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गुजरात : वक्फ संपत्ति घोटाला में सलीम, महमूद समेत 5 गिरफ्तार : उर्दू स्कूल के लिए मिली जमीन पर बनाई दुकानें, 20 साल तक वसूला लाखों का किराया

                वक्फ की 100 करोड़ की संपत्तियों पर 20 सालों से अवैध निर्माण (फोटो साभार : Opindia)
वक़्फ़ संशोधक बिल कानून बनने से सारे मुसलमानों में डर नहीं बल्कि डर सिर्फ उन्हीं को है जो वक़्फ़ की जमीन का दुरूपयोग कर किराया हज़ारों में देकर हर महीने करोड़ों कमा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले News18 पर एंकर लुबिका लियाकत मुस्लिम बहुल क्षेत्र में पहुँच उनसे वक़्फ़ कानून के बारे में पूछा तो पूरे शो में यही बात निकल कर आयी कि आम मुसलमान को वक़्फ़ नाम से वाकिफ नहीं। अब सवाल यह पैदा होता है कि सड़क पर उतर कर दंगा करने वाले गुंडे कौन हैं और किसके हाथ बिकाऊ हैं?  

अहमदाबाद में पाँच मुस्लिमों ने वक्फ बोर्ड की जमीन पर अवैध रूप से दुकानें खड़ी कर दीं। इसके बाद उन्होंने खुद को वक्फ का ट्रस्टी घोषित कर 2 दशक से उनका किराया वसूला। यह जमीन अहमदाबाद नगर निगम ने वक्फ बोर्ड को उर्दू स्कूलों के लिए दी थी लेकिन इन पर करोड़ों की दुकाने चल रही थीं। इस मामले में अब FIR दर्ज हुई है।

यह दुकानें अहमदाबाद के जमालपुर में थीं। यह मामला काँच वाली मस्जिद के पास स्थित वक्फ बोर्ड की उस भूमि से जुड़ा है। दरअसल, 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में यह स्कूल जर्जर हो गए थे और इन्हें तोड़ दिया गया था। इसके बाद यह जमीन खाली पड़ी थी।

इसी का फायदा उठाते हुए सलीम खान पठान नामक एक व्यक्ति ने उस जमीन पर 10 दुकानें बना लीं और उन्हें किराए पर उठा दिया। सलीम खान के साथ ही मोहम्मद यासर शेख, महमूद खान पठान, फैज मोहम्मद पीर मोहम्मद और शाहिद अहमद शेख ने ना केवल इन दुकानों से बल्कि वक्फ बोर्ड की लगभग 150 और संपत्तियों से भी पिछले 20 वर्षों से लगातार किराया वसूला।

यह सारा किराया वक्फ बोर्ड के आधिकारिक खाते में जमा होने के बजाय इन आरोपितों की निजी जेबों में जाता रहा, जिससे बोर्ड को करोड़ों रुपये का नुकसान भी झेलना पड़ा। इस व्यापक धोखाधड़ी की जानकारी वक्फ बोर्ड को तब हुई जब जमालपुर के एक रिक्शा चालक, मोहम्मद रफीक अंसारी ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई।

ऑपइंडिया से बातचीत में अंसारी ने बताया कि उन्होंने खुद गुजरात वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन लोखंडवाला को इस अवैध कब्जे की सूचना दी, लेकिन बोर्ड की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में इस मामले की पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई। पाँचों आरोपितों को इस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी मौजूद है।

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा वक्फ बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों की देखरेख में आता है। ऐसे में उनकी कार्यशैली पर प्रश्न उठ रहे हैं। इससे जुड़े लोगों ने पूछा है कि वक्फ की इतनी बेशकीमती जमीन पर अवैध निर्माण कैसे हो गया और कुछ बाहरी लोगों ने स्वयं को ट्रस्टी बताकर इतने लंबे समय तक किराया कैसे वसूला।

शिकायतकर्ता अंसारी ने यह भी आशंका जताई है कि इस गोरखधंधे में वक्फ बोर्ड के कुछ अंदरूनी लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिसके कारण उनकी शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई।अंसारी ने इस मामले में अहमदाबाद पुलिस की तत्परता की सराहना की है।

उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों, विशेष रूप से गोसाई साहब, ने उनकी शिकायत पर गंभीरता से ध्यान दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

वक्फ कानून के लिए पीएम मोदी का धन्यवाद: अंसारी

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने हाल ही में लागू हुए नए वक्फ अधिनियम का पुरजोर समर्थन किया है। उनका मानना है कि इस नए कानून के प्रावधानों के तहत सलीम खान पठान जैसे लोगों के लिए वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जा करना और वक्फ बोर्ड के लिए ऐसी गतिविधियों पर आँख बंद करना अब संभव नहीं होगा।
अंसारी ने इस कानून के लिए भाजपा सरकार की प्रशंसा भी की। शिकायतकर्ता ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि नए वक्फ एक्ट के कारण सलीम खान पठान जैसे लोग अब वक्फ की जमीनों पर कब्जा नहीं कर पाएँगे और वक्फ बोर्ड भी इस पर आंख मूंदकर नहीं रह पाएगा।
उन्होंने कहा, “गांधीनगर जाकर गुजरात वक्फ बोर्ड के चेयरमैन से शिकायत करने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं किया। अब अगर नए कानून आ गए तो कोई भी जबरदस्ती वक्फ की जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएगा। मैं इस कानून के लिए भाजपा सरकार की बहुत सराहना करता हूँ।”
इसके अलावा, शिकायतकर्ता को यह भी संदेह है कि सलीम खान पठान के साथ-साथ वक्फ बोर्ड के कुछ कथित ठेकेदार भी इस घोटाले में शामिल हो सकते हैं। इसीलिए वक्फ बोर्ड से शिकायत करने के बाद भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।
इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद पुलिस से संपर्क किया और अहमदाबाद पुलिस की तारीफ करते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी गोसाई साहब और अहमदाबाद पुलिस ने मेरी काफी मदद की है और ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।”

पहले कानून बनती तो नहीं होती गड़बड़ी

विडंबना है कि कुछ स्वार्थी तत्व वक्फ अधिनियम को लेकर मुस्लिमों को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए उकसा रहे हैं। अहमदाबाद में सामने आया यह करोड़ों का घोटाला ऐसे ही लोगों के स्वार्थों को उजागर करता है। यदि नया वक्फ (संशोधन) अधिनियम पहले ही लागू हो गया होता, तो इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश बहुत पहले हो गया होता।
यदि पहले यह संशोधन लागू कर दिया गया होता तो इन मुस्लिम ठेकेदारों की दुकानें बंद हो जातीं और करोड़ों की अवैध कमाई रुक जाती। यही कारण है कि वे इस नए कानून से नाराज हैं और इसे मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार का एक साधन बता रहे हैं। लेकिन, कानून का असल उद्देश्य यह है कि वक्फ की जमीनों का असल फायदा गरीब मुस्लिमों को मिले।
यदि नया कानून लागू हो जाता तो संपत्तियों के सर्वेक्षण और रजिस्ट्रार में बदलाव होता, राज्य और केंद्र में वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव होता, पिछड़े वर्ग के मुसलमानों और महिलाओं को भी बोर्ड में सदस्यता दी जाती और वक्फ और भूमि नियंत्रण की प्रक्रिया से लेकर उसकी देखरेख और वक्फ ट्रिब्यूनल में बदलाव किए जाते।
अगर ऐसा होता तो इस तरह के घोटाले बंद हो जाते और वक्फ बोर्ड के नाम पर गरीब मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होता। केवल 5-7 अधिकारी ही वक्फ संपत्तियों का उपयोग बंद कर देते और बड़ी मुस्लिम आबादी को इसका सीधा लाभ मिलता।
कानून लागू होने के बाद जो लोग अवैध संपत्ति अर्जित कर रहे थे, वे रुक जाएँगे। इसीलिए आज वक्फ एक्ट का विरोध हो रहा है। ताकि वे दोनों हाथों से वक्फ संपत्तियों को लूट सकें और घोटाले करके अपनी जेबें भर सकें।
हकीकत यह है कि ऐसे लोग नए वक्फ कानून पर इसलिए आपत्ति जता रहे हैं क्योंकि यह उन्हें ऐसी सम्पत्तियाँ हड़पने से रोकेगा। उन्हें ना तो गरीब मुसलमानों की परवाह है और न ही उनके मजहब की संपत्तियों की। उनकी एकमात्र चिंता यह है कि यदि कानून लागू हुआ तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी।
अहमदाबाद की इस घटना का निष्कर्ष यह है कि जहाँ बहुत अधिक संपत्ति होगी, वहाँ केवल 5-7 लोग ही वक्फ की जमीनों पर शासन करेंगे और संपत्ति को अपने पास रख लेंगे। गरीब मुस्लिमों साथ हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन किया है।

120 से ज्यादा स्मारक और देश की धरोहर पर वक्फ बोर्ड का कब्जे का दावा : संसदीय समिति के सामने ASI ने खोला चिट्ठा


सरकारी जमीनों और यहाँ तक कि हिंदुओं के गाँवों तक को मुस्लिमों की संपत्ति घोषित करने वाले वक्फ बोर्ड पर शिकंजा कसने के लिए केंद्र मोदी सरकार एक बिल लाई थी। इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया है। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने JPC को ऐसे 120 स्मारकों से अधिक दावा किया है, जो उसके अधीन है लेकिन वक्फ बोर्ड उस पर दावा करता है।

वक्फ (संशोधन) विधेयक की जाँच कर रही संयुक्त संसदीय समिति को ASI ने शुक्रवार (6 सितंबर 2024) के सामने बताया कि ये सभी स्मारक उसके संरक्षण में हैं, लेकिन विभिन्न राज्यों के वक्फ बोर्ड इन स्मारकों पर अपना दावा करते हैं। इनमें कुछ स्मारकों को ASI द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित करने के लगभग एक सदी बाद वक्फ की संपत्ति घोषित किया गया है।

इस सूची में महाराष्ट्र के अहमदनगर स्थित निजाम शाही को स्थापित करने वाले अहमद शाह की कब्र को शामिल किया गया है। इसे एएसआई ने 1909 में संरक्षित स्मारक घोषित किया था। वहीं, साल 2006 में इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया। वक्फ बोर्ड के इसी असीमित अधिकार को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली NDA सरकार संशोधन बिल लेकर आई है।

सूत्रों के मुताबिक, एएसआई के अधिकारियों ने बैठक में बताया कि वक्फ बोर्ड के साथ देश भर में 132 संपत्तियों को लेकर उनका विवाद है। दरअसल, यह सब कुछ वक्फ (संशोधन) कानून पर विचार करने के लिए बनाई गई जेपीसी की चौथी बैठक के दौरान शुक्रवार को हुई। ASI संस्कृति मंत्रालय के अधीन आता है। इसकी ओर से सचिव ने प्रतिनिधित्व किया। 

वहीं, इस बिल पर मुस्लिमों का पक्ष रखने के लिए जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया और इंटरफेथ कोलिशन फॉर पीस का प्रतिनिधित्व सैयद जफर महमूद ने किया। दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एवं एएमयू के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह तथा पैकियम सैमुअल भी संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए। तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड भी समिति के सामने पेश हुआ।

बैठक के दौरान भाजपा एवं ASI के साथ विपक्षी सदस्यों की जबरदस्त नोंक-झोंक हुई। इसमें ASI ने कहा कि वक्फ बोर्ड किसी भी संपत्ति पर अपना दावा कर सकता है। इसको लेकर विपक्षी सदस्यों ने ASI की आलोचना की। विपक्षी सदस्यों ने संस्कृति मंत्रालय पर समिति के सदस्यों को गुमराह करने और गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया।

सूत्रों ने कहा कि मुस्लिम निकायों ने इस विधेयक का विरोध किया और कहा कि यह मुस्लिम समुदाय के हितों के खिलाफ है। ASI ने कहा कि विभिन्न वक्फ निकायों ने उसके स्मारकों पर अतिक्रमण किया है और मदरसा-शौचालय जैसे निर्माण किए हैं। इसका कुछ विपक्षी सदस्यों ने विरोध किया कि और कहा कि ये सुविधाएँ मुस्लिमों के इबादत स्थलों में मौजूद होनी चाहिए।

मुस्लिम संगठनों ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने, कलेक्टर को ज्यादा अधिकार देने, वक्फ बाई यूजर को हटाने, वक्फ को संपत्ति दान करने के लिए 5 साल का प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होने की अनिवार्य शर्त जैसे कई प्रावधानों को पूरी तरह से गलत बताया। इसके बाद भाजपा सांसद ने कहा कि मुस्लिमों की धार्मिक पुस्तक कुरान में वक्फ का कहीं जिक्र नहीं है। इसलिए वक्फ बोर्ड गैर-इस्लामिक संस्था है।

भाजपा सांसद के बयान के बैठक में जबरदस्त हंगामा हुआ। भाजपा सांसद और असदुद्दीन ओवैसी के बीच इस पर तीखी नोक-झोंक भी हुई। वहीं, संस्कृति मंत्रालय ने इस दौरान समिति को 53 स्मारकों की प्रस्तुति दी। उसने कहा कि उसकी प्रस्तुति अभी पूरी नहीं हैं, क्योंकि देश भर से कई स्थानों से रिपोर्ट आनी बाक़ी है। इसलिए उसे आगे भी मौक़ा दिया जाए।

भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में संसद की संयुक्त समिति की बैठक में भाग लेने वाले सांसदों में भाजपा के निशिकांत दुबे, बृजलाल, तेजस्वी सूर्या और संजय जायसवाल शामिल थे। वहीं, कॉन्ग्रेस के गौरव गोगोई, मोहम्मद जावेद, सैयद नसीर हुसैन, इमरान मसूद, तृणमूल कॉन्ग्रेस के कल्याण बनर्जी, AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह मौजूद थे।

वक्फ बोर्ड को तेलंगाना हाईकोर्ट ने दिखाई औकात; 5-स्टार होटल मेरियट पर इस्लामी कब्जा करना चाहता था, 60 साल के बाद हाईकोर्ट से मिला ‘घंटा’


अपने ऊल-जुलूल फरमानों के लिए कुख्यात वक्फ बोर्ड का नया कारनामा सामने आया है। वक्फ बोर्ड ने हैदराबाद के एक नामी 5 स्टार होटल को ही अपनी जागीर घोषित कर दिया। होटल का नाम मैरियट है जिसे कभी वायसराय नाम से भी जाना जाता था। इस पर कब्ज़े के लिए बोर्ड ने होटल से बाकायदा लम्बी कानूनी लड़ाई भी लड़ी। आखिरकार तेलंगाना में वक्फ बोर्ड के तमाम मंसूबे धरे के धरे ही रह गए। हाईकोर्ट ने होटल को न सिर्फ बड़ी राहत दी है बल्कि वक्फ बोर्ड को मिसकंडक्ट (प्रतिकूल प्रविष्टि) भी थमा दी है।

लॉ बीट के मुताबिक इस मामले की सुनवाई तेलंगाना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायमूर्ति अनिल कुमार जुकांति की बेंच में हुई। सुनवाई इस मुद्दे पर थी कि होटल मेरियट आखिर है किस का?

साल 1964 में अब्दुल गफूर नाम के एक व्यक्ति ने तब वायसराय नाम से चर्चित इस होटल पर अपना हक जताते हुए मुकदमा कर दिया था। मुकदमे में वक्फ अधिनियम 1954 का हवाला दिया गया था, जिसकी वजह से होटल मेरियट की सम्पत्ति विवादित घोषित हो गई थी।

लगभग 50 वर्षों तक वक्फ बोर्ड ने यह मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझाए रखा। साल 2014 में एक बार फिर से तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड होटल मेरियट के खिलाफ सक्रिय हुआ। उसने एक अख़बार में नोटिस के माध्यम से होटल मेरियट को कानूनी कार्रवाई की धमकी दी।

वक्फ बोर्ड की कानूनी कार्रवाई की धमकी पर होटल मेरियट के संचालकों ने भी अदालत में जवाब दाखिल किया। इस जवाब में वक्फ पर पुराने अदालती आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। आखिरकार यह मामला हाईकोर्ट तक पहुँच गया।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। आखिरकार अंतिम फैसला होटल मैरियट के पक्ष में आया। अदालत ने वक्फ बोर्ड की याचिका को शुरुआत से ही गैरकानूनी माना। होटल के खिलाफ वक्फ बोर्ड की अधिसूचना को ख़ारिज करते हुए अदालत ने फैसला सुनाया। साथ ही वक्फ बोर्ड को मिसकंडक्ट जारी करते हुए भविष्य में सभी बेदखली के कामों को रोकने का आदेश दिया।