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इजिप्ट में महिलाओं के ‘हाइमेन रिपेयर’ को लेकर फतवा

                                      साभार प्रतीकात्मक 
इजिप्ट में एक नया इस्लामी फतवा जारी कर के महिलाओं को उनका हाइमेन ‘रिपेयर’ करने की अनुमति दी गई है, जिस पर विवाद छिड़ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं को आशंका है कि महिलाओं को विवाह पूर्व सेक्स के प्रति ललचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। इजिप्ट की सबसे बड़ी मजहबी संस्था ‘दर अल इफ्ता’ के ‘शरिया रिसर्च डिपार्टमेंट’ के निदेशक डॉक्टर अहमद मंदोह ने ये आदेश जारी किया।

उन्होंने कहा, “कुछ मामलों में पैचिंग की आवश्यकता होती है और ये वैध भी होता है। ये उन महिलाओं के लिए हैं, जिनका रेप हुआ है या फिर जो धोखा खाने के बाद पश्चाताप कर के फिर से रिश्ते बनाना चाहती हैं।” 30 अगस्त, 2021 को इस सम्बन्ध में फतवा जारी किया गया। इससे पहले 2015 में किए गए एक अध्ययन में कई पुरुषों से रिश्ते बनाने वाली महिलाओं को ‘हाइमेन रिपेयर’ की अनुमति का विरोध किया गया था।

इजिप्ट की सरकार का कहना है कि कुछ ऐसे मामले हैं, जिनमें शरिया के हिसाब से ‘हाइमेन रिपेयर’ की अनुमति नहीं है। लोगों ने पूछा था कि इस्लाम में ‘हाइमेन रिकंस्ट्रक्शन’ सर्जरी की अनुमति है या नहीं, जिसके जवाब में इजिप्ट की सर्वोच्च मजहबी संस्था ने ये फैसला सुनाया। लोगों का कहना है कि ‘Hymenoplasty’ से महिलाएँ शादी से पहले ज्यादा सेक्स करेंगी, क्योंकि शादी के समय उनके पास ‘क्विक फिक्स’ का तरीका होगा।

इजिप्ट के एग्जीक्यूटिव कानून के तहत ‘Hymenoplasty’ कराना या फिर करना, दोनों ही अवैध रहे हैं। इजिप्ट के प्राइवेट क्लीनिकों में इसके लिए व्यवस्था है, जिसका खर्च $1200 (88.23 हज़ार भारतीय रुपए) कम से कम आता है। इजिप्ट में ‘अक्षुण्ण हाइमेन’ को ‘शुद्धता और नैतिकता’ का प्रतीक माना जाता है। मुल्क में पिछले कुछ दिनों में उर्फी निकाह (गुप्त अपंजीकृत) में बढ़ोतरी हुई है, जिससे कई महिलाओं ने इस प्रक्रिया को अपनाया है।

ऐसे निक़ाहों में महिलाएँ अपना सब कुछ अपने पति को सौंप देती हैं, लेकिन पुरुष सिर्फ दोनों के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज को फाड़ कर तलाक ले सकता है। निकाह का यही एकमात्र सबूत होता है। ऐसी स्थिति में लड़कियाँ ‘Hymenoplasty’ करा कर किसी अन्य रिश्ते में बँध जाती हैं। कई लोगों ने नए फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि ऐसा काफी पहले हो जाना चाहिए था। हाल ही में इजिप्ट के एक टीवी शो में बताया गया था कि हाइमेन व वर्जिनिटी का कोई लेनादेना नहीं है।

मिश्र : जब अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाते हुए भीड़ ने ईसाई महिला को नंगा कर सड़क पर घसीटा

ईसाई वृद्धा को इंसाफ दिलाने की उठी माँग (फोटो साभार: barnabasfund)
साल 2016 में मिस्र (Egypt) की एक ईसाई वृद्धा के साथ बदसलूकी का मामला फिर तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। खबर है कि मिस्र में हमदा अल सवा नाम की एक पब्लिक प्रॉजिक्यूटर ने दोबारा इस केस पर गौर करने का निर्णय लिया है, जिसमें तीन मुस्लिम आरोपितों को 10 साल की सजा दिए जाने के बावजूद उन्हें आरोपों से रिहा कर दिया गया।

पूरी घटना काहिरा से 250 किमी दक्षिण में मिन्या प्रांत के अल करम सड़क की है। साल 2016 में 70 वर्षीय सुआद थबेट (Suad Thabet) और उनके पति अब्दु अयाद के घर पर 300 से ज्यादा कट्टरपंथियों ने हमला किया था। भीड़ को संदेह था कि एक मुस्लिम महिला के साथ वृद्ध दंपत्ति के बेटे का प्रेम प्रसंग है।

इस दौरान आतताई भीड़ ने सुआद को न केवल मारा-पीटा था बल्कि उन्हें नंगा करके सड़कों पर घसीटा भी था। इसी भीड़ ने कथित तौर पर अल्लाह हू अकबर चिल्लाते हुए उनके घर को लूटने के साथ-साथ 5 अन्य ईसाइयों के घरों को लूट कर आग के हवाले झोंक दिया था। बाद में इस केस में कार्रवाई हुई। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया। 

लेकिन, साल 2017 में यह पूरा केस ड्रॉप कर दिया गया। फिर पता चला कि साल 2020 के जनवरी माह में 3 आरोपितों को उनकी अनुपस्थिति में 10 साल की सजा सुनाई गई। लेकिन, हाल में खबर आई कि उन्हें भी रिहा कर दिया गया है।

विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद सुआद इतना टूट गईं कि जब तीनों आरोपितों को साल 2020 में रिहा किया गया तो वह कोर्ट के फैसले पर फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने पूछा, “आखिर उन लोगों को कैसे छोड़ा जा सकता है… प्रेसीडेंट अल सिसी ने मुझे न्याय दिलाने का वादा किया था, फिर कोर्ट ने कैसे कह दिया कि वो लोग निर्दोष हैं। मुझे लग रहा है मैं अब भी नग्न हूँ। अगर कुछ भी करके मुझे धरती पर न्याय नहीं मिलता तो मैं स्वर्ग में न्याय की प्रतीक्षा करूँगी।”

साल 2017 की एक विदेशी रिपोर्ट में महिला ने आपबीती साझा करते हुए कहा था, “हम लोग मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण वापसी घर नहीं जा पा रहे… सरकार ऐसे दमनकारियों को खुली सड़कों पर घूमने की छूट दे रही है। वह हमारा गाँव है। हम वहाँ पैदा हुए, बड़े हुए। आखिर हम पीड़ित कैसे हो सकते हैं कि अपने गाँव और घर न लौट पाएँ।”

आरोपितों की रिहाई के बाद सोशल मीडिया पर इस मामले के ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज उठाई। एक हैशटैग चलाकर पीड़ित महिला के लिए न्याय की गुहार लगाई जाने लगी। मॉनिका गेबरिल ने सुवाद को न्याय दिलाने के लिए लोगों से कहा कि वह उन्हें अपनी माँ की तरह समझें।

रमी ने भी मिस्र में आरोपितों की रिहाई के लिए पीड़ित वृद्धा से क्षमा माँगी और, “Egypt was naked” नाम से एक नया हैशटैग चालू किया।

मिस्र में ईसाइयों के साथ भेदभाव नई बात नहीं है। काहिरा और अलेक्जेंड्रिया जैसे बड़े शहरों में फिर भी यह सब कम है, लेकिन मिनिया जैसे प्रांतों में यह बहुत अधिक होता है, जहाँ ईसाई चारों ओर से बहुसंख्यक आबादी से घिरे हुए हैं।

कश्मीर पर शोर मचाने वाले चीन का असली चेहरा, उइगर मुसलमानों ने सुनाई जुल्मों की दास्तां

Chinaचीन में उइगर मुसलमानों पर अत्याचारों की बात किसी से छिपी नहीं है और अब दूसरे देशों में रह रहे उइगरों पर नकेल कसने की उसकी कारस्तानियां सामने आ रही हैं।  एक उइगर छात्र अब्दुलमलिक अब्दुलअजीज को मिस्र पुलिस ने गिरफ्तार किया और जब उसकी आंखों से पट्टी हटाई गई तो वह यह देखकर सकते में पड़ गया कि चीनी अधिकारी उससे पूछताछ कर रहे हैं।
उसे दिनदहाड़े उसके दोस्तों के साथ उठाया गया और काहिरा के एक पुलिस थाने में ले जाया गया जहां चीनी अधिकारियों ने उससे पूछा कि वह मिस्र में क्या कर रहा है। तीनों अधिकारियों ने उससे चीनी भाषा में बात की और उसे चीनी नाम से संबोधित किया ना कि उइगर नाम से।बता दें कि उइगर मुसलमानों की पहचान उजागर ना करने के लिए खबर में उनके छद्म नामों का इस्तेमाल किया गया है।
अब्दुलअजीज (27) ने कहा, ‘उन्होंने कभी अपना नाम नहीं लिया या यह नहीं बताया कि वे असल में क्या हैं।’ अब्दुलअजीज के खुलासों से 2017 में 90 से अधिक उइगरों की गिरफ्तारियों को लेकर नई जानकारियां सामने आ रही हैं। इनमें से ज्यादातर उइगर मुस्लिम तुर्किक अल्पसंख्यक समुदाय के थे। जुलाई 2017 के पहले सप्ताह में तीन दिन तक की गई कार्रवाई के बारे में उन्होंने नए खुलासे किए। वह उस समय दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सुन्नी मुस्लिम शैक्षिक संस्थान अल अजहर में इस्लामिक धर्मशास्त्र का छात्र था। उसने बताया कि मिस्र के पुलिसकर्मियों ने कहा कि ‘चीनी सरकार ने कहा है कि आप आतंकवादी हैं।’
हालांकि उन लोगों ने कहा कि वे केवल अल-अजहर के छात्र हैं। मिस्र में सबसे बड़े निवेशकों में से चीन एक है। वह मिस्र में बड़ी ढांचागत परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। दोनों देशेां के बीच व्यापार पिछले साल रिकॉर्ड 13.8 अबर डॉलर पर पहुंच गया।
इन कार्रवाइयों से महज तीन दिन पहले मिस्र और चीन ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पर एक सुरक्षा ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। नस्र सिटी में एक पुलिस थाने में पूछताछ के कुछ दिनों बाद अब्दुलअजीज को टोरा भेज दिया गया जिसे मिस्र की सबसे कुख्यात जेलों में गिना जाता है।
हिरासत में रहने के 60 दिन बाद रिहा करने पर वह अक्टूबर 2017 में भाग कर तुर्की चला गया जो उइगर प्रवासियों का हब है। वहीं, शम्स इद्दीन अहमद (26) नामक शख्स को नस्र शहर में चार जुलाई 2017 को मूसा इब्न नासीर मस्जिद के बाहर गिरफ्तार किया गया।
चीन के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र शिनजियांग में रहने वाले उसके पिता भी उस महीने लापता हो गए थे। उसने कहा, ‘मुझे अभी तक नहीं पता कि वह जिंदा है या नहीं।’ अहमद को भी टोरा ले जाया गया। उसने कहा, ‘मुझे वहां पहुंचने पर काफी डर लगा। वहां घुप्प अंधेरा था..मैंने सोचा कि कैसे हम कभी यहां से बाहर निकल पाएंगे। मुझे डर था कि वे हमें चीनी अधिकारियों को सौंप देंगे।’
वहां उइगरों को 45 से 50 व्यक्तियों के दो समूहों में बांट दिया और उन्हें हफ्तों तक बड़ी काल कोठरी में रखा गया। रिहाई से दो सप्ताह पहले उइगरों और विभिन्न अन्य चीनी जातीय वंश के चीनी मुसलमानों को तीन समूहों में विभाजित कर दिया गया और उन्हें कलर कोड दिए गए। लाल, हरे या पीले रंग से पता चलता था कि उन्हें प्रत्यर्पित किया जाएगा, रिहा किया जाएगा या उनसे और पूछताछ की जाएगी।
अहमद ने दावा किया कि 11 दिन की पुलिस हिरासत के दौरान तीन चीनी अधिकारियों ने उससे खासतौर से उसके पिता के बारे में पूछताछ की। उसने बताया कि उन्होंने पूछा कि उसके पिता कहां है और वे कैसे उसे पैसे भेजते हैं? अहमद हरे रंग के समूह में था जिसका मतलब था कि उसे रिहा कर दिया जाएगा। वह अक्टूबर 2017 की शुरुआत में इस्तांबुल भाग गया। पकड़े गए अन्य उइगरों की कहानी भी कुछ इस तरह की है।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि दस लाख से अधिक उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यक चीन में नजरबंदी शिविरों में रहते हैं जहां उन्हें राजनीतिक विचारधारा बदलने के लिए विवश किया जाता है। मिस्र के गृह मंत्रालय और काहिरा में चीनी दूतावास ने इन खबरों पर कोई टिप्पणी नहीं की है।