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वामपंथ का प्रचार बंद करो नहीं तो नौकरी छोड़ दो : टिम डैवी, बीबीसी नए डायरेक्टर जनरल

बीबीसी के नए डायरेक्टर जनरल का ऐलान
बीबीसी के नए डायरेक्टर जनरल टिम डैवी
ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी (बीबीसी) के नए डायरेक्टर जनरल टिम डैवी मशहूर वामपंथी नेटवर्क की ज़िम्मेदारी सँभालने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने विचारधारा प्रेरित कर्मचारियों से भी साफ़ कह दिया है कि या तो वह अपना नज़रिया बदल लें या नौकरी से इस्तीफ़ा दे सकते हैं। ख़बरों के मुताबिक़ बीबीसी के नए मुखिया टिम ने वादा किया है कि बीबीसी में बड़े पैमाने पर बदलाव होंगे। 
साथ ही कर्मचारियों से कहा कि जितने भी लोग किसी भी तरह की विचारधारा से प्रेरित हैं वह अपना नज़रिया बदल लें या वह नौकरी छोड़ सकते हैं। कार्डिफ के बीबीसी दफ्तर में बोलते हुए टिम ने कहा, “अगर कोई कर्मचारी किसी विचारधारा प्रेरित स्तंभकार बनना चाहता है या सोशल मीडिया पर किसी विचारधारा के लिए कैम्पेनर की तरह काम करना चाहता है, तो यह उनकी निजी पसंद हो सकती है लेकिन ऐसे लोग अब बीबीसी में काम नहीं कर सकते हैं।”
टिम डैवी ने अपने उन कर्मचारियों पर कार्रवाई का ऐलान किया है जो सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करेंगे। ऐसा बताया जा रहा है कि यह बदलाव इसलिए किए जा रहे हैं जिससे बीबीसी की निष्पक्ष छवि बने। टिम ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के संबंध में बीबीसी के कर्मचारियों के लिए दिशा निर्देश जारी किया गया है। सभी कर्मचारियों को इसका पालन करना होगा। 
इसके बाद टिम ने कहा अब बीबीसी के लिए निष्पक्ष बने रहना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। साथ ही बीबीसी पर तमाम विचारधाराओं के नेता आरोप लगाते हैं कि उसका रवैया पक्षपाती और भेद करने वाला है। टिम के मुताबिक़, “बीसीसी सिर्फ विचारधारा से प्रेरित रहने वाले पत्रकारों और स्तंभकारों का संस्थान नहीं है। संस्थान के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती है खासकर निष्पक्ष चर्चाएँ और नस्लभेद जैसे मुद्दों का विरोध। हमारा उद्देश्य राजनीतिक झुकाव से हट कर आगे बढ़ना होगा। हम किसी के एजेंडा का प्रचार नहीं कर सकते सिर्फ सच सामने लाना होगा।”
उन्होंने कहा, “फेक न्यूज़, सोशल मीडिया कैम्पेन, विचारों का शोर और मीडिया संस्थानों के झुकाव जैसे वक्त में हमें अपना काम सही से करना होगा। हमें पूरे देश के लिए ख़बरें तैयार करनी हैं न कि एक ख़ास वर्ग या समूह के लिए। बीबीसी पर हमेशा से आरोप लगते रहे हैं कि वह वामपंथ से प्रेरित है या वामपंथ का पक्ष लेता है। इस तरह के आरोप सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लगाए जाते हैं।” इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए टिम ने यह आदेश जारी किया। 
बीबीसी पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह सिर्फ लंदन के संभ्रांत वर्ग के लिए ख़बरें तैयार करता है। इस पर टिम ने कहा, “मैं इस तरह के आरोप आने वाले समय में नहीं सुनना चाहता कि बीबीसी सिर्फ एक विशेष वर्ग के लिए खबरें प्रकाशित करता है।”
इसके बाद टिम ने इस बात का भी दवा किया कि बीबीसी निष्पक्षता के लिए समर्पित रहेगा। इस पर टिम ने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा, “मैं हमारे रवैये में बड़े पैमाने पर बदलाव चाहता हूँ वह चाहे आंतरिक हो या बाहरी। लोगों के बीच यह संदेश जाना चाहिए कि हम उनके लिए काम कर रहे हैं न कि किसी विचारधारा के लिए।” 

हिन्दुओं, ब्राह्मणों, प्राचीन इतिहास की घृणा से सनी हैं ‘विश्व बुक्स’ की किताबें

विश्व बुक्स, हिन्दूघृणा
हमारे देश में कई ऐसी पुस्तकें लिखी जाती हैं, जिनमें हमारी अपनी ही विरासत का मखौल उड़ाया जाता है। इनमें से एक ‘विश्व बुक्स’ प्रकाशन संस्थान भी है, जिसकी किताबें हिंदुत्व का मजाक बनाने के लिए ही लिखी जाती हैं। ‘विश्व बुक्स’ की अधिकतर पुस्तकें बच्चों और छात्रों के लिए लिखी जाती है। वो लोग ही इसे ज्यादा पढ़ते हैं। कई पुस्तकें वयस्कों के लिए भी हैं। इनमें से अधिकतर हिन्दूघृणा से सनी हुई किताबें हैं।
उदाहरण के लिए इसके एक किताब का शीर्षक देखिए- “धार्मिक कर्मकांड- पंडों का चक्रव्यूह“, जिसमें ब्राह्मणों का मजाक बनाया गया है। इसमें हिन्दू धर्म की पूजा पद्धतियों को नकारते हुए इसे ब्राह्मणों की साजिश बताया गया है। यानी, ब्राह्मणों, साधुओं, हिन्दू धर्म और मंदिरों को बदनाम करने का ‘विश्व बुक्स’ ने बीड़ा उठाया हुआ है। राकेश नाथ द्वारा लिखित इस पुस्तक के कवर पर ही भगवा वस्त्रों में एक ब्राह्मण को कमण्डल लेकर भागते हुए दिखाया गया है।
जब छात्र व बच्चे इन चीजों को पढ़ते होंगे तो क्या वो अपने ही धर्म और समाज के प्रति हीन भावना से ग्रसित नहीं हो जाते होंगे? ब्राह्मणों को इस तरह से पेश किया गया है जैसे वो समाज के सबसे बड़े विलेन्स हों। इसी तरह इसने जयप्रकाश यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘धर्म: एक धोखा’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसमें धर्म को छल-कपट का विषय बताया गया है। इसके कवर पेज पर भी कमंडल लिए एक ब्राह्मण को दिखाया गया है।
राकेश नाथ की ही एक और पुस्तक है- “धर्म का शाप- आतंक, विभत्स्ता, क्रूरता, व बर्बरता का जनक”, जिसमें व्यक्ति को धर्म के कारण दबे-कुचले होने की बात कही गई है। इसके अलावा हिन्दू समाज को अपने ही प्रति ‘हीनता’ से भरने के लिए हिन्दुओं को हार जाने वाला समुदाय बता कर एक पुस्तक में समेटा गया है और उसे नाम दिया गया है- :द हिस्ट्री ऑफ़ हिंदूज- द सागा ऑफ़ डिफिट्स, जिसमें हिन्दू समाज को डरपोक प्रदर्शित किया गया है।
इससे पहले एक ट्विटर यूजर अंजी ने खुलासा किया था कि उन्होंने अमेजॉन के जरिए विश्व बुक्स से श्रीमद्भगवद्गीता मँगाने का ऑर्डर दिया था लेकिन साथ में हिन्दूघृणा से सनी किताब भी आई। जब उनके ऑर्डर की डिलीवरी हुई, तो उसके साथ एक और बुक थी जिसका शीर्षक था- “भागवत पुराण कितना अप्रासंगिक” उक्त पुस्तक पुराण का प्रतिवाद है और पाठकों को पुराण पढ़ने से रोकने के लिए स्पष्ट रूप से लक्षित है।
पता चला कि इस तरह की घटना कई उपभोक्ताओं के साथ हो चुकी है। कई लोगों को ऐसी किताबें भेजी गई हैं। किसी ने सुपरहीरोज की किताब ऑर्डर की तो उन्हें ये मिला, किसी ने अंग्रेजी की किताब मँगाई तो उन्हें बाइबल पहुँची। जाहिर है, वो भले ही मुफ्त में चीजें दे दें लेकिन उन्हें हिन्दुओं के ख़िलाफ़ घृणा को भड़काना ही है, हर हाल में। ऐसे पाठकों को ख़ासकर निशाना बनाया जा रहा है, जो आस्तिक हैं, धर्म में विश्वास रखते हैं।
इसी तरह की एक पुस्तक है “हम अध्यात्मवादी होते हैं“, जिसमें डॉक्टर सुरेंद्र कुमार शर्मा नामक व्यक्ति ने दावा किया है कि हिन्दू अपनी प्राचीन संस्कृति का ढोल पीटते रहते हैं और उनका अलग अध्यात्मवाद है। साथ ही इसमें लिखा है कि अध्यात्मवादी होना एक ‘षड्यंत्र’ था, जिसे ऋषियों, नायकों, अवतारों और मुनियों ने बुना था। दावा किया गया है कि उन्होंने ऐसा इसीलिए किया, ताकि विशेष वेश बना कर अपने स्वार्थों की पूर्ति कर सकें।
इस पुस्तक के डिस्क्रिप्शन में लिखा है कि ये पाठकों को ‘अध्यात्मवाद की भूलभुलैया’ से बाहर लेकर आएगा। राकेश नाथ की एक अन्य पुस्तक में रामचरितमानस की रचना करने वाले कवि तुलसीदास को ही बदनाम किया गया है। इस पुस्तक का ही नाम है, “तुलसीदास- द मिसगाईडर ऑफ हिन्दू सोसाइटी“, अर्थात उन्हें हिन्दू समाज को पथभ्रष्ट करने वाला व्यक्ति बताया गया है। इसमें लिखा है कि हिन्दुओं को विदेशी सलीमशाहियीं के जूतों के नीचे कीड़े-मकोड़ों की तरह रौंदा जाता था।
तुलसीदास के साहित्य को ‘आडम्बर’ घोषित कर दिया गया है और उन्हें हिन्दुओं को पुरुषार्थ छोड़ कर राम भरोसे रहने के लिए प्रेरित करने वाला व्यक्ति बताया गया है। इस पुस्तक में इन चीजों का ‘पोल खोलने’ का दावा किया गया है। इसी लेखक की “हम हिन्दुओं में क्या नैतिकता है?” नामक पुस्तक में पूछा गया है कि भारत में अवतार क्यों पैदा हुए हैं और उनकी लम्बी लाइनें क्यों लग गई हैं? इसमें विदेशी आक्रांताओं के हमले का कारण हिन्दुओं के विवेकहीन पाखंडों, आडम्बरों और मान्यताओं को बताया गया है।


इस पुस्तक में हिन्दुओं की सही स्थिति का आकलन करने का दावा करते हुए नैतिकता सिखाने की बात कही गई है। इसी लेखक की एक अन्य पुस्तक ‘ब्राह्मण यूनियन‘ को भी ‘विश्व बुक्स’ ने ही पब्लिश किया है और इसमें भी ब्राह्मणों को बदनाम किया गया है। “क्या हिन्दू नारी आज भी उपेक्षित है?“- इस पुस्तक में स्त्रियों की स्थिति को जबरदस्ती धर्म से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की गई है। “धर्म का धंधा” भी ऐसी ही एक पुस्तक है।
एक पुस्तक में तो हिन्दुओं के धर्मग्रंथों को ही हमारे ऊपर लादा गया एक बोझ बता दिया गया है। “कितने अप्रासंगिक हैं धर्मग्रन्थ?” में हमारी अपनी ही प्राचीन पुस्तकों को कूड़ा-करकट की तरह दिखाया गया है। “जैन धर्म ग्रंथों की कितनी वास्तविकता?” नामक पुस्तक में रीति-रिवाजों को मनुष्य को विवेकहीन बनाने का एक जरिया बताया गया है। लिखा है कि आदेश और प्रवचन इत्यादि अनुयायियों को बरगलाने का एक जरिया हैं।
‘विश्व बुक्स’ दिल्ली प्रेस ग्रुप का ही एक एसोसिएट है, ऐसा उसकी ही वेबसाइट पर बताया गया है। दिल्ली प्रेस 9 भाषाओं में 32 मैगजीन्स का प्रकाशन करता है। ‘विश्व बुक्स’ का मुख्यालय गाजियाबाद के साहिबाबाद में स्थित है। अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ये किस नेक्सस का काम है। ऐसी किताबों को जबरदस्ती लोगों को पढ़वाना एक ऐसी मुहिम का हिस्सा है, जिससे लोग अपने ही धर्म और इतिहास से विमुख हो जाएँ।
इससे पहले चंपक पत्रिका के अक्टूबर 2019 संस्करण के एक हिस्से में पत्रिका बच्चों से कश्मीर में अपने जैसे अन्य बच्चों के नाम पत्र लिखने और उनसे वहाँ की स्थिति के बारे में पूछने के लिए अपील की गई थी। पत्रिका के इस संस्करण में कहा गया है कि कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त किए जाने के बाद घाटी में स्थिति ठीक नहीं है। हजारों सैनिकों और सेना की बटालियनों को कश्मीर भेजा गया है और जगह-जगह कर्फ्यू लगा हुआ है।
लिखा गया था कि यहाँ तक कि टेलीफोन लाइनों और इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया है। मतलब उनपर बड़ा अत्याचार हो रहा है। आप हमें पत्र भेंजे हम उन्हें निश्चित रूप से कश्मीर के बच्चों तक पहुँचाएँगे। ऐसा करके बच्चों में ये जहर बोने की कोशिश है कि देखिए वहाँ के बच्चे किस हाल में हैं। कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि इससे पहले वहाँ के क्या हालात थे। इसी तरह ‘दिल्ली प्रेस ग्रुप्स’ की किताबें प्रपंच फैलाती हैं।
इसकी सबसे पुरानी पत्रिका ‘द कारवाँ’ के एज़ाज अशरफ की एक घटिया रिपोर्ट में, उन्होंने हमारे शहीद सैनिकों की ‘जाति का विश्लेषण’ किया था। कारवाँ का एजेंडा तो ऐसा है, जिसमें उन्होंने उन बलिदानी सैनिकों को भी नहीं छोड़ा, जिनकी पाकिस्तान जैसे आतंकी स्टेट द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी। इसने अमित शाह, पीएम मोदी, एनएसए डोभाल और उनके बेटे पर कई घटिया आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित किए हैं। 

20 लाख करोड़ रूपए के पैकेज से कांग्रेस और लिबरल गिरोह बदहवास

आत्मनिर्भर भारत कॉन्ग्रेसप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज ही आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन पर जोर देते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है।
लेकिन इस आर्थिक पैकेज की घोषणा के तुरन्त बाद कांग्रेस की ओर से जो प्रतिक्रियाएँ आई हैं, उन्हें देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि कम से कम कांग्रेस के लिए यह काफी नहीं हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस ने अपने ट्विटर एकाउंट से लिखा है – “केवल 20 लाख करोड़..? मोदी जी, ये महामारी है, सब कुछ चौपट हो चुका है। जीडीपी का केवल 10% नहीं, कम से कम जीडीपी का 50% तो दीजिए।”
लेकिन ऐसा कर के कांग्रेस एक बार फिर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है और उसने यह साबित किया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, उसका उद्देश्य मात्र केंद्र सरकार का विरोध करना है।
यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस अपने ही उस बयान से पलटते हुए आज 20 लाख करोड़ के पैकेज को कम न बता रही होती जिसमें उन्होंने कुछ ही दिन पहले कहा था कि सरकार कोरोन वायरस की आपदा से निपटने के लिए देश की कुल GDP का कम से कम 5-6% की घोषणा करनी चाहिए।
मोदी ने स्पष्ट किया है कि 20 लाख करोड़ का यह पैकेज भारत की GDP का तकरीबन 10% है।

वहीं, देश के लिबरल-गिरोह को भी इस घोषणा से खासा ‘परेशान’ होते देखा जा रहा है, जिन्हें कि सोशल मीडिया यूजर्स जवाब भी देते देखे जा सकते हैं –



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आत्मनिर्भर भारत के लिए आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए PM मोदी ने अपने भाषण में कहा-
“आत्मनिर्भर भारत की ये भव्य इमारत, पाँच पिलर्स पर खड़ी होगी: पहला पिलर इकॉनॉमी होगा, एक ऐसी इकॉनॉमी जो इक्रिमेंटल चेंज नहीं बल्कि क्वांटम जंप लाए। दूसरा पिलर इफ्रास्ट्रकचर, एक ऐसा इफ्रास्ट्रकचर जो आधुनिक भारत की पहचान बने। तीसरा पिलर हमारा सिस्टम, एक ऐसा सिस्टम जो बीती शताब्दी की रीति-नीति नहीं, बल्कि 21वीं सदी के सपनों को साकार करने वाली तकनीक व्यवस्थाओं पर आधारित हो। चौथा पिलर हमारी डेमोग्राफी, दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में हमारी डेमोग्राफी हमारी ताकत है, आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है। पाँचवा पिलर डिमांड, हमारी अर्थव्यवस्था में डिमांड और सप्लाई चेन का जो चक्र है, जो ताकत है, उसे पूरी क्षमता से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।

जनता कर्फ्यू: थाली और ताली में उलझी लिबरल गैंग की औरतें

आरफा खानम, इरेना अकबर, स्वाति चतुर्वेदी और सबा नकवी
सिर्फ थाली और ताली ही तलाश पाईं स्वघोषित महिला पत्रकार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 19 को राष्ट्र को संबोधित किया। संक्रमण का प्रसार करने के लिए लोगों से संकल्प और संयम की अपील की। अफवाहों से बचने और सतर्कता बरतने सहित तमाम बातें की। इसके आर्थिक प्रभाव की चर्चा करते हुए बताया कि इससे निपटने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया गया है।
उन्होंने जनता से 9 आग्रह किए। रविवार को जनता कर्फ्यू की अपील की। साथ ही कहा कि 22 मार्च के दिन सभी लोग अपने घर की बालकनी में आएँ और इस महामारी से निपटने में जुटे लोगों की सेवा के प्रति आभार जताने के लिए 5 मिनट तक करतल ध्वनि बजाएँ।
प्रधानमंत्री की इस पहल की ज्यादातर तबकों में सराहना हुई। लेकिन, लिबरल गैंग को यह नहीं सुहाया। शेहला रशीद जैसे कुछ नामों को छोड़ दे तो गैंग की ज्यादातर औरतें थाली और ताली के अलावा प्रधानमंत्री के संबोधन में कुछ तलाश नहीं पाईं। इस सूची में सबसे पहला नाम है प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर की आरफा खान्नम शेरवानी का। अपनी कुँठा व्यक्त करते हुए उसने ट्वीट किया है, “जनता curfew, ताली और थाली… सब कुछ जनता ही करेगी, तो आप क्या करेंगे सरकार? 30 मिनट के भाषण में 3 चीज़ें बताइये जो सरकार करेगी?”
पत्रकार रोहिणी सिंह भी भार प्रकट करने के तरीके को भी संशय के घेरे में रखकर पेश करती हैं और लिखती हैं- “भारत में वैश्विक महामारी से लड़ाई ताली और थाली बजा-बजाकर लड़ी जाएगी।”
सबा नकवी ने लिखा है, “ये दिलचस्प है कि निजी क्षेत्र के डॉक्टर प्रधानमंत्री का गुणगान करते हैं, जबकि सरकारी क्षेत्र के डॉक्टर अभी भी बुनियादी किट और मास्क माँग रहे हैं।”
पत्रकार सागरिका घोष भी नरेंद्र मोदी के इस आग्रह पर सवाल उठाती हैं। वे पहले तो तो नरेंद्र मोदी के ‘जनता कर्फ्यू’ विचार की तारीफ करती हैं। मगर, इसके बाद अपना रवैया बरकरार रखते हुए कहती हैं कि एक दूसरे से दूर रहने की बात ठीक है, लेकिन वे कुछ ठोस सुनने की इच्छुक थी। सागरिका सवाल करती हैं कि जो प्रधानमंत्री ने कहा वो सब तो ठीक है, लेकिन सरकार क्वारेंटाइन सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए क्या कर रही है, इसके बारे में नरेंद्र मोदी ने कोई बात क्यों नहीं की।
इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार और दलितों से घृणा करने वाली इरेना अकबर स्वास्थ्यकर्मियों को सराहने के लिए उठाए जाने वाले इस कदम का मजाक उड़ाने के लिए लिखती हैं कि रविवार को 5 बजे वो अपनी बॉलकनी में खड़े होकर भक्तों की शिनाख्त करेंगे। उनके हिसाब से जो कोई भी प्रधानमंत्री की बात मानकर अपनी बॉलकनी में खड़े होकर ताली या थाली बजाएगा वो सिर्फ उनका भक्त होगा।


इरेना कहती है कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपील नहीं करते बल्कि आश्वस्त करते हैं कि वो इस विपदा में उनका ध्यान रखेंगे। लेकिन मोदी ने सिर्फ़ अपील की, क्योंकि वे जानते हैं कि वे बेवकूफों के राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं।
एक पत्रकार और शीरीन नाम की महिला जिन्हें इरेना अकबर भी रीट्वीट करती हैं। वे थाली बजाकर आभार देने की बात का मजाक उड़ाते हुए कहती हैं कि इटली में हो रहा बॉलकनी टाइम पास भारत के लिए राष्ट्रीय आपदा से लड़ने की नीति है।
स्वघोषित पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी भी इस पर अपनी राय देने नहीं चूकतीं। वे सागरिका घोष की तरह तालमेल बिठाते हुए कहती है कि वे नरेंद्र मोदी के इस भाषण को उनके सबसे अच्छे भाषणों में रेट करती हैं। केवल थाली बजाने वाली बात को छोड़कर। बता दें, स्वाति चतुर्वेदी इस पहल पर हैरानी जताती हैं और कहती है कि उन्हें ये फिजूल लग रहा है।
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जनता-कर्फ्यू का विरोध करते राजदीप सरदेसाई आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार NDTV लगता है घोर मोदी विरोधी है। जिसका प्रधान....

लेफ्ट लिबरल और इस्लामिक गैंग प्रोपेगेंडा के साथ लौटा : महिलाओं के साथ ‘छेड़छाड़’ के लिए होली है

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
रंगों का त्योहार होली आते ही वामपंथियों, लिबरलों और इस्लामवादियों का प्रोपेगेंडा भी शुरू हो गया है। वो हमेशा की तरह हिन्दू त्यौहार को नीचा दिखाने की अपनी हरकत में लग गए हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक करवाचौथ पर 'मै क्यों भूखी रहूं', शिवरात्रि पर 'शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की बजाए किसी गरीब को दूध दो', और दीपावली पर आतिशबाज़ी से प्रदुषण होता है' आदि आदि। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि कब्रों पर चादर चढ़ाने की बजाए किसी गरीब को दे दी जाये, और जिस दिन यह बात हिन्दुओं ने उछाल दी यही गैंग संविधान और गंगा-यमुना तहजीब का स्वांग इस्लामवादियों और उनके वैचारिक कॉमरेडों ने एक बार फिर से हिन्दू पर्व की छवि को खराब करने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने होली के पर्व को महिलाओं के खिलाफ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने आरोप लगाया कि होली के त्योहार के दौरान हिन्दू पुरुष, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं और उनका उत्पीड़न करते हैं।

एक सोशल मीडिया यूजर ने ट्विटर पर सेक्सिस्ट टिप्पणी करते हुए लिखा कि होली के नाम पर पूरे देश में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ किया जाता है।

मिनी नायर नाम की एक महिला, जो कि लेखक होने का दावा करती है, लिखती है कि होली उसके लिए काफी भयानक थी, क्योंकि पिछले साल वह केरल में इस त्योहार के दौरान बेचैनी महसूस कर रही थी। ‘फेमिनिस्ट’ मिनी नायर पुरुषों को ‘राक्षस’ बुलाते हुए कहती है कि भांग उसकी परेशानी का सबब बना था।
शची नेली नाम की एक अन्य हिंदूफोबिक सोशल मीडिया यूजर ने शनिवार को ट्विटर पर दावा किया कि वह होली नहीं खेलती है, क्योंकि अतीत में होली खेलने खेलने के दौरान उसके साथ छेड़छाड़ की गई थी। नेली यह भी कहती है कि इस त्योहार को मनाते समय जब ‘होली है’ का उद्घोष किया जाता है, तो ये उसे एक युद्ध की तरह लगता है।
सोशल मीडिया पर एक इस्लामिक ट्रोल Opus of Ali ने भी इसी तरह के हिंदूफोबिक ट्वीट्स का सहारा लिया है, जिसमें कहा गया कि होली छेड़छाड़ का त्योहार है। कट्टरपंथी इस्लामवादी ने लगातार एक के बाद एक कई ट्वीट करते हुए लिखा कि छेड़छाड़ से बचने के लिए लोगों को होली को ना कहना चाहिए।
एक अन्य ट्वीट में Opus of Ali ने होली मनाने वाले हिंदुओं पर झूठे दावे करते हुए कहा कि इस दौरान महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।
इसके साथ ही ‘Baudhkaro’ नामक एक अल्ट्रा-लेप्ट समूह ने होली पर हमला किया। ये खुद को डॉ. बीआर अंबेडकर की शिक्षाओं का फॉलोवर होने का दावा करता है। इसमें दो वामपंथी कट्टरपंथी द्वारा ‘त्योहार- द एंटी होली सॉन्ग’ गाया जाता है। इसमें से एक कट्टरपंथी विवादास्पद वामपंथी विश्वविद्यालय जेएनयू से पीएचडी छात्र है, जो भड़काऊ टिप्पणी करता है और दावा करता है कि होली एक जातिवादी त्योहार है, जिसमें ऊँची जाति के हिंदुओं द्वारा निचली जातियों की महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।

इनका रीति-रिवाजों और परंपराओं को कोसना केवल हिंदू त्योहारों तक ही सीमित है। गैर-हिंदू त्योहारों की प्रतिगामी प्रथाओं की बात आते ही ये आँखें मूंद लेते हैं। हकीकत यह है कि लिबरल देश की गैर-स्वदेशी संस्कृति के सभी पहलुओं को छुपाते हैं, जबकि वे सभी हिंदू त्योहारों को खत्म करने का प्रयास करते हैं।
लेफ्ट मीडिया ने पिछले साल भी होली पर निशाना साधा था। फेक न्यूज वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने हिंदुओं के रंगों के त्योहार की छवि को खराब करने के लिए इस पर्व को बच्चों द्वारा सड़कों पर आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अवसर के रूप में ब्रांड बनाने के लिए आगे बढ़ाया था। इसी तरह से वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने भी होली के खिलाफ जहर उगले थे।

‘भारत, इजराइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा’ : केंद्रीय मंत्री वीके सिंह

केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने मार्च 6 को कहा कि लोग चाहते हैं कि आतंकवादियों को निशाना बनाने में भारत, इजराइल के अनुरूप व्यवहार करें लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि वहां का विपक्ष भारत जैसा नहीं है और आपरेशन म्यूनिख जैसे कार्यों के संबंध में अपनी सेना पर सवाल नहीं उठाता, अपमानित नहीं करता. 
वीके सिंह ने अपने फेसबुक पोस्ट में सरकार के आलोचकों पर निशाना साधा जिसमें विपक्षी नेता, छात्र नेता, कार्यकर्ता, मीडिया आदि शामिल हैं . उन्होंने भारत के भीतर एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का आह्वान करते हुए दावा किया कि अगर ऐसा नहीं होता है तो डकैत, लूटने को तैयार हैं .
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‘लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए’ 
‘हिन्दुस्तान इजराइल क्यों नहीं बनता…’ शीर्षक से फेसबुक पोस्ट में वी के सिंह ने लिखा, ‘लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए. बस मोदी टैंक लेकर घुसें, और सब पाकिस्तानियों को ख़त्म कर दें. हम चाहते हैं, रातों रात इजराइल मोड में आ जाएं.’ उन्होंने आगे लिखा कि मोदी है, तो उन्हें पूरी अपेक्षा और विश्वास है कि बदला होगा, भीषण होगा, सौ गुना हाहाकारी होगा. पर भारत, इजराइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा. 

विदेश राज्य मंत्री ने कहा कि छोटे से इजराइल पर आस पास के 10 देश हमला कर दें, पर तब भी वह छः दिन के अंदर उन्हें धूल चटा कर वापस उन्हीं के घर में बिठा देता है. एक छोटे से देश पर कोई एक ग्रेनेड फेंकने से पहले 10 बार सोचता है, क्योंकि 10 गुना नुकसान वापस झेलना पड़ेगा.
‘क्योंकि इजराइल में कोई जेएनयू नहीं’ 
उन्होंने लिखा, सवाल है कि भारत इजराइल क्यों नहीं बन सकता? ‘क्योंकि इजराइल में कोई जेएनयू नहीं जहां इजराइल के युवा ‘इजराइल, तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगा सकें. इजराइल में कोई सरकार चुने जाने के दो महीने के अंदर किसी गंभीर आरोपों में घिरे किसी नक्सली को क्लीन चिट नहीं देती .’ 

पाकिस्तान में आतंकी शिविरों में वायु सेना के हमलों का सबूत मांगने वालों पर तंज कसते हुए सिंह ने कहा कि क्योंकि इजराइल जब ऑपेरशन म्यूनिख करता है तो वहां का विपक्ष सबूत मांग कर देश एवं सेना को अपमानित नहीं करता . उनका परोक्ष संदर्भ इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद द्वारा 1972 म्यूनिख ओलंपिक में आतंकी हमले में उसके दल कई सदस्यों की मौत में शामिल लोगों को मारने के छिपे अभियान के संदर्भ में था . 
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वीके सिंह ने यह पोस्ट ऐसे समय में लिखा है जब बालाकोट वायु सेना हमले को लेकर सरकार और विपक्षी दलों के बीच शब्दों के बाण तेज हो गए हैं . विपक्षी दल की ओर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत कुछ पार्टी नेताओं द्वारा हमले में आतंकवादियों के मारे जाने की संख्या संबंधी बयान के संबंध में सबूत मांगे जा रहे हैं . इस संबंध में एक ट्वीट में वी के सिंह ने कहा, ‘रात 3.30 बजे मच्छर बहुत थे, तो मैंने हिट मारा . अब मच्छर कितने मारे, ये गिनने बैठूँ, या आराम से सो जाऊं?’ 
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Image result for फौज का गुंडा‘वहां के पत्रकार आंतकियों के लिए मानवाधिकार का रोना नहीं रोते’ 
वहीं, फेसबुक पोस्ट में सिंह ने कहा कि क्योंकि वहां (इजराइल) के पत्रकार आतंकियों के लिए मानवाधिकार का रोना नहीं रोते हैं. और ना ही वहां के पत्रकार आतंकी को आतंकवादी कहने के बजाय चरमपंथी या उग्रवादी कहते हैं . क्योंकि इजराइल के कोई जाट, गुर्जर, मराठा वहां की किसी सार्वजनिक सम्पत्ति को नहीं जलाते. वहां देश सर्वोपरि होता है, जाति या धर्म नहीं.

Image result for फौज का गुंडा Image result for फौज का गुंडाकेंद्रीय मंत्री ने कहा कि क्योंकि वहां के नेता, सेनाध्यक्ष को कुत्ता, गुंडा नहीं कहते. वहां करदाताओं के पैसों पर पढ़ने वाले शेहला रशीद या कन्हैया कुमार जैसे जोंक नहीं है . वहां के अभिनेता अपनी धरती पर जहां वो पैदा हुए हैं, जहां वो सफल हुए हैं, उस पर शर्मिंदा नहीं होते. असहिष्णुता का नाटक नहीं करते.
विपक्षी दलों पर परोक्ष तंज कसते हुए सिंह ने कहा कि वहां लोग नेतन्याहू या उसकी पार्टी का विरोध करते करते इजराइल विरोधी नहीं हो जाते. यहाँ आपको सैकड़ो मिलेंगे जिनके मन में एक अजीब सी खुशी है कि बस इसी बहाने मोदी, भाजपा पर कीचड़ उछालेंगे, कि बहुत कूद रहे थे कि कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ.
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार पूर्व सेना प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्व...

उन्होंने कहा कि क्योंकि वहां के नेता देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के पीछे नहीं खड़े होते, और ना ही वहां की जनता किसी बात के लालच में आकर ऐसे नेताओं के पीछे खड़ी होती है. उन्होंने कहा कि वहां का विपक्ष अपने धुर विरोधी ईरान में जाकर ये नहीं कहता कि आप नेतन्याहू को हटाने में हमारी मदद करो .