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अनुच्छेद 370 ने पाकिस्तान को कंगाली के कगार पर पहुँचाया

आर.बी.एल.निगम 
भारत में मोदी विरोधी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त होने पर पता नहीं किस आधार पर विरोध कर रहे हैं? पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे से ध्यान हटाने 370 का विरोध कर रहा है, लेकिन विश्व में इस मुद्दे पर कोई साथ नहीं, सिवाए भारत में मोदी विरोधियों के। मोदी विरोधियों के ही कारण केवल जम्मू-कश्मीर ही नहीं, आतंकी भारत की धरती को बेगुनाहों के खून से लाल कर रहे थे और ये लोग "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" का नाम देकर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को बचाकर भारत ही नहीं, बल्कि विश्व में हिन्दू समाज को ही कलंकित करते रहे। परन्तु समय का चक्र ऐसा पलटा, वही आतंकवाद पाकिस्तान और मोदी विरोधियों के लिए मुसीबत बन गया है। 
पाकिस्तान विश्व में अलग-थलग पड़ने के बावजूद अपने देश को निर्दोष सिद्ध करने के प्रयास में कंगाली के द्वार पर जा पहुँचा है, लगभग वही स्थिति भारत में मोदी विरोधियों की होने वाली है। जो नेता देश का नहीं हुआ, किसका होगा? इमरान खान की मजबूरी है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाही करके फौज से बगावत कर अपनी कुर्सी नहीं गंवाना नहीं चाहता, लेकिन मोदी विरोधियों को लगभग हर चुनाव में मुंह तोड़ जवाब मिल रहा है, अगर पाकिस्तान के पक्ष में बोलकर सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं, पाकिस्तान से बुरी स्थिति उनकी होने वाली है। क्योकि पाकिस्तान और मोदी विरोधियों की लगभग एक ही बोली है, इन दोनों की बोली में बहुत कम अन्तर है। 
प्रधानमन्त्री इमरान खान अगर वास्तव में देशप्रेमी हैं, उन्हें चाहिए आतंकवाद के विरुद्ध कदम उठाए, जैसाकि उन्होंने अमेरिका में स्वीकार किया है कि "पाकिस्तान में 40 आतंकी संगठन और 40,000 आतंकी सक्रीय हैं।" होने दें अपनी सरकार कुर्बान, लेकिन इतिहास में नाम करने के साथ-साथ आने वाले सत्ताधीशों के लिए एक उदाहरण बन रोशन रहेंगे।   
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद पाकिस्तान बौखला गया है। प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत के साथ लगभग सारे द्विपक्षीय संबंध तोड़ दिए और सारे व्यापारिक रिश्ते खत्म कर लिए हैं। पाक इसकी शिकायत चीन, अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, रूस, यूएई सहित ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन लेकर गया। लेकिन सभी देशों से उसको मुंह की खानी पड़ी है।
संयुक्त राष्ट्र से मिली ठंडी प्रतिक्रिया
भारत के खिलाफ शिकायत करते हुए पाकिस्तान ने पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र को जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को रद करने के संबंध में एक पत्र लिखा था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने पत्र पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया।
फिर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को पत्र लिखकर दावा किया कि जम्मू-कश्मीर पर भारत ने 1949 के यूएनएससी प्रस्ताव का उल्लंघन किया है। इसके जवाब में गुटेरेस ने पाकिस्तान को 1972 में हुए शिमला समझौते का हवाला दिया। 1971 भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान की हार के बाद शिमला समझौता हुआ था, जिसमें कहा गया था कि दोनों देश शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से अपने सभी मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से सुलझाएंगे।
अमेरिका से कोई समर्थन नहीं
जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटाने के भारत के फैसले को पलटने के लिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए अमेरिका से भी अपील की। लेकिन अमेरिका ने मामले पर तटस्थ भूमिका निभाई है। जम्मू और कश्मीर के विकास और पाकिस्तान की शिकायत पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मॉर्गन ऑर्टागस ने कहा कि कश्मीर पर देश की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अमेरिका ने संयम बरतने का आह्वान किया और भारत और पाकिस्तान दोनों से इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की। कश्मीर को लेकर अमेरिका की हमेशा से यह नीति रही है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय मुद्दा है।
चीन ने आशाओं को किया धराशायी
जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के कदम पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उसने कहा कि इस कदम ने चीन की संप्रभुता को कमजोर किया है। लेकिन, उसकी यह प्रतिक्रिया लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने तक सीमित थी। शाह महमूद कुरैशी ने चीनी नेताओं के साथ वार्ता के लिए बीजिंग के लिए उड़ान भरी। कुरैशी और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच एक बैठक के बाद चीन ने एक बयान जारी कर कहा, कश्मीर मुद्दा औपनिवेशिक इतिहास से बचा हुआ विवाद है। इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और द्विपक्षीय समझौते के प्रस्तावों के आधार पर ठीक से और शांति से हल किया जाना चाहिए। चीनी विदेश मंत्री के बयान में द्विपक्षीय समझौते ने कुरैशी की आशाओं को धराशायी कर दिया कि उसके हर मौसम का मित्र चीन उसके साथ अधिक मजबूती से खड़ा होगा।
ओआइसी ने दिया झटका
पाकिस्तान को सबसे तगड़ा झटका ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (ओआइसी) से लगा। 57 इस्लामिक देशों वाले संगठन ओआइसी ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा की। लेकिन जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने को लेकर भारत के साथ पाकिस्तान की कूटनीतिक लड़ाई में शामिल होने से इन्कार कर दिया। शक्तिशाली ओआइसी सदस्य देश सऊदी अरब और तुर्की ने कश्मीर मुद्दे के निपटारे के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय वार्ता का आह्वान किया है। वहीं यूएई ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया। ओआइसी के सदस्य देश आर्थिक भागीदारी और रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत को अधिक महत्व देते हैं। वहीं भारत ने सभी ओआइसी सदस्यों के साथ अपने आर्थिक और सामरिक संबंधों को मजबूत किया है।
भारत को रूस का मिला खुला समर्थन
मुश्किल की घड़ी में भारत का साथ देने वाले रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि कश्मीर को लेकर मोदी सरकार का फैसला संवैधानिक दायरे में लिया गया है। रूस के इस बयान के बाद पाकिस्तान को तगड़ा झटका लगा है।
तालिबान की फटकार
अफगानिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन तालिबान ने भी पाकिस्तान को फटकार लगाई है। तालिबान ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि कश्मीर पर ताजा फैसले के बाद भारत एवं पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव को अफगानिस्तान के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आज समाज सेवा के नाम पर जो लूट मची हुई है, उसे देख नेता शब्द एक ग्लानि बनता जा रहा है। जिस....

कंगाली की कगार पर पाक 
पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट में है और उसने इस साल सऊदी अरब और चीन से दो अरब डॉलर का कर्ज लिया है। इसकी अर्थव्यवस्था 3.5 फीसद से कम की दर से बढ़ रही है। मंदी के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था 6.5-7.0 फीसद की दर से बढ़ रही है और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के आकार की लगभग नौ गुना है।

घिरता जा रहा पाकिस्तान, 200 दिनों में नहीं की कार्रवाई तो 'ब्लैक लिस्ट' में डाल देगा FATF

FATF Pakistan
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पाकिस्तान को अनेकों अवसर दिए जाने पर भी नवाज़ शरीफ से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद को समाप्त करने की कोई कार्यवाही न किए जाने पर मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के मुद्दे को उछाल कर दुनियां को सोंचने के मजबूर कर दिया। आज उसी का परिणाम है कि पाकिस्तान अपने ही खेत की पतवार में जलने को मजबूर हो गया है। पाकिस्तान को छोड़, समस्त विश्व मोदी के दिमाग को पढ़ रहा है। मोदी की हर कार्यशैली पर मन्थन कर रहा है। परन्तु पाकिस्तान के आका इस मुगालते में बैठे रहे कि पिछली सरकारों की भाँति वर्तमान मोदी सरकार भी बस जनता का बहराने के लिए बस दो-चार दिन बोल कर चुप हो जाएंगे। 
कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन अटल बिहारी सरकार द्वारा लगाए प्रतिबन्धों का इतना प्रभाव पाकिस्तान पर नहीं पड़ा था, जितना की आज। बल्कि दूसरे अर्थों में कहा जाए कि विश्व की निगाहों में ही गिर गया है। क्योकि पाकिस्तान में चुनाव प्रक्रिया तो मात्र एक छलावा है, सरकार कोई भी पार्टी बनाए, लेकिन चलना उसे केवल फौज के इशारे पर ही है। स्कूलों में भारत के विरुद्ध पढ़ाना, भारत के विरुद्ध शुरू से ही बच्चों के खून में भारत के विरुद्ध जहर घोलना, जो व्यस्क होना तो दूर, उससे पूर्व ही भारत को बड़ी कटुताई से देखते हैं। 
भारत से मैच हारने पर खिलाडियों पर हमले किये जाते हैं, बेचारे भयभीत होकर सुरक्षा के घेरे में अपने परिवार तक पहुँच पाते हैं। जबकि भारत में पाकिस्तान से कोई भी मैच हारने पर किसी खिलाडी के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाता। पाकिस्तान में ही ऐसा क्यों होता है, कारण स्पष्ट है। सरकार का फौज के इशारे पर काम करना। वहां क जनता ने भी आज तक किसी नेता से यह पूछने का साहस नहीं किया, कि वोट देती जनता है, और काम सेना के इशारे पर क्यों करते हो? विश्व में इतना अपमानित होने पर भी अगर पाकिस्तान के नेता और पार्टियाँ सचेत नहीं हुई, फिर शायद दुनियां की कोई ताकत उन्हें समझा नहीं सकती। आतंकवादी सरगनाओं को तुरन्त जेलों में डाल, उनके ठिकानो को नेस्ताबूत किए जाएँ।     
पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद भारत के साथ-साथ अतंरराष्ट्रीय संस्थाएं पाकिस्तान पर दबाव बना रही हैं। भारत ने फाइनेंशियल एक्शन टॉस्क फोर्स (एफएटीएफ) से पाकिस्तान को 'काली सूची' में डालने की पहल की थी लेकिन इस संस्था ने इमरान खान की सरकार को आतंकवादी फंडिंग के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अक्टूबर तक का समय दिया है। एफएटीएफ ने कहा है कि पाकिस्तान यदि आतंकियों की वित्तीय मदद रोकने के लिए समुचित एवं पर्याप्त कदम नहीं उठाता है तो उसे 'काली सूची' में डाल दिया जाएगा। इस तरह पाकिस्तान को एफएटीएफ से सात महीने करीब 200 दिनों का समय मिल गया है। पाकिस्तान पहले से ही इस संस्था की 'ग्रे सूची' में मौजूद है।
पाकिस्तान को 'ग्रे सूची' में रखने का फैसला पेरिस में सप्ताह भर चली बैठक के बाद शुक्रवार को लिया गया। पुलवामा में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को 'काली सूची' में रखने के लिए मजबूती के साथ अपना रक्ष रखा था। भारत की दलील थी कि आतंकियों की फंडिंग पर रोक लगाने के लिए पाकिस्तान कोई कदम नहीं उठा रहा।
एफएटीएफ ने आतंकी फंडिंग पर रोक लगाने के लिए पाकिस्तान को अक्टूबर तक के लिए समय मिल गया है। एफएटीएफ ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान ने यदि अक्टूबर तक आतंकी फंडिंग रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए तो उसे 'कालू सूची' में डाल दिया जाएगा। पहले से ही आर्थिक बदहाली का सामना कर रहे पाकिस्तान के लिए यह बड़ा झटका है।
'काली सूची' में डाल दिए जाने पर पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। विदेशी कारोबारियों और बैंकों को पाकिस्तान में कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। इसका पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और व्यापार पर बुरा असर पड़ेगा। ईरान और उत्तर कोरिया पहले से ही एफएटीएफ की काली सूची में हैं। साल 1989 में गठित एफएटीएफ एक अंतर-सरकारी वैश्विक संस्था है जो टेरर फंडिंग एवं आतंकवादी गतिविधियों में मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ काम करती है।