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‘जब कोरोना से लड़ रहा था देश, धर्मांतरण में लगे थे मुल्ला-मौलवी और ईसाई मिशनरी’: VHP का शंखनाद

देशभर में हो रहे धर्मान्तरण (Conversion) के खिलाफ जन जागरुकता फैलाने और अवैध धर्मान्तरण के खिलाफ कड़े कानून की माँग को लेकर विश्व हिंदू परिषद (Vishwa hindu parishad) ने सोमवार (20 दिसंबर 2021) से 11 दिवसीय अभियान की शुरुआत की है। इसको लेकर वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार (Alok kumar) ने कहा है कि अब समय आ गया है कि लालच, भय या धोखे से धर्मान्तरण करवाने वालों के खिलाफ कठोर कानून की व्यवस्था की जाए।

उन्होंने ये बात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कही। कुमार के मुताबिक, देश में मुल्ला-मौलवी और ईसाई मिशनरी धर्मान्तरण का षड्यंत्र चला रहे हैं। इसकी भीषणता को देखते हुए हमने फैसला किया है कि अभियान चलाकर मुल्ला-मौलवियों और ईसाइयों के षणयंत्रों को उजागर करेंगे। इसके तहत जनसभाएँ, सोशल मीडिया साहित्य बाँटकर जनजागरण किया जाएगा। ताकि इन लोगों के हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी कृत्यों को समझकर इस पर रोक लगाई जा सके। वीएचपी नेता ने कहा, “कोरोना के समय जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था और अधिकतर सामाजिक-धार्मिक संगठन सेवा के कार्यों में लगे थे, उस दौरान मौलवी और पादरी आक्रामक तरीके से धर्मान्तरण का काम कर रहे थे।”

आलोक कुमार ने आरोप लगाया कि ‘चंगाई सभा’ के नाम पर चर्च खुले आम धर्मान्तरण करवा रहे हैं। ये लोग भोले-भाले वनवासियों को ग्रामीणों और पिछड़े लोगों को टार्गेट कर रहे हैं। कुमार का कहना है कि मिशनरी खुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि कोरोना काल में जितने चर्च खोले गए, उतने तो बीते 25 सालों में भी नहीं खोले जा सके। लव जिहाद से पीड़ित हिंदू महिलाओं की प्रताड़ना, हत्या जैसी खबरें हर दिन सामने आती हैं। अवैध धर्मान्तरण के कारण भारत का विभाजन और उसके बाद करोड़ों हिंदुओं का नरसंहार, दंगे और आतंकवाद की पीड़ा से दो चार हो चुका हिंदू अब इन सारी चीजों को स्वीकार नहीं करेगा।

आलोक कुमार ने ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के धर्मान्तरण कराए जाने के षड्यंत्र का खुलासा किया और कहा कि संविधान के मुताबिक, अगर कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति धर्मान्तरण करता है तो उसे मिलने वाला विशेषाधिकार समाप्त हो जाता है। जबकि इसके उलट अनुसूचित जनजाति वालों के अधिकार धर्मान्तरण के बाद भी बने रहते हैं। इसी संवैधानिक गलतियों का फायदा ईसाई मिशनरी उठाते हैं। हालाँकि, जनजातियों का अपने धर्म के प्रति अटूट विश्वास ही है जो ढाई सौ सालों में हजारों करोड़ डॉलर खर्च करने के बाद भी अभी तक केवल 18% वनवासियों का धर्मान्तरण कराया जा सका है।

विहिप के कार्याध्यक्ष के मुताबिक, भारत में ज्यादातर धर्मान्तरण, बलपूर्वक, धोखे से या फिर लालच देकर करवाया गया है। यही वजह रही है देवल ऋषि, स्वामी विद्यारण्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद जैसे महापुरुषों धर्मान्तरण रोकने के सतत प्रयास किए हैं।

विश्व हिंदू परिषद ने 6 दिसंबर 2021 को देश में धर्मान्तरण के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़ने के अभियान को शुरू करने का ऐलान किया था।

5 साल से चल रहा था ईसाई धर्मांतरण का खेल

धर्मांतरण की साजिश रच रहे 50 लोग गिरफ्तार (साभार: दैनिक जागरण)
उत्तर प्रदेश के मऊ में रविवार 10 अक्टूबर 2021 को अवैध धर्मांतरण मामले में 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ईसाई मिशनरी पर प्रार्थना की आड़ में लोगों को बहला-फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन करने के आरोप लगाए गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मऊ के सहादतपुरा मोहल्ले में रोडवेज के पीछे एक घर में पिछले 5 वर्षों से प्रार्थना सभा के नाम पर धर्मांतरण की साजिश रच रहे लोगों को आज हिंदू जागरण मंच के पदाधिकारियों ने बेनकाब कर दिया। मौके पर पहुँची पुलिस ने प्रार्थना सभा में शामिल पादरी अब्राहम सहित मकान मालिक और लगभग 50 महिलाओं-पुरुषों को हिरासत में ले लिया। सभी को कोतवाली परिसर में लाकर पूछताछ की जा रही है।

पुलिस अधिकारी ने बताया, “हमें सूचना मिली है कि एक व्यक्ति ने अपने घर में ईसाई धर्म के लोगों को बुलाकर उन्हें दूसरा धर्म अपनाने के लिए कहा। इस मामले में FIR दर्ज़ करेंगे। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है।”

सहादतपुरा स्थित विजेंद्र राजभर के मकान में पादरी अब्राहम करीब 5 सालों से प्रार्थना सभा आयोजित कर रहा था। धीरे-धीरे यहाँ लोगों की संख्या बढ़ने लगी। इसकी सूचना जब हिंदू संगठनों तक पहुँची, तो उन्होंने इस रैकेट का भंडाफोड़ किया। हिंदू जागरण मंच के जिला प्रभारी भानु प्रताप सिंह एवं अन्य पदाधिकारियों का आरोप है कि यहाँ लोगों की बीमारियाँ दूर करने के लिए न केवल प्रार्थना, बल्कि धर्मांतरण की साजिश रची जा रही थी।

उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे यहाँ आसपास के गाँवों और कस्बे से लोग आने लगे थे। ये ज्यादा पढ़े-लिखे लोग नहीं थे, जिसकी वजह से ईसाई मिशनरी के झाँसे में आ गए। ईसाई धर्म से जुड़े लोग इन्हें आस्था एवं विश्वास के नाम पर गुमराह करते थे।

सीओ धनंजय मिश्र ने बताया कि धर्म परिवर्तन कराने की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। धर्मांतरण की पुष्टि होने पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। वहीं, पादरी अब्राहम का कहना है कि वहाँ किसी को जबरन नहीं बुलाया जाता था। लोग अपनी मर्जी से आते थे। यहाँ उनकी बीमारी दूर करने के लिए प्रार्थना की जाती थी।

मिश्र : जब अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाते हुए भीड़ ने ईसाई महिला को नंगा कर सड़क पर घसीटा

ईसाई वृद्धा को इंसाफ दिलाने की उठी माँग (फोटो साभार: barnabasfund)
साल 2016 में मिस्र (Egypt) की एक ईसाई वृद्धा के साथ बदसलूकी का मामला फिर तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। खबर है कि मिस्र में हमदा अल सवा नाम की एक पब्लिक प्रॉजिक्यूटर ने दोबारा इस केस पर गौर करने का निर्णय लिया है, जिसमें तीन मुस्लिम आरोपितों को 10 साल की सजा दिए जाने के बावजूद उन्हें आरोपों से रिहा कर दिया गया।

पूरी घटना काहिरा से 250 किमी दक्षिण में मिन्या प्रांत के अल करम सड़क की है। साल 2016 में 70 वर्षीय सुआद थबेट (Suad Thabet) और उनके पति अब्दु अयाद के घर पर 300 से ज्यादा कट्टरपंथियों ने हमला किया था। भीड़ को संदेह था कि एक मुस्लिम महिला के साथ वृद्ध दंपत्ति के बेटे का प्रेम प्रसंग है।

इस दौरान आतताई भीड़ ने सुआद को न केवल मारा-पीटा था बल्कि उन्हें नंगा करके सड़कों पर घसीटा भी था। इसी भीड़ ने कथित तौर पर अल्लाह हू अकबर चिल्लाते हुए उनके घर को लूटने के साथ-साथ 5 अन्य ईसाइयों के घरों को लूट कर आग के हवाले झोंक दिया था। बाद में इस केस में कार्रवाई हुई। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया। 

लेकिन, साल 2017 में यह पूरा केस ड्रॉप कर दिया गया। फिर पता चला कि साल 2020 के जनवरी माह में 3 आरोपितों को उनकी अनुपस्थिति में 10 साल की सजा सुनाई गई। लेकिन, हाल में खबर आई कि उन्हें भी रिहा कर दिया गया है।

विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद सुआद इतना टूट गईं कि जब तीनों आरोपितों को साल 2020 में रिहा किया गया तो वह कोर्ट के फैसले पर फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने पूछा, “आखिर उन लोगों को कैसे छोड़ा जा सकता है… प्रेसीडेंट अल सिसी ने मुझे न्याय दिलाने का वादा किया था, फिर कोर्ट ने कैसे कह दिया कि वो लोग निर्दोष हैं। मुझे लग रहा है मैं अब भी नग्न हूँ। अगर कुछ भी करके मुझे धरती पर न्याय नहीं मिलता तो मैं स्वर्ग में न्याय की प्रतीक्षा करूँगी।”

साल 2017 की एक विदेशी रिपोर्ट में महिला ने आपबीती साझा करते हुए कहा था, “हम लोग मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण वापसी घर नहीं जा पा रहे… सरकार ऐसे दमनकारियों को खुली सड़कों पर घूमने की छूट दे रही है। वह हमारा गाँव है। हम वहाँ पैदा हुए, बड़े हुए। आखिर हम पीड़ित कैसे हो सकते हैं कि अपने गाँव और घर न लौट पाएँ।”

आरोपितों की रिहाई के बाद सोशल मीडिया पर इस मामले के ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज उठाई। एक हैशटैग चलाकर पीड़ित महिला के लिए न्याय की गुहार लगाई जाने लगी। मॉनिका गेबरिल ने सुवाद को न्याय दिलाने के लिए लोगों से कहा कि वह उन्हें अपनी माँ की तरह समझें।

रमी ने भी मिस्र में आरोपितों की रिहाई के लिए पीड़ित वृद्धा से क्षमा माँगी और, “Egypt was naked” नाम से एक नया हैशटैग चालू किया।

मिस्र में ईसाइयों के साथ भेदभाव नई बात नहीं है। काहिरा और अलेक्जेंड्रिया जैसे बड़े शहरों में फिर भी यह सब कम है, लेकिन मिनिया जैसे प्रांतों में यह बहुत अधिक होता है, जहाँ ईसाई चारों ओर से बहुसंख्यक आबादी से घिरे हुए हैं।

देवी की प्रतिमा को पादरी ने बताया शत्रु की शक्ति, ईशु का नाम ले-लेकर लगा दी आग

अरुणाचल प्रदेश, देवी की प्रतिमा में आग
वायरल वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट
अरुणाचल प्रदेश में एक बार फिर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला सामने आया है। यहाँ पूर्वी कामेंग जिले (East kameng district unit) की कुछ धार्मिक व सांस्कृतिक संस्थाओं ने मिलकर सेप्पा के पेंटेकोस्टल चर्च के पादरी, चतुंग सोपुंग और तली लंगड़ो समेत अन्य लोगों पर एफआईआर दर्ज करवाई है।
एफआईआर में संस्थाओं ने आरोप लगाया है कि उक्त लोगों ने उनके समुदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हुए सर्वोच्च देवी की प्रतीक ऐन डोनई (ane donyi) (सूर्य की माता) के चिह्न को जलाया।

इस एफआईआर में संस्थाओं ने पादरियों के इस एक्शन को पूर्ण रूप से अरुणाचल प्रदेश की धार्मिक स्वतंत्रता की धारा 3, 4 और 5 का उल्लंघन बताया। साथ ही ये भी उल्लेख किया कि यह कृत्य आईपीसी की धारा 295 A और 298 समेत सभी शांति भंग करने वाले प्रवधानों का उल्लंघन है। इसलिए वह चाहते हैं कि इस मामले में शिकायत दर्ज करके उचित कार्रवाई हो।
उल्लेखनीय है कि यह मामला संज्ञान में आने के बाद इस संबंध में ऑपइंडिया ने एफआईआर करने वाले IFCSAP EK ईकाई के अध्यक्ष ख्या सोनम से बात करने की कोशिश की। मगर उन्होंने बैठक में होने का हवाला देकर फोन रख दिया। फिर, हमने अन्य संस्था NIFCS EK यूनिक के चेयरमैन कारलिंग डोलो को संपर्क किया। लेकिन, उन्होंने भी सवालों का जवाब नहीं दिया।
इसके बाद हमने सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही वीडियोज से जानकारी जुटाई। इसमें यह स्पष्ट दिखा कि किस प्रकार ईशु के नाम पर अन्य धर्म की भावनाओं का मजाक बनाया गया।
इस एफआईआर के अलावा सोशल मीडिया पर जो वीडियो सामने आई है। उसमें कुछ ईसाई जीसस के नाम पर ऐन डोनई के चिह्न व मूर्तियों को जलाते नजर आ रहे हैं। वीडियो में हम सुन सकते हैं कि पादरी कहता है कि ईशु के नाम पर हम सारे शत्रुओं की शक्तियों को कुचलते हैं। ईशु के नाम पर सारे मूर्तियों, दुष्ट प्रेत आत्माओं को जलाते हैं।
इसके बाद एक युवक सभी धार्मिक चिह्नों पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर उन्हें आग के हवाले कर देता है। सभी लोग उसपर घास-फूस डालकर इस कृत्य में अपना सहयोग देते हैं। पादरी लगातार देवी की मूर्ति और चिह्नों को जलाते हुए कहता रहता है कि यह सभी कुछ ईश्वर के नाम पर भस्म किया जाता है।
वीडियो में ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि जो चिह्म इस दौरान भस्म नहीं हो पाए, उन्हें भी आग में डाला गया ताकि वह भी आग की तपिश झेंलें। उनके ऊपर भी भूसा डालकर पूरी कोशिश हुई उन्हें जलाने की।
सोशल मीडिया पर इस कृत्य को सामने लाते हुए पाइ दवे नाम के यूजर ने लिखा है ऐसे ही वजहों से वे लोग अरुणाचल प्रदेश में फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट को सख्ती से लागू करने की वकालत करते हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएँ राज्य सरकार के पक्षतापूर्ण रवैये का परिणाम हैं। सोशल मीडिया यूजर लिखते हैं कि राज्य सरकार के लिए समय आ गया है कि वे स्वदेशी संस्कृति और परंपरा के संरक्षक के रूप में दिखावटी होने के बजाय पत्र और भावना में अधिनियम के कार्यान्वयन और क्रियान्वयन पर गंभीरता से विचार करें।