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मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा


डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत
महाराणा कुम्भा (1433 – 1468 ई०)
मेवाड़ के महाराणा मोकल के पश्चात उनके वीर पुत्र महाराणा कुंभा ने 1433 ई0 में मेवाड़ का राज्य भार संभाला। महाराणा कुंभा का भी मेवाड़ के राणा वंश के शासकों में प्रमुख स्थान है। उन्होंने अपने शासनकाल में कई ऐसे महान कार्य किए जिन्होंने उनकी कीर्ति को अमर किया। जिन प्रमुख शासकों का मेवाड़ या राजपूताना में आज भी विशेष सम्मान के साथ नाम लिया जाता है उनमें महाराणा कुंभा अग्रगण्य है। महाराणा कुंभा ने 1468 ई0 तक मेवाड़ पर शासन किया था।
इनका दूसरा नाम कुंभकर्ण भी था, परंतु इतिहास में इन्हें महाराणा कुंभा के नाम से ही जाना जाता है। मेवाड़ के महाराणा वंश के यह अकेले ऐसे शासक हैं जिन्होंने 35 वर्ष की अवस्था में ही 32 नए दुर्गों का निर्माण करवाया था। महाराणा कुंभा के इस महान योगदान से पता चलता है कि वह अपनी किलेबंदी की योजना के प्रति कितने गंभीर थे ? वह जानते थे कि किले ही उस समय मजबूती का प्रतीक होते थे और किसी भी राज्य को स्थाई आधार देने में सहायक होते थे। इन 32 दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़, मचान दुर्ग, भौसठ दुर्ग और बसंतगढ़ महत्वपूर्ण हैं।
चित्तौड़गढ़ के आधुनिक निर्माता
महाराणा कुंभा ने चित्तौड़ के दुर्ग का भी पूरी भव्यता के साथ पुनर्निर्माण कराया था। इसीलिए उनको चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता भी कहा जाता है। 'वीर-विनोद' के लेखक श्यामलदस के अनुसार कुुुम्भा ने इन 32 दुर्गों का निर्माण कराया था ।उनके द्वारा इन किलों के भीतर मंदिरों का भी निर्माण करवाया गया था। उनके इस प्रकार के पुरुषार्थ से पता चलता है कि वह देश की रक्षा सुरक्षा के प्रति कितने गंभीर थे ? मुसलमानों की आक्रमणकारी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने उस समय राजपूत नीति को नई ऊंचाई प्रदान की थी। उन्होंने राष्ट्रवाद को मजबूत करने के लिए उस समय भारत के क्षत्रियों की एकता पर बल दिया था। जिससे कि विदेशी मुस्लिम शासकों का मिलकर सामना किया जा सके और उन्हें देश से बाहर खदेड़ने में सफलता प्राप्त हो सके। यह अलग बात है कि उनकी इस प्रकार की योजना को राष्ट्रव्यापी समर्थन प्राप्त नहीं हो सका परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उनके इस प्रयास और कार्य से कोई परिणाम ही नहीं निकला था? ऐसे प्रयासों का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है और इसे हम उनके शासनकाल में इस्लाम के अधिक विस्तार न लेने के रूप में देख सकते हैं।
चित्तौड़गढ़ के भीतर बना विजय स्तंभ महाराणा कुंभा की विजय कीर्ति का गुणगान आज भी कर रहा है। महाराणा कुंभा का यह विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर के रूप में विश्व विख्यात है। महाराणा कुंभा का यह विजय स्तंभ यह भी स्पष्ट कर देता है कि भारतवर्ष में इस प्रकार के विजय स्तंभ बनाने का प्रचलन प्राचीन काल से है। दिल्ली की कुतुबमीनार को भी भारतीय निर्माण कला का उत्कृष्ट उदाहरण मानकर इसी दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। जिसे भारत के लोगों ने वेधशाला के रूप में निर्मित किया था।
महाराणा कुंभा भारत के इतिहास में न केवल सैन्य संगठन के दृष्टिकोण से अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं अपितु उनके भीतर साहित्य साधना की भी एक अद्भुत प्रतिभा थी।
उन्होंने 'संगीत राज' की रचना की थी।महाराणा कुंभा ने अपने इसी प्रकार के साहित्यिक अनुराग का परिचय देते हुए चंडी-शतक एवं गीतगोविन्द आदि ग्रंथों की व्याख्या भी की थी।
कुंभलगढ़ की दीवार
महाराणा कुंभा ने चीन की दीवार के बाद संसार की सबसे लंबी दीवार का निर्माण भी किले के बाहर करवाया। इसे देखकर हर कोई आज भी आश्चर्यचकित रह जाता है। इससे महाराणा की स्थापत्य कला के प्रति रुचि का तो ज्ञान होता ही है ,साथ ही वह सुरक्षा के प्रति कितने गंभीर थे ? इस बात का भी पता चलता है। इस किले को कुंभलगढ़ के किले और दीवार को कुंभलगढ़ की दीवार के नाम से जाना जाता है। इस दीवार के निर्माण में उस समय 15 वर्ष का समय लगा था। चीन की दीवार को जहां चीन के तत्कालीन शासकों ने अपने कैदियों से जबरन निर्मित करवाया था और उन्हें उसका कोई पारिश्रमिक नहीं दिया था, वहीं महाराणा कुंभा ने इन्हें अपने श्रमिकों के माध्यम से बनवाया था और उन्हें उनका उचित पारिश्रमिक भी प्रदान किया था। इस प्रकार जहां चीन की दीवार में शोषण छिपा हुआ है, वहीं महाराणा कुंभा के द्वारा निर्मित कराई गई इस दीवार में पोषण छिपा हुआ है।
अपनी धार्मिक आस्था को प्रकट करते हुए इस किले के भीतर भी महाराणा कुंभा ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया था। किले के भीतर बने इन मंदिरों की संख्या 360 बताई जाती है। इन मंदिरों में लगभग 300 मंदिर जैन मंदिर के रूप में विद्यमान हैं।
महाराणा कुम्भा को इतिहास में अभिनवभृताचार्य, राणेराय, रावराय, हालगुरू, शैलगुरु, दानगुरु, छापगुरु, नरपति, परपति, गजपति, अश्वपति, हिन्दू सुरतान, नन्दीकेशवर, परम भागवत, आदि वराह जैसी उपाधियों से भी जाना जाता है।
पिता की हत्या का लिया प्रतिशोध
महाराणा मोकल सिंह के विषय में हम पूर्व में ही यह उल्लेख कर चुके हैं कि उनकी हत्या की गई थी। महाराणा मोकल सिंह के हत्यारे अभी खुले घूम रहे थे। उनका इस प्रकार खुला घूमना महाराणा कुंभा को बड़ा अखरता था। अपने पिता के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने वाले महाराणा कुम्भा के लिए यह बहुत आवश्यक हो गया था कि वह उनके हत्यारों से उनकी हत्या का प्रतिशोध ले। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए महाराणा कुंभा ने अपने कुछ विश्वसनीय साथियों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। जिसमें पिता के हत्यारों को समाप्त करने में वह बहुत अधिक सीमा तक सफल हो गया था।
प्रतिशोध लेकर किया, हत्यारों का नाश।
प्रजाहित शासन किया, काटे सारे पाश।।
महाराणा कुंभा ने राज्य सिंहासन पर विराजमान होते ही अगले 7 वर्षों के भीतर दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान सैयद मोहम्मद शाह और गुजरात के सुल्तान अहमद शाह को पराजित करने में भी सफलता प्राप्त की थी। इन दोनों मुस्लिम शासकों को पराजित करके इस वीर योद्धा ने हिंदुत्व और केसरिया ध्वज के सामने उनका सिर झुकवाया था अर्थात उन्हें भली प्रकार यह आभास हो गया था कि हिंदुत्व क्या है और भारत के वैदिक धर्मी हिंदू समाज के लोग अपने धर्म व संस्कृति के प्रति किस सीमा तक समर्पित हैं ?
मेवाड़ राज्य का विस्तार
सारंगपुर, नागौर, नराणा, अजमेर, मंडोर, मांडलगढ़, बूंदी, खाटू, चाटूस आदि के सुदृढ़ किलों को इन मुस्लिम शासकों से जीतकर महाराणा कुंभा ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। अपने पिता के हत्यारे चाचा व मेरा को उनके साथियों के सहित महाराणा कुंभा समाप्त करने में सफल हो गए थे, परंतु अभी महपा नाम का उनका शत्रु मारा जाना शेष था। वह महाराणा को चकमा देता हुआ इधर उधर भाग रहा था। अंत में वह सुल्तान महमूद खिलजी के यहां शरणागत हो गया। महमूद खिलजी ने भी उसे अपना पूरा संरक्षण दे दिया। हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि जहां कहीं भी किसी मुस्लिम शासक ने हिंदू समाज के महपा जैसे किसी भी व्यक्ति को शरण दी है, वहां उसने किसी भी प्रकार का मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए या मानवतावादी होकर ऐसा कार्य नहीं किया है अपितु उसने ऐसे व्यक्ति को उसके ही लोगों के विरुद्ध समय आने पर प्रयोग करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर ऐसा कार्य किया है।
जब महाराणा कुंभा को इस बात की जानकारी हुई कि उसके शत्रु को सुल्तान खिलजी ने शरण दे दी है तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। यह 1437 ई0 की घटना है जब महाराणा कुंभा ने अपने इस शत्रु को समाप्त करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर सारंगपुर पर हमला कर दिया। इस युद्ध में महाराणा कुंभा ने सुल्तान की ईंट से ईंट बजा दी थी और उसे पराजित करने के पश्चात मंदसौर और जावरा को भी जीत कर अपने राज्य में मिला लिया था। इतना ही नहीं, इस युद्ध में महमूद खिलजी को बंदी बनाकर चित्तौड़ ले आया गया था। क्या ही अच्छा होता कि हमारे महाराणा अपने इस शत्रु को सदा - सदा के लिए समाप्त कर देते, पर उन्होंने ऐसा न करके पृथ्वीराज चौहान वाली गलती को दोहरा दिया और उसे क्षमा करके अपनी कैद से मुक्त कर दिया। शत्रु को मुक्त करके राणा ने बड़ी भारी गलती कर ली थी।
किया विजय स्तंभ का निर्माण
सारंगपुर में मिली इस महत्वपूर्ण जीत के पश्चात ही महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ में स्थित विजय स्तंभ को निर्मित करवाया था। वास्तव में यह स्तंभ उनकी उस विजय का प्रतीक है जिसके पश्चात उन्होंने मान लिया था कि अब उन्होंने अपने पिता के हत्यारों पर विजय प्राप्त कर ली है ।
विजय का परतीक है, राणा का स्तंभ।
निज पताका गाड़ दी, शत्रु रह गया दंग।।
इसके साथ ही साथ उन शत्रुओं को भी वश में कर लिया है जो यहां पर अपना साम्राज्य विस्तार करते जा रहे थे । साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ अपने मजहब को भी प्रचारित - प्रसारित करते जा रहे थे।
विजय के प्रतीक विजय स्तंभ का निर्माण उसी वर्ष अर्थात 1437ई0 में ही संपन्न हो गया था। इस विजय स्तंभ की ऊंचाई 122 फीट और चौड़ाई 30 फीट है। यह नीचे से चौड़ा है, बीच में कुछ संकरा है और ऊपर जाते - जाते फिर से थोड़ा चौड़ा हो जाता है। यह भारत की स्थापत्य कला और कारीगरी का एक बेजोड़ नमूना है।
9 मंजिले इस विजय स्तंभ के ऊपर तक जाने के लिए 157 सीढ़ियों को बनाया गया है। महाराणा कुंभा के इस स्तम्भ को विष्णु ध्वज या विष्णु स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें वैदिक हिंदू धर्म के महापुरुषों, देवी - देवताओं की मूर्तियों को भी स्थापित किया गया है। जिनमें रामायण और महाभारत के पात्रों की अनेक मूर्तियों के साथ-साथ भगवान विष्णु के अवतार, हरिहर, ब्रह्मा, लक्ष्मी, नारायण, उमा, महेश्वर और अर्धनारीश्वर की मूर्तियां सम्मिलित हैं।
लोक कल्याण बनाम लूट कल्याण
इस प्रकार के कार्यों से पता चलता है कि महाराणा कुंभा के भीतर गुणों की खान थी। यदि सारे के सारे तथाकथित उदार मुगल बादशाहों को हमारे इस शासक के समक्ष एक साथ खड़ा कर दिया जाए तो भी उन सारों के सम्मिलित गुणों से अधिक गुण इसके भीतर होंगे। सबसे बड़ा गुण तो यही होगा कि महाराणा कुंभा ने जहां अपने देश के लोगों की भलाई के लिए काम किया और उनके शिक्षा स्वास्थ्य आदि पर एक योग्य शासक की भांति ध्यान दिया वहीं लुटेरे मुगलों ने लोक कल्याण के कार्यो पर ध्यान न देकर लूट कल्याण पर ध्यान दिया।
1459 ई0 में महमूद खिलजी ने महाराणा कुंभा की चित्तौड़ पर एक बार फिर चढ़ाई की, परंतु महाराणा ने उसे फिर मुंहतोड़ उत्तर दिया। इस बार पराजित हुआ सुल्तान खिलजी मांडू की ओर भाग गया था। इसके पश्चात सुल्तान खिलजी ने खींची चौहानों के अधीन रहने वाले गागरोन पर आक्रमण कर दिया। गागरोन के इस युद्ध में सेनापति दाहिर मारा गया और यहां पर खिलजी का आधिपत्य स्थापित हो गया। गागरोन विजय से उत्साहित होकर महमूद खिलजी ने मांडलगढ़ के किले पर आक्रमण किया। परंतु यहां उसे सफलता नहीं मिली यहां पर राणा कुंभा के साथ उसका युद्ध हुआ और उस युद्ध में महमूद खिलजी को एक बार फिर करारी पराजय का सामना करना पड़ा। 11 अक्टूबर 1446 ई0 को सुल्तान खिलजी ने एक बार फिर आक्रमण किया परंतु उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई।
महाराणा कुंभा के लिए सुल्तान खिलजी मोहम्मद गौरी बन चुका था। जिसने पृथ्वीराज चौहान को एक से अधिक बार चुनौतियां दी थीं। यद्यपि महाराणा कुंभा ने उस अधर्मी को हर बार परास्त किया। सुल्तान खिलजी ने अजमेर और मांडलगढ़ पर भी आक्रमण किया था। 1455 ईस्वी में महाराणा कुंभा के प्रतिनिधि के रूप में गजधर सिंह अजमेर में नियुक्ति पर थे।
जब सुल्तान खिलजी को यह पता चला कि राणा कुंभा इस समय कहीं दूर हैं तो उसने उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर अजमेर पर आक्रमण कर दिया, परंतु उसे यहां भी पराजय का ही मुंह देखना पड़ा। 1457 में महमूद खिलजी ने मांडलगढ़ पर हमला किया और उसे जीतने में सफल हो गया। जब राणा कुंभा को अपने गुजरात प्रवास के समय इस घटना की जानकारी मिली तो वह तुरंत वहां से लौट आये और मांडलगढ़ पर फिर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। बार-बार पिटते हुए सुल्तान महमूद ने इस बार जावर पर आक्रमण कर दिया। वीर महाराणा कुंभा और उनके सैनिकों ने यहां भी इस आक्रमणकारी को धूल चटाई।
फिरोज खान और महाराणा
महाराणा कुंभा के समय नागौर पर फिरोज खान नामक मुस्लिम शासक का शासन था। इस मुस्लिम शासक के 2 पुत्र थे जिनमें से एक का नाम मुजाहिद खान और दूसरे का शम्स खान था। अपने पिता की मृत्यु के उपरांत इन दोनों में भी उत्तराधिकार के लिए वैसा ही युद्ध आरंभ हो गया जैसा कि हर मुस्लिम शासक की मृत्यु के बाद हुआ होता था। शम्स खान ने इस युद्ध में महाराणा कुंभा से सहायता की प्रार्थना की। महाराणा ने भी अवसर को पहचान कर शम्स को गद्दी पर बैठा दिया। इसके बदले में महाराणा ने शम्स खान से यह वचन भी ले लिया कि भविष्य में जब भी महाराणा को आवश्यकता होगी, तब वह उनकी सहायता करेगा।
राजगद्दी पर बैठते ही शम्स खान महाराणा कुंभा को दिए हुए अपने वचनों से लौट गया। वास्तव में एक मुसलमान होने के कारण उससे ऐसी ही अपेक्षा भी की जा सकती थी। शम्स खान की कृतघ्नता को देखते हुए महाराणा कुंभा ने नागौर पर आक्रमण किया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद शम्स खान गुजरात की ओर भाग गया। गुजरात जाकर शम्स खान ने वहां के शासक कुतुबुद्दीन से अपनी पुत्री का विवाह किया और उससे मिलकर राणा कुंभा से बदला लेने का संकल्प लिया। इस बार राय रामचंद्र और मलिक गिदई के नेतृत्व में सुल्तान कुतुबुद्दीन ने एक बड़ी सेना महाराणा को परास्त करने के लिए भेजी। जिसके साथ शम्स खान भी था। दोनों ओर की सेनाओं में भयंकर जमकर संघर्ष हुआ। इस युद्ध में भी कुंभा की ही विजय हुई।

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।) 

“सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण”

 

डॉ विवेक आर्य, उगता भारत 

हिन्दू समाज में भी यही माना जाता है कि हिंदुस्तान में जितने भी मुस्लमान सूफी, फकीर और पीर आदि हुए हैं, वे सभी उदारवादी थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। वे भारतीय दर्शन और ध्यान योग की उपज थे। मगर यह एक भ्रान्ति है। भारत देश पर इस्लामिक आकर्मण दो रूपों में हुआ था। प्रथम इस्लामिक आक्रमणकर्ताओं द्वारा एक हाथ में तलवार और एक में क़ुरान लेकर भारत के शरीर और आत्मा पर जख्म पर जख्म बनाते चले गए। दूसरा सूफियों द्वारा मुख में भजन, कीर्तन, चमत्कार के दावे और बगल में क़ुरान दबाये हुए पीड़ित भारतीयों के जख्मों पर मरहम लगाने के बहाने इस्लाम में दीक्षित करना था। सूफियों को इस्लाम में दीक्षित करने वाली संस्था कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस लेख में हम ऐतिहासिक प्रमाणों के माध्यम से यह जानेंगे की सूफियों द्वारा
भारत का इस्लामीकरण किस प्रकार किया गया।
सूफियों के कारनामें
हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाने के लिए सूफियों ने साम-दाम, दंड-भेद की नीति से लेकर तलवार उठाने तक सभी नैतिक और अनैतिक तरीकों का भरपूर प्रयोग किया।
1. शाहजहाँ की मुल्ला मुहीबीब अली सिन्धी नामक सूफी आलिम से अभिन्नता थी। शाहजहाँ ने इस सूफी संत को हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने की आज्ञा दी थी[i]।
2. सूफी कादरिया खानकाह के शेख दाऊद और उनके शिष्य शाह अब्दुल माली के विषय में कहा जाता है कि वे 50 से 100 हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करते थे[ii]।
3.सूफी शेख अब्दुल अज़ीज़ द्वारा अनेक हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित किया गया[iii]।
4. सूफी मीरान भीख के जीवन का एक प्रसंग मिलता है। एक हिन्दू जमींदार बीरबर को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। उसने सूफी मीरान भीख से सजा मांफी की गुहार लगाई। सूफी ने इस्लाम कबूल करने की शर्त लगाई। हिन्दू बीरबर मुसलमान बन गया। सूफी ने इस्लाम की सेवा में उसे रख लिया[iv]।
5. दारा शिकोह के अनुसार सूफी शेख अब्दुल क़ादिर द्वारा अनेक हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया[v]।
6. मीर सैय्यद अली हमदानी द्वारा कश्मीर का बड़े पैमाने पर इस्लामीकरण किया गया। श्रीनगर के काली मंदिर को तोड़कर उसने अपनी खानकाह स्थापित करी थी। हिन्दू ब्राह्मणों को छलने के लिए हमदानी के शिष्य नूरुद्दीन ने नुंद ऋषि के नाम से अपने को प्रसिद्द कर लिया। नूरुद्दीन ने श्रीनगर की प्रसिद्द हिन्दू उपासक लाल देह के हिन्दू रंग में अपने को पहले रंग लिया। फिर उसके उपासकों को प्रभावित कर इस्लाम में दीक्षित कर दिया। उसके मुख्य शिष्यों के नाम बामुद्दीन, जैनुद्दीन, लतीफुद्दीन आदि रख दिया।ये सभी जन्म से ब्राह्मण थे[vi]।
सूफियों द्वारा इस्लाम की सेवा करने के लिए मुस्लिम शासकों को हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। जिससे हिन्दू तंग आकर इस्लाम ग्रहण कर ले।
1. अल्तमश द्वारा नियुक्त सुहरावर्दी ख़लीफ़ा सैय्यद नूरुद्दीन मुबारक ने इस्लाम की सेवा के लिए
– शरिया लागु करना।
-मूर्तिपूजा और बहुदेवतावाद को कुफ्र घोषित करना।
-मूर्तिपूजक हिन्दुओं को प्रताड़ित करना।
-हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों को दंड देना।
-किसी भी उच्च पद पर किसी भी हिन्दू को न आसीन करना[vii]।
2. बंगाल के सुल्तान गियासुद्दीन आज़म को फिरदवासिया सूफी शेख मुज्जफर ने पत्र लिख कर किसी भी काफिर को किसी भी सरकारी उच्च पद पर रखने से साफ़ मना किया। शेख ने कहा इस्लाम के बन्दों पर कोई काफिर हुकुम जारी न कर सके। ऐसी व्यवस्था करे। इस्लाम, हदीस आदि में ऐसे स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं[viii]।

3. मीर सैय्यद अली हमदानी द्वारा कश्मीर के सुलतान को हिन्दुओं के सम्बन्ध में राजाज्ञा लागु करने का परामर्श दिया गया था। इस परामर्श में हिन्दुओं के साथ कैसा बर्ताव करे। यह बताया गया था।
-हिन्दुओं को नए मंदिर बनाने की कोई इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को पुराने मंदिर की मरम्मत की कोई इजाजत न हो।
-मुसलमान यात्रियों को हिन्दू मंदिरों में रुकने की इजाज़त हो।
– मुसलमान यात्रियों को हिन्दू अपने घर में कम से कम तीन दिन रुकवा कर उनकी सेवा करे।
-हिन्दुओं को जासूसी करने और जासूसों को अपने घर में रुकवाने का कोई अधिकार न हो।
-कोई हिन्दू इस्लाम ग्रहण करना चाहे तो उसे कोई रोकटोक न हो।
-हिन्दू मुसलमानों को सम्मान दे एवं अपने विवाह में आने का उन्हें निमंत्रण दे।
-हिन्दुओं को मुसलमानों जैसे वस्त्र पहनने और नाम रखने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को काठी वाले घोड़े और अस्त्र-शस्त्र रखने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को रत्न जड़ित अंगूठी पहनने का अधिकार न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम बस्ती में मकान बनाने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम कब्रिस्तान के नजदीक से शव यात्रा लेकर जाने और मुसलमानों के कब्रिस्तान में शव गाड़ने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को ऊँची आवाज़ में मृत्यु पर विलाप करने की इजाजत न हो।
-हिन्दुओं को मुस्लिम गुलाम खरीदने की इजाजत न हो।
मेरे विचार से इससे आगे कुछ कहने की आवश्यता ही नहीं है[ix]।
4. सूफी शाह वलीउल्लाह द्वारा दिल्ली के सुल्तान अहमद शाह को हिन्दुओं को उनके त्योहार बनाने से मना किया गया। उन्हें होली बनाने और गंगा स्नान करने से रोका जाये। सुन्नी फिरके से सम्बंधित होने के कारण सूफी शाह वलीउल्लाह द्वारा शिया फिरके पर पाबन्दी लगाने की सलाह दी गई। शिया मुसलमानों को ताजिये निकालने और छाती पीटने पर पाबन्दी लगाने की सलाह दी गई[x]।
5. मीर मुहम्मद सूफी और सुहा भट्ट की सलाह पर कश्मीर के सुल्तान सिकंदर ने अनंतनाग,मार्तण्ड, सोपुर और बारामुला के प्राचीन हिन्दुओं के मंदिरों को नष्ट कर दिया। हिन्दुओं पर जज़िया कर लगाया गया। कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मणों को सरकारी पदों से हटाकर ईरान से मौलवियों को बुलाकर बैठा दिया गया[xi]।
सूफियों द्वारा हिन्दू मंदिरों का विनाश।
इतिहास में अनेक उदहारण मिलते हैं जब सूफियों ने अनेक हिन्दू मंदिरों का स्वयं विध्वंश किया अथवा मुस्लिम शासकों को ऐसा करने की प्रेरणा दी।
1. सूफी मियां बयान अजमेर में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के समीप रहता था। गुजरात से बहादुर शाह जब अजमेर आया तो सूफी मियां उससे मिले। उस समय राजगद्दी को लेकर गुजरात में अनेक मतभेद चल रहे थे। मियां ने बहादुर शाह की खूब आवभगत करी और उसे अजमेर को राजपूत काफिरों से मुक्त करने की गुजारिश करी। बाद में शासक बनने पर बहादुर शाह ने अजमेर पर हमला कर दिया। हिन्दू मंदिरों का सहार कर उसने अपने वायदे को निभाया[xii]।
2. लखनौती बंगाल में रहने वाले सुहरावर्दी शेख जलालुद्दीन ने उत्तरी बंगाल के देवताला (देव महल) में जाकर एक विशाल मंदिर का विध्वंश कर उसे पहले खानकाह में तब्दील किया फिर हज़ारों हिन्दू और बुद्धों को इस्लाम में दीक्षित किया[xiii]।
सूफियों द्वारा हिन्दू राज्यों पर इस्लामिक शासकों द्वारा हमला करने के लिए उकसाना
1. चिश्ती शेख नूर क़ुतुब आलम ने बंगाल के दिनाजपुर के राजा गणेश की बढ़ते शासन से क्षुब्ध होकर जौनपर के इस्लामिक शासक सुल्तान इब्राहिम शाह को हमला करने के लिए न्योता दिया। गणेश राजा ने भय से अपने बेटे को इस्लाम काबुल करा अपनी सत्ता बचाई[xiv]।
2. शेख गौस द्वारा ग्वालियर के किले को जितने में बाबर की सहायता करी गई थी[xv]।
3. शेख अहमद शाहिद द्वारा नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में हज़ारों अनुयाइयों को नमाज पढ़ने के बाद सिखों के राज को हटाने के लिए इस्लाम के नाम पर रजामंद किया गया[xvi]।
सूफियों का हिन्दुओं के प्रति सौतेला व्यवहार
हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के नाम से प्रसिद्द सूफियों का हिन्दुओं के प्रति व्यवहार मतान्ध और संकुचित सोच वाला था।
1. सूफी वलीउल्लाह का कहना था की मुसलमानों को हिन्दुओं के घरों से दूर रहना चाहिए जिससे उन्हें उनके घर के चूल्हे न देखने पड़े[xvii]। यही वलीउल्लाह सुल्तान मुहम्मद गजनी को खिलाफत-ए-खास के बाद इस्लाम का सबसे बड़ा शहंशाह मानता था। उसका कहना था की मुहम्मद के इतिहासकारों ने नहीं पहचाना की मुहम्मद गजनी की जन्मपत्री मुहम्मद साहिब से मिलती थी इसीलिए उसे जिहाद में आशातीत सफलता प्राप्त हुई[xviii]। हिन्दुओं पर अथाह अत्याचार करने वाले ग़जनी की प्रसंशा करने वाले को क्या आप हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक मानना चाहेंगे?
2. सूफी सुहरावर्दी शेख जलालुद्दीन द्वारा अल्लाह को हिन्दुओं द्वारा ठाकुर, धनी और करतार जैसे शब्दों का प्रयोग करने से सख्त विरोध था[xix]।
इस लेख के माध्यम से हमने भारत वर्ष के पिछले 1200 वर्षों के इतिहास में से सप्रमाण
कुछ उदहारण दिए है जिनसे यह सिद्ध होता हैं सूफियों का मूल उद्देश्य भारत का इस्लामीकरण करना था। अजमेर के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया, बहराइच के सालार गाज़ी मियां के विषय में कब्र पूजा: मूर्खता अथवा अन्धविश्वास नामक लेख में विस्तार से प्रकाश डाला जायेगा। आशा है इस लेख को पढ़कर पाठकों की इस भ्रान्ति का निवारण हो जायेगा की सूफी संतों का कार्य शांति और भाईचारे का पैगाम देना था।
References-
[i] Tabaqat-I-shahjahani, f.316b
[ii] supra, p.63, p.119-120
[iii]malfuzat-I-shah ‘abdu’l-’aziz, p.22)
[iv]History of Sufism in India by SAA Rizvi vol. 2 p.272-273
[v]Muhammad dara-shukoh, safinatu’l-auliya’, lucknow, 1872,p.69

[vi]सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण,पुरुषोत्तम पृष्ठ 28
[vii]tarikh-I firuz shahi, pp. 41-44
[viii]S.H.Askari- the correspondence of the fourteenth century Sufi saints of Bihar with the contemporary sovereigns of Delhi and Bengal, journal of the Bihar research society, march 1956,p.186-187
[ix]Zakhiratul-muluk, pp. 117-118
[x] Shah Waliu’llah dihlawi ke siyasi maktubat, aligarh, 1950, pp. 41-44, 2nd edition, Delhi 1969, p.5
[xi] HSI by SAA Rizvi, vol.1, pp.297
[xii] akhbaru’l-akhyar by Shaikh ‘abdu’l-haqq muhaddis dihlawi pp.291-292
[xiii] jamali, p.171
[xiv] tabaqat-I-akbari, 3,p.265; gulshan-I ibrahimi, pp. 296-207; ghulam hussain salim, riyazu’s- salatin, Calcutta, 1890, pp.108-110, maktubat-I ashrafi (letter to sultan Ibrahim)
[xv] Beveridge, a.s.tr.Babur-nama, 2, reprint, New Delhi, 1970, pp. 539-540
[xvi] Muhammad ja’far thaneswari, ed. Maktubat-Saiyid Ahmad shahid, Karachi, 1969.no.14, 16
[xvii] shah waliu’llah, hujjat Allah al – baligha, 1, Karachi, n.d. pp.468
[xviii] shah waliu’llah, qurr

4 साल के बेटे को टुकड़े-टुकड़े काटा, दिल निकाल कर बंदा बैरागी के मुँह में ठूँस दिया: मुगलों ने 700 बैलगाड़ियों में भरे सिखों के कटे सिर, दिल्ली में घुमाया

भारतवर्ष में एक से बढ़ कर एक योद्धा हुए हैं, जिनमें से अधिकतर के बारे में हमारे पाठ्य पुस्तकों में कुछ नहीं मिलता। योद्धा और संत बंदा सिंह बहादुर उनमें से ही एक हैं, जिनकी कहानी में न सिर्फ सिख खालसा की वीरता, बल्कि मुगलों की क्रूरता की भी दास्ताँ है। 15 वर्ष की उम्र में ही संन्यास ग्रहण करने वाले ‘लक्ष्मण दास’ ने लगभग दो दशक ‘माधव सिंह बैरागी’ के रूप में बिताया। गोदावरी नदी के किनारे स्थित नांदेड़ में उन्होंने अपना आश्रम स्थापित किया था।

बैरागी बन गए थे बंदा सिंह बहादुर, गुरु गोविंद सिंह ने दी खालसा की कमान

सन् 1670 के अक्टूबर में जन्मे बंदा सिंह बहादुर को ये नाम खालसा में शामिल होने के बाद मिला। हालाँकि, गुरु गोविंद सिंह ने उनका नाम ‘गुरबख्श सिंह’ रखा था। सन् 1708 में गुरु गोविंद सिंह ने बंदा सिंह बहादुर के आश्रम जाकर उनसे मुलाकात की थी, जिसके बाद बंदा सिंह बहादुर उनके शिष्य बन गए। खालसा में आते-आते ही बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के पटियाला में स्थित मुगलों की प्रांतीय राजधानी समाना पर नियंत्रण स्थापित कर इस्लामी आक्रांताओं में हड़कंप मचा दिया।
बंदा सिंह बहादुर के जीवन के बारे में हम बात करेंगे, लेकिन मुग़ल बादशाह फर्रुख सियर के राज में किस तरह उनकी हत्या की गई और सिखों का भयंकर कत्लेआम हुआ, उसके बारे में विस्तृत चर्चा आवश्यक है। बंदा सिंह बहादुर को जब मुगलों ने पकड़ लिया, तब उन्हें बाँध कर दिल्ली लाया गया। गुरदास नांगल के युद्ध में उन्होंने मुगलों से लोहा लिया था। लेकिन, उनके चमत्कार और पराक्रम के बारे में मुगलों ने इतना सुन रखा था कि उन्हें डर था कि कहीं रास्ते में वो भाग न जाएँ।

युद्धबंदियों के साथ मुगलों ने किया था कुछ ऐसा सलूक

एक मुगल अधिकारी ने तो यहाँ तक कहा कि वो खुद को उनके साथ ही रास्ते भर बाँध कर जाना चाहता है, ताकि जैसे ही वो भागें वो उनके शरीर में खंजर घुसा सके। उनके पाँव में बेड़ियाँ लगी हुई थीं। उनके गले में एक रिंग फँसाया गया था, उनके हाथ जंजीरों से बाँध दिए गए थे और उन्हें एक लोहे के पिंजरे में डाल दिया गया था। लोहे के पिंजरे से उन्हें 4 जगह बाँधा गया था। हाथी पर वो पिंजरा रखा हुआ था और उनके दोनों तरफ दो मुग़ल फौजियों को उनके साथ ही बाँधा गया था।
उनके साथ-साथ गाजे-बाजे के साथ एक मुग़ल दल चल रहा था। साथ ही फौजियों ने अपने-अपने भाले पर मृत सिखों के कटे हुए सिर लटका रखे थे, जिन्हें वो प्रदर्शित करते हुए चल रहे थे। सबसे पीछे मुगलों के अमीर, फौजदार और अन्य राजा लोग चल रहे थे। 780 अधमरे सिख बंदियों, 2000 कटे हुए सिर और 700 मालगाड़ियों में भरे हुए सिखों के कटे हुए सिर लेकर अब्दुल अस समद खान लाहौर की शाही सड़क में घुसा। इस जुलूस को देखने के लिए सड़क के दोनों तरफ एक बड़ी भीड़ थी।
अधिकतर कटे हुए सिरों से खून टपक रहे थे। उसने अपने बेटे ज़करिया खान और अमिन खान के बेटे कमरुद्दीन खान के साथ उन बंदियों को दिल्ली भेजा, क्योंकि उसे मुग़ल बादशाह की तरफ से वहीं रहने का आदेश आया था। ज़करिया खान को लगा था कि 200 युद्धबंदी बादशाह के सामने छोटी संख्या है, इसीलिए उसने पूरे पंजाब में सिखों के ‘शिकार’ का आदेश जारी किया। निर्दोष सिखों को पकड़-पकड़ कर लाया जाता और उनका सिर कलम कर दिया जाता।
इस तरह सिखों के कलम किए हुए सिरों से 700 मालगाड़ियों को भर दिया गया। सरहिंद में बंदा सिंह बहादुर और इन युद्धबंदियों को घुमाया गया, जहाँ सड़क के दोनों किनारे खड़े होकर मुस्लिम भीड़ उन्हें गंदी-गंदी गालियाँ दे रही थीं। जबकि सिख बंदी इस दौरान गुरु ग्रन्थ साहिब की पंक्तियाँ पढ़ रहे थे। जिस तरह मराठा सम्राट संभाजी का अपमान किया गया था, ठीक उसी तरह चीजें यहाँ भी हुईं। दिल्ली में बादशाह के सामने मुग़ल सरदारों ने अपनी क्रूरता की मिसाल पेश कर वाहवाही लूटी।
सबसे पहले बादशाह फर्रुख सियर के सामने 2000 सिखों के कटे हुए सिर बाँसों पर लटका कर पेश किए गए। उन सिखों के लंबे-लंबे बाल हवा से लहरा रहे थे। उसके बाद एक मरी हुई बिल्ली को पेश कर के बादशाह को बताया गया कि गुरदास नांगल के आसपास रहने वाले चौपाये जानवरों तक को नहीं बख्शा गया है। फिर बंदा सिंह बहादुर को पेश किया गया, जिन्हें जानबूझ कर मजाक बनाने के लिए सोने से जड़ी पगड़ी पहनाई गई थी।
इसके पीछे कई ऊँटों पर बाँध कर लाए गए सिख बंदियों को पेश किया गया। प्रमुख सिखों को भेड़ की खाल पहनाई गई थी, ताकि वो भालू की तरह लगें। सिख बंदियों के हाथ एक लकड़ी के साथ ठोक दिए गए थे। इस दौरान मुस्लिम भीड़ लगातार उन पर हँस रही थी। उन्होंने इसे ‘तमाशा’ नाम दिया था। मिर्जा मुहम्मद हैरसी नाम के एक व्यक्ति ने लिखा है कि कैसे मुस्लिम भीड़ ख़ुशी से नाच-गा रही थी। उसने लिखा है कि फिर भी सिख खुश थे और प्रार्थना कर रहे थे, कह रहे थे कि ये सब सर्वशक्तिमान ईश्वर ने ही लिखा है।
सिखों ने जवाब दिया कि भूख-प्यास और रसद न मिलने के कारण उनका ये हाल हुआ, वरना इससे पहले इतने युद्धों में उनकी क्षमताओं को लोग देख ही चुके हैं। बंदा सिंह बहादुर की पत्नी और उनके 4 साल के बेटे अजय सिंह के अलावा बच्चे की देखभाल करने वाली महिला को भी हरम में भेजा गया। लगभग 694 सिखों को हत्या के लिए सरबराह खान कोतवाल को सौंप दिया गया। मुग़ल सरदारों को उनकी कायरता का जम कर बादशाह ने इनाम दिया।
सिखों के पास संसाधन नहीं थे, ऐसे में मुगलों को आश्चर्य हो रहा था कि कैसे उन्होंने इतनी बड़ी इस्लामी फ़ौज से लगातार टक्कर लिया। 5 मार्च, 1716 को दिल्ली में सिखों का कत्लेआम शुरू हुआ। हर दिन 100 सिखों को पकड़ कर लाया जाता और उनका सिर कलम कर दिया जाता। कत्लगाह में जल्लाद अपनी तलवारों की धार तेज़ कर के रखते, सिखों को इस्लाम अपना कर मुस्लिम बनने को कहा जाता, लेकिन एक ने भी गुरु की राह से अलग जाना स्वीकार नहीं किया।
एक सप्ताह तक ये कत्लेआम चलता रहा। इसके गवाह रहे लोगों ने लिखा है कि सिख बलिदान देने के लिए एक-दूसरे से आगे जाने की होड़ में रहते थे और अंत समय तक उनके चेहरे पर उनकी मजबूती झलकती थी। सिर काट-काट कर उनके शरीरों को फेंक कर एक ढेर बनाया जाता और रात को उनकी सिर कटी हुई लाशों को पेड़ से टाँग दिया जाता था। इस दौरान एक विधवा की भी कहानी आती है, जिसका बेटा बंदियों में शामिल था।
उस युवक की अभी-अभी शादी हुई थी और हाथ के कंगन तक नहीं उतरे थे। माँ ने किसी तरह झूठ बोल कर बादशाह फर्रुख सियर से उसे छुड़ाने का आदेश ले लिया। उन्होंने कहा कि उनका बेटा गुरु का अनुयायी नहीं है और सिखों का बंदी था। लेकिन, बेटे ने इस आदेश के बावजूद अपनी माँ पर झूठ बोलने का आरोप लगाया और गुरु से धोखे की जगह बलिदान को चुना। उसने जल्लाद के सामने अपना सिर झुकाया और एक झटके में सिर कलम हो गया।

बंदा सिंह बहादुर के 4 साल के बेटे का दिल निकाल कर उनके मुँह में ठूँस दिया गया

इस दौरान 3 महीने तक बंदा सिंह बहादुर को प्रताड़ित किया जाता रहा। बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों को हत्या वाले दिन किले से बाहर लाया गया। इसके बाद सिख बंदियों को बहादुर शाह I की कब्र के साथ परेड कराया गया। बंदा सिंह बहादुर को अन्य कैदियों की तरह इस्लाम और मौत में से कोई एक चुनने को कहा गया, लेकिन गुरु गोविंद सिंह के चुने हुए सिपाही ने मृत्यु को चुना। इसके बाद जो हुआ, वो शरीर और आत्मा को कँपाने वाला है।
बंदा सिंह बहादुर के 4 साल के बेटे अजय सिंह को उनकी गोद में डाल दिया गया और उसकी हत्या करने को कहा गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद उनके सामने ही उनके 4 साल के बेटे को चाकू से टुकड़े टुकड़े में काटा गया और उसका दिल निकाल कर पिता बंदा सिंह बहादुर के मुँह में ठूँस दिया गया। वो स्थिर रहे, एक मूर्ति की तरह – इसे ईश्वर की इच्छा मान कर। फिर कसाई वाले चाकू से बंदा सिंह बहादुर की दाईं आँख को निकाल लिया गया, उसके बाद बाईं आँख काट कर बाहर कर दी गई।
फिर उनके दाएँ पैर को काट कर अलग कर दिया गया। उसके बाद उनके दोनों हाथों को काट कर उनके शरीर से अलग कर दिया गया। फिर उनके शरीर से मांस निकाले जाने लगे। उसके बाद उन्हें टुकड़ों में काटा जाने लगा। लेकिन, वो टस से मस नहीं हुए और अपना बलिदान दे दिया, पर इस्लाम नहीं अपनाया। उनके बाकी साथियों का भी यही हाल किया गया। औरंगजेब की क्रूरता सबने सुनी है, लेकिन बाकी मुगलो के अत्याचार उससे कम नहीं थे, उलटा हर एक इस्लामी शासक ने क्रूरता की पिछली सारी हदें पार की।