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साल भर सेक्युलरिज्म, दीवाली पर प्रदूषण: सरकारी आदेश जो हिन्दू त्यौहारों पर निकलता है, ‘ईद’ पर फाइलों में बंद रहता है

ईद वगैरह की बात और है, तब ये आदेश न तो फाइल से निकलता और न ही कुछ कहता (प्रतीकात्मक चित्र)
हिन्दू त्योहारों के दिन आने वाले हैं। हिन्दुओं के दिन नहीं आते इसलिए वे त्योहारों के दिनों से ही संतुष्ट हो लेते हैं। बस लफड़ा तब होता है जब इस संतुष्टि में भी सरकारी तंत्र, यंत्र घुसाकर प्रदूषण का लेवल नापना शुरू कर देता हैं। फिर नाप तौल कर कहते हैं- हमारे शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत गिर गया है। शहर चाहे जितना घटिया रहे पर उसका एयर क्वालिटी इंडेक्स चकाचक होना चाहिए। इधर इंडेक्स देखकर पढ़े-लिखे हिंदू को ‘गिल्टी’ निकल आती है और वो गिल्ट के मारे मरने की तैयारी करने में भी नहीं हिचकता।

फिर क्या, सोशल मीडिया की शरण में पहुँच रोना शुरू कर देता है; देखिए, ग्लोबल वार्मिंग आज सबसे विकट समस्या है। मेरी बात पर विश्वास न हो तो ग्रेटा थन्बर्ग पर विश्वास कर लो। उधर फेलो हिंदू पोस्ट को लाइक कर ग्रेटा के यूट्यूब वीडियो में डूब जाता है और उसके ‘हाउ डेयर यू’ पर मन ही मन पसेरी भर ताली पीट देता है।

सरकारी विभाग का हाथ बँटाने दिल्ली के मुख्यमंत्री खुद उतर पड़े हैं। बाकी कामों में वे गिर लेते हैं पर ऐसे कामों में उतर पड़ते हैं। वे दो दिनों से ट्वीट कर बता रहे हैं कि प्रदूषण के विभिन्न मानकों की वैल्यू कैसे बढ़ गई है। सरकार की वैल्यू चाहे जो हो, हिंदू त्योहारों में प्रदूषण की वैल्यू बढ़ जाए तो उन्हें चैन मिलता है और वे मन ही मन गाते हैं- अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार।

हिंदू त्योहारों पर पर्यावरण विभाग के साथ नेता भी चौकन्ने हो जाते हैं और साल भर सेकुलरिज्म को लेकर चिंतित नेताजी इन दिनों प्रदूषण को लेकर चिंतित रहते हैं। राजनीतिक दल और उनके नेताओं की चिंता यात्रा कुवार महीने में शुरू होकर कार्तिक में ख़त्म हो लेती है, क्योंकि आगे क्रिसमस खड़ा रहता है।

आदेश निकलने लगे हैं। सरकारी आदेशों ने भी निकलने के लिए यही मौसम चुन रखा है। सर्दी अधिक नहीं रहती कि ठिठुरना पड़े और खाँसी-जुकाम की नौबत आए। लिहाजा वे नंग-धड़ंग निकल लेते हैं। निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना सीना ताने टाइप। क्या कल्लोगे?

एक आदेश दिल्ली सरकार की फाइल से निकल कर विचरण कर रहा है। बता रहा है कि इस बार छठ पूजा सामान्य तरीके से नहीं मनाने देगा। अब पूजा है तो मनाने देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ईद वगैरह की बात और है। तब ये आदेश न तो फाइल से निकलता और न ही कुछ कहता। पर यहाँ छठ पूजा की बात है लिहाजा किसी ‘छठे’ हुए अफसर ने आदेश को बोल दिया है; जाओ और पूजा पर रोक लगाकर आ जाओ। निश्चिन्त होकर जाओ, कोई तुम्हारा कुछ नहीं कर सकता।

बीएमसी ने दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमा की लंबाई-चौड़ाई निर्धारित कर दी है। घर में पूजा करनी है तो दो फुट और सार्वजनिक पूजा में चार फुट से अधिक नहीं। मानों घरों में स्थापित प्रतिमा दो फुट तक की रही तो वायरस हाथ जोड़कर खड़ा हो जाएगा और कहेगा; हे जगत जननी दुर्गे, महिषासुर की छाती से त्रिशूल निकाल हमारी छाती में भोंक दें तो हमें मोक्ष मिले। तभी हम पृथ्वी छोड़ सीधा स्वर्ग जाएँगे और यहाँ वापस नहीं आएँगे। ये हिंदू लोग बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ बनाते हैं। तभी तो हमें गुस्से में चीन से निकलना पड़ा। छोटी प्रतिमाएँ बनाते तो हमें ये तांडव करने की जरूरत क्यों पड़ती?

सार्वजनिक पूजा मंडलों में प्रतिमा चार फुट तक की रही तभी मुंबई में कानून का राज वापस आ पाएगा और अनिल देशमुख, परमबीर सिंह और सचिन वाजे के कारण सरकार की जो किरकिरी हुई है उसका असर तभी कम होगा।

पश्चिम बंगाल सरकार ने फरमान सुना दिया है कि दुर्गा पूजा पंडालों में पिछले वर्ष के सारे प्रतिबंध इस वर्ष भी यथावत लागू होंगे। क्यों न हो? हिंदुओं पर प्रतिबंध न हो तो संविधान के प्री-एम्बल में जिस सेकुलरिज्म की रक्षा की शपथ ली गई है, वो बेचारा छटपटाता रहेगा। उसकी रक्षा का हर प्रयास हिंदुओं पर प्रतिबंध से शुरू होकर उसी में ख़त्म होता है।

वैसे उसकी रक्षा भले हिंदुओं पर प्रतिबंध से होती है पर उसे मजबूती चुनावी हिंसा से ही मिलती है। दरअसल चुनावी हिंसा से लोकतंत्र को जीवन मिलता है। कोरोना का भी मन बहलना चाहिए। ईद के दौरान इसलिए बाहर नहीं आ पाया था, क्योंकि उन दिनों सरकारी दल के कैडर हिंसा और बलात्कार करने सड़कों पर उतर आए थे और कोरोना को उनसे डर लग रहा था। इसलिए जिद करके बैठ गया था कि मनाएगा तो केवल दुर्गा पूजा, इसके लिए चाहे जो हो जाए।

पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने घोषणा कर दी है कि लोगों को रावण का पुतला जलाने नहीं दिया जाएगा। ये भी सही है। पुतले की रक्षा होनी ही चाहिए। एक दो ही तो बचे हैं। एक रावण और दूसरा… मेरा मतलब पुतलों की रक्षा आवश्यक है। वैसे भी कई बार पुतलों में पटाखे भर दिए जाते हैं और यह जरूरी है कि इस मौसम में दिल्ली में बहने वाली हवा की गुणवत्ता की टेस्टिंग होनी चाहिए। प्रदूषण का नहीं पता पर हिंदू कंट्रोल में रहता है।

दीपावली के पटाखों से कुत्तों को तकलीफ होती है, ऐसा सोशल मीडिया पर जोर-शोर के साथ बताया जाता है। कुत्ते सेंसिटिव होते हैं और तकलीफ के लिए हमेशा तैयार भी।

अब इन फरमानों का कितना हिस्सा कोरोना महामारी के चलते हैं और कितना अन्य कारणों से, यह पिछले वर्ष की भाँति ही इस वर्ष के लिए भी शोध का विषय होगा।

एक अफसर बता रहे थे कि; पर्यावरण और प्रदूषण की बात हिंदू त्योहारों के मौके पर इसलिए की जाती हैं क्योंकि हिंदू त्योहारों की परम्पराएँ पंद्रह सौ सालों से अधिक पुरानी हैं और पर्यावरण विभाग वाले इन त्योहारों और पंद्रह वर्ष से अधिक पुरानी गाड़ियों को एक जैसा समझते हैं। उन्हें किसी प्रखर बाबू ने बता दिया है कि भारतवर्ष में सारा प्रदूषण इन्हीं दोनों की वजह से फैलता है। अफसर बेचारा मंत्र पढ़े जा रहा है; पंद्रह सालों से अधिक पुरानी गाड़ी नहीं रहने देंगे और पंद्रह सौ सालों से अधिक पुराने त्यौहार!

दिल्ली : केजरीवाल सरकार ने RTI में ही खोल दी अपनी पोल : पर्यावरण के नाम पर वसूले 883 करोड़ रूपए , खर्चे बस 14 करोड़ रूपए


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

जब भी कोरोना पर केजरीवाल टीवी पर आते हैं, उनका यही कहना होता है "आपने मुझे अपने परिवार का सदस्य माना है, मेरी सलाह है कि जब भी घर से बाहर निकलें मास्क पहनकर निकलें..." आदि आदि। लेकिन अपने आपको सबके परिवार का सदस्य मानने वाला ही जब पर्यावरण के नाम पर मिले धन को कहीं और खर्च कर, दिल्ली वालों को उनके रहमोकरम पर छोड़ दे, क्या ऐसा आदमी परिवार का सदस्य हो सकता है? यही स्थिति कोरोना को भी लेकर है। जो आदमी मुंह में राम बगल में छुरी रखे वह आदमी क्या विश्वास के काबिल हो सकता है? क्या अब अभी भी दिल्ली मुफ्त की रेवड़ियां खाने के लालच में अपना और अपने परिजनों का जीवन संकट में डालेंगे? 
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार प्रदूषण की समस्या को लेकर कितनी ‘गंभीर’ है यह एक आरटीआई जवाब से फिर उजागर हुआ है। द संडे गार्जियन की खबर के अनुसार केजरीवाल सरकार ने बीते चार साल में पर्यावरण के नाम पर 883 करोड़ रुपए इकट्ठे किए हैं। लेकिन, प्रदूषण रोकने पर इस राशि का केवल 1.6 फीसदी ही खर्च किया गया है। यानी 883 करोड़ रुपए में से केवल 141,280,000 रुपए खर्च किए गए हैं।

यह चौंकाने वाला खुलासा दिल्ली सरकार के ट्रांसपोर्ट विभाग ने स्वयं संडे गार्जियन की आरटीआई के जवाब में किया है। विभाग द्वारा मुहैया करई गई जानकारी के मुताबिक दिल्ली सरकार ने साल 2017 में पर्यावरण कर के नाम पर 503 करोड़ रुपए, साल 2018 में 228 करोड़ रुपए और साल 2019 में 110 करोड़ रुपए इकट्ठा किए। इसके अलावा सरकार पर्यावरण उपकर के नाम पर साल 2020 में सितंबर तक 4 करोड़ रुपए जमा कर चुकी है।

रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण कर को दिल्ली सरकार क्षतिपूर्ति शुल्क के रूप में एकत्रित करती है। इसका एक बड़ा हिस्सा उन ट्रकों से लिया जाता है जो आए दिन दिल्ली में घुसते हैं और जिनके कारण प्रदूषण फैलता है। इस सूचना में आगे कहा गया है कि दिल्ली सरकार पर्यावरण उपकर का केवल बहुत छोटा हिस्सा सालों से प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल कर रही है।

आरटीआई यह भी बताती है कि दिल्ली सरकार ने पिछले चार सालों में सिर्फ 15 करोड़ 58 लाख रुपए पर्यावरण संरक्षण और साफ हवा के लिए खर्च किया है, जबकि साल 2017 में इकट्ठा हुए उपकर में से केजरीवाल सरकार ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया है।

साल 2018 के कर में से 15 लाख रुपए एनएमवी (नॉन-मोटर व्हीकल) लेन के सुधार और रखरखाव के लिए खर्च किए गए थे और शहर में मार्शल के रूप में नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों की तैनाती के लिए 43 करोड़ रुपए खर्च किया गया।

साल 2017 में आम आदमी पार्टी सरकार ने हाइड्रोजन पावर बस लाने का वादा किया था, लेकिन आरटीआई जवाब में बताया गया है कि साल 2019 तक इस पर सिर्फ 15 करोड़ खर्च हुआ है और 265 करोड़ रुपए दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट प्रणाली के सुधार के लिए खर्च किया गया है।

साल 2017 में द न्यूज इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक फंड का सही उपयोग न कर पाने के कारण AAP सरकार को कॉन्ग्रेस तक घेर चुकी है। कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने उस समय आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार फंड का सही प्रयोग नहीं कर पा रही है और न ही ट्रांसपोर्ट सुविधा सुधार रही है।

अब सोचने वाली बात है कि दिल्ली में आए दिन प्रदूषण के नाम पर पड़ोसी राज्यों को दोषी ठहराने वाली केजरीवाल सरकार का मकसद क्या है? आखिर क्यों हमें भ्रम में रख कर ऐसा दर्शाया जा रहा है कि सरकार प्रदूषण के लिए नित नए कदम उठा रही है, लेकिन उसे दूसरे लोग सहयोग नहीं कर रहे।

‘ऑड-ईवन’ से लेकर ‘रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ’ तक का आह्वान करवाने के लिए दिल्ली सरकार जोर-शोर से जनता के सामने विज्ञापन करती है। लेकिन ऐसे प्रयोगों के नतीजे जब देने होते हैं तो दिल्ली की जनता का आभार व्यक्त करके उससे उनका ध्यान भटका दिया जाता है। 

संडे गार्जियन की यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर क्यों प्रदूषण जैसी व्यापक समस्या से उभरने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए? आखिर क्यों आम आदमी पार्टी ने एक भी बार पर्यावरण के नाम पर इकट्ठा धनराशि का जवाब देना सही नहीं समझा? क्या केवल दिवाली पर पटाखे बैन से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या केवल ग्रीन दिल्ली एप लॉन्च करने से दिल्ली का AQI सुधर जाएगा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का दिल्ली सरकार से पूछना है कि आखिर जब इस तरह जनता के पैसे खाने थे तो फिर ऑड-ईवन का नाटक क्यों किया गया था? एक यूजर तंज कसते हुए कहता है कि 1% प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया, क्योंकि बाकी का विज्ञापन पर यूज होना था।


मोदी सरकार ने प्लास्टिक कचरे से सड़क बना बचाए 300,00,00,000 रूपए

प्लास्टिक कचरा, सड़क निर्माणमोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान को कुछ कदम आगे बढ़ाते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने प्लास्टिक कचरे का सदुपयोग करने की पहल शुरू की। जिस प्लास्टिक कचरे को असल स्वरूप में रिसाइकल नहीं किया जा सकता है उसका मंत्रालय सड़क निर्माण में उपयोग कर रहा है। इसके इस्तेमाल से अब तक करीब 1 लाख किलोमीटर सड़क तैयार हो चुकी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ अगले वित्तीय वर्ष तक सरकार इसकी रफ़्तार दोगुना करने की योजना बना रही है। 
सड़कें तैयार करने में प्लास्टिक कचरे के उपयोग का ऐतिहासिक निर्णय सबसे पहली बार साल 2015 में लिया गया था। केंद्र सरकार ने सड़क निर्माण से जुड़े लोगों को अधिसूचना जारी करके यह स्पष्ट कर दिया कि इस काम में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल अनिवार्य होगा। साल 2016 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस आदेश की आधिकारिक तौर पर घोषणा की। तब से लेकर अब तक 11 राज्यों की लगभग 1 लाख किलोमीटर लम्बी सड़कों में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो चुका है। 
पिछले दिनों आई रिपोर्ट के अनुसार 1 किलोमीटर सड़क निर्माण के दौरान लगभग 10 टन बिटुमिन की ज़रूरत पड़ती थी। केंद्र सरकार के प्लास्टिक उपयोग करने के आदेश के बाद इस प्रक्रिया में 9 टन बिटुमिन लगता था, यानी हर 1 किलोमीटर सड़क तैयार करने में 1 टन बिटुमिन की बचत होती है। 1 टन बिटुमिन की लागत लगभग 30 हज़ार रुपए तक आती है। इसका मतलब सरकार हर 1 किलोमीटर सड़क निर्माण में लगभग 30 हज़ार रुपए बचा रही है। 
प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल करके सड़क बनाने की प्रस्तावना मदुरै के थियागराजार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के प्राध्यापक पद्मश्री राजगोपालन वासुदेवन ने दी थी। उन्हें ‘प्लास्टिक मैन ऑफ़ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है, उनका कहना था कि प्लास्टिक की वजह से सड़क में गड्ढे नहीं होते हैं। यह सामान्य तरीके से बनाई गई सड़कों की तुलना में बाढ़ और अत्यधिक गर्मी झेलने में ज़्यादा कारगर साबित होते हैं।
इसके लिए सबसे पहले एक शहर का नगरीय निकाय पूरे शहर का कचरा इकट्ठा करता है फिर उस प्लास्टिक कचरे को तीन प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है, धुल कर उसकी सफाई, फिर धुलने के बाद उसे सुखाना और अंत में उसका चूरा बनाना। इसमें हर तरह का प्लास्टिक शामिल होता है। प्लास्टिक के कचरे को प्लांट में इतना महीन कर दिया जाता है कि यह 4 एमएम के टुकड़ों में नज़र आने लगता है। फिर प्लास्टिक के यह टुकड़े बिटुमिन के साथ मिलाए जाते हैं,  इसके बाद तार और कोल भी मिलाया जाता है। फिर इसे 160 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है। अंत में इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया जाता है। 
सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की पहल को मद्देनज़र रखते हुए प्लास्टिक कचरे की मदद से कई बेंच भी तैयार की थी। पिछले साल अक्टूबर महीने में पश्चिम रेलवे ने प्लास्टिक कचरे की मदद से मुंबई के चर्च गेट स्टेशन पर 3 बेंच तैयार की थी। पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक़ भारत में 24,940 टन कचरा प्रतिदिन उत्सर्जित होता है जिसमें से 60 फीसद रिसाइकिल कर लिया जाता है। शेष प्लास्टिक कचरा गड्ढों में दबा दिया जाता है, नालों में बहाया जाता है, समुद्र में जाकर प्रदूषण फैलाता है या जलाया जाता है जिससे वायु प्रदूषण होता है।   

फ़िल्म सिटी ने हड़प रखी है नेशनल पार्क की 51 एकड़ ज़मीन, Aarey पर विरोध करने वाला बॉलीवुड भी चुप

फ़िल्म सिटी, संजय गाँधी नेशनल पार्कआरे को हाईकोर्ट ने आधिकारिक रूप से जंगल मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद इसे लेकर महाराष्ट्र सरकार का विरोध कर रहे लोगों को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस विरोध प्रदर्शन में बॉलीवुड बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है। मनोज वाजपेयी और वरुण धवन जैसे अभिनेताओं से लेकर दिया मिर्जा और ऋचा चड्ढा जैसी अभिनेत्रियों तक ने आरे क्षेत्र में मेट्रो के लिए पेड़ों को काटे जाने का विरोध किया। एकाध कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने तो उस पेड़ को गले लगाया, जिन्हें काटा ही नहीं जाना है। हालाँकि, अक्षय कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े अभिनेताओं ने मेट्रो की महत्ता बताते हुए सरकार का समर्थन भी किया है।
इसी क्रम में एक दो वर्ष पुरानी ख़बर है, जो बॉलीवुड को अपने भीतर झाँकने पर मजबूर कर देगी। लक्ज़री गाड़ियों से घूमने वाले जिस बॉलीवुड के लोग मेट्रो प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, उसी बॉलीवुड के गढ़ को लेकर ऐसी सूचना आई थी, जिसे लेकर आज तक एक भी सेलेब्रिटी ने आवाज़ नहीं उठाई। मुंबई के गोरेगाँव में फिल्म सिटी और संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान स्थित हैं। जहाँ फ़िल्म सिटी के नाम से जाना जाने वाला ‘दादासाहब फाल्के नगर’ 1977 में बनाया गया था। यहीं ‘बोरीवली नेशनल पार्क’ भी है, जिसका नाम 1996 में ‘संजय गाँधी नेशनल पार्क’ कर दिया गया था।
फ़िल्म सिटी का निर्माण भले ही 1977 में हुआ लेकिन यहाँ दादासाहब फाल्के द्वारा निर्मित स्टूडियो पहले से ही था। यह 1911 से ही वहाँ स्थापित है। इसे 1977 में एक नया रूप-रंग दिया गया था।
संजय गाँधी नेशनल पार्क (जो तब बोरीवली नेशनल पार्क हुआ करता था) की अथॉरिटी का कहना है कि 1966 में ग़लती से उसके हिस्से की 51 एकड़ ज़मीन फिल्म सिटी को ट्रांसफर हो गई थी, जिसे अब तक नहीं लौटाया गया है। ‘वनशक्ति’ एनजीओ ने सूचना के अधिकार के तहत कुछ डॉक्युमेंट्स हासिल किए थे, जिससे पता चला कि 51 एकड़ की यह ज़मीन विवादित है क्योंकि फिल्म सिटी और नेशनल पार्क के बीच कोई बाउंड्री नहीं है। नेशनल पार्क के अधिकारियों का कहना है कि वे 1970 से लगातार फ़िल्म सिटी से मिन्नतें कर रहे हैं कि नेशनल पार्क की ज़मीन लौटा दी जाए।
अगस्त 2017 में भी इस सम्बन्ध में फिल्म सिटी से निवेदन करते हुए एक पत्र लिखा गया था। पार्क के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि फिल्म सिटी के लोगों की सुरक्षा के लिए भी यह ज़रूरी है क्योंकि जंगली जानवर उस क्षेत्र में स्वच्छंद घुमते हैं। बता दें कि फ़िल्म सिटी में आर्टिफिसियल झरने और जेल से लेकर वो सभी चीजें हैं, जिनकी बॉलीवुड फ़िल्मों की शूटिंग में आवश्यकता होती है। लगभग सभी बॉलीवुड फ़िल्मों का अधिकतर हिस्सा यहीं शूट किया जाता है। तब फ़िल्म सिटी ने ये ज़मीन लौटाने से मना कर दिया था और उन्होंने कहा था कि वे अपने निर्णय पर अडिग रहेंगे।
अगस्त 2017 में फ़िल्म सिटी में शूटिंग के दौरान कई लोगों पर जंगली जानवरों ने हमले किए थे। उसके बाद एक सप्ताह से भी अधिक समय तक इसे बंद रखा गया था। बावजूद इसके फ़िल्म सिटी ने नेशनल पार्क को ज़मीन लौटाने से इनकार कर दिया। ‘वनशक्ति’ के डायरेक्टर स्टालिन का कहना है कि संजय गाँधी नेशनल पार्क की ज़मीन के बड़े हिस्से को धोखाधड़ी के माध्यम से फ़िल्म सिटी को बेच डाला गया था। उन्होंने बताया कि इससे वन्य जनजीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। स्टालिन ने इसे लैंड स्कैम करार दिया।

पार्क के अधिकारी मानते हैं कि सर्वे नंबर में गड़बड़ी होने के कारण फ़िल्म सिटी को अतिरिक्त ज़मीन मिल गई। महाराष्ट्र सरकार ने 1969 में मुंबई इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MIDC) को 215 एकड़ ज़मीन दी थी। 1970 में आए एक सरकारी नोटिफिकेशन ने इसकी पुष्टि की। 
अक्टूबर 9, 2017 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इस ख़बर पर विस्तृत कवरेज की थी
इसके बाद 1977 में MIDC ने 245 एकड़ ज़मीन फ़िल्म सिटी को ट्रांसफर किया। बाद में फ़ैसला लिया गया कि फ़िल्म सिटी को 245 एकड़ की जगह 194 एकड़ ही ट्रांसफर किया जाएगा। इस तरह से बाकी के बचे 51 एकड़ ज़मीन को वन विभाग को वापस लौटाया जाना था।
ग़लती कहाँ हुई थी। 1970 के सरकारी नोटिफिकेशन में ग़लत सूचना दी गई थी। 1984 में एक दूसरा नोटिफिकेशन आया, जिसमें भूल-सुधार किया गया। दरअसल, 1970 के नोटिफिकेशन में ग़लती यह हुई थी कि 194 एकड़ को 215 एकड़ माप लिया गया था। एक गाँव का क्षेत्रफल ग़लत आँके जाने के कारण ऐसा हुआ। इस तरह से 245 एकड़ में से 194 एकड़ फ़िल्म सिटी को दिया जाना था और बाकी का 51 एकड़ वापस फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को लौटाया जाना था। फ़िल्म सिटी ने ये ज़मीन लौटाने से इनकार कर दिया और इसी कारण पिछले कई दशकों से नेशनल पार्क के साथ उसकी बाउंड्री अंतिम रूप नहीं ले सकी।
अगस्त 2017 में बाढ़ आने के कारण संजय गाँधी नेशनल पार्क के कई अहम दस्तावेज नष्ट हो गए। इस कारण इस मुद्दे को सुलझाने में और देरी हुई। दूसरी ओर, फ़िल्म सिटी के डिप्टी इंजीनियर चंद्रकांत ने कहा कि नेशनल पार्क की किसी भी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा नहीं किया गया है और कोई भी ज़मीन वापस नहीं लौटाई जाएगी। बॉलीवुड के लोगों ने भी पिछले 35 सालों से (जब नोटिफिकेशन में भूल-सुधार हुआ) इसे लेकर कोई आवाज़ नहीं उठाई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्यों न आरे जंगल बचाने के लिए पर्यावरण की चिंता करने वाले बॉलीवुड सेलेब्स अपने घर से ही शुरुआत करें?