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चर्च में सेक्स पार्टी के बाद पादरी ने कर ली आत्महत्या

                    मृत पादरी मैककॉय (इनसेट), चर्च जहाँ सेक्स पार्टी हुई (फोटो साभार : FirstPost)
ब्रिटेन की राजधानी लंदन के एक चर्च में सेक्स पार्टी का खुलासा हुआ है। इस खुलासे के बाद पोप ने जाँच के आदेश दिए हैं। सेक्स पार्टी पादरी माइकल मैककॉय ने लॉकडाउन के दौरान आयोजित की थी। सेक्स पार्टी का आरोप जिस पादरी पर लगा है, उसने साल 2021 में आत्महत्या कर ली थी। मामले की जाँच लीवरपूल के आर्कबिशप को सौंपी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, सेक्स पार्टी का खुलासा पूर्व पादरी रॉबर्ट बयर्ने के इस्‍तीफे की जाँच के दौरान हुआ है। जाँच में सामने आया कि रॉबर्ट ब्रायन के इस्तीफे के बाद मैककॉय पादरी बनने जा रहा था।

हालाँकि, इस बीच दिसंबर 2020 में मैककॉय ने चर्च के अंदर बने अपने घर में कुछ ईसाइयों को कथित तौर पर सेक्‍स पार्टी के लिए तैयार किया। कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण लंदन में लॉकडाउन लगा हुआ था। ऐसे में चर्च खाली पड़ा था। मौके का फायदा उठाकर मैककॉय ने यह पार्टी आयोजित की थी।

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में इससे पहले कोई भी शिकायत नहीं हुई थी। लेकिन, मामले का खुलासा होने के बाद मैककॉय के खिलाफ गवाही देने के लिए बड़ी संख्या में लोग सामने आ रहे हैं।

‘संडे टाइम्‍स’ ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा है कि मामले का खुलासा होने के बाद कई लोगों ने इस मामले की शिकायत की है। मैककॉय के खिलाफ गवाही देने वालों का आरोप है कि उसने चर्च के अंदर बने अपने घर में सेक्‍स पार्टी आयोजित की थी।

हालाँकि,इस आरोप की पुष्टि नहीं हो पायी है। लेकिन, ये आरोप काफी हद सही इसलिए लग रहे हैं क्योंकि पादरी मैककॉय पर बच्चों के यौन शोषण करने का आरोप लगा था। इन आरोपों के बाद जब पुलिस ने उसके खिलाफ जाँच शुरू की तो 4 दिन बाद ही उसने आत्महत्या कर ली थी। बता दें कि ‘सेक्स पार्टी’ की जाँच कर रहे अधिकारियों को इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि मैककॉय से पहले चर्च के पादरी रहे रॉबर्ट ब्रायन इसमें शामिल हुए थे या नहीं। चर्च में हुई सेक्स पार्टी के इस खुलासे के बाद पूरी दुनिया में इसकी आलोचना हो रही है।

लक्षण होने पर भी जान-बूझकर लोगों के बीच गए केजरीवाल? कोरोना संक्रमित होने के बाद उत्तराखंड रैली पर उठे सवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल न सिर्फ खुद कोरोना संक्रमित हैं बल्कि अपने ढुलमुल रवैये से उन्होंने हजारों लोगों को मुसीबत में डाल दिया है जिनके भी अब ओमिक्रोन संक्रमित होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। CM केजरीवाल ने खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने लिखा, “मुझे कोरोना संक्रमण हुआ है। लक्षण हल्के हैं। मैंने खुद को घर में आइसोलेट कर लिया है। मेरे संपर्क में जो भी लोग पिछले कुछ दिनों में आए हैं वे भी खुद को आइसोलेट कर लें और कोरोना टेस्ट करा लें।”

चिंता की बात यह है कि केजरीवाल संक्रमित पाए जाने से पहले हाल के दिनों में पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करते नजर आए हैं। इस दौरान वे हजारों की भीड़ से घिरे थे और न तो उन्होंने मास्क पहन रखा था और न ही उनके आसपास नजर आने वाले लोगों ने। अमृतसर में उन्होंने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी उस दौरान भी उनके आसपास काफी लोग मौजूद थे।

यदि उनकी रैली के कार्यक्रम के केवल एक सप्ताह को ध्यान में रखा जाए तो, वह चंडीगढ़ में विजय यात्रा का हिस्सा रहे हैं, पटियाला में शांति रैली में, अमृतसर के एक मंदिर में गए थे और 27 दिसंबर से लखनऊ और देहरादून में रैलियाँ की थीं। ऐसे में अपनी यात्रा और रैलियों के दौरान, आप सुप्रीमो केजरीवाल न जानें कितने ही लोगों के संपर्क में आए हों, जिनके अब संक्रमित होने का खतरा है।

पिछले दिनों में कहाँ-कहाँ गए अरविंद केजरीवाल

  • तीन जनवरी को देहरादून में जनसभा की
  • दो जनवरी को लखनऊ में जनसभा की
  • एक जनवरी को अमृतसर, राम तीर्थ मंदिर पहुँचे
  • 31 दिसंबर को पंजाब के पटियाला में शांति मार्च में शामिल हुए
  • 30 दिसंबर को चंडीगढ़ में विजय यात्रा का हिस्सा थे
  • 28 दिसंबर को दिल्ली में कोरोना पर प्रेस कॉन्फ्रेंस
संक्रमित होने से पहले सोमवार (3 जनवरी 2022) को केजरीवाल ने देहरादून में रैली की थी। इस दौरान उन्होंने मास्क नहीं पहना था। इससे एक दिन पहले रविवार (2 जनवरी 2022) को भी सीएम केजरीवाल ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रैली को संबोधित किया था। इस दौरान भी उन्होंने मास्क नहीं पहना था। शनिवार (1 जनवरी 2022) को अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के अमृतसर के प्राचीन एवं ऐतिहासिक ‘श्री राम तीरथ मंदिर’ की पवित्र स्थली के आज दर्शन किए।

जबकि वह COVID पॉजिटिव पाए जाने से ठीक पहले भी एक रैली में थे, जिसे देखकर लगता है कि केजरीवाल ने जानबूझकर हजारों लोगों की जान जोखिम में डाल रहे थे।

ट्विटर यूजर ‘@BeffitingFacts’ ने ट्विटर पर यह सवाल उठाया कि अगर CM केजरीवाल यह घोषणा कर रहे हैं कि आज उसका COVID-19 टेस्ट पॉजिटिव आया है, तो संभवत: कम से कम एक दिन पहले, 3 जनवरी को उनका परीक्षण किया गया होगा क्योंकि उसके कुछ लक्षण दिखे होंगे। फिर भी उन्होंने लापरवाही बरतते हुए 3 जनवरी 2022 को उत्तराखंड में एक रैली में भाग लिया। जिसकी तस्वीरें और वीडियो आप के कई नेताओं और आप के आधिकारिक हैंडल द्वारा भी शेयर किए गए थे।

आप उत्तराखंड ने भी ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें दिखाया गया था कि रैली में हजारों लोग शामिल हुए। ऐसे में केजरीवाल हजारों लोगों से मिलते हैं, यहाँ तक ​​कि बंद कमरों में बिना मास्क पहने बैठकें करते हैं।

जबकि यही केजरीवाल 2 जनवरी को दिल्ली के लोगों को को चेताते हुए अपने एक भाषण में लोगों से मास्क पहनने और बढ़ते हुए ओमिक्रोन ​​​​मामलों की वजह से सुरक्षित रहने का आग्रह किया था।

ऐसे में सवाल कई हैं। क्या केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक लिप्सा के लिए हजारों लोगों को खतरे में डाल दिया। क्योंकि जब 4 जनवरी को उनका टेस्ट कोविड पॉजिटिव आता है तो जाहिर सी बात है कि इसके पहले कुछ लक्षण साफ़ नजर आए होंगे जिससे उनका टेस्ट किया गया होगा। या वे किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आए हैं जिसकी पुष्टि COVID पॉजिटिव थी। ऐसे में उन्हें खुद को आइसोलेट कर लेना चाहिए था। और कम से कम हजारों लोगों के साथ रैलियाँ करके उनके लिए मुसीबत नहीं खड़ी करनी चाहिए थी।

चीन के कर्ज में फँस कंगाली के कगार पर पहुँचा श्रीलंका: 500000 लोग गरीबी रेखा से नीचे, 200000 की गई नौकरी

श्रीलंका आज कंगाली की कगार पर खड़ा है। आर्थिक और मानवीय आपदा गहरा गई है। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमत आसमान छू रही। रिकॉर्ड स्तर पर महँगाई है। आखिर श्रीलंका की यह हालत हुई कैसे?

दरअसल, श्रीलंका की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक पर्यटन पर आश्रित है। इस पर कोरोना महामारी के कारण ग्रहण लग गया है। दूसरी ओर श्रीलंका को चीन से कर्ज लेना काफी महँगा पड़ रहा है। उसके कर्ज चुकाते-चुकाते श्रीलंका आज आर्थिक बदहाली की स्थिति में पहुँच गया है। बताया जा रहा है कि देश का खजाना खाली होने को है और वह जल्द ही दिवालिया हो सकता है।

विश्व बैंक का अनुमान है कि श्रीलंका में महामारी की शुरुआत के बाद से 5,00,000 लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर में महँगाई 11.1 प्रतिशत की रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच गया। बढ़ती महँगाई की वजह से लोगों की प्लेट से खाने के सामान दूर होने लगे हैं। वे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि राजपक्षे सरकार द्वारा श्रीलंका में आर्थिक आपातकाल घोषित करने के बाद सेना को चावल और चीनी सहित आवश्यक वस्तुओं को सुनिश्चित करने की शक्ति दी गई थी, हालाँकि इससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

श्रीलंका के लिए सबसे अधिक दबाव वाली समस्याओं में से एक विशेष रूप से चीन के ऋण का भारी बोझ है। उस पर चीन का 5 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज है और पिछले साल उसने अपने गंभीर वित्तीय संकट से निपटने में मदद के लिए बीजिंग से अतिरिक्त 1 अरब डॉलर का ऋण लिया था, जिसका भुगतान किस्तों में किया जा रहा है। अगले 12 महीनों में सरकारी और निजी क्षेत्र में श्रीलंका को घरेलू और विदेशी ऋणों में अनुमानित 7.3 बिलियन डॉलर चुकाने की आवश्यकता होगी, जिसमें जनवरी में 500 मिलियन डॉलर अंतर्राष्ट्रीय सॉवरेन बांड पुनर्भुगतान भी शामिल है। हालाँकि, नवंबर तक उपलब्ध विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1.6 बिलियन डॉलर था।

विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री हर्षा डी सिल्वा ने हाल ही में संसद में कहा था कि अगले साल जनवरी तक विदेशी मुद्रा भंडार 437 मिलियन डॉलर होगा, जबकि फरवरी से अक्टूबर 2022 तक सेवा के लिए कुल विदेशी ऋण 4.8 बिलियन डॉलर होगा, जिससे राष्ट्र पूरी तरह से दिवालिया हो जाएगा। सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजीत निवार्ड काबराल ने हालाँकि सार्वजनिक तौर पर कहा है कि श्रीलंका अपने ऋणों को चुका सकता है।

गंगा के पानी में नहीं मिला कोरोना का कोई भी अंश, लाशों पर की गई थी राजनीति: CSIR-IITR की 120 पेज के रिसर्च नतीजे

         गंगा नदी के सैम्पल्स में कोरोना वायरस के कोई ट्रेस नहीं मिले (प्रतीकात्मक चित्र साभार: India Today)
2021 के पहले हाफ में कोरोना महामारी जब अपने उच्च-स्तर पर थी, उस दौरान उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में बहती लाशों की तस्वीरें शेयर कर के दावा किया गया था कि कोरोना के कारण मौतें छिपाने के लिए मृतकों की लाशों को फेंक दिया गया है। राज्य की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार को बदनाम करने के लिए भी मीडिया में प्रोपेगंडा चलाया गया। अब ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR)’ एवं ‘ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR)’ के वैज्ञानिकों की एक समीति ने गंगा नदी के सैम्पल्स की जाँच की है।

CSIR और IITR के वैज्ञानिकों द्वारा जब गंगा नदी के इन सैम्पल्स की जाँच की गई, तो इसमें कोरोना वायरस का कोई ट्रेस नहीं मिला। पानी के इन सैम्पल्स को 2020 में ही उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा नदी से लिया गया था, जिसकी जाँच के नतीजे अब आए हैं। 120 पेज की इस रिसर्च स्टडी के आधार पर ‘द न्यू इंडियन’ ने अपनी खबर में बताया है कि 13 लोकेशंस से लिए गए गंगा नदी के पानी ने इन सैम्पल्स का RT-PCR टेस्ट के जरिए परीक्षण किया गया।

इसी माध्यम से मानवों में भी कोरोना वायरस के लक्षणों का परीक्षण किया जाता है। वैज्ञानिकों ने उन जगहों से कुल 132 सैम्पल्स एकत्रित किए थे, जहाँ लाशें तैरने की बातें कही गई थीं। ये सारे के सारे सैम्पल्स कोरोना नेगेटिव टेस्ट किए गए हैं। ये सैम्पल्स, कनौज, उन्नाव, कानपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, वाराणसी, बक्सर, हमीरपुर, गाजीपुर, बलिया, पटना, सारण और भोजपुर में गंगा नदी से लिए गए थे। पश्चिमी मीडिया ने इन लाशों को कोरोना के कारण हुई मौतें बताया था।

 CSIR-IITR के डायरेक्टर एसके बारीक ने ‘द नई इंडियन’ को बताया कि गंगा नदी के अंदर कोविड-19 के सैम्पल्स मौजूद ही नहीं थे। उन्होंने बताया कि ये परीक्षण पर्याप्त संख्या में सैम्पल साइज और कड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया के बाद तय किए गए हैं। उन्होंने बताया कि जिस SOP से 3.5 लाख सैम्पल्स उनलोगों ने टेस्ट किए गए, वही प्रक्रिया इस बार भी अपनाई गई। उन्होंने बताया कि पानी में कोरोना वायरस मिला ही नहीं। ये सैम्पलिंग मई-जून 2021 में की गई थी।

इन नतीजों के आने के बाद भाजपा ने भी दुराग्रह पूर्ण दुष्प्रचार पर निशाना साधा है। प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि डिस्टर्बेंस पैदा करने और लोगों को भड़काने के लिए ये कुचक्र रचा गया था। उन्होंने इसे ‘राहुल गाँधी के नेतृत्व वाले कॉन्ग्रेस टूलकिट गैंग’ की साजिश बताते हुए कहा कि उन्होंने पहले लॉकडाउन पर सवाल उठाए, बाद में लॉकडाउन की वकालत की। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सपा ने लोगों को वैक्सीन न लेने के लिए भड़काया और इसे भाजपा की वैक्सीन बताया।

राकेश त्रिपाठी ने कहा, “लाशों के ऊपर राजनीति इसीलिए खेली गई, ताकि लाशों की तस्वीरें दिखा कर डर का माहौल पैदा किया जा सके और भाजपा को बदनाम किया जा सके। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा किया गया। महाराष्ट्र और केरल में यूपी से ज्यादा मौतें हुईं, लेकिन वहाँ को लेकर कुछ नहीं कहा गया। अब पश्चिमी मीडिया और विपक्षी दलों को इसका जवाब देना होगा।” जबकि वैज्ञानिक अध्ययन के नतीजों में कुछ अलग ही बात सामने आई है।

ढह गया ‘केरल मॉडल’: राज्य में पिछले 5 दिनों में कोरोना के 1.5 लाख से अधिक नए मामले

मीडिया से लेकर मोदी विरोधी राजनेता कोरोना पर केरल की वास्तविकता को छुपाकर खूब कसीदे पढ़ते नहीं थक रहे थे, लेकिन वहां इस महामारी का क्या हाल है, सब मुंह में दही जमाए बैठे हैं। किसी में सच्चाई बताने का साहस नहीं।  
केरल में कोरोना की बेकाबू रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा आँकड़ों के मुताबिक, पिछले पाँच दिनों में केरल में कोविड-19 के 1.5 लाख से अधिक नए मामले सामने आए हैं। राज्य में कोरोना के दर्ज किए गए नए मामले पिछले पाँच दिनों में देश में दर्ज किए गए कुल मामलों का 68% से अधिक है। इस समय भारत में कोरोना मरीजों की कुल संख्या 2,26,067 है, जबकि केरल में 1,55,424 मामले दर्ज किए गए हैं।

हर दिन दर्ज हो रहे नए केस 

25 अगस्त को केरल में 31,445 (भारत में कुल मामलों का 67.9%) नए मामले दर्ज किए गए, जबकि उस दिन भारत में कुल कोरोना मामलों की संख्या 46,280 थी।

  • 26 अगस्त को, केरल में 30,077 (भारत में कुल मामलों का 67.5%) नए मामले सामने आए, जबकि देश के बाकी हिस्सों में केवल 14,473 मामले सामने आए।

    27 अगस्त को, केरल में पिछले दिन की तुलना में 2,000 से अधिक मामलों की बढ़त के साथ (भारत में कुल मामलों का 70.07%) इस दिन यहाँ कोरोना के 32,801 नए मामले दर्ज किए गए। उसी दिन भारत में कुल कोविड-19 मामलों की संख्या 46,806 थी।

    28 अगस्त को, केरल में 31,265 (भारत में कुल मामलों का 69.3%) नए मामले दर्ज किए, जबकि भारत में नए मामलों की कुल संख्या 45,064 थी।

    29 अगस्त को, केरल में 29,836 (भारत में कुल मामलों का 68.7%) नए कोविड-19 के मामले दर्ज किए, जबकि भारत में नए मामलों की कुल संख्या 43,367 थी।

                                               सभी ग्राफ साभार  Source: Covid19india.org

    ढह गया केरल मॉडल 

    केरल का कोविड-19 प्रबंधन, जिसे अक्सर केरल मॉडल कहा जाता है, इसकी शुरुआत में मीडिया और लिबरल लोगों द्वारा ‘महामारी को नियंत्रित करने’ के लिए सराहना की गई थी। वास्तव में, कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों ने फरवरी और मार्च 2020 की शुरुआत में ही घोषणा कर दी थी कि केरल ने महामारी पर पूरी तरह से काबू पा लिया है। हालाँकि, शुरुआत में सबसे अच्छे कोविड-19 प्रबंधन के लिए अपनी पीठ थपथपाने वाले राज्य का केरल मॉडल ताश के पत्तों की तरह ढह गया था। राज्य की वर्तमान स्थिति देखने के बाद अब कोई केरल मॉडल की सराहना नहीं कर रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब पूरे देश में केरल ही एक मात्र ऐसा राज्य है, जहाँ कोरोना के सबसे अधिक नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं।

    देश के बाकी हिस्सों की तो वह कोरोना महामारी पर काबू पाने में सफल हुए हैं। केरल नए मामलों में अभी भी सबसे आगे है। ध्यान दें केरल में प्रति दिन लगभग 70% नए कोरोना के मामले दर्ज हो रहे हैं, जबकि यह भारत की कुल आबादी का सिर्फ 3% है। केरल का औसत पॉजिटिविटी रेट, जाँच किए गए प्रत्येक 100 लोगों के पॉजिटिव मामलों की तुलना में 18.5 प्रतिशत है।

    वर्तमान में सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश एक दिन में 50 से भी कम नए मामले दर्ज कर रहा है। केरल पिछले 5 दिनों से 30,000 के करीब मामले दर्ज कर रहा है। हाल ही में, रॉयटर्स जैसे मीडिया घरानों ने कोरोना के कुप्रबंधन को लेकर केरल सरकार को क्लीन चिट देने का प्रयास किया, जिसकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काफी आलोचना की गई।

    अगस्त 27 को, रॉयटर्स ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था, ‘Kerala’s COVID-19 lessons for India and Modi’s government’। उन्होंने पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली केरल सरकार को कोविड-19 महामारी के प्रभावी संचालन के लिए धन्यवाद भी कहा।

    ऐसे में जब यहाँ मामले इतने अधिक हैं, तो राज्य सरकार को परीक्षण बढ़ाना चाहिए ताकि संक्रमण का पता लगाया जा सके और उस पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन केरल ने इस समय जाँच भी कम कर दी है। केरल सरकार में ‘नो टेस्ट, नो केस’ नया मंत्र लगता है। द हिंदू बिजनेसलाइन में 23 अगस्त की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि केरल में कोरोना मामलों की जाँच में पिछले दो हफ्तों में लगभग एक तिहाई की कमी आई है।

    कोरोना महामारी पर अंकुश लगाने में केरल सरकार पूरी तरह से असफल रही है। इसके चलते हिंदू समुदाय अपने आने वाले त्योहार को भी नहीं मना सकेंगे, क्योंकि अन्य राज्य सरकारों पर इसका दबाव होगा कि केरल मॉडल को न दोहराया जाए। केरल में रहने वाले हिंदू परिवार, जिन्होंने पिछले 18 महीनों में महामारी के कारण कोई त्योहार नहीं मनाया हैं, वे उत्सव मनाने का इंतजार कर रहे हैं।

    ऑक्सीजन की कमी का नैरेटिव फैलाने वाले डॉक्टरों को पद्म अवॉर्ड के लिए भेजे AAP सरकार के 3 नाम

                   डॉक्टर सुरेश कुमार, शिव कुमार सरीन, संदीप बुद्धिराजा और सीएम अरविंद केजरीवाल (बाएँ से दाएँ)
    दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने पद्म अवॉर्ड्स के लिए केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी है। लेकिन, जिन नामों को पद्म सम्मान के लिए भेजा गया है, उससे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार पर संदेह पैदा होता है, क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्होंने कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी और केंद्र द्वारा सौतेले व्यवहार का नैरेटिव फैलाने में मदद की थी।

    दिल्ली सरकार ने पद्म अवॉर्ड के लिए जो तीन नाम भेजे हैं, उनमें से एक है डॉक्टर एसके सरीन का। वो ‘इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS)’ के निदेशक हैं। उन्होंने 20 अप्रैल, 2021 को एक बयान देते हुए दावा किया था कि दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की भारी कमी है। उन्होंने दावा किया था कि 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की डिमांड के बदले सिर्फ 300 मीट्रिक टन ही मिल रहा है, जिससे एक बड़ा गैप पैदा हो गया।

    दिल्ली सरकार की सिफारिश में दूसरा नाम है डॉक्टर सुरेश कुमार का। वो ‘लोक नायक जयप्रकाश नारायण (LNJP) अस्पताल’ का प्रबंध निदेशक (MD) हैं। 24 अप्रैल, 2021 को उनका बयान आया था कि पिछले 4-5 दिनों से उनके अस्पतालों में सारे बेड्स भरे हुए हैं। उनका कहना था कि कुछ मरीजों को ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल बनाए रखने के लिए प्रति मिनट 40-50 लीटर ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है।

    साथ ही उन्होंने ऑक्सीजन सप्लाई चेन के ठीक न होने का दावा भी किया था। दिल्ली सरकार जिस तीसरे डॉक्टर को पद्म अवॉर्ड दिलाना चाहती है, उनका नाम है संदीप बुद्धिराजा। वो मैक्स हॉस्पिटल के क्लिनिकल डायरेक्टर हैं। उन्होंने दिल्ली के अधिकारियों द्वारा ऑक्सीजन की ज़रूरत को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने वाली रिपोर्ट पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने इस रिपोर्ट में बदलाव करने की सलाह दी थी।

    इन तीनों डॉक्टरों के नाम दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की अध्यक्षता वाली कमिटी ने सुझाए हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बताया कि इसके लिए उनके पास 9427 सुझाव आए थे। एक और बात जानने लायक है कि डॉक्टर शिव कुमार (SK) सरीन को पहले भी पद्म अवॉर्ड मिल चुके हैं। उन्हें 2007 में यूपीए सरकार ने पद्म भूषण के सम्मान से नवाजा था। अब सोशल मीडिया में आरोप लग रहे हैं कि कोरोना काल में केंद्र सरकार विरोधी माहौल बनाने वालों को केजरीवाल सरकार सम्मानित करना चाहती है

    सुप्रीम कोर्ट की ऑक्सीजन ऑडिट टीम से निकले आँकड़े से पता चला था कि दिल्ली सरकार ने 25 अप्रैल से 10 मई तक दूसरे कोविड लहर के चरम के दौरान दिल्ली को ऑक्सीजन की जितनी आवश्यकता थी, उससे चार गुना से अधिक बढ़ा कर दिखाया। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं। जबकि इसके उल्ट AAP सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि ऑक्सीजन से कोई मौत नहीं हुई है।

    याद कीजिए कि ये वही दिल्ली सरकार है, जिसने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान मरीजों को डॉक्टरों-नर्सों के सहारे और डॉक्टर-नर्सों को भगवान के सहारे छोड़ दिया था। GTB अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने वीडियो बना कर बताया था कि कैसे घर छोड़ कर ड्यूटी करने वाले मेडिकल कर्मियों को खराब खान परोसा जा रहा था। उन्हें सिर्फ दाल-चावल मिलते थे, वो भी ठंडे। अब यही केजरीवाल सरकार बड़े-बड़े अस्पतालों में बड़े-बड़े [पदों पर तैनात डॉक्टरों को पद्म अवॉर्ड्स दिलाना चाहती है।

    ‘अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हमें दे दो’: क्रैग केली, ऑस्ट्रेलियाई सांसद

                                            ऑस्ट्रेलिया के सांसद क्रैग केली ने सीएम योगी के काम की तारीफ़ की 
    उत्तर प्रदेश में अब कोरोना वायरस संक्रमण के मात्र 1608 सक्रिय मामले बचे हैं। तुलना के लिए बता दें कि ये आँकड़ा केरल में 1.15 लाख और महाराष्ट्र में 1.14 लाख है। लेकिन भारत की पक्षपाती मीडिया को ये सब नहीं दिख रहा है। उसके लिए अब भी उद्धव ठाकरे ‘बेस्ट सीएम’ और ‘केरल मॉडल’ सबसे अच्छा है। पर यहाँ से 7800 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया के सांसद क्रैग केली को मुख्यमंत्री योगी का कुशल प्रबंधन दिख रहा है। जो भारतीय विपक्ष और पक्षपाती मीडिया के लिए बहुत ही लज्जा की बात है। विपक्ष द्वारा आलोचना करना तो समझ आता है, लेकिन पक्षपाती मीडिया किस आधार पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशंसनीय कार्यों को नज़रअंदाज़ कर रही है, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि विपक्ष ने मीडिया को किसी न किसी रूप कितना प्रभावित कर रखा है। 

    भारतीय मीडिया को क्या शर्म आ रही है?

    ज्ञात हो, ऑस्ट्रलियाई सांसद क्रैग केली से पूर्व WHO भी कोरोना प्रबंधन को लेकर योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा कर चूका है। 

    क्रैग केली ने कई महीनों से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामकाज पर नजर रखी हुई है और जिस तरह से अपने कुशल प्रबंधन से उन्होंने राज्य में कोरोना को मात दी है, इससे ऑस्ट्रेलियाई सांसद प्रभावित हैं। हाल ही में उन्होंने लिखा कि भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के लिए ताली बजनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया के ह्यूजेस से सांसद क्रैग केली ने कहा कि काश ऐसा कोई विकल्प होता कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हम कुछ दिनों के लिए ले सकते।

    उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में आइवरमेक्टिन दवा की कमी और नेतृत्व की अक्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ ही इन चीजों को ठीक कर सकते हैं। उन्होंने एक डेटा एनालिस्ट के ट्वीट को कोट करते हुए ये बातें लिखीं। उन्होंने अपने आँकड़े में बताया था कि भारत के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य में पिछले 1 महीने में कोरोना के मात्र 1% मामले सामने आए हैं और 2.5% मौतें हुई हैं।

    जबकि उत्तर प्रदेश में भारत की 17% जनसंख्या रहती है। उक्त डेटा एनालिस्ट जे चमी ने उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के आँकड़े गिनाए, जहाँ देश की 9% जनसंख्या रहती है। उन्होंने बताया कि इस राज्य में कोरोना के देश के कुल 18% मामले हैं और आधी से अधिक मौतें तो यहीं हो रही हैं। उन्होंने बताया कि जहाँ महाराष्ट्र भारत का फार्मा हब है, लेकिन आइवरमेक्टिन के प्रयोग में उत्तर प्रदेश ने सफलता हासिल की है।

    ऐसा नहीं है कि क्रैग केली ने पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ की हो। जून 2021 के अंत में भी बताया था कि कैसे 23 करोड़ की जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश ने कोरोना के ‘डेल्टा वैरिएंट’ पर विजय हासिल की है। उन्होंने 30 जून को ये ट्वीट करते हुए बताया था कि जहाँ उस दिन उत्तर प्रदेश में कोरोना के 182 नए मामले सामने आए, वहीं यूके में ये आँकड़ा 20,479 रहा। उन्होंने इवरमेक्टिन दवा के सही उपयोग को लेकर भी सीएम योगी की प्रशंसा की।

    मई में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)’ ने भी इसकी तारीफ़ की थी कि किस तरह उत्तर प्रदेश में घर-घर जाकर कोविड टेस्टिंग की जा रही है। गाँवों तक में स्वास्थ्यकर्मी जाकर कोरोना के लक्षणों वाले मरीजों के आइसोलेशन की व्यवस्था करते हैं। WHO ने बताया था कि किस तरह 97,941 गाँवों में ये चल रहा है। तब भी क्रैग केली ने कहा था कि उत्तर प्रदेश कोरोना को मात दे रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया और WHO ये किसी को नहीं बता रहा कि ये सब कैसे संभव हो रहा है।

    कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों के इलाज के लिए यूपी सरकार ने स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की सलाह के बाद प्रदेश में आइवरमेक्टिन को कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए प्रयोग किया। इसके साथ ही डॉक्‍सीसाइक्लिन को भी कोरोना मरीजों के लिए प्रयोग में लाया गया। उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्‍य था, जिसने बड़े पैमाने पर रोगनिरोधी और मेडिकल उपयोग में आइवरमेक्टिन का प्रयोग किया।

    भारत की छवि धूमिल करने के प्रयास में द लॅन्सेट, IHME और एनडीटीवी ने बढ़ा-चढ़ाकर कोरोना से मौत के अनुमानित आँकड़े पेश किए


    अमेरिका स्थित ग्लोबल हेल्थ रिसर्च संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेडिकल एंड इवैल्यूएशन (IMHE) ने अगस्त 2021 तक भारत में कोविड-19 से 1.4 से 1.6 मिलियन यानी 14 से 16 लाख लोगों के मरने का अनुमान लगाया था। IHME सीएटल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन का स्वतंत्र रिसर्च विंग है। उसका यह अनुमान 25 से 30 अप्रैल के बीच के डेटा पर आधारित है।

    हालाँकि, म​हीनों बाद ऐसा प्रतीत होता है कि इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेडिकल एंड इवैल्यूएशन (IMHE) ने उस समय कोविड मौतों का जो अनुमान लगाया था, वह बिल्कुल गलत था। क्योंकि उसके ताजा आँकड़े इसके उलट हैं। यहाँ ध्यान दें कि ताजा आँकड़े अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लॅन्सेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट है, जिसमें IHME के अनुमानों को गलत साबित किया गया है। हालाँकि, अब यू-टर्न लेते हुए IHME ने द लॅन्सेट की रिपोर्ट सामने आने के बाद अगस्त तक 1.6 मिलियन (16 लाख) मौतों के पूर्वानुमान को 1 मिलियन (10 लाख) मौतों तक सीमित कर दिया है।

    फिर भी, IHME द्वारा कोरोना से होने वाली मौतों का लगाया गया पूर्वानुमान अभी भी अपने निशान से बेहद दूर है। उदाहरण के लिए वर्तमान पूर्वानुमानों के अनुसार, भारत में आज यानी 29 जून को COVID-19 से अनुमानित मौतों की संख्या 1.11 मिलियन (11 लाख) है। यह मृत्यु की वर्तमान संख्या का 2.8 गुना है, जो कि 3.97 लाख है।

    मौतों की अनुमानित संख्या की तुलना में रिपोर्ट की गई मौतों की संख्या में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है। इस तरह अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए अनुमान IHME के नियोजित संदिग्ध तरीकों और उसके गलत इरादों पर सवाल उठाते हैं। शायद, संगठन का उद्देश्य वास्तव में COVID-19 से संबंधित मौतों की वास्तविक संख्या को पेश करना नहीं है, बल्कि अनुमानित मौतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर मोदी सरकार की छवि खराब करना है।

    भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर अब स्थिर होती दिख रही है। इन दिनों देश भर के जारी आँकड़ों से स्पष्ट है कि कोरोना वायरस की बेकाबू दूसरी लहर पर काबू पा लिया गया है। हर दिन कोरोना के कम मामले सामने आना, यह साबित करता है कि भारत में स्थिति अभी नियंत्रण में है। देश अब ऑक्सीजन संकट का सामना भी नहीं कर रहा है, जैसा कि अप्रैल 2021 में अचानक दूसरी लहर के कहर बरपाने से ऑक्सीजन, अस्पतालों में बेड, आइसोलेशन वार्ड सेंटर, वेंटिलेटर और अन्य उपकरणों का संकट गहरा गया था। हालाँकि, मोदी सरकार चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने, वेंटिलेटर और अन्य आवश्यक उपकरणों का लगातार विस्तार कर रही है, ताकि कोरोनो वायरस की तीसरी लहर से निपटा जा सके।

    इसके अलावा भारत अपने टीकाकरण अभियान को तेजी से बढ़ा रहा है। 21 जून से जब से केंद्र सरकार ने देश के सभी राज्यो में टीकाकरण अभियान का कार्यभार संभाला है, तब से वैक्सीन लगवाने वालों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। टीकाकरण केंद्रों की साप्ताहिक छुट्टी के दिन यानी रविवार को छोड़कर लगातार हर हफ्ते 50 लाख का आँकड़ा पार कर रहा है। इस सप्ताह सोमवार को भारत ने एक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है। दरअसल, टीकाकरण के मामले में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आगे निकल गया है। भारत में अब तक लगभग 32.5 करोड़ से अधिक लोग COVID-19 वैक्सीन की कम से कम एक खुराक ले चुके हैं।

    हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि आईएचएमई द्वारा मौतों का लगाया गया अनुमान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। अत्यधिक बढ़ाचढ़ा कर मौत के आँकड़े बताते हुए IHME ने सभी मानकों को दरकिनार ​कर दिया। इसके बजाए अगस्त 2021 तक 1.14 मिलियन (11 लाख से अधिक) मौतों के अविश्वसनीय अनुमानों को पेश कर इसने मोदी सरकार के खिलाफ अपने पूर्वाग्रह जगजाहिर कर दिया है।

    साभार: https://covid19.healthdata.org/india

    द लॅन्सेट के पूर्वानुमान के बाद IMHE ने अपना अनुमान किया कम

    हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब आईएचएमई ने ऐसे अनुमान लगाए हैं, जो तर्कसंगत नहीं हैं। इससे पहले मई में, IHME द्वारा इस्तेमाल किए गए संदिग्ध मॉडल ने अनुमान लगाया था कि भारत में कोरोना से अगस्त 2021 तक 1.4 से 1.6 मिलियन (14 से 16 लाख) लोगों की मौत हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लॅन्सेट ने तब IHME रिपोर्ट का हवाला देते हुए मोदी सरकार के खिलाफ अपना दुष्प्रचार किया था।

    इसने एक लेख प्रकाशित किया था, जो ढेरों गलतियों से भरा हुआ था। जिसकी व्याख्या आम आदमी भी कर सकते हैं। लेख में कहा गया है, “भारत को जब तक टीका लगाया जा रहा है, तब तक SARS-CoV-2 ट्रांसमिशन को जितना संभव हो कम करना चाहिए। जैसे-जैसे मामले बढ़ते जा रहे हैं, सरकार को सटीक आँकड़े समय पर प्रकाशित करने चाहिए। इसके साथ ही जनता को स्पष्ट रूप से समझाएँ कि क्या हो रहा है और महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन के ​अलावा क्या आवश्यक है।”

    IHME ने अपने कोविड मॉडल को संशोधित किया

    भले ही IHME ने अनुमान लगाया था कि भारत में अगस्त 2021 तक 1.4 से 1.6 मिलियन (14 से 16 लाख) लोगों की मौत होगी। वहीं, द लॅन्सेट में प्रकाशित लेख ने इसे लगभग 1 मिलियन (10 लाख) मौतों तक ही सीमित कर दिया। ऐसे में साफ दिखाई देता है कि द लॅन्सेट ने अपने लेख से 600000 मौतों में से 300000 मौतों को कम कर दिया है। यह दर्शाता है कि यहाँ तक ​​कि वे भी आईएचएमई के अत्यधिक बढ़ाचढ़ा कर पेश किए गए आँकड़ों पर विश्वास नहीं करते थे। द लॅन्सेट ने जैसे ही भारत में 1 मिलियन मौतों की भविष्यवाणी की, उसके बाद तुरंत IHME ने अपने मॉडल को संशोधित किया।

    इसमें दो राय नहीं है कि 1 मिलियन (10 लाख) का आँकड़ा भी एक अतिश्योक्ति ही है। इस तरह के आँकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। IHME ने नवंबर 2020 में नियमित रूप से 1000 से अधिक कोविड-19 मौतों का अनुमान लगाया था, जबकि उस दौरान कोरोना अपने पीक पर भी नहीं था। इसने 29 जून तक की रिपोर्ट में मौतों की संख्या के संबंध में वर्तमान डेटा को बदलने की जहमत भी नहीं उठाई थी। स्पष्ट रूप से, अधिक यथार्थवादी अनुमानों को प्रतिबिंबित करने के लिए अपने मॉडल को मौलिक रूप से फिर से तैयार करने की आवश्यकता आईएचएमई के लिए प्राथमिकता नहीं थी, जो खुद को COVID-19 संबंधित रुझानों का सबसे प्रमुख भविष्यवक्ता बताने से नहीं थकता है।

    अगस्त तक 50 लाख लोगों की मौत, NDTV ने भी लोगों को काफी डराने का काम किया

    द लॅन्सेट और IMHE के अलावा अन्य लोगों ने भी कोरोना से भारत में होने वाली मौतों को लेकर जमकर प्रोपेगेंडा फैलाया और लोगों को डराने का काम किया। कोरोना की रफ्तार कम होने के बीच NDTV ने भी लोगों को काफी डराने का काम किया। उन्होंने महामारी विज्ञानी एरिक फीगल-डिंग (epidemiologist’ Eric Feigl-Ding) को आमंत्रित किया। एरिक ने एक चौंका देने वाला दावा किया कि अगस्त 2021 तक भारत में कोरोना से 5 मिलियन यानी 50 लाख लोगों की मौत का आँकड़ा पार हो जाएगा।

    पत्रकार विष्णु सोम के साथ इंटरव्यू के दौरान, एरिक फीगल-डिंग ने दावा किया, ”भारत में कोरोना के आँकड़ें बेहद खराब हैं। मरने वालों की संख्या ठीक से नहीं बताई जा रही है। भारत में 1 अगस्त तक लाखों लोगों की मौत होना निश्चित है।”

    जैसा कि सब जानते हैं एनडीटीवी के हाथों एरिक के रूप में एक तुरूप का इक्का लग गया था, जिसके बहाने इस चैनल ने देश में कोरोना वायरस के मामलों को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि एरिक एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ नहीं है। हार्वर्ड टीसी चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (Harvard TC Chan School of Public Health) के अनुसार, एरिक फीगल-डिंग एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी विज्ञानी (public health epidemiologist), पोषण विशेषज्ञ (nutritionist) और स्वास्थ्य अर्थशास्त्री (health economist) हैं। वह एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ भी नहीं है, बल्कि एक पुरानी महामारी विज्ञानी है।

    5 मिलियन का आँकड़ा और भी हास्यास्पद है। फीगल-डिंग ने टिप्पणी की थी कि अप्रैल और अगस्त के बीच लगभग 2430000 लोगों की मौत हो जाएगी। वहीं, यहाँ पर वह (ndtv) 5 मिलियन यानी 50 लाख मौतों की भविष्यवाणी कर रहे थे। इतनी बड़ी संख्या में मौत का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव दूरगामी होगा। इससे देश के बड़े हिस्से में अराजकता फैल जाएगी, लेकिन ऐसी घटनाएँ कहीं देखने को नहीं मिलीं।

    कोरोन वायरस पर एक ‘स्टार एक्सपर्ट’ के रूप में एरिक का उदय किसी भी स्वास्थ्य शोधकर्ता, महामारी विज्ञानी या वैज्ञानिक के लिए अस्वाभाविक था। उन्हें कोरोना वायरस पर एक शोध पत्र पढ़ने का मौका दिया गया और उन्होंने पिछले साल जनवरी में एक महामारी के फैलने की भविष्यवाणी की। इस प्रसिद्धि के बाद, कई महामारी विज्ञानी उनकी साख पर सवाल उठाने के लिए आगे आए। नाम न छापने की शर्त पर एक महामारी विज्ञानी ने क्रॉनिकल ऑफ हायर एजुकेशन को बताया कि एरिक फीगल-डिंग की संक्रामक रोगों पर शोध शून्य है। यानी यह उनकी ​पृष्ठभूमि के विपरित है।

    मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने का प्रयास

    ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने के प्रयास में द लॅन्सेट, आईएचएमई (IHME) और एनडीटीवी (ndtv) ने कोविड मौतों का बढ़ा-चढ़ाकर अनुमानित आँकड़ा पेश किया है। COVID मौतों के अनुमान की सटीकता शायद ही चिंता का विषय हो, लेकिन यह सब देखकर तो केवल यही लगता है कि उन्होंने ऐसा मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने के लिए किया है।

    फ्री वैक्सीन में खोट निकाल रहे राहुल गाँधी को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का टका सा जवाब

                                                                                                                                            साभार 
    कोरोना टीकाकरण पर केंद्र सरकार के ताज़ा फैसले से बिफरे राहुल गाँधी को जब प्रधानमंत्री के राष्ट्र को सम्बोधन में से कुछ खोट निकालने लायक नहीं मिला तो उन्होंने ट्विटर पर एक जबरदस्ती का सवाल दाग दिया, जिसका करारा जवाब उन्हें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मिला। बता दें कि पीएम मोदी ने सोमवार (जून 7, 2021) को राष्ट्र के नाम सम्बोधन में केंद्र सरकार की तरफ से मुफ्त वैक्सीन राज्यों को देने की घोषणा की।

    टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशानिर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

    इस पर राहुल गाँधी ने कहा कि उनके पास सिर्फ एक ‘सीधा सा सवाल’ है, “अगर वैक्सीन मुफ्त में दी जा रही है कि प्राइवेट अस्पताल इसके लिए क्यों चार्ज लेंगे?” साथ ही उन्होंने ‘फ्री वैक्सीन फॉर ऑल’ का टैग भी लगाया। दअरसल, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में घोषणा की है कि निजी अस्पतालों द्वारा 25 प्रतिशत टीकों की सीधी खरीद की व्यवस्था जारी रहेगी। राहुल गाँधी की नाराजगी इसी से जुड़े फैसले से थी।

    प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार, राज्य सरकारें इस बात की निगरानी करेंगी कि निजी अस्पतालों द्वारा टीकों की निर्धारित कीमत पर केवल 150 रुपए का ही सर्विस चार्ज लिया जाए। राहुल गाँधी का सवाल इसी पर था। कभी उनकी ही पार्टी में रहे हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गाँधी के ‘एक सीधा सा सवाल’ का ‘एक सीधा सा जवाब’ दिया है। साथ ही सलाह दी कि वो बच्चों की तरह जबरदस्ती सब कुछ में गलतियाँ न निकालें।

    असम के मुख्यमंत्री ने जवाब देते हुए कहा, “सरकारी अस्पतालों में 18 से अधिक की उम्र वाले हर एक भारतीय नागरिक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा मुफ्त में कोरोना वैक्सीन दी जाएगी। जिन्हें रुपए देकर वैक्सीन लेनी है, उनके लिए प्राइवेट अस्पतालों का रुख करने की व्यवस्था है।” असल में हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल को समझाया कि मुफ्त में वैक्सीन के लिए प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लेने की ज़रूरत ही नहीं है, सरकार ने इसकी व्यवस्था पहले ही कर रखी है।

    राहुल गाँधी अक्सर हिमंत बिस्वा सरमा के निशाने पर रहते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने कॉन्ग्रेस के अंतिम दिनों का एक किस्सा सुनाया था, जब वो राहुल गाँधी की एक बैठक में गए थे। उन्होंने बताया था कि उन्होंने देखा कि तरुण गोगोई और सीपी जोशी जैसे वरिष्ठ नेता उसी प्लेट से बिस्किट उठा कर खा रहे हैं, जिसे राहुल गाँधी के कुत्ते ‘पीडी’ ने जूठा कर दिया था। इस अपमान के बाद सरमा ने कॉन्ग्रेस छोड़ भाजपा का रुख किया था।

    वैक्सीन पॉलिसी: पी चिदंबरम और राजदीप सरदेसाई ने कोरोना वैक्सीन को लेकर फैलाया था प्रोपेगंडा; चिदंबरम ने वापस लिया बयान

    कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जहाँ कोरोना वैक्सीन को लेकर भ्रम फैलाया, वहीं ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी अपने पुराने बयान से यू-टर्न लेते हुए केंद्र सरकार के फैसले का श्रेय विपक्षी नेताओं को दे डाला। विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर हंगामा करने में देर नहीं मचाई और दावा किया कि वैक्सीन नीति की प्रक्रिया ‘सेंट्रलाइज्ड’ हो, ये उनकी शुरू से माँग थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने भी यही किया।

    उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘राष्ट्र के नाम सम्बोधन’ का संदेश यही है कि केंद्र सरकार ने अपनी पिछली गलतियों से सीख ली है और उसने जो दो प्रमुख गलतियाँ की थीं, उसे सुधारने का प्रयास किया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर झाँसा देने का आरोप लगाते ये भी कहा कि उन्होंने अपनी गलतियों के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने दावा किया कि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा था कि केंद्र को वैक्सीन की खरीद नहीं करनी चाहिए।

    तमिलनाडु के कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अब मोदी कह रहे हैं कि राज्यों ने वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी, इसीलिए उन्हें ये सुविधा दी गई थी। उन्होंने सवाल दागा था कि किस राज्य के किस मुख्यमंत्री ने किस समय वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी या ऐसी माँग की थी? इसके बाद लोगों ने उनके सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पत्र पेश किया, जिसमें उन्होंने यही माँग रखी थी।

    फिर पी चिदंबरम ने अपने बयान को गलत बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने मुख्यमंत्री ममता का पत्र शेयर किया है, जिसके बाद वो अपने बयान में भूल-सुधार करते हैं। चिदंबरम ने ये बयान ANI को दिया था। दरअसल, फरवरी 24, 2021 के उस पत्र में ममता बनर्जी ने माँग की थी कि राज्य सरकारों को प्राथमिकता के आधार पर राज्यों को बड़ी संख्या में वैक्सीन की खरीद की अनुमति देनी चाहिए।

    इस दौरान पी चिदंबरम अपनी ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का वो पत्र भी भूल गए, जो उन्होंने अप्रैल 8, 2021 को लिखा था। राहुल गाँधी ने तब माँग की थी कि वैक्सीन की खरीद में राज्य सरकारों की ज्यादा भूमिका होनी चाहिए। तब उन्होंने ‘सेंट्रलाइज्ड प्रोपेगंडा’ को गलत करार दिया था। खुद पी चिदंबरम ने NDTV को वैक्सीन की प्रक्रिया डिसेंट्रलाइज करने को कहा था। शेखर गुप्ता ने भी एक ट्वीट में लिखा था कि कई राज्यों ने ऐसी माँग की है।

    ज्ञात हो कि टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशा निर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

    वहीं राजदीप सरदेसाई ने राज्यों को वैक्सीन को वैक्सीन की खरीद का अधिकार दिए जाने के समय मनमोहन सिंह को श्रेय देते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधे थे, लेकिन अब वो इस प्रक्रिया के वापस लिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं को श्रेय देते नहीं अघा रहे। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने राज्यों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह मान ऐसा किया है। लेकिन, तब राजदीप ने कहा था कि मनमोहन की सलाह पर राज्यों को ये अधिकार मिला है।

    ‘कोरोना सीजनल बीमारी, सिर्फ खाँसी-जुकाम है’: महिला प्रोफेसर के दावों से उठे WHO पर सवाल

    WHO द्वारा कोरोना को एक मौसमी बीमारी बताने से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि चीन का WHO पर कितना अधिक प्रभाव है, जो यह मानने को तैयार नहीं कि यह चीन द्वारा छोड़ा गया वायरस है। जैसाकि पूर्व में शंका व्यक्त की जा रही थी कि चीन ने WHO पर अपना अधिकार किया हुआ है, यदि WHO की ही बात को सच माना जाए तो WHO विश्व को बताए कि किस आधार पर इसे महामारी बताया था? विश्व के समस्त देशों को इस मुद्दे पर लामबंद होकर WHO की विश्वसनीयता पर प्रश्न करना चाहिए। 

    कोरोना संक्रमण के खतरनाक प्रकोप को झेलने के बावजूद सोशल मीडिया पर दावे किए जा रहे हैं कि ये एक मौसमी बीमारी है और इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इन दावों को सही साबित करने के लिए डोलोरेस काहिल नाम की महिला प्रोफेसर का वीडियो शेयर हो रहा है।

    बिना दावों की सच्चाई जानें फेक न्यूज फैलाने वालों का कहना है कि कोरोना संक्रमण पर दी जानकारी पर WHO ने अपनी गलती मान कर इसे एक सीजनल वायरस बताया है जिसमें मौसमी बदलाव के कारण खाँसी-जुकाम और गला दर्द रहता है।

    वायरल होते संदेशों के मुताबिक WHO के हवाले से ये भी कहा जा रहा है कि कोरोना रोगी को न तो अलग रहने की है और न ही जनता को सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत है। यह एक मरीज से दूसरे व्यक्ति में भी नहीं फैलता। इस संदेश के साथ WHO पर गुस्सा दिखाते हुए इस वीडियो को देखने को कहा जा रहा है। संदेश में लिखा है, “सबके 2 साल खराब करने के बाद इन्होंने तो पल्ला झाड़ लिया अब कर लो क्या करना है, इनका देखिए WHO की प्रेस कॉन्फ्रेंस।”

    वीडियो और संदेश की सच्चाई क्या है। इसे पीआईबी फैक्ट चेक के जरिए पहले ही बताया जा चुका है कि संदेश में किए गए दावे फर्जी हैं। कोरोना कोई सीजनल बीमारी नहीं है। इसमें शारीरिक दूरी और आइसोलेशन जरूरी है। यह एक संक्रामक रोग है जिसमें कोविड के अनुकूल व्यवहार अपनाना जरूरी है।

    इसके अलावा बात करें वीडियो में नजर आने वाली महिला प्रोफेसर डोलोरेस काहिल की तो गूगल सर्च से पता चलता है कि महिला डबलिन में स्कूल ऑफ मेडिसिन की एक प्रोफेसर हैं। उनका यह वीडियो 19 अक्टूबर 2020 को बर्लिन में हुए वर्ल्ड डॉक्टर अलायंस का है। जहाँ कोरोना संक्रमण पर भ्रामक दावा करने के कारण इस पर फॉल्स इन्फॉर्मेशन का टैग लगा दिया गया है।

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    वुहान लैब : 730395 अरब रुपए पूरी दुनिया को दे चीन: डोनाल्ड ट्रंप

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    वुहान लैब : 730395 अरब रुपए पूरी दुनिया को दे चीन: डोनाल्ड ट्रंप

    इसके अलावा ये बात भी गौर करने वाली है कि डोलोरेस WHO की कोई अधिकारी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस महामारी को 11 मार्च 2020 को महामारी घोषित किया था। इसके कारण अब तक 37 लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। इसलिए सिर्फ एक वीडियो पर ये मानना कि कोरोना कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, समझदारी का काम नहीं है।

    वुहान लैब : 730395 अरब रुपए पूरी दुनिया को दे चीन: डोनाल्ड ट्रंप

                                                     डोनाल्ड ट्रंप का चीन पर आरोप
    अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर कोरोना वायरस को लेकर चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए उस पर हमला बोला है। ट्रंप ने शुक्रवार (4 जून 2021) को कहा, ”मैंने सही कहा था कि चीनी वायरस वुहान लैब से ही आया है। अब तो हर कोई यहाँ तक कि जो तथाकथित दुश्मन हैं, उन्होंने भी यह कहना शुरू कर दिया है कि चीनी वायरस के वुहान लैब से फैलने की बात पर राष्ट्रपति ट्रंप सही थे।”

    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि इस महामारी से होने वाली मौतों और नुकसान की भरपाई के लिए चीन को अमेरिका और दुनिया को 10 ट्रिलियन डॉलर (7,30,395 अरब रुपए) का भुगतान करना चाहिए।

    दुनिया भर में कोरोना महामारी फैलाने वाले चीन पर भड़कते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ”बराक ओबामा प्रशासन ने बेवकूफी की और वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के लिए फंडिग किया।”

    ट्रंप ने कहा, ”जब मैंने इस बारे में सुना, तब मैंने फैसला किया कि अब किसी भी हालत में चीन को फंड नहीं दिया जाएगा।” उन्होंने यह भी जिक्र किया कि महामारी की शुरुआत में ही उन्होंने चीन के साथ सब कुछ बंद कर दिया था, जिस पर संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर फॉसी ने आपत्ति जताई थी।

    मालूम हो कि अमेरिका के टॉप कोरोना वायरस सलाहकार डॉ. एंथोनी फौसी के निजी ईमेल सामने आने के बाद वुहान लैब से आने वाले चीनी वायरस को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। वाशिंगटन पोस्ट, बजफीड न्यूज और सीएनएन द्वारा सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (एफओआईए) के माध्यम से जनवरी से जून 2020 तक 3,000 से अधिक पेजों का ईमेल प्राप्त किया गया था।

    ईमेल से अमेरिका में कोरोना प्रकोप के शुरुआती दिनों के बारे में पता चला है। डॉ. फौसी और उनके सहयोगियों ने शुरुआती दिनों में इस सिद्धांत पर ध्यान दिया कि COVID-19 वायरस चीन की वुहान लैब से लीक हो सकता है।। ‘लैब लीक’ ईमेल के संबंध में डॉक्टर ने सीएनएन न्यूज चैनल को बताया कि उन्हें अभी भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा है कि वुहान लैब से कोरोना वायरस की उत्पत्ति हुई है।

    उन्होंने कहा कि उन्हें याद नहीं है कि उस संशोधित ईमेल में क्या लिखा है, लेकिन यह बिल्कुल असंभव है। उनके अनुसार यह सोचना समझदारी से परे है कि चीन ने जानबूझकर कुछ ऐसा बनाया है, ताकि वह खुद को और दुनिया के अन्य लोगों को मार सके। हालाँकि, डॉ. फौसी के इस विवादास्पद दावे को पिछले साल विशेषज्ञों ने खारिज कर दिया था, जिन्होंने कहा था कि यह “बिल्कुल असंभव” था। इस बात की पुष्टि करने के लिए अभी तक कोई साक्ष्य भी सामने नहीं आया है।

    वहीं, हाल के दिनों में कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जाँच को लेकर चीन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया गया। जाँच को लेकर शुरू हुईं कवायदों का भारत ने भी पुरजोर समर्थन किया है। भारत ने बीते हफ्ते शुक्रवार (28 मई 2021) को कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर आगे की जाँच के आह्वान का समर्थन किया और इस तरह के अध्ययन के लिए चीन और अन्य पक्षों के सहयोग की माँग की थी।

    दुनिया में कोरोना वायरस फैलाने के लिए शुरू से ही डोनाल्ड ट्रंप चीन को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। उन्होंने कई बार अपने संबोधन में कोरोना को चाइनीज वायरस कहा था।

    दिल्ली : मजहब देख कोरोना वॉरियर्स की मदद करते केजरीवाल; मुस्लिम की मदद लेकिन हिन्दू पुलिसकर्मी की विधवा को सालभर बाद भी नहीं

                                                अरविंद केजरीवाल को अमित राणा की पत्नी ने लिखा पत्र
    ऑनलाइन वेब पोर्टल या ऐप के जरिए लोगों के घरों में देसी और विदेशी दारू पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार शायद भूल गई है कि उन्होंने कोविड महामारी में फ्रंटलाइन पर काम करने के दौरान जान गँवाने वाले वॉरियर्स के परिवारों से कुछ वादे किए थे। लिहाजा एक पुलिसकर्मी की विधवा को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को खत लिखना पड़ा है। वे सालभर से दिल्ली सरकार के मुआवजे की बाट जोह रही हैं। उन्होंने अपने साथ भेदभाव की वजह भी पत्र में पूछी है।
    वैसे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा मजहब देख सियासत करना कोई नई बात नहीं। चुनावों में हनुमान चालीसा पढ़ने वाला अख़लाक़ की मौत पर दिल्ली से दादरी जाने वाले दिल्ली में ही इनके "वोट बैंक" द्वारा हिन्दुओं की हत्या एवं मंदिरों पर हमले होने पर सांप सूंघ जाता है। इतना सबकुछ होने पर समझ नहीं आता कि मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में हिन्दू आम आदमी पार्टी को क्यों वोट देता है? जबकि उनके सामने विकल्प बहुत हैं। अपने शासनकाल में कांग्रेस ने हिन्दू धर्म, संस्कृति और इतिहास को क्षति पहुंचाई है, उसी परम्परा को केजरीवाल की पार्टी आगे बढ़ा रही है। चुनाव आएंगे, फिर दिल्ली की जनता को कोई मुफ्त रेवड़ी देने का वायदा कर सत्ता हथियाने का प्रयास होगा और जनता विशेषकर हिन्दू हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों को भूल इस पार्टी को वोट दे आएगी। नागरिक संशोधक कानून के विरुद्ध में बने शाहीन बाग और हिन्दू विरोधी दंगों को भी भूल जाएगी। 
    सुनिए सोशल मीडिया पर वायरल होता पुलिसकर्मियों का दर्द :


    इसी क्रम में पूरे एक साल के इंतजार के बाद दिवंगत पुलिस कॉन्सटेबल अमित राणा की पत्नी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिख कर अधूरे वादे पर उनका ध्यान आकर्षित करवाया है। उन्होंने हाल में मुआवजा पाने वाले परिवारों का नाम लिए बिना केजरीवाल से इस भेदभाव की वजह पूछी है।

    स्मरण हो कि अमित कुमार राणा का निधन कोविड से 5 मई 2020 को हुआ था। पुलिस बल में कोविड से होने वाली ये पहली मृत्यु थी। अब इस घटना को 1 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल को याद नहीं कि अमित राणा के परिवार को उन्हें 1 करोड़ का मुआवजा देना है।

                                                      अरविंद केजरीवाल को लिखा गया पत्र
    मुख्यमंत्री को उनकी कही बात याद दिलाते हुए राणा की पत्नी पूजा लिखती हैं, “मेरे पति अमित राणा शहीद कोरोना वॉरियर थे और दिल्ली के लोगों की सेवा व रक्षा करते हुए कोरोना से ग्रसित होकर उनकी मृत्यु हो गई। मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उस दुख की घड़ी में मेरे पति की सेवाओं को याद करते हुए आपने एक करोड़ रुपए की सहायता राशि की घोषणा की थी। उस दुख की घड़ी के अंधेरे में वो मेरे लिए आशा की किरण था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी मुझे सहायता राशि नहीं मिल पाई है जिसकी आपने मीडिया पर ट्विटर से घोषणा की थी। कुछ लोगों को आपने दस दिन के अंदर ही सहायता राशि प्रदान कर दी थी फिर मेरे साथ ऐसा भेदभाव क्यों?”

    पूजा लिखती है, “मेरा 1 साल का बेटा और एक चार माह की बेटी है। आज उनके भविष्य की चिंता सता रही है। यदि मुख्यमंत्री अपने किए वादे को पूरा नहीं करते तो शायद मैं किसी पर विश्वास नहीं कर पाऊँगी।”

    इस वर्ष जनवरी में अमित राणा की विधवा पूजा ने बताया था कि अमित की फाइल को दिल्ली सरकार ने रिजेक्ट कर दिया है, क्योंकि यह उनके मापदंडों को पूरा नहीं करती जबकि उन्होंने सरकारी विभाग द्वारा माँगे गए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा कर दिए थे, फिर भी उन्हें कहा गया कि अमित कोविड ड्यूटी में तैनात नहीं थे।

    इस बीच दिल्ली के जीटीबी अस्बताल के डॉक्टर अनस मुजाहिद के रिश्तेदारों तथा कुछ अन्य लोगों को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा 1 करोड़ का मुआवजा दिया जा चुका है। आँकड़ों पर बात करें तो दिल्ली में 100 डॉक्टरों और 92 टीचर्स की मौत हुई है। इसके बावजूद केजरीवाल चुनिंदा लोगों को मुआवजा देने में लगे हैं। 23 मई को केजरीवाल ने डॉ. अनस के पिता से मिल कर उन्हें 1 करोड़ रुपए का चेक सौंपा था। 

    दिल्ली के मुख्यमंत्री बार-बार कहते हैं कि उन्हें कोविड वॉरियर्स की मौतों का खेद हैं और वह उन्हें आर्थिक सहायता मुहैया करवाएँगे। लेकिन हकीकत ये है कि कोविड में ड्यूटी के दौरान संक्रमित होकर जान गँवाने वाले 15 में से 12 पुलिसकर्मियों के परिवारों की फाइल दिल्ली सरकार दिसंबर 2020 में रिजेक्ट कर चुकी है। क्यों? वहीं 3 अभी दिल्ली सरकार के पास पेंडिंग पड़ी है।

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    फिर कहते हैं कि भाजपा, हिन्दू महासभा, संघ और विश्व हिन्दू परिषद् साम्प्रदायिकता का वातावरण बनाकर ध्रुवीकरण का माहौल बना रहे हैं, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि ऐसा माहौल बनाने को मौका ही क्यों दिया? दिल्ली में हिन्दुओं की हत्याओं पर चुप्पी, मंदिरों पर होते हमलों पर चुप्पी, इनके पार्षद द्वारा हिन्दुओं पर हुए हमलों पर चुप्पी लेकिन जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ खड़ा होने में शान समझते हैं। कृषि कानून को दिल्ली में लागु कर यू-टर्न लेकर किसान आंदोलन को समर्थन करना अपना कर्तव्य समझते हैं। हाथ जोड़ विज्ञापनों में कहेंगे कि 'तुम्हारा बेटा हूँ', क्या यही होता है बेटे का कर्तव्य?