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बेनकाब होता सिलेक्टिव लिब्रलिस्म

Shekhar Gurera's Cartoon for 1/27/2008
साभार 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सरकार की किसी भी नीति का विरोध करना गलत बात नहीं है, करना भी चाहिए, जिसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कहते हैं। लेकिन विरोध तर्कपूर्ण हो, जिसमें समाज भी अहित न हो, लेकिन विरोध इसलिए करना की हमने सरकार द्वारा देशहित में उठाये जाने वाले हर कदम का विरोध करेंगे ताकि हमारी कलाई न खुल सके। 
इन उदारवादियों ने अपने ही देश के गौरवमयी इतिहास को अपनी नीच सोंच के कारण धूमिल कर शर्मनाक काम किया है, जिसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा।  
आज हम उस समाज में जी रहे हैं जिसे अपने दोहरे चरित्र का प्रदर्शन करने में महारत हासिल है। वो समाज जो एकतरफ अपने उदारवादी होने का ढोंग करता है, महिला अधिकारों, मानव अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बड़े बड़े आंदोलन और बड़ी बड़ी बातें करता है लेकिन जब इन्हीं अधिकारों का उपयोग करते हुए कोई महिला या पुरूष अपने ऐसे विचार समाज के सामने रखते हैं तो इसी समाज को यह उदारवाद रास नहीं आता और इनके द्वारा उस महिला या पुरुष का जीना ही दूभर कर दिया जाता है। वो लोग जो असहमत होने के अधिकार को संविधान द्वारा दिया गया सबसे बड़ा अधिकार मानते हैं वो दूसरों की असहमती को स्वीकार ही नहीं कर पाते।
हाल ही के कुछ घटनाक्रमों पर नज़र डालते हैं:-
1.अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की एक छात्रा को सोशल मीडिया पर धमकी दी गई है कि यूनिवर्सिटी खुलने के बाद उसे जबरन पीतल का हिजाब पहनाया जाएगा। उसका कुसूर ये था कि उसने कॉलेज में छात्राओं को जबरन हिजाब पहनने के मसले पर अपनी राय रखी थी जिसके बाद स्नातक के एक छात्र ने उसके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए उसे धमकाया।
2.कुछ दिन पहले ही मुंबई स्थित मानखुर्द में एक हिंदू लड़की ने मस्जिद में अजान के समय लाउडस्पीकर से आने वाली आवाज से परेशान हो कर उनसे नियमों का पालन करने की गुजारिश की थी, तो उसे कट्टरपंथियों के गुस्से का सामना करना पड़ा था। 
निर्भया से आसिफा तक...उदारवादियों के सिलेक्टिव ...इतना ही नहीं, पुलिस और प्रशासन भी उन कट्टरपंथियों के आगे बेबस और बौना नज़र  रहा था।
3.जब इस लड़की के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक अन्य लड़की ने आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई तो उसे भी बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए उसका बलात्कार करने की धमकी तक दे दी गई। यह मामला इंदौर का है जहाँ इस लड़की की गुस्ताखी यह थी कि उसने उपर्युक्त लड़की के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक प्लेकार्ड की फोटो शेयर की थी जिसमें लिखा था कि अज़ान करो पर आवाज कम करो,लाउडस्पीकर से क्या साबित करना चाहते हो।लेकिन इन लड़कियों के समर्थन में कोई आवाज नहीं आई और ये अपनी लड़ाई में अकेली खड़ी हैं। दरसअल इन लड़कियों की गलती यह थी कि ये तीनों उन बातों को सच मान बैठी थीं जो इन्होंने तथाकथित उदारवादियों के मुँह से सुनी थीं। वो भूल गईं थीं कि भले ही इस देश का लोकतंत्र उन्हें “असहमत होने का अधिकार” देता है और इस देश का संविधान इन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी भी देता है लेकिन ये तथाकथित उदारवादीनहीं।क्योंकि इनका उदारवाद चयनात्मक है सार्वभौमिक नहीं। 
कुछ समय पहले इन्हीं शब्दों की आड़ में देश के लोकतंत्र की दुहाई देकर और संविधान की रक्षा के नाम पर CAA के विरोध में समुदाय विशेष की महिलाओं द्वारा अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन और धरना दिया जा रहा था जिसे देश भर में इन उदारवादियों का समर्थन प्राप्त था। तब उस प्रर्दशन के दौरान लोकतंत्र के नाम पर प्रदर्शनकारियों की तानाशाही और संविधान की रक्षा के नाम पर संविधान सम्मत कानून का गैरकानूनी विरोध पूरे देश ने देखा। इन महिलाओं को कड़क ठंठ में दूध पीते बच्चों को भी लाने का प्रलोभन दिया गया। लेकिन महिला अधिकारों लोकतंत्र में असहमत होने के अधिकार और संविधान द्वारा प्रदत्त विरोध करने के अधिकार के नाम पर प्रशासन के हाथ बांध दिए गए। 
Niti Central Archive on Twitter: "#Cartoon: by Manoj Kureel on ...
साभार 
इसी प्रकार दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों की साज़िश रचने के आरोप में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एक छात्रा को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। वो CAA विरोध प्रदर्शन में भी शामिल थी और उसे भी सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया था। उस समय उसके समर्थन में महिला अधिकारों की बात करने वालों की झड़ी लग गई थी। प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर एक महिला जो कि एक छात्रा भी है उसके साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ और उसके सम्मान के लिए आवाज उठाने वाले महिला और वामपंथी संगठन सामने आ गए थे। सही भी है चाहे वो अपराधी हो, पर महिला होने के नाते वो एक आत्मसम्मान की अधिकारी है जिसकी रक्षा किसी भी सभ्य समाज में की जानी चाहिए। लेकिन जब हिजाब के खिलाफ आवाज उठाने वाली छात्रा हो या लाउडस्पीकर पर अजान का न्यायसम्मत विरोध करने वाली महिला हो या फिर इसके समर्थन में उतरी एक अन्य छात्रा हो, इनके समर्थन में महिला अधिकारों की बात करने वाले उपर्युक्त किसी उदारवादी संगठन की कोई आवाज क्यों नहीं सुनाई दी। 
जिन वामपंथी संगठनों के महिला सशक्तिकरण के विषय में लंबे चौड़े भाषण विभिन्न मंचों पर अनेकों अवसरों पर देखे और सुने गए आज वो यथार्थ में बदलने के इंतजार में हैं।अगर आप सोच रहे हैं कि यह दोगला व्यवहार केवल महिलाओं के साथ किया जाता है तो आपको साल के शुरुआत में कन्नूर यूनिवर्सिटी में आयोजित भारतीय इतिहास कांग्रेस के मंच पर केरल के राज्यपाल आरिफ मुहमम्द खान के साथ इतिहासकार इरफान हबीब की बदसलूकी याद कर लेनी चाहिए।
24 मार्च 1943 को भारत के अतिरिक्त गृहसचिव रिचर्ड टोटनहम ने वामपंथियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ”भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा है कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, किसी के सगे नहीं हो सकते सिवाय अपने स्वार्थों के।” दरअसल जो वामपंथी मानवाधिकारों, दलित अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिला अधिकारों के नारे बुलंद करते हैं उनका सच यह है कि जब 1979 में उन्हीं की पश्चिम बंगाल में सरकार दलितों का भीषण नरसंहार करती है या 1993 में विरोध प्रदर्शन कर रहे युवा कार्यकर्ताओं पर खुले आम गोलियां चलवाती है जिसमें 13 लोग मारे जाते हैं या फिर जब बंगाल के वामपंथी कार्यकर्ता 2006 में तापसी मलिक नाम की एक नाबालिग लड़की का बलात्कार कर जला कर मार डालते हैं तो इनकी उदारवाद मानव अधिकार महिला अधिकार की बातें खोखले नारे बन कर रह जाते हैं। लेकिन अब शायद समय आ गया है जब इन उदारवादियों के सिलेक्टिव लिब्रलिस्म से पर्दा उठने लगा है।
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जनता भी अब इनके षड्यंत्रों को समझने लगी है। परन्तु पूर्णरूप से पर्दाफाश होने में अधिक नहीं कुछ समय जरूर लगेगा, तब तक हर शांतिप्रिय भारतवासी को संयम से काम लेना पड़ेगा। 2014 के चुनाव पूर्व तक देश में आतंकवादी घटनाओं को छुपाने ये ही उदारवादी "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से भारत ही नहीं समूचे विश्व को भ्रमित किया गया था, जिसमें हमारी मीडिया ने भरपूर साथ दिया। लेकिन सत्ता परिवर्तन होते ही उदारवादियों के चेहरों से छद्दम समाजवाद का नकाब हटना शुरू होने से हो रही बेचैनी दंगों, प्रदर्शन और धरनों के रूप में सामने आ रही है। 

‘भारत, इजराइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा’ : केंद्रीय मंत्री वीके सिंह

केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने मार्च 6 को कहा कि लोग चाहते हैं कि आतंकवादियों को निशाना बनाने में भारत, इजराइल के अनुरूप व्यवहार करें लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि वहां का विपक्ष भारत जैसा नहीं है और आपरेशन म्यूनिख जैसे कार्यों के संबंध में अपनी सेना पर सवाल नहीं उठाता, अपमानित नहीं करता. 
वीके सिंह ने अपने फेसबुक पोस्ट में सरकार के आलोचकों पर निशाना साधा जिसमें विपक्षी नेता, छात्र नेता, कार्यकर्ता, मीडिया आदि शामिल हैं . उन्होंने भारत के भीतर एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का आह्वान करते हुए दावा किया कि अगर ऐसा नहीं होता है तो डकैत, लूटने को तैयार हैं .
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‘लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए’ 
‘हिन्दुस्तान इजराइल क्यों नहीं बनता…’ शीर्षक से फेसबुक पोस्ट में वी के सिंह ने लिखा, ‘लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए. बस मोदी टैंक लेकर घुसें, और सब पाकिस्तानियों को ख़त्म कर दें. हम चाहते हैं, रातों रात इजराइल मोड में आ जाएं.’ उन्होंने आगे लिखा कि मोदी है, तो उन्हें पूरी अपेक्षा और विश्वास है कि बदला होगा, भीषण होगा, सौ गुना हाहाकारी होगा. पर भारत, इजराइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा. 

विदेश राज्य मंत्री ने कहा कि छोटे से इजराइल पर आस पास के 10 देश हमला कर दें, पर तब भी वह छः दिन के अंदर उन्हें धूल चटा कर वापस उन्हीं के घर में बिठा देता है. एक छोटे से देश पर कोई एक ग्रेनेड फेंकने से पहले 10 बार सोचता है, क्योंकि 10 गुना नुकसान वापस झेलना पड़ेगा.
‘क्योंकि इजराइल में कोई जेएनयू नहीं’ 
उन्होंने लिखा, सवाल है कि भारत इजराइल क्यों नहीं बन सकता? ‘क्योंकि इजराइल में कोई जेएनयू नहीं जहां इजराइल के युवा ‘इजराइल, तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगा सकें. इजराइल में कोई सरकार चुने जाने के दो महीने के अंदर किसी गंभीर आरोपों में घिरे किसी नक्सली को क्लीन चिट नहीं देती .’ 

पाकिस्तान में आतंकी शिविरों में वायु सेना के हमलों का सबूत मांगने वालों पर तंज कसते हुए सिंह ने कहा कि क्योंकि इजराइल जब ऑपेरशन म्यूनिख करता है तो वहां का विपक्ष सबूत मांग कर देश एवं सेना को अपमानित नहीं करता . उनका परोक्ष संदर्भ इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद द्वारा 1972 म्यूनिख ओलंपिक में आतंकी हमले में उसके दल कई सदस्यों की मौत में शामिल लोगों को मारने के छिपे अभियान के संदर्भ में था . 
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वीके सिंह ने यह पोस्ट ऐसे समय में लिखा है जब बालाकोट वायु सेना हमले को लेकर सरकार और विपक्षी दलों के बीच शब्दों के बाण तेज हो गए हैं . विपक्षी दल की ओर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत कुछ पार्टी नेताओं द्वारा हमले में आतंकवादियों के मारे जाने की संख्या संबंधी बयान के संबंध में सबूत मांगे जा रहे हैं . इस संबंध में एक ट्वीट में वी के सिंह ने कहा, ‘रात 3.30 बजे मच्छर बहुत थे, तो मैंने हिट मारा . अब मच्छर कितने मारे, ये गिनने बैठूँ, या आराम से सो जाऊं?’ 
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Image result for फौज का गुंडा‘वहां के पत्रकार आंतकियों के लिए मानवाधिकार का रोना नहीं रोते’ 
वहीं, फेसबुक पोस्ट में सिंह ने कहा कि क्योंकि वहां (इजराइल) के पत्रकार आतंकियों के लिए मानवाधिकार का रोना नहीं रोते हैं. और ना ही वहां के पत्रकार आतंकी को आतंकवादी कहने के बजाय चरमपंथी या उग्रवादी कहते हैं . क्योंकि इजराइल के कोई जाट, गुर्जर, मराठा वहां की किसी सार्वजनिक सम्पत्ति को नहीं जलाते. वहां देश सर्वोपरि होता है, जाति या धर्म नहीं.

Image result for फौज का गुंडा Image result for फौज का गुंडाकेंद्रीय मंत्री ने कहा कि क्योंकि वहां के नेता, सेनाध्यक्ष को कुत्ता, गुंडा नहीं कहते. वहां करदाताओं के पैसों पर पढ़ने वाले शेहला रशीद या कन्हैया कुमार जैसे जोंक नहीं है . वहां के अभिनेता अपनी धरती पर जहां वो पैदा हुए हैं, जहां वो सफल हुए हैं, उस पर शर्मिंदा नहीं होते. असहिष्णुता का नाटक नहीं करते.
विपक्षी दलों पर परोक्ष तंज कसते हुए सिंह ने कहा कि वहां लोग नेतन्याहू या उसकी पार्टी का विरोध करते करते इजराइल विरोधी नहीं हो जाते. यहाँ आपको सैकड़ो मिलेंगे जिनके मन में एक अजीब सी खुशी है कि बस इसी बहाने मोदी, भाजपा पर कीचड़ उछालेंगे, कि बहुत कूद रहे थे कि कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ.
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार पूर्व सेना प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्व...

उन्होंने कहा कि क्योंकि वहां के नेता देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के पीछे नहीं खड़े होते, और ना ही वहां की जनता किसी बात के लालच में आकर ऐसे नेताओं के पीछे खड़ी होती है. उन्होंने कहा कि वहां का विपक्ष अपने धुर विरोधी ईरान में जाकर ये नहीं कहता कि आप नेतन्याहू को हटाने में हमारी मदद करो .