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मेवाड़ के शूरमा : जयमल और फत्ता

डॉ राकेश कुमार आर्य,
संपादक : उगता भारत 
मेवाड़ की शौर्य गाथा में जयमल और पत्ता का भी विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। जब अकबर ने 1567 ई0 में मेवाड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया तो उस समय इन दोनों महावीर योद्धाओं ने अपना विशेष पराक्रम दिखाकर इतिहास में अपना नाम अमर किया। उनके पराक्रम के वर्णन के बिना 1567 ईस्वी के उस युद्ध का कोई महत्व नहीं रह जाता है। महाराणा उदय सिंह को उस समय इन दोनों की वीरता के कारण बहुत अधिक संबल मिला था। इन दोनों के कारण ही उस समय मेवाड़ अपने सम्मान को सुरक्षित रखने में किसी सीमा तक सफल रहा था। इसके अतिरिक्त अकबर जैसे शत्रु को भी इन दोनों वीर योद्धाओं के कारण यह पता चल गया था कि भारत का पराक्रम क्या है ? उस समय जयमल की वीरता और शौर्य की दूर-दूर तक भक्ति। मां भारती का यह सच्चा सपूत उस समय अकबर जैसे शत्रु से जिस वीरता से लड़ा था उसे देखकर अकबर ने भी दांतो तले उंगली दबा ली थी। उसकी वीरता की कहानियां आज भी मेवाड़ में घर-घर में सुनी जा सकती हैं। जिससे यह पता चलता है कि वह अपनी वीरता के कारण समकालीन इतिहास में कितना लोकप्रिय था ?
भारत मां की शान हैं , जयमल - फत्ता वीर।
वीरता की खान थे और धीर- वीर - गंभीर।।
जयमल के साथ युद्ध में उसका 16 वर्षीय भाई फत्ता भी अपना सहयोग दे रहा था। दोनों भाइयों ने उस ऐतिहासिक युद्ध में शत्रु पर कहर की वर्षा की थी। उनकी वीरता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी आनंद बोध सरस्वती जी ने अपनी पुस्तक "महाराणा प्रताप" के पृष्ठ 41 पर लिखा है : - "राजपूत सेना खूब जी तोड़कर लड़ी और इस प्रकार घनघोर युद्ध हुआ कि बहुत दिन तक कुछ भी सफलता नहीं मिली। अंत में सुरंग लगाने का विचार हुआ। सुरंग तैयार करने के बाद इसमें बारूद भर दिया गया। इस में आग लगाने के बाद हुए विस्फोट से दोनों पक्षों को बहुत क्षति हुई। 6 महीनों तक किला घिरा हुआ था। राजपूत बड़ी वीरता से प्राणों को हथेली पर रखकर लड़ते थे। इससे किला विजय नहीं हो पाता था।
इस युद्ध में जयमल की पत्नी तारा बाई ने अद्भुत वीरता का काम कर दिखाया। उसने युद्ध में भाग लिया और अपनी बहादुरी से सेना में हड़कंप मचा दिया। इस क्रम में वह दो बार अकबर पर दो वार करने में सफल रही यह उसका दुर्भाग्य था कि दोनों वार खाली चले गए। अंत में जयमल अकबर के तीर से वीरगति को प्राप्त हो गया तो उसका भाई फत्ता आगे बढ़ा और उसने अपनी सेना को जोश से भर दिया किंतु अंत में वह स्वयं आगे बढ़कर लड़ता हुआ मारा गया। हां, जयमल और फत्ता की बहादुरी को अकबर भी मान गया और सम्मान स्वरूप पत्थर की आदमकद मूर्ति बनवाकर उसने किले के द्वार पर खड़ी कर दी। सबसे अंत में वीर जयमल की पत्नी किले के बाहर आई और शत्रुओं को मारती और काटती हुई अपने पति की सहगामिनी हुई।"
जयमल की पारिवारिक पृष्ठभूमि
इस वर्णन से स्पष्ट है कि जयमल और फत्ता का पूरा परिवार ही वीर योद्धाओं का परिवार था। सचमुच वह वीरांगना अभिनंदन की पात्र है जिसने सीधे जौहर न करके अनेक शत्रु सैनिकों को दोजख की आग में झोंक दिया था। उसने अकेला मरना उचित नहीं माना। इसके विपरीत अनेक शत्रुओं का अंत करके आत्म दान देना उचित माना।
ताराबाई धन्य थी, धन्य था उसका कृत्य।
राष्ट्र नमन करता उसे हो करके कृतकृत्य।।
जयमल फत्ता का संबंध मेड़ता से था। जब मालदेव ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया, तब जयमल का मेवाड़ महाराणा उदयसिंह के पास चला गया था। महाराणा ने उसे सम्मान प्रदान करते हुए बदनौर की जागीर प्रदान की।1562 ई0 में उसने मेड़ता पर पुनः अधिकार स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उसके पश्चात मुगल सम्राट अकबर ने जयमल के राज्य मेड़ता पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना भेजी। इसके पश्चात जयमल एक बार पुनः मेवाड़ में महाराणा उदय सिंह के पास लौट आया। जब 1567ई0 की सीमा अकबर नहीं मेवाड़ पर दूसरी बार हमला किया तो उस समय महाराणा उदय सिंह ने जयमल की वीरता से प्रभावित होकर उसे चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा का दायित्व सौंपा था। अपने इस दायित्व को निभाने में जयमल ने पूरी निष्ठा से कार्य किया था। वह मातृभूमि के प्रति पूर्णतया समर्पित था और वह जानता था कि मां का ऋण प्राण देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। वीरता उन दोनों भाइयों के भीतर कूट-कूट कर भरी हुई थी।
देश के हित जान देकर नाम रोशन कर गए
वीरता के ओज से , वे देश को थे भर गए ।
कौन कहता जान देकर दोनों बंधु मर गए,
ध्यान से देखो तनिक ! वे तो हो अमर गए।।
यह घटना 26 अक्टूबर 1567 के दिन की है। जब जयमल और फत्ता ने अपने स्वामी महाराणा उदय सिंह को अन्य सरदारों व सामंतों के साथ परामर्श करने के उपरांत किले से बाहर निकाल दिया था। महाराणा को किले से बाहर निकालने का अर्थ था कि अब अपने आपको आत्म बलिदान के लिए तैयार कर लेना। वास्तव में महाराणा को कीले से बाहर निकालने के क्षण उसी समय आए थे जब राजपूतों के बचने की कोई संभावना नहीं रही थी। केसरिया साफा बांधकर अगले दिन केवल मौत का आलिंगन करना था। बस , देखना केवल यह था कि मौत का आलिंगन करते समय भी कितनी वीरता का प्रदर्शन किया जा सकता है? कहना न होगा कि महाराणा को किले से बाहर निकालने का अर्थ अपनी मृत्यु के फरमान पर अपने आप हस्ताक्षर कर लेना था।
हम कितने सौभाग्यशाली हैं
सचमुच हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमारे पूर्वजों के लिए अपनी मृत्यु के फरमान पर अपने आप हस्ताक्षर करने का सौदा सदा बड़ा सस्ता रहा। जिसे शेष संसार सबसे महंगा सौदा कहता है उसे हमारे पूर्वजों ने सबसे सस्ता बनाकर रख दिया था। हथेली पर जान रख कर लोग इश्क के लिए चलते हैं, जबकि हमारे पूर्वज हथेली पर जान रखकर वतन की हिफाजत के लिए चलते थे।
जयमल और फत्ता के पास 8 हजार सैनिकों की मेवाड़ी सेना साथ में थी। सेना का उत्साह देखते ही बनता था। वैसे भी अभी कुछ समय पूर्व ही अकबर की मुस्लिम सेना को मेवाड़ की सेना ने मारकर भगाया था। इसके अतिरिक्त शत्रु के प्रति सात्विक उत्साह रखकर उसके विनाश के लिए संकल्पित होना भारत की सेना की प्राचीन परंपरा रही है। अकबर इस बात की प्रतीक्षा में था कि महाराणा उदय सिंह किले के फाटक खोलें और बाहर आकर मैदानी लड़ाई लड़ें। जबकि महाराणा के पास पर्याप्त रसद होने के कारण वह किले के भीतर ही रहना पसंद कर रहे थे।
जब अकबर ने देखा कि महाराणा फाटक नहीं खोल रहे हैं तो उसने किले की दीवारों पर गोले बरसाने आरंभ कर दिये। जयमल एक अच्छे निर्माता भी थे। उन्हें निर्माण कला का अच्छा ज्ञान था। वह रात्रि में किले की उन सारी दीवारों की मरम्मत करवा देते थे जिन्हें अकबर के सैनिक दिन में अपने तोप के गोलों से तोड़ने में सफल होते थे। इससे शत्रु सेना के लिए जयमल ने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। अकबर समझ नहीं पा रहा था कि अब उसे क्या करना चाहिए? किले के फाटक को तोड़ने में वह सफल नहीं हो पा रहा था और यदि दीवारों को तोड़कर रास्ता बनाकर भीतर जाने का प्रयास कर रहा था तो उसे जयमल पूर्ण नहीं होने दे रहा था।

फिर बाबर को किसने बुलाया ?

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत

यदि बाबर को महाराणा संग्राम सिंह ने भारत पर आक्रमण करने के लिए नहीं बुलाया था तो फिर उसे बुलाया किसने था ? यह प्रश्न बड़ा स्वाभाविक है। यदि हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि भारत पर आक्रमण करने की बात जब बाबर सोच रहा था तो उस समय पंजाब के राज्यपाल दौलत खान लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। इब्राहिम लोदी इस दौलत खान लोदी का भतीजा था । उस समय अपने अपने सत्ता स्वार्थों के चलते चाचा भतीजे की आपस में ठनी हुई थी। इस प्रकार अपनी परिवारिक शत्रुता या रंजिश के कारण पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल ने बाबर को इब्राहिम लोदी के विरुद्ध भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। पंजाब के इस राज्यपाल ने बाबर के समक्ष यह शर्त भी रख दी थी कि बाबर पंजाब का शासक बन जाएगा तथा दिल्ली आलम खान को मिलेगी।

यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि यदि महाराणा संग्राम सिंह विदेशी आक्रमणकारी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करते तो उनसे हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी कभी मिलने नहीं जाते। क्योंकि बाबर के द्वारा तथाकथित रूप से आमंत्रित किए गए बाबर ने सर्वप्रथम इन्हीं लोगों को आहत किया था। वह दोनों महाराणा संग्राम सिंह से मिलने इसीलिए गए थे कि महाराणा भी विदेशी बाबर के विरोधी थे। बाबर के विरुद्ध जब महाराणा संग्राम सिंह हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी के साथ वार्ता कर रहे थे तो तीनों के बीच इस बात पर सहमति बनी कि बाबर के विरुद्ध मिलकर लड़ाई लड़ी जाएगी।
बाबर के विरुद्ध बना संयुक्त मोर्चा
इस संयुक्त मोर्चे का बनना इस बात का संकेत है कि तीनों ही समान रूप से बाबर को अपना शत्रु मानते थे। महाराणा संग्राम सिंह यद्यपि किसी भी मुस्लिम शासक को भारत में देखना नहीं चाहते थे। परंतु राजनीति कई बार अलग दिशा में चलती हुई दिखती है जबकि कूटनीति कभी-कभी दूसरी दिशा में जाती दिखाई देती है। कहने का अभिप्राय है कि राजनीति में रहकर जब कूटनीति चली जाती है तो उस समय यह आवश्यक नहीं होता कि जो दीख रहा होता है वही सच होता है। उसका कोई ना कोई निहित अर्थ होता है, जो ढूंढ कर निकाला जाता है। यदि इन तीनों के गठबंधन पर विचार किया जाए तो राणा संग्राम सिंह की सोच केवल एक थी कि घर की छोटी मोटी बातों या समस्याओं को तो बाद में भी समाप्त कर लिया जाएगा पर इस समय बड़ी बुराई से निपटने के लिए सबका साथ रहना आवश्यक है।
इस मंत्रणा में हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी ने महाराणा संग्राम सिंह की सर्वोच्चता को स्वीकार किया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि युद्ध का परिणाम हमारे अनुकूल आता है तो दिल्ली के अधिपति महाराणा संग्राम सिंह ही होंगे।
इस प्रकार के निर्णय से स्पष्ट होता है कि उस समय हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी दोनों देशभक्ति की भावना से सराबोर थे। उन्हें भी बाबर मुक्त भारत की ही इच्छा थी। वास्तव में उस समय इन तीनों शक्तियों का मिलना भारत के भविष्य को तय कर रहा था। इस बैठक से यह निश्चित हो गया था कि अब बाबर का संघर्ष महाराणा संग्राम सिंह से होना अनिवार्य हो गया है। बैठक ने यह भी निश्चित कर दिया था कि आने वाले भारत की दिशा क्या होगी ? देश के प्रबुद्ध वर्ग को इस बात का संकेत मिल गया था कि बाबर को इस देश में भारतवर्ष की सबसे बड़ी शक्ति से भिड़कर ही अपने भविष्य का निश्चय करना होगा।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि बाबर इन तीनों के गठबंधन से अपरिचित रहा हो। निश्चय ही वह भी अपने गुप्तचरों के माध्यम से उन तीनों की इस बैठक पर पूरी सजगता के साथ नजर गड़ाए होगा। जब भी आप किसी अपरिचित स्थान पर होते हैं तो वहां पर स्वाभाविक रूप से अधिक चौकसी करनी पड़ती है। बाबर के साथ भी यही हो रहा था। उस समय बाबर का जयेष्ठ पुत्र हुमायूं अपनी सेना के साथ बढ़ता - बढ़ता पूरब के राज्यों में बहुत दूर तक अपना अधिकार स्थापित कर चुका था। तब बाबर दक्षिण की ओर अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा। महाराणा संग्राम सिंह ने इस अवसर को अपने लिए अनुकूल समझा। उन्होंने जब यह सुना कि बाबर उनकी ओर बढ़ रहा है तो वह अपनी सेना सहित उसी ओर आगे बढ़ने लगे जिस ओर से बाबर चढ़ा आ रहा था। राणा संग्राम सिंह संग्राम को ढूंढते फिरते रहते थे। वह भारत की क्षत्रिय परंपरा के प्रतीक पुरुष थे। क्षत्रियों का कार्य ही अन्याय के विरुद्ध लड़ना होता है। संसार के किसी भी कोने में होने वाले अत्याचारों को मिटाना उनका धर्म होता है। महाराणा संग्राम सिंह अपने धर्म को भली प्रकार जानते थे। यही कारण था कि वह बाबर से भिड़कर उसका सर्वनाश कर देना चाहते थे। महाराणा संग्राम सिंह की सेना ने बाबर की सेना को अपनी ओर बढ़ने से रोकने का असफल प्रयास भी किया।
मुस्लिम किलेदारों ने की देश के साथ गद्दारी
बाबर ने धौलपुर, बियाना और ग्वालियर के किलों को बड़ी सहजता से अपने साथ मिला लिया। वहां से उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली। इससे उसका मन और भी अधिक बढ़ गया था। इन किलों के किलेदार मुसलमान ही थे। उन्होंने बाबर का साथ देकर देश के साथ गद्दारी की और सांप्रदायिक आधार पर एक विदेशी आक्रमणकारी का साथ देकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि उनके लिए राष्ट्र से पहले मजहब है। इन गद्दारों को अपने साथ मिलाकर बाबर और भी अधिक उत्साहित हो गया था। उसने इन गद्दारों को उचित पुरस्कार देते हुए जागीरें भी प्रदान कर दी थीं। इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह के मनोबल पर किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा । वह अपने उत्साह को यथावत बनाए हुए आगे बढ़ रहे थे । वह जानते थे कि गद्दारी कहां से हो सकती है ? और ये गद्दार उनके लिए कितने अधिक खतरनाक हो सकते हैं ?
जब महाराणा संग्राम सिंह को यह पता चला कि बियाना में किले की सुरक्षा के लिए तुर्क सेना छोड़ दी गई है तो राणा की सेना ने बियाना पर आक्रमण किया और बाबर की सेना को बड़ी संख्या में मार कर बियाना के किले पर अधिकार स्थापित कर लिया। तत्कालीन परिस्थितियों में महाराणा संग्राम सिंह को मिली यह जीत बहुत अधिक महत्व रखती थी। यद्यपि वर्तमान इतिहास में इस जीत को कोई स्थान नहीं दिया गया। द्वेष भाव से लिखे गए इतिहास में भारत के इस महानायक को यहां भी उपेक्षित करने का प्रयास किया गया है। यदि इसके महत्व पर हम प्रकाश डालें तो पता चलता है कि बाबर की सेना को परास्त करने के लिए या उससे खानवा का युद्ध करने से पूर्व किस प्रकार एक योजनाबद्ध ढंग से महाराणा संग्राम सिंह के द्वारा कार्य किया गया था ? इस पहली झड़प से ही बाबर को महाराणा संग्राम सिंह के महत्व और उनके बल का आभास हो गया था। उसे पता चल गया था कि उसका विशाल सैन्य दल महाराणा के मनोबल के सामने कुछ भी नहीं है।
बियाना में हुआ भयंकर संघर्ष
फलस्वरूप बाबर ने अब युद्ध के लिए और भी बड़े स्तर पर तैयारी आरंभ कर दी थी। बड़े सैन्य दल के साथ अब वह महाराणा से युद्ध करने के लिए रण क्षेत्र की ओर बढ़ने लगा। भरतपुर राज्य के बियाना नामक स्थान पर राणा संग्राम सिंह की सेना से बाबर का भयंकर युद्ध हुआ। उस समय बाबर के साथ काबुल की पूर्व सेना के साथ-साथ दिल्ली की वह मुस्लिम सेना भी थी जो उसे लोदी को हटाने के पश्चात मिली थी। इस प्रकार एक विशाल सैन्य दल का सामना महाराणा संग्राम सिंह की सेना को इस समय करना पड़ रहा था।
इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना अपने शत्रु पर भारी होती जा रही थी। महाराणा संग्राम सिंह परम प्रतापी थे। अपने प्रताप और पराक्रम के बल पर वह शत्रु से युद्ध रत थे । उनके प्रताप और पराक्रम से उनकी सेना को भी निरंतर ऊर्जा प्राप्त हो रही थी। वह सूर्य के समान पराक्रमी होकर शत्रु पर टूटते थे और उसी का अनुकरण करते हुए शत्रु के खून की प्यासी होकर उनकी सेना भी शत्रु पक्ष पर टूट पड़ती थी। बड़ी संख्या में विदेशी शत्रुओं के शव धरती पर गिरते जा रहे थे। राणा के सैनिक भूखे शेर की तरह अपने शत्रुओं पर टूट पड़ते थे। अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देना मेवाड़ की शान रही थी । आज अपनी उसी शान को प्रकट करने के लिए जब परीक्षा की घड़ी आई तो कोई भी हिंदू वीर योद्धा पीछे हटने को तैयार नहीं था। अनेक शत्रु सैनिकों का संहार करके अपने प्राणोत्सर्ग करने की उनमें होड़ मची हुई थी।
अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक - एक इंच भूमि को मुक्त करने के संकल्प के साथ हर - हर महादेव का गगनभेदी उद्घोष करते हुए भारत की वीर सेना शत्रु पर टूट पड़ती थी। जिधर भी हमारे वीर योद्धा आगे बढ़ते उधर ही शत्रु सेना में कोहराम मच जाता था। उस समय युद्ध का रोमांच अपने शिखर पर था। आज हमारे वीर योद्धा विदेशी शत्रु, विदेशी धर्म और विदेशी सोच को मिटाने के लिए युद्धरत थे। वह दिल्ली से ही नहीं अपितु भारत की एक-एक इंच भूमि से शत्रु को भगा देने के लिए युद्ध में अपना कौशल दिखा रहे थे। शत्रु सेना भी उस समय भारत को पाने के लिए प्राणपण से संघर्ष कर रही थी। उन्हें अपने दीन के प्रचार - प्रसार के लिए बड़े सौभाग्य से मिली हिंदुस्तान की भूमि को खोने की उतनी ही चिंता थी जितनी अपनी आन, बान, शान को बनाए रखने की चिंता हमारे देश के महानायक महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना के सैनिकों को थी।
युद्ध का परिणाम
इस घनघोर युद्ध का परिणाम यह निकला कि कुछ ही समय में राणा की सेना शत्रु पक्ष पर निर्णायक विजय पानी की दिशा में आगे बढ़ने लगी। शत्रु पक्ष की सेना अब भागने की स्थिति में आ गई थी। उसका मनोबल टूटने लगा था और हिंदू वीरों की वीरता के समक्ष उसके पांव उखड़ चुके थे। युद्ध क्षेत्र को छोड़कर बाबर की सेना अंत में भाग खड़ी हुई। इस रणभूमि ने अपना निर्णय हिंदू हितों के रक्षक महाराणा संग्राम सिंह की सेना और उसके पराक्रम के पक्ष में दिया।
महाराणा संग्राम सिंह से यहां पर एक चूक हुई कि उन्होंने भागती हुई शत्रु की सेना का दूर तक पीछा नहीं किया। यदि वह दूर तक भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा करके उसे मारते काटते चले जाते तो फिर कभी शत्रु का उनकी ओर लौटना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने उदारता दिखाते हुए युद्ध क्षेत्र से भागी हुई सेना का पीछा नहीं किया । हमारी उदारता का दिव्य गुण हमारे लिए फिर बीच में आ गया।
यदि इस प्रकार के मानवीय गुण भारत को युद्ध क्षेत्र में परेशान नहीं करते या हमारे महान योद्धाओं के सिद्धांतों के आड़े नहीं आते तो हम मोड़ लेने के लिए लालायित इतिहास को निर्णायक मोड़ लेटे हुए देखते। इस युद्ध के पश्चात भी महाराणा संग्राम सिंह के लिए अभी 'दिल्ली दूर थी।' उन्हें दिल्ली को लेने के लिए अभी कुछ और भी करना था। दिल्ली को शत्रुविहीन करने के लिए महाराणा संग्राम सिंह यदि उस समय भागती हुई मुस्लिम सेना को लगे हाथों दिल्ली से भी भगा देते तो दिल्ली बड़ी सहजता से उनके हाथों में आ जाती। तब भारतवर्ष का इतिहास भी कुछ दूसरा होता।
कहते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है । युद्ध से तो समस्याएं आरंभ होती हैं। यहां भी जो युद्ध लड़ा गया था वह समस्या का अंत नहीं था अपितु यहां से एक समस्या आरंभ हुई थी और वह समस्या यही थी कि दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में जुटा जाए। फलस्वरूप महाराणा भी दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में लग गए , और शत्रु बाबर भी नए युद्ध की तैयारी में लग गया।