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राजीव गाँधी जन्मदिन पर विशेष : प्रस्तुत है भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की माला

Rajiv Gandhi Profiles। राजीव गांधी : भारत के ...
                                                                                                        साभार 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पिछले कुछ सालों में राहुल गाँधी और अब उनकी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा भी केंद्र सरकार पर हर प्रकार के घोटालों के आरोप लगाते नजर आए हैं। इसके लिए उन्होंने कभी द हिन्दू अखबार की फर्जी कतरनों का सहारा लिया तो कभी चुनावी रैलियों में मनगढ़ंत आँकड़ों के जरिए एक ही झूठ को कई बार दोहरा कर यह साबित करने का प्रयास किया कि राहुल गाँधी के पिता राजीव के कार्यकाल और उसी तरह UPA के दागदार राजनीतिक सफर की तरह ही नरेंद्र मोदी सरकार में भी घोटाले हुए हैं।
इस कड़ी में राहुल गाँधी और उनकी बहन को कभी सुप्रीम कोर्ट से लताड़ लगी तो कभी उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ इन खुले झूठों को बेचने की कीमत आम चुनावों में भारी हार के साथ चुकानी पड़ी।
अगस्त 20, 1944 को, आज ही के दिन पैदा हुए राजीव गाँधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गाँधी की उम्र तब महज 40 साल थी और भारत के प्रधानमंत्री पद पर अक्टूबर 31, 1984 से दिसंबर 01, 1989 तक आसीन रहे।
राजीव गाँधी कंप्यूटर लाये” – आखिर ...राजीव गांधी : मिस्टर क्लीन या मिस्टर ...
देशभक्ति मात्र एक दिखावा 
कांग्रेस और इसके समर्थकों द्वारा कहा जाता है कि परिवार ने देश के लिए जानें दी हैं। परन्तु जब राजीव की ओर देखने पर ज्ञात होता है कि इंडो-पाक युद्ध के दौरान इन्हे ड्यूटी पर रहने की बजाए इटली में विवाहित आनंद विभोर होने चले गए थे। जबकि नियम है की "युद्ध के दौरान हर एयरलाइन का पायलट 24-घंटे ड्यूटी पर रहेगा, लेकिन देशभक्त राजीव गाँधी भारत से ही गायब थे।  
राजीव गाँधी के राजनीतिक जीवन कई प्रकार से दागदार रहा, इसमें सबसे बड़ी वजह एक बोफोर्स घोटाला और भोपाल गैस त्रासदी से लेकर कश्मीरी पंडितों का पलायन है। इसके साथ ही कोरोना काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन के अंतर्गत किए गए घोटाले दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गाँधी के करियर में एक और अध्याय जोड़ते हैं।
राजीव गाँधी का प्रधानमंत्री रहते घोटालों और विवादों से निरंतर ही करीबी सम्बन्ध रहा। इन पर एक नजर डालते हैं –
कश्मीरी पंडितों का पलायन  
केंद्र में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान ही जेकेएलएफ के आतंकियों ने कश्मीरी हिंदूओं पर हमले शुरू कर दिए थे। जगमोहन की तैनाती राज्यपाल के तौर पर जनवरी 19, 1990 को हुई। लेकिन इससे पहले और जगमोहन के शुरूआती दिनों में हालात काबू से बाहर आ चुके थे।
सितंबर 14, 1989 को पंडित टीकालाल टपलू की हत्या कर दी गई जो कि कश्मीर घाटी के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। आतंकियों ने सबसे पहले उन्हें निशाना बनाकर अपने इरादे साफ कर दिए थे। इस हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद ही जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी।
घाटी में गवर्नर का शासन मार्च, 1986 में दूसरी बार तब लागू किया गया था, जब कॉन्ग्रेस ने गुलाम मोहम्मद शाह से समर्थन वापस ले लिया था। उस दौरान फारूक-राजीव समझौते पर काम चल रहा था और इस पर मुहर लगने और हस्ताक्षर होने के बाद फारूक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए।
1987 का विधानसभा चुनाव, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस द्वारा संयुक्त रूप से लड़ा गया। कश्मीर के इतिहास में खुले धाँधली के आरोपों के साथ सबसे बड़ी धोखाधड़ी के रूप में इसे याद रखा गया। यही वो समय था, जब उग्रवाद के साथ कश्मीर का रिश्ता गहरा होता चला गया। 1987 के इस ‘फारूक-राजीव एकॉर्ड’ के बाद कश्मीर हमेशा के लिए बारूद के ढेर पर बैठ गया और कश्मीरी पंडितों का नारकीय जीवन शुरू हो गया।
घोटालों में फंसा नेहरु गांधी परिवार ...
बोफोर्स घोटाला 
एक चुनावी रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती में पीएम मोदी ने कहा था, ”आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था। गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन… मिस्टर क्लीन चला था। लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।”
मोदी का इशारा राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी और उनके बोफोर्स घोटालों में सम्बन्ध की ओर ही था। इस घोटाले ने 1980 और 1990 के दशक में गाँधी परिवार और ख़ासकर तब प्रधानमंत्री रहे राजीव गाँधी की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया था।
बोफोर्स घोटाले ने राजीव गाँधी की मौत के कई साल बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। इस घोटाले में आरोप थे कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने कमीशन के बतौर 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे, ताकि वो भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉविट्ज़र तोपें बेच सकें।
बाद में राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी पर भी बोफ़ोर्स तोप सौदे के मामले में आरोप लगे थे, जब इस सौदे में बिचौलिया बने इटली के कारोबारी और गाँधी परिवार के क़रीबी ओतावियो क्वात्रोची का नाम सामने आया तो वह अर्जेंटिना भाग गया।
यूपीए सरकार के दौरान साल 2009 की शुरुआत तक भारत को आपराधिक मामलों में ओतावियो क्वात्रोची की तलाश थी, लेकिन अप्रैल 28, 2009 को सीबीआई ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देते हुए इंटरपोल से उस पर जारी रेडकॉर्नर नोटिस को हटा लेने की अपील की। सीबीआई की अपील पर इंटरपोल ने क्वात्रोची पर से रेडकॉर्नर हटा लिया गया। तब भाजपा ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देने के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ बताया था। 2013 में मिलान में उसकी मौत की खबरें सामने आईं थीं।
भोपाल गैस त्रासदी : 35 साल बाद भी ...
भोपाल गैस त्रासदी 25 हज़ार लोगों के कातिल को भगाया 
भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे।
2-3 दिसंबर, 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की कंपनी से जानलेवा गैस लीक होने से हजारों लोगों की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी।
अब तक अनुमान है कि तकरीबन 25,000 लोगों की इस गैस संबंधी बीमारी से मौत हो चुकी है। जबकि, हजारों लोग आज भी पीड़ित हैं। इस कंपनी के मालिक वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने सरकारी प्लेन में बैठाकर सुरक्षित भोपाल से दिल्ली पहुँचाया, जहाँ से उसे अमेरिका जाने दिया गया।
इस त्रासदी पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर कन्हैयालाल नंदन ने ‘मोहे कहाँ विश्राम’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें कहा गया कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। भगौड़े एंडरसन को भारत सरकार कभी दुबारा भारत वापस ला पाने में नाकामयाब रही और 92 साल की उम्र में सितंबर 29, 2014 को अमेरिका के फ्लोरिडा में एंडरसन की मौत हो गई।
Rajiv Gandhi Quotes: राजीव गांधी के 10 अनमोल ...सिखों के नरसंहार को ठहराया था उचित 
भारत में सबसे बड़े दंगे (नरसंहार ही था वो) को सरकारी छूट देने का आरोप राजीव गाँधी पर ही है। अक्टूबर 31, 1984 को इंदिरा गाँधी की हत्या के अगले दिन से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में भयानक सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।
नवंबर 19, 1984 को इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों की भीड़ के सामने सिखों के क़त्ल को जायज ठहराते हुए बयान दिया था, “जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।”
राजीव गाँधी ने इन दंगों का शिकार हुए हज़ारों सिखों पर कोई टिपण्णी ना करते हुए उनके घावों को कुरेदने वाला यह बयान दिया था जो आज तक भी गाँधी परिवार की प्राथमिकताओं को बेनकाब करने के लिए काफी है।
News on rajiv gandhi and sonia gandhi love story, all latest ...सरकार 1 रूपया भेजती है, जनता तक 15 पैसे पहुँचते हैं 
भ्रष्टाचार और घोटालों पर राजीव गाँधी के विचार क्या थे, इस बात का अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस बात से भी कोई ख़ास समस्या नहीं थी कि यदि केंद्र द्वारा 1 रुपया भेजा जाता है तो आम आदमी तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।
यानि सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार स्वीकार करने पर भी कोई कार्यवाही नहीं की। दूसरे, अर्थों में सरकार और पार्टी के भ्रष्ट होने की बात स्वीकार की। अपने जीवनकाल में शायद यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि 85 पैसे कौन खा रहा है? 
यह वर्ष 1985 की बात है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी सूखा प्रभावित ओडिशा के कालाहाँडी जिले में दौरे पर थे। यहाँ उन्होंने भ्रष्टाचार पर बात करते हुए कहा था कि सरकार जब भी 1 रुपया खर्च करती है तो लोगों तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने में असमर्थता जताते हुए राजीव ने अपने उस भाषण में कहा था कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है, जिसे दिल्ली से बैठकर दूर नहीं किया जा सकता।
विजय महाजन को राजीव गांधी फाउंडेशन ...राजीव गाँधी फाउंडेशन घोटाला 
राजीव गाँधी का घोटालों के साथ रिश्ता उनकी मौत के इतने वर्ष बाद भी जीवित नजर आता है। ऐसे समय में जब देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा था और भारतीय सेना लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना के साथ संघर्षरत थी, राजीव गाँधी फाउंडेशन द्वारा किए गए घोटाले चर्चा का विषय बन गए। ख़ास बात यह रही कि यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गाँधी परिवार के माँ-बेटा और बेटी की नजर PM CARES फंड पर टिकी हुई थी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार से फंड लेकर चीन के पक्ष में लॉबिग करने का मामला भी सामने आया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री राहत कोष फंड (PMNRF) को राजीव गाँधी फाउंडेशन में ट्रांसफर करने भी खुलासा भी हुआ। साथ ही पता चला कि UPA के दौरान कई मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की ओर से भी राजीव गाँधी फाउंडेशन में पैसे ट्रांसफर किए गए। इन सभी खुलासों के बाद गृह मंत्रालय ने एक कमिटी का गठन किया है।
शाहबानो केस एक ऐसा मामला है जिसने ...शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट निर्णय को निरस्त किया 
राजीव गाँधी के करियर में तमाम घोटालों के अलावा दंगे और सबसे अहम शाहबानो प्रकरण शामिल हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 1985 को अंतिम निर्णय सुनाया,जिसके अनुसार खान साहब को शाहबानो को प्रति मास 500 रुपए गुज़ारा भत्ता देना होगा। इस फैंसले को सुन कर देश में शरीयत के नाम पर ढोल बजाने वाले मुसलमान धर्मगुरु और नेताओं के तो गले ही सूख गए। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर थी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का इस निर्णय के विरोध में उतरना प्रत्याशित था। देश को झटका तो तब लगा जब उस समय की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम बोर्ड के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। शाहबानो अदालतों में तो जीत गई पर सरकार के सामने हार गई।
शाहबानो निर्णय से तत्कालीन ...
 राजीव के करीबी रहे एम.जे.अकबर ने
शाहबानो निर्णय को बदलवाने में निर्णायक भूमिका
वाले आज भाजपा में रहते असहाय रहे 
जब सात सालों की कठिन कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद मुस्लिम समाज का विरोध इस कदर बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया था, और इस अधिनियम ने मुस्लिम महिलाओं से गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अदालत के दरवाजे पर जाने का अधिकार भी छीन लिया। राजीव गांधी सरकार का यह अधिनियम, मानो मुस्लिम पर्सनल लॉ का फोटोकॉपी था।
राजीव गांधी चाहते तो अपने राजनैतिक लाभ और वोट बैंक के दलदल से ऊपर उठ कर, पुराने कायदों को पीछे छोड़कर, एक अच्छा फैंसला ले सकते थे। लेकिन शायद उन्हें वोट बैंक की ज़्यादा टेंशन थी। करीब तीन दशक बाद, इस गलती को एनडीए सरकार ने सुधारा। 1975 में अपना संघर्ष शुरू करने वाली शाहबानो की असल जीत मानों 2019 में हुई हो। ये किस्सा हमारे आगे कई सवाल खड़े कर देता है…
  • क्या कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता का टैग लगाने योग्य है?
  • इंसाफ और धर्म में एक सरकार के लिए क्या ऊपर होना चाहिए?
  • क्या 62 साल की महिला और बच्चों को गुजारा भत्ता ना देना किसी धर्म/मजहब के खिलाफ हो सकता है?
CalcutaQuranPetition.jpgइस कानून के चलते शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया गया। यहाँ से खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत हुई थी और आज ये हाल हैं कि राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस आज खुद को कट्टर हिन्दू साबित करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है।
कुरान के विरुद्ध आए निर्णय को भी निरस्त किया 
31 जुलाई 1986 को कुरान की लगभग 24 आयतों के कारण दिल्ली की अदालत द्वारा आए निर्णय को भी निरस्त कर कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति का प्रमाण दिया। जिसका खामियाजा कांग्रेस को इतना भारी पड़ रहा है कि तब से लेकर आज तक कांग्रेस निरन्तर नीचे जा रही है। अब तो यह स्थिति हो गयी है कि आने वाले समय में कब पाताललोक सिधार जाए, कह नहीं सकते। दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि राजीव युग में ही कांग्रेस के पतन की गाथा लिख दी गयी थी। 
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कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा
इन सबसे हटकर उस किस्से को तो शायद ही कभी यह देश भूल सकेगा, जब राजीव गाँधी ने भारत की सुरक्षा में तैनात आईएनएस विराट को अपने परिवार और इटली के ससुरालवालों की मौज मस्ती में लगा दिया था। समुद्र के बीचों-बीच 10 दिन तक मौज काटी थी। यह इस बात का बहुत छोटा सा सबूत था कि गाँधी परिवार इस देश की हर सम्पदा पर अपना पहला हक़ समझता आया था। यह सब तब घटित हो रहा था, जब दरबारी मीडिया, दरबारी विचारक और दरबारी इतिहासकार इन्हीं राजीव गाँधी को इक्कीसवीं सदी का वास्तुकार साबित करने के हर प्रयास कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट का कांग्रेस से सवाल : कोई राजनीतिक पार्टी किसी देश के साथ समझौता कैसे कर सकती है?

सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच हुए समझौते पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठा दिया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि चीन के साथ कोई राजनीतिक पार्टी किसी ‘एमओयू’ पर हस्ताक्षर कैसे कर सकती है? कोर्ट ने कहा कि किसी विदेशी सरकार ने एक राजनीतिक पार्टी के साथ कोई करार किया हो, यह बात उसने कभी नहीं सुनी। कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन (CPC) के बीच सात अगस्त, 2008 को एक एमओयू पर दस्तखत हुआ। गलवान घाटी में चीन के साथ झड़प के बाद कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच हुए एमओयू की बात सामने आई थी। इस पर देश में काफी होहल्ला हुआ। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले हाईकोर्ट के पास ले जाने को कहा है।
गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ झड़प के बीच इस खुलासा से सनसनी फैल गई थी कि कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एमओयू के बाद राजीव गांधी फाउंडेशन को दान के नाम पर चीन से काफी ज्यादा वित्तीय मदद मिली थी।
राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन, जाकिर हुसैन के साथ फरार मेहुल चोकसी से भी मिला था दान
राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर हाल ही में एक बड़ा खुलासा हुआ। भारत स्थित चीनी दूतावास, चीन सरकार, जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF), मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ करोंड़ों रुपये के घोटाले में फरार मेहुल चोकसी ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन को दान दिया था। पंजाब नेशनल बैंक को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगाकर देश से फरार हुए हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी ने राजीव गांधी फाउंडेशन को ये दान अपनी कंपनी नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के जरिए दिया था। चोकसी ने एंटिगुआ और बारबुडा की नागरिकता ले रखी है। चोकसी और उसका भांजा नीरव मोदी 13,500 करोड़ रुपये के पीएनबी धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी है।

इसका खुलासा करते हुए टाइम्स नाउ ने यह भी कहा कि चीन सरकार की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा वित्त पोषित चाइना एसोसिएशन फॉर इंटरनेशनल फ्रेंडली कॉन्टैक्ट (CAIFC) ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन को वित्तीय सहायता दी थी। एफबीआई CAIFC  पर नजर रख रहा था और यूएस-चीन इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन की एक रिपोर्ट में अमेरिकी कांग्रेस में कहा गया था कि वह विदेशों में जासूसी गतिविधियों में शामिल था।
7 मंत्रालय और 11 पीएसयू ने भी दिए दान
कई सरकारी उपक्रमों ने भी राजीव गांधी फाउंडेशन में दान किया था। इनमें गृह मंत्रालय समेत 7 मंत्रालय और 11 बड़े सार्वजानिक उपक्रम भी शामिल थे। यह सब दान तब किए गए जब देश में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उस समय यूपीए की चेयरपर्सन थीं।

दान देने वाले मंत्रालय और सरकारी विभाग-
*गृह मंत्रालय
*प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय, मानव संसाधन मंत्रालय
*स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
*पर्यावरण और वन मंत्रालय 
*लघु उद्योग मंत्रालय
*राष्ट्रीय स्वरोजगार मिशन, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा एक परियोजना
*महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा सबला

दान देने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
*एलआईसी
*सेल
*गेल (इंडिया) लिमिटेड
*ऑयल इंडिया लिमिटेड
*ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स
*स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
*बैंक ऑफ महाराष्ट्र
*आवास और शहरी विकास निगम लिमिटेड
*ओएनजीसी
*आईडीबीआई बैंक
*भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से मिला दान
यूपीए सरकार के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिए गए दान के खुलासे ने भी कांग्रेस के चेहरे से नकाब हटा दिया। कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) का गलत इस्तेमाल किया। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड से राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसा दान किया गया। यह पैसा उस समय दान किया गया, जब सोनिया गांधी पीएमएनआरएफ के बोर्ड में भी थीं और आरजीएफ की अध्यक्ष भी थीं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, ‘संकट में लोगों की मदद करने के लिए बना पीएमएनआरएफ, यूपीए के कार्यकाल में राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसे दान कर रहा था। पीएमएनआरएफ बोर्ड में कौन बैठा? सोनिया गांधी। राजीव गांधी फाउंडेशन की अध्यक्षता कौन करता है? सोनिया गांधी। यह पूरी तरह से निंदनीय है।’

बीजेपी के आरोप का आधार क्या?
बीजेपी अध्यक्ष नड्डा ने 2005-2006 और 2007-2008 में राजीव गांधी फाउंडेशन को दान देने वालों की लिस्ट शेयर की, इनमें प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड का भी नाम है।


राजीव गांधी फाउंडेशन क्या है?
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए 21 जून 1991 को सोनिया गांधी ने इसकी शुरुआत की थी। सोनिया गांधी राजीव गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। इस फाउंडेशन में सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी, बेटी प्रियंका वाड्रा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा पी. चिदंबरम ट्रस्टी हैं।

कांग्रेस ने चीन से भी ली रिश्वत 
इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया था कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन ने पैसे दिए। उन्होंने पूछा था कि कांग्रेस ये बताए की ये प्रेम कैसे बढ़ गया। इनके कार्यकाल में चीन हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया। कांग्रेस स्पष्ट करे कि इस डोनेशन के लिए क्या सरकार से मंजूरी ली गई थी? 

राहुल के ट्वीट पर भाजपा का पलटवार, किया शाहीन बाग से लेकर चीन को बचाने तक का जिक्र

BJP chief JP Nadda said that One dynasty trying to destroy Prime ...
आखिर क्या कारण है कि देशहित और जनहित की दुहाई देने वाली कांग्रेस उलटे-पुल्टे बयानों से जनता को भ्रमित कर रही है। आतंकवाद को संरक्षण देकर, जनमानस के दिमाग में पाकिस्तान का एक डर बैठ गया था, उस डर को नेस्ताबूत कर पाकिस्तान को विश्व में अलग-थलग कर उसे आतंकवाद की आरामगाह सिद्ध करने में सफल होना कांग्रेस और इसके समर्थकों को रास नहीं आया। ठीक यही स्थिति चीन को लेकर है। 
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी को कोरोना संकट को लेकर केंद्र सरकार पर तंज कसना भारी पड़ा। राहुल के ट्वीट पर पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हीं के अंदाज में कटाक्ष किया। प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर कहा कि राहुल गांधी जी अपने पिछले 6 महीने की उपलब्धियों पर आप भी ध्यान दें…
फरवरी: शाहीन बाग और दंगे
मार्च: ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्य प्रदेश को गंवाना
अप्रैल: प्रवासी मजदूरों को उकसाना
मई: कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की छठी सालगिरह
जून: चीन का बचाव करना
जुलाई: राजस्थान में कांग्रेस पतन के कगार पर


जावड़ेकर ने एक के बाद एक ट्वीट करते हुए राहुल गांधी पर जमकर निशाना साधा। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि राहुल बाबा आप कोरोना के खिलाफ जंग में भारत की उपलब्धियां भी लिख लें। भारत में अमेरिका, यूरोप और ब्राजील की तुलना में सबसे कम औसत मामले, सक्रिय मामले और मृत्यु दर है। आपने मोमबत्तियां जलाने का मजाक उड़ाकर देशवासियों और कोरोना वारियर्स का अपमान किया है।

नड्डा ने भी लगाई फटकार
एक दिन पहले ही बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि एक खानदान वर्षों से पीएम मोदी को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। यह उनके लिए दुखद बात है कि पीएम मोदी का 130 करोड़ भारतीयों के साथ गहरा लगाव है। वे उनके लिए काम करते हैं और उन्हीं के लिए जीते हैं। जो उन्हें बर्बाद करना चाहते हैं, वो अपनी ही पार्टी को खत्म कर देंगे।


बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल के वीडियो मैसेज को एक बार फिर राहुल की असफल लॉन्चिंग बता डाला। उन्होंने कहा कि हमने एक और बार राहुल गांधी के रिलॉन्च का विफल संस्करण देखा। राहुल गांधी हमेशा की तरह तथ्यों पर कमजोर थे। रक्षा और विदेश नीति के मामलों का राजनीतिकरण किया जा रहा है। यह दिखाता है कि एक खानदान किस तरह 1962 के पाप को धोना चाहता है और भारत को कमजोर करने की हताशा को दर्शाता है।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने आरोप लगाया कि 1950 के दशक से ही चीन ने एक वंश में रणनीतिक निवेश किया है जिसने उन्हें लाभांश भी मिला है। 1962 में UNSC सीट छोड़ देना, यूपीए शासनकाल में चीन के हाथों जमीन खोना, 2008 में MoU साइन करना, राजीव गांधी फाउंडेशन को चंदा और अन्य इसके उदाहरण हैं।
नड्डा के आरोप लगाया कि चाहे डोकलाम का मामला हो या अभी राहुल गांधी का सेना पर विश्वास करने के बजाय चीन की ओर से दी गई जानकारी में ज्यादा दिलचस्पी रखना। क्यों एक खानदान भारत को कमजोर और चीन को मजबूत करनाना चाहता है? कांग्रेस के भी कई नेता ने एक वंश को नकार दिया है।

और कितना उठेगा गांधी परिवार के काले कारनामों का पर्दा?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस द्वारा किए घोटाले सुन-सुनकर जनता के कान पक गए हैं। चुनाव आने से पूर्व लगभग हर पार्टी कांग्रेस अथवा यूपीए घोटालों का झुनझुना लेकर बजाने लगती हैं, लेकिन चुनाव उपरांत परिणाम वही ढाक के तीन पात। 
दिल्ली सत्ता हथियाने आम आदमी पार्टी के "अरविन्द केजरीवाल तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विरुद्ध 370 आरोप लेकर नाच रहे थे, कहते थे शीला जेल जाएगी, क्या हुआ?" आज तक एक घोटाले की जाँच तो क्या नाम तक नहीं लिया और अब तो शीला दीक्षित स्वर्गवासी हो चुकी हैं। 
2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते थे कि "भ्रष्टाचारी जमानत पर बाहर हैं, जेल के दरवाजे तक पहुंचा दिया, बस दरवाजे की दूसरी तरफ भेजना है।" क्या हुआ बाबाजी का ढुल्लू। यदि इतने घोटाले किसी आम नागरिक अथवा अधिकारी ने किए होते, पता नहीं कब का जेल में पटक दिया होता। बस दामन बचाने के लिए लालू यादव जैसे को जेल भेज दिया, हो गया भ्रष्टाचार दूर, हो गयी भ्रष्टाचार पर कार्यवाही। मायावती, मुलायमसिंह, अखिलेश याद आएंगे उत्तर प्रदेश चुनावों में।  
यह सत्ता पक्ष पर आरोप नहीं, कटु सच्चाई है। भ्रष्टाचार का यह हाल है कि "कल जो काम 100 रूपए देकर होता था, आज 1000 रूपए में होता है। बिना रिश्वत दिए नगर निगम का भवन विभाग नक्शा पास नहीं करता। चलिए नक्शा पास हो गया, फिर ??।" यानि आम आदमी कहाँ-कहाँ रिश्वत से बचे। सब्जीवाला बिना रिश्वत दिए सड़क पर बैठ नहीं सकता। सीमेंट से भरे एक विक्रम टैम्पो 600 रूपए देता है। 
सरकार यदि भ्रष्टाचार पर गंभीर है तो सबसे पहले नेताओं की मोटी होती तिजोरियों, चुनावों में शराब और नोट बंटवारे पर लगाम लगानी होगी। अन्यथा जनता फ़िल्मी गीत "सपने सुहाने लड़कपन के...." याद रखे।   
खैर अब, राजीव गाँधी फाउंडेशन समेत 3 ट्रस्टों की फंडिंग को लेकर उपजे विवाद पर केंद्रीय गृह मंत्रालय सख्त है और अंतर-मंत्रालय जाँच बिठा दी गई है, जिससे गाँधी परिवार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। ख़ुद गृह मंत्रालय के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर के इस बात की सूचना दी गई है। ये कमिटी फाउंडेशन द्वारा ली गई फंडिंग और नियमों के उल्लंघन को लेकर जाँच करेगी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के डायरेक्टर इस कमिटी की अध्यक्षता करेंगे।
गृह मंत्रालय ने अपनी ट्वीट में कहा– “केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अंतर-मंत्रालय कमिटी का गठन किया है, जो राजीव गाँधी फाउंडेशन, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की जाँच करेगी।” गृह मंत्रालय द्वारा गठित कमिटी PMLA एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट और FCRA एक्ट के नियम-क़ानूनों के उल्लंघन के सम्बन्ध में जाँच करेगी, जिसके बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से फंडिंग मिलने का खुलासा होने के बाद हंगामा शुरू हो गया था। इस फाउंडेशन के शीर्ष अधिकारियों में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गाँधी के नाम शामिल हैं। 
भारती फाउंडेशन द्वारा गृह मंत्रालय को प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि इसे कतर फाउंडेशन एंडोमेंट से वित्त वर्ष 2018-19 में लगभग 14 करोड़ रुपए मिले थे। बता दें कि कतर फाउंडेशन एक प्राइवेट चैरिटी संस्थान है, जो पूर्व अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी और उनकी पत्नी शेखा मोझा बिंत नासिर द्वारा स्थापित किया गया था। कॉन्ग्रेस का यहूदी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के साथ भी काफी नजदीकी संबंध रहा है।


फाउंडेशन को पंजाब नेशनल बैंक में हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले के अभियुक्त मेहुल चोकसी से भी दान मिला था। उसने 2014-15 में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाले इस फाउंडेशन में अघोषित दान किया था। दान नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड (Naviraj Estates Private Limited) के नाम से किया गया था और मेहुल चोकसी इस कंपनी के निदेशकों में से एक है। इसके बाद से ही भाजपा इन आरोपों को लेकर हमलावर है।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय मूंदड़ा घोटाला हो, इंदिरा गांधी के समय मारूति घोटाला या फिर राजीव गांधी के समय में बोफोर्स घोटाला या सोनिया गांधी के समय डॉ मनमोहन सिंह के नाम पर घोटाला ही घोटाला। आजादी के बाद से ही देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में कांग्रेस आगे रही है। अपने स्वार्थ को साधने के लिए सत्ता का कैसे दुरुपयोग हो सकता है, ये कांग्रेस सरकारों की करतूतों से सामने आता रहा है। सत्ता का दुरुपयोग का ही एक मामला हाल में सामने आया है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से पैसा दिया गया था। इसके साथ ही कई सरकारी कंपनियों पर भी पैसा देने के लिए दवाब बनाया गया था। इतना ही नहीं राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से फंडिंग मिलती थी। इस सबका खुलासा होने के बाद गृह मंत्रालय ने एक अंतरमंत्रालय कमेटी बनाई है। अंतरमंत्रालय समिति राजीव गांधी फाउंडेशन के साथ राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट, इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की भी जांच करेगी। कमेटी इन फाउंडेशन की फंडिंग, इनके द्वारा किए गए उल्लंघनों की जांच करेगी। इस जांच में पीएमएलए एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट, एफआरसीए एक्ट के नियमों के उल्लंघन की जांच शामिल है। इस कमेटी की अगुवाई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के स्पेशल डायरेक्टर करेंगे।
देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस और गांधी परिवार ने 60 सालों तक देश को जमकर लूटा है। कांग्रेस की सरकारों के तहत हुए घोटालों की सूची इतनी लंबी है कि कभी खत्म ही नहीं होती।अगस्ता वेस्टलैंड स्कैम, बोफोर्स घोटाला, नेशनल हेराल्ड घोटाला, जमीन घोटाला… न जाने कितने ऐसे स्कैम हैं, जो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े हैं। डालते हैं नेहरू-गांधी परिवार के घोटालों पर एक नजर-
अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला
वर्ष 2013 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल पर इटली की चॉपर कंपनी ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ से कमीशन लेने के आरोप लगे। दरअसल अगस्ता वेस्टलैंड से भारत को 36 अरब रुपये के सौदे के तहत 12 हेलिकॉप्टर ख़रीदने थे, जिसमें 360 करोड़ रुपए की रिश्वतखोरी की बात सामने आई। इतालवी कोर्ट ने माना कि इस मामले में भारतीय अफसरों और राजनेताओं को 15 मिलियन डॉलर रिश्वत दी गई। इतालवी कोर्ट ने एक नोट में इशारा किया था कि सोनिया गांधी सौदे में पीछे से अहम भूमिका निभा रही थीं। कोर्ट ने 225 पेज के फैसले में चार बार सोनिया का जिक्र किया।

2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2008)
भारत में सबसे बड़ा घोटाला 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला था, जिसमें दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर निजी दूरसंचार कंपनियों को 2008 में बहुत सस्ते दरों पर 2 जी लाइसेंस जारी करने का आरोप लगाया गया था। नियमों का पालन नहीं किया गया था, लाइसेंस जारी करते समय केवल पक्षपात किया गया था। इसमें 1.96 लाख करोड़ रुपये का घोटाला हुआ था। दरअसल सरकार ने 2001 में स्पेक्ट्रम लाइसेंस के लिए प्रवेश शुल्क रखा था। इसमें दूरसंचार के बारे अनुभवहीन कंपनियों को लाइसेंस जारी किया गया था। भारत में 2001 में मोबाइल उपभोक्ता 4 मिलियन थे जो 2008 में बढ़ोतरी करके 350 मिलियन तक पहुंच गये।

सत्यम घोटाला (2009)
सत्यम कंप्यूटर सर्विसेजस के घोटाले से भारतीय निवेशक और शेयरधारक बुरी तरह प्रभावित हुए। यह घोटाला कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े घोटालों में से एक है, इसमें 14,000 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया था। पूर्व चेयरमैन रामलिंगा राजू इस घोटाले में शामिल थे, जिन्होंने सब कुछ संभाला हुआ था। बाद में उन्होंने 1.47 अरब अमेरिकी डॉलर के खाते को किसी प्रकार के संदेह के कारण खारिज कर दिया। उस साल के अंत में, सत्यम का 46% हिस्सा टेक महिंद्रा ने खरीदा था, जिसने कंपनी को अवशोषित और पुनर्जीवित किया।

कॉमनवेल्थ गेम घोटाला (2010)
राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी और संचालन के लिए लिये लिया गया धन भारी मात्रा में घोटाले में चला गया। इसमें लगभग 70,000 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया है। इस घोटाले में कई भारतीय राजनेता नौकरशाह और कंपनियों के बड़े लोग शामिल थे। इस घोटाले के प्रमुख पुणे के निर्वाचन क्षेत्र से 15 वीं लोकसभा के लिए कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि सुरेश कलमाड़ी थे। उस समय, कलमाड़ी दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन समिति के अध्यक्ष थे। इसमें शामिल अन्य बड़े लोगों में दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री- शीला दीक्षित और रॉबर्ट वाड्रा हैं। इसका गैर-अस्तित्व वाली पार्टियों के लिए भुगतान किया गया, उपकरण की खरीद करते समय कीमतों में तेजी आई और निष्पादन में देरी हुई थी।

कोयला घोटाला (2012)
कोयला घोटाले के कारण भारत सरकार को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। सीएजी ने एक रिपोर्ट पेश की और कहा कि 194 कोयला ब्लॉकों की नीलामी में अनियमितताऐं शामिल हैं। सरकार ने 2004 और 2011 के बीच कोयला खदानों की नीलमी नहीं करने का फैसला किया था। कोयला ब्लॉक अलग-अलग पार्टियों और निजी कंपनियों को बेच दिये गये थे। इस निर्णय से राजस्व में भारी नुकसान हुआ था।

टाट्रा ट्रक घोटाला (2012)
वेक्ट्रा के अध्यक्ष रवि ऋषिफॉर्मर और सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह के खिलाफ मनी लॉन्डरिंग प्रतिबंध अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला पंजीकृत किया था। इसमें सेना के लिए 1,676 टाटा ट्रकों की खरीद के लिए 14 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी।

आदर्श घोटाला (2012)
इस घोटाले में मुंबई की कोलाबा सोसायटी में 31 मंजिल इमारत में स्थित फ्लैटों को बाजार की कीमतों से कम कीमत पर बेचा गया था। इस सोसायटी को सैनिकों की विधवाओं और भारत के रक्षा मंत्रालय के कर्मियों के लिए बनाया गया था। समय की अवधि में, फ्लैटों के आवंटन के लिए नियम और विनियमन संशोधित किए गए थे। इसमें महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों- सुशील कुमार शिंदे, विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण के खिलाफ आरोप लगाये गये थे। यह जमीन रक्षा विभाग की थी और सोसायटी के लिये दी गई थी।

सोनिया-राहुल-वाड्रा के पास 5 बिलियन डालर से अधिक की संपत्ति कहां से आई?



आजादी के बाद देश को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझने वाले गांधी परिवार ने किसानों की जमीन खरीदने-बेचने से लेकर रक्षा सौदे में दलाली से अकूत संपदा अर्जित की है। गांधी खानदान के मौजूदा दोनों नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी नेशनल हेराल्ड केस में कोर्ट से जमानत पर हैं। इन दोनों ने अपनी सरकारों के जरिए देश के विभिन्न शहरों में नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र के नाम पर कई एकड़ जमीन आवंटित करा ली। इसकी प्रॉपर्टी की कीमत करीब 5 हजार करोड़ है। दोनों मां-बेटे ने एक कंपनी बनाकर नेशनल हेराल्ड की सारी जमीन को अपने नाम करवा ली। जब कोर्ट में मामला खुला तो दोनों को जमानत लेना पड़ा। अमेरिका की business insider और जर्मनी के द वेल्ट के मुताबिक सोनिया दुनिया की चौथी सबसे धनी महिला हैं।उनकी संपत्ति 10 हजार से 45 हजार करोड़ के बीच हो सकती है। राहुल गांधी कुछ नहीं करते लेकिन उनकी घोषित संपत्ति 9.40 करोड़ है।
Celebrity Net Worth के अनुसार कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के पास लगभग 2 बिलियन डालर की संपदा है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पास भी 100 मीलियन डालर की संपदा है।
प्रमुख घोटालों की सूची और उसकी रकम-

कोयला घोटाला1.86 लाख करोड़ रुपये
2जी घोटाला1.76 लाख करोड़ रुपये
महाराष्ट्र सिंचाई घोटाला70,000करोड़ रुपये
कामनवेल्थ घोटाला35,000 करोड़ रुपये
स्कार्पियन पनडुब्बी घोटाला1,100 करोड़ रुपये
अगस्ता वेस्ट लैंड घोटाला3,600 करोड़ रुपये
टाट्रा ट्रक घोटाला14 करोड़ रुपये
अब चलते हैं पीछे 
बोफोर्स घोटाला
बोफोर्स कंपनी ने 1437 करोड़ रुपये के होवित्जर तोप का सौदा हासिल करने के लिए भारत के बड़े राजनेताओं और सेना के अधिकारियों को 1.42 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी थी। आरोप है कि इसमें दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ सोनिया गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं को को स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने कमीशन के बतौर 64 करोड़ रुपये दिये थे। इस सौदे में गांधी परिवार के करीबी और इतालवी कारोबारी ओतावियो क्वात्रोकी के अर्जेंटीना चले जाने पर सोनिया गांधी पर भी आरोप लगे।

वाड्रा-डीएलएफ घोटाला
वर्ष 2012 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और उनके दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ घोटाले का आरोप लगा। उनपर शिकोहपुर गांव में कम दाम पर जमीन खरीदकर  भारी मुनाफे में रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ को बेचने का आरोप लगा। रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से 65 करोड़ का ब्याज-मुक्त लोन लेने का आरोप लगा। बिना ब्याज पैसे की अदायगी के पीछे कंपनी को राजनीतिक लाभ पहुंचाना मूल उद्देश्य था। यह तथ्य भी सामने आया है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार के रहते रॉबर्ट वाड्रा ने देश के कई और हिस्सों में भी बेहद कम कीमतों पर जमीनें खरीदीं। इस मामले में हाल ही में हरियाणा सरकार ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

बीकानेर में जमीन घोटाले का मामला
राजस्थान के बीकानेर में हुए जमीन घोटालों में रॉबर्ट वाड्रा की कंपनियों के जमीन सौदे भी शामिल हैं। अंग्रेजी न्यूज पोर्टल इकोनॉमिक्स टाइम्स के अनुसार गलत जमीन सौदों के सिलसिले में 18 एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें से 4 वाड्रा की कंपनियों से जुड़े हैं। ये सारी एफआईआर 1400 बीघा जमीन जाली नामों से खरीदे जाने से जुड़ी हैं, जिनमें से 275 बीघा जमीन वाड्रा की कंपनियों के लिए जाली नामों से खरीदे जाने के आरोप हैं।

मारुति घोटाला
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी को यात्री कार बनाने का लाइसेंस मिला था। वर्ष 1973 में सोनिया गांधी को मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लि. का एमडी बनाया गया, हालांकि सोनिया के पास इसके लिए जरूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। बताया जा रहा है कि कंपनी को सरकार की ओर से टैक्स, फंड और कई छूटें मिलीं थी।

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मूंदड़ा स्कैंडल
कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा को स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे घोटाले के तौर पर याद किया जाता है। इसके छींटें प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर भी पड़े। दरअसल 1957 में मूंदड़ा ने एलआईसी के माध्यम से अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपये का निवेश कराया था। यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इंवेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया। तब तक एलआईसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुक़सान हो चुका था। इस केस को फिरोज गांधी ने उजागर किया, जिसे नेहरू ख़ामोशी से निपटाना चाहते थे। उन्होंने तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी को बचाने की कोशिश भी की, लेकिन उन्हें अंतत: पद छोड़ना पड़ा।