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पुलवामा हमले के बाद सरकार का बड़ा कदम, हुर्रियत के 5 नेताओं की सुरक्षा हटाई गई

Mirwaiz Umar Farooqपुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मीरवाइज उमर फारुक समेत पांच अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली है। सीआरपीएफ काफिले पर हुए हमले के बाद ये कदम उठाया गया है। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि आतंकियों के साथ उनके मददगारों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। मीरवाइज उमर फारुक के अलावा अब्दुल गनी बट्ट, हाशिम कुरैशी, बिलाल लोन, शब्बीर शाह हैं। स्पष्ट किया गया है कि इन पांच नेताओं और अन्य अलगाववादियों को किसी भी चीज की आड़ में सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जाएगी।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के साथ संदिग्ध तौर पर संपर्क रखने वाले कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को मिली सुरक्षा की समीक्षा की, जिसके बाद ये फैसला किया गया। एक शीर्ष अधिकारी ने बताया था कि केंद्र सरकार ने एक सुझाव दिया था जिसके बाद ऐसे व्यक्तियों को मिली सुरक्षा की समीक्षा की जाएगी, जिन पर आईएसआई के साथ संबंधों का शक है।
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने फरवरी 15 को श्रीनगर में हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं समेत अलगाववादियों का परोक्ष जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान और उसकी जासूसी एजेंसी आईएसआई से धन पा रहे लोगों को दी गई सुरक्षा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। ऐसे तत्व और ताकतें हैं जो पाकिस्तान और आईएसआई से धन लेते हैं। मैंने संबंधित अधिकारियों से उनकी सुरक्षा पर पुनर्विचार करने को कहा है। 
उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में कुछ तत्वों के तार आईएसआई और आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं, लेकिन सरकार उनकी सोच को परास्त करेगी। ऐसे लोग जम्मू कश्मीर की जनता और राज्य के युवाओं के भविष्य के साथ खेल रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई निर्णायक दौर में है और मैं देश को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम इसमें जीतेंगे।
Shiv senaसर्जिकल स्ट्रीक नहीं, इस्लामाबाद और लाहौर पर हमला हो-- शिव सेना 
पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद की स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में शिवसेना ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से कहा कि वह सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक करने से नतीजे नहीं निकलने वाले और वक्त आ गया है कि लाहौर और इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के अंदरूनी हिस्सों में हमले किए जाएं। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में शिरकत करने के बाद शिवसेना के सांसद संजय राउत ने पत्रकारों को बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार को वह करना चाहिए जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
राउत ने कहा, ‘सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक से काम नहीं चलने वाला, अब लाहौर और इस्लामाबाद तक हमले करने होंगे। मोदी सरकार को वह करना चाहिए जो इंदिरा गांधी की सरकार ने किया था।’ गौरतलब है कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 का युद्ध जीता था। भारत ने जम्मू-कश्मीर के उरी में थलसेना की शिविर पर हुए आतंकवादी हमले के जवाब में 2016 में पाकिस्तान से लगी सीमा के पार आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी।
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आर.बी.एल. निगम,फिल्म समीक्षक पुलवामा आतंकी हमले ने देश को हिला कर रख दिया है। बॉलीवुड के तमाम एक्टर इस पर लगातार अपन.....

पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत की दृढ़ता दिखाते हुए आज सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस बात को रेखांकित किया कि वे देश की एकता और अखंडता की रक्षा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपने सुरक्षा बलों के साथ एकजुटता से खड़ी हैं।
सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी प्रमुख पार्टियों के नेताओं ने शिरकत की। भाजपा और कांग्रेस सहित सभी पार्टियों ने एक प्रस्ताव पारित कर आतंकवादी हमले और सीमा-पार से उसे मिल रहे समर्थन की निंदा की। विपक्षी सदस्यों ने इस चुनौती से निपटने में सरकार को पूरा समर्थन दिया।
इंडिया इज़राइल क्यों नहीं बन सकता?
लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए। चाहते हैं कि बस मोदी टैंक लेकर घुसे और सब पाकिस्तानियों को ख़त्म कर दे। चाहते हैं, देश रातोंरात इज़राइल मोड में आ जाये। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं होगा।
मोदी है, तो मुझे पूरी अपेक्षा और विश्वास है कि बदला होगा, भीषण होगा, सौ गुना हाहाकारी होगा। लेकिन इंडिया इज़राइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा।
छोटे से इज़राइल पर आस पास के 10 देश अटैक कर दे, तब भी वो छः दिन के अंदर धूल चटा कर, उन्हें वापस अपने घर में बिठा सकता है। छोटे से इज़राइल पर कोई एक ग्रेनेड फेंकने से पहले भी 10 बार सोचता है, क्योंकि जानता है, किए गए नुकसान से 10 गुना नुकसान वापस झेलना पड़ेगा। 
आतंकियों से हमदर्दी रखने पर भी कड़ी कार्रवाई होगी
कश्मीर में आतंकियों के साथ-साथ उनसे सहानुभूति रखने वालों, पत्थरबाजों और अलगाववादियों से सुरक्षा बल सख्ती से निपटेंगे। पुलवामा हमले के बाद सुरक्षाबलों को सरकार ने कार्रवाई के लिए खुली छूट देने का फैसला किया है। इसका असर अगले कुछ दिनों में दिखना शुरू हो जाएगा।
सूत्रों के अनुसार कश्मीर में आतंकियों को परोक्ष रूप से समर्थन देने वालों की बड़ी संख्या है। इनमें अलगाववादी भी शामिल हैं, लेकिन इनके खिलाफ सुरक्षाबल कोई कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। अलगाववादियों के परोक्ष समर्थन से आतंकियों के हौसले ‘बुलंद’ रहते हैं। इससे नए आतंकी भी पैदा होते हैं। सुरक्षा से जुड़े सूत्रों ने कहा कि ऐसे लोग अब हमारे निशाने पर होंगे। उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
पैनी नजर रहेगी
सूत्रों का कहा है कि अलगाववादियों की गतिविधियों पर भी बलों की पैनी नजर रहेगी। उनके बयानों और मुलाकातों पर भी बल निगरानी रखेंगे ताकि कार्रवाई का ठोस आधार निकालकर उन्हें गिरफ्तार किया जा सके।

पत्थरबाजों पर नरमी नहीं
सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वालों के प्रति भी बल अब नरमी नही दिखाएंगे। अब इन्हें आतंकियों का समर्थन करने और सुरक्षा बलों पर हमले के आरोप में गिरफ्तार करेंगे। मौके पर जवाबी कार्रवाई भी करेंगे।

जनाजे की भीड़ की निगरानी
सूत्रों ने कहा कि आतंकियों के जनाजों में जुटने वाली भीड़ पर भी नजर रखी जाएगी। उसमें नारेबाजी कर कट्टरता को बढ़ावा देने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। दरअसल आतंकियो के जनाजे में भीड़ जुटाकर कुछ लोग माहौल को गरमाने की कोशिश करते हैं लेकिन अभी तक ऐसे लोग कानून की आखों में धूल झोकते रहे हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि आतंकियों के साथ ही उनके समर्थकों से भी सख्ती से निपटने की जरूरत है। कश्मीर में ऐसे लोग बहुत है वे सिर्फ अलगाववादियों में नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में है। जब तक ऐसे लोगों का समर्थन आतंकियों को मिलता रहेगा आतंकवाद कम नहीं होगा।
भारत इज़राइल नहीं बन सकता ?
क्योंकि इज़राइल में कोई JNU नहीं है, जहां देश के युवा 'इज़राइल, तेरे टुकड़े होंगे' के नारे लगा सकें। 
इज़राइल में कोई सरकार चुने जाने के दो महीने के अंदर, गंभीर आरोपों में घिरी नलिनी सुंदर नामक किसी नक्सली को क्लीन चिट नहीं दे दी जाती। 
क्योंकि इज़राइल जब ऑपेरशन Mu nich करता है, तो वहां का विपक्ष सबूत मांग कर देश व सेना को अपमानित नहीं करता।
क्योंकि वहां ना तो आतंकवादियों के लिए रात दो बजे कोर्ट खुलते हैं और ना ही वहां के पत्रकार आतंकियों के  लिए मानवाधिकार का रंडी रोना रोते हैं। ना ही वहां के पत्रकार आतंकी को टेररिस्ट कहने के बजाय मिलिटेंट या उग्रवादी कहना उचित मानते हैं।
क्योंकि इज़राइल में कोई जाट, गुर्जर या मराठा इज़राइल की पब्लिक प्रोपर्टी को नहीं जलाते। वहां देश सर्वोपरि है, जाति या धर्म नहीं। 
क्योंकि वहां के नेता, सेनाध्यक्ष को कुत्ता या गुंडा कहने की हिम्मत भी नहीं कर सकते। टैक्सपेयर्स के पैसों से पढ़ाई का ढोंग रचने वाले, शाहीला रशीद या कन्हैया कुमार जैसे जोंक नहीं है, जो आर्मी को रेपिस्ट बताते फिरें। क्योंकि वहां के अभिनेता,  जहां पैदा हुए हैं, जहां सफल हुए हैं, उस धरती पर शर्मिंदा नहीं होते। 
असहिष्णुता का नाटक नहीं करते।
क्योंकि वहां लोग नेतन्याहू या उसकी पार्टी का विरोध करते करते इज़राइल विरोधी नहीं हो जाते।
भारत में तो आपको सैकड़ो मिलेंगे, जिनके मन में एक अजीब सी खुशी हो रही है कि हमला हुआ। अब इसी बहाने मोदी और भाजपा पर कीचड़ उछालेंगे, कहेंगे, बहुत कूद रहे थे कि कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ।
क्योंकि कर्ज़माफ़ी, बेरोज़गारी भत्ते और जातिवाद के चक्कर में इज़राइल के लोग बॉर्डर से जुड़े वो राज्य, जहां सिमी या नक्सली पनपने का डर हो - आतंकवादियों और नक्सलियों के हिमायती को नहीं सौंपते। 
क्योंकि वहां के युवा, देश तोड़ने की बातें नहीं करते। वहां के नेता ऐसे देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के पीछे नहीं खड़े होते और ना ही वहां की जनता किसी बात के लालच में आकर, ऐसे नेताओं के पीछे खड़ी होती है।
वहां का विपक्ष इज़राइल के धुर विरोधी ईरान में जाकर, ये नहीं कहता कि आप नेतन्याहू को हटाने में हमारी मदद करो। 
आज जो पाकिस्तान को साफ़ करने की बात कर रहे हैं और सच में युद्ध हो जाये, तो प्याज-पेट्रोल-टमाटर महंगे हो गए, इस बात को लेकर सड़कों पर आ जायेंगे। दाल फ्राई खाने का शौकीन देश, टमाटर महंगे होना नहीं सहन कर सकता। 
बरगद बन जाने की बातें करते हैं, गमले में उगे हुए लोग। 
नहीं बन सकते हैं हम इज़राइल। क्योंकि इजराइल अपनी टेक्नोलॉजी, अपने आयुधों या हथियारों से इज़राइल नहीं है। इज़राइल अपने नागरिकों के कारण इज़राइल है। और इसी तरह, भारत अपने 'नागरिकों' की वजह से ही भारत है। इसे कोई मोदी या कोई भी और, आकर बदल नहीं  सकता। 
बाहर का तो पता नहीं, लेकिन आज देश के अंदर एक सर्जिकल स्ट्राइक की बेहद आवश्यकता है। ये नहीं हो पाया, तो लुटेरे लूटने के लिए तैयार बैठे हैं।

ज़रूरत ये भी है कि हम इज़राइल बनें, कि हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों को विश्वास हो कि कुछ भी हो, देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए देश एक रहेगा, सिर्फ ऐसे युद्ध काल में ही नहीं, वरन हमेशा। नहीं तो भारत ऐसे ही चोट दर चोट खाता रहेगा।