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उत्तर प्रदेश : योगी सरकार में पत्रकारों का उत्पीड़न निरंतर जारी ; ब्यूरोक्रेसी का स्वर्णिम काल

राकेश कुमार आर्य, संपादक, उगता भारत 
संभल। पत्रकारिता के लिए सचमुच यह एक बुरी खबर है कि योगी सरकार में पत्रकारों का उत्पीड़न निरंतर जारी है ब्यूरोक्रेसी का स्वर्णिम काल चल रहा है जहां पत्रकारिता का गला घोंटने के लिए ब्यूरोक्रेट्स किसी भी सीमा तक जा सकते हैं । इसी का उदाहरण है एसपी सम्भल का दुराचरण। जिन्होंने स्वच्छ और निर्भीक पत्रकारिता करने वाले वेद वसु आर्य को जबरन और गलत ढंग से अभी हाल ही में हुए एक हत्याकांड में अभियुक्त बनवाया है।
इस संबंध में जानकारी देते हुए पत्रकार की माता श्रीमती वीरावती कार्य द्वारा बताया गया कि उसके पति श्री दयाशंकर आर्य गांव - भीकमपुर जैनी के गांव प्रधान रहे हैं , ग्रामीण उत्थान ,भारतीय संस्कृति, और राष्ट्रसेवा के कार्यों में अग्रणी रहे हैं । करीब एक माह से फालिश रोग से पीडित हैं । बड़ा पुत्र वेदवसु अपने पिता के कार्यो में सहयोग करता है और पुलिस व प्रशासन के भ्रष्टाचार को भी अपनी पत्रकारिता के माध्यम से खोलता रहता है । इसके अतिरिक्त जनता को न्याय मिले इसके लिए भी प्रशासनिक अधिकारियों को मनमानी नहीं करने देता है। 
श्रीमती आर्या का कहना है कि के गाँव व जाति और राजनीतिक लोग परिवार की अच्छी छवि को मिटाने की कुछ माह पहले धमकी दी गई थी दी । उसी का परिणाम हुआ कि जब विगत 1 जून को गाँव भीकमपुर जैनी के धर्मपाल पुत्र नत्थू को अज्ञात व्यक्ति ने चोटिल कर दिया और जब बाद में विलम्ब से मिले उपचार के कारण उसकी मृत्यु हो गई तो इस केस में प्रार्थिया के पति व पुत्र को फर्जी रूप से अमित के रूप में नामित करा दिया गया , जिसमें एसपी सम्भल का विशेष रूप से सहयोग रहा । जबकि श्री दयाशंकर आर्य पैरालाइसिस के कारण चल फिर भी नहीं सकते और वेदवसु आर्य उस घटना के समय गांव उपरोक्त में भी नहीं था।
श्रीमती वीरावती का आरोप है कि रंजिशन प्रार्थिया के पति और पुत्र व अन्य लोगों को नामित करते हुए थाना- रजपुरा , जिला -संभल (उ०प्र०) पर मुकदमा अपराध संख्या 288 सन् 2020 दर्ज करा दिया है।
घटना के दिनांक व समय पर प्रार्थिया के पति अपने घर में फालिश की बीमारी से पीड़ित होने पर चारपाई पर थे। पुत्र वेद वसु सगाई समारोह में उपस्थित था।.
गॉव-क्षेत्र के रंजिश मानने वाले लोगों ने प्रार्थिया के पुत्र वेदवसु को थर्ड डिग्री ट्रोचर कराकर गांव-समाज में बेईज्जत कराना चाहते हैं।
इलाका पुलिस और उच्चअधिकारियों पर कुछ राजनीतिक लोगों का दवाब- प्रभाव है। पुलिस एसपी के इस आचरण के चलते पूरा शासन प्रशासन मौन धारण किए हुए हैं। कोई भी इस घटना को सही ढंग से जांच कराने को तैयार नहीं है। जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो सके पत्रकारों पर आए दिन पुलिस प्रशासन के अत्याचार होते रहते हैं। एक-एक करके कई पत्रकारों के साथ ज्यादती की गई है परंतु सब चुप हो जाते हैं । ऐसा नहीं है कि इस पुलिस अधिकारी की जांच जानकारी उच्चाधिकारियों और शासन में बैठे लोगों को ना हो , बार-बार की शिकायतों के उपरांत हुए भी इस अधिकारी का कोई बाल बांका नहीं हुआ है। यह खुलेआम रिश्वत लेता है और लोगों को झूठे मामलों में फंसाकर मोटी रिश्वत लेकर छोड़ने का आदि रहा है।
ज्ञात रहे कि वेदवसु अपनी जान बचाने और निर्दोष होने के साक्ष्य हेतु करीब 34 शपथ पत्र प्रस्तुत किये गये है , किन्तु विवेचक एसपी श्री यमुना प्रसाद के दवाब में निष्पक्ष जांच न करके और कानून का उलघंन करके मनमानी कर रहे है । पुलिस घर पर जाकर औरतों के साथ अभद्र व्यवहार करती है। सामान की तोड़फोड़ करना और साथ ही लूटपाट कर पैसे छीन लेना तो वैसे भी पुलिस के लिए जगजाहिर है इस मामले में भी यही हो रहा है। इस संबंध में कुछ और जानकारी हम अलग से प्रस्तुत करेंगे।
कुछ भी हो अभी तो एक ही बात स्पष्ट हो रही है कि हम इस समय स्वतंत्र भारत में ना जीकर मुगलों के ही काल में जी रहे हैं । जहां पर प्रशासन अपनी मनमानी करते हुए आम आदमी पर झूठे इल्जाम लगाकर उन्हें झूठे केस में फंसा कर फांसी की ओर ले जाता है। देखते हैं मुख्यमंत्री योगी कब इस ओर देखते हैं और कब पुलिस प्रशासन के उच्चाधिकारी एक न्यायपूर्ण निर्णय इस प्रकरण में लेते हैं ? यदि पत्रकारिता का गला घोटने वाले ऐसे अधिकारियों को योगीराज में प्रोत्साहन मिलता रहा तो निश्चय ही पत्रकारिता के लिए समझ लीजिए कि काले दिन आ चुके हैं।
एक पत्रकार को हत्या के केस में झूठा फंसाया जा रहा है । एसपी की गुंडागर्दी का पूरा शासन-प्रशासन सहयोग कर रहा है । यह पत्रकार हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ा है , जबकि एसपी सपा के नजदीक है और सपा के लोगों का ही इस पत्रकार को फंसाने का पूरा षड्यंत्र है । क्षेत्र के ही नहीं बल्कि मरने वाले के घर वाले भी नहीं चाहते कि इस पत्रकार को इस मामले में फंसाया जाए । पत्रकार के पिता पैरालाइसिस से पीड़ित हैं। उनका भी नाम इस f.i.r. में दर्ज है।

पत्रकारों के दमन का कांग्रेस का रहा है पुराना इतिहास

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कहावत है कि "रस्सी जल जाती है लेकिन बल नहीं जाता है", कांग्रेस पार्टी पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। कांग्रेस की रस्सी तो जल गई लेकिन बल नहीं गया। पत्रकारिता और पत्रकारों के प्रति असहिष्णुता रवैया अभी तक जारी है। ध्यान रखिए इस बार भी नामी पत्रकार अर्णब गोस्वामी पर वहीं हमला हुआ है जहां कांग्रेस सत्ता में है। खास बात है कि अर्णब गोस्वामी के सोनिया गांधी से सवाल पूछने के बाद ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अर्नब गोस्वामी को रिपब्लिक भारत से हटान की मांग की थी और उन्हें सनकी तक घोषित कर दिया था। इसके बाद ही रात को उन पर हमला हो गया। 
दिल्ली की कांग्रेस नेता अलका लांबा ने इस घटना के बाद अपने ट्वीट पर यूथ कांग्रेस जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अर्णब गोस्वामी पर हुए हमले की प्रसंशा की थी। ये वही अलका लांबा जिन्होंने सोशल मीडिया पर कमेंट करने पर एक युवक को पीटने के लिए उनके घर चली गई थी। मालूम हो कि मुंबई के नजदीक पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीटकर निर्मम हत्या कर दी। दोनों साधुओं की हत्या हुए करीब छह दिन हो गए, लेकिन हत्या के पीछे का सच का खुलासा नहीं हुआ है। चूंकि यह हत्या महाराष्ट्र के पालघर में हुई है, जहां सरकार में कांग्रेस शामिल है। इसी संदर्भ में अर्नब गोस्वामी ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से सवाल पूछ लिया। इसी से कांग्रेस के बौखलाए नेता और यूथ कांग्रेस ने अर्णब गोस्वामी और उनकी पत्नी पर रात बारह बजे के करीब हमला कर दिया। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस शासित सरकार के संदर्भ में सोनिया गांधी से सवाल पूछना भी अपराध हो गया है?
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पत्रकारों के दमन का कांग्रेस का रहा है लंबा इतिहास
कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना शासित महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में जिस प्रकार देश के जाने-माने पत्रकार अर्नब गोस्वामी पर यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हमले के महज तीन घंटे बाद ही डीसीपी का बदला बयान सामने आया है, इससे कांग्रेस शासन की पुरानी करतूत सामने आ गई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि अपना सच्च छिपाने के लिए पत्रकारों के खिलाफ कांग्रेस के दमन का लंबा इतिहास रहा है। मालूम हो कि अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी पर बीती रात यानि बुधवार की रात सवा बारह बजे के करीब हुए हमले के बाद कांग्रेस पार्टी और उसकी अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी सवालों के घेरे में है। इस घटना के बारे में अर्नब गोस्वामी ने वीडियो जारी कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी है। उन्होंने इस घटना के बाद पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत भी दर्ज करवाई। शिकायत में बताया है कि दो लोगों ने रिपब्लिक भारत के हेडक्वार्टर से घर लौटते वक्त उनके आवास के नजदीक उन पर और उनकी पत्नी पर हमला किया था। इस हमले के बाद जिस प्रकार कांग्रेसी नेताओं के बयान और हरकतें सामने आई हैं इससे तो यही लगता है कि कांग्रेस ने पत्रकारों पर दमन के अपने पुराने इतिहास को ही दोहराया है।
इंदिरा गांधी ने रामनाथ गोयनका को किया था परेशान
समय इंदिरा गांधी का रहा हो या राजिव गांधी का, सत्ता के ठसक में कांग्रेस ने हमेशा ही पत्रकारों का दमन किया है। गांधी परिवार को कभी मीडिया की स्वतंत्रता नहीं सुहाई। पत्रकारों के अधिकारों को कम करने की सबसे पहली पहल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही की थी। बाद में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने तो पूरे प्रेस पर ही बंदिश लगा दी थी। इतना ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया के प्रमुख हस्ती रहे रामनाथ गोयनका को झुकाने के लिए उन्होंने उनके अखबार को दिए जाने वाले विज्ञापन बंद करवा दिए। इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी ने अपने प्रशासनिक हनक के माध्यम से अखबार छपने के समय बिजली कटवा देती थी, ताकि समय पर लोगों को अखबार नहीं मिले।
राजीव गांधी के शासनकाल में प्रोफेसर की पीटाई
जब 1988 में बोफोर्स घोटाला सामने आया उस समय राजीव गांधी के खिलाफ ‘गली-गली में शोर है राजीव गांधी चोर है’ का नारा काफी प्रचलन में था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन में एक कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान जब एक लड़की से चुटकुला सुनाने को कहा गया तो उसने ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ बोल दिया। क्या कांग्रेस बताएगी कि इसके सीधे प्रसारण किये जाने पर उस पत्रकार का क्या हश्र हुआ था? बाद में इस घटना को लेकर सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया था कि  ‘ऑल इंडिया रेडियो के किस स्टेशन ने ‘राजीव गांधी चोर है’ वाक्य प्रसारित किया था?’ राजीव गांधी पर पूछा गया यह सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट प्रदीप कृष्णात्रेय पर बहुत भारी पड़ा। युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पत्रकारिता विभाग में जाकर प्रोफेसर के साथ न केवल जमकर मारपीट की, बल्कि  उनके चेहरे पर कालिख पोतकर पूरे कैंपस में घुमाया।
राजीव गांधी लाए थे पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक
स्वतंत्र और निष्पक्ष आवाज हमेशा से कांग्रेस के कान में चुभती रही है। तभी तो कांग्रेस हमेशा से देश में एक बंधुआ प्रेस के पक्ष रही है। पत्रकारों के खिलाफ समय-समय पर कानून बनाना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है। इंदिरा गांधी ने पत्रकारिता को खत्म करने के लिए आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगा दिया तो राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान पूरी पत्रकारिता को ही खत्म करने की ठान ली थी। तभी तो राजीव गांधी पत्रकारों की आवाज बंद करने के उद्देश्य से संसद में पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक लेकर आए थे। वे अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को बंद करने के लिए ही इस प्रकार का कानून लाए थे।
राहुल ने महिला पत्रकार पर की अमर्यादित टिप्पणी
अपनी ड्योढ़ी पर खुद के सुविधानुसार पत्रकारों को इंटरव्यू देने के आदि राहुल गांधी ने स्मिता प्रकाश जैसी वरिष्ठ पत्रकार पर अपने प्रश्नों का स्वयं उत्तर देने का आरोप लगाते हुए उन पर हमला किया था। यह वाकया उस समय का है जब स्मिता प्रकाश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया था, और उसकी चर्चा भी काफी हुई थी। उसी समय राहुल गांधी ने भद्दे तरीके से उस पर आरोप लगाते हुए हमला किया था। वरिष्ठ महिला पत्रकार के खिलाफ राहुल गांधी के इस अमर्यादित हमले के बाद भी किसी ने राहुल गांधी से सवाल पूछने की हिम्मत कर पाई।
यूपीए के कार्यकाल में पत्रकार सुधीर चौधरी पर हमला
कांग्रेस पार्टी की पुरानी आदत रही है। जब भी वह सत्ता में रही है अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की आवाज दबाती रही है। वह चाहे जो भी दौर रहा हो। यूपीए-2 के कार्यकाल में भी पत्रकारिता और पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए पर हमले होते रहे। इसके लिए कांग्रेस ने हमेशा साम दाम दंड और भेद का इस्तेमाल किया है। साल 2012 में कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी पर अपनी कंपनी के कथित तौर पर कोयला घोटाले में शामिल होने की खबर प्रसारित नहीं करने के बदले में 100 करोड़ रुपये मांगने का आरोप लगाया था। इस आरोप के चलते सुधीर चौधरी को जेल तक जाना पड़ा। हालांकि बाद में सुधीर चौधरी ने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ मानहानि का मामला दाखिल किया। उन्होंने जिंदल पर उन्हें एफआईआर में झूठे तरीके से फंसाने और संवाददाता सम्मेलन में झूठा बयान देने का आरोप लगाया।
यूथ कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है गुंडागर्दी का
किसी पत्रकार पर जानलेवा हमला करना यूथ कांग्रेस की पहली घटना नहीं है। अपने आकाओं की आलोचना करने वालों के साथ गुंडागर्दी करना उसे विरासत में मिली हुई है। सन 1988 की बात है जब पटना रेडियो स्टेशन में एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान बच्ची द्वारा राजीव गांधी को चोर कह देने को लेकर यूथ कांग्रेस ने गुंडागर्दी की थी। इतना ही नहीं इस मामले को लेकर यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय पर हमला किया था।
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