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UPSC वाले ‘ओझा सर’ छात्रों को पढ़ाते, इस्लाम को बताते हैं दुनिया की रोशनी : ‘यादवों की बीवियों संग नाचते थे श्रीकृष्ण, बाद में सालियाँ भी दे दी’

ओझा सर का फिर वीडियो वायरल
भारत में जयचंदों की कभी कमी नहीं रही। इन बेशर्मों की नूपुर विवाद से आंखें नहीं खुली। संत कबीर दास का एक दोहा है "गुरु गोबिंद दोहु खड़े, काकू लागु पांव, बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो मिलाए।  कट्टरपंथी सच को दबाने के लिए 'सर तन से अलग' की मुहिम चलाए हुए हैं लेकिन ओझा जैसे बेशर्म चंद चांदी के सिक्कों की खातिर अपने ही देवी-देवताओं को अपमानित कर गुरु की गरिमा को कलंकित कर रहे हैं। 
कोचिंग सेंटर्स में सिविल परीक्षाओं की तैयारी कराने के नाम पर इस्लाम का महिमामंडन करना और हिंदू धर्म पर तंज कसना कोई नई बात नहीं रह गई है। हाल में ओझा सर नाम से मशहूर अवध प्रताप ओझा का एक वीडियो वायरल होना शुरू हुआ है। वी़डियो में देख सकते हैं कि किस तरह से वो हिंदुओं के प्रभु भगवान श्री कृष्ण पर अलग-अलग ढंग से लांछन लगाते हैं और दावा करते हैं कि यादव लोग एक बार भगवान को मिलकर मारने वाले थे।

वीडियो में ओझा को कहते सुना जा सकता है, “बलराम ने एक बार कहा कि यादव लोग तुम को पकड़कर मारने वाले हैं। कृष्ण ने पूछा ‘क्यों’। तो बलराम बोले तुम इनकी बीवियों के साथ नाचते हो, तो पीटेंगे नहीं। ये सुन श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम टेंशन मत लो हम संभाल लेंगे। इसके बाद एक दिन वृंदावन में बारिश होनी शुरू हुई तो कृष्ण ने जाकर पर्वत उठा लिया। अब सोच कर देखो उंगली पर अगर कोई पर्वत उठा ले तो ये क्या हुआ- शक्ति का प्रदर्शन। तब यादवों ने श्रीकृष्ण को हाथ जोड़ कर कहा कि तुम बीवी के साथ तो नाच ही रहे हो, साली के साथ भी नाचो। हमें कोई टेंशन नहीं।”

ओझा जिस प्रकार बच्चों को ‘शक्ति के प्रदर्शन’ का कॉन्सेप्ट समझा रहे हैं, वो कई लोगों को अपमानजनक लग रहा है। लोग याद दिला रहे हैं कि कैसे जब बात इस्लाम की आती है तो ओझा के हाव-भाव बदल जाते हैं और जब हिंदुत्व या ब्राह्मणों पर टिप्पणी करनी होती है तो यही ओझा आक्रमक दिखते हैं।

इस्लाम के प्रति अवध ओझा की राय

कुछ दिन पहले इन्हीं ओझा सर की इस्लाम की तारीफ करते वीडियो सामने आई थी। इसमें वह अंधेरे से भरी दुनिया में इस्लाम को रोशनी बता रहे थे। उन्हें कहते सुना गया था, “इस्लाम जब पैदा हुआ तब पूरी दुनिया में अँधेरा छाया हुआ था। इस्लाम का इतिहास पढ़ो। यूरोप में विच हंट के नाम पर महिलाओं को जलाया जा रहा था। भारत में सती प्रथा थी। चीन में लड़कियों की हत्या की जा रही थी। चारों तरफ अँधेरा था, और अँधेरे के बीच मोहम्मद साहब हाथ में दीया लिए खड़े थे, इस्लाम…प्यार…संदेश।
आगे वीडियो में उन्हें कहते सुना जा सकता है, “मोहम्मद एक रास्ते से हर रोज जाते थे। वहाँ एक महिला उनके ऊपर कूड़ा डालती थी। अगर कोई हमारे ऊपर कूड़ा डाले तो हम उसे गोली मार देंगे कि हमारे ऊपर किसी ने कूड़ा कैसे फेंका। वाजीराम के टीचर पर कूड़ा कैसे फेंका, इतनी औकात तुम्हारी। एक दिन उस महिला ने कूड़ा नहीं फेंका। मकान के अंदर गए। पूछा मोहतरमा कहाँ है। पता चला वो बीमार हैं। उनका हाल चाल पूछा कि मालिक से दुआ करूँगा आप जल्दी ठीक हो जाएँ।”

अवध प्रताप ओझा कैसे बने ‘ओझा सर’?

अपने शुरुआती जीवन में शराब-सिगरेट के आदि अवध प्रताप ओझा आज IQRA IAS में इतिहास के वरिष्ठ फैकल्टी हैं। वह पेशे से वकील हैं और पिछले 15 वर्षों से यूपीएससी के उम्मीदवारों को पढ़ा रहे हैं। कुछ दिन पहले दैनिक भास्कर में उनके जीवन पर एक कहानी प्रकाशित हुई थी। इसमें बताया गया था यूपी गोंडा में जन्मे अवध प्रताप ओझा ने इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान यूपीएससी करने की सोची, लेकिन जब अपने लास्ट प्रयास में भी यूपीएससी पार नहीं कर पाए, तब उनकी माँ ने कहा- ‘तुम्हारा खेल खत्म हो गया है अब तुम्हें मेरे सहारे जिंदा रहना होगा।’

अपने कोचिंग में 1 साल सिर्फ सद्दाम को दी शिक्षा

ओझा अपनी माँ की यह बात सुन लड़कर घर से निकले और 2007 तक घर से बाहर रहे। किसी ने उन्हें कोचिंग में हिस्ट्री पढ़ाने को कहा। शुरू में उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे पढ़ाना है और फिर उन्होंने पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चों को उनका ढंग पसंद आया। 2005 में इलाहाबाद से दिल्ली आकर अपना कोचिंग सेंटर खोला। पैसे न होने की वजह से 7 महीने बारटेंडर की जॉब भी की। 2019 में जाकर उन्होंने IQRA IAS को शुरू किया। पहले साल इसमें सिर्फ सद्दाम हुसैन नाम के लड़के को पढ़ाया गया। हालाँकि अब यहाँ 1000 से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं। 20 ऐसे छात्रों को भी कोचिंग दी जाती है जो यूपीएससी निकलने के बाद पैसे देते हैं।

अवलोकन करें:-

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हिंदुत्व के अलावा ब्राह्मणों को देते हैं गाली, नेहरू के प्रशंसक

छात्रों के बीच अवध ओझा ओझा सर के नाम से मशहूर हैं। उनके पढ़ाने के तरीके की लोग अक्सर तारीफ करते हैं। लेकिन पिछले दिनों उनके लेक्चर की वीडियो वायरल होने के बाद उनकी मंशा पर सवाल उठने लगे। उन्होंने केवल एक बार श्रीकृष्ण का मजाक नहीं उड़ाया। उन्होंने ब्राह्मणों को लेकर भी कह रखा है कि ब्रिटिशों के समय में जूता खाते थे और अब सीना तानकर घूम रहे हैं। इसके अलावा वो मानते हैं कि जो कोई भी जवाहरलाल नेहरू को गलत कहता है उससे ज्यादा मूर्ख कोई नहीं है।

नौकरशाही में मुस्लिम घुसपैठ पर सुदर्शन चैनल ने दबा दी दुखती नब्ज

सुदर्शन की आने वाली रिपोर्ट पर विवाद
सुदर्शन न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने कुछ दिनों पहले अपने चैनल पर एक सीरीज लाने का ऐलान किया। उन्होंने 25 अगस्त को ट्वीट करते हुए बताया कि उनके चैनल पर 28 अगस्त से एक ऐसी सीरिज शुरू होगी, जिसमें वह कार्यपालिका के सबसे बड़े पदों (IAS-IPS) पर मुस्लिमों की बढ़ती संख्या पर बात करेंगे। 
इस घोषणा के साथ उन्होंने सीरिज का परिचय देने के लिए एक वीडियो साझा की। इस वीडियो में हम उन्हें कुछ सवाल करते देख सकते हैं। वह दावा करते हैं कि उनकी सीरिज सरकारी नौकरशाही में मुस्लिमों के घुसपैठ का खुलासा करेगी। 
दरअसल, सुरेश चव्हाणके ने उस उस दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया है, जिसके कारण हो रही पीड़ा से छद्दम सेक्युलरिस्टों को उछलना लाजमी है। वैसे इस मुद्दे पर काफी समय से चर्चा गर्म थी, सवाल यह था कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? और घंटी बांधने का काम सुरेश ने कर दिया है। कोई और चैनल अपनी TRP के चक्कर में इस मुद्दे पर चर्चा तक करने को तैयार नहीं था, लेकिन सुदर्शन चैनल ने देश में नियुक्तियों/चयन में धर्म के आधार पर हो रही प्राथमिकता धांधली को उजागर कर, राष्ट्र के सम्मुख ज्वलंत समस्या को प्रस्तुत किया है। प्रतियोगिता में किसने अच्छे अंक लिए हैं, चयन उसी आधार पर होना चाहिए, मजहब के नाम पर अलग से अंक देकर प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पीछे धकेल देना, क्या उसके साथ बेइंसाफी नहीं? लेकिन छद्दम धर्म-निरपेक्ष इसे साम्प्रदायिकता का रंग देकर, फ़िज़ा ख़राब करने की बात बोल रहे हैं। 
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए मुज़फ्फरनगर दंगे में क्या हुआ था, उस समय की फाइलों को खोलो। हिन्दू पुलिस वालों ने कुछ दंगाइयों को पकड़ कर सुरक्षा की दृष्टि से अधिकारीयों के आने तक हवालात में डाल दिया। जैसे ही वह मुस्लिम अधिकारी आया, उसने उन्हें छोड़ने के लिए बोला, जिसका उन पुलिसकर्मियों द्वारा विरोध करने पर उस पुलिस अधिकारी के साथ उनकी मार-पिटाई भी हुई, उस झगडे के दौरान उस मुस्लिम अधिकारी ने कहा था, "पहले मैं मुसलमान हूँ, पुलिस बाद में...", इतना ही नहीं मुलायम सिंह ने इस शर्मनाक हरकत पर उस अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने की बजाए उसकी पीठ थप-थपाई थी। अगर किसी हिन्दू ने यही बात कही होती "क्या तब भी उसकी पीठ थपथपाई होती?" विपरीत इसके फिरकापरस्ती करने के इल्ज़ाम में उस अधिकारी पर कानूनी कार्यवाही की जाती। जिसका उल्लेख उस समय हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते लेख में किया था, और वही हादसा 11, अशोका रोड पर हुई "मुज़फरनगर दंगा : एक सच" चर्चा के दौरान वहां के भाजपा नेता हुकुम सिंह ने अपने भाषण में बताया। इतनी मीडिया मौजूद थी, सब चाय/कॉफी, समोसे और रसगुल्ले खाकर चले गए, परन्तु किसी भी मीडिया ने इस समाचार को लेशमात्र भी जगह नहीं दी। क्योकि केंद्र में यूपीए और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में थी। जबकि मैं पहले ही इस समाचार को प्रकाशित कर चूका था। देखिए संलग्न पृष्ठ।      
वे पूछते हैं, “आखिर अचानक मुसलमान आईएएस, आईपीएस में कैसे बढ़ गए? सबसे कठिन परीक्षा में सबसे ज्यादा मार्क्स और सबसे ज्यादा संख्या में पास होने का राज क्या है? सोचिए, जामिया के जिहादी अगर आपके जिलाधिकारी और हर मंत्रालय में सचिव होंगे तो क्या होगा?”
सोशल मीडिया पर अब इसी विवादित वीडियो के कारण बवाल हो गया है। कई मुस्लिम एक्टिविस्टों और लेफ्ट लिबरल्स ने सुरेश चव्हाण पर नफरत फैलाने का आरोप लगाया। साथ ही उनके अकाउंट को सस्पेंड करने की माँग की है। सैफ आलम नाम के वकील ने इस बीच मुंबई पुलिस में सुरेश के ख़िलाफ़ शिकायत दायर करके केस की जानकारी भी दी।
कई आईएएस-आईपीएस अधिकारियों ने भी इस ट्वीट के खिलाफ़ अपनी राय रखी। वहीं आईपीएस एसोसिएशन ने भी इस वीडियो की निंदा की है। उनके अलावा वामपंथी गिरोह के लोग भी इसे अपने लिए एक ‘मौका’ समझकर ट्वीट कर रहे हैं।


आईपीएस एसोसिएशन ने ट्वीट करते हुए लिखा, “सुदर्शन टीवी ऐसी न्यूज स्टोरी को बढ़ावा दे रहा है जिसमें सिविल सर्विस के अभ्यार्थियों को उनके धर्म के आधार पर लक्षित किया जा रहा है।”
एसोसिएशन आगे लिखता है, “हम इस प्रकार की साम्प्रदायिक और गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता की निंदा करते हैं।” यहाँ बता दें कि आईपीएस एसोसिएशन भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों का केंद्रीय समूह है। मगर यह कोई सरकारी संस्था नहीं है।
इस संस्था के अलावा कई आईपीएस अधिकारी भी है जो इस वीडियो की निंदा कर रहे हैं। जैसे आईपीएस अधिकारी निहारिका भट्ट ने इसे ‘घृणा फैलाने वाली कोशिश’ करार दिया और कहा कि धर्म के आधार पर अधिकारियों की साख पर सवाल उठाना न केवल हास्यपूर्ण है, बल्कि इसे सख्त कानूनी प्रावधानों से भी निपटा जाना चाहिए। हम सभी भारतीय पहले हैं।


रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एन.सी. अस्थाना ने भी ट्वीट कर कहा, “अखिल भारतीय सेवाओं के लिए अधिकारियों के चयन में यूपीएससी जैसी संवैधानिक संस्था की अखंडता और निष्पक्षता पर संदेह जताते हुए, वह संवैधानिक योजना के प्रति अविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं।”


इंडियन पुलिस फाउंडेशन ने भी न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए), यूपी पुलिस और संबंधित सरकारी अधिकारियों से भी सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया।


सुरेश चव्हाणके का जबाव 
एक ओर जहाँ एसोसिएशन समेत कई अधिकारी ऐसी किसी भी सीरिज को विषैला और नफरत फैलाने वाला बता कर नकार रहे हैं। वहीं दूसरी ओर वामपंथी इस मौके का फायदा उठा कर अपना अलग एजेंडा चला रहे हैं।


लेकिन ये गौर करने वाली बात है कि अभी प्रोग्राम ऑन एयर नहीं हुआ है और कोई नहीं जानता कि इसमें क्या दिखाया जाएगा। सारा बवाल सुदर्शन न्यूज के एडिटर इन चीफ की कुछ सेकेंड की वीडियो पर है। ऐसे में सुरेश चव्हाण ने ऐसे लोगों को जवाब देते हुए कहा है कि ये प्रोग्राम आईपीएस और आईएएस अधिकारियों पर नहीं है। बल्कि चयन प्रक्रिया पर है। उनका दावा है कि इसमें जाकिर नाइक तक का हाथ है।
वामपंथियों की राय 
इस वीडियो पर बवाल होने के बाद संजुक्ता बासु ने लिखा, “दक्षिणपंथियों के दिमाग में कोई तर्क नहीं है। सिर्फ़ मुस्लिम विरोधी घृणा है। बेवकूफाना थ्योरी है कि मुस्लिम वर्षों से बहुसंख्यक बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फिर भी जनसंख्या का 14% है। सालों से चल रहा रैकेट अब भी यूपीएससी में केवल 5% है। इनका जनसंख्या के समान अनुपात भी नहीं है।”


तहसीन पूनावाला ने सुदर्शन चैनल पर नफरत फैलाने के लिए कार्रवाई करने की माँग करते हैं। साथ ही उनके ख़िलाफ शिकायत भी की। विजेता सिंह ने आईपीएस एसोसिएशन को सलाह दी कि सुदर्शन न्यूज चैनल नोएडा में हैं, इसलिए वे वहाँ इसके ख़िलाफ़ शिकायत करें।
वामपंथियों की ऐसी प्रतिक्रियाओं पर कुछ यूजर्स पलटवार कर रहे हैं। लगातार इनसे पूछा जा रहा है कि विषम दिनों में ऐसा कुछ हो तो उनके लिए प्रेस फ्रीडम खतरे में आ जाती है और सामान्य दिनों में ये केस फाइल करने की सलाह देते हैं।


वामपंथियों की प्रतिक्रियाओं पर पलटवार 
आईपीएस/ आईएएस और बड़े बड़े अधिकारियों की आपत्ति देखकर वामपंथी पत्रकार जो अपना एजेंडा चला रहे हैं, उसको ध्वस्त करने के लिए उनकी रिपोर्ट्स के कुछ स्क्रीनशॉट शेयर किए जा रहे हैं।


कुछ पुराने मामलों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करवा कर बताया जा रहा है कि डेटा के नाम पर हिंदुओं को टारगेट करने का काम लिबरल मीडिया लंबे समय से करता आया है। इसकी कभी कोई निंदा नहीं हुई। लेकिन, आज मौके का फायदा उठा कर यही मीडिया अधिकारियों को राय दे रहा है।
लोगों का कहना है कि पुलवामा जैसे मसले पर यही मीडिया जवानों की जाति ढूँढ लाया था और फौजियों को भी ब्राह्मण-दलित में बाँटने का प्रयास किया था।

इसके अलावा द न्यूज मिनट के लेख का वह स्क्रीनशॉट शेयर किया जा रहा है जिसमें राजदीप ने दावा किया था कि कपिल देव के समय तक क्रिकेट अर्बन ब्राह्मण हुआ करता था। इसके बाद ऐसे ही द वायर का एक ट्वीट है जिसमें द वायर मेडिकल प्रोफेशन में ब्राह्मणों और बनिया लोगों का आधिपत्य बताने से नहीं चूकता और द कारवाँ की एक खबर में यूनिवर्सिटी के वीसी पद पर ऊँची जाति और हरिजन का मामला उठता है।


केवल यूपीएससी की बात करें, तो युग परिवर्तन का शेयर करके सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर हार्ड डेटा में बात करने में दिक्कत है, क्योंकि कई परीक्षाओं के इंटरव्यू स्टेज पर आकर भेदभाव साफ देखने को मिला है।
हर्ष मधुसुदन इस लेख को शेयर करते हुए गौर करवाते हुए कहते हैं, “जो मुस्लिम औसत नंबर पर चुने जाते हैं, उन्हें सामान्य कैटेगरी के अभ्यर्थी से 13 नंबर ज्यादा मिलते हैं। वहीं, एससी/ओबीसी को भी इंटरव्यू स्तर पर कम नंबर मिलते हैं (6.65 और 2.60 क्रमश:)”


पिछले साल जकात फाउंडेशन के 18 छात्रों ने यूपीएससी एग्जाम उत्तीर्ण किया था। इसके बाद भारतीय प्रशासन में इस्लामिक प्रभाव बढ़ता साफ नजर आया। चिंता की बात यह है कि जकात फाउंडेशन इस्लामिक सिद्धांतों पर शुरू हुआ एनजीओ है, जो छात्रों को सिविल सर्विस की परीक्षा के लिए कोचिंग भी देता है। शाह फैसल इसी कोचिंग के एलुमिनी हैं, जिन्होंने साल 2010 में सिविल परीक्षा टॉप की और भारत को बाद में रेपिस्तान कहा।