अपनी जमानत अवधि को किसी न किसी बहाने आगे बढ़ाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। उस स्थिति में मी लॉर्ड क्या करेंगे? केजरीवाल पर लगे आरोपों पर क्यों नहीं विचार किया गया? उनको दरकिनार कर चुनाव प्रचार को प्राथमिकता दी? क्या इसी पद्धति पर मी लॉर्ड अपने निर्णय देते रहेंगे? सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को बनाए रखने में मुख्य न्यायधीश को इस विषय को अति गंभीरता से लेना होगा। 

  

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने अंतरिम बेल से संबंधित सुनवाई करते हुए कहा कि शराब नीति मामले में केस अगस्त 2022 में दर्ज किया गया था और अरविंद केजरीवाल को लगभग डेढ़ साल बाद मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि आखिर डेढ़ साल तक ED कहाँ थी।

हालाँकि, ईडी के विरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल को न्यायालय से अंतरिम जमानत मिल गई है, लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं। वैसे भारत में न्यायपालिका पर सवाल उठाने के रिवाज नहीं है, लेकिन जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने जो तर्क दिया था वो उचित था। ईडी का संदेह भी सच साबित होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दर्ज अपने हलफनामे में प्रवर्तन निदेशालय ने तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

ED की आशंका आखिरकार सच साबित होती दिख रही है। अब राष्ट्रद्रोह में जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह ने चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से सात दिनों के लिए अंतरिम जमानत की माँग की है। वह खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता है। हालाँकि, हाई कोर्ट ने असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल की याचिका खारिज कर दी है।

NSA के तहत जेल में ‘बंद वारिस पंजाब दे’ नाम के खालिस्तान समर्थक अमृतपाल की याचिका भले खारिज हो गई हो, लेकिन इससे एक नया रिवाज पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। इस देश में ऐसे दर्जनों नेता हैं, जिन पर विभिन्न मामलों में केस दर्ज है और कुछ नेता पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में हैं। ऐसे में वे भी अपने लिए छूट की माँग कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख नाम झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का नाम प्रमुख है।

अपने हलफनामे में ED ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कहा था, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये (अरविंद केजरीवाल) तो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

जाहिर सी बात है कि जब उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए अरविंद केजरीवाल अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं तो कई ऐसे नेता हैं तो खुद उम्मीदवार हैं। ऐसे में वे अरविंद केजरीवाल की जमानत को प्रमुखता से उदाहरण के रूप में पेश करके अपने लिए भी ऐसी माँग कर सकते हैं। ऐसी में न्यायालय के सामने एक अलग तरह का धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ भी जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच चल रही है। ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 31 जनवरी 2024 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने 2 फरवरी को अपनी गिरफ्तारी को गलत बताते हुए याचिका दाखिल की थी। हालाँकि, यह याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल का हवाला देखकर सोरेन भी सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

हेमंत सोरेन और दिल्ली शराब घोटाले में बंद आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया भी न्याय में समानता के सिद्धांत का तर्क देकर अपने लिए अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं। दरअसल, जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार है और वह कई मामलों को ध्यान में रखते हुए किसी आरोपित को जमानत देता है। इनमें जिस धारा के आरोपित बंद है उसमें जमानत के लिए क्या प्रावधान हैं, जमानत पर निकलने के बाद वह लापता तो नहीं हो जाएगा, सबूतों के साथ छेड़छाड़ तो नहीं करेगा, गवाहों को धमकाएगा तो नहीं, गवाहों की हत्या तो नहीं करेगा, किसी अन्य आपराधिक मामले को अंजाम तो नहीं देगा… आदि कई ऐसे बिंदु होते हैं।

अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं और शक्तिशाली भी हैं। ऐसे में इन बिंदुओं पर न्यायिक सिद्धांत के तहत नजर डालना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर चुनाव प्रचार के नाम पर जमानत मिलती है तो ऐसी याचिकाओं की लंबी लाइन लग जाएगी, क्योंकि भारत में लगभग हर साल कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। इनमें पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनाव तक शामिल हैं।

कोर्ट में ED ने भी तर्क दिया था, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनावी प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम वैधानिकता है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही किसी राजनेता को अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि चुनाव पूरे साल होता है।” ED ने तर्क दिया था कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है। किसी को कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

एजेंसी ने यह भी तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

इन सब तमाम बिंदुओं को मिलाते हुए सोशल मीडिया पर लोग न्याय में समानता की बात लोग कर रहे हैं। लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि चुनाव प्रचार के लिए किसी आरोपित को, जो जेल में बंद है, उसे जमानत किस आधार पर दी जा सकती है। क्या अरविंद केजरीवाल की जगह कोई आम आदमी होता तो उसे यह सुविधा मिलती?

अधिकांश लोग किसी ना किसी पार्टी अथवा नेता के फॉलोअर होते हैं। अगर जेल में बंद। ऐसा ही कोई व्यक्ति तर्क दे कि उसे पार्टी अथवा नेता का प्रचार करना है तो क्या उसे यही सुविधा मिलेगी? इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और ना भी। इसलिए देश में दशकों से न्यायिक सुधार की माँग भी की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में थोड़ा कदम बढ़ाए भी था, लेकिन वो फलीभूत नहीं हो पाया।

आखिर सुप्रीम कोर्ट दामाद की तरह केजरीवाल की जमानत पर क्यों केंद्रित है? चुनाव प्रचार के लिए केजरीवाल को अंतरिम जमानत बन जाएगी मिसाल: ED ने किया विरोध, कहा- इलेक्शन कैंपेन मौलिक अधिकार नहीं

जिस तरह सुप्रीम कोर्ट दिल्ली शराब घोटाले के kingpin अरविन्द केजरीवाल को जमानत देने पर इतना समय बर्बाद कर रहा है शंका व्यक्त करता है। 1977 में आपातकाल के बाद हुए लोक सभा चुनावों में बहुचर्चित लेबर नेता जॉर्ज फर्नांडीज़ ने कोर्ट में बंद रहकर चुनाव लड़ा था। जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद ही जेल से रिहा हुए थे। दूसरे, केजरीवाल मुख्यमंत्री है, कोर्ट कोई केजरीवाल से प्रश्न करना चाहिए कि अन्य मुख्यमंत्रियों की तरह इस्तीफा क्यों नहीं दिया? जेल से सरकार नहीं चलेगी? लेकिन कोर्ट है कि अन्य लंबित केसों को छोड़ एक ही मुक़दमे को झुनझुना बनाकर समय बर्बाद कर रही है। 
शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव को देखते हुए अंतरिम जमानत देने के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (9 मई 2024) को जोरदार विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

अपने हलफनामे में ED ने कहा, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये तो चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

केंद्रीय एजेंसी ने कहा, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनाव प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम जमानत दी जानी है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि चुनाव पूरे वर्ष होते रहते हैं।” ED ने तर्क दिया कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है।

हलफनामे में आगे कहा गया है, “हर स्तर पर हर राजनेता यह तर्क देगा कि यदि उसे अंतरिम जमानत पर रिहा नहीं किया गया तो उसे अपरिवर्तनीय परिणाम भुगतने होंगे। अकेले धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत वर्तमान में कई राजनेता हैं, जो न्यायिक हिरासत में हैं और उनके मामलों की जाँच सक्षम अधिकारियों द्वारा की जा रही है।”

केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने आगे तर्क दिया, “अदालतें उनकी (नेताओं की) हिरासत को बरकरार रख रही हैं। गैर-पीएमएलए अपराधों में पूरे देश में कई राजनीतिक नेता न्यायिक हिरासत में होंगे। इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा विशेष उपचार की विशेष प्रार्थना को स्वीकार किया जाए।”

एजेंसी ने कहा कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

इस मामले पर अगली सुनवाई शुक्रवार (10 मई 2024) को होगी। इस मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सुनवाई करने वाली पीठ की अध्यक्षता करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा था, “हम शुक्रवार को अंतरिम आदेश (अंतरिम जमानत पर) सुनाएँगे। गिरफ्तारी को चुनौती देने से जुड़े मुख्य मामले पर भी उसी दिन फैसला किया जाएगा।”