Showing posts with label bofors. Show all posts
Showing posts with label bofors. Show all posts

राजीव गाँधी जन्मदिन पर विशेष : प्रस्तुत है भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की माला

Rajiv Gandhi Profiles। राजीव गांधी : भारत के ...
                                                                                                        साभार 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पिछले कुछ सालों में राहुल गाँधी और अब उनकी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा भी केंद्र सरकार पर हर प्रकार के घोटालों के आरोप लगाते नजर आए हैं। इसके लिए उन्होंने कभी द हिन्दू अखबार की फर्जी कतरनों का सहारा लिया तो कभी चुनावी रैलियों में मनगढ़ंत आँकड़ों के जरिए एक ही झूठ को कई बार दोहरा कर यह साबित करने का प्रयास किया कि राहुल गाँधी के पिता राजीव के कार्यकाल और उसी तरह UPA के दागदार राजनीतिक सफर की तरह ही नरेंद्र मोदी सरकार में भी घोटाले हुए हैं।
इस कड़ी में राहुल गाँधी और उनकी बहन को कभी सुप्रीम कोर्ट से लताड़ लगी तो कभी उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ इन खुले झूठों को बेचने की कीमत आम चुनावों में भारी हार के साथ चुकानी पड़ी।
अगस्त 20, 1944 को, आज ही के दिन पैदा हुए राजीव गाँधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गाँधी की उम्र तब महज 40 साल थी और भारत के प्रधानमंत्री पद पर अक्टूबर 31, 1984 से दिसंबर 01, 1989 तक आसीन रहे।
राजीव गाँधी कंप्यूटर लाये” – आखिर ...राजीव गांधी : मिस्टर क्लीन या मिस्टर ...
देशभक्ति मात्र एक दिखावा 
कांग्रेस और इसके समर्थकों द्वारा कहा जाता है कि परिवार ने देश के लिए जानें दी हैं। परन्तु जब राजीव की ओर देखने पर ज्ञात होता है कि इंडो-पाक युद्ध के दौरान इन्हे ड्यूटी पर रहने की बजाए इटली में विवाहित आनंद विभोर होने चले गए थे। जबकि नियम है की "युद्ध के दौरान हर एयरलाइन का पायलट 24-घंटे ड्यूटी पर रहेगा, लेकिन देशभक्त राजीव गाँधी भारत से ही गायब थे।  
राजीव गाँधी के राजनीतिक जीवन कई प्रकार से दागदार रहा, इसमें सबसे बड़ी वजह एक बोफोर्स घोटाला और भोपाल गैस त्रासदी से लेकर कश्मीरी पंडितों का पलायन है। इसके साथ ही कोरोना काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन के अंतर्गत किए गए घोटाले दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गाँधी के करियर में एक और अध्याय जोड़ते हैं।
राजीव गाँधी का प्रधानमंत्री रहते घोटालों और विवादों से निरंतर ही करीबी सम्बन्ध रहा। इन पर एक नजर डालते हैं –
कश्मीरी पंडितों का पलायन  
केंद्र में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान ही जेकेएलएफ के आतंकियों ने कश्मीरी हिंदूओं पर हमले शुरू कर दिए थे। जगमोहन की तैनाती राज्यपाल के तौर पर जनवरी 19, 1990 को हुई। लेकिन इससे पहले और जगमोहन के शुरूआती दिनों में हालात काबू से बाहर आ चुके थे।
सितंबर 14, 1989 को पंडित टीकालाल टपलू की हत्या कर दी गई जो कि कश्मीर घाटी के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। आतंकियों ने सबसे पहले उन्हें निशाना बनाकर अपने इरादे साफ कर दिए थे। इस हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद ही जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी।
घाटी में गवर्नर का शासन मार्च, 1986 में दूसरी बार तब लागू किया गया था, जब कॉन्ग्रेस ने गुलाम मोहम्मद शाह से समर्थन वापस ले लिया था। उस दौरान फारूक-राजीव समझौते पर काम चल रहा था और इस पर मुहर लगने और हस्ताक्षर होने के बाद फारूक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए।
1987 का विधानसभा चुनाव, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस द्वारा संयुक्त रूप से लड़ा गया। कश्मीर के इतिहास में खुले धाँधली के आरोपों के साथ सबसे बड़ी धोखाधड़ी के रूप में इसे याद रखा गया। यही वो समय था, जब उग्रवाद के साथ कश्मीर का रिश्ता गहरा होता चला गया। 1987 के इस ‘फारूक-राजीव एकॉर्ड’ के बाद कश्मीर हमेशा के लिए बारूद के ढेर पर बैठ गया और कश्मीरी पंडितों का नारकीय जीवन शुरू हो गया।
घोटालों में फंसा नेहरु गांधी परिवार ...
बोफोर्स घोटाला 
एक चुनावी रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती में पीएम मोदी ने कहा था, ”आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था। गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन… मिस्टर क्लीन चला था। लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।”
मोदी का इशारा राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी और उनके बोफोर्स घोटालों में सम्बन्ध की ओर ही था। इस घोटाले ने 1980 और 1990 के दशक में गाँधी परिवार और ख़ासकर तब प्रधानमंत्री रहे राजीव गाँधी की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया था।
बोफोर्स घोटाले ने राजीव गाँधी की मौत के कई साल बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। इस घोटाले में आरोप थे कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने कमीशन के बतौर 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे, ताकि वो भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉविट्ज़र तोपें बेच सकें।
बाद में राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी पर भी बोफ़ोर्स तोप सौदे के मामले में आरोप लगे थे, जब इस सौदे में बिचौलिया बने इटली के कारोबारी और गाँधी परिवार के क़रीबी ओतावियो क्वात्रोची का नाम सामने आया तो वह अर्जेंटिना भाग गया।
यूपीए सरकार के दौरान साल 2009 की शुरुआत तक भारत को आपराधिक मामलों में ओतावियो क्वात्रोची की तलाश थी, लेकिन अप्रैल 28, 2009 को सीबीआई ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देते हुए इंटरपोल से उस पर जारी रेडकॉर्नर नोटिस को हटा लेने की अपील की। सीबीआई की अपील पर इंटरपोल ने क्वात्रोची पर से रेडकॉर्नर हटा लिया गया। तब भाजपा ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देने के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ बताया था। 2013 में मिलान में उसकी मौत की खबरें सामने आईं थीं।
भोपाल गैस त्रासदी : 35 साल बाद भी ...
भोपाल गैस त्रासदी 25 हज़ार लोगों के कातिल को भगाया 
भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे।
2-3 दिसंबर, 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की कंपनी से जानलेवा गैस लीक होने से हजारों लोगों की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी।
अब तक अनुमान है कि तकरीबन 25,000 लोगों की इस गैस संबंधी बीमारी से मौत हो चुकी है। जबकि, हजारों लोग आज भी पीड़ित हैं। इस कंपनी के मालिक वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने सरकारी प्लेन में बैठाकर सुरक्षित भोपाल से दिल्ली पहुँचाया, जहाँ से उसे अमेरिका जाने दिया गया।
इस त्रासदी पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर कन्हैयालाल नंदन ने ‘मोहे कहाँ विश्राम’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें कहा गया कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। भगौड़े एंडरसन को भारत सरकार कभी दुबारा भारत वापस ला पाने में नाकामयाब रही और 92 साल की उम्र में सितंबर 29, 2014 को अमेरिका के फ्लोरिडा में एंडरसन की मौत हो गई।
Rajiv Gandhi Quotes: राजीव गांधी के 10 अनमोल ...सिखों के नरसंहार को ठहराया था उचित 
भारत में सबसे बड़े दंगे (नरसंहार ही था वो) को सरकारी छूट देने का आरोप राजीव गाँधी पर ही है। अक्टूबर 31, 1984 को इंदिरा गाँधी की हत्या के अगले दिन से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में भयानक सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।
नवंबर 19, 1984 को इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों की भीड़ के सामने सिखों के क़त्ल को जायज ठहराते हुए बयान दिया था, “जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।”
राजीव गाँधी ने इन दंगों का शिकार हुए हज़ारों सिखों पर कोई टिपण्णी ना करते हुए उनके घावों को कुरेदने वाला यह बयान दिया था जो आज तक भी गाँधी परिवार की प्राथमिकताओं को बेनकाब करने के लिए काफी है।
News on rajiv gandhi and sonia gandhi love story, all latest ...सरकार 1 रूपया भेजती है, जनता तक 15 पैसे पहुँचते हैं 
भ्रष्टाचार और घोटालों पर राजीव गाँधी के विचार क्या थे, इस बात का अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस बात से भी कोई ख़ास समस्या नहीं थी कि यदि केंद्र द्वारा 1 रुपया भेजा जाता है तो आम आदमी तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।
यानि सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार स्वीकार करने पर भी कोई कार्यवाही नहीं की। दूसरे, अर्थों में सरकार और पार्टी के भ्रष्ट होने की बात स्वीकार की। अपने जीवनकाल में शायद यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि 85 पैसे कौन खा रहा है? 
यह वर्ष 1985 की बात है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी सूखा प्रभावित ओडिशा के कालाहाँडी जिले में दौरे पर थे। यहाँ उन्होंने भ्रष्टाचार पर बात करते हुए कहा था कि सरकार जब भी 1 रुपया खर्च करती है तो लोगों तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने में असमर्थता जताते हुए राजीव ने अपने उस भाषण में कहा था कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है, जिसे दिल्ली से बैठकर दूर नहीं किया जा सकता।
विजय महाजन को राजीव गांधी फाउंडेशन ...राजीव गाँधी फाउंडेशन घोटाला 
राजीव गाँधी का घोटालों के साथ रिश्ता उनकी मौत के इतने वर्ष बाद भी जीवित नजर आता है। ऐसे समय में जब देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा था और भारतीय सेना लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना के साथ संघर्षरत थी, राजीव गाँधी फाउंडेशन द्वारा किए गए घोटाले चर्चा का विषय बन गए। ख़ास बात यह रही कि यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गाँधी परिवार के माँ-बेटा और बेटी की नजर PM CARES फंड पर टिकी हुई थी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार से फंड लेकर चीन के पक्ष में लॉबिग करने का मामला भी सामने आया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री राहत कोष फंड (PMNRF) को राजीव गाँधी फाउंडेशन में ट्रांसफर करने भी खुलासा भी हुआ। साथ ही पता चला कि UPA के दौरान कई मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की ओर से भी राजीव गाँधी फाउंडेशन में पैसे ट्रांसफर किए गए। इन सभी खुलासों के बाद गृह मंत्रालय ने एक कमिटी का गठन किया है।
शाहबानो केस एक ऐसा मामला है जिसने ...शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय को निरस्त किया 
राजीव गाँधी के करियर में तमाम घोटालों के अलावा दंगे और सबसे अहम शाहबानो प्रकरण शामिल हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 1985 को अंतिम निर्णय सुनाया,जिसके अनुसार खान साहब को शाहबानो को प्रति मास 500 रुपए गुज़ारा भत्ता देना होगा। इस फैंसले को सुन कर देश में शरीयत के नाम पर ढोल बजाने वाले मुसलमान धर्मगुरु और नेताओं के तो गले ही सूख गए। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर थी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का इस निर्णय के विरोध में उतरना प्रत्याशित था। देश को झटका तो तब लगा जब उस समय की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम बोर्ड के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। शाहबानो अदालतों में तो जीत गई पर सरकार के सामने हार गई।
शाहबानो निर्णय से तत्कालीन ...
 राजीव के करीबी रहे एम.जे.अकबर ने
शाहबानो निर्णय को बदलवाने में निर्णायक भूमिका
वाले आज भाजपा में रहते असहाय रहे 
जब सात सालों की कठिन कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद मुस्लिम समाज का विरोध इस कदर बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया था, और इस अधिनियम ने मुस्लिम महिलाओं से गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अदालत के दरवाजे पर जाने का अधिकार भी छीन लिया। राजीव गांधी सरकार का यह अधिनियम, मानो मुस्लिम पर्सनल लॉ का फोटोकॉपी था।
राजीव गांधी चाहते तो अपने राजनैतिक लाभ और वोट बैंक के दलदल से ऊपर उठ कर, पुराने कायदों को पीछे छोड़कर, एक अच्छा फैंसला ले सकते थे। लेकिन शायद उन्हें वोट बैंक की ज़्यादा टेंशन थी। करीब तीन दशक बाद, इस गलती को एनडीए सरकार ने सुधारा। 1975 में अपना संघर्ष शुरू करने वाली शाहबानो की असल जीत मानों 2019 में हुई हो। ये किस्सा हमारे आगे कई सवाल खड़े कर देता है…
  • क्या कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता का टैग लगाने योग्य है?
  • इंसाफ और धर्म में एक सरकार के लिए क्या ऊपर होना चाहिए?
  • क्या 62 साल की महिला और बच्चों को गुजारा भत्ता ना देना किसी धर्म/मजहब के खिलाफ हो सकता है?
CalcutaQuranPetition.jpgइस कानून के चलते शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया गया। यहाँ से खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत हुई थी और आज ये हाल हैं कि राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस आज खुद को कट्टर हिन्दू साबित करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है।
कुरान के विरुद्ध आए निर्णय को भी निरस्त किया 
31 जुलाई 1986 को कुरान की लगभग 24 आयतों के कारण दिल्ली की अदालत द्वारा आए निर्णय को भी निरस्त कर कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति का प्रमाण दिया। जिसका खामियाजा कांग्रेस को इतना भारी पड़ रहा है कि तब से लेकर आज तक कांग्रेस निरन्तर नीचे जा रही है। अब तो यह स्थिति हो गयी है कि आने वाले समय में कब पाताललोक सिधार जाए, कह नहीं सकते। दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि राजीव युग में ही कांग्रेस के पतन की गाथा लिख दी गयी थी। 
SANATANGYANPEETH.IN
कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा
इन सबसे हटकर उस किस्से को तो शायद ही कभी यह देश भूल सकेगा, जब राजीव गाँधी ने भारत की सुरक्षा में तैनात आईएनएस विराट को अपने परिवार और इटली के ससुरालवालों की मौज मस्ती में लगा दिया था। समुद्र के बीचों-बीच 10 दिन तक मौज काटी थी। यह इस बात का बहुत छोटा सा सबूत था कि गाँधी परिवार इस देश की हर सम्पदा पर अपना पहला हक़ समझता आया था। यह सब तब घटित हो रहा था, जब दरबारी मीडिया, दरबारी विचारक और दरबारी इतिहासकार इन्हीं राजीव गाँधी को इक्कीसवीं सदी का वास्तुकार साबित करने के हर प्रयास कर रहे थे।

भ्रष्टाचार और घोटालों की खान है कांग्रेस पार्टी

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
चुनावी दंगल में आरोप-प्रत्यारोप लगाना कोई नई बात नहीं। लेकिन उन आरोप-प्रत्यारोपों का आधार होना चाहिए। कांग्रेस समेत जितने भी मोदी विरोधी है, 2002 गुजरात दंगों के बाद से नरेन्द्र मोदी को "मौत का सौदागर", "खून का दलाल", "चाय वाला", "नीच", "चौकीदार चोर" आदि न जाने कितने उपनामों से अलंकृत करते रहे, बाबरी मस्जिद की बात कर ध्रुवीकरण करते रहे, लेकिन तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कभी चुनाव आयोग तो क्या किसी भी चुनावी रैली तक में इसका विरोध नहीं किया। परन्तु जबसे मोदी-योगी-अमित ने पार्टी की बागडोर सम्भाली है, हर आरोप का मुँह तोड़ जवाब दिया जा रहा है, जिस कारण समस्त विरोधी खेमे में कोहराम मचा हुआ है।
मोदी विरोधी राष्ट्र को बताएँ कि 2002 का दंगा कितने दिन चला और इससे पूर्व हुए दंगे कितने दिन? उनकी चर्चा क्यों नहीं करते? लेकिन 2002 दंगे के लिए मोदी को इसलिए कोसते हैं कि मोदी ने केवल दंगे के दोषियों और ट्रेन में 56 कारसेवकों को जलाकर मारने को ही पकड़ा, किसी निर्दोष को नहीं। फिर अखिलेश यादव के कार्यकाल में मुज़फ्फरनगर दंगा हुआ, इसकी चर्चा क्यों नहीं होती? क्योकि ये दंगा सरकार की छत्रसाया में हिन्दुओं के विरुद्ध था, लेकिन जब आर्मी द्वारा इनके वोट बैंक से AK-47 बरामद होने लगी, क्यों तलाशी अभियान रुकवा गया था? उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को मुज़फ्फरनगर दंगे की फाइल को खोलकर, दोषियों को जेल भेजना चाहिए। तीसरे, स्वतन्त्र भारत का शायद सबसे भयंकर दंगा जिसमे महात्मा गाँधी की हत्या उपरान्त चितपावन ब्राह्मणों का बड़ी बेदर्दी से नरसंहार किया गया था, 1984 के दंगों की तो जाँच हो सकती है, परन्तु उस नरसंहार पर आज तक सब चुप्पी साधे हुए हैं, क्यों?     
लोकसभा चुनाव 2019 के लगभग अन्तिम पड़ाव पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार में लिप्त राहुल गाँधी के पिताश्री राजीव गाँधी का बोफोर्स घोटाले में नाम लेते ही चुनाव आयोग से शिकायत करने पहुँच गए। जबकि राजीव गाँधी सरकार बोफोर्स घोटाले की भेंट चढ़ गयी थी।  
पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय 1957 में मूंदड़ा घोटाला हो, इंदिरा गांधी के समय 1973 में मारूति घोटाला, 60,000 रूपए का नागरवाला काण्ड, या फिर राजीव गांधी के समय में बोफोर्स घोटाला हो देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में कांग्रेस का हाथ रही है। डॉ मनमोहन सिंह के नाम पर पराकांतर से सरकार चलाने वाली सोनिया गांधी के समय तो बस घोटाला ही घोटाला रहा है। अगर कांग्रेस भ्रष्टाचार की जननी है तो निश्चित रूप से राजीव गांधी संस्थागत भ्रष्टाचार के पिता हैं। क्योंकि वे अकेले प्रधानमंत्री है जिन्होंने केंद्र से चले एक रुपये में 85 पैसे गायब होने की बात जानते हुए भी कुछ नहीं किया। संस्थागत भ्रष्टाचार का इसे बड़ा और सबूत क्या हो सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके पूरे जीवनकाल को भ्रष्टाचार से लिप्त बताया तो इसमें झूठ क्या है।
यदि स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर पिछली यूपीए सरकार सहित, कांग्रेस कालखण्ड में हुए घोटालों में कांग्रेस ने देश के कितने धन को अपनी तिजोरी में भर लिया। कांग्रेस ने समझा था, मुग़ल आए भारत को लुटा, भारत की जनता को कोई फर्क नहीं, ब्रिटिशर्स आये लुटा फिर भी भारत वहीँ का वहीँ, तो तुम भी लूटो। कांग्रेस भूल गयी "आखिर बकरे की कब तक खैर मनाती, आ गयी छुरी के नीचे", यानि कांग्रेस की लूटमार जगजाहिर शुरू से थी, लेकिन सवाल था, "बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?" परन्तु मोदी-रूपी बिल्ली ने गले में आखिरकार घण्टी बांध ही दी। परिणामस्वरूप, गाँधी परिवार जमानत पर घूम रहा है।    
बोफोर्स घोटाला का दाग 
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आज भी बोफोर्स घोटाले का दाग है। यह वही घोटाला है जिसके माध्यम से राजीव गांधी ने देश में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दिया था। जिस दलाली को देश में एक अनाचार के रूप में देखा जाता था उसे राजीव गांधी सरकार ने महिमामंडित कर दिया। राजीव गांधी ने घूस को डील का भाग बना दिया। तभी तो 1437 करोड़ रुपये के बोफोर्स तोप के सौदे के लिए बोफोर्स कंपनी ने भारत के नेताओं से लेकर अधिकारियों को 1.42 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी थी। खास बात है कि कंपनी ने इस सौदे के कमीशन के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उसके परिवार को 64 करोड़ रुपये दिए थे। इसी सौदे में इटली के करोबारी ओतावियो क्वात्रोची का नाम सामने आया था। जिसे बाद में साजिश के तहत देश से भगा दिया गया।
वैसे उस समय यह भी चर्चा थी, कि राजीव ने बोफोर्स में मिली रिश्वत का बड़ा भाग नेशनल हेराल्ड की आर्थिक स्थिति को सुधारने में लगाया था। उस समय दैनिक के कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिलता था। प्रिन्टिंग इतनी शोचनीय थी कि एक कॉलम की लाइन दूसरे कॉलम में दूसरे की तीसरे में आदि। कमीशन के मिले धन से खानदानी दैनिक की आर्थिक स्थिति में सुधार किया। कर्मचारियों को निश्चित समय पर वेतन मिलना शुरू हो गया। लेकिन राजीव की मृत्यु के बाद किसी ने खानदानी दैनिक की चिन्ता करने की बजाए केवल अपनी तिजोरियों को भरने में व्यस्त हो गए। परिणामस्वरूप दिल्ली से नेशनल हेराल्ड नदारत हो गया। शायद बेरोजगार हुए लगभग 400/500 कर्मचारियों की बददुआ रंग ला रही है कि कांग्रेस तभी से निरन्तर धरातल में समां रही है। ठीक यही स्थिति कम्युनिस्टों की भी है। सोवियत यूनियन के विभाजन होने पर जबसे Patriot, अंग्रेजी दैनिक बंद हुआ है, वामपंथी केवल दो/तीन राज्यों में सिमट गयी, बल्कि अब तो वहाँ से भी पार्टी का सफाया होने के कगार पर है।  
भोपाल गैस कांड के आरोपी को भी देश से भगाया 
ये वही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे जिन पर भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी एंडरसन को भगाया था। यह खुलासा किसी और ने नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा उनके निकट के सहयोगी रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी किताब में किया था। भोपाल गैंस कांड के दंश को आज भी वहां के लोगों ने भूला नहीं है।
देश में सिख दंगा के दौरान होने दिया सबसे बड़ा नरसंहार 
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में जब आतताइयों ने सिखों को खिलाफ दंगा के नाम पर उनका नरसंहार करना शुरू किया उस समय राजीव गांधी ही देश के प्रधानमंत्री थे। लेकिन दंगा को रोकने के उपाय करने की बजाय उन्होंने आतताइयों को ही उकसाने वाला बयान दे दिया। सभी को याद है, उन्होंने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। उनके इस बयान के बाद तो देश के सिखों पर खासकर दिल्ली में तो कयामत आ गई थी।
अवलोकन करें:-
इस वेबसाइट का परिचय

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार गाँधी परिवार अपने आपको देश का बहुत बड़ा हितैषी और देशभक्त बताता है। 1971 के युद्ध को कांग.....



इस वेबसाइट का परिचय

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार इन दिनों बॉलीवुड भी पूरी तरह से चुनाव के मौसम और राजनीति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। ज...



इस वेबसाइट का परिचय

NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
. आर.बी. एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अटल बिहारी वाजपॆयी जी को राजनीति में ’अजात शत्रु’ कहतें हैं। अपनी समभाव के लिये जान.....

इस वेबसाइट का परिचय

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा .....

इस वेबसाइट का परिचय

NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 1951 में पहली बार देश की पहली लोकसभा के लिए चुनाव कराए गए।489 संसदीय सीटों पर अपनी किस्‍मत ....


राजीव गांधी पर पहली बार नहीं उठे हैं सवाल 
राजीव गांधी देश के एक ऐसे इकलौता प्रधानमंत्री हुए जिन्हें राजशाही की तरह प्रधानमंत्री मां इंदिरा गांधी के निधन पर राजगद्दी के रूप में प्रधानमंत्री का पद मिल गया। उन पर तो यह भी सवाल उठता रहा है कि पायलट होने के बाद भी उन्होंने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में कोई योगदान क्यों नहीं किया? आखिर क्यों नहीं राजीव गांधी ने जीते जी खुद पर उठे इन सवालों का जवाब दिया?