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ताजमहल को शाहजहाँ ने नहीं बनवाया, यह था हिंदू राजा का महल… गलत लिखा इतिहास में: दिल्ली हाईकोर्ट में मामला, ASI करेगी विचार


दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार (3 अक्टूबर 2023) को अपने एक फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को ताजमहल के ‘सही इतिहास’ को प्रकाशित करने वाले आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया। अपनी जनहित याचिका में हिंदू सेना ने कहा कि ताजमहल को मुगल बादशाह शाहजहाँ ने नहीं, बल्कि राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के कच्छावा वंश के क्षत्रिय राजा मान सिंह ने बनवाया था।

इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सतीशचंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने इस मामले में ASI को निर्देश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले भी इस तरह की प्रार्थनाओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। शीर्ष अदालत ने तब संगठन से ASI के समक्ष एक आवेदन दाखिल करने को कहा था।

शुक्रवार को उच्च न्यायालय को याचिकाकर्ता ने बताया कि ASI ने अभी तक उनके प्रत्यावेदन पर निर्णय नहीं लिया है। इसलिए, बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उस अभ्यावेदन पर गौर करने के लिए कहा है। हिंदू सेना के अध्यक्ष सुरजीत सिंह यादव ने दायर याचिका में कहा है कि ताजमहल मूल रूप से राजा मान सिंह का महल था और बाद में शाहजहाँ द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया गया था।

यादव ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट से आग्रह किया कि इतिहास की किताबों से ताजमहल के निर्माण से संबंधित ‘ऐतिहासिक रूप से गलत तथ्यों’ को हटाने के लिए ASI, केंद्र सरकार, भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दे। याचिका में ASI से ताजमहल की उम्र और राजा मान सिंह के महल के अस्तित्व के बारे में जाँच करने का निर्देश देने की भी माँग की गई है।

याचिकाकर्ता सुरजीत यादव का कहना है कि उन्होंने ताजमहल के बारे में ‘गहरा अध्ययन और शोध’ किया है। इसलिए इतिहास के तथ्यों को सुधारना और लोगों को ताजमहल के बारे में सही जानकारी देना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने जेडए देसाई द्वारा लिखित ‘ताज संग्रहालय’ नामक पुस्तक का भी उल्लेख किया, जिसमें मुमताज महल को दफनाने के लिए एक ‘ऊँची और सुंदर’ जगह का चयन किया गया था।

इस पुस्तक का हवाला देते हुए उन्होंने अपनी याचिका में आगे कहा कि यह ऊँची और सुंदर जगह राजा मान सिंह की हवेली थी, जो उस समय उनके पोते राजा जय सिंह के कब्जे में थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस हवेली को कभी ध्वस्त नहीं किया गया था। यादव का कहना है कि ताजमहल की वर्तमान संरचना राजा मान सिंह की हवेली का एक संशोधन और नवीनीकरण भर है, जो पहले से मौजूद थी।

सुरजीत यादव ने कहा है, “ता संग्रहालय नामक पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि मुमताज महल का मृत शरीर राजा जय सिंह के भूमि परिसर के भीतर एक अस्थायी गुंबददार संरचना के तहत दफनाया गया था। यह उल्लेख करना उचित है कि ऐसा कोई विवरण नहीं है, जो बताता हो कि राजा मान सिंह की हवेली को ताजमहल के निर्माण के लिए ध्वस्त किया गया था।”

याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने ताजमहल पर कई किताबों की जाँच की और एक किताब में कहा गया है कि शाहजहाँ की पत्नी आलिया बेगम थीं। मुमताज महल का कहीं कोई जिक्र नहीं है। ASI की वेबसाइट पर विरोधाभासी जानाकारी देने का आरोप लगाते हुए याचिका में कहा गया है कि ASI ने बेवसाइट पर कहा है कि 1631 में मुमताज महल की मृत्यु के 6 महीने बाद शव को ताजमहल के मुख्य मकबरे के तहखाने में दफनाने के लिए आगरा लाया गया था।
याचिका में कहा गया है कि ASI की उसी वेब पेज पर उल्टा जानकारी दी गई है, जहाँ कहा गया है कि 1648 में ताजमहल का निर्माण पूरा होने में लगभग 17 साल लगे थे। याचिका में कहा गया है कि जब ताजमहल को पूरा होने में 17 साल लगे और वह 1648 में बनकर तैयार हुआ तो मुमताज महल का शव 1631 ईस्वी में दफनाने के लिए आगरा कैसे लाया गया। यह विरोधाभासी और भ्रामक है।

‘मुगल महान, हिंदुओं ने बौद्ध मंदिर तोड़े’: मुगलों के ‘प्रवक्ता’ राजदीप सरदेसाई को साथी पत्रकार गौरव सावंत ने पानी पिला-पिला कर धो दिया

                                    मुगल इतिहास पर बात करते हुए राजदीप सरदेसाई और गौरव सावंत
NCERT किताबों में मुगल इतिहास पर विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में हर न्यूज रूम में इस पर बहस हो रही है। एक पक्ष का कहना है कि स्कूली शिक्षा में मुगलों के बारे में पढ़ाया जाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि पता चले कि उन्होंने भारत के लिए कितना कुछ किया। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि मुगलों का इतिहास शिक्षा का हिस्सा हो लेकिन उसे बिन किसी तोड़-मरोड़ के पेश किया जाए ताकि ये पता चले कि मुगलों ने भारत में कितनी तबाही मचाई।

अब यही बहस न्यूजरूम्स तक भी पहुँच गई है। इंडिया टुडे के एंकर व कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई भी ऐसी ही एक चर्चा में शामिल हुए जहाँ उन्होंने अपने ‘प्रोपेगेंडा’ को गोल-मोल करके पेश करने का प्रयास किया। हालाँकि, इस दौरान शो में बैठे एंकर व मैनेजिंग एडिटर गौरव सावंत ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई। उन्हें तथ्यों से वाकिफ करवाते हुए बताया कि आखिर किस तरह मुगलों ने भारत में हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा था जिसे इतिहास की किताबों में चालाकी से छिपा दिया गया।

इंडिया टुडे के डेमोक्रेटिक न्यूजरूम शो में देख सकते हैं कि राजदीप सरदेसाई कहते हैं, “इतिहास की बातें इतिहासकारों के हाथ में छोड़ दी जानी चाहिए, न कि उसे राजनेताओं को लिखने को देना चाहिए, क्योंकि ऐसा होते ही इतिहास में जहर भर जाता है। आप इतिहास से मुगलों को नहीं मिटा सकते। उन्होंने भारत के बहुलवादी संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है। आप उन्हें मिटाकर कैसे सिर्फ विलन दिखा सकते हैं। मैं नहीं कहता कि अकबर महान था। मगर कम-से-कम हमारे युवाओं को अकबर के बारे में पढ़ने तो दो। उन्हें देश के अन्य राजाओं के बारे में पढ़ने दो। लेकिन इस प्रकार चुन-चुनकर इतिहास मिटाना ताकि वो राजनैतिक एजेंडे को सूट करे वहाँ मुझे आपत्ति होती है। यही पाकिस्तान ने भी इतिहास के साथ किया था जिस वजह से वहाँ की पीढ़ी भारत पर निशाना साधती रहती है।”

गौरव सावंत ने लगाई राजदीप को लताड़

राजदीप की बात सुनने के बाद गौरव सावंत ने अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि वह राजदीप से सहमत हैं कि मुगल इतिहास को कभी भी बच्चों की किताबों से नहीं मिटाया जाना चाहिए। इस देश को पता होना चाहिए कि अकबर ने आखिर किया क्या था। पता होना चाहिए कि बाबर इस धरती का एक विध्वंसक था जो कहीं और से आया था। चित्तौड़ के युद्ध में कैसे 40 हजार हिंदू मारे गए थे और उनकी संख्या मापने के लिए उनके जनेऊ गिने गए थे।
उन्होंने कहा ये सब राजनेताओं द्वारा लिखित इतिहास की किताब में नहीं लिखा गया बल्कि इसे जेम्स स्टॉर्ट ने लिखा है। इसी तरह अकबर ने प्रयागराज और बनारस में क्या किया। बदायूनी को इसलिए ईनाम से नवाजा था क्योंकि उसने काफिरों के खून में अपने दाढ़ी भिगाने की बात कही थी। इसके बाद फादर मॉनसेराट ने भी लिखा है कि कैसे मुसलमानों ने हिंदुओं के मंदिरों और उसकी मूर्तियों को तोड़ा।

‘दीन-ए-इलाही’ की आड़ में छिपाया हिंदुओं का नरसंहार

कार्यक्रम में राजदीप सरदेसाई को कहते सुना जा सकता है कि गौरव नफरत फैलाने के अलावा भी बहुत सारा इतिहास है। उन्होंने दीन-ए-इलाही का उदाहरण रखकर इस्लामी बर्बरता पर सफाई देने का प्रयास किया। वहीं गौरव सावंत ने उन्हें ये कहकर चुप कराया कि मार्क्सवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास में यही तो था कि उसमें दीन-ए-इलाही बता दिया गया, लेकिन ये नहीं बताया गया कैसे चित्तौड़ में हिंदू मरे। जहाँगीर के बारे में यह नहीं बताया गया कि कैसे उसने सिखों के पाँचवे गुरु को गर्म तवे पर बैठाकर मारा था।
अवलोकन करें:-
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
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ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
पिताश्री एम.बी.एल. निगम श्री केवल रतन मलकानी अस्सी के दशक में विश्व चर्चित पत्रकार श्री केवल रतन मलकानी, मुख्य सम्प....


डेमोक्रेटिक न्यूजरूम की यह बहस यही नहीं रुकी। इस कार्यक्रम में राजदीप ने बहादुर शाह जफर को महान विद्वान बताया और ये भी कहा कि उन्होंने विलियन डार्लिम्पल के पॉडकास्ट से जफर के योगदान के बारे में जाना। कहा कि जिस दिल्ली में हम रहते हैं यहाँ भी मुगलों ने काफी योगदान दिया है। इस पर गौरव सावंत ने उनसे पूछा कि आखिर दिल्ली के बड़े-बड़े मंदिर कहाँ हैं। राजदीप ने आगे यहाँ तक कहा कि हिंदुओं ने बौद्धों के मंदिरों को तोड़ा जिसे सुन ट्विटर के ट्रू इंडोलॉडी अकॉउंट ने उन्हें चुनौती दी कि वो बस तीन ऐसे हिंदू राजाओं के बारे में बता दें, उसके बाद वह तमाम हिंदू राजाओं के बारे में बताएँगे जिन्होंने बौद्ध धर्म के लिए कितना कुछ किया।
बीते कुछ दिनों से ये चर्चा हो रही है कि 12 वीं की एनसीईआरटी किताबों से मुगल इतिहास के अध्याय हटाए जा रहे हैं। जबकि एनसीईआरटी के डायरेक्टर का कहना है कि ऐसा दावा करने वाले न्यूज आउटलेट सिर्फ झूठ फैला रहे हैं।

फिर बाबर को किसने बुलाया ?

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत

यदि बाबर को महाराणा संग्राम सिंह ने भारत पर आक्रमण करने के लिए नहीं बुलाया था तो फिर उसे बुलाया किसने था ? यह प्रश्न बड़ा स्वाभाविक है। यदि हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि भारत पर आक्रमण करने की बात जब बाबर सोच रहा था तो उस समय पंजाब के राज्यपाल दौलत खान लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। इब्राहिम लोदी इस दौलत खान लोदी का भतीजा था । उस समय अपने अपने सत्ता स्वार्थों के चलते चाचा भतीजे की आपस में ठनी हुई थी। इस प्रकार अपनी परिवारिक शत्रुता या रंजिश के कारण पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल ने बाबर को इब्राहिम लोदी के विरुद्ध भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। पंजाब के इस राज्यपाल ने बाबर के समक्ष यह शर्त भी रख दी थी कि बाबर पंजाब का शासक बन जाएगा तथा दिल्ली आलम खान को मिलेगी।

यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि यदि महाराणा संग्राम सिंह विदेशी आक्रमणकारी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करते तो उनसे हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी कभी मिलने नहीं जाते। क्योंकि बाबर के द्वारा तथाकथित रूप से आमंत्रित किए गए बाबर ने सर्वप्रथम इन्हीं लोगों को आहत किया था। वह दोनों महाराणा संग्राम सिंह से मिलने इसीलिए गए थे कि महाराणा भी विदेशी बाबर के विरोधी थे। बाबर के विरुद्ध जब महाराणा संग्राम सिंह हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी के साथ वार्ता कर रहे थे तो तीनों के बीच इस बात पर सहमति बनी कि बाबर के विरुद्ध मिलकर लड़ाई लड़ी जाएगी।
बाबर के विरुद्ध बना संयुक्त मोर्चा
इस संयुक्त मोर्चे का बनना इस बात का संकेत है कि तीनों ही समान रूप से बाबर को अपना शत्रु मानते थे। महाराणा संग्राम सिंह यद्यपि किसी भी मुस्लिम शासक को भारत में देखना नहीं चाहते थे। परंतु राजनीति कई बार अलग दिशा में चलती हुई दिखती है जबकि कूटनीति कभी-कभी दूसरी दिशा में जाती दिखाई देती है। कहने का अभिप्राय है कि राजनीति में रहकर जब कूटनीति चली जाती है तो उस समय यह आवश्यक नहीं होता कि जो दीख रहा होता है वही सच होता है। उसका कोई ना कोई निहित अर्थ होता है, जो ढूंढ कर निकाला जाता है। यदि इन तीनों के गठबंधन पर विचार किया जाए तो राणा संग्राम सिंह की सोच केवल एक थी कि घर की छोटी मोटी बातों या समस्याओं को तो बाद में भी समाप्त कर लिया जाएगा पर इस समय बड़ी बुराई से निपटने के लिए सबका साथ रहना आवश्यक है।
इस मंत्रणा में हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी ने महाराणा संग्राम सिंह की सर्वोच्चता को स्वीकार किया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि युद्ध का परिणाम हमारे अनुकूल आता है तो दिल्ली के अधिपति महाराणा संग्राम सिंह ही होंगे।
इस प्रकार के निर्णय से स्पष्ट होता है कि उस समय हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी दोनों देशभक्ति की भावना से सराबोर थे। उन्हें भी बाबर मुक्त भारत की ही इच्छा थी। वास्तव में उस समय इन तीनों शक्तियों का मिलना भारत के भविष्य को तय कर रहा था। इस बैठक से यह निश्चित हो गया था कि अब बाबर का संघर्ष महाराणा संग्राम सिंह से होना अनिवार्य हो गया है। बैठक ने यह भी निश्चित कर दिया था कि आने वाले भारत की दिशा क्या होगी ? देश के प्रबुद्ध वर्ग को इस बात का संकेत मिल गया था कि बाबर को इस देश में भारतवर्ष की सबसे बड़ी शक्ति से भिड़कर ही अपने भविष्य का निश्चय करना होगा।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि बाबर इन तीनों के गठबंधन से अपरिचित रहा हो। निश्चय ही वह भी अपने गुप्तचरों के माध्यम से उन तीनों की इस बैठक पर पूरी सजगता के साथ नजर गड़ाए होगा। जब भी आप किसी अपरिचित स्थान पर होते हैं तो वहां पर स्वाभाविक रूप से अधिक चौकसी करनी पड़ती है। बाबर के साथ भी यही हो रहा था। उस समय बाबर का जयेष्ठ पुत्र हुमायूं अपनी सेना के साथ बढ़ता - बढ़ता पूरब के राज्यों में बहुत दूर तक अपना अधिकार स्थापित कर चुका था। तब बाबर दक्षिण की ओर अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा। महाराणा संग्राम सिंह ने इस अवसर को अपने लिए अनुकूल समझा। उन्होंने जब यह सुना कि बाबर उनकी ओर बढ़ रहा है तो वह अपनी सेना सहित उसी ओर आगे बढ़ने लगे जिस ओर से बाबर चढ़ा आ रहा था। राणा संग्राम सिंह संग्राम को ढूंढते फिरते रहते थे। वह भारत की क्षत्रिय परंपरा के प्रतीक पुरुष थे। क्षत्रियों का कार्य ही अन्याय के विरुद्ध लड़ना होता है। संसार के किसी भी कोने में होने वाले अत्याचारों को मिटाना उनका धर्म होता है। महाराणा संग्राम सिंह अपने धर्म को भली प्रकार जानते थे। यही कारण था कि वह बाबर से भिड़कर उसका सर्वनाश कर देना चाहते थे। महाराणा संग्राम सिंह की सेना ने बाबर की सेना को अपनी ओर बढ़ने से रोकने का असफल प्रयास भी किया।
मुस्लिम किलेदारों ने की देश के साथ गद्दारी
बाबर ने धौलपुर, बियाना और ग्वालियर के किलों को बड़ी सहजता से अपने साथ मिला लिया। वहां से उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली। इससे उसका मन और भी अधिक बढ़ गया था। इन किलों के किलेदार मुसलमान ही थे। उन्होंने बाबर का साथ देकर देश के साथ गद्दारी की और सांप्रदायिक आधार पर एक विदेशी आक्रमणकारी का साथ देकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि उनके लिए राष्ट्र से पहले मजहब है। इन गद्दारों को अपने साथ मिलाकर बाबर और भी अधिक उत्साहित हो गया था। उसने इन गद्दारों को उचित पुरस्कार देते हुए जागीरें भी प्रदान कर दी थीं। इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह के मनोबल पर किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा । वह अपने उत्साह को यथावत बनाए हुए आगे बढ़ रहे थे । वह जानते थे कि गद्दारी कहां से हो सकती है ? और ये गद्दार उनके लिए कितने अधिक खतरनाक हो सकते हैं ?
जब महाराणा संग्राम सिंह को यह पता चला कि बियाना में किले की सुरक्षा के लिए तुर्क सेना छोड़ दी गई है तो राणा की सेना ने बियाना पर आक्रमण किया और बाबर की सेना को बड़ी संख्या में मार कर बियाना के किले पर अधिकार स्थापित कर लिया। तत्कालीन परिस्थितियों में महाराणा संग्राम सिंह को मिली यह जीत बहुत अधिक महत्व रखती थी। यद्यपि वर्तमान इतिहास में इस जीत को कोई स्थान नहीं दिया गया। द्वेष भाव से लिखे गए इतिहास में भारत के इस महानायक को यहां भी उपेक्षित करने का प्रयास किया गया है। यदि इसके महत्व पर हम प्रकाश डालें तो पता चलता है कि बाबर की सेना को परास्त करने के लिए या उससे खानवा का युद्ध करने से पूर्व किस प्रकार एक योजनाबद्ध ढंग से महाराणा संग्राम सिंह के द्वारा कार्य किया गया था ? इस पहली झड़प से ही बाबर को महाराणा संग्राम सिंह के महत्व और उनके बल का आभास हो गया था। उसे पता चल गया था कि उसका विशाल सैन्य दल महाराणा के मनोबल के सामने कुछ भी नहीं है।
बियाना में हुआ भयंकर संघर्ष
फलस्वरूप बाबर ने अब युद्ध के लिए और भी बड़े स्तर पर तैयारी आरंभ कर दी थी। बड़े सैन्य दल के साथ अब वह महाराणा से युद्ध करने के लिए रण क्षेत्र की ओर बढ़ने लगा। भरतपुर राज्य के बियाना नामक स्थान पर राणा संग्राम सिंह की सेना से बाबर का भयंकर युद्ध हुआ। उस समय बाबर के साथ काबुल की पूर्व सेना के साथ-साथ दिल्ली की वह मुस्लिम सेना भी थी जो उसे लोदी को हटाने के पश्चात मिली थी। इस प्रकार एक विशाल सैन्य दल का सामना महाराणा संग्राम सिंह की सेना को इस समय करना पड़ रहा था।
इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना अपने शत्रु पर भारी होती जा रही थी। महाराणा संग्राम सिंह परम प्रतापी थे। अपने प्रताप और पराक्रम के बल पर वह शत्रु से युद्ध रत थे । उनके प्रताप और पराक्रम से उनकी सेना को भी निरंतर ऊर्जा प्राप्त हो रही थी। वह सूर्य के समान पराक्रमी होकर शत्रु पर टूटते थे और उसी का अनुकरण करते हुए शत्रु के खून की प्यासी होकर उनकी सेना भी शत्रु पक्ष पर टूट पड़ती थी। बड़ी संख्या में विदेशी शत्रुओं के शव धरती पर गिरते जा रहे थे। राणा के सैनिक भूखे शेर की तरह अपने शत्रुओं पर टूट पड़ते थे। अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देना मेवाड़ की शान रही थी । आज अपनी उसी शान को प्रकट करने के लिए जब परीक्षा की घड़ी आई तो कोई भी हिंदू वीर योद्धा पीछे हटने को तैयार नहीं था। अनेक शत्रु सैनिकों का संहार करके अपने प्राणोत्सर्ग करने की उनमें होड़ मची हुई थी।
अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक - एक इंच भूमि को मुक्त करने के संकल्प के साथ हर - हर महादेव का गगनभेदी उद्घोष करते हुए भारत की वीर सेना शत्रु पर टूट पड़ती थी। जिधर भी हमारे वीर योद्धा आगे बढ़ते उधर ही शत्रु सेना में कोहराम मच जाता था। उस समय युद्ध का रोमांच अपने शिखर पर था। आज हमारे वीर योद्धा विदेशी शत्रु, विदेशी धर्म और विदेशी सोच को मिटाने के लिए युद्धरत थे। वह दिल्ली से ही नहीं अपितु भारत की एक-एक इंच भूमि से शत्रु को भगा देने के लिए युद्ध में अपना कौशल दिखा रहे थे। शत्रु सेना भी उस समय भारत को पाने के लिए प्राणपण से संघर्ष कर रही थी। उन्हें अपने दीन के प्रचार - प्रसार के लिए बड़े सौभाग्य से मिली हिंदुस्तान की भूमि को खोने की उतनी ही चिंता थी जितनी अपनी आन, बान, शान को बनाए रखने की चिंता हमारे देश के महानायक महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना के सैनिकों को थी।
युद्ध का परिणाम
इस घनघोर युद्ध का परिणाम यह निकला कि कुछ ही समय में राणा की सेना शत्रु पक्ष पर निर्णायक विजय पानी की दिशा में आगे बढ़ने लगी। शत्रु पक्ष की सेना अब भागने की स्थिति में आ गई थी। उसका मनोबल टूटने लगा था और हिंदू वीरों की वीरता के समक्ष उसके पांव उखड़ चुके थे। युद्ध क्षेत्र को छोड़कर बाबर की सेना अंत में भाग खड़ी हुई। इस रणभूमि ने अपना निर्णय हिंदू हितों के रक्षक महाराणा संग्राम सिंह की सेना और उसके पराक्रम के पक्ष में दिया।
महाराणा संग्राम सिंह से यहां पर एक चूक हुई कि उन्होंने भागती हुई शत्रु की सेना का दूर तक पीछा नहीं किया। यदि वह दूर तक भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा करके उसे मारते काटते चले जाते तो फिर कभी शत्रु का उनकी ओर लौटना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने उदारता दिखाते हुए युद्ध क्षेत्र से भागी हुई सेना का पीछा नहीं किया । हमारी उदारता का दिव्य गुण हमारे लिए फिर बीच में आ गया।
यदि इस प्रकार के मानवीय गुण भारत को युद्ध क्षेत्र में परेशान नहीं करते या हमारे महान योद्धाओं के सिद्धांतों के आड़े नहीं आते तो हम मोड़ लेने के लिए लालायित इतिहास को निर्णायक मोड़ लेटे हुए देखते। इस युद्ध के पश्चात भी महाराणा संग्राम सिंह के लिए अभी 'दिल्ली दूर थी।' उन्हें दिल्ली को लेने के लिए अभी कुछ और भी करना था। दिल्ली को शत्रुविहीन करने के लिए महाराणा संग्राम सिंह यदि उस समय भागती हुई मुस्लिम सेना को लगे हाथों दिल्ली से भी भगा देते तो दिल्ली बड़ी सहजता से उनके हाथों में आ जाती। तब भारतवर्ष का इतिहास भी कुछ दूसरा होता।
कहते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है । युद्ध से तो समस्याएं आरंभ होती हैं। यहां भी जो युद्ध लड़ा गया था वह समस्या का अंत नहीं था अपितु यहां से एक समस्या आरंभ हुई थी और वह समस्या यही थी कि दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में जुटा जाए। फलस्वरूप महाराणा भी दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में लग गए , और शत्रु बाबर भी नए युद्ध की तैयारी में लग गया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL, विदेशी आक्रांताओं द्वारा रखे गए नामों को बदला जाए: वकील अश्विनी उपाध्याय कहा- नाम पता करने के लिए बने रीनेमिंग कमीशन

वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर विदेशी आक्रमणकारियों के नामों पर रखे गए शहरों व स्थानों के नाम बदलने की माँग की है। उपाध्याय ने कोर्ट से एक रीनेमिंग कमीशन बनाने की माँग की है, जिसका काम बदले गए स्थानों के वास्तविक नाम का पता लगाना होगा। उन्होंने अपनी याचिका के साथ 1,000 नामों की एक सूची भी कोर्ट सौंपी है। याचिका में उन्होंने न्यायालयों द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णयों का भी उल्लेख किया है।

सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दिए जाने की जानकारी देते हुए अश्विनी उपाध्याय ने अपने ट्विटर हैंडल से एक वीडियो पोस्ट किया है। वीडियो में वे इस पीआईएल के विषय की जानकारी दे रहे हैं। उपाध्याय ने जानकारी दी कि पीआईएल में उन्होंने रीनेमिंग कमीशन बनाने की माँग की है। कमीशन आक्रांताओं द्वारा बदले गए स्थानों के नामों की पहचान कर उसके वास्तविक नाम का पता लगाएगा। इसके बाद सरकारें उसे बदलने का काम करेंगी।

वकील उपाध्याय ने याचिका के साथ 1000 स्थानों के नाम कोर्ट के सामने रखे, जिन्हें आक्रान्ताओं ने बदल दिया था। याचिका के अनुसार, बिहार के बेगूसराय का नाम अजातशत्रु नगर था, जो बर्बर बेगू के नाम पर बेगूसरया बन गया। मुजफ्फरपुर को विदेहपुर के नाम से जाना जाता था। हरिपुर का नाम हाजीपुर किया गया। द्वार बंगा को क्रूर दरभंग खान के कारण दरभंगा कहा जाने लगा।

नालंदा को जलाने वाले बख्तियार के नाम पर पटना के पास बख्तियारपुर शहर है। इसके अलावा उन्होंने याचिका में बिहार शरीफ और जमालपुर जैसे बिहार के शहरों का उल्लेख किया है। याचिका में बिहार के शहरों के अलावा देश भर के अन्य शहरों का भी नाम दिया गया है। उनमें अहमदाबाद, होशंगाबाद, दौलताबाद, औरंगाबाद, उस्मानाबाद, गाजियाबाद, फिरोजाबाद, फरीदाबाद, गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़ जैसे स्थान शामिल हैं।

पिछले दिनों ही राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान कर दिया गया था। हालाँकि, दिल्ली में अब भी कई जगहों के नाम मुगल आक्रान्ताओं के नामों पर ही हैं। दिल्ली में ही बाबर रोड, अकबर रोड, जहाँगीर रोड, औरंगजेब रोड, तुगलक रोड जैसे सड़कों के नाम हैं। याचिका में शहरों के साथ-साथ सड़कों और ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने के लिए भी कदम उठाने की माँग की गई है।

शाहजहाँ: जिसने अपनी हवस के लिए बेटी जहाँआरा का नहीं होने दिया निकाह

सबसे क्रूर मुग़ल शासक शाहजहां 
शायद ही कभी कांग्रेस, वामपंथी और छद्दम धर्म-निर्पेक्षों ने सोंचा भी नहीं होगा कि हिन्दू गौरवविंत इतिहास को धूमिल कर आतताई मुग़लों के रक्तरंजित इतिहास पर पर्दा डाल, महान बताकर पढ़ने को मजबूर किया है, कभी हमारे इस महाझूठ के ऊपर से पर्दा भी उठेगा। जब कभी किसी इतिहास जानकर ने वास्तविक से रूबरू करवाने का प्रयास किया, उसे इन पाखंडी कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शांति के दुश्मन और न जाने कितने नामों से अलंकृत कर बदनाम करते रहे। परन्तु सच्चाई अधिक समय तक लुप्त नहीं हो सकती। वर्तमान सरकार को चाहिए कि जिन इतिहासकारों ने ऐसा निंदनीय एवं घृणित काम वाह-वाही लूट सरकारी सुख-सुविधाओं को भोगा है, उन्हें दण्डित किया जाए। 
आतंकी संगठन आईएसआईएसआई के बारे में जब हम पढ़ते हैं कि वह अल्पसंख्यक यजीदी महिलाओं को यौन गुलाम बना रहा है तो हमें आश्चर्य होता है, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल बादशाहों ने भी बहुसंख्यक हिन्दू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दासी यानी सेक्स स्लेव्स बनाया था।

इसमें मुगल बादशाह शाहजहाँ का हरम सबसे अधिक बदनाम रहा, जिसके कारण दिल्ली का रेड लाइट एरिया जीबी रोड बसा। शाहजहाँ के हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके अब्बू जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने अब्बू की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छँटनी की तथा बुजुर्ग महिलाओं को भगा कर अन्य हिन्दू परिवारों से जबरन महिलाएँ लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।

कहते हैं कि उन्हीं भगाई गई महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जीबी रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था। यह शख्स यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी। 

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने अपनी किताब travels in the mughal empire में इस विषय में टिप्पणी की थी कि महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था और नपुसंक बनाए गए सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिति, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी।

शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए, आठ हजार औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा। आप यह जानकर हैरान हो जाएँगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं, बल्कि उसका असली नाम ‘अर्जुमंद-बानो-बेगम’ था और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हाँकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी। इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की, यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा था, जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था। अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की?

शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी, जो कि उसकी पहली बीबी थी। शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुँवारी लड़की नहीं थी बल्कि वो भी शादीशुदा थी और उसका शौहर शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम ‘शेर अफगान खान’ था। शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि 38 वर्षीय मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला था। शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ सम्भोग करने का दोषी तक कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में चर्चा शुरू हुई, तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गई और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा – “माली को अपने द्वारा लगाए पेड़ का फल खाने का हक है।”

इतना ही नहीं, जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है कि एक बार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ ने तंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।

दरअसल, अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी। इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुगल खानदान की लड़कियाँ अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी, नौकर के साथ-साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी। कहा जाता है कि जहाँआरा अपने बाप के लिए लड़कियाँ भी फँसाकर लाती थी।

जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था। शाहजहाँ के राज ज्योतिषी की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा देकर बाप के हवाले कर दिया था, जिससे शाहजहाँ ने अपनी उम्र के 58वें वर्ष में उस 13 वर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राह्मण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

The legacy of muslim rule in India के अनुसार शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि वह तिमूर (तैमूरलंग) का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तैमूर से और उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से वह इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तैमूर द्वितीय रख लिया था।

बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के विरुद्ध युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी। अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था, “शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार कर लिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था।” शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय दिया। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।

1632 में कश्मीर से लौटते समय शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनाई गई महिलाएँ ‘घर वापसी’ करते हुए फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका, तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। 

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सिर काट दिया गया। हजारों महिलाओं को जबरन मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।

हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था।

शाहजहाँ के राज में इस्लाम का ही कानून था। या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उतर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4,000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा था। जवान लड़कियाँ इसके हरम भेज दी जाती थीं। शाहजहाँ के आते-आते मुगल शासन पुराने मुसलमानी ढर्रे पर चल पड़ा था।

इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी के ’बादशाहनामे’ के अनुसार शाहजहाँ के ध्यान में यह बात लाई गई कि पिछले शासन में बहुत से मूर्ति मंदिरों का निर्माण प्रारंभ किया गया था किन्तु कुफ्र के गढ़ बनारस में बहुत से मंदिरों का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। काफिर उनको पूरा करना चाहते थे। मजहब के रक्षक बादशाह सलामत ने आदेश दिया कि बनारस और उसके पूरे साम्राज्य में तमाम नए मंदिर ध्वस्त कर दिए जाएँ। इलाहाबाद के सूबे से सूचना आई कि बनारस में 76 मंदिर गिरा दिए गए हैं। यह घटना 1633 की है। हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करने की प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।

1634 में शाहजहाँ के सैनिकों ने बुन्देलखंड के राजा जुझारदेव की (जो जहाँगीर के कृपा पात्रों में था) रानियों, दो पुत्रों, एक पौत्र और एक भाई को पकड़कर शाहजहाँ के पास भेजा। शाहजहाँ ने दुर्गाभान और दुर्जनसाल नामक अवयस्क एक पुत्र और पौत्र को जबरन मुसलमान बनवाया। एक वयस्क पुत्र उदयभान और भाई श्यामदेव का, इस्लाम स्वीकार न करने के कारण वध करवा दिया। रानियों को हरम में भेज दिया गया।

गुलामी के लिए अथवा व्यभिचार के लिए इस मुस्लिम व्यवहार के विपरीत दुर्गादास राठौर ने औरंगजेब की पौत्री सफीयुतुन्निसा और पौत्र बुलन्द अख्तर को, जिन्हें औरंगजेब का पुत्र और शाहजहाँ का पौत्र शाहजादा अकबर उसके संरक्षण में छोड़ गया था, नियमानुसार इस्लाम की शिक्षा दिलाकर, सम्मानपूर्वक औरंगजेब को 13 वर्ष के बाद, जब वह जवान हो गए थे, वापस कर दिया। यह इस्लाम और हिन्दू धर्म की शिक्षा के कारण हुआ। यह दो ऐतिहासिक उदाहरण हिन्दू और मुसलमान मानसिकता के अंतर पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त हैं।

शाहजहाँ की धार्मिक नीतियाँ लगातार विवाद में रहीं। हिंदू माता की कोख से जन्मी ये संतान इस्लाम को लेकर ज्यादा ही आग्रही था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भारी कर लगाए। साथ ही कई ऐसे आदेश दिए, जो हिंदुओं को परेशान करने वाले थे।

1634 ई. में उन्होंने ही ये बात शुरू की कि अगर कोई हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का शादी करें तो ये शादी तब तक जायज नहीं होगी, जब तक कि अगला पक्ष इस्लाम न स्वीकार कर ले। ये भी कहा जाता है कि हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिए इस मुगल बादशाह के राज में एक अलग विभाग बना हुआ था, जो केवल यही बात सुनिश्चित करता था। इस बात का जिक्र कई जगहों पर मिलता है।

अकबर ने उन किसानों के परिवारों को गुलाम बनाने और बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो सरकारी लगान समय से नहीं दे पाए थे। शाहजहाँ ने इस प्रथा को फिर से चालू कर दिया। किसानों को लगान देने के लिए अपनी स्त्रियों और बच्चों को बेचने पर मजबूर किया जाने लगा। किसानों को जबरन पकड़ कर (गुलामी में) बेचने के लिए मंडियों और मेलों में ले जाया जाता था। उनकी अभागी स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिये रुदन करती चली जातीं थीं। शाहजहाँ के आदेश थे कि इन हिन्दू गुलामों को हिन्दुओं के हाथ न बेचा जाए। मुसलमान मालिकों के पास गुलामों का अन्ततः मुसलमान हो जाना निश्चित था।

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कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

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कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

शाहजहाँ ने जितने भी युद्ध किए। उनमें कहीं भी उसने हिंदुओं के प्रति उदारता का प्रदर्शन नहीं किया, वह सदा उनके प्रति क्रूर बना रहा। जिससे देश की बहुसंख्यक प्रजा उससे आतंकित रही। हिंदू इतने घृणित अनाचार को सहन नहीं कर सकता था। इसलिए उसे विद्रोही होना था और विद्रोही बनकर अपनी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करना था।

यही कारण था कि हिंदुओं ने इस अनाचारी बादशाह को और प्रेम के कथित पुजारी व्यभिचारी शासक से मुक्ति पाने हेतु उसे दर्जनों बार चुनौती दी और उसे सर्वथा एक असफल शासक बनाकर रख दिया। इतना असफल कि उसका अपनी संतान पर भी नियंत्रण नहीं रहा और एक दिन उसके अपने पुत्र औरंगजेब ने ही उसे जेल में डाल दिया।

1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी बेटी जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया, परन्तु औरंगजेब ने अपने बाप की अय्याशी का पूरा इंतजाम रखा। अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने साथ 40 रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी और दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को किले से बाहर निकाल दिया।

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था। शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही 22 जनवरी 1666 में 74 साल में हुई। बताया जाता है कि अत्यधिक कामोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण उसकी मौत हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था। अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी बता कर महान बताया जाता है?

अगर शाहजहाँ को अपनी बीबी के प्रति थोड़ा भी प्यार होता तो मुमताज के साथ शादी करने के बाद वो इतनी रखैलें ना रखता, और ना ही उनकी मौत के बाद उसकी बहन से शादी करता और ना ही पिता-बेटी के पवित्र रिश्ते को कलंकित करता। क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है? क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमें खाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं? 

शाहजहाँ को प्यार नहीं हैवानियत की हवस थी। उसने अपने अहंकार और शरीर में जलती हवस की ज्वाला को शांत करने के लिए मुमताज से विवाह किया था, ना कि उसकी सुंदरता से। जिसने कभी औरतों की इज्जत ना की हो, वो प्यार की ईबादत को क्या समझेगा। इसलिए ताजमहल को मुमताज की याद का मकबरा कहना गलत होगा।

दरअसल, ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गई है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपाई जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान शिव का मंदिर तेजो महालय है। इतिहासकार पीएन ओक ने पुरातात्विक साक्ष्यों के जरिए बकायदा इसे साबित किया है और इस पर पुस्तकें भी लिखी हैं। असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

                               क़ुतुब मीनार को लेकर दायर की गई RTI का NCERT ने दिया जवाब
क़ुतुब मीनार परिसर के भीतर प्राचीन काल में कई मंदिरों के अस्तित्व की बात कुछ इतिहासकारों ने भी स्वीकार की है। आपने भी यही पढ़ा और सुना होगा कि कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार को बनवाया था। NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की पाठ्य पुस्तकों में भी छात्रों को यही पढ़ाया जा रहा है। इस मामले में लेखक नीरज अत्री ने एक RTI दायर की थी, जिसके जवाब चौंकाने वाले हैं।

वैसे इस विषय पर यदा-कदा लिखता रहा हूँ कि मुस्लिम समाज के वोट अपनी तिजोरी में रखने के लिए कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने भारत के गौरवमयी हिन्दू इतिहास को धूमिल कर आतताई मुग़लों के रक्तरंजित इतिहास को दरकिनार कर महान बता कर समस्त देशवासियों को गलत इतिहास पढ़वा दिया। यह देश का दुर्भाग्य है कि हम अपने ही वास्तविक इतिहास से शिक्षित होते हुए भी किसी अनपढ़ से कम नहीं। जो वास्तविकता की बात करता है, उसे तथाकथित इतिहासकार और छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता और पार्टियां साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शान्ति का दुश्मन और सिरफिरा आदि नामों से बदनाम करते हैं। संक्षेप में संलग्न मेरा स्तम्भ के अलावा नीचे दिए लिंक का अवलोकन करिए। जिसका किसी छद्दम धर्म-निरपेक्ष एवं इतिहासकार ने खंडन नहीं किया। लेकिन RTI के माध्यम से सच्चाई सामने आ रही है। 
वास्तविक इतिहास की बात करने वालों को साम्प्रदायिक आदि नामों से अलंकृत करने वालों को सर्वप्रथम रामजन्मभूमि विवाद से आंखें खोलनी चाहिए कि किस तरह खुदाई में मिले मंदिर के प्रमाणों को कोर्ट से छुपा कर मुद्दे को लंबित कर जनता को गुमराह किया जाता रहा। फिर 1962 तक जितने भी फैसले कृष्णजन्म भूमि के पक्ष में आए कोर्ट के फैसले क्यों नहीं लागु किया गया? फिर अय्याश अकबर को बता दिया महान, आखिर झूठ बोलने की भी कोई सीमा होती है। वर्तमान मोदी सरकार को चाहिए कि इतिहास से भयंकर छेड़छाड़ करने वाले समस्त इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट में डालना चाहिए।  
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
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ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
पिताश्री एम.बी.एल. निगम श्री केवल रतन मलकानी अस्सी के दशक में विश्व चर्चित पत्रकार श्री केवल रतन मलकानी, मुख्य सम्प....

इतिहास का सबसे बड़ा झूठ जो हम सबको स्कूल में पढ़ाया गया
‘औरंगजेब-शाहजहाँ ने बनवाए मंदिर’ – NCERT के पास नहीं कोई प्रमाण – RTI में खुलासा

उससे पहले जानते हैं कि NCERT की पुस्तक में लिखा क्या है। इसमें कुतुबमीनार की तस्वीर के साथ दिए गए विवरण में बताया गया है कि कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद और मीनार को 12वीं शताब्दी के अंत में बनवाया गया था। साथ ही लिखा है कि दिल्ली के सुल्तानों द्वारा बसाए गए पहले नगर का जश्न मनाने के लिए इसका निर्माण हुआ। आगे बताया गया है कि इसे इतिहास में दिल्ली-ए-कुहना नाम से जाना जाता है, जिसे हम आज पुरानी दिल्ली कहते हैं।

तत्पश्चात लिखा है कि इस ‘मस्जिद’ को कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था, जिसे मामलुक साम्राज्य के तीसरे सुल्तान इल्तुतमिश ने पूरा करवाया, जो ऐबक का दामाद था। साथ ही पुस्तक के उस पन्ने में मस्जिद क्या होता है और अरबी में इस शब्द का मतलब क्या है, ये सब समझाया गया है। खुत्बा-ए-जुमा के साथ-साथ नमाज पढ़ने के बारे में भी समझाया गया है। फिर मुहम्मद बिन तुगलक के बनवाए बेगमपुरी मस्जिद का जिक्र है।

इसके बाद ‘Brainwashed Republic: India’s Controlled Systemic Deracination’ नामक पुस्तक लिख चुके नीरज अत्री ने इस मामले में नवंबर 21, 2012 में एक RTI दायर की थी। इस पुस्तक में वो पहले ही पाठ्यक्रम में शामिल भारतीय इतिहास की पुस्तकों की पोल खोल चुके हैं। जिस पुस्तक की यहाँ बात हो रही है, वो NCERT की कक्षा-7 की पुस्तक (ISBN 81-7450-724-8) है, जिसका नाम ‘Our Past 2’ है।

इस पुस्तक के 36वें पेज पर ‘फिगर 2’ बता कर कुतुबमीनार का चित्र है और उपर्युक्त विवरण वहीं पर बाईं तरफ छपा हुआ है। नीरज अत्री का सवाल इस फैक्ट पर था कि इसे दिल्ली के दो सुल्तानों कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने बनवाया। उन्होंने इस मामले में 5 सवाल पूछे। क्या रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज या रेफेरेंस है, जिसके आधार पर ये निष्कर्ष निकाला गया कि कुतुबमीनार को इन्हीं दोनों सुल्तानों ने बनवाया था? अगर हाँ, तो कौन सा।

इसके जवाब में NCERT के RTI सेल द्वारा दिसम्बर 11, 2012 को दिए गए जवाब में कहा गया था कि ऐसी कोई सर्टिफाइड कॉपी या दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं है। दूसरा सवाल था कि ऐसा कोई शिलालेख या पुरालेखिक सबूत भी है क्या, जिससे ये साबित होता हो? इसका जवाब भी ना में मिला। तीसरे सवाल में उन लोगों के नाम माँगे गए थे, जिनकी अनुशंसा के बाद पुस्तक के उक्त अंश को जोड़ा गया।

इसके जवाब में बताया गया कि सदस्यों, मुख्य सलाहकार, सलाहकार और अध्यक्ष के नाम पाठ्य पुस्तक में ही दिए गए हैं। इन तथ्यों का निरीक्षण कर के इन्हें पास किसने किया? इस चौथे प्रश्न का जवाब था कि प्रोफेसर मृणाल मिरि की अध्यक्षता वाली नेशनल मॉनिटरिंग कमिटी ने इसे अनुमति प्रदान की, जिसका जिक्र पुस्तक में भी है। अंतिम सवाल था कि इस तथ्य को लेकर कोई नोट्स हैं, जिसके जवाब में बताया गया कि विभाग की किसी फाइल्स में ऐसा कुछ भी नहीं है।

अत्री ने एनसीईआरटी में तथ्यों के साथ हुई कई छेड़छाड़ के लिए 100 से भी अधिक आरटीआई लगाई थी। उन्होंने एनसीईआरटी पुस्तकों के बारे में बताया था कि UPA सरकार के आने के बाद उसमें आर्य-द्रविड़ की थ्योरी परोसी गई, जिससे बच्चों के मन में गलत धारणाएँ बैठीं। अत्री ने ऑपइंडिया को बताया था कि भारत सबसे पुरानी सभ्यता है और हमारे पास गौरव करने के लिए इतनी चीजें हैं, फिर भी हम अकेले देश हैं जो अपने ही बच्चों का आत्मविश्वास ख़त्म करते हैं।