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दिल्ली : मजहब देख कोरोना वॉरियर्स की मदद करते केजरीवाल; मुस्लिम की मदद लेकिन हिन्दू पुलिसकर्मी की विधवा को सालभर बाद भी नहीं

                                            अरविंद केजरीवाल को अमित राणा की पत्नी ने लिखा पत्र
ऑनलाइन वेब पोर्टल या ऐप के जरिए लोगों के घरों में देसी और विदेशी दारू पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार शायद भूल गई है कि उन्होंने कोविड महामारी में फ्रंटलाइन पर काम करने के दौरान जान गँवाने वाले वॉरियर्स के परिवारों से कुछ वादे किए थे। लिहाजा एक पुलिसकर्मी की विधवा को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को खत लिखना पड़ा है। वे सालभर से दिल्ली सरकार के मुआवजे की बाट जोह रही हैं। उन्होंने अपने साथ भेदभाव की वजह भी पत्र में पूछी है।
वैसे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा मजहब देख सियासत करना कोई नई बात नहीं। चुनावों में हनुमान चालीसा पढ़ने वाला अख़लाक़ की मौत पर दिल्ली से दादरी जाने वाले दिल्ली में ही इनके "वोट बैंक" द्वारा हिन्दुओं की हत्या एवं मंदिरों पर हमले होने पर सांप सूंघ जाता है। इतना सबकुछ होने पर समझ नहीं आता कि मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में हिन्दू आम आदमी पार्टी को क्यों वोट देता है? जबकि उनके सामने विकल्प बहुत हैं। अपने शासनकाल में कांग्रेस ने हिन्दू धर्म, संस्कृति और इतिहास को क्षति पहुंचाई है, उसी परम्परा को केजरीवाल की पार्टी आगे बढ़ा रही है। चुनाव आएंगे, फिर दिल्ली की जनता को कोई मुफ्त रेवड़ी देने का वायदा कर सत्ता हथियाने का प्रयास होगा और जनता विशेषकर हिन्दू हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों को भूल इस पार्टी को वोट दे आएगी। नागरिक संशोधक कानून के विरुद्ध में बने शाहीन बाग और हिन्दू विरोधी दंगों को भी भूल जाएगी। 
सुनिए सोशल मीडिया पर वायरल होता पुलिसकर्मियों का दर्द :


इसी क्रम में पूरे एक साल के इंतजार के बाद दिवंगत पुलिस कॉन्सटेबल अमित राणा की पत्नी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिख कर अधूरे वादे पर उनका ध्यान आकर्षित करवाया है। उन्होंने हाल में मुआवजा पाने वाले परिवारों का नाम लिए बिना केजरीवाल से इस भेदभाव की वजह पूछी है।

स्मरण हो कि अमित कुमार राणा का निधन कोविड से 5 मई 2020 को हुआ था। पुलिस बल में कोविड से होने वाली ये पहली मृत्यु थी। अब इस घटना को 1 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल को याद नहीं कि अमित राणा के परिवार को उन्हें 1 करोड़ का मुआवजा देना है।

                                                  अरविंद केजरीवाल को लिखा गया पत्र
मुख्यमंत्री को उनकी कही बात याद दिलाते हुए राणा की पत्नी पूजा लिखती हैं, “मेरे पति अमित राणा शहीद कोरोना वॉरियर थे और दिल्ली के लोगों की सेवा व रक्षा करते हुए कोरोना से ग्रसित होकर उनकी मृत्यु हो गई। मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उस दुख की घड़ी में मेरे पति की सेवाओं को याद करते हुए आपने एक करोड़ रुपए की सहायता राशि की घोषणा की थी। उस दुख की घड़ी के अंधेरे में वो मेरे लिए आशा की किरण था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी मुझे सहायता राशि नहीं मिल पाई है जिसकी आपने मीडिया पर ट्विटर से घोषणा की थी। कुछ लोगों को आपने दस दिन के अंदर ही सहायता राशि प्रदान कर दी थी फिर मेरे साथ ऐसा भेदभाव क्यों?”

पूजा लिखती है, “मेरा 1 साल का बेटा और एक चार माह की बेटी है। आज उनके भविष्य की चिंता सता रही है। यदि मुख्यमंत्री अपने किए वादे को पूरा नहीं करते तो शायद मैं किसी पर विश्वास नहीं कर पाऊँगी।”

इस वर्ष जनवरी में अमित राणा की विधवा पूजा ने बताया था कि अमित की फाइल को दिल्ली सरकार ने रिजेक्ट कर दिया है, क्योंकि यह उनके मापदंडों को पूरा नहीं करती जबकि उन्होंने सरकारी विभाग द्वारा माँगे गए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा कर दिए थे, फिर भी उन्हें कहा गया कि अमित कोविड ड्यूटी में तैनात नहीं थे।

इस बीच दिल्ली के जीटीबी अस्बताल के डॉक्टर अनस मुजाहिद के रिश्तेदारों तथा कुछ अन्य लोगों को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा 1 करोड़ का मुआवजा दिया जा चुका है। आँकड़ों पर बात करें तो दिल्ली में 100 डॉक्टरों और 92 टीचर्स की मौत हुई है। इसके बावजूद केजरीवाल चुनिंदा लोगों को मुआवजा देने में लगे हैं। 23 मई को केजरीवाल ने डॉ. अनस के पिता से मिल कर उन्हें 1 करोड़ रुपए का चेक सौंपा था। 

दिल्ली के मुख्यमंत्री बार-बार कहते हैं कि उन्हें कोविड वॉरियर्स की मौतों का खेद हैं और वह उन्हें आर्थिक सहायता मुहैया करवाएँगे। लेकिन हकीकत ये है कि कोविड में ड्यूटी के दौरान संक्रमित होकर जान गँवाने वाले 15 में से 12 पुलिसकर्मियों के परिवारों की फाइल दिल्ली सरकार दिसंबर 2020 में रिजेक्ट कर चुकी है। क्यों? वहीं 3 अभी दिल्ली सरकार के पास पेंडिंग पड़ी है।

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फिर कहते हैं कि भाजपा, हिन्दू महासभा, संघ और विश्व हिन्दू परिषद् साम्प्रदायिकता का वातावरण बनाकर ध्रुवीकरण का माहौल बना रहे हैं, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि ऐसा माहौल बनाने को मौका ही क्यों दिया? दिल्ली में हिन्दुओं की हत्याओं पर चुप्पी, मंदिरों पर होते हमलों पर चुप्पी, इनके पार्षद द्वारा हिन्दुओं पर हुए हमलों पर चुप्पी लेकिन जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ खड़ा होने में शान समझते हैं। कृषि कानून को दिल्ली में लागु कर यू-टर्न लेकर किसान आंदोलन को समर्थन करना अपना कर्तव्य समझते हैं। हाथ जोड़ विज्ञापनों में कहेंगे कि 'तुम्हारा बेटा हूँ', क्या यही होता है बेटे का कर्तव्य?