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हिन्दू नामों से चलते होटल और ढाबों का खुलासा होना शुरू; सूरत में आदिल सलीम नूरानी का चर्चित रेस्टोरेंट "कंसार थाल'; 'चेलिया मुस्लिमों द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल, किसी हिन्दू को नौकरी पर नहीं रखते

सच परेशान हो सकता है, पराजित नहीं यानि कांवर यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले होटलों के मालिकों को अपना नाम बताने पर हंगामा करना छद्दम सेक्युलरिस्ट्स को ही बेनकाब कर रहा है। हिन्दुओं को आंखें खोलनी होंगी कि सेकुलरिज्म के हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा धोखा किया जा रहा है। क्या हिन्दुओं के विरुद्ध बहुत गहरा षड़यंत्र चल रहा है, जिसे चौपट करने क्या परमपिता परमेश्वर ने मोदी-योगी को भारतीय राजनीति में पदापर्ण करवाया है। हिन्दुओं को भी रेवड़ियों को त्याग कर इन छद्दम सेक्युलरिस्टों से दूरी बनानी चाहिए। एकतरफा धर्म-निपेक्षता चलाने वालों से होशियार और चौकन्ना रहना चाहिए। ये लोग कभी भी अपनी तिजोरी भरने के लिए हिन्दुओं को संकट में डाल सकते हैं। सनातन को अपमानित करने वालों को अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में वोट देने से परहेज नहीं किया। हिन्दुओं को लालच त्यागना होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों को नाम छुपाकर कोई भी व्यापार करने वालों के विरुद्ध कानून लाकर इसे घिनौना अपराध घोषित करना चाहिए। दिल्ली में जवाहर होटल, करीम होटल, नूरी मसाले आदि मुस्लिम नाम से चल रहे हैं, हिन्दू भी खूब खरीदारी करते हैं, लेकिन नाम छुपाकर हिन्दू नाम से व्यापार करना क्या अपराध नहीं।
सूरत में एक बहुत बड़ा गुजराती रेस्टोरेंट है, जिसका नाम है "कंसार थाल"!

2020 तक लोगों को यही पता था कि यह रेस्टोरेंट किसी हिंदू का है, क्योंकि प्रवेश द्वार पर बड़ी सी गणेश जी की पीतल की प्रतिमा रखी थी।
2020 में दो करोड़ के ड्रग्स के साथ आदिल सलीम नूरानी नाम का एक शांतिदूत पकड़ा गया... तब गुजरात के लोगों को पता चला कि अहमदाबाद सूरत और बड़ोदरा में जो "कंसार थाल" के नाम से जो यह बहुत प्रसिद्ध गुजराती रेस्टोरेंट है उसका मालिक ये आदिल सलीम नूरानी है और आप यह देखकर चौंक जाएंगे कि इसके हर रेस्टोरेंट में प्रवेश करते ही आपको गणेश जी की प्रतिमा नजर आएगी।
"कंसारा" गुजरात में हिंदुओं की एक जाति होती है जिसे शेष भारत के अलग अलग क्षेत्रों में "कसेरा" आदि उपनामों से भी जाना जाता है, जो कि पारंपरिक रूप से विभिन्न धातुओं को मिलाकर एक मिश्र धातु का निर्माण करती है जिसे "कांसा" कहते हैं, उस कांसे को हाथों से ही हथौड़े से पीट-पीटकर "थाली" या अन्य बर्तन बनाती है और उस "थाली" या कांसे के बर्तनों में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी "कंसार" अथवा "कसेरे" के द्वारा हाथों से बनाई गई मिश्र धातु "कांसे" की थाली में भोजन करना बहुत लाभप्रद बताया गया है।
"कंसार" एक तरह का पारंपरिक व्यंजन परोसने का पात्र होता है जिसे पारंपरिक रूप से सात्विक भोजन हेतु हिंदू प्रयोग में लाते हैं।
अब यह शांति धूर्त अपने रेस्टोरेंटस का नाम "कसाई थाल"या "हलाल थाल" इत्यादि न रखकर सात्विक सनातनी हिन्दुओं को भरमाने व धर्म भ्रष्ट करने के लिए अब हिंदुओं के नाम पर, हिंदू प्रतीक चिन्हों द्वारा बरगला कर हिंदू खान पान की सुचिता को भंग करने की भावना से अंधेरे में रखते हुए हिंदुओं से ही पैसा कमा रहे हैं।
लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यह शांति धूर्त वैसे तो मूर्ति पूजा के विरूद्ध होते हैं,
लेकिन जब धंधे की बात आती हो या हिंदुओं को धोखा देने की बात आती हो, तब यह अल तकिया अपनाकर एक छद्म आवरण पहन लेते हैं ताकि हिंदू इनके रेस्टोरेंट में खाना खाने धोखे से आ जाएं ...!!
और धोखा खाते भी है … अपनी पहचान को छुपाकर कोई काम वही करता है जो कुछ अपराध करना चाहता है ..या लोगों को ठगना भ्रमित करना ….
यह अपराध की श्रेणी में होना चाहिए
"चेलिया मुस्लिम" द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल 

आपको राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के हाइवे पर तमाम ऐसे होटल मिलेंगे जिनका नाम भाग्योदय, तुलसी, बनास, डिनरवेल, अरुणोदय, आदि हिन्दू नाम वाला होगा | और राज्य में भी होगे चैन बहुत गहरी हैं  इन होटलों की चेन जिसमे हजारो होटल है उन्हें गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले "चेलिया मुस्लिम" चलाते है ।

.इन होटलों में एक भी हिन्दू को नौकरी नही दी जाती..और इन के रखरखाव से भी पता नहीं लगता कि इनका संचालन किसी मुस्लिम द्वारा किया जा रहा है। चेलिया ग्रुप ऑफ़ होटल्स का हेड ऑफिस अहमदाबाद में है । इनका पूरा खरीद सेंट्रलाइज्ड होता है। ये डाइरेक्ट कोल्डड्रिंक, नमकीन आदि बनाने वाली कम्पनीज के साथ बल्क में डील करते है,.. फिर उसे हर एक होटल में सप्लाई करते है। जहाँ तक सम्भव हो ये खरीदारी मुस्लिम से ही करते है। इनके होटल्स में इनवर्टर, बैटरी, आरओ आदि सप्लाई करने वाला भी मुस्लिम ही होता है। चूँकि ये अपने होटलों का नाम हिन्दू नाम जैसा रखते है और "ओनली वेज" लिखते है। और इनके होटल साफ सुथरे दिखते है .. इसलिए हिन्दू इनके होटलों के तरफ आकर्षित होते है। इनका ये मानना है की हिन्दुओ से पैसा निकालो और उसे मुस्लिमो के बीच लाओ।

इनका पूरा बिजनस फ्रेंचाइजी माडल पर आधारित होता है। इनकी एक सहकारी कमेटी है जो अल्पसंख्यक आयोग में अल्पसंख्यक कमेटी के रूप में रजिस्टर्ड है .. इस कमेटी में देश विदेश के लाखो चेलिया मुस्लिम मेम्बर है और सब अपना अपना योगदान देते है। फिर ये हाइवे पर कोई अच्छा जगह देखकर उसे काफी ऊँची कीमत देकर खरीद लेते है। फिर उस होटल का एक खरीदी बिक्री का एकाउंट बनाते है.. और उस होटल को किसी चेलिया मुस्लिम को चलाने के लिए सौप देते है।

पुरे विश्व के चेलिया मुस्लिम सिर्फ मुहर्रम में अपने गाँव में इकठ्ठे होते है। फिर हर एक होटल के लाभ हानि का हिसाब करते है। इसलिए मुहर्रम के दौरान करीब 20 दिनों तक गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के हाइवे पर के 90% होटल्स बंद रहते है।

ये बसों के स्टाफ को मुफ्त खाना और बेहद महंगे गिफ्ट देते है ताकि ड्राइवर इनके ही होटल पर बस रोके। और सवारियों से खाने का मोटा पैसा वसूलते हैं। 

.अहमदाबाद के सरखेज में इनका बहुत बड़ा सेंट्रलाइज्ड परचेज डिपो है। खुद का आलू प्याज आदि रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज है। ये सीजन पर सीधे किसानो से बेहद सस्ते दाम पर आलू, प्याज और अदरक आदि खरीद लेते है।

."इकोनोमिक्स टाइम्स अहमदाबाद" में छपे एक रिपोर्ट में इस चेलिया होटल्स की कुल पूंजी इस समय करीब 3000 करोड़ रूपये पहुंच चुकी है। और इनकी कुल परिसम्पत्तियों की कीमत इस समय 10,000 करोड़ रूपये होगी।

.हिन्दुओ के जेब से पैसा निकालकर उसे मुसलमानों में बांटने का ये चेलिया ग्रुप्स ऑफ़ होटल्स बेहद खतरनाक मोडल है।

.दुःख इस बात का है की अभी तक हिन्दू चेलिया मुस्लिमो के इस गंदे खेल को नही समझ सके और इनके होटलों में खाना खाकर इन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करते है...या समझिए किसी का ध्यान ही नहीं गया था। और फिर इनका ये पैसा आतंकियों को जाता है। गजवा ऐ हिंद के लिए जाता है‌। इससे बड़ा खतरनाक ये है की इन की मार्केट इतनी मजबूत बन चुकी है। ये किसी हिन्दू के होटल को चलने ही नही देते।

ऑस्ट्रेलिया : 4 दिन के अंदर 2 हिंदू मंदिरों पर हमला; ‘Target Modi, हिंदुस्तान मुर्दाबाद’; शिव विष्णु मंदिर पर लिखे भारत विरोधी नारे

              मेलबर्न में ऐतिहासिक शिव विष्णु मंदिर पर खालिस्तानी समर्थकों ने किया हमला (फोटो क्रेडिट-फर्स्ट पोस्ट)
ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में खालिस्तानी समर्थकों ने एक और हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की। बदमाशों ने कैरम डाउन्स में ऐतिहासिक श्री शिव विष्णु मंदिर (Shri Shiva Vishnu Temple) पर हमला किया और तोड़फोड़ के दौरान मंदिर के पास की दीवारों पर हिंदू विरोधी और भारत विरोधी नारे लिखे।

खालिस्तानियों द्वारा हिन्दू मंदिरों पर हमला और मोदी विरोधी नारों को सिख समुदाय को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। इस षड़यंत्र को समझना होगा। मोदी, हिन्दू और हिन्दुस्तान विरोध में खालिस्तानियों और मुस्लिम कट्टरपंथियों की भाषा में कोई अंतर नहीं। संभव हो, खालिस्तानियों को मोहरा बनाकर 1984 दोहराने का षड़यंत्र हो। और कट्टरपंथी अपने मकसद में कामयाब हो जाएं। सिख समाज को इस षड़यंत्र को गंभीरता से लेकर खालिस्तानियों से बात करनी चाहिए। खालिस्तानियों का जिस पार्टी से विवाद था, वह आज सत्ता से बाहर है और शायद वापस आने की कोई सम्भावना नहीं दिखती।   

बदमाशों ने तोड़-फोड़ के दौरान ‘टारगेट मोदी (मोदी को निशाना)’, ‘मोदी हिटलर’ और ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे मंदिर की दीवारों पर लिख दिए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह हमला 16 जनवरी 2023 को हुआ। खालिस्तान समर्थकों ने इससे पहले मेलबर्न के उत्तरी उपनगर मिल पार्क (Melbourne’s northern suburb of Mill Park) में BAPS स्वामीनारायण मंदिर पर कथित तौर पर हमला किया था।

घटना तब हुई, जब श्रद्धालु ‘दर्शन’ के लिए और तीन दिवसीय ‘थाई पोंगल’ त्योहार मनाने के लिए मंदिर पहुँचे थे। ‘थाई पोंगल’ त्यौहार हिंदू आबादी द्वारा मनाया जाता है। हिंदू काउंसिल ऑफ ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया चैप्टर के अध्यक्ष मकरंद भागवत ने इस घटना की निंदा की और कहा, “मैं आपको यह नहीं बता सकता कि खालिस्तान प्रोपेगेंडा के लिए एक दूसरे हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ से हम कितना परेशान हैं। हम निश्चित रूप से इस मामले को विक्टोरियन बहुसांस्कृतिक आयोग और विक्टोरिया के बहुसांस्कृतिक मंत्री के सामने उठाएँगे। हिंदुओं को मौत की धमकी एक बहुत ही गंभीर मामला है। यहाँ समुदाय इन खालिस्तान समर्थकों से डरता है।”

इस बीच, मेलबर्न हिंदू समुदाय के सदस्य सचिन महते ने कहा, ”अगर इन खालिस्तान समर्थकों में हिम्मत है तो उन्हें शांतिपूर्ण हिंदू समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने के बजाय विक्टोरियन संसद भवन पर कुछ लिखना चाहिए।”

                                    खालिस्तान समर्थकों द्वारा आयोजित एक रैली (इमेज सोर्स- ऑस्ट्रेलिया टुडे)

इससे पहले 15 जनवरी 2023 शाम को मेलबर्न में खालिस्तानी समर्थकों ने एक वाहन रैली निकली थी और जनमत संग्रह के लिए समर्थन जुटाने के प्रयास किया था। हालाँकि, रिपोर्ट में बताया गया है कि मेलबर्न में लगभग 60,000 सिखों की आबादी में से 200 से कम व्यक्तियों ने ही इसमें भाग लिया।

विक्टोरिया की यहूदी समुदाय परिषद (Jewish Community Council of Victoria), गुरुद्वारा श्री गुरु नानक दरबार (Gurdwara Siri Guru Nanak Darbar), चर्चों की विक्टोरियन परिषद (Victorian Council of Churches) और विक्टोरिया की बौद्ध परिषद (Buddhist Council of Victoria) ने हिंदू मंदिरों पर हमले की निंदा की है। परिषदों के अनुसार, हिंदुओं के खिलाफ मौत की धमकी एक चिंता का विषय है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय अब खालिस्तान समर्थकों के आतंक में जी रहा है।

                              भारतीय बौद्ध परिषद द्वारा जारी बयान (स्रोत- ऑस्ट्रेलिया टुडे)

                                  जेसीसीवी द्वारा जारी एक बयान (स्रोत- ऑस्ट्रेलिया टुडे)
इससे पहले 12 जनवरी 2023 को ऑस्ट्रेलिया में एक हिंदू मंदिर BAPS स्वामीनारायण मंदिर में खालिस्तान समर्थकों ने कथित तौर पर तोड़-फोड़ की थी और उस पर भारत विरोधी नारे लिखे थे। रिपोर्टों के अनुसार,  मेलबर्न के प्रतिष्ठित स्वामीनारायण मंदिर की दीवारों पर ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारों लिखे गए थे।

हिंदुओं के खिलाफ किसने रची साजिश? संविधान में आर्टिकल 30 से मुसलमानों व ईसाई को धार्मिक शिक्षा की अनुमति, लेकिन हिंदू शिक्षा की अनुमति नहीं, क्यों?

भारतीय संविधान में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बताया गया है जिसके तहत यहां पर सभी धर्मों और पंथों के लोगों को एक समान अधिकार दिए गए हैं। भारत मूल रूप से हिंदू बाहुल्य देश है इसके बावजूद यहां पर सभी धर्मों को एक समान अधिकार दिए गए हैं, यह भारत की महानता है। लेकिन इसके साथ ही अल्पसंख्यकों को कुछ विशिष्ट अधिकार भी दिए गए हैं। भारतीय संविधान के भाग तृतीय में अनुच्छेद 30 का वर्णन किया गया है जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में बताया गया है। संविधान के अनुच्छेद 30 के मुताबिक धर्म और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के मुताबिक शैक्षिक संस्थानों को स्थापित करने का अधिकार है। यह मुख्य तौर पर अल्पसंख्यकों को धर्म एवं भाषा के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित करने और संचालन करने का विशेष अधिकार देता है।

सोशल मीडिया ट्विटर पर Agenda Buster ने संविधान के अनुच्छेद 30 पर ट्वीट की एक श्रृंखला प्रकाशित की है। यह स्टोरी उसी पर आधारित है।

यह हिंदुओं के साथ की गई सबसे बड़ी साजिश है। जो काम औरंगजेब और अंग्रेज नहीं कर पाए उसे हमारे अपने नेताओं ने कर दिया और हिंदू सभ्यता को मौत की शय्या पर लिटा दिया। संविधान के सिर्फ एक अधिनियम ने हिंदू सभ्यता की रीढ़ तोड़ दी।

मदरसा शिक्षा पर सरकारी खर्च के बारे में आपने कई बार सुना होगा। मदरसा वह जगह है जहां मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा मिलती है। क्या आपने कभी गुरुकुलों पर सरकारी खर्च के बारे में सुना है? यहां आपको इन निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर मिलेंगेः

प्रश्न –

1. सरकार मदरसा को फंड देती है लेकिन गुरुकुल को नहीं दे सकती?
2. भारत के टॉप स्कूलों के मालिक ईसाई और मुसलमान क्यों हैं?
3.क्यों वेद और गीता स्कूलों में कभी नहीं पढ़ाई जा सकती
4. क्यों अगले 30 वर्षों में भारत से हिंदू धर्म गायब हो जाएगा
5. सरकार कैसे एक सुधार करके हिंदुओं को बचा सकती है

हर राज्य में एक अलग मदरसा बोर्ड होता है और मदरसा शिक्षा के लिए फंड होता है। जैसे पश्चिम बंगाल में केवल मदरसा शिक्षा के लिए 5000 करोड़ रुपये का वार्षिक कोष है और अन्य राज्यों में इसी तरह से फंड की व्यवस्था की गई है। बिजनेस स्टैंडर्ड की 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 7 वर्षों में मदरसों के आधुनिकीकरण पर 1000 करोड़ रुपये खर्च किए। इन सरकार द्वारा वित्त पोषित मदरसे के कारण, मुसलमान बहुत धार्मिक और जड़ हैं लेकिन क्या आपने कभी आश्चर्य किया है कि किसी भी राज्य में कोई हिंदू शिक्षा बोर्ड नहीं है। कोई भी सरकार गुरुकुल शिक्षा पर एक पैसा भी खर्च नहीं करती है जहां हिंदू बच्चे हिंदू धर्म सीख सकें। क्यों ?

इन सभी सवालों का जवाब भारतीय संविधान के 2 अनुच्छेदों…अनुच्छेद 28 एवं अनुच्छेद 30 में निहित है। अनुच्छेद 28 कहता है: किसी भी सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है। कोई भी स्कूल जो सरकार से फंड, टैक्स छूट, भूमि छूट या यहां तक ​​​​कि सरकारी पाठ्यक्रम या सीबीएसई जैसे सरकारी प्रमाणन से कोई सहायता लेता है, तो उस स्कूल को सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कहा जाएगा, इसलिए इस तर्क से भारत के 99.99% स्कूल अनुच्छेद 28 के अंतर्गत आते हैं। इस हिसाब से इस अनुच्छेद ने सभी धर्मों की धार्मिक शिक्षा को बंद कर दिया। किसी भी स्कूल में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है।

अब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 पर नजर डालिए। अनुच्छेद 30 कहता है:
1. सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार होगा।
2. राज्य, शैक्षणिक संस्थान को सहायता प्रदान करने में, किसी भी शैक्षणिक संस्थान के खिलाफ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह अल्पसंख्यक के प्रबंधन के अधीन है।

भारत में मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध अल्पसंख्यक में आते हैं। सरल शब्दों में, अनुच्छेद 28 अल्पसंख्यकों पर लागू नहीं होगा। अनुच्छेद 28 में उन्होंने सभी सरकार समर्थित धार्मिक शिक्षा की संभावना पर रोक लगा दी। लेकिन अनुच्छेद 30 में उन्होंने चुपके से मुस्लिम, ईसाई एवं अन्य अल्पसंख्यकों को उस दायरे से निकाल दिया और हिंदू धार्मिक शिक्षा को पिंजरे में बंद कर दिया और वह अब भी पिंजरे में बंद है।

इस तरह यदि हम अनुच्छेद 28 एवं 30 को एक साथ देखें तो मुस्लिम, ईसाई, सिख धार्मिक शिक्षा सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में दी जा सकती है लेकिन हिंदू धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है। मदरसा, क्रिश्चियन स्कूल को सरकार फंड दे सकती है लेकिन गुरुकुल को सरकार फंड नहीं कर सकती। इसलिए हर राज्य में मदरसा बोर्ड है लेकिन गुरुकुल बोर्ड नहीं है, क्योंकि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता है। इसलिए स्कूल में बाइबिल, कुरान पढ़ाया जा सकता है लेकिन गीता कभी भी किसी सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में नहीं पढ़ाई जा सकती।

एक और दिलचस्प बात – किस स्कूल को अल्पसंख्यक स्कूल और किस स्कूल को बहुसंख्यक स्कूल कहा जाएगा? कोई भी स्कूल जो हिंदू के स्वामित्व में हो, उसे बहुसंख्यक स्कूल कहा जाएगा और मुस्लिम या ईसाई के स्वामित्व वाले किसी भी स्कूल को अल्पसंख्यक स्कूल कहा जाएगा। वे धार्मिक शिक्षा पढ़ा रहे हैं या नहीं, या अल्पसंख्यक छात्र वहां हैं या नहीं इससे मतलब नहीं है।

मान लीजिए राम, अब्दुल और माइकल सीबीएसई से संबद्ध एक निजी स्कूल शुरू करते हैं। तीनों एक ही विषय पढ़ा रहे हैं, एक ही सिलेबस और तीनों में 100% हिंदू छात्र हैं, तो क्या होगा? अब्दुल स्कूल और माइकल स्कूल को अल्पसंख्यक स्कूल कहा जाएगा और वे अनुच्छेद 30 में वर्णित सभी लाभों के लिए पात्र हैं। इसका मतलब है कि राम को सभी सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना होगा लेकिन अब्दुल और माइकल को ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। राम अपने स्कूल में भगवद गीता नहीं पढ़ा सकते, लेकिन अब्दुल और माइकल कुरान और बाइबिल पढ़ा सकते हैं, जबकि वहां 100% हिंदू छात्र हैं। इसका मतलब है कि राम को आरटीई के तहत 25% सीटें आरक्षित रखनी होंगी लेकिन यह अब्दुल और माइकल पर लागू नहीं होगा। इसलिए एक हिंदू स्कूल नहीं चला सकता और भारत में आपको ज्यादातर अच्छे स्कूलों के मालिक मुस्लिम और ईसाई मिल जाएंगे।

इस तरह से देखें तो 26 जनवरी 1950 भारत के लिए गणतंत्र दिवस नहीं था, यह हिंदू सभ्यता के लिए गुलामी दिवस था, जिस दिन उन्होंने संविधान के माध्यम से हिंदू शिक्षा को आधिकारिक रूप से नष्ट कर दिया। उन्होंने पूरी शिक्षा प्रणाली अल्पसंख्यकों के हाथों में दे दी। दुनिया में 200 देश हैं लेकिन दुनिया में एक भी ऐसा देश नहीं है जहां इस तरह के खतरनाक बहुसंख्यक विरोधी नियम हैं। धार्मिक शिक्षा के कारण मुसलमान आज भी मुसलमान हैं, एक ईसाई अभी भी ईसाई है लेकिन एक हिंदू अंततः हिंदू हेटर बन गया। अगर इस अनुच्छेद 28/30 को हटाया नहीं गया है, तो 20-30 वर्षों में हिंदू सभ्यता ज्ञान के अभाव में भारत में हिंदू धर्म पर गंभीर खतरा है। सरकार को भारतीय संविधान के इस अनुच्छेद 28 एवं 30 को समाप्त करना चाहिए ताकि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों को भारत में फलने-फूलने का समान अधिकार मिल सके।

बहुसंख्यक हिंदू और अल्पसंख्यक के बीच इस संवैधानिक पक्षपात की कहानी केवल शिक्षा पर समाप्त नहीं होती है। यह पक्षपात हिंदू मंदिरों के साथ भी किया गया। अगर हमारे मंदिर आज़ाद होते तो हम आज भी बिना किसी सरकारी सहयोग के दुनिया के सबसे अच्छे हिंदू स्कूल बना पाते। क्योंकि मंदिरों के पास पैसा है। लेकिन नेहरू अनुच्छेद 30 पर ही नहीं रुके, उन्होंने मंदिर अधिनियम लाकर हमारे मंदिरों पर भी कब्जा कर लिया। लेकिन मस्जिद और चर्च को नहीं छुआ। अब हमें न तो हिंदू शिक्षा पर राज्य का समर्थन है और न ही हमें मंदिरों से धन मिल सकता है। भारत में मस्जिद, चर्च फ्री लेकिन मंदिर नहीं। अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा की अनुमति लेकिन हिंदू शिक्षा की नहीं।