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पश्चिम बंगाल : ममता बनर्जी हमारी गौरवशाली सेना की भी विरोधी


किसी भी चुनाव में वोट करने से पहले जनता को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। जो पार्टियां मोदी विरोध करने में भारत विरोधी विदेशियों के हाथ की कठपुतली बन फौज और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्न खड़े कर संविधान की धज्जियाँ उड़ाती हो क्या ऐसी पार्टियां एक भी वोट की हकदार हैं? 2014 चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद से हमारी फौजें शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनी है पिछली सरकारों ने सिर्फ एक नाम के लिए फौज का जमावड़ा किया हुआ था। आज जब हमारी सेनाएं अपना पराक्रम दिखाती है विपक्ष फौजों का मनोबल गिराने का कोई मौका नहीं चुकती। फिर विपक्ष जनता को गुमराह कर कहता है कि संविधान से बंधे हैं, फौजों की ही वजह से हम चैन से अपने घरों में सो पाते हैं और जनता इनके मकड़जाल में फंस इनको वोट दे देती हैं। इतना ही नहीं, 2014 के बाद से भारत विरोधियों से मिली भीख पर जितने भी आन्दोलनजीवी सड़क पर उतर देश की शांति भंग करने की कोशिश की। लेकिन परमपिता परमेश्वर की कृपा से आन्दोलनजीवी ही नहीं इनके आका भी बेनकाब हो जाते हैं फिर भी हम इनको वोट देकर इनकी देश विरोधी हरकतों को गुप्त समर्थन दे देते हैं।      

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के बयानों को लेकर समय-समय पर राष्ट्रीय राजनीति में तीखी बहस छिड़ती रही है। खासतौर पर जब मनगढ़ंत और झूठ आरोपों का संबंध हमारी गौरवशाली भारतीय सेना, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र या संवेदनशील सुरक्षा मुद्दों से जुड़ता है, तब यह बहस और भी गंभीर हो जाती है। लोकतंत्र में सवाल उठाना और जवाबदेही मांगना स्वाभाविक है, लेकिन जब आरोपों की भाषा और संदर्भ देश की बहादुर सेना और उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालने लगें, तब यह विमर्श केवल राजनीतिक नहीं रह जाता। यह राष्ट्रीय मनोबल और संस्थागत भरोसे को डिगाने वाला बन जाता है। एक तरह से यह राष्ट्रद्रोह की सोच का शुरुआती चरण ही है। हाल के वर्षों में उनके कई बयान ऐसे रहे हैं, जिनमें उन्होंने सेना की कार्यशैली, केंद्र सरकार की सुरक्षा नीति और यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

मनगढ़ंत आलोचना-आरोपों से राजनीतिक हित साधने की चेष्टा
हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां सवाल पूछे जा सकते हैं। लेकिन सवाल पूछने और आरोप लगाने में फर्क होता है। जब कोई वरिष्ठ संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सेना जैसी संस्था पर टिप्पणी करता है, तो उसका प्रभाव सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं अधिक व्यापक होता है। इससे न केवल देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संदेश जाता है। राजनीति में तीखे आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एक न्यूनतम सहमति और संयम की अपेक्षा हमेशा रही है। जब यह सीमा टूटती है, तो राजनीतिक लाभ भले ही अल्पकालिक हो, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है। ममता बनर्जी के बयान इसी संदर्भ में हैं, जिनमें आलोचना और आरोप के साथ-साथ राजनीतिक हित साधने की चेष्टा ज्यादा है।

सेना की विश्वसनीयता पर सवाल: एक खतरनाक संकेत
जनवरी 2026 में ममता बनर्जी द्वारा भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने का आरोप लगाना एक गंभीर मामला बन गया। यह आरोप इतना संवेदनशील था कि सेना की पूर्वी कमान को राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी। सेना ने साफ तौर पर इन आरोपों को निराधार बताया। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना जैसी संस्था की निष्पक्षता और पेशेवर प्रतिबद्धता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। ऐसे में बिना ठोस प्रमाण के इस तरह के आरोप न केवल संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि जनता के बीच भ्रम भी पैदा करते हैं।

सेना को कार्रवाई से पहले मुझसे सलाह लेनी चाहिए- मुख्यमंत्री
सितंबर 2025 में ममता बनर्जी का यह कहना कि सेना को किसी भी कार्रवाई से पहले राज्य सरकार या पुलिस से सलाह लेनी चाहिए, एक अलग तरह का विवाद खड़ा करता है। भारतीय संविधान में सेना की भूमिका और उसके संचालन का स्पष्ट ढांचा है, जिसमें केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे में राज्य स्तर पर सैन्य निर्णयों को नियंत्रित करने की बात न केवल संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत प्रतीत होती है, बल्कि इससे सुरक्षा तंत्र की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठते हैं। उनका यह बचकाना बयान राजनीतिक असहमति से आगे जाकर संस्थागत सीमाओं को चुनौती देता नजर आता है।

हमले को “फासीवादी सर्जिकल स्ट्राइक” बताया
आतंकी हमलों के खिलाफ सेना की सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ न करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक को फासीवादी जरूर करार दिया। ममता का जनवरी 2020 में जेएनयू हिंसा के संदर्भ में “फासीवादी सर्जिकल स्ट्राइक” जैसे शब्दों का प्रयोग भी विवादों में रहा। “सर्जिकल स्ट्राइक” शब्द भारतीय सेना की एक विशेष सैन्य उपलब्धि से जुड़ा है, जिसे देश में गर्व के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सीएम ने इसे जेएनयू की ओछी राजनीति में इस्तेमाल किया। इस शब्द का राजनीतिक संदर्भ में नकारात्मक अर्थों में इस्तेमाल करना वाकई लोगों को आपत्तिजनक लगा। इससे यह सवाल भी उठा कि क्या राजनीतिक विमर्श में सैन्य उपलब्धियों की भाषा का इस तरह उपयोग उचित है?