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राजीव गाँधी के चाटुकार सैम पित्रौदा ने उड़वा दिया मजाक, बोला, ‘राजीव गाँधी 1 दिन में मिलाते थे 5000+ लोगों से हाथ, खून निकलने लगता था’

कांग्रेस नेता सैम पित्रौदा और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी
लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस अपने मुताबिक माहौल बनाने में लगी हुई है। राहुल गाँधी एक नई यात्रा पर निकल रहे हैं। लेकिन उनके नेताओं के बयानों के कारण उनकी अभी से फजीहत होनी शुरू हो चुकी है। सैम पित्रौदा को ही सुन लीजिए। एक चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा है कि राहुल गाँधी की तरह राजीव गाँधी भी बहुत लोगों से मिलते थे। वह तो एक दिन में 5-5 हजार लोगों के साथ हाथ मिलाते थे जिसकी वजह से उनके हाथ से खून भी निकलने लगता था।

उन्होंने खुद को राजीव गाँधी का दोस्त बताते हुए इस वाकये की चर्चा 4pm नाम के चैनल पर संजय शर्मा के साथ की। यहाँ सजय उनसे पूछ रहे थे- “क्या आप राहुल गाँधी के पिता (राजीव गाँधी) के दोस्त रहे थे? इस पर सैम ने ‘हाँ’ में जवाब दिया और जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी इस तरह की यात्रा की थी, क्या उन्हें भी लोगों से मिलने का शौक था?

इस पर सैम बोले- “बिल्कुल, मैं आपको एक बार की बात बताता हूँ। एक रात, मैं और मेरी पत्नी राजीव गाँधी से मिले। उस समय उनके हाथ से खून निकल रहा था। मुझे बड़ा अचरज लगा। मैंने पूछा कि ये क्या हुआ। तो उन्होंने कहा- सैम, आज हमने करीबन 5000 लोगों से हाथ मिलाया। जहाँ भी मैं गया लोगों ने हाथ मिलाए। वो लोग खेतीबाड़ी करते हैं उनके हाथ बहुत रफ होते हैं।”

ऐसे में यह भी सवाल होता है कि 'जो नेता इतने लोगों से मिलता हो, और अगले ही चुनाव में सत्ता से बाहर होना' क्या संभव हो सकता है? चाटुकारिता की भी एक सीमा होती है, फैंको उतना जितना सामने वाले के गले से नीचे उतर सके। इतना मत फेंको की अपनी जग हंसाई करवाने के साथ-साथ अपने नेता की भी हंसी उड़वा दो। हकीकत में कांग्रेस के पतन का कारण ही परिवार की चाटुकारिता है। 

सैम कहते हैं, “हमारे हाथ कभी भी इतने रफ नहीं हो सकते क्योंकि हम लिखते हैं, कुल्हाड़ी लेकर काम नहीं करते। हमारे पूर्वजों के हाथ रफ थे। मेरे चाचा तो लुहार का काम करते थे। वो पूड़ियाँ बनाते थे तो गर्म तेल में ऊंगली डालकर उसे निकालते थे। उनके काम के कारण उनका हाथ रफ हो गया था।”

सैम जब दावा करते रहते हैं कि राजीव गाँधी बहुत लोगों को मिलते थे, तो ये वाकया सुन संजय शर्मा पूछते हैं कि क्या उन्होंने सच में इतने लोगों से हाथ मिला लिया कि उनका हाथ कड़ा हो गया और खून आ गया?

इस पर सैम फिर दोहराते हैं कि राजीव गाँधी इतने के बाद रुकते नहीं थे। ये सिलिसला चलता रहता था। वह आनंद से रहते थे और बोलते थे कि ये उनकी ड्यूटी है। सैम ने दावा किया कि ये सब राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए किया था। वह पीएम होते हुए भी इतने लोगों से मिलते थे।

राजीव गाँधी का सैम पित्रौदा ने उड़वा दिया मजाक

सैम पित्रौदा की इस बात का सोर्स वह स्वयं हैं। उन्होंने वीडियो में ये नहीं बताया कि कौन सी रैली में, कौन से गाँव में, किस जगह राजीव गाँधी ने 5 हजार से ज्यादा लोगों से इतनी बार हाथ मिलाए कि उनका हाथ ही कट गया और उससे खून निकलने लगा। केवल गाँधी परिवार का बखान करने में ऐसा लगता है वो कुछ भी बोलते चले गए। यही वजह है कि उनकी ये बातें सुनकर राहुल गाँधी के साथ-साथ अब राजीव गाँधी का भी मजाक उड़ने लगा है।
वहीं सैम पित्रौदा को तो लोग ‘चाटुकार’ बता रहे हैं, बड़े स्तर का चमचा कह रहे हैं। कुछ लोग ‘कॉन्ग्रेस की नैया डुबाने’ के पीछे सैम पित्रौदा को जिम्मेदार बता रहे हैं। कुछ ऐसे बयान सुनकर कह रहे हैं कि कॉन्ग्रेस को भगवान ही बचा सकती है। कुछ लोग तो सैम पित्रौदा की बड़ी-बड़ी बात को गणित के साथ भी काट रहे हैं कि अगर एक व्यक्ति से हाथ मिलाने में 6-7 सेंकेड लगते हैं तो 5000 लोगों से हाथ मिलाने में तो 8 घंटे के करीब लग जाएँगे। क्या सवाल नहीं उठता कि एक दिन में एक प्रधानमंत्री सिर्फ 8 घंटे तक लोगों से हाथ ही मिला रहा है।

जब राजीव गाँधी ने राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन पर चलवा दीं थी गोलियां

             अपने पिता के आंदोलन पर गोलियां चलवाने वाली कांग्रेस के चक्रव्यू में फंस गया बेटा राकेश टिकैत  
गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2021) पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों का उपद्रव पूरे देश को शर्मसार करने वाला था। लाल किले में तिरंगे के अपमान से लेकर दिल्ली की सड़कों पर पुलिसकर्मियों पर हमला, समेत तमाम घटनाएँ हैं, जिसे देख हर कोई इस प्रदर्शन की मंशा पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में प्रियंका गाँधी और उनके भाई राहुल गाँधी कथित किसानों के समर्थन में आए हैं। 

26 जनवरी को हुई हिंसा की एक भी बार निंदा न करने वाली प्रियंका गाँधी ने हालिया ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। इस ट्वीट में प्रियंका लिखती हैं, “किसान का भरोसा देश की पूँजी है। इनके भरोसे को तोड़ना अपराध है। इनकी आवाज न सुनना पाप है। इनको डराना धमकाना महापाप है। किसान पर हमला, देश पर हमला है। प्रधानमंत्री जी, देश को कमजोर मत कीजिए।”

वहीं, राहुल गाँधी ने पूछा है कि आखिर लोगों को लाल किले में जाने की अनुमति कैसे मिली? उन्हें रोका क्यों नहीं गया? पूछिए गृहमंत्री से कि क्या उद्देश्य था कि लोगों को परिसर में जाने दिया गया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष का कहना है, “सरकार को किसानों से बात करके समस्या के हल तक पहुँचना चाहिए। हल सिर्फ ये है कि कानून वापस लिया जाए और उसे कूड़ेदान में डाला जाए। सरकार सोचती होगी कि किसान घर चले जाएँगे। मेरी चिंता है कि ये स्थिति बढ़ेगी। लेकिन हमें वह सब नहीं चाहिए। हमें हल चाहिए।”
 जब राकेश टिकैत के पिता महिंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन पर गोलियां चलवाईं थी, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी  ने 
अब ‘किसानों’ के हिंसक रूप को देखने के बावजूद उनके समर्थन में आए प्रियंका-राहुल को याद दिलाना जरूरी है कि आज जो वह दोनों किसान समुदाय के हितैषी बनकर कथित किसानों की स्थिति के लिए मोदी सरकार को कोस रहे है, उनके खुद के पिता राजीव गाँधी का रवैया उन असली किसानों के प्रति कैसा था जो न सड़कों पर दंगे कर रहे थे, न खालिस्तानियों का समर्थन। 
राहुल और प्रियंका के ट्वीटों पर लोगों की प्रक्रिया:-
लगभग 30 साल पहले की बात है। 1988 के अक्टूबर माह में तत्कालीन बीकेयू नेता व राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के अधिकार के लिए एक प्रदर्शन किया था, जिसे राजीव गाँधी की सरकार ने दबाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। 
महेंद्र सिंह टिकैत के निर्देशों पर करीब 50 हजार किसानों ने उस समय दिल्ली के उत्तरी और दक्षिणी ब्लॉक के पास बने बोट क्लब और उसके लॉन का घेराव किया था। इस आंदोलन के पीछे मुख्य वजह कृषि संकट, देरी से हो रहे भुगतान, नौकरशाही के जटिल नियम और किसानों के कष्टों के प्रति सरकार की उदासीनता थी।
शुरुआत में तय किया गया कि यह आंदोलन 1 दिन का होगा। मगर देखते ही देखते अवधि एक हफ्ता पार कर गई। धीरे-धीरे सबका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ। उधर, कुछ दिन में शीतकालीन संसद सत्र शुरू होने वाला था। वीपी सिंह के इस्तीफे और बोफोर्स घोटाले के कारण पहले ही राजीव गाँधी सरकार सबके निशाने पर थी।
ऐसे में किसान आंदोलन की भड़की आग को शांत करने के लिए राजीव सरकार ने सबसे पहले किसानों के प्रदर्शन क्षेत्र में पानी की सप्लाई बंद की। फिर खाने की सप्लाई को रोक दिया गया। जब किसान इतने पर भी नहीं हटे तो किसान और उनके मवेशियों को दुखी करने के लिए रात-रात गाने बजाए गए। फिर भी किसान माँग पर अड़े रहे तब राजीव सरकार ने कथित रूप से लाठीचार्ज किया और महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई वाली किसानों की रैली को उसी समय खदेड़ दिया गया। मालूम हो कि यह वही घटना है जब एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में चली गोलियों में दो किसानों की मौत हो गई थी।
आज प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी उन किसानों के लिए सरकार से सवाल कर रहे हैं जिनकी हकीकत और मंशा दोनों जगजाहिर हो गई है। दूसरी ओर स्थानीय भी माँग कर रहे हैं कि प्रदर्शनस्थल खाली करवाए जाएँ और सभी प्रदर्शनकारी अपने-अपने घर लौटें। मगर, इन सब बातों को नजरअंदाज करते हुए प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी दोनों कथित किसानों के कुकर्मों पर लीपापोती करने में जुटे हैं। वो भी ये जानते हुए सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कृषि कानून केवल किसानों के हित में हैं।
अब राहुल गाँधी कह रहे हैं कि सरकार को किसानों से बातचीत करनी चाहिए जबकि सच्चाई यह है कि 11 दौर की बातचीत बेनतीजा सिर्फ़ किसानों की जिद्द के कारण हुई है, जिससे साफ पता चलता है कि उनकी इच्छा सिर्फ़ कृषि कानून पर चर्चा करने की नहीं है।
कॉन्ग्रेस का किसानों के प्रति बर्बर रवैया सिर्फ़ 1988 में सामने नहीं आया था, बल्कि साल 1997 में भी इसकी पोल खुली थी। तब, मध्यप्रदेश के मुलतई में कॉन्ग्रेस काल में एक और कार्रवाई किसानों के ख़िलाफ़ हुई थी। वहाँ बल का प्रयोग करके लगभग किसान प्रदर्शन पर ओपन फायरिंग करवा दी गई थी। घटना में आधिकारिक तौर पर 19 किसानों की जान गई थी। वहीं 150 से ज्यादा घायल हुए थे। वहीं एक्टिविस्ट कहते हैं कि इस घटना में 24 किसान मरे थे। भाजपा उस समय विपक्ष में थी और उसने पूरी घटना को जलियाँवाला बाग नरसंहार के समकक्ष बताया था।

राजीव गांधी की डिलीवरी के लिए इंदिरा गांधी मुंबई ही क्यों गईं थीं?

फिरोज़ गांधी के साथ इंदिरा.
अपने शौहर फिरोज जहांगीर के साथ इंदिरा गाँधी 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कहते हैं संस्कार बच्चा माँ के पेट से लेकर आता है, जो गाँधी परिवार पर सटीक भी बैठता है। इंदिरा गाँधी से लेकर आज राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा तक कोई फ़िरोज़ जहांगीर का नाम लेने की बजाए ननिहाल नेहरू परिवार से अपने सम्बन्ध बताते रहते हैं। लगता है सोनिया, राहुल और प्रियंका को फ़िरोज़ की पृष्ठभूमि का बोध नहीं या फिर नेहरू परिवार के बाहर का होने से लगता है शायद उनको उतना लाभ न मिल पाए, अगर वह इस कारण अपने ससुर/दादा फ़िरोज़ का नाम नहीं लेते, भयंकर भूल कर रहे हैं। 
फिरोज का नाम या उसका अनुसरण करने का कारण है, वह यह कि ये नेहरू परिवार की तरह भ्रष्टाचार और घोटालों से दूर नहीं रहना चाहते। सत्ता तो आनी जानी चीज है, लेकिन आत्मसम्मान अगर चला गया तो पुनः प्राप्त नहीं होता। यदि वर्तमान गाँधी परिवार फिरोज के कदम-ओ-निशान पर चलते तो आत्मसम्मान नहीं गया होता। परन्तु अब बहुत देर हो चुकी है। आज फ़िरोज़ भी कब्र में अपना सिर दीवारों से पीट रहे होंगे। शायद यही कारण भी है कि फिरोज की चीख न सुन पाने के कारण कोई उनकी कब्र तक पर सजदा करने नहीं जाता। इन्हें नहीं मालूम की जब फिरोज संसद में खड़े होते थे, ससुर जवाहर लाल नेहरू के पसीने आने लगते थे। लेकिन जब उसी संसद में फिरोज का पोता राहुल बोलता है, हंसी का पात्र बन जाता है। और पोती प्रियंका के भी राजनीति में आने पर आलम यही है। यानि पोते और पोती दोनों ने अपने दादा फिरोज जहांगीर के नाम को तक को कलंकित कर दिया। दादा फिरोज ने लड़ाई लड़ी भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध और फुलवारी लड़ाई लड़ रही है भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज़ों को बचाने। खैर। 
मुंबई ही क्यों गयी थी राजीव की डिलीवरी के लिए?   
देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का मुंबई से खास कनेक्शन रहा है। मुंबई में जिस जगह फिलहाल कुमार मंगलम बिड़ला का घर है, वहां कभी इंदिरा गांधी की छोटी बुआ कृष्णा हटी सिंह का घर हुआ करता था। इसका नाम आनंद भवन था। खास बात ये है कि इसी घर में इंदिरा गांधी को मिला था मां बनने का आनंद। इंदिरा गांधी इलाहाबाद में थीं, जब उन्हें पहली बार अपने मां बनने का पता चला। इंदिरा गांधी उस वक्त खुश थीं तो उनके मन में डर भी था। इसके पीछे कारण उनकी सेहत थी। वो बचपन से लेकर राजनीति में जाने तक अकसर बीमार रहती थीं। खराब सेहत के कारण ही उन्हें ऑक्सफर्ड से बीच में ही पढ़ाई छोड़कर वापस भारत लौटना पड़ा था। 
इंदिरा गाँधी की सेहत ख़राब रहने के कारण जानने के लिए हमें कुछ पीछे जाना पड़ेगा। शायद यही उनकी सेहत ख़राब रहने का कारण हो, देखिए :
देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन से जुड़े कुछ रहस्‍यों का खुलासा एक नई किताब में किया गया है। वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार सागरिका घोष की लिखी किताब Indira: India’s Most Powerful Prime Minister में इंदिरा और फीरोज गांधी के रिश्‍तों पर नई रोशनी डाली गई है। किताब के अनुसार, ‘फीरोज ने 1955 में जब जीवन बीमा का राष्‍ट्रीयकरण किया, प्रेस का संसदीय कार्यवाही की रिपोर्ट‍िंग की आजादी दिलाई, हालांकि बाद में इस कानून को इंदिरा ने ही इमरजेंसी के दौरान कुचल दिया। सागरिका की किताब के अनुसार, दिल्‍ली में फीरोज को नेहरू की मौजूदगी से घुटन होती थी और तीन मूर्ति भवन में रहना उनके लिए असहनीय हो गया था। फीरोज की आशिक-मिजाजी के किस्‍से दिल्‍ली के गलियारों में सुनाई देने लगे थे। वह अक्‍सर तारकेश्‍वरी सिन्‍हा, महमूना सुल्‍तान और सुभद्रा जोशी जैसी सांसदों के साथ अपनी दोस्‍ती का प्रदर्शन करते थे, वह भी ऐसा दिखाने के लिए जैसे वह अपने ससुराल वालों को शर्मिंदा कर रहे हों।
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हालांकि तारकेश्‍वरी सिन्‍हा ने यह कहते हुए खंडन किया , ”अगर एक मर्द और औरत साथ में लंच कर लें तो अफेयर की अफवाह उड़ने लगती है… मैंने एक बार इंदिरा से पूछा था कि क्‍या वह अफवाहों में यकीन करती है, चूंकि मैं खुद भी शादीशुदा थी और मेरा एक परिवार तथा सम्‍मान था, उन्‍होंने कहा कि वह अफवाहों में यकीन नहीं रखती।”
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M.O. मथाई भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव थे। उन्होंने 1946 से 1959 तक नेहरू के विशेष सहायक के रूप में सेवा की। लेकिन नेहरू के निजी सचिव के इंदिरा गांधी के साथ बहुत निजी संबंध थे।हां, एम.ओ. माथाई जो नेहरू के साथ थे, नेहरू परिवार के बारे में सब कुछ जानते थे, वास्तव में थोड़ा बहुत ज़्यादा ही जानते थे।मथाई ने “रेमिनिसंस ऑफ़ द नेहरु ऐज” नामक एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने नेहरू परिवार को नग्न कर दिया।नेहरू के कई रहस्यों को पता चला है लेकिन क्या अधिक दिलचस्प है इंदिरा गांधी का शीर्षक “SHE” है।
अपनी पुस्तक में मथाई नेहरू के प्रति बहुत सम्मान दिखाया है लेकिन उन्होंने खुले तौर पर एश्वीना, पद्मजा नायडू (सरोजिनी नायडू की बेटी), मृदुला साराभाई और कई अन्य लोगों के साथ घनिष्ठ संबंधों से भी खुलेआम बात की थी।नेहरू इन महिलाओं को प्रभावित करने में बहुत व्यस्त थे कि वे भारत की देखभाल करने में भूल गए आखिरकार,भारत 1962 भारत-चीन युद्ध हार गया।उस किताब में “SHE” नाम का एक अध्याय था जो आखिरी पल में वापस ले लिया गया था।इंदिरा गांधी के साथ मथाई के यौन संबंध के विवरण को ‘पिन’ करने के लिए इस अध्याय ने पिन लगा दिया है।
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19 नवंबर 1917 को इंदिरा गांधी का जन्म पंडित जवाहर लाल नेहरू
और कमला नेहरू के घर हुआ था। वो पंडित नेहरू की इकलौटी
 संतान थीं। उनके पिता आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री
बने थे। उनके नक्शेकदम पर चलते हुए इंदिरा भी देश की
 पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। गांधी ने 1966 से 1977 औ़र
फिर 1980 से 1984 तक देश की प्रधानमंत्री के तौर पर सेवा की थी।
 अपने पिता के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान वो उनकी निजी
 सचिव रह चुकी थी। इसी वजह से उन्हें एक प्रधानमंत्री के कार्यों
को करीब से देखने, समझने का मौका मिला। उन्हें भारत की
आयरन लेडी के नाम से जाना जाता है। इसकी वजह उनका कई
 कड़े फैसले लेना है।
 (Image Source: Express Archive)
मथाई इंदिरा गांधी के साथ इस तरह के रोमांटिक संबंध थे कि उसने इंदिरा गांधी के घर में संकट पैदा किया था। यह ज्ञात है कि नेहरू को भी फिरोज गांधी पसंद नहीं था। मथाई कहते हैं कि वह बारह साल तक इंदिरा के प्रेमी थे और यहां तक ​​कि एक बार उसको गर्भवती भी बना दिया था,लेकिन उसका गर्भपात करवा दिया गया।
इंदिरा गांधी ने मथाई से कहा, “मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूं, कल शाम को मुझे जंगल में ले जाना चाहती हूं।” मथाई ने उत्तर दिया कि उसके पास किसी महिला से कोई अनुभव नहीं है। इसलिए उसने उन्हें दो पुस्तकें दीं, एक डॉ अब्राहम स्टोन के बारे में सेक्स और महिला शरीर रचना भी थी।
उसने उसे सूर्यास्त के बाद उसे जंगल में ले जाने के लिए कहा। वह हमेशा मथाई को कस कर रखती थी और उसे “ओह भूपत आई लव यू” कहा करती थी।इंदिरा ने उन्हें भूपत का नाम दिया, डाकू और मथाई ने उन्हें पुतिली, डक्केटेस के रूप में बुलाया। उन्होंने कहा कि जब तक उनके साथ वह इंदिरा नहीं थी तब तक उन्हें कभी पता नहीं था कि असली सेक्स क्या होता है?
अध्याय कहता है कि उसका ‘ठंडा और निषिद्ध’ प्रतिष्ठा ‘स्त्रैण स्व-संरक्षण’ का ही एक उपाय था; वह ‘बिस्तर में असाधारण तरीके से अच्छी’ थी; ‘सेक्स एक्ट में उन्हें फ्रांसीसी महिलाओं और केरल नायर महिलाओं की सभी कलात्मकताएं थीं’। मथाई यह भी कहता है कि उन्हें लंबे समय तक चुंबन पसंद है।
यद्यपि उनका इंदिरा गांधी के साथ बहुत अच्छा यौन संबंध था, उसने खुद से खुद को क्यों दूर किया? इंदिरा गांधी का सिर्फ एक व्यक्ति के साथ संबंध नहीं था। एक दिन जब मथाई इंदिरा गांधी से मिलने आए, उन्होंने उन्हें धीरेंद्र ब्रह्मचारी के साथ देखा, जो एक लंबा आदमी था, जिसने इंदिरा गांधी के साथ रखा गया था। जब मथाई ने इंदिरा को उनके साथ देखा, तो उसने कहा कि “मुझे आपको कुछ कहना है; लेकिन मैं इसे बाद में कहूंगा “। यह इंदिरा गांधी के साथ उनके रिश्ते का अंत था।
Image result for m o mathaiफीरोज के रूमानी किस्‍सों की हकीकत चाहे जो भी हो, उनके बारे में बातें खूब होतीं। अधिकतर लोगों को यही लगता था कि या तो फीरोज के अफेयर्स के चलते दोनों के बीच तलाक होगा या फिर इंदिरा की बेवफाई के चलते। ऐसी अफवाह थी कि इंदिरा का अफेयर नेहरू के सेक्रेटरी, एमओ मथाई से था। मथाई 1946 से लेकर 1959 तक नेहरू की परछाई रहे थे। वह अनथक काम करने में यकीन रखते थे, बेबाक थे जिसपर नेहरू ने पूरी तरह से भरोसा किया।
मथाई ने अपनी आत्‍मकथा में नेहरू काल का जिक्र करते हुए कथित तौर पर ‘शी’ नाम से एक पूरा खण्‍ड लिखा है, जिसमें उन्‍होंने ‘जोशीली’ इंदिरा का जिक्र किया जिनके साथ करीब 12 साल तक उनका अफेयर रहा। कई दक्षिणपंथी वेबसाइट्स पर मौजूद उस कथित खण्‍ड में कई लाइनें ऐसी हैं जिनमें कहा गया है कि ‘उनकी (इंदिरा) क्लियोपेट्रो जैसी नाक थी, पॉलिन बोनापार्ट जैसी आंखें और वीनस जैसे स्‍तन थे।’
इस खण्‍ड में लिखा गया है कि इंदिरा ‘बिस्‍तर में बेहद अच्‍छी थीं’ औरं सेक्‍स में ‘वह फ्रेंच महिलाओं और केरल नायर महिलाओं का मिश्रण थीं।’ किताब में यह भी दावा किया गया है कि वह लेखक (मथाई) से गर्भवती हो गई थीं और गर्भपात कराना पड़ा। कई अपुष्‍ट ऑनलाइन वर्जन में इंदिरा के हवाले से कहा गया कि वह एक हिंदू से शादी करना बर्दाश्‍त नहीं कर सकती थीं।’

धीरेंद्र ब्रह्मचारी इंदिरा गांधी के योग प्रशिक्षक थे। योग मुद्रा जल्द ही कामुक मुद्रा बन गयी।इंदिरा गांधी ने एक बार कहा था कि वह कभी भी एक हिंदू से शादी नहीं कर सकतीं, लेकिन वह एक हिंदू साथ रखी थी। उसने यह भी कहा कि ‘मुझे रानी मधुमक्खी पसंद है मैं हवा में प्यार करना चाहती हूं। ‘अध्याय के अंत में, मथाई ने लिखा, ‘मैं उसके साथ प्यार में गहराई से गिर गया था।’(श्रेय: नेहरू एज की यादें)
शायद इसी कारण, काफी सोच समझकर इंदिरा गांधी और उनके पति फिरोज गांधी ने तय किया कि वो अपने पहले बच्चे को मुंबई में जन्म देंगी। इसकी वजह थी डॉ. वीएन शिरोडकर, जो उस वक्त देश के सबसे बड़े गायनोकॉलजिस्ट हुआ करते थे। इंग्लैंड और यूरोप तक से डॉक्टर मुंबई आकर डॉ. शिरोडकर की सर्जरी देखा करते थे
डॉ. शिरोडकर ने सी सेक्शन के लिए एक अलग और नए तरीके की स्टिच की तकनीक खोज निकाली थी।इसे शिरोडकर स्टिच नाम दिया गया और इसे दुनिया भर के डॉक्टरों ने अपनाया। यही कारण था कि इंदिरा और फिरोज गांधी ने डॉ. शिरोडकर को चुना और दोनों मुंबई आ गए। आनंद भवन में रहने लगे। फिर डॉ. शिरोडकर के अंडर में इंदिरा की केयर शुरू हो गई। 1944 का ये वक्त इंदिरा और फिरोज के लिए उनके वैवाहिक जीवन का सुनहरा वक्त था। दोनों दिनभर दोस्तों से मिलते। क्लब-रेस्त्रां में खाना-पीना खाते। वहीं दोनों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रहती थी कि बच्चे का नाम क्या रखना है। उपुल जयकर की किताब के मुताबिक दोनों को ही लगता था कि उन्हें बेटा होगा। इंदिरा गांधी इस पूरे माहौल, पति और जिंदगी से इतना खुश थीं कि वो एक बार फिर से एक आम गृहिणी की तरह जीवन गुजारने की ख्वाहिशें पालने लगीं
20 अगस्त 1944 को सुबह 8:10 मिनट पर राजीव गांधी का जन्म हुआ। इंदिरा गांधी की सभी आशंकाएं निराधार साबित हुईं। बिना किसी कॉम्पलिकेशन के राजीव का जन्म हुआ। जवाहरलाल नेहरू उस वक्त अहमदनगर किला जेल में भारत छोड़ो आंदोलन के चलते बंद थे। बताते हैं कि नेहरू जी को इस बात की बहुत चिंता थी कि बच्चे के जन्म का समय सही नोट किया जाए। उन्होंने अपनी बहन को इसके लिए खासतौर पर कहा था कि बच्चे के जन्म का सही टाइम नोटकर उसकी जन्मपत्री बनवाकर उनके पास भेजी जाए। दो महीने बाद अक्टूबर 1944 में इंदिरा और फिरोज राजीव को लेकर वापस इलाहाबाद चले गए।1960 और 70 के दशक में डॉ. शिरोडकर को पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा गया। यही थी इंदिरा गांधी का मुंबई कनेक्शन। 

राजीव गाँधी जन्मदिन पर विशेष : प्रस्तुत है भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की माला

Rajiv Gandhi Profiles। राजीव गांधी : भारत के ...
                                                                                                        साभार 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पिछले कुछ सालों में राहुल गाँधी और अब उनकी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा भी केंद्र सरकार पर हर प्रकार के घोटालों के आरोप लगाते नजर आए हैं। इसके लिए उन्होंने कभी द हिन्दू अखबार की फर्जी कतरनों का सहारा लिया तो कभी चुनावी रैलियों में मनगढ़ंत आँकड़ों के जरिए एक ही झूठ को कई बार दोहरा कर यह साबित करने का प्रयास किया कि राहुल गाँधी के पिता राजीव के कार्यकाल और उसी तरह UPA के दागदार राजनीतिक सफर की तरह ही नरेंद्र मोदी सरकार में भी घोटाले हुए हैं।
इस कड़ी में राहुल गाँधी और उनकी बहन को कभी सुप्रीम कोर्ट से लताड़ लगी तो कभी उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ इन खुले झूठों को बेचने की कीमत आम चुनावों में भारी हार के साथ चुकानी पड़ी।
अगस्त 20, 1944 को, आज ही के दिन पैदा हुए राजीव गाँधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गाँधी की उम्र तब महज 40 साल थी और भारत के प्रधानमंत्री पद पर अक्टूबर 31, 1984 से दिसंबर 01, 1989 तक आसीन रहे।
राजीव गाँधी कंप्यूटर लाये” – आखिर ...राजीव गांधी : मिस्टर क्लीन या मिस्टर ...
देशभक्ति मात्र एक दिखावा 
कांग्रेस और इसके समर्थकों द्वारा कहा जाता है कि परिवार ने देश के लिए जानें दी हैं। परन्तु जब राजीव की ओर देखने पर ज्ञात होता है कि इंडो-पाक युद्ध के दौरान इन्हे ड्यूटी पर रहने की बजाए इटली में विवाहित आनंद विभोर होने चले गए थे। जबकि नियम है की "युद्ध के दौरान हर एयरलाइन का पायलट 24-घंटे ड्यूटी पर रहेगा, लेकिन देशभक्त राजीव गाँधी भारत से ही गायब थे।  
राजीव गाँधी के राजनीतिक जीवन कई प्रकार से दागदार रहा, इसमें सबसे बड़ी वजह एक बोफोर्स घोटाला और भोपाल गैस त्रासदी से लेकर कश्मीरी पंडितों का पलायन है। इसके साथ ही कोरोना काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन के अंतर्गत किए गए घोटाले दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गाँधी के करियर में एक और अध्याय जोड़ते हैं।
राजीव गाँधी का प्रधानमंत्री रहते घोटालों और विवादों से निरंतर ही करीबी सम्बन्ध रहा। इन पर एक नजर डालते हैं –
कश्मीरी पंडितों का पलायन  
केंद्र में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान ही जेकेएलएफ के आतंकियों ने कश्मीरी हिंदूओं पर हमले शुरू कर दिए थे। जगमोहन की तैनाती राज्यपाल के तौर पर जनवरी 19, 1990 को हुई। लेकिन इससे पहले और जगमोहन के शुरूआती दिनों में हालात काबू से बाहर आ चुके थे।
सितंबर 14, 1989 को पंडित टीकालाल टपलू की हत्या कर दी गई जो कि कश्मीर घाटी के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। आतंकियों ने सबसे पहले उन्हें निशाना बनाकर अपने इरादे साफ कर दिए थे। इस हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद ही जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी।
घाटी में गवर्नर का शासन मार्च, 1986 में दूसरी बार तब लागू किया गया था, जब कॉन्ग्रेस ने गुलाम मोहम्मद शाह से समर्थन वापस ले लिया था। उस दौरान फारूक-राजीव समझौते पर काम चल रहा था और इस पर मुहर लगने और हस्ताक्षर होने के बाद फारूक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए।
1987 का विधानसभा चुनाव, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस द्वारा संयुक्त रूप से लड़ा गया। कश्मीर के इतिहास में खुले धाँधली के आरोपों के साथ सबसे बड़ी धोखाधड़ी के रूप में इसे याद रखा गया। यही वो समय था, जब उग्रवाद के साथ कश्मीर का रिश्ता गहरा होता चला गया। 1987 के इस ‘फारूक-राजीव एकॉर्ड’ के बाद कश्मीर हमेशा के लिए बारूद के ढेर पर बैठ गया और कश्मीरी पंडितों का नारकीय जीवन शुरू हो गया।
घोटालों में फंसा नेहरु गांधी परिवार ...
बोफोर्स घोटाला 
एक चुनावी रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती में पीएम मोदी ने कहा था, ”आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था। गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन… मिस्टर क्लीन चला था। लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।”
मोदी का इशारा राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी और उनके बोफोर्स घोटालों में सम्बन्ध की ओर ही था। इस घोटाले ने 1980 और 1990 के दशक में गाँधी परिवार और ख़ासकर तब प्रधानमंत्री रहे राजीव गाँधी की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया था।
बोफोर्स घोटाले ने राजीव गाँधी की मौत के कई साल बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। इस घोटाले में आरोप थे कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने कमीशन के बतौर 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे, ताकि वो भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉविट्ज़र तोपें बेच सकें।
बाद में राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी पर भी बोफ़ोर्स तोप सौदे के मामले में आरोप लगे थे, जब इस सौदे में बिचौलिया बने इटली के कारोबारी और गाँधी परिवार के क़रीबी ओतावियो क्वात्रोची का नाम सामने आया तो वह अर्जेंटिना भाग गया।
यूपीए सरकार के दौरान साल 2009 की शुरुआत तक भारत को आपराधिक मामलों में ओतावियो क्वात्रोची की तलाश थी, लेकिन अप्रैल 28, 2009 को सीबीआई ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देते हुए इंटरपोल से उस पर जारी रेडकॉर्नर नोटिस को हटा लेने की अपील की। सीबीआई की अपील पर इंटरपोल ने क्वात्रोची पर से रेडकॉर्नर हटा लिया गया। तब भाजपा ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देने के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ बताया था। 2013 में मिलान में उसकी मौत की खबरें सामने आईं थीं।
भोपाल गैस त्रासदी : 35 साल बाद भी ...
भोपाल गैस त्रासदी 25 हज़ार लोगों के कातिल को भगाया 
भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे।
2-3 दिसंबर, 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की कंपनी से जानलेवा गैस लीक होने से हजारों लोगों की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी।
अब तक अनुमान है कि तकरीबन 25,000 लोगों की इस गैस संबंधी बीमारी से मौत हो चुकी है। जबकि, हजारों लोग आज भी पीड़ित हैं। इस कंपनी के मालिक वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने सरकारी प्लेन में बैठाकर सुरक्षित भोपाल से दिल्ली पहुँचाया, जहाँ से उसे अमेरिका जाने दिया गया।
इस त्रासदी पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर कन्हैयालाल नंदन ने ‘मोहे कहाँ विश्राम’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें कहा गया कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। भगौड़े एंडरसन को भारत सरकार कभी दुबारा भारत वापस ला पाने में नाकामयाब रही और 92 साल की उम्र में सितंबर 29, 2014 को अमेरिका के फ्लोरिडा में एंडरसन की मौत हो गई।
Rajiv Gandhi Quotes: राजीव गांधी के 10 अनमोल ...सिखों के नरसंहार को ठहराया था उचित 
भारत में सबसे बड़े दंगे (नरसंहार ही था वो) को सरकारी छूट देने का आरोप राजीव गाँधी पर ही है। अक्टूबर 31, 1984 को इंदिरा गाँधी की हत्या के अगले दिन से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में भयानक सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।
नवंबर 19, 1984 को इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों की भीड़ के सामने सिखों के क़त्ल को जायज ठहराते हुए बयान दिया था, “जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।”
राजीव गाँधी ने इन दंगों का शिकार हुए हज़ारों सिखों पर कोई टिपण्णी ना करते हुए उनके घावों को कुरेदने वाला यह बयान दिया था जो आज तक भी गाँधी परिवार की प्राथमिकताओं को बेनकाब करने के लिए काफी है।
News on rajiv gandhi and sonia gandhi love story, all latest ...सरकार 1 रूपया भेजती है, जनता तक 15 पैसे पहुँचते हैं 
भ्रष्टाचार और घोटालों पर राजीव गाँधी के विचार क्या थे, इस बात का अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस बात से भी कोई ख़ास समस्या नहीं थी कि यदि केंद्र द्वारा 1 रुपया भेजा जाता है तो आम आदमी तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।
यानि सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार स्वीकार करने पर भी कोई कार्यवाही नहीं की। दूसरे, अर्थों में सरकार और पार्टी के भ्रष्ट होने की बात स्वीकार की। अपने जीवनकाल में शायद यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि 85 पैसे कौन खा रहा है? 
यह वर्ष 1985 की बात है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी सूखा प्रभावित ओडिशा के कालाहाँडी जिले में दौरे पर थे। यहाँ उन्होंने भ्रष्टाचार पर बात करते हुए कहा था कि सरकार जब भी 1 रुपया खर्च करती है तो लोगों तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने में असमर्थता जताते हुए राजीव ने अपने उस भाषण में कहा था कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है, जिसे दिल्ली से बैठकर दूर नहीं किया जा सकता।
विजय महाजन को राजीव गांधी फाउंडेशन ...राजीव गाँधी फाउंडेशन घोटाला 
राजीव गाँधी का घोटालों के साथ रिश्ता उनकी मौत के इतने वर्ष बाद भी जीवित नजर आता है। ऐसे समय में जब देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा था और भारतीय सेना लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना के साथ संघर्षरत थी, राजीव गाँधी फाउंडेशन द्वारा किए गए घोटाले चर्चा का विषय बन गए। ख़ास बात यह रही कि यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गाँधी परिवार के माँ-बेटा और बेटी की नजर PM CARES फंड पर टिकी हुई थी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार से फंड लेकर चीन के पक्ष में लॉबिग करने का मामला भी सामने आया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री राहत कोष फंड (PMNRF) को राजीव गाँधी फाउंडेशन में ट्रांसफर करने भी खुलासा भी हुआ। साथ ही पता चला कि UPA के दौरान कई मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की ओर से भी राजीव गाँधी फाउंडेशन में पैसे ट्रांसफर किए गए। इन सभी खुलासों के बाद गृह मंत्रालय ने एक कमिटी का गठन किया है।
शाहबानो केस एक ऐसा मामला है जिसने ...शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय को निरस्त किया 
राजीव गाँधी के करियर में तमाम घोटालों के अलावा दंगे और सबसे अहम शाहबानो प्रकरण शामिल हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 1985 को अंतिम निर्णय सुनाया,जिसके अनुसार खान साहब को शाहबानो को प्रति मास 500 रुपए गुज़ारा भत्ता देना होगा। इस फैंसले को सुन कर देश में शरीयत के नाम पर ढोल बजाने वाले मुसलमान धर्मगुरु और नेताओं के तो गले ही सूख गए। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर थी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का इस निर्णय के विरोध में उतरना प्रत्याशित था। देश को झटका तो तब लगा जब उस समय की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम बोर्ड के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। शाहबानो अदालतों में तो जीत गई पर सरकार के सामने हार गई।
शाहबानो निर्णय से तत्कालीन ...
 राजीव के करीबी रहे एम.जे.अकबर ने
शाहबानो निर्णय को बदलवाने में निर्णायक भूमिका
वाले आज भाजपा में रहते असहाय रहे 
जब सात सालों की कठिन कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद मुस्लिम समाज का विरोध इस कदर बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया था, और इस अधिनियम ने मुस्लिम महिलाओं से गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अदालत के दरवाजे पर जाने का अधिकार भी छीन लिया। राजीव गांधी सरकार का यह अधिनियम, मानो मुस्लिम पर्सनल लॉ का फोटोकॉपी था।
राजीव गांधी चाहते तो अपने राजनैतिक लाभ और वोट बैंक के दलदल से ऊपर उठ कर, पुराने कायदों को पीछे छोड़कर, एक अच्छा फैंसला ले सकते थे। लेकिन शायद उन्हें वोट बैंक की ज़्यादा टेंशन थी। करीब तीन दशक बाद, इस गलती को एनडीए सरकार ने सुधारा। 1975 में अपना संघर्ष शुरू करने वाली शाहबानो की असल जीत मानों 2019 में हुई हो। ये किस्सा हमारे आगे कई सवाल खड़े कर देता है…
  • क्या कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता का टैग लगाने योग्य है?
  • इंसाफ और धर्म में एक सरकार के लिए क्या ऊपर होना चाहिए?
  • क्या 62 साल की महिला और बच्चों को गुजारा भत्ता ना देना किसी धर्म/मजहब के खिलाफ हो सकता है?
CalcutaQuranPetition.jpgइस कानून के चलते शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया गया। यहाँ से खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत हुई थी और आज ये हाल हैं कि राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस आज खुद को कट्टर हिन्दू साबित करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है।
कुरान के विरुद्ध आए निर्णय को भी निरस्त किया 
31 जुलाई 1986 को कुरान की लगभग 24 आयतों के कारण दिल्ली की अदालत द्वारा आए निर्णय को भी निरस्त कर कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति का प्रमाण दिया। जिसका खामियाजा कांग्रेस को इतना भारी पड़ रहा है कि तब से लेकर आज तक कांग्रेस निरन्तर नीचे जा रही है। अब तो यह स्थिति हो गयी है कि आने वाले समय में कब पाताललोक सिधार जाए, कह नहीं सकते। दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि राजीव युग में ही कांग्रेस के पतन की गाथा लिख दी गयी थी। 
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कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा
इन सबसे हटकर उस किस्से को तो शायद ही कभी यह देश भूल सकेगा, जब राजीव गाँधी ने भारत की सुरक्षा में तैनात आईएनएस विराट को अपने परिवार और इटली के ससुरालवालों की मौज मस्ती में लगा दिया था। समुद्र के बीचों-बीच 10 दिन तक मौज काटी थी। यह इस बात का बहुत छोटा सा सबूत था कि गाँधी परिवार इस देश की हर सम्पदा पर अपना पहला हक़ समझता आया था। यह सब तब घटित हो रहा था, जब दरबारी मीडिया, दरबारी विचारक और दरबारी इतिहासकार इन्हीं राजीव गाँधी को इक्कीसवीं सदी का वास्तुकार साबित करने के हर प्रयास कर रहे थे।

राजीव गांधी फाउंडेशन : चीन, जाकिर नायक और फरार मेहुल चोकसी से भी मिला था दान

राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर एक और खुलासा हुआ है। भारत स्थित चीनी दूतावास, चीन सरकार, जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF), मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ करोंड़ों रुपये के घोटाले में फरार मेहुल चोकसी ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन को दान दिया था। पंजाब नेशनल बैंक को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगाकर देश से फरार हुए हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी ने राजीव गांधी फाउंडेशन को ये दान अपनी कंपनी नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के जरिए दिया था। चोकसी ने एंटिगुआ और बारबुडा की नागरिकता ले रखी है। चोकसी और उसका भांजा नीरव मोदी 13,500 करोड़ रुपये के पीएनबी धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी है।
इसका खुलासा करते हुए टाइम्स नाउ ने यह भी कहा कि चीन सरकार की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा वित्त पोषित चाइना एसोसिएशन फॉर इंटरनेशनल फ्रेंडली कॉन्टैक्ट (CAIFC) ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन को वित्तीय सहायता दी थी। एफबीआई CAIFC  पर नजर रख रहा था और यूएस-चीन इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन की एक रिपोर्ट में अमेरिकी कांग्रेस में कहा गया था कि वह विदेशों में जासूसी गतिविधियों में शामिल था।
7 मंत्रालय और 11 पीएसयू ने भी दिए दान
ऑपइंडिया की खबर के अनुसार कई सरकारी उपक्रमों ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन में दान किया था। इनमें गृह मंत्रालय समेत 7 मंत्रालय और 11 बड़े सार्वजानिक उपक्रम भी शामिल थे। यह सब दान तब किए गए जब देश में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उस समय यूपीए की चेयरपर्सन थीं।

दान देने वाले मंत्रालय और सरकारी विभाग-
*गृह मंत्रालय
*प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय, मानव संसाधन मंत्रालय
*स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
*पर्यावरण और वन मंत्रालय 
*लघु उद्योग मंत्रालय
*राष्ट्रीय स्वरोजगार मिशन, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा एक परियोजना
*महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा सबला

दान देने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
*एलआईसी
*सेल
*गेल (इंडिया) लिमिटेड
*ऑयल इंडिया लिमिटेड
*ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स
*स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
*बैंक ऑफ महाराष्ट्र
*आवास और शहरी विकास निगम लिमिटेड
*ओएनजीसी
*आईडीबीआई बैंक
*भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से मिला दान
यूपीए सरकार के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिए गए दान के खुलासे ने भी कांग्रेस के चेहरे से नकाब हटा दिया है। कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) का गलत इस्तेमाल किया। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड से राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसा दान किया गया। यह पैसा उस समय दान किया गया, जब सोनिया गांधी पीएमएनआरएफ के बोर्ड में भी थीं और आरजीएफ की अध्यक्ष भी थीं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, ‘संकट में लोगों की मदद करने के लिए बना पीएमएनआरएफ, यूपीए के कार्यकाल में राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसे दान कर रहा था। पीएमएनआरएफ बोर्ड में कौन बैठा? सोनिया गांधी। राजीव गांधी फाउंडेशन की अध्यक्षता कौन करता है? सोनिया गांधी। यह पूरी तरह से निंदनीय है।’

आरोप का आधार क्या?
बीजेपी अध्यक्ष नड्डा ने 2005-2006 और 2007-2008 में राजीव गांधी फाउंडेशन को दान देने वालों की लिस्ट शेयर की हैं, इनमें प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड का भी नाम है।



राजीव गांधी फाउंडेशन क्या है?
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए 21 जून 1991 को सोनिया गांधी ने इसकी शुरुआत की थी। सोनिया गांधी राजीव गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। इस फाउंडेशन में सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी, बेटी प्रियंका वाड्रा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा पी. चिदंबरम ट्रस्टी हैं।

कांग्रेस ने चीन से भी ली रिश्वत 
इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया था कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन ने पैसे दिए। उन्होंने पूछा था कि कांग्रेस ये बताए की ये प्रेम कैसे बढ़ गया। इनके कार्यकाल में चीन हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया। कांग्रेस स्पष्ट करे कि इस डोनेशन के लिए क्या सरकार से मंजूरी ली गई थी? गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ झड़प के बीच इस खुलासा से सनसनी फैल गई है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को दान के नाम पर चीन से काफी ज्यादा वित्तीय मदद मिली थी। 

राजीव गांधी फाउंडेशन की वार्षिक रिपोर्ट 2005-06 में भी कहा गया है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को पीपुल रिपब्लिक ऑफ चाइना के दूतावास से फंडिंग हुई है।
कांग्रेस के थिंक-टैंक ने की FTA की पैरवी, व्यापार घाटा 33 गुणा बढ़ा
राजीव गांधी फाउंडेशन ने चीन के साथ एफटीए की पैरवी की, जिसके बाद 2003-04 और 2013-14 के बीच व्यापार घाटा 33 गुणा बढ़ गया। इसके अलावा 2008 में कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के बीच  एमओयू का राजीव गांधी फाउंडेशन के साथ संबंध को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चीन से साथ सीमा विवाद के समय कांग्रेस के नरम रवैये को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि कहीं इसका कारण यहीं तो नहीं है।