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ट्रंप प्रशासन में 'भारत विरोधी' सदस्य : एक खालिस्तानी, दूसरा पाकिस्तानी की पैदाइश: हरमीत ढिल्लो-उम्मेद मलिक; इनके ‘घुसपैठ’ से ही भारत को आँखें दिखा रहे डोनाल्ड ट्रंप

                  ट्रंप प्रशासन में 'भारत विरोधी' सदस्य ( साभार- Greenwich Economic Forum/CNN)
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं करने और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाने के दावों को खारिज करने के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों में खटास आ गई है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष को ‘मोदी का युद्ध‘ बताना। भारत पर यूक्रेन युद्ध को आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाना और रूसी तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त 25% (कुल 50%) टैरिफ लगाने का फैसला, भारत- अमेरिकी संबंधों में आई कड़वाहट की वजह बने हैं। जबकि बीजिंग द्वारा उसी तेल की खरीद का बेशर्मी से बचाव करना, ये दिखाता है कि ट्रंप के इरादे ठीक नहीं हैं।

भारत की दृढ़ता और संप्रभुता ने निश्चित रूप से ट्रंप के नाज़ुक अहंकार को चोट पहुँचाई है। हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी धमकाने वाली चालों के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखते। ट्रंप प्रशासन ने भारत-विरोधी लोगों को अपने प्रशासन में शामिल कर रही सही कसर पूरी कर दी है। खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो और आधे पाकिस्तानी उम्मेद मलिक ऐसे ही दो व्यक्ति हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी हैं।

उम्मेद मलिक कौन हैं?

 46 वर्षीय उम्मेद मलिक ईरानी और पाकिस्तानी प्रवासियों के घर पैदा हुए थे। उनका पालन-पोषण न्यू जर्सी में हुआ। द फ्री प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उनके माता-पिता डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा जमा करते थे। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को दो बार वोट दिया था। डेमोक्रेटिक हिलेरी क्लिंटन को चंदा दिया और न्यू जर्सी के दो डेमोक्रेट्स उम्मीदवारों के लिए काम किया।

‘ब्लैक लाइव्स मैटर’, ‘मी टू’ आंदोलन और दूसरे उदारवादी नीतियों की वजह से मलिक का पार्टी से मोहभंग हो गया। वह रिपब्लिकन के साथ आ गए। आज वह MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के कट्टर समर्थक हैं और ट्रंप परिवार के करीबी भी।

डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ उनकी दोस्ती ने कथित तौर पर उन्हें ट्रम्प परिवार के वित्तीय मामलों से जोड़ दिया है। दोनों की मुलाकात 2019 की गर्मियों में हैम्पटन्स पार्टी में हुई थी। इसके बाद वे दोनों अक्सर मिलते थे। वह ट्रम्प जूनियर की उस वक्त की प्रेमिका किम्बर्ली गुइलफॉयल को 10 साल से जानते थे।

मलिक ने जो बाइडेन को 2,800 डॉलर देने के एक महीने बाद ही ट्रम्प को 5,600 डॉलर का अपना पहला दान दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति के सबसे बड़े बेटे के ‘1789 कैपिटल’ में भी मलिक भागीदार है। इसके अलावा पत्रकार टकर कार्लसन की कंपनी का वह सबसे बड़ा निवेशक है। कार्लसन और मलिक 2015 से दोस्त थे।

अपने इजराइल विरोधी बयानों के लिए कुख्यात मलिक भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा है। उसने ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफ की थी। उन्होंने 2022 में तर्क दिया था, “मजबूत देश कमजोर देशों पर हावी होते हैं। यह चलन नहीं बदला है। जब अंग्रेज भारत से चले गए, तो वे अपने पीछे एक पूरी सभ्यता, एक भाषा, एक कानूनी व्यवस्था, स्कूल, चर्च और सार्वजनिक इमारतें छोड़ गए, जो आज भी उपयोग में हैं।” उसके बयान की जबरदस्त आलोचना हुई थी।

टकर कार्लसन नेटवर्क (टीसीएन) में अहम निवेशक मलिक की कई बार आलोचना भी हुई। लॉरा लूमर ने उन्हें कार्लसन नेटवर्क में इजराइल की आलोचना करने के पीछे का मास्टरमाइंड बताया था। पिछले साल कार्लसन ने एक ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लिया था जिसने आरोप लगाया था कि एडॉल्फ हिटलर स्वर्ग में है।

बाद में, वही व्यक्ति तस्कर जेफरी एपस्टीन पर हुए एक कार्यक्रम में दिखा। कार्लसन ने उसे ‘संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे अच्छा और सबसे ईमानदार लोकप्रिय इतिहासकार’ बताया। जुलाई में उसने ईरानी राष्ट्रपति का इंटरव्यू लिया। हालाँकि MAGA और इजराइल-ईरान मुद्दे पर इस इंटरव्यू में विवाद हो गया।

मलिक का नाम एक एक्स पोस्ट में नेटवर्क का ‘प्रमुख समर्थक’ बताया गया था। 1789 कैपिटल अब कार्लसन की कंपनी में निवेशक के रूप में शामिल नहीं है।

ट्रंप प्रशासन के साथ उम्मेद मलिक के गहरे संबंध

मलिक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सदस्य रहे हैं। मलिक ने एक प्रमुख थिंक टैंक, मिल्केन इंस्टीट्यूट को धन दान किया था। वह इंस्टीट्यूट के बोर्ड में भी थे। यह एक ऐसी गैर लाभकारी विदेश नीति से जुड़ी संस्था है, जिसने कुख्यात जॉर्ज सोरोस सहित उदारवादी हस्तियों के सम्मान में वार्षिक समारोह आयोजित किए हैं।

मलिक ने 2018 में अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंक ऑफ अमेरिका छोड़ दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बैंक ने उन पर कॉर्पोरेट मानकों की अनदेखी और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हुए बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मलिक ने बैंक ऑफ अमेरिका पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक का मुकदमा दायर किया। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और मलिक ने उस पैसे से अपनी निवेश कंपनी, फरवाहर पार्टनर्स शुरू की।

मलिक 2021 में फ्लोरिडा पहुँचे और वहाँ रिपब्लिकन से जुड़ गए। वह रूढ़िवादी संगठन रॉकब्रिज नेटवर्क में भी शामिल हो गए। इसकी स्थापना जेडी वेंस और क्रिस बुस्किर्क ने की थी। बुस्किर्क 1789 कैपिटल के सह-संस्थापक और दक्षिणपंथी वेबसाइट अमेरिकन ग्रेटनेस के प्रकाशक थे।

मलिक ने 2023 में बुस्किर्क और रिपब्लिकन मेगाडोनर रेबेका मर्सर के साथ मिलकर ‘1789 कैपिटल’ की स्थापना की। मलिक की कंपनी ने पहला निवेश कार्लसन के नेटवर्क में किया था।

मलिक अब सबसे प्रसिद्ध उद्यमियों में से एक बन गए हैं। वह फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित मार-ए-लागो क्लब में काफी समय बिताते हैं। रिपब्लिकन उम्मीदवारों और चैरिटी संस्थाओं को एक बार में हजारों डॉलर के चेक भेजते हैं। स्कॉट बेसेंट को ट्रंप का वित्त मंत्री नियुक्त किए जाने से उन्होंने उनसे मुलाकात की थी। 10 साल पहले बेसेंट को 2015 में पहला ‘हेज फंड’ शुरू करने में उनकी मदद की थी।

बेसेंट ने हाल ही में राहुल गाँधी के अडानी-अंबानी वाले तंज को दोहराते हुए कहा था कि ‘सबसे अमीर भारतीय परिवार’ रूसी तेल से मुनाफा कमा रहे हैं।

मलिक वर्तमान प्रशासन के साथ जुड़े हुए हैं। ट्रंप जूनियर के साथ कई परियोजनाओं पर सहयोग कर रहे हैं। ये परियोजनाएँ लोकतंत्र-विरोधियों को बढ़ावा देने के लिए एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ की स्थापना के लिए चलाई जा रही हैं। साथ ही भारत, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ भावना को बढ़ाने के लिए एक क्लब बनाया गया है।

खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो को जानिए

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस कार्यकाल में भारतीय-अमेरिकी हरमीत कौर ढिल्लन को अमेरिकी न्याय विभाग में नागरिक अधिकारों के लिए सहायक अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया। उनका “द ढिल्लन लॉ ग्रुप” नामक एक कानूनी फर्म है। इसके पूरे देश में ऑफिस खुले हुए हैं। हालाँकि, ट्रंप प्रशासन में शामिल होने के बाद उन्हें 2025 में कंपनी छोड़नी पड़ी।

उनके विवादास्पद अतीत और खालिस्तान समर्थक रवैये को देखते हुए उनकी कड़ी आलोचना भी हुई।

ढिल्लो पर बार-बार अमेरिका में खालिस्तानियों का समर्थन करने के आरोप लगे। वह भारत विरोधी गुट की मुखर समर्थक रही हैं। उन्होंने नई दिल्ली पर अमेरिका और कनाडा में मारने के लिए लोगों को भेजने का आरोप लगाया है और यह भी कहा है कि आलोचकों की हत्या में प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं।

ढिल्लो ने आरोप लगाया कि खालिस्तानी समर्थकों की हत्या के पीछे मोदी सरकार का हाथ है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय अमेरिकी डेमोक्रेट्स ने इन हत्याओं पर अजीब चुप्पी साध ली है। उन्होंने अमेरिकी सरकार से पूछा कि देश के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं।

ढिल्लो ने कनाडा में विपक्ष के नेता पियरे पोलीव्रे का भी हवाला दिया, जिन्होंने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का समर्थन किया था। ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर लगाया था। उन्होंने अमेरिका में खालिस्तानी समर्थकों को ‘सिख नेता’ करार दिया। साथ ही खालिस्तानियों की कट्टरपंथी विचारधारा को कम करके आंका।

ढिल्लो ने भारत में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघनों पर रॉयटर्स के एक लेख का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि पंजाब में हाल ही में इंटरनेट पर लगे बैन से लोगों को काफी नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सिख कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को निशाना बनाया गया है। दरअसल उन्होंने उस वक्त की बात की, जब पंजाब में खालिस्तानी प्रचारक और सांसद अमृतपाल सिंह पर कार्रवाई को लेकर झूठा प्रचार किया जा रहा था।

ढिल्लो पहले डेमोक्रेटिक नेता कमला हैरिस की समर्थक थीं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के जिला अटॉर्नी पद के लिए हैरिस के लिए काम किया था। हालाँकि कार्लसन शो के दौरान उन्हें हैरिस के खिलाफ जातिवादी टिप्पणी की।

ढिल्लो ने कमला हैरिस के उच्चारण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह दूसरे अक्षर पर जोर देती हैं, जिससे यह कमाला बन जाता है, जबकि भारत में इसे कमला कहा जाता है। ढिल्लन ने कहा, “वह एक उच्च जाति ‘ब्राह्मण’ के परिवार से आती हैं। उनकी माँ एक ब्राह्मण हैं।”

ट्रम्प प्रशासन रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर अपने हास्यास्पद हमलों में भी इस निराधार ब्राह्मण-विशेषाधिकार कथा को जारी रखता है। व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने जातिगत राजनीति का सहारा लेने की कोशिश की और ज़ोर देकर कहा कि ब्राह्मण ही इस व्यापार के असली लाभार्थी हैं।

ढिल्लो पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। जून 2023 में द गार्जियन में छपी एक खबर में खुलासा हुआ कि उनके नेतृत्व में एक गैर-लाभकारी संस्था में 10 लाख डॉलर से ज्यादा का निवेश किया गया।

रिपोर्ट में खुलासा किया गया है, “द गार्जियन ने पाया है कि सेंटर फॉर अमेरिकन लिबर्टी (CAL) से कम से कम 13.2 लाख डॉलर उनकी लॉ फर्म, ढिल्लो लॉ ग्रुप को हस्तांतरित किए गए हैं। इसके अलावा, राज्य और संघीय दस्तावेजों से पता चलता है कि ढिल्लो दो घंटे के साप्ताहिक कार्य के लिए CAL से 120,000 डॉलर का वेतन लेती हैं।”

हरमीत ढिल्लो का पार्टनर फर्म भी कट्टरपंथी

जॉन-पॉल-देओल ‘द ढिल्लो लॉ ग्रुप’ के पार्टनरों में एक हैं। वह एक ऑनलाइन ट्रोल की तरह काम करता है, जो नियमित रूप से हिंदुओं और हिंदू देवताओं का अपमान करता है। उसने 2023 में ‘द वायर’ के लेख में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की निंदा करने वाले एक यूजर्स के पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरूप भगवान शिव के लिए एक अपमानजनक ट्वीट भेजा था।

हालाँकि ट्वीट को हटा दिया गया, लेकिन उनका इतिहास उन हिंदुओं और सिखों पर हमला करने के लिए जातिवादी और नस्लीय शब्दों का इस्तेमाल करने का रहा है जो उनकी मान्यताओं से सहमत नहीं हैं। वह अक्सर “ब्राह्मणों” को निशाना बनाते हैं, हिंदुओं का “लिंडू” कहकर मजाक उड़ाते हैं और सबसे “पिछड़ी सभ्यता” कहते हैं।

अमेरिका में जाति-विरोधी हिंदू-विरोधी कानून के प्रबल समर्थक देओल ने भी वेदों को जाति से जोड़कर उनका अपमान किया।

दरअसल ट्रंप के आचरण से ज्यादा खतरनाक उनकी सोच है। उन्हें लगता है कि बाकी दुनिया पर अमेरिका का दबदबा है। वह गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के मोदी सरकार से संबंधों को लेकर विपक्ष के प्रचार का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही जातिगत राजनीति के मुद्दे पर मतदाताओं को भड़का रहे हैं, ताकि नई दिल्ली को अपनी माँगें मनवाने के लिए धमकाया जा सके।

ट्रंप की हताशा और उनके आसपास मौजूद भारत विरोधी लोगों को देखते हुए उनके ‘भारत-विरोध’ को समझा जा सकता है। ‘खालिस्तानी आतंकवाद’ का महिमामंडन भी इसकी कड़ी है।

वोट बैंक के लिए हिंदुओं-भारत से रिश्ते बिगाड़ रहे जस्टिन ट्रूडो ; चीन-पाकिस्तान का दखल, कमजोर राजनीतिक जमीन, घटती लोकप्रियता


खालिस्तानियों से हमदर्दी दिखाने और भारत से कूटनीतिक रिश्ते खराब करने के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो घरेलू राजनीति में भी अलग-थलग पड़ गए हैं। कनाडा की राजनीतिक और पत्रकार बिरादरी भी ट्रूडो की नीतियों ने कतई सहमत नहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत विरोध का यह झंडा ट्रूडो ने अपने वोटबैंक को ठीक करने के लिए उठाया है। यह भी कहा जा रहा है कि कनाडा के चुनावों में चीन के हस्तक्षेप से लोगों का ध्यान भटकाने को लेकर ट्रूडो भारत का नाम उछाल रहे हैं।

जिस तरह भारत में मोदी विरोधी सनातन विरोध कर जनता को गुमराह करते रहते हैं, ठीक उसी तर्ज पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो चल निकले हैं। वैसे बीजेपी भी तुष्टिकरण कर रही है, जिसका उदाहरण महाराष्ट्र में बीजेपी समर्थित शिवसेना सरकार ने चुनावों मुस्लिम वोट लेने खजाना खोल दिया, उसके बावजूद बीजेपी और शिवसेना को मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला।   

अपनी ही पार्टी के निशाने पर ट्रूडो

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ गए हैं। उनकी लिबरल पार्टी के कई सांसदों ने ट्रूडो सरकार की नाकामियों के चलते जस्टिन ट्रूडो से प्रधानमंत्री पद छोड़ने को कहा है। कई सांसद मुखर होकर यह बात उठा रहे हैं। कनाडाई मीडिया बता रहा है कि लिबरल पार्टी के सांसद एक साथ आकर ट्रूडो पर दबाव बना रहे है कि वह आगामी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद छोड़ दें। उन पर यह दबाव हालिया टोरंटो उपचुनाव में हार के बाद और बढ़ा है।
CBC की एक रिपोर्ट बताती है कि सांसद सीन केसी ने जस्टिन ट्रूडो से खुले तौर पर पद छोड़ने को कहा है। इसके अलावा बाकी सांसद संख्याबल जुटा रहे हैं ताकि वह ट्रूडो को किनारे लगा सकें। ट्रूडो के विरोधी सांसद तब तक इस पूरी प्रक्रिया को चुपचाप कर रहे हैं। कई सांसदों से एक ऐसे कागज पर दस्तखत करने को कहा जा रहा है जिसमें ट्रूडो को हटाने की बात कही गई है। ट्रूडो को हटाने की यह कोशिश अकारण ही नहीं हो रही है। कनाडा में 2025 में आम चुनाव होने हैं।
चुनाव से पहले जस्टिन ट्रूडो की जनता में लोकप्रियता रसातल को चली गई है। जनता की पसंद-नापसंद बताने वाली अप्रूवल रेटिंग में भारी गिरावट हुई है। सितम्बर, 2024 में ट्रूडो की अप्रूवल रेटिंग मात्र 30% थी। यानी 100 में से 70 लोग ट्रूडो को पसंद नहीं करते। जब ट्रूडो प्रधानमंत्री बने थे, तब उनको पसंद करने वालों का आँकड़ा 60% के पार था। युवा वर्ग और पुरुषों में तो ट्रूडो की रेटिंग 25% पर पहुँच गई है। उनकी लोकप्रियता घटने का सबसे बड़ा कारण कनाडा में बढती महंगाई और बेरोजगारी है।
अपनी पार्टी के विरोध से बचने को ट्रूडो भारत विरोध का पैंतरा अपना रहे हैं। उन्हें लगता है कि राजनयिक बखेड़ा खड़ा करने से कुछ समय के लिए उनकी कुर्सी बच जाएगी। वह अपनी पार्टी को देश के संकट में फंसे होने का बहाना दे सकेंगे। हालाँकि, उनकी कुर्सी बचाने की यह तरकीब कनाडा को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भारी पड़ने वाली है।

मुस्लिम-सिख वोटबैंक भी है कारण

जस्टिन ट्रूडो के खुले भारत विरोध का एक कारण वोटबैंक भी है। वह यूँ ही खालिस्तानियों का समर्थन नहीं कर रहे हैं। दरअसल, सिख कनाडा की आबादी का लगभग 2% हैं। उनके वोट ब्रैम्पटन जैसे इलाकों में निर्णायक हैं। कनाडा में सिखों का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकांश नेता भी खालिस्तान के समर्थक हैं। जगमीत सिंह इसका एक उदाहरण हैं। कई बड़े गुरुद्वारों में भी खालिस्तानियों का प्रभाव है। इन सब परिस्तिथियों में सिख वोट ट्रूडो के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
वह खालिस्तानियों को खुश करके सिख समुदाय का वोट चाहते हैं। इसके अलावा कनाडा में हिन्दू वोट भी 2.3% है। ट्रूडो जानते हैं कि भारत का विरोध करने से उनको हिन्दू वोट का नुकसान होगा। हालाँकि, वह इस वोट का नुकसान करने को तैयार हैं और इसकी भरपाई वह सिख-मुस्लिम वोट मिलाकर करना चाहते हैं। कनाडा की आबादी में लगभग 5% हिस्सा मुस्लिमों का है। इनमें से भी बड़ा हिस्सा उन मुस्लिमों का है, जो पाकिस्तानी हैं।
इस मुस्लिम वोटबैंक को साधने के लिए ट्रूडो ने कनाडा के भीतर पाकिस्तान की गतिविधियों को खुला छूट दे दी है। सितम्बर, 2024 में ही कनाडा की खुफिया और सुरक्षा एजेंसी CSIS प्रमुख वनेसा लॉयड ने स्पष्ट तौर पर विदेशी दखल की जाँच करने वाली कमिटी को बताया था कि पाकिस्तान कनाडा के भीतर दखल दे रहा है। उन्होंने बताया था कि पाकिस्तान कनाडा के भीतर खालिस्तान समर्थकों को मदद करता है और साथ ही चुनावों में भी दखल देता है। पाकिस्तान यहाँ लोगों को दबाता भी है।
जस्टिन ट्रूडो ने इस खुलासे के ऊपर आँखे मूँद रखी हैं। उन्होंने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी के ऊपर एक भी शब्द बोलने से इनकार कर दिया है। कनाडा के भीतर खालिस्तानियों को पाकिस्तान के साथ मिल कर भारत तोड़ने की साजिश रचने की पूरी छूट दी जा रही है। यह सब इसलिए ताकि ट्रूडो लगभग 7%-8% वोटबैंक बढ़ा सकें। चुनावी फायदे के लिए ट्रूडो ने अपने देश के रिश्तों को ताक पर रख दिया है। वह कनाडा की शिक्षा व्यवस्था का भी इससे बड़ा नुकसान करने वाले हैं।

चीन का दखल छुपाने का भी प्रयास

जस्टिन ट्रूडो का भारत विरोधी रवैये का एक और कारण है। यह कारण चीन का कनाडा की राजनीति और उसके चुनाव में दखल है। चीन के प्रभाव कनाडा में प्रभाव को ट्रूडो छुपाना चाहते हैं। कनाडाई चुनाव में दखल को लेकर एक जाँच चल रही है। जून, 2024 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक कुछ चीनी नागरिक, कनाडा के शासन और अर्थव्यवस्था में घुसपैठ करने और उसे प्रभावित करने के प्रयासों में लगे हुए हैं और लगे हुए हैं।
इस रिपोर्ट में बताया गया था कि कनाडा के चुनावों में दखल के लिए चीन सबसे बड़ा खतरा है। एक रिपोर्ट में तो यहाँ तक बताया गया था कि चीन ने कनाडा के भीतर अपने पुलिस स्टेशन तक बना लिए हैं। कनाडा में 7 चीनी पुलिस स्टेशन होने की बात कही गई थी। यह भी सामने आया था कि चीन ने कनाडा में कंजर्वेटिव पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया। चीन ने कनाडा में सांसदों और कई नेताओं को धमकाने तक को लेकर प्रयास किए हैं। यहाँ तक कि जस्टिन ट्रूडो को जिताने में भी चीन का योगदान बताया जाता है।
चीन का कनाडा में दखल यहाँ राजनीति में बड़ा मुद्दा है। इसे दबाने को लेकर भी जस्टिन ट्रूडो भारत को निशाने पर ले रहे हैं। भारत लगातार कनाडा से खालिस्तानियों पर कार्रवाई की माँग करता आया है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत की चिंताओं को लगातार नजरअंदाज करते आए हैं और साथ ही भारत विरोधियों को प्रश्रय देते रहे हैं। स्थानीय राजनीति चमकाने के लिए आतंकियों को बसाना कभी भी फायदे का सौदा नहीं होता है, जस्टिन ट्रूडो जितनी जल्दी यह समझेंगे, उतना ही कनाडा का नुकसान कम होगा।

पंजाब में एक नया भिंडरावाला दस्तक दे चुका है, केजरीवाल दिल्ली में चैन की बंसी बजा रहा है; दिल्लीवालों आंखे खोल लो

दिल्लीवालों भगवान का अहसान मानो कि दिल्ली पूर्ण राज्य न होने के कारण केंद्र के अधीन है, अन्यथा जिस फ्री के लालच में तुम लोगों ने अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सिर पर बैठाया है, दिल्ली नगर निगम में हो रही गुंडागर्दी एक नमूना है और जलता पंजाब जीताजागता उदाहरण। अगर अभी भी दिल्लीवालों ने अपनी आंखें नहीं खोली, दिल्लीवालों से बड़ा अंधा दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलने वाला। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि अन्य उन राज्यों को भी अपनी आंखें खोलने की जरुरत है, जो फ्री के लालच में केजरीवाल पार्टी को वोट देते हैं। पंजाब में वीभत्स घटनाएं देख इस पार्टी से दूरी बनाना ही हितकर होगा, अन्यथा तुम्हारी आने वाली पीडियां तुम्हे कोसेंगी। बीजेपी को वोट नहीं देनी मत दो, कांग्रेस को दे दो, लेकिन केजरीवाल पार्टी से दूरी बनाओ। पंजाब में तो केजरीवाल पार्टी के हाथ में पुलिस है, फिर क्यों खामोश? दिल्ली नगर निगम में हाथापाई ऐसे हो रही है, जैसे निर्वाचित सदस्य नहीं, बल्कि सड़क पर गुंडे लड़ रहे हों। यह दिल्ली नगर निगम इतिहास में पहली बार हुआ है।  

गृह मंत्रालय को दिल्ली नगर निगम में हुई हाथापाई और उड़ते पंजाब में कानून का बने मजाक की सीबीआई जाँच कर दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए। क्या पंजाब पुलिस और मुख्यमंत्री को होने वाले जमावड़े की कोई सूचना नहीं थी? यह भी शंका व्यक्त की जा रही है कि जिस तरह से हाथ काटने की दर्दनाक हरकतें हुई हैं, इसमें खालिस्तानियों की आड़ में भारत विरोधी तत्व शामिल होकर जनता से लेकर राज्य और केंद्र सरकारों में डर बैठाने की कोशिश की गयी हो?  

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ‘फ्री-फ्री’ की डुगडुगी ने उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया, जिन्होंने तात्कालिक और मामूली लाभ के लिए अपना और देश का भविष्य दांव पर लगा दिया। उन्हें यह एहसास नहीं था कि उनका बहुमूल्य वोट ही उनके लिए घातक साबित होने वाला है। उन्हें इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। आज पंजाब और दिल्ली की जनता अपनी नादानी की सजा भुगत रही है। केजरीवाल सरकार ने जहां दिल्ली की जनता का खजाना शराब माफिया के हवाले कर दिया, वहीं भगवंत मान की सरकार ने पूरे पंजाब को ड्रग्स माफिया और खालिस्तानियों के हवाले कर दिया है। पंजाब में खालिस्तानी तांडव कर रहे हैं। पुलिस भी उनके सामने बेबस है। पुलिस पीट रही है और खालिस्तानियों के सामने आत्मसमर्पण कर रही है। फ्री-फ्री के चक्कर में इंसान की जान भी फ्री हो गई है। खुलेआम लोगों पर हमले हो रहे हैं। वहीं केजरीवाल की हालत उस नीरो जैसी हो गई है, जो पंजाब जल रहा है और वो दिल्ली में चैन की बंसी बजा रहा है।

 

फ्री के चक्कर में जान हो गई सस्ती, केजरीवाल के धरे रह गए वादे

पंजाब में कानून-व्यवस्था कायम करने और बढ़ते नशे के कारोबार पर रोक लगाने के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार में पंजाब पुलिस लाचार है। जिस राज्य में पुलिस सुरक्षित नहीं है, वहां आम जनता कितनी सुरक्षित होगी सोचा जा सकता है। केजरीवाल ने लोगों के सामने वादा किया था कि हम पंजाब का माहौल खराब नहीं होने देंगे। हम पंजाब का भाईचारा खराब नहीं होने देंगे। हम पंजाब की शांति खराब नहीं होने देंगे। पंजाब के एक-एक व्यक्ति को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी हमारी है। हम अपनी जिम्मेदारी पूरी करेंगे। लेकिन इन घटनाओं ने साबित कर दिया कि केजरीवाल अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नाकाम रहे हैं।

केजरीवाल मेयर बनाने और मामूली बात पर ट्वीट करने में व्यस्त

दिल्ली के सीएम केजरीवाल, पंजाब के सीएम भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के ट्विटर हैंडल पर जलते, पिटते और मरते पंजाब के ये वीडियो गायब है। बीजेपी शासित राज्यों में होने वाली मामूली घटना पर ट्वीट करने वाली केजरीवाल एंड कंपनी मौन है। उन्हें ये घटनाएं दिखाई नहीं दे रही हैं। पंजाब को खालिस्तानियों और अपराधियों के हवाले कर केजरीवाल एंड कंपनी दिल्ली नगर निगम पर कब्जे में व्यस्त है। मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव के बाद अब स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव को लेकर हंगामा जारी है। केजरीवाल एंड कंपनी ने स्टैंडिंग कमेटियों पर कब्जे के लिए पूरा जोर लगा दिया है। अब एमसीडी दंगल बन गई। वहीं आम आदमी की समर्थक और उसके इकोसिस्टम की पत्रकार साक्षी जोशी ने रात में एक कार का टायर पंचर होने पर ट्वीट किया, तो केजरीवाल ने एलजी को जिम्मेदार बताते हुए रिट्वीट किया, जिसमें उन्होंंने लिखा-LG sahib…। केजरीवाल को एक मामूली बात पर ट्वीट करने का वक्त है, लेकिन जलते, डोलते और लूटते पंजाब के लिए ट्वीट करने का समय नहीं है। केजरीवाल ने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

खालिस्तानी समर्थकों के सामने पंजाब पुलिस का आत्मसमर्पण

23 फरवरी, 2023 को पंजाब के अंमृतसर में जो कुछ हुआ, उसने भिंडरावाले की याद ताजा कर दी। ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह अपने समर्थकों के साथ अजनाला पुलिस थाने के बाहर खूब तांडव किया। सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि हिंसक हो चुके अमृतपाल के समर्थक पूरी तरह हथियारों से लैस थे। इनके हाथ में लाठी, बंदूकें और तलवारें थीं। इन्होंने पुलिस के बैरिकेड्स भी तोड़ दिए। पुलिस वालों पर भी हमला किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। अमृतपाल समर्थकों की भीड़ और आक्रोश देखकर पुलिसकर्मियों ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद भीड़ जबरन पुलिस स्टेशन के अंदर घुस गई। ये सभी किडनैपिंग केस में गिरफ्तार अपने एक साथी लवप्रीत तूफान की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। आखिरकार पुलिस ने आरोपी को रिहा कर दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि पंजाब में सरकार पूरी तरह पंगु हो चुकी है और खालिस्तानी सरकार चला रहे हैं।

पंजाब में तालिबानी राज, पुलिस से शिकायत करने पर काट दी अंगुलियां

सोशल मीडिया में दिल को दहला देने वाला एक और वीडियो वायरल हो रहा है, जो साबित करता है कि पंजाब में कानून का शासन खत्म हो चुका है और तालिबानियों का राज चल रहा है। लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। पुलिस से शिकायत करने पर लोगों के हाथ काट दिए जा रहे हैं। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति को पुलिस से शिकायत करने की गुस्ताखी की कितनी बड़ी सजा दी जा रही है। शिकायत करने वाले की अंगुलियों को काट कर अलग कर दिया गया। जिस तरीके से अंगुलियों को काटा गया, वो काटने वाले के अंदर की क्रूरता को दर्शाता है। उसके मान में शासन-पुलिस का खौफ नहीं होना बताता है। केजरीवाल और भगंवत मान ने अपराधियों के अंदर से कानून और पुलिस का खौफ खत्म कर दिया है। इससे लोगों की जान फ्री हो गई है। जो चाहे, जब चाहे किसी की जान ले सकता है। उसे पता है कि इसकी सजा उसे नहीं मिलेगी।

 

सरेआम महिला पर हुआ हमला, पुलिस वाले भी जान बचाकर भागे 

एक ही दिन आए इन दो वीडियो ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। वहीं तीन दिन पहले पंजाब के फिरोजपुर में चार बदमाशों ने एक पचास वर्षीय महिला पर तलवार से वार कर उसे घायल कर दिया। बाइक पर आए चार सवारों ने महिला के शरीर पर ताबड़तोड़ वार किए। यह हमला उस समय किया गया जब महिला सोमवार को कोर्ट में किसी मामले की गवाही देकर घर लौट रही थी। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि महिला बस पकड़ने के लिए बाज चैक पर इंतजार कर रही थी। उसी समय बाइक पर सवार होकर चार बदमाशों ने उस पर तलवारों से हमला कर दिया। महिला के सिर, बाजू व शरीर के अन्य हिस्से में चोटें आई हैं। घटना स्थल पर माैजूद लोगों में दशहत पैदा हो गई। वे भागते दिखे। लोगों के अनुसार घटनास्थल पर पुलिस भी मौजूद थी, लेकिन वारदात के दौरान एक बार भी पुलिसकर्मियों ने बीच बचाव नहीं किया। मौका पाकर पुलिसकर्मी वहां से खिसक गए। वारदात के बाद आसपास के लोगों ने महिला को सिविल अस्पताल में भर्ती करवाया, जहां से उसे फरीदकोट स्थित मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। इस घटना ने लोगों की जान-माल की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के पुलिस और भगवंत मान सरकार के दावाें की भी पोल खाेल दी है।

 

भगवंत मान के गृह जिले संगरूर में युवक पर सरेआम हमला

इससे पहले सोशल मीडिया पर पंजाब के संगरूर का एक वीडियो जमकर वायरल हुआ था। इसमें एक युवक की बेरहमी से पिटाई की गई थी। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति युवक को पकड़ा हुआ है और दो लोग जिनके हाथों में लोहे की रॉड और गंडासा है, युवक को जमीन पर गिराकर उसपर ताबड़तोड़ वार कर रहे हैं। झकझोर देने वाला यह वीडियो मुख्यमंत्री भगवंत मान के गृह जिले संगरूर का है। बताया जाता है कि पिटने वाले युवक का नाम सोनू कुमार है। छह लोगों ने मिलकर सोनू के हाथ और पैर को तोड़ दिया। इस मामले में मनी सिंह, कुलदीप, लवी, गोपाल, अमरीक, मलकीत के खिलाफ नमजद एफआईआर दर्ज की गई है।

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पंजाब : खौफनाक वीडियो: पंजाब में काट दी हाथ की अंगुलियाँ, CM भगवंत मान से नहीं संभल रही कानून-व्यवस

‘राजनीति से प्रेरित किसान आंदोलन वापस लो’ – जिस सिख रेडियो जॉकी ने यह कहा, उन्हें धारदार हथियार से कई बार गोदा

न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में बतौर रेडियो जॉकी कार्यरत हरनेक सिंह पर हमला करने के बाद उन्हें कई बार धारदार हथियार से गोदा गया, जिसके बाद वो अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। न्यूजीलैंड की मीडिया ने इस हमले को मजहबी कट्टरता से प्रेरित बताया है। उन पर दिसंबर 23, 2020 को हमला किया गया। 53 वर्षीय हरनेक सिंह रात के 10:30 बजे रेडियो शो से लौट रहे थे, तभी उन पर ये हमला हुआ।

इस साल उन पर ये दूसरा हमला है। जुलाई 2020 में भी उनके जन्मदिन के दिन ही ‘लव पंजाब’ रेस्टॉरेंट में उन पर हमला किया गया था। हरनेक सिंह के साथी बलविंदर ने बताया कि वो उनके भाई के समान हैं और सिख समुदाय की सामाजिक और धार्मिक स्थितियों को लेकर अक्सर चर्चा में मशगूल रहा करते थे। साथ ही वो न्यूजीलैंड के सिख समुदाय की भलाई के लिए भी प्रयासरत थे। उन पर धारदार हथियारों से हमला किया गया।

बलविंदर ने बताया कि ये हमला रेडियो पर उनके द्वारा कही गई बातों के विरोध में किया गया है, ऐसा लगता है। उन्होंने कहा कि हरनेक सिंह की सोच और विचारों को लेकर रोष के कारण ये हमला हुआ। उन्होंने हाल ही में दिल्ली में राजनीतिक रूप से प्रेरित आंदोलन को वापस लेने की अपील की थी, जिसमें तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग की जा रही है। हरनेक धार्मिक गलतफहमियों को दूर करने के लिए भी रेडियो शो में बातें किया करते थे।

उनके दोस्त ने बताया कि ये हमला ऐसे मजहबी कट्टरपंथियों ने किया है, जो धर्म को मिथकों में देखता हो और उसे वास्तविकता में कोई रुचि न हो। उनकी पत्नी ने बताया कि उनकी हालत अभी स्थिर है। उनकी सर्जरी भी की गई है। न्यूजीलैंड की पुलिस ने कहा है कि इस मामले में और जाँच की जा रही है। उन पर हुए हमले के बाद रेडियो स्टेशन को भी सैकड़ों कॉल और मैसेजों के द्वारा धमकियाँ मिल रही हैं।

उनके साथियों ने बताया कि हरनेक सिंह सिर्फ धर्म पर ही बातें नहीं किया करते थे, बल्कि सिख समुदाय कैसे पीछे छूट रहा और और क्या सामाजिक समस्याएँ हैं, उनके क्या निदान हो सकते हैं – इन सब पर चर्चा किया करते थे। वो बदलाव की बातें किया करते थे। उनके सिख मित्रों ने कहा कि कुछ लोग अभी भी 100 वर्ष पीछे जीना चाहते हैं और हरनेक सिंह ऐसे लोगों को सही रास्ते पर लाना चाहते थे।

उधर विवादित ‘किसान आंदोलन’ के बीच में पंजाब में तीसरी बार कॉन्ग्रेस के टिकट पर सांसद बने रवनीत सिंह बिट्टू ने मोदी सरकार को धमकाते हुए कहा है कि वो सोचते हैं कि हम यहाँ पर बैठे हैं इतने दिनों से तो बैठे-बैठे थक जाएँगे। उन्होंने कहा, “1 तारीख (जनवरी 1, 2020) के बाद हम लाशों के भी ढेर लगाएँगे। हम अपना खून भी देंगे। हम इसके लिए कहीं भी, किसी भी हद तक जा सकते हैं।”