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हिरासत में लिए गए अलगावादी व राजनेता एक साल तक रह सकते हैं अंदर

जम्मू-कश्मीर का विशेषाधिकार समाप्त कर दो केंद्र शासित राज्य बनाने के मद्देनजर हिरासत में लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, अलगाववादियों व अन्य लोगों की जल्द रिहाई की उम्मीद नहीं है। संबंधित अधिकारियों की मानें तो इन्हें एक साल तक बंद रखा जा सकता है।
राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने और किसी भी तरह के राष्ट्रविरोधी प्रदर्शनों की संभावना को टालने के लिए राज्य प्रशासन ने बीते आठ दिनों के दौरान करीब 700 लोगों को हिरासत में लिया है। इनमें से करीब 150 लोगों को देश के विभिन्न राज्यों की जेलों में स्थानांतरित किया है।
इनमें अलगाववादियों के अलावा नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) के महासचिव अली मोहम्मद सागर भी हैं। नेकां उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के अलावा पीडीपी की अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी गिरफ्तार नेताओं में शामिल हैं।
हालांकि महबूबा को हरि निवास में और उमर अब्दुल्ला को वन विभाग के गेस्ट हाउस में रखा गया है। लेकिन अधिकारिक तौर पर कोई भी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी इन दोनों नेताओं के बारे में बोलने को तैयार नहीं हैं। सिर्फ यही नहीं राज्य में बीते एक सप्ताह के दौरान हुई गिरफ्तारियों की संख्या का ब्योरा भी देने के लिए कोई अधिकारी तैयार नहीं है।
राज्य सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल भी उमर अब्दुल्ला और महबूबा पर लगाई गई कानूनी धाराओं का ब्योरा देने में असमर्थ नजर आए हैं। राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने बताया कि वादी में कोई भी किसी भी तरह से हिंसा न भड़का सके इसलिए विभिन्न नेताओं और अन्य लोगों को एहतियातन हिरासत में लिया गया है। इनमें से कइयों को जन सुरक्षा अधिनियम के तहत भी बंदी बनाए जाने की सूचना है।
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अगस्त 16 को फोन पर बात...

उन्होंने बताया कि हालात सामान्य होने पर कुछेक राजनीतिक नेताओं को छोड़ा जा सकता है। कई लोगों को राज्य प्रशासन विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत अगले एक साल तक बंद रख सकता है।

हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी पर कसा शिकंजा, दिल्ली में प्रॉपर्टी जब्त

Syed Ali Shah Geelani
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। आय कर विभाग ने अप्रैल 1 को हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष गिलानी का दिल्ली स्थित फ्लैट जब्त कर लिया। पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों का नकेल घाटी के अलगाववादी नेताओं पर कसता जा रहा है। गिलानी का यह फ्लैट मालवीय नगर के पास खिड़की एक्सटेंशन में है। इसके साथ ही आय कर विभाग ने उनके संपत्तियों के हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी है। गिलानी 3,62,62,160 रुपए नहीं चुका पाए हैं।
हुर्रियत नेता पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। पिछले महीने यानी मार्च में प्रवर्तन निदेशालय ने अवैध रूप से 10,000 अमेरिकी डॉलर के विदेशी मुद्रा रखने के जुर्म में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर ₹14.40 लाख का जुर्माना लगाया था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के अध्यक्ष यासीन मलिक के खिलाफ भी इस तरह की कार्यवाही होने के आसार हैं
पीटीआई के पास उपलब्ध आदेश की प्रति के मुताबिक, यह फ्लैट दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित है और विभाग के कर वसूली अधिकारी (टीआरओ) ने 1996-97 से लेकर 2001-02 के बीच कथित तौर पर ₹3.62 करोड़ आयकर का भुगतान करने में विफल रहने पर इस घर को सील कर दिया। इसके अनुसार विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 222 के तहत यह कार्रवाई की और इसके अंतर्गत हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता द्वारा संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक रहेगी। 
गिलानी सहित हुर्रियत नेताओं पर जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी भावनाएं भड़काने का आरोप है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) घाटी के अलगाववादी नेताओं के खिलाफ जांच भी कर रही है। आरोप है कि हुर्रियत नेता पाकिस्तानी के इशारे पर घाटी में युवकों को भारत विरोधी गतिविधियों और सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी के लिए उकसाते हैं। 
पुलवामा में गत 14 फरवरी सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमला हुआ था। इस हमले में 40 जवान शहीद हो गए। इस आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने अलगावादी नेताओं के खिलाफ अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। सरकार ने अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा वापस ले ली है। सुरक्षा हटाए जाने के बाद अलगाववादी नेताओं ने कहा कि उन्होंने कभी सुरक्षा की मांग नहीं की थी। 
टीआरओ आयकर विभाग की प्रवर्तन कार्रवाई शाखा है और यह इरादतन कर न चुकाने के मामलों से निपटती है। अधिकारी बकाया कर के भुगतान के लिए संपत्ति जब्त कर सकते हैं और आगे उसकी नीलामी भी कर सकते हैं। इस संबंध में 29 मार्च को गिलानी के खिलाफ कार्रवाई का आदेश जारी किया गया था। इस आवास में गिलानी के दामाद की भी हिस्सेदारी बताई जा रही है। आयकर विभाग द्वारा गिलानी के खिलाफ शिकायत करने के बाद ईडी ने जाँच शुरू की।

: Office of the Tax Recovery Officer attaches Kashmiri Separatist Syed Ali Shah Geelani's Khirki Extension, Malviya Nagar property. Prohibits him from transferring the property as he has failed to pay Rs 3,62,62,160. (file pic)
सुरक्षा एजेंसियों ने घाटी में कार्रवाई करते हुए कुछ समय पहले मीर वाइज उमर फारूक के घर से हॉट लाइन बरामद की। बताया गया कि मीर वाइज इस हॉट लाइन का इस्तेमाल पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बातचीत करने के लिए करते थे। समझा जाता है कि आने वाले समय में जांच एजेंसियां गिलानी के अलावा अन्य अलगाववादी नेताओं पर कार्रवाई कर सकती हैं।

यासीन मलिक पर कसा शिकंजा, पीएसए के तहत केस दर्ज

Yasin Malik, Separatist Leader JKLF
पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद से मोदी सरकार के देश की सुरक्षा को लेकर तेवर सख्त होते जा रहे हैं, जो यह भी दर्शाता है कि है कोई सख्त निर्णय लेने वाला। 
हालाँकि यह निर्णय बहुत देरी से लिया गया है, यदि यह निर्णय मोदी सरकार ने सत्ता आते ही ले लिया होता, कश्मीर अब तक बहुत सुधर गया होता। चलो, "जब उठो, तभी सवेरा।" 
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं पर शिकंजा कसता जा रहा है। अलगावादी नेताओं की सुरक्षा पहले ही वापस ली जा चुकी है। अब जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के मुखिया यासीन मलिक के ऊपर जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत केस दर्ज हुआ है। जेकेएलएफ के एक प्रवक्ता ने गुरुवार को इस बारे में जानकारी दी। प्रवक्ता ने कहा, 'मलिक के ऊपर जन सुरक्षा अधिनियम के तहत केस दर्ज हुआ है।'
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक प्रवक्ता ने कहा कि हम उनकी 'गिरफ्तारी' और एक राजनीतिक व्यक्ति पर पीएसए लगाने की कड़ी शब्दों में निंदा करते हैं। बता दें कि मलिक को गत 22 फरवरी को हिरासत में लिया गया और इसके बाद उन्हें कोठीबाग पुलिस स्टेशन में रखा गया। इसके पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गत 26 फरवरी को अलगाववादी नेता के आवास पर छापे मारे।
पुलवामा में गत 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकवादी हमले में 40 जवान शहीद हो गए। इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने 18 अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में या तो कटौती कर दी या उनकी सुरक्षा हटा ली। जिन नेताओं से सुरक्षा हटाई गई उनमें हुर्रियत नेता एसएएस गिलानी, आगा सैय्यद मोसवी, मौलवी अब्बास अंसारी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी, शाहिद उल इस्लाम, जफर अकबर भट, नयीम अहमद खान, मुख्तार अहमद वाजा के नाम हैं।
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मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमलों का मास्‍टरमाइंड हाफिज सईद खुद पर लगे प्रतिबंध हटाने की गुहार लेकर संयुक्‍त .....

सुरक्षा हटाए जाने पर कई अलगाववादी नेताओं ने कहा कि उन्होंने कभी सरकार से सुरक्षा की मांग नहीं की थी। अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा हटाए जाने के सरकार के कदम को लोगों ने सराहा। लोगों ने कहा कि भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ाने वाले इन अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा बहुत पहले वापस ले लेनी चाहिए थी। तो कुछ ने कहा कि उन्हें यह बात कभी समझ में नहीं आई कि सरकार ने उन्हें सुरक्षा क्यों दी थी? 
अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा पर सरकार प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपए खर्च करती आई है। लेकिन इसके बदले सरकार या देश को मिला क्या? कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित किया गया, घाटी छोड़ने को मजबूर किया, क्या इसी काम के लिए इन पर इतना धन खर्च करके पाला जा रहा था? किसी भी हुर्रियत नेता ने या फिर पीडीपी अथवा नेशनल कांफ्रेंस के किसी भी नेता ने कश्मीरी पंडितों से यह कहने का साहस किया कि "पुरानी बात छोड़, नए सिरे से अपने स्थानों पर आकर रहिए, आप पर वार बाद में होगा, पहले हमारे पर वार होगा।" वहां आतंकवाद क्यों पनपा? क्यों सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया जाता रहा? क्या सुरक्षाकर्मियों का कोई जीवन नहीं? मस्जिदों का दुरूपयोग हो रहा है, आतंकवादियों को बचाने पत्थरबाजों को मस्जिदों में लगे लॉउड स्पीकरों से चीख-चीख कर बुलाया जाता है, कभी इनमे से किसी ने विरोध किया? यदि इन कश्मीरी नेताओं ने ही इन राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर नकेल डाली होती, कश्मीर की इतनी खस्ता हालत नहीं हुई होती। आज तक किसी ने नहीं कहा और न ही किसी में हिम्मत। कश्मीर से बाहर आकर राष्ट्रीयता की बात करते इन्हे शर्म भी नहीं आती। इतना ही नहीं, जो पार्टी या नेता इन कश्मीरी पार्टीयों से गठबन्धन करते हैं, उनसे पूछा जाए, "सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाज़ी क्यों होती है? पत्थरबाजों को धन कहाँ से आता है और कौन से सूत्रों से।"      

18 अलगाववादी, 155 नेताओं से 1000 जवान, 100 गाड़ियां वापस ली गईं

यासीन मलिक समेत 18 अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा हटाई गई।जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने 18 अलगाववादियों और 155 नेताओं को दी गई सुरक्षा फरवरी 20 को हटा दी। इस फैसले के बाद 1000 से ज्यादा जवान और 100 से ज्यादा गाड़ियां पुलिस की रूटीन ड्यूटी के लिए फ्री होंगी। सिविल सर्विसेज के 2010 के टॉपर और हाल ही में आईएएस की नौकरी छोड़ने वाले शाह फैजल का नाम भी सुरक्षा छिनने वालों की सूची में है।
राज्य के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा समीक्षा की बैठक में कहा गया कि अलगाववादियों को दी गई सुरक्षा संसाधनों की बर्बादी है। जिनकी सुरक्षा घटाई गई है, उनमें एसएएस गिलानी, आगा सैयद मौसवी, मौलवी अब्बास अंसारी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी आदि शामिल हैं। इससे पहले रविवार को भी छह अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई थी।
वाघा बॉर्डर पर अटके पाक के ट्रक
वहीं, पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति के तहत भारत ने आर्थिक तौर पर उसकी कमर तोड़नी शुरू कर दी है। हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीन लिया था और वहां से आने वाले सामान पर ड्यूटी 200% तक बढ़ा दी थी। पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वाघा बॉर्डर पर सामान से लदे पाकिस्तान के कई ट्रक अटके हुए हैं। पाक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलवामा हमले के बाद भारत की कोशिशें पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर हर तरह से नुकसान पहुंचा रही हैं।
पाकिस्तान के एक चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक, 14 फरवरी को पुलवामा हमले से पहले ट्रक के जरिए अरबों रुपए का छुहारा वाघा बॉर्डर से भारत में एक्सपोर्ट होना था। हालांकि, अब वाघा बॉर्डर पर छुहारों से लदे सैकड़ों ट्रक खड़े हैं। एक ट्रक में तकरीबन 15 लाख रुपए का माल है। 200% इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने के बाद 15 लाख रुपए के सामान पर 30 लाख रुपए की ड्यूटी लगा दी गई है। इसके बाद लाहौर से आ रहे कई ट्रक बॉर्डर पहुंचे बिना ही लौट रहे हैं। पाकिस्तान की कई छुहारा मार्केट में कारोबार बंद हो चुका है। पिछले पांच दिनों में पाकिस्तान सरकार और वहां के कारोबारियों को अरबों रुपए का नुकसान हो चुका है।
पाक को चाय का निर्यात भी कम करेगा भारत
भारत के चाय उत्पादकों ने भी कहा है कि वे पाकिस्तान को निर्यात कम कर देंगे। 2018 में भारत ने पाकिस्तान में 1.58 करोड़ किलोग्राम चाय निर्यात की थी। 2017 के मुकाबले चाय के निर्यात में 7.43% का इजाफा हुआ था। चाय उत्पादकों का कहना है कि अब वे पाकिस्तान की बजाय मिस्र, मध्य पूर्व और रूस जैसे देशों में चाय निर्यात करने के बारे में सोचेंगे।

पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से एमएफएन का दर्जा वापस ले लिया है।
पुलवामा हमले का असर
पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीनने का फैसला किया था। इसके बाद से भारत पर पाकिस्तान से आयात होने वाली वस्तुओं पर किसी भी सीमा तक शुल्क बढ़ाने का अधिकार था। पाकिस्तान से आयात होने वाली दो प्रमुख वस्तुएं फल और सीमेंट हैं। अब तक फलों पर 30-50% और सीमेंट पर 7.5% कस्टम ड्यूटी लगती थी। अब यह ड्यूटी बढ़कर सीधे 200% हो चुकी है। भारत-पाकिस्तान के बीच सालाना 17 हजार करोड़ रुपए का कारोबार होता है। इसमें भारत की 80% और पाक की 20% हिस्सेदारी है।

भारत ने 1996 में पाक को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया था
मोस्ट फेवर्ड नेशन यानी सबसे ज्यादा तरजीही वाला देश। विश्‍व व्‍यापार संगठन और इंटरनेशनल ट्रेड नियमों के आधार पर व्यापार में सहूलियत लाने के लिए मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया जाता है। जिस देश को यह यह दर्जा मिलता है, उसे आश्वासन रहता है कि उसे कारोबार में नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। भारत ने 1996 में पाकिस्‍तान को मोस्‍ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया था। 2016 में सिंधु जल समझौता खत्म करने के समय और उड़ी हमले के बाद भी भारत ने पाक से एमएफएन का दर्जा वापस लेने के संकेत दिए थे। हालांकि, बाद में केंद्र सरकार ने इसे जारी रखा था। पाक ने कभी भी भारत को एमएफएन का दर्जा नहीं दिया।

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पुलवामा हमले के बाद पूरे देश में जारी रोष का असर अब दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर भी दिखाई देने लगा है। सड़क म...

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जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में शहीद हुए 40 जवानों के शोक से देश अब तक उबरा ...

पुलवामा हमले के बाद सरकार का बड़ा कदम, हुर्रियत के 5 नेताओं की सुरक्षा हटाई गई

Mirwaiz Umar Farooqपुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मीरवाइज उमर फारुक समेत पांच अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली है। सीआरपीएफ काफिले पर हुए हमले के बाद ये कदम उठाया गया है। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि आतंकियों के साथ उनके मददगारों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। मीरवाइज उमर फारुक के अलावा अब्दुल गनी बट्ट, हाशिम कुरैशी, बिलाल लोन, शब्बीर शाह हैं। स्पष्ट किया गया है कि इन पांच नेताओं और अन्य अलगाववादियों को किसी भी चीज की आड़ में सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जाएगी।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के साथ संदिग्ध तौर पर संपर्क रखने वाले कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को मिली सुरक्षा की समीक्षा की, जिसके बाद ये फैसला किया गया। एक शीर्ष अधिकारी ने बताया था कि केंद्र सरकार ने एक सुझाव दिया था जिसके बाद ऐसे व्यक्तियों को मिली सुरक्षा की समीक्षा की जाएगी, जिन पर आईएसआई के साथ संबंधों का शक है।
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने फरवरी 15 को श्रीनगर में हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं समेत अलगाववादियों का परोक्ष जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान और उसकी जासूसी एजेंसी आईएसआई से धन पा रहे लोगों को दी गई सुरक्षा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। ऐसे तत्व और ताकतें हैं जो पाकिस्तान और आईएसआई से धन लेते हैं। मैंने संबंधित अधिकारियों से उनकी सुरक्षा पर पुनर्विचार करने को कहा है। 
उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में कुछ तत्वों के तार आईएसआई और आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं, लेकिन सरकार उनकी सोच को परास्त करेगी। ऐसे लोग जम्मू कश्मीर की जनता और राज्य के युवाओं के भविष्य के साथ खेल रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई निर्णायक दौर में है और मैं देश को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम इसमें जीतेंगे।
Shiv senaसर्जिकल स्ट्रीक नहीं, इस्लामाबाद और लाहौर पर हमला हो-- शिव सेना 
पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद की स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में शिवसेना ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से कहा कि वह सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक करने से नतीजे नहीं निकलने वाले और वक्त आ गया है कि लाहौर और इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के अंदरूनी हिस्सों में हमले किए जाएं। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में शिरकत करने के बाद शिवसेना के सांसद संजय राउत ने पत्रकारों को बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार को वह करना चाहिए जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
राउत ने कहा, ‘सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक से काम नहीं चलने वाला, अब लाहौर और इस्लामाबाद तक हमले करने होंगे। मोदी सरकार को वह करना चाहिए जो इंदिरा गांधी की सरकार ने किया था।’ गौरतलब है कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 का युद्ध जीता था। भारत ने जम्मू-कश्मीर के उरी में थलसेना की शिविर पर हुए आतंकवादी हमले के जवाब में 2016 में पाकिस्तान से लगी सीमा के पार आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी।
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आर.बी.एल. निगम,फिल्म समीक्षक पुलवामा आतंकी हमले ने देश को हिला कर रख दिया है। बॉलीवुड के तमाम एक्टर इस पर लगातार अपन.....

पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत की दृढ़ता दिखाते हुए आज सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस बात को रेखांकित किया कि वे देश की एकता और अखंडता की रक्षा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपने सुरक्षा बलों के साथ एकजुटता से खड़ी हैं।
सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी प्रमुख पार्टियों के नेताओं ने शिरकत की। भाजपा और कांग्रेस सहित सभी पार्टियों ने एक प्रस्ताव पारित कर आतंकवादी हमले और सीमा-पार से उसे मिल रहे समर्थन की निंदा की। विपक्षी सदस्यों ने इस चुनौती से निपटने में सरकार को पूरा समर्थन दिया।
इंडिया इज़राइल क्यों नहीं बन सकता?
लोगों को आज प्रतिशोध चाहिए। चाहते हैं कि बस मोदी टैंक लेकर घुसे और सब पाकिस्तानियों को ख़त्म कर दे। चाहते हैं, देश रातोंरात इज़राइल मोड में आ जाये। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं होगा।
मोदी है, तो मुझे पूरी अपेक्षा और विश्वास है कि बदला होगा, भीषण होगा, सौ गुना हाहाकारी होगा। लेकिन इंडिया इज़राइल नहीं बन सकता और ना ही बन पाएगा।
छोटे से इज़राइल पर आस पास के 10 देश अटैक कर दे, तब भी वो छः दिन के अंदर धूल चटा कर, उन्हें वापस अपने घर में बिठा सकता है। छोटे से इज़राइल पर कोई एक ग्रेनेड फेंकने से पहले भी 10 बार सोचता है, क्योंकि जानता है, किए गए नुकसान से 10 गुना नुकसान वापस झेलना पड़ेगा। 
आतंकियों से हमदर्दी रखने पर भी कड़ी कार्रवाई होगी
कश्मीर में आतंकियों के साथ-साथ उनसे सहानुभूति रखने वालों, पत्थरबाजों और अलगाववादियों से सुरक्षा बल सख्ती से निपटेंगे। पुलवामा हमले के बाद सुरक्षाबलों को सरकार ने कार्रवाई के लिए खुली छूट देने का फैसला किया है। इसका असर अगले कुछ दिनों में दिखना शुरू हो जाएगा।
सूत्रों के अनुसार कश्मीर में आतंकियों को परोक्ष रूप से समर्थन देने वालों की बड़ी संख्या है। इनमें अलगाववादी भी शामिल हैं, लेकिन इनके खिलाफ सुरक्षाबल कोई कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। अलगाववादियों के परोक्ष समर्थन से आतंकियों के हौसले ‘बुलंद’ रहते हैं। इससे नए आतंकी भी पैदा होते हैं। सुरक्षा से जुड़े सूत्रों ने कहा कि ऐसे लोग अब हमारे निशाने पर होंगे। उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
पैनी नजर रहेगी
सूत्रों का कहा है कि अलगाववादियों की गतिविधियों पर भी बलों की पैनी नजर रहेगी। उनके बयानों और मुलाकातों पर भी बल निगरानी रखेंगे ताकि कार्रवाई का ठोस आधार निकालकर उन्हें गिरफ्तार किया जा सके।

पत्थरबाजों पर नरमी नहीं
सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वालों के प्रति भी बल अब नरमी नही दिखाएंगे। अब इन्हें आतंकियों का समर्थन करने और सुरक्षा बलों पर हमले के आरोप में गिरफ्तार करेंगे। मौके पर जवाबी कार्रवाई भी करेंगे।

जनाजे की भीड़ की निगरानी
सूत्रों ने कहा कि आतंकियों के जनाजों में जुटने वाली भीड़ पर भी नजर रखी जाएगी। उसमें नारेबाजी कर कट्टरता को बढ़ावा देने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। दरअसल आतंकियो के जनाजे में भीड़ जुटाकर कुछ लोग माहौल को गरमाने की कोशिश करते हैं लेकिन अभी तक ऐसे लोग कानून की आखों में धूल झोकते रहे हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि आतंकियों के साथ ही उनके समर्थकों से भी सख्ती से निपटने की जरूरत है। कश्मीर में ऐसे लोग बहुत है वे सिर्फ अलगाववादियों में नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में है। जब तक ऐसे लोगों का समर्थन आतंकियों को मिलता रहेगा आतंकवाद कम नहीं होगा।
भारत इज़राइल नहीं बन सकता ?
क्योंकि इज़राइल में कोई JNU नहीं है, जहां देश के युवा 'इज़राइल, तेरे टुकड़े होंगे' के नारे लगा सकें। 
इज़राइल में कोई सरकार चुने जाने के दो महीने के अंदर, गंभीर आरोपों में घिरी नलिनी सुंदर नामक किसी नक्सली को क्लीन चिट नहीं दे दी जाती। 
क्योंकि इज़राइल जब ऑपेरशन Mu nich करता है, तो वहां का विपक्ष सबूत मांग कर देश व सेना को अपमानित नहीं करता।
क्योंकि वहां ना तो आतंकवादियों के लिए रात दो बजे कोर्ट खुलते हैं और ना ही वहां के पत्रकार आतंकियों के  लिए मानवाधिकार का रंडी रोना रोते हैं। ना ही वहां के पत्रकार आतंकी को टेररिस्ट कहने के बजाय मिलिटेंट या उग्रवादी कहना उचित मानते हैं।
क्योंकि इज़राइल में कोई जाट, गुर्जर या मराठा इज़राइल की पब्लिक प्रोपर्टी को नहीं जलाते। वहां देश सर्वोपरि है, जाति या धर्म नहीं। 
क्योंकि वहां के नेता, सेनाध्यक्ष को कुत्ता या गुंडा कहने की हिम्मत भी नहीं कर सकते। टैक्सपेयर्स के पैसों से पढ़ाई का ढोंग रचने वाले, शाहीला रशीद या कन्हैया कुमार जैसे जोंक नहीं है, जो आर्मी को रेपिस्ट बताते फिरें। क्योंकि वहां के अभिनेता,  जहां पैदा हुए हैं, जहां सफल हुए हैं, उस धरती पर शर्मिंदा नहीं होते। 
असहिष्णुता का नाटक नहीं करते।
क्योंकि वहां लोग नेतन्याहू या उसकी पार्टी का विरोध करते करते इज़राइल विरोधी नहीं हो जाते।
भारत में तो आपको सैकड़ो मिलेंगे, जिनके मन में एक अजीब सी खुशी हो रही है कि हमला हुआ। अब इसी बहाने मोदी और भाजपा पर कीचड़ उछालेंगे, कहेंगे, बहुत कूद रहे थे कि कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ।
क्योंकि कर्ज़माफ़ी, बेरोज़गारी भत्ते और जातिवाद के चक्कर में इज़राइल के लोग बॉर्डर से जुड़े वो राज्य, जहां सिमी या नक्सली पनपने का डर हो - आतंकवादियों और नक्सलियों के हिमायती को नहीं सौंपते। 
क्योंकि वहां के युवा, देश तोड़ने की बातें नहीं करते। वहां के नेता ऐसे देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के पीछे नहीं खड़े होते और ना ही वहां की जनता किसी बात के लालच में आकर, ऐसे नेताओं के पीछे खड़ी होती है।
वहां का विपक्ष इज़राइल के धुर विरोधी ईरान में जाकर, ये नहीं कहता कि आप नेतन्याहू को हटाने में हमारी मदद करो। 
आज जो पाकिस्तान को साफ़ करने की बात कर रहे हैं और सच में युद्ध हो जाये, तो प्याज-पेट्रोल-टमाटर महंगे हो गए, इस बात को लेकर सड़कों पर आ जायेंगे। दाल फ्राई खाने का शौकीन देश, टमाटर महंगे होना नहीं सहन कर सकता। 
बरगद बन जाने की बातें करते हैं, गमले में उगे हुए लोग। 
नहीं बन सकते हैं हम इज़राइल। क्योंकि इजराइल अपनी टेक्नोलॉजी, अपने आयुधों या हथियारों से इज़राइल नहीं है। इज़राइल अपने नागरिकों के कारण इज़राइल है। और इसी तरह, भारत अपने 'नागरिकों' की वजह से ही भारत है। इसे कोई मोदी या कोई भी और, आकर बदल नहीं  सकता। 
बाहर का तो पता नहीं, लेकिन आज देश के अंदर एक सर्जिकल स्ट्राइक की बेहद आवश्यकता है। ये नहीं हो पाया, तो लुटेरे लूटने के लिए तैयार बैठे हैं।

ज़रूरत ये भी है कि हम इज़राइल बनें, कि हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों को विश्वास हो कि कुछ भी हो, देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए देश एक रहेगा, सिर्फ ऐसे युद्ध काल में ही नहीं, वरन हमेशा। नहीं तो भारत ऐसे ही चोट दर चोट खाता रहेगा।