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10 जनपथ का सोनिया गाँधी ने 18 महीने से नहीं दिया भाड़ा: कांग्रेस के कब्जे वाली अन्य कोठियों का भी 10 साल से किराया बाकी : RTI से खुलासा

चुनावों में अपने आपको ईमानदार और देशभक्त कहने वाली कांग्रेस का असली चेहरा एक RTI से उजागर हुआ है कि किस तरह सत्ता में न होते हुए भी सरकारी खजाने को लुटा जा रहा है और भाजपा यानि मोदी सरकार भी इस लूट पर खामोश है, क्यों? 

विधानसभा चुनावों के बीच कांग्रेस  अध्यक्ष सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी द्वारा अपने लुटियन स्थित बंगलो का लम्बे समय से किराया न देने का मामला सामने आया है। एक RTI के अनुसार यह खुलासा हुआ है कि गाँधी परिवार दिल्ली के अपने तीन आवंटित बंगलो का किराया भी  काफी समय से नहीं दिया है।

ये तीन बंगले हैं- 26 अकबर रोड, 10 जनपथ और चाणक्यपुरी में। बता दें कि 26 अकबर रोड और चाणक्यपुरी वाले बंगले में कांग्रेस ने ऑफिस बना रखा है वहीं 10 जनपथ सोनिया गाँधी का घर है। गुजरात के सुजीत पटेल के RTI के जवाब में शहरी हाउसिंग मंत्रालय ने बकाया किराए के बारे में सूचना दी है। 26 अकबर रोड के बंगले का जहाँ दिसंबर 2012 के बाद से 1269902 रुपया किराया बाकी है वहीं चाणक्यपुरी के बंगले का किराया अगस्त 2013 के बाद से बाकी है, जिसकी सरकारी राशि 507911 रूपया है। वहीं सोनिया गाँधी के आधिकारिक निवास 10 जनपथ का भी सितम्बर 2020 के बाद से किराया नहीं दिया गया है।

बीजेपी मुंबई के प्रवक्ता सुरेश नखुआ ने तंज करते हुए ट्वीट किया, “एंटोनिया माइनो उर्फ ​​सोनिया गाँधी प्रवासी श्रमिकों के टिकट के भुगतान को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कर रही थीं। कम से कम पहले अपने मकान का किराया तो चुकाया होता, जो डेढ़ साल से बकाया है।”

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को आवंटित घर देश के अन्य नेताओं के मुकाबले सबसे बड़ा घर है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री निवास 7 रेस कोर्स से भी बड़ा है। सेंट्रल पब्लिक डिपार्टमेंट के अनुसार प्रधानमंत्री निवास 14,101 वर्ग मीटर में बना है वहीं सोनिया गाँधी का निवास 15,181 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला है जो 7RCR के मुकाबले काफी बड़ा है।

राजधानी दिल्ली में कांग्रेस ने अपने कब्जे में कई बंगलो को ले रखा था। जिसे खाली कराने के लिए मोदी सरकार में कई नोटिस भेजे गए थे। निवास स्थान के अलावा कांग्रेस के कब्जे में जो तीन अन्य बंगले 5 रायसीना रोड, 26 अकबर रोड और सी-2/109 चाणक्यपुरी हैं। इनमें से रायसीना रोड वाला बंगला यूथ कांग्रेस के पास है, जबकि 26 अकबर रोड और चाणक्यपुरी वाला बंगला पार्टी के कामकाज के लिए इस्तेमाल होता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक पुराने RTI के हवाले से बताया गया है कि शहरी विकास मंत्रालय के तहत आने वाले संपदा निदेशालय ने इनका आवंटन 26 जून, 2013 को रद्द कर दिया गया था। बता दें कि कॉन्ग्रेस को दिल्ली में अपना कार्यालय भवन बनाने के लिए 2010 में जमीन दी गई थी।

जमीन आवंटन के तीन साल के अंदर कांग्रेस को भवन का निर्माण करवा लेना था और चार बंगलों को 2013 तक खाली कर देना था। आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने तीन साल का अतिरिक्त समय देने का निवेदन किया था। जिसके बाद 2017 में भी कांग्रेस को नोटिस भेजा गया था। फिलहाल अभी भी ये बंगले कांग्रेस के कब्जे में है और इनका किराया मार्किट रेट से बहुत कम होने के बाद भी कांग्रेस ने लम्बे समय से चुकता नहीं किया है। जिसे लेकर सोशल मीडिया कांग्रेस को घेरा जा रहा है।

दिल्ली : पिछले दो सालों में सिर्फ 28 लोगों को दी नौकरी, आरटीआई से केजरीवाल के महाझूठ का बड़ा खुलासा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर और झूठे वादे कर राष्ट्रीय राजधानी में सरकार तो बना ली। अब इस झूठ को ही वो चुनावी सफलता की कुंजी मान रहे हैं। लेकिन आरटाआई कार्यकर्ता डॉ. डीसी प्रजापति ने आरटीआई के हवाले से दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के महाझूठ का बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली सरकार जब से सत्ता में आई है, उसने रोजगार को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए। रोजगार के मामले में बड़े-बड़े वादे करती रही, लेकिन सभी झूठे निकले। 

आरटीआई के मुताबिक केजरीवाल सरकार ने पिछले दो सालों में सिर्फ 28 लोगों को नौकरियां दी हैं। इससे पहले अगस्त 2018 में दिल्ली विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान तत्कालीन नेता विपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने रोजगार कार्यालय में हुए पंजीयन और नौकरियों की जानकारी सरकार के रोजगार मंत्री से मांगी थी। दिल्ली सरकार के रोजगार विभाग ने लिखित जवाब में बताया कि तीन साल में सिर्फ 344 बेरोजगारों को नौकरियां मिलीं। इनमें से 177 कंडक्टर, वॉटरमैन और टेम्पररी वॉटरमैन पद पर नियुक्त हुए। इसके साथ यह जानकारी भी सामने आई कि रोजगार विभाग ने इसके लिए कुल 21.53 करोड़ रुपये खर्च किए।

जुलाई 2020 में केजरीवाल सरकार ने कोरोना महामारी से प्रभावित नौकरी की तलाश करने वाले और नौकरी देने वाले दोनों के लिए एक जॉब पोर्टल jobs.delhi.gov.in लॉन्च किया था। इस पोर्टल को सरकार ने रोजगार बाजार नाम दिया। लेकिन, सरकार ने अभी तक स्पष्ट तौर पर यह नहीं बताया कि रोजगार बाजार में कितने लोगों को नौकरियां मिलीं। केजरीवाल की यह रोजगार योजना भी फेल साबित हुई है। दरअसल अरविंद केजरीवाल रोजगार के नाम पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं। इसलिए वो दूसरों राज्यों में भी सरकार बनाने के लिए लोगों को झूठे वादे कर झांसा देने की कोशिश कर रहे हैं। 

उत्तराखंड के हल्द्वानी में केजरीवाल ने ऐलान किया कि राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर 6 महीने में 1 लाख लोगों को नौकरियां मिलेंगी। जब तक रोजगार नहीं मिलता तब तक हर महीने 5,000 रुपये का भत्ता दिया जाएगा। इसके अलावा युवाओं के लिए जॉब पोर्टल, पलायन और रोजगार मंत्रालय का गठन किया जाएगा। इसी बीच केजरीवाल और उनकी सरकार ने रोजगार के नाम पर किस तरह दिल्ली की जनता की आंखों में धूल झोंकी है, उसका सबूत अब जनता के सामने है। इससे उत्तराखंड और अन्य राज्य की जनता को सबक लेने की जरूरत है।

कोरोना महामारी के दौरान केजरीवाल ने कोरोना वारियर्स की मृत्यु होने पर जो सहायता की घोषणा की थी, लेकिन वह काम भी धर्म देखकर किया। देखिए वीडियो:-

दिल्ली में रोजगार देने में नाकाम केजरीवाल सरकार 

RTI से खुलासा : 2 साल में 28 लोगों दी नौकरी

        वर्ष                 नियुक्तियां    
       2020                28
       2019                  0
  दिल्ली सरकार के रोजगार विभाग ने खोली पोल
3 साल में 344 बेरोजगारों को मिली नौकरी
             वर्ष             नियुक्तियां 
            2017                   66
            2016                  102
            2015                 176

दिल्लीः कोरोना रिलीफ फंड में आए 35 रूपए करोड़, संक्रमण रोकने पर केजरीवाल सरकार का खर्च ‘शून्य’, लेकिन विज्ञापन पर 150 करोड़ खर्च

काम करने की बजाए विज्ञापन पर खर्च मुफ्तखोर दिल्लीवासियों के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के कार्यकलापों को देख इनके संस्कारों पर शंका होने लगती है। जब से दिल्ली में केजरीवाल मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से दिल्ली में प्रदुषण, सफाई कर्मचारियों के वेतन का झगड़ा तो कभी कोई अन्य समस्या। केजरीवाल से पूर्व शीला दीक्षित तक जितने भी दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे, किसी के भी कार्यकाल में कभी ऐसी समस्या नहीं आयी। केजरीवाल के कार्यकलापों को देख निश्चितरूप से कहा जा सकता है कि जिस दिन सत्ता परिवर्तन होगा, केजरीवाल घोटालों में शायद भारत के समस्त मुख्यमंत्रियों को बहुत पीछे छोड़ देंगे।   
दिल्ली सरकार के एलजी/सीएम रिलीफ फण्ड मार्च 2020 से जनवरी 2021 के बीच करीब 35 करोड़ रुपए आए। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने इसमें से 17 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए। लेकिन इसी दौरान इस फण्ड से कितना को रोकने पर खर्च हुआ, इसकी जानकारी देने में सरकार विफल रही है। यह तथ्य सूचना का अधिकार (RTI) के जवाब से सामने आया है। खास बात ये है कि दिल्ली सरकार राष्ट्रीय राजधानी में महामारी के कुप्रबंधन का आरोप केंद्र सरकार पर लगा रही है।

आरटीआई कार्यकर्ता विवेक पांडे ने इस संबंध में जानकारी माँगी थी। ऑपइंडिया से बात करते हुए विवेक ने बताया कि उन्होंने मार्च 2020 से सीएम/एलजी राहत कोष में आए धन और उसके उपयोग को लेकर जानकारी माँगी थी। इसके लिए उन्होंने दिल्ली सरकार के पास दो आरटीआई आवेदन दिए थे।

पहला आरटीआई नवंबर 2020 में और दूसरा फरवरी 2021 में दाखिल किया गया। उन्होंने यह भी पूछा कि आप सरकार ने इस अवधि के दौरान कोविड-19 महामारी को नियंत्रित करने पर कितना खर्च किया है।

दोनों के मिले लगभग समान जवाब

दोनों आरटीआई में उल्लेखित सवालों और मिले जवाबों का स्क्रीनशॉट विवेक ने शेयर किया है। 16 नवंबर 2020 के आरटीआई आवेदन में उन्होंने सरकार से मार्च 2020 तक एलजी/सीएम राहत कोष में जमा राशि का विवरण देने के लिए कहा था। जवाब में बताया गया कि इस दौरान फण्ड में 34.69 करोड़ रुपए जमा हुए।

                नवंबर 2020 में विवेक पांडे द्वारा दायर आरटीआई आवेदन और दिल्ली सरकार का जवाब
सरकार ने फण्ड से कितना खर्च किया, इस सवाल के जवाब में बताया गया कि अब तक 17.02 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। हालाँकि दिल्ली सरकार यह बताने में विफल रही कि उन्होंने पैसा कहाँ खर्च किया। जवाब में कहा गया कि अभी डाटा को अंतिम रूप नहीं दिया गया है और इसका मिलान करना बाकी है। कोविड महामारी नियंत्रण पर कितना पैसा खर्च किया गया, इसका जवाब ‘शून्य’ बताया गया।

तीन महीने इंतजार करने के बाद, विवेक ने केजरीवाल सरकार से बेहतर जवाब पाने की आशा में एक और आवेदन प्रस्तुत किया। दिल्ली सरकार द्वारा दिए गए उत्तरों में एकमात्र अंतर उन्हें प्राप्त राशि (34.77 करोड़ रुपये) और उनके द्वारा खर्च की गई राशि (17.27 करोड़ रुपये) में था। इस प्रश्न के लिए कि कोविड महामारी नियंत्रण पर कितना पैसा खर्च किया, जवाब फिर से वही था NIL (शून्य)।

               फरवरी 2021 में विवेक पांडे द्वारा दायर आरटीआई आवेदन और दिल्ली सरकार का जवाब
ऑपइंडिया से बात करते हुए, विवेक ने कहा कि कोविड मामलों की बढ़ती संख्या के बीच राष्ट्रीय राजधानी में स्वास्थ्य ढाँचे के कुप्रबंधन के लिए दिल्ली सरकार लगातार केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है। हालाँकि, केजरीवाल के हाथ में धन होने के बावजूद, उन्होंने महामारी को नियंत्रित करने के लिए कुछ नहीं किया। विवेक ने कहा, “वह सीएम रिलीफ फण्ड से ऑक्सीजन प्लांट स्थापित कर सकते थे या कुछ अन्य व्यवस्था कर सकते थे।” विशेष रूप से, केजरीवाल सरकार ने उस राहत कार्य का श्रेय लेने की कोशिश की, जो पिछले साल दिल्ली सरकार के महामारी का प्रबंधन करने में विफल रहने के बाद केंद्र सरकार द्वारा किया गया था। महामारी की दूसरी लहार के दौरान भी, उन्होंने (केजरीवाल) उसी रणनीति को अपनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

दिल्ली सरकार ने 2021 में विज्ञापनों पर खर्च किए 150 करोड़

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार ने पिछले कुछ महीनों में प्रिंट, टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया के विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च किए हैं। केवल 2021 में विज्ञापनों पर 150 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जो दिखाते हैं कि दिल्ली सरकार की प्राथमिकताएँ क्या हैं। अकेले मार्च में, सरकार ने विज्ञापनों पर 92.48 करोड़ रुपए खर्च किए। एक ट्विटर उपयोगकर्ता ने कहा कि उसने गिना कि टीवी पर छह घंटे के भीतर 15 बार विज्ञापन चलाए गए।

अवलोकन करें:-

क्या दिल्ली के समाचार छुपाने के लिए विज्ञापनों से केजरीवाल ने मीडिया को खरीद लिया है? Times Now पत्रक

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क्या दिल्ली के समाचार छुपाने के लिए विज्ञापनों से केजरीवाल ने मीडिया को खरीद लिया है? Times Now पत्रक

25 अप्रैल को दिल्ली में 22933 नए कोरोना केस सामने आए। अब तक राज्य में 10,27,715 कोविड-19 के मामले आ चुके हैं, जिनमें से 9,18,143 ठीक हो चुके हैं। राज्य में 94,592 ऐक्टिव केस हैं और 14248 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। 25 अप्रैल को ही 350 लोगों की मौत हुई है। पिछले एक हफ्ते के दौरान पॉजिटिव रेट बढ़कर 30 फीसदी हो गया है। पिछले दो हफ्ते के दौरान वैक्सीन लगाए जाने वालों की भी संख्या घटी है। 10 अप्रैल से राज्य द्वारा 1,05,918 डोज जारी किए गए, जिनमें से दिल्ली 1 लाख/दिन का आँकड़ा भी नहीं पार कर पाई। कई दिन तो 50 हजार टीके भी नहीं लग सके।

केजरीवाल के स्वास्थ्य मंत्री के कोरोना इलाज में हुए 2.5 लाख रुपए खर्च, सरकारी खजाने से भरा निजी अस्पताल का बिल: RTI में खुलासा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खाने का खर्चा और उनकी माताश्री के दिल्ली आने पर उनका खर्चा आदि की RTI के माध्यम से जानकारी लेने वाले कभी अपने द्वारा सरकारी खजाने के दुरूपयोग किये जाने पर मुंह में दही जमाए बैठ, ईमानदार बने घूमते हैं। 
पर्यावरण हो अथवा कोरोना आदि मदो पर मिले धन को जनता पर खर्च करने की बजाए उसका अधिकांश भाग अपने विज्ञापन पर खर्च करते हैं। दिल्ली में कोरोना की स्थिति ख़राब होने पर यदि केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, समस्त भारत में दिल्ली का बहुत बुरा हाल हो गया होता।  
कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली में एक ओर जहाँ गरीबों को बिस्तर और दवाई नसीब नहीं हो पा रही थी, वहीं दूसरी ओर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के कोरोना वायरस के इलाज के दौरान 2,54,898 रुपए का खर्च आया है। एक आरटीआई के जवाब में इस बात की जानकारी मिली है। आरटीआई कार्यकर्ता विवेक पांडेय ने एक आरटीआई दायर कर इस मामले में जानकारी माँगी थी।

विवेक पांडेय 10 जनवरी 2021 को आरटीआई डाल कर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र कुमार जैन के इलाज पर दिल्ली सरकार द्वारा किए गए खर्चों का विवरण माँगा था। जिसका जवाब देते हुए कहा गया है कि राजीव गाँधी सुपर स्पेशेलिटी अस्पताल में हुए इलाज का बिल ऑफिस में उपलब्ध नहीं है। वहीं, साकेत के मैक्स सुपर स्पेशेलिटी अस्पताल में उनके इलाज के दौरान 2,54,898 रुपए दिल्ली सरकार की तरफ से भरे गए थे। केजरीवाल सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन का इलाज इस अपस्ताल में 19 जून 2020 से 26 जून 2020 तक चला था।

उस समय मैक्स अस्पताल दैनिक रूप से रूटीन जनरल वार्ड के 25,090 रुपए, रूटीन ट्विन-शेयरिंग के लिए 27,190 रुपए, रुटीन वार्ड प्लस प्राइवेट रूम के लिए 30,490 रुपए, बिना वेंटीलेटर के आईसीयू के लिए 53,050 रुपए और वेंटीलेटर के साथ आईसीयू के लिए 72,550 रुपए चार्ज कर रहा था।

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन में कोविड-19 के लक्षण दिखने के बाद उन्हें राजीव गाँधी सुपर स्पेशेलिटी अस्पताल में भर्ती करवाया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (जून 15, 2020) को उन्हें साँस लेने में दिक्कत शुरू हुई थी। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहाँ उन्हें कुछ समय तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। सत्येंद्र जैन ने दिल्ली सरकार से ये बिल वसूल किया था।

सत्येंद्र जैन के अस्पताल में भर्ती होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछना शुरू कर दिया कि आखिर वो घर पर क्यों नहीं है? दरअसल लोगों ने उनसे यह सवाल इसलिए किया था क्योंकि इससे पहले सत्येंद्र जैन ने कोविड-19 के मरीजों को लेकर इस बात को स्पष्ट किया था कि अगर कोरोना किसी को हो भी जाता है, तो वह अस्पताल की ओर न भागें, क्योंकि उसका इलाज घर में रखकर किया जाएगा, उसे प्रॉपर गाइड किया जाएगा, डॉक्टर उसे घर पर आकर देखेंगे। हालत बहुत बिगड़ने पर ही अस्पताल में एडमिट किया जाएगा।

सत्येंद्र जैन ने दिल्ली में कोरोना के बढ़ते प्रकोप के लिए बाहरी लोगों को जिम्मेदार ठहराया था। स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय बाहरी लोगों पर इसका दोष मढ़ना शुरू कर दिया था। न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उनका कहना था कि सक्रिय मामलों की संख्या में वृद्धि का कारण दिल्ली के बाहर के लोग हैं। जो कोरोना वायरस का टेस्ट दिल्ली में करा रहे हैं।

कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

                               क़ुतुब मीनार को लेकर दायर की गई RTI का NCERT ने दिया जवाब
क़ुतुब मीनार परिसर के भीतर प्राचीन काल में कई मंदिरों के अस्तित्व की बात कुछ इतिहासकारों ने भी स्वीकार की है। आपने भी यही पढ़ा और सुना होगा कि कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार को बनवाया था। NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की पाठ्य पुस्तकों में भी छात्रों को यही पढ़ाया जा रहा है। इस मामले में लेखक नीरज अत्री ने एक RTI दायर की थी, जिसके जवाब चौंकाने वाले हैं।

वैसे इस विषय पर यदा-कदा लिखता रहा हूँ कि मुस्लिम समाज के वोट अपनी तिजोरी में रखने के लिए कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने भारत के गौरवमयी हिन्दू इतिहास को धूमिल कर आतताई मुग़लों के रक्तरंजित इतिहास को दरकिनार कर महान बता कर समस्त देशवासियों को गलत इतिहास पढ़वा दिया। यह देश का दुर्भाग्य है कि हम अपने ही वास्तविक इतिहास से शिक्षित होते हुए भी किसी अनपढ़ से कम नहीं। जो वास्तविकता की बात करता है, उसे तथाकथित इतिहासकार और छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता और पार्टियां साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शान्ति का दुश्मन और सिरफिरा आदि नामों से बदनाम करते हैं। संक्षेप में संलग्न मेरा स्तम्भ के अलावा नीचे दिए लिंक का अवलोकन करिए। जिसका किसी छद्दम धर्म-निरपेक्ष एवं इतिहासकार ने खंडन नहीं किया। लेकिन RTI के माध्यम से सच्चाई सामने आ रही है। 
वास्तविक इतिहास की बात करने वालों को साम्प्रदायिक आदि नामों से अलंकृत करने वालों को सर्वप्रथम रामजन्मभूमि विवाद से आंखें खोलनी चाहिए कि किस तरह खुदाई में मिले मंदिर के प्रमाणों को कोर्ट से छुपा कर मुद्दे को लंबित कर जनता को गुमराह किया जाता रहा। फिर 1962 तक जितने भी फैसले कृष्णजन्म भूमि के पक्ष में आए कोर्ट के फैसले क्यों नहीं लागु किया गया? फिर अय्याश अकबर को बता दिया महान, आखिर झूठ बोलने की भी कोई सीमा होती है। वर्तमान मोदी सरकार को चाहिए कि इतिहास से भयंकर छेड़छाड़ करने वाले समस्त इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट में डालना चाहिए।  
ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
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ऐय्याश अकबर को महान बताने वाले इतिहासकारों का बहिष्कार हो
पिताश्री एम.बी.एल. निगम श्री केवल रतन मलकानी अस्सी के दशक में विश्व चर्चित पत्रकार श्री केवल रतन मलकानी, मुख्य सम्प....

इतिहास का सबसे बड़ा झूठ जो हम सबको स्कूल में पढ़ाया गया
‘औरंगजेब-शाहजहाँ ने बनवाए मंदिर’ – NCERT के पास नहीं कोई प्रमाण – RTI में खुलासा

उससे पहले जानते हैं कि NCERT की पुस्तक में लिखा क्या है। इसमें कुतुबमीनार की तस्वीर के साथ दिए गए विवरण में बताया गया है कि कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद और मीनार को 12वीं शताब्दी के अंत में बनवाया गया था। साथ ही लिखा है कि दिल्ली के सुल्तानों द्वारा बसाए गए पहले नगर का जश्न मनाने के लिए इसका निर्माण हुआ। आगे बताया गया है कि इसे इतिहास में दिल्ली-ए-कुहना नाम से जाना जाता है, जिसे हम आज पुरानी दिल्ली कहते हैं।

तत्पश्चात लिखा है कि इस ‘मस्जिद’ को कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था, जिसे मामलुक साम्राज्य के तीसरे सुल्तान इल्तुतमिश ने पूरा करवाया, जो ऐबक का दामाद था। साथ ही पुस्तक के उस पन्ने में मस्जिद क्या होता है और अरबी में इस शब्द का मतलब क्या है, ये सब समझाया गया है। खुत्बा-ए-जुमा के साथ-साथ नमाज पढ़ने के बारे में भी समझाया गया है। फिर मुहम्मद बिन तुगलक के बनवाए बेगमपुरी मस्जिद का जिक्र है।

इसके बाद ‘Brainwashed Republic: India’s Controlled Systemic Deracination’ नामक पुस्तक लिख चुके नीरज अत्री ने इस मामले में नवंबर 21, 2012 में एक RTI दायर की थी। इस पुस्तक में वो पहले ही पाठ्यक्रम में शामिल भारतीय इतिहास की पुस्तकों की पोल खोल चुके हैं। जिस पुस्तक की यहाँ बात हो रही है, वो NCERT की कक्षा-7 की पुस्तक (ISBN 81-7450-724-8) है, जिसका नाम ‘Our Past 2’ है।

इस पुस्तक के 36वें पेज पर ‘फिगर 2’ बता कर कुतुबमीनार का चित्र है और उपर्युक्त विवरण वहीं पर बाईं तरफ छपा हुआ है। नीरज अत्री का सवाल इस फैक्ट पर था कि इसे दिल्ली के दो सुल्तानों कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने बनवाया। उन्होंने इस मामले में 5 सवाल पूछे। क्या रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज या रेफेरेंस है, जिसके आधार पर ये निष्कर्ष निकाला गया कि कुतुबमीनार को इन्हीं दोनों सुल्तानों ने बनवाया था? अगर हाँ, तो कौन सा।

इसके जवाब में NCERT के RTI सेल द्वारा दिसम्बर 11, 2012 को दिए गए जवाब में कहा गया था कि ऐसी कोई सर्टिफाइड कॉपी या दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं है। दूसरा सवाल था कि ऐसा कोई शिलालेख या पुरालेखिक सबूत भी है क्या, जिससे ये साबित होता हो? इसका जवाब भी ना में मिला। तीसरे सवाल में उन लोगों के नाम माँगे गए थे, जिनकी अनुशंसा के बाद पुस्तक के उक्त अंश को जोड़ा गया।

इसके जवाब में बताया गया कि सदस्यों, मुख्य सलाहकार, सलाहकार और अध्यक्ष के नाम पाठ्य पुस्तक में ही दिए गए हैं। इन तथ्यों का निरीक्षण कर के इन्हें पास किसने किया? इस चौथे प्रश्न का जवाब था कि प्रोफेसर मृणाल मिरि की अध्यक्षता वाली नेशनल मॉनिटरिंग कमिटी ने इसे अनुमति प्रदान की, जिसका जिक्र पुस्तक में भी है। अंतिम सवाल था कि इस तथ्य को लेकर कोई नोट्स हैं, जिसके जवाब में बताया गया कि विभाग की किसी फाइल्स में ऐसा कुछ भी नहीं है।

अत्री ने एनसीईआरटी में तथ्यों के साथ हुई कई छेड़छाड़ के लिए 100 से भी अधिक आरटीआई लगाई थी। उन्होंने एनसीईआरटी पुस्तकों के बारे में बताया था कि UPA सरकार के आने के बाद उसमें आर्य-द्रविड़ की थ्योरी परोसी गई, जिससे बच्चों के मन में गलत धारणाएँ बैठीं। अत्री ने ऑपइंडिया को बताया था कि भारत सबसे पुरानी सभ्यता है और हमारे पास गौरव करने के लिए इतनी चीजें हैं, फिर भी हम अकेले देश हैं जो अपने ही बच्चों का आत्मविश्वास ख़त्म करते हैं।

PM मोदी कहाँ-कैसे-कब हवाई जहाज से गए…: वायु सेना ने कहा – ‘नहीं दे सकते, देश के लिए खतरा है’

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से इनकी विरोधियों रोटी-पानी के साथ-साथ रातों की नींद भी हराम हो चुकी है। मोदी शायद ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके खानपान से लेकर उनके आने-जाने पर विरोधी गिद्ध की नज़र रखने को आतुर हैं। पहले इनके खाने-पीने की जानकारी और फिर इनकी माताश्री के दिल्ली अपने पुत्र के पास और रुकने आदि तक की RTI डाली जा चुकी हैं, लेकिन PMO से हर बार एक ही जवाब मिला कि "पता नहीं, प्रधानमंत्री जी अपने निजी करते हैं, किसी को नहीं पता।" लेकिन अब जो सूचना मांगी गयी है, उसमे जहाज से आने-जाने की सूचना। आखिर विरोधी क्यों और किस कारण जानकारी लेना चाह रहे हैं। ऐसे में प्रश्न होता है कि क्या जानकारी लेने वाला कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा क्यों लेना चाहता है? यह गंभीर जाँच का विषय है।     

PM मोदी कहाँ गए थे, कब गए थे, कैसे गए थे और किस-किस रूट से गए थे – RTI करके एक शख्स ने यह जानकारी माँगी थी। आश्चर्य की बात यह है कि यह RTI एक ऐसे शख्स ने डाली थी, जो खुद भारतीय वायुसेना के कोमोडोर रह चुके हैं, नाम है – लोकेश के बत्रा।

कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में भी यह सब जानकारी माँगी थी – 2013 से लेकर अब तक जब RTI डाली गई थी, उस तिथि तक)। आश्चर्य यह कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने 8 जुलाई 2020 को भारतीय वायु सेना को यह जानकारी देने के लिए निर्देश भी जारी कर दिया।

अब भारतीय वायु सेना ने CIC के इस निर्देश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। भारतीय वायु सेना का कहना है कि प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री की हवाई यात्रा से संबंधित जानकारी साझा नहीं की जा सकती है। वायु सेना ने इसे ‘सेंसिटिव डिटेल’ की कैटेगिरी में बताया है।

भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले SPG ग्रुप के जवान और पूरी यात्रा डिटेल को सार्वजनिक करने से न सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी बल्कि देश की अखंडता और संप्रभुता पर भी खतरा बन सकता है।

कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे इस तरह की जानकारी के लिए जून 2018 में RTI डाली थी। भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को यह बताया कि RTI एक्ट के तहत इस तरह की जानकारी को निषेध बताया गया है। अपने तर्क में वायु सेना ने कहा कि CIC ने निर्देश देने में भयंकर चूक की है क्योंकि SPG को RTI एक्ट के तहत छूट दी गई है।

RTI एक्टिविस्ट और सुप्रीम कोर्ट 

दिसंबर 2019 में मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने प्रशांत भूषण को उनकी एक याचिका के लिए फटकार लगाई। यह याचिका प्रशांत भूषण की ही एक पुरानी याचिका के बारे में थी। उस पुरानी याचिका को दायर कर प्रशांत भूषण ने आरटीआई एक्ट के संबंध में राज्यों के सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सवाल उठाए थे।

इसके जवाब में सीजेआई ने माना था कि आरटीआई को लेकर कुछ गंभीर चिंताएँ अवश्य जायज़ हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोग सूचनाएँ माँग रहे हैं, जिनका मामले से कोई लेना-देना ही नहीं है। उन्होंने भूषण को लेकर नाराज़गी जताते हुए कहा, “कुछ लोग खुद को ‘आरटीआई एक्टिविस्ट’ कहते हैं। मुझे बताइए, ये कोई व्यवसाय है क्या?” 

RTI से खुलासा : दिल्ली दंगों के दौरान 13 धार्मिक स्थलों को बनाया गया था निशाना

दिल्ली दंगाउत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी माह के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिन्दू विरोधी हिंसा में दंगाइयों ने 13 धार्मिक स्थलों को अपना निशाना बनाते हुए उनको नुकसान पहुँचाया था। दिल्ली पुलिस ने इन मामलों में 13 प्राथमिकी दर्ज करते हुए 33 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसका खुलासा दिल्ली पुलिस द्वारा RTI के तहत दिए जवाब से हुआ है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त एवं जन सूचना अधिकारी एम.ए रिज़वी के हस्ताक्षर से जारी जवाब में बताया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान एक समुदाय विशेष के 11 धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। पुलिस ने इन घटनाओं के संबंध में 11 प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं और 31 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से सात को जमानत मिल गई है और चार मामलों में आरोप-पत्र दाखिल कर दिए गए हैं।

दूसरे आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि अन्य समुदाय विशेष के दो धर्मस्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। इस बाबत दो प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस संबंध में गिरफ्तार किसी भी आरोपी को ज़मानत नहीं मिली है, जबकि एक मामले में आरोप-पत्र दायर कर दिया गया है।
अन्य आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि जाफराबाद, कर्दमपुरी और चाँदबाग में सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और दंगों के सिलसिले में ज्योतिनगर, दयालपुर और जाफराबाद थानों में कुल 190 प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और 357 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी नहीं है कि कितने गिरफ्तार लोगों को जमानत पर छोड़ा गया है, लेकिन पुलिस का कहना है कि 25 मामलों में आरोप-पत्र दायर कर दिए गए हैं।

आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि 23 फरवरी को मौजपुर चौक पर सीएए के समर्थन में हुए प्रदर्शन के सिलसिले में वेलकम थाने में तीन प्राथमिकियाँ दर्ज की गईं और 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से सात को जमानत मिल गई है।
वकील यूनुफ नकी द्वारा RTI के तहत माँगी गई के जानकारी में दिल्ली पुलिस से दंगों के दौरान दर्ज की गई प्राथमिकियों की प्रति और गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम भी माँगे थे। लेकिन पुलिस ने किसी भी आरोपी का नाम, प्राथमिकियों की प्रति और दंगाइयों द्वारा बनाए गए धार्मिक स्थलों का पता देने से साफ इनकार कर दिया। पुलिस ने इस मामले के पीछे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ होना बताया और इसके लिए आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा आठ (1) (ए,जी,जे और एच) का हवाला दिया है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुए हिंदू विरोधी दंगों में कुल 53 लोगों की मौत हो गई थी और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं संसद में दंगों पर चर्चा के दौरान मार्च महीने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया था कि हिंसा के दौरान 371 दुकानों और 142 घरों को आग लगाई गई थी। शाह के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने दंगों के संबंध में 700 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की है।
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