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केरल : ‘ईसाई बनने के बाद हिंदू होने का दावा नहीं कर सकते’: माकपा के MLA ए राजा की सदस्यता रद्द, SC सीट से जीते थे : हाई कोर्ट

धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने वाले वामपंथी विधायक ए राजा की सदस्यता केरल हाई कोर्ट ने समाप्त कर दी है। वह CPI(M) के टिकट पर अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट से चुने गए थे। हाई कोर्ट ने उनकी विधायकी निरस्त करते हुए कहा कि ईसाई बनने के बाद कोई भी व्यक्ति हिंदू होने का दावा नहीं कर सकता है।

कांग्रेस नेता डी कुमार ने याचिका दायर कर उनके निर्वाचन को चुनौती दी थी। आरोप लगाया था कि ईसाई बनने के बाद ए राजा ने फर्जी जाति प्रमाण-पत्र का उपयोग कर चुनाव लड़ा था। इस याचिका पर 20 मार्च 2023 को सुनवाई करते हुए केरल हाई कोर्ट के जस्टिस पी सोमराजन ने कहा है कि केरल की देवीकुलम सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। चूँकि नामांकन भरने से पहले ए राजा ईसाई बन चुके थे। इसलिए वह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते थे।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि ईसाई बनने के बाद ए राजा हिंदू धर्म से संबंधित होने का दावा नहीं कर सकते। इस आधार पर निर्वाचन अधिकारी को भी उनका नामांकन खारिज कर देना चाहिए था। अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 98 की धारा 1951 के तहत ए राजा का निर्वाचन अमान्य घोषित कर दिया।

साल 2021 में केरल में विधानसभा चुनाव हुए थे। इस चुनाव में देवीकुलम विधानसभा सीट से माकपा ने ए राजा और कॉन्ग्रेस ने डी कुमार को मैदान में उतारा था। नामांकन दाखिल करने के दौरान डी कुमार ने निर्वाचन अधिकारी के समक्ष इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि ए राजा ईसाई हैं, इसलिए वह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन तब निर्वाचन अधिकारी ने उनकी दलील खारिज कर दी थी।

इसके बाद डी कुमार ने हाई कोर्ट का रुख किया। वहाँ भी उन्होंने ए राजा के जाति-प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए। ए राजा की शादी की तस्वीर, सीएसआई चर्च के पारिवारिक रजिस्टर के रिकॉर्ड, चर्च में हुए बपतिस्मा के रजिस्टर के रिकॉर्ड को कोर्ट में पेश किया। डी कुमार ने बताया कि ए राजा की पत्नी भी ईसाई हैं। उनकी शादी एक चर्च में हुई थी। तमाम सबूतों और दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने ए राजा का निर्वाचन रद्द कर दिया। साल 2021 में हुए केरल विधानसभा चुनाव में देवीकुलम सीट से माकपा प्रत्याशी रहे ए राजा ने कांग्रेस प्रत्याशी डी कुमार को 7847 वोटों से हराया था।

किसानों के खून से रंगे हैं कांग्रेस, आप और कम्युनिस्टों के हाथ

जैसाकि अब जगजाहिर हो चूका है कि किसान आंदोलन के नाम पर ये जमावड़ा उन आढ़तियों का है, जो अब तक किसानों का शोषण कर रहे थे, लेकिन ये लोग जिन लोगों के हाथ खेल रहे हैं, वह आंदोलन शुरू पर ही सामने आ गया। 
फिर जिन पार्टियों कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और कम्युनिस्टों के हाथ पहले ही किसानों के खून में रंगे हैं, उनके कंधे बैठ देश में अराजकता फैलाना इनकी मंशा को भी स्पष्ट करता है। ज्ञात हो, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के दौरान, अप्रैल 2015 को अरविन्द केजरीवाल के भाषण के दौरान एक गजेंद्र सिंह नाम का किसान पेड़ पर लटक कर आत्महत्या कर रहा था,(देखिए चित्र) केजरीवाल ने अपना भाषण जारी रखा, जो यह भी सिद्ध करता है कि कांग्रेस और कम्युनिस्टों की तरह यह पार्टी भी हमदर्दी की नौटंकी कर रही है। 
नए कृषि कानून का कांग्रेस समेेत लेफ्ट पार्टियां भी विरोध कर रही हैं, साथ ही किसानों को सरकार के खिलाफ उकसाने के हरसंभव कोशिश भी कर रही हैं। इन पार्टियों का इतिहास किसानों पर अत्याचार करने का रहा है। 1998 में मध्य प्रदेश की कांग्रेसी दिग्विजय सिंह सरकार ने आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग का आदेश दिया था, जिसमें 22 किसानों की मौत हो गई थी तो 2006 में पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में वामपंथी बुद्धदेव सरकार ने अपनी जमीन के लिए लड़ रहे किसानों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था, जिसमें 14 किसानों की मौत हो गई थी।

किसानों पर अत्याचार करने में कांग्रेस का कोई सानी नहीं है। यह 1998 की बात है, जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकाल में मुलताई हत्याकांड को अंजाम दिया गया था, जिसमें पुलिस फायरिंग में 22 किसान मारे गए थे। फायरिंग का आदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ही दिया था।

मुलताई गोली कांड 

बैतूल जिले की मुलताई तहसील में 1998 में ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से खराब हुए गेहूं की फसलों पर किसान 5000 रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा मांग रहे थे। यहां तीन साल से लगातार न तो कांग्रेस के एजेंडे में मुआवजा दिए जाने की बात थी और न ही दिग्विजय सिंह सरकार ने किसानों की मांग पर कोई गौर किया। इस वजह से प्रदेश में मुलताई ब्लॉक के लगभग 2500 किसानों ने मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी।

मुलताई थाने के रिकॉर्ड अनुसार इस घटना में 22 किसानों की मौत हुई और 150-200 घायल हो गए।सरकार का गफलतभरा बयान 

मुलताई गोलीकांड में भी पहले सरकार यह कहकर मुकर गई थी कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई है। बाद में स्वीकारना पड़ा कि पुलिस फायरिंग हुई थी और आंदोलन में मौजूद किसानों की मौत हुई थी।

प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने घटना के बाद इसे जलियांवाला बाग कहते हुए तत्कालीन कलेक्टर और एसपी पर केस दर्ज करने की मांग की थी।

कांग्रेस सरकार की नीति 

 लगभग हफ्तेभर से चल रहे इस आंदोलन को लेकर कांग्रेस सरकार ने कोई गंभीरता नहीं बरती। किसानों ने 12 जनवरी 1998 को तहसील मुख्यालय घेरने की चेतावनी दी तो भारी पुलिस बल लगा दिया गया। आसपास के गांवों से किसानों को मुलताई नहीं पहुंचने देने के लिए रास्ते ब्लॉक कर दिए तो विवाद भड़क गया। पथराव शुरू होते ही पुलिस ने फायरिंग शुरू की।

जब कम्युनिस्टों ने रंगे किसानों के खून से हाथ 

2006 में पश्चिम बंगाल सरकार ने कार फैक्ट्री के लिए हुगली जिले के सिंगूर में 5 गांव से किसानों की जमीन लेने का फैसला लिया। 18 मई 2006 को टाटा ग्रुप ने ऐलान किया कि वह पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर में करीब 997 एकड़ जमीन पर लखटकिया कार फैक्ट्री बनाएंगे। पश्चिम बंगाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर के पांच गांव गोपालनगर, सिंघेरभेरी, बेराबेरी, खासेरभेरी और बाजेमेलिया के 9 हजार से अधिक किसानों से लगभग 997 एकड़ जमीन लेने की योजना तैयार की। 

राज्य सरकार ने इसके लिए 6 हजार किसानों को जमीन देने के लिए राजी कर लिया, लेकिन शेष किसानों ने जमीन देने से मना कर दिया। हालांकि, सरकार ने उनसे जबरन जमीन पर कब्जा ले लिया. जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 किसान मारे गए।

नंदीग्राम : अधिकरण के नाम पर किसानों का संघर्ष 

सिंगूर के अलावा नंदीग्राम शहर भी किसानों के साथ हुई बर्बरता के लिए जाना जाता है। नवंबर 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया की एक कंपनी सालिम ग्रुप के स्पेशल इकॉनोमिक जोन के लिए जमीन अधिग्रहण के विवाद में पुलिस के साथ हुए संघर्ष में 14 किसानों की जान चली गई। 

रामजन्मभूमि मंदिर : दूरदर्शन पर न हो भूमि पूजन का टेलीकास्ट: CPI

भूमि पूजन, सीपीआईअयोध्या में 5 अगस्त को होने वाले श्रीराम मंदिर भूमिपूजन का दूरदर्शन पर लाइव टेलीकास्ट होगा। वामपंथी दल सीपीआई (CPI) ने इस पर आपत्ति जताई है। उसने इस संबंध में केंद्र सरकार को पत्र लिखा है।
CPI ने जुलाई 27, 2020 को पत्र लिख भूमि पूजन को सरकारी टीवी चैनल पर प्रसारित नहीं करने की माँग की। सीपीआई का कहना है कि धार्मिक समारोह को प्रसारित करने के लिए दूरदर्शन का उपयोग राष्ट्रीय अखंडता के स्वीकृत मानदंडों के खिलाफ है। अयोध्या में मंदिर लंबे समय से संघर्ष और मतभेद का स्रोत रहा है, इसलिए यहाँ पर होने वाले समारोह के प्रसारण से बचा जाना चाहिए।
उल्लेखनीय यह है कि कांग्रेस और वामपंथियों ने मिलकर इस मुद्दे को बनाया था, राम के अस्तित्व को नकार करने का दुस्साहस इन्हीं लोगों ने किया था। रामसेतु को भी श्रीराम की वानर सेना द्वारा बनाने को नकार दिया था और उसे खंडित करने का जितने भी प्रयास किए, केवल असफलता ही हाथ लगी, फिर भी श्रीराम और उनके कामों को कभी नहीं स्वीकारा और तुष्टिकरण कर अपनी तिजोरियां भरते रहे और जनमानस एक-दूसरे को साम्प्रदायिकता भरी निगाह से देखता रहा। कोर्ट के आदेश पर हुई खुदाई में मिले अवशेषों को कोर्ट से छुपाने का घिनौना काम भी इन्हीं लोगों ने किया था, जिसका उल्लेख तत्कालीन पुरातत्व निदेशक डॉ के.के. मोहम्मद ने अपनी पुस्तक में भी किया है। अन्यथा विवाद कई वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था। 
इतना ही नहीं जब तक मामला कोर्ट में लंबित था तब ये ही गैंग भाजपा और विहिप से मंदिर की तारीख पूछता था और जब तारीख निश्चित हो गयी, तब भी इनको साम्प्रदायिकता नज़र आ रही है। वास्तव में इनके DNA में ही साम्प्रदायिकता घुसी हुई है। 
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस संबंध में सूचना और प्रसारण (I & B) मंत्रालय को पत्र लिखा है। इसमें लिखा गया है कि अयोध्या में 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और फिर राम मंदिर को लेकर पिछले कई दशकों से देश में संघर्ष और मतभेद रहा है।
पत्र में आगे कहा गया है, “प्रसार भारती अधिनियम की धारा 12 2 (a) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसका उद्देश्य ‘देश की एकता, अखंडता और संविधान में निहित मूल्यों को कायम रखना’ है।”
पत्र में जोर देकर कहा गया है, “धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सद्भाव के सिद्धांतों पर स्थापित देश के लिए राष्ट्रीय प्रसारक के रूप में 5 अगस्त को अयोध्या में धार्मिक समारोह को प्रसारित करने के लिए दूरदर्शन का उपयोग राष्ट्रीय अखंडता के स्वीकृत मानदंडों के विपरीत है।” और अब तक जो मंदिर में अवरोध उत्पन्न कर रहे थे, वह क्या धर्म-निरपेक्षता थी?
पत्र में सीपीआई के विनय विश्वम ने लिखा, “धार्मिक कार्य होने वाली भूमि पर विवाद की ऐतिहासिकता को देखते हुए, सरकार के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने के प्रयासों का विरोध करना और यह सुनिश्चित करना परिपक्व निर्णय होगा कि राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि से समझौता न किया जाए।” जहाँ तक राजनीतिकरण की बात है, यह तो तत्कालीन भारतीय जनसंघ के समय से भाजपा के घोषणा पत्र में रहा है, फिर राजनीतिकरण किस आधार पर हुआ?
भूमि पूजन में शामिल होने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अयोध्या जाएँगें, ये खबर जब से वामपंथियों ने सुनी है तब से भड़क उठे हैं, कह रहे हैं पीएम मोदी का अयोध्या दौरा न सिर्फ गलत बल्कि सेकुलरिज्म के खिलाफ भी है।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता डी राजा ने प्रधानमंत्री मोदी के अयोध्या दौरे का विरोध करते हुए कहा कि मोदी का अयोध्या जाना बिलकुल गलत है। इससे गलत सन्देश जायेगा और ये सेकुलरिज्म के खिलाफ है। बता दें कि डी राजा से पहले एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने पीएम मोदी के अयोध्या दौरे पर ऐतराज जताया था।
अयोध्या में आगामी 5 अगस्त को राम मंदिर की आधारशिला रखी जानी है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या जाएँगे और भूमि पूजन के बाद राम मंदिर की पहली ईंट रखेंगे। भूमि पूजन के लिए बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत को भी आमंत्रण भेजा गया है। इस समारोह का दूरदर्शन द्वारा सीधा प्रसारण किया जाएगा।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय के मुताबिक, भूमि पूजन के पूरे कार्यक्रम का दूरदर्शन लाइव टेलीकास्‍ट करेगा। उन्‍होंने कहा कि अन्‍य चैनल भी भूमि पूजन को लाइव दिखाने की तैयारी में है। राय ने कोरोना वायरस महामारी के खतरे को देखते हुए लोगों से अयोध्‍या न आने की अपील की। उन्‍होंने कहा कि सब लोग घर में रहते हुए भूमि पूजन देखें और उत्‍सव मनाएँ।

3 बड़ी पार्टियों से छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

election commission of india will take decision on tmc,ncp and cpi national party statusदेश की तीन बड़ी पार्टियों तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) से को राष्ट्रीय पार्टी का तमगा छिन सकता है। हाल में भारतीय निर्वाचन आयोग ने तीनों पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। आयोग ने उनसे पूछा था कि इनके प्रदर्शन के आधार पर क्यों न इनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म कर दिया जाए?
तीन पार्टियों से छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा
निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के मुताबिक किसी राजनीतिक पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तभी मिलता है जब उसके उम्मीदवार लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार या उससे अधिक राज्यों में कम से कम छह प्रतिशत वोट हासिल करें। ऐसी पार्टी के लोकसभा में भी कम से कम चार सांसद होने चाहिए। इसके अलावा कुल लोकसभा सीटों की कम से कम दो प्रतिशत सीट होनी चाहिए और इसके उम्मीदवार कम से कम तीन राज्यों से आने चाहिए।
किन पार्टियों को मिला है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा
मौजूदा समय में बीजेपी, टीएमसी, बीएसपी, सीपीआई, माकपा, कांग्रेस, एनसीपी और नेशनल पीपल्स पार्टी ऑफ मेघायल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है। हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, भाकपा का प्रदर्शन खराब रहा था। इसलिए इन पर राष्ट्रीय दर्जा खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है।

टीएमसी, सीपीआई और एनसीपी का पक्ष! 
टीएमसी ने चुनाव आयोग के नोटिस के जवाब में कहा कि पार्टी को 2014 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था इसलिए 2024 तक पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा खत्म न हो और अगले लोकसभा चुनाव के बाद ही चुनाव आयोग आकलन करे. सीपीआई ने चुनाव आयोग से कहा है कि क्योंकि वो देश की सबसे पुरानी पार्टी है और पार्टी का विस्तार देशभर में है इसलिए सिर्फ चुनाव नतीजों के आधार पर मान्यता खत्म न हो, जबकि एनसीपी ने आयोग से मांग की है कि राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता पर फैसला महाराष्ट्र और बाकी राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद आयोग करे. महाराष्ट्र में इसी साल अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होना है और एनसीपी राज्य में एक प्रमुख पार्टी है।
चुनाव आयोग देगा एक और मौका 

चुनाव आयोग टीएमसी, एनसीपी और सीपीआई को राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के मसले पर पक्ष रखने का एक अंतिम मौका देगा। चुनाव आयोग जल्द ही तीनों पार्टियों को अलग-अलग अपना पक्ष रखने का अलग से मौका देगा। जिसकी तारीख आयोग आने वाले दिनों में तय करेगा। सुनवाई के दौरान किसी पार्टी की दलील से आयोग को ऐसा लगता है कि कुछ महीनों की या फिर किसी तरह की राहत दी जा सकती है तो फिर आयोग विचार करेगा।

छुटभैया नेताओं को NOTA से भी कम मिले वोट

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत में इतनी अधिक राजनीतिक पार्टियाँ खुली हुई हैं, विश्व के किसी भी कोने में इतनी पार्टियाँ नहीं मिलेंगी। एक समय था, जनसेवा एक भावना होती थी, परन्तु आज व्यापार बन गयी है। और इस जनसेवा को व्यापार बनाने में जितनी दोषी धर्म और जात के नाम पर बनी छोटी-छोटी पार्टियाँ हैं, उतनी दोषी बड़ी पार्टियां भी हैं। जो सत्ता पाने की खातिर इन छुट भइयों को आसमान पर बैठा देती हैं। धरातल पर देखा जाए तो इन छुटभइयों का अपनी जाति, मोहल्ले और धर्म पर भी अधिपत्य नहीं होता, केवल मुठ्ठीभर लोगों के ही दम पर अपना रोब दिखाते हैं, इनके अपने पोलिंग पर भी शत-प्रतिशत वोट नहीं पड़ना, जो अभी सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों से उजागर हो गया है। 
देश से भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण समाप्त करने के लिए इन छुटभइयों की पार्टियों पर नकेल डालने की जरुरत है। क्योकि ये केवल अपनी सफेदपोश दादागिरी दिखाने अपने क्षेत्र नहीं, गली-कूचे तक के शेर होते हैं। ये सफेदपोशी दादा किन्हीं नेता के संरक्षण एवं दान के पैसों के दम पर तनावपूर्व स्थिति बनाकर अपनी तिजोरियाँ भरने में लग जाते हैं।    
हाल ही में 17वीं लोकसभा के लिए हुए आम मतदान में 36 राजनीतिक दलों में से 15 पार्टियों को नोटा से भी कम वोट मिले इनमें से कई दलों ने केवल कुछ सीटों पर ही चुनाव लड़ा। उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) विकल्प 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रस्तुत किया गया था, जो एक निर्वाचन क्षेत्र में सभी उम्मीदवारों की अस्वीकृति को दर्शाता है
इस आम चुनाव में कुल वोटों का 1.06 प्रतिशत मतदान नोटा को प्राप्त हुआ वहीं 2014 के चुनावों में, कुल मतदाताओं में से लगभग 1.08 प्रतिशत ने नोटा के विकल्प को चुना गया था केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने बिहार में छह लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन उन्हें कुल वोटों में से केवल 0.52 प्रतिशत वोट मिले
तीन सीटों वाली पार्टियां - मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को (0.01 प्रतिशत वोट), जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (0.05 प्रतिशत वोट) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (0.26 प्रतिशत वोट)- को नोटा की तुलना में कम वोट मिले
Image result for अकाली भाजपाशिरोमणि अकाली दल (शिअद), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (कपा) और अपना दल ने दो-दो लोकसभा सीटें जीतीं लेकिन उन्हें अलग से डाले गए कुल वोटों का एक फीसदी से भी कम हिस्सा मिलालोकसभा में एक सीट के साथ सात राजनीतिक दलों ने वोट के आधे से भी कम हिस्से को हासिल किया हैं
ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (0.11 फीसदी वोट) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (0.12 फीसदी वोट) को 0.10 फीसदी से ज्यादा वोट मिले, जबकि पांच पार्टियों को इससे कम वोट मिलेकेरल कांग्रेस (मणि) को कुल मतों का 0.07 प्रतिशत, मिजो नेशनल फ्रंट को 0.04 प्रतिशत और नागा पीपुल्स फ्रंट को 0.06 प्रतिशत वोट मिले
सिंगल-सीट बैगर्स नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को 0.08 प्रतिशत और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा को कुल मतों का 0.03 प्रतिशत प्राप्त हुआ

प्रधानमन्त्री के नाम पर महागठबंधन में अभी से दरार

PM के नाम पर महागठबंधन में अभी से दरार, SP, BSP और तृणमूल जैसी पार्ट‍ियां स्‍टालिन की घोषणा से नाराज!
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
विपक्षी दलों के कई नेता 2019 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी गठबंधन की ओर से किसी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किये जाने के खिलाफ लगते हैं। विपक्षी खेमे के सूत्रों ने यह जानकारी दी विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, ‘विपक्ष के कई नेता प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में किसी का नाम घोषित किये जाने के खिलाफ हैं। सपा, बसपा, तृणमूल और राकांपा स्टालिन की घोषणा से सहमत नहीं है। उनके अनुसार यह जल्दीबाजी है। लोकसभा परिणामों के बाद ही प्रधानमंत्री का निर्णय होगा
विपक्षी खेमे की प्रतिक्रिया ऐसे समय में सामने आई है जब द्रमुक अध्यक्ष एम के स्टालिन ने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को विपक्ष के प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी होना चाहिए, क्योंकि उनमें भाजपा को शिकस्त देने की क्षमता है। द्रमुक अध्यक्ष एम के स्टालिन ने दिसम्बर 16 को राहुल गांधी को 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए उनका पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि गांधी वंशज में ‘फासीवादी’ नरेन्द्र मोदी सरकार को हराने की क्षमता है
वीडियो देखिए:--
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वैसे भी प्रधानमन्त्री के मुद्दे पर किसी भी दल का प्रधानमंत्री पद पर राहुल गाँधी के नाम अपना समर्थन देने पर राहुल गाँधी भी कई बार कह चुके हैं कि जिस पार्टी की सबसे ज्यादा सीटें होंगी, उसी पार्टी से प्रधानमन्त्री होगा।लेकिन हर पार्टी प्रमुख प्रधानमन्त्री की दौड़ में अपने आपको आगे रखने में व्यस्त है।   
अवलोकन करें:--
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अकेला मोदी, सब पर भारी आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 2019 में नरेन्द्र मोदी को मात देने को हर कोई लगा हुआ है, लेकिन अपने अ...

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कहते हैं कि दिल्ली की मीडिया का एक बड़ा तबका आज भी गांधी परिवार के साथ अपनी वफादारी निभा रहा है। लगता है कि ये वफादा.....


सीपीआई ने भी स्‍टाल‍िन की बात नहीं द‍िया जवाब
हालांकि डीएमके द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए सीपीआई के डी राजा ने स्‍टालिन की घोषणा से पूरी तरह सहमति नहीं जताई। उन्‍होंने कहा, अभी सारी पार्टियों को इस पर विचार करने की जरूरत है। आने वाले दिनों में इस पर और तस्‍वीर साफ हो सकती है
एक चेहरा घोष‍ित करने के पक्ष में नहीं
हालांकि इतना तय है कि महागठबंधन में अब भी सभी दल किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं। कुछ दिन पहले फारुख अब्‍दुल्‍ला जैसे नेताओं की ओर से कहा गया था कि महागठबंधन में कोई एक चेहरा नहीं है। हम अपना चेहरा चुनावों के बाद तय कर लेंगे। इसके अलावा शरद यादव भी कह चुके हैं कि महागठबंधन में अभी चेहरे की कोई लड़ाई नहीं है। लेकिन ममता बनर्जी और मायावती जैसी दि‍ग्‍गज नेता कांग्रेस की सरपरस्‍ती स्‍वीकार करने के लि‍ए तैयार नहीं हैं
फारूख अब्दुल्ला की बात मानी जाए तो जनता यह भी जानना चाहेगी कि जब गठबंधन में प्रधानमन्त्री योग्य कोई नेता नहीं, फिर किस आधार पर गठबंधन को वोट देकर पुनः मतदान प्रक्रिया में जाकर देश का धन व्यर्थ करने से क्या लाभ? गंभीरता से मन्थन करने पर फारूख की बात में बहुत वजन हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना देश के साथ अन्याय करना होगा। यानि जनता किसी ऐसे-वैसे को वोट देकर अपना समय और वोट ख़राब नहीं करना चाहेगी। 
कांग्रेस के लिए इन तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में सरकार बनाना 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले काफी अच्छे संकेत के रूप में आए हैं। इसलिए पार्टी ने तीनों ही जगहों पर होने वाले शपथ ग्रहण के लिए सभी विपक्षी दलों को न्योता भी भेजा है। लेकिन अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए समाजवादी और बहुजन समाजवादी द्वारा सम्मिलित न होना महागठबंधन के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि शहर बसने से पहले ही लुटेरे, चील, कौए और गिद्ध विराजमान हो गए हैं।