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हिन्दूफोबिया फैलाने के षड्यंत्र के विविध माध्यम : वेब सीरिज, स्टैंड अप कॉमेडी, पुस्तकें, पेंटिग्स

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आज देश में हिन्दू धर्म, देवी-देवताओं का मजाक करना और हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम बॉलीवूड फिल्म, वेब सीरिज, सोशल मीडिया के माध्यम से धडल्ले से चल रहा है । प्रतिदिन सोशल मीडिया, टीवी और विभिन्न मंचों पर हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं का जो मजाक उड रहा है, उसे हमारे ही कुछ हिन्दू समर्थन देते है, यह दुर्भाग्य की बात है । बुरा भी लगे तो हम सोचते हैं कि इसका विरोध कोई और कर देगा। ठीक उसी शुतुरमुर्गी मुद्रा की तरह, जैसे जब सिर्फ हमारे घर की बिजली जाती है तो हम परेशान होते हैं, लेकिन पूरे मोहल्ले की बिजली जाती है तो निश्चिंत हो जाते हैं कि जो हमसे ज्यादा परेशान होगा, वह इसकी शिकायत करेगा।
धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले भी हिन्दू आस्था पर हो रहे आघात को न केवल चुपचाप देखते रहते हैं बल्कि इसमें रस लेते हैं। ऐसे मौके आने पर इसका कानूनी तरीके से विरोध किया जाना चाहिए। स्थानीय पुलिस के साथ संबंधित कंपनी को भी मेल, फोन या पत्र के माध्यम से शिकायत भेजनी चाहिए।
हिंदुओं में संगठन की कमी और धर्मशिक्षा का अभाव इसका मुख्य कारण है। कोई भी कंपनी या संस्था किसी अन्य धर्म के पवित्र चिह्नों को कपड़ों, जूतों पर दिखाने का साहस नहीं करती, क्योंकि उसे पता है कि इसका क्या परिणाम हो सकता है।
आइए देखते है कुछ ऐसे माध्यम जिसके द्वारा यह षड्यंत्र हो रहा है…
वेब सीरीज 
वैसे तो भारतीय सभ्यता को आघात पहुंचाने में बॉलीवुड तो पहले से ही था लेकिन इस मामले में वेब सीरीज ने बॉलीवुड को भी पिछे छोड़ दिया है। सिनेमा वाले जो असभ्यता और अश्लीलता थियेटरो में नहीं दिखा सकते उन्हें वेब सीरीज के माध्यम से आज के युवा तक उनके मोबाइल के माध्यम से पहुंचा देते हैं। आज आप जितने भी वेब सीरीज देख लो अधिकतर या कहे एक दो को छोड़कर बाकि सभी वामपंथ विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले ही मिलेंगे जो या तो राष्ट्रविरोधी होती हैं या हिन्दूफोबीक वैसे राष्ट्रविरोधी और हिन्दूफोबीक में कुछ खास अंतर नहीं हैं। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राईम, वूट, जी 5 आदि ओटीटी प्लैटफॉर्म्स द्वारा यह हिन्दूफोबिया दिखाया जाता है।
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अभी एकता कपूर की XXX सीरीज को ही देख ले ये एक सेमी पोर्न सीरीज तो है ही लेकिन इसके दूसरे सीजन मे तो भारतीय सेना का, उनकी पत्नी की और उनके वर्दी का अपमान किया गया है।
पाताल लोक में एक हिन्दू पंडित को मंदिर में मांस खाते हुए दिखाया गया है। साथ ही गौमांस के चलते होने वाली लिंचिंग में हिन्दुओं को भगवा आतंकी दिखाने का प्रयास किया गया है।
सेकरेड गेम्स जो की भारत की पहली वेब सीरीज थी वो भी हिन्दूफोबीया से भरी हुई थी उसके पहले सीजन के शुरूआती एपीसोड में ही ये डायलोग है की भगवान को फर्क नहीं पड़ता जो कि काफी अपमानजनक हैं इसमे ये भी बताया गया की रामायण के कारण ही सबसे ज्यादा दंगे हुए हैं इस सीरिज में एक जवान मुस्लिम लड़के का फेक एनकाउंटर भी दिखाया गया हैं। इस सीरिज के दुसरे सीजन में तो हद ही हो गई जिसमें ये बताया गया की भारत ही नहीं पूरे विश्व में जहा भी आतंकवादी संगठन हैं उनकी वत्त पोषण एक हिन्दू संत की आश्रम से की जाती हैं।
उपरोक्त उदाहरणो से हम समझ सकते हैं कि किस तरह ये वेब सीरीज हमारे समाज के लिए घातक हैं और हमारे युवा पीढ़ी को किस दिशा के ओर ले जा रही हैं सेंसर नही होने का पूरा लाभ ये वेब सीरीज वाले उठा रहे हैं।
Stand up Comedy और web series के नाम पर सनातन ...स्टैंड अप कॉमेडी 
स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं और परंपराओं का मजाक उड़ाने का सिलसिला अब सारी हदें पार कर चुका है। ताजा मामला सुरलीन कौर नाम की एक कथित स्टैंड अप कॉमेडियन का है जिसने अपने एक प्रोग्राम में इस्कॉन मंदिर जाने वालों के साथ-साथ खजुराहो के देवी-देवताओं तक पर बेहद भद्दे कमेंट किए हैं । इसे लेकर सोशल मीडिया पर विरोध होने के बाद सुरलीन कौर और शेमारू (Shemaroo) कंपनी के खिलाफ केस दर्ज कराया गया है।
हंसी-मजाक के नाम पर स्टैंड अप कॉमेडी के इन कार्यक्रमों में आम तौर पर हिंदू धर्म और देवी-देवताओं को लेकर अश्लील टिप्पणियां की जाती हैं। लेकिन ज्यादातर बार लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अब ये पब्लिसिटी बटोरने और प्रोग्राम को हिट बनाने का फॉर्मूला बन गया है। इस बात की भी पुख्ता जानकारी है कि हिंदुओं को शिकार बनाने वाले ऐसे कलाकारों को ज्यादा पैसे और स्पॉन्सर मिलते हैं।



कुछ दिन पहले मुनव्वर फारुकी नाम का ये जिहादी कॉमेडियन विवादों में आया था जब उसने गोधरा में हिंदुओं की हत्या को मज़ाक़ का विषय बनाया था।
मुनव्वर फारुकी इससे पहले भगवान राम और सीता को लेकर भी अश्लील कमेंट्स कर चुका है। उसके ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत हुई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हिन्दू विरोधी पुस्तकें 
हमारे देश में कई ऐसी पुस्तकें लिखी जाती हैं, जिनमें हमारी अपनी ही विरासत का मखौल उड़ाया जाता है। इनमें से एक ‘विश्व बुक्स’ प्रकाशन संस्थान भी है, जिसकी किताबें हिंदुत्व का मजाक बनाने के लिए ही लिखी जाती हैं। ‘विश्व बुक्स’ की अधिकतर पुस्तकें बच्चों और छात्रों के लिए लिखी जाती है। वो लोग ही इसे ज्यादा पढ़ते हैं। कई पुस्तकें वयस्कों के लिए भी हैं। इनमें से अधिकतर हिन्दूघृणा से सनी हुई किताबें हैं।




उदाहरण के लिए इसके एक किताब का शीर्षक देखिए- “धार्मिक कर्मकांड- पंडों का चक्रव्यूह“, जिसमें ब्राह्मणों का मजाक बनाया गया है। इसमें हिन्दू धर्म की पूजा पद्धतियों को नकारते हुए इसे ब्राह्मणों की साजिश बताया गया है। यानी, ब्राह्मणों, साधुओं, हिन्दू धर्म और मंदिरों को बदनाम करने का ‘विश्व बुक्स’ ने बीड़ा उठाया हुआ है। राकेश नाथ द्वारा लिखित इस पुस्तक के कवर पर ही भगवा वस्त्रों में एक ब्राह्मण को कमण्डल लेकर भागते हुए दिखाया गया है।
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जब छात्र व बच्चे इन चीजों को पढ़ते होंगे तो क्या वो अपने ही धर्म और समाज के प्रति हीन भावना से ग्रसित नहीं हो जाते होंगे? ब्राह्मणों को इस तरह से पेश किया गया है जैसे वो समाज के सबसे बड़े विलेन्स हों। इसी तरह इसने जयप्रकाश यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘धर्म: एक धोखा’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसमें धर्म को छल-कपट का विषय बताया गया है। इसके कवर पेज पर भी कमंडल लिए एक ब्राह्मण को दिखाया गया है।
हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित करती पेंटिंग्स 
जैसा कि हम सभीं जानते है कि चित्रकार म.फि. हुसैन द्वारा निकाले गए चित्रों द्वारा हिन्दू-देवताओं का घोर अपमान किया है । हुसैन द्वारा पेंट की गई हिन्दू देवताओं की नग्न एवं अश्लील चित्र का वर्षों से लिलाव होते आ रहा है । अभी हुसैन जीवित नहीं है, किंतु उनके द्वारा बनाए गई यह पेंटिग्स आज भी कुछ आर्ट गैलरीज में लिलाव के लिए रखी जाती है ।
ऐसे ही एक और चित्रकार है, जिनका नाम है अकरम हुसैन । उन्होंने एक पेंटिंग बनाई है जिसमें दिखाया है कि, कैसे तिरंगे जैसी आकृति में से शराब की बोतलें और अंडरगार्मेंट्स निकल रहे हैं।
इससे पहले अकरम हुसैन ने ‘रासलीला-थीम’ को लेकर बनाई एक पेंटिंग में भगवान कृष्ण को बार में बिकनी पहनी महिलाओं में घिरा दिखाकर धार्मिक संस्थाओं को भड़का दिया था। गुवाहाटी के पुलिस उपायुक्त अमिताव सिन्हा ने कहा कि शिकायत दर्ज होने के बाद विवादित पेंटिंग को हटा लिया गया।
साथ ही अब सोशल मीडिया पर कुछ पेंटिंग्स को पोस्ट किया जा रहा है जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का अनादरात्मक चित्रण किया गया है ।
हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट दिखाई दे रही है जिसमें संकेत देशमुख नाम के व्यक्ति ने वह चित्र पेंट किया है । इस पेंटिंग को कोलकाता कॅन्वास नाम के इंस्टाग्राम पेज पर पोस्ट किया है । साथ ही पेंटिंग के निर्माता संकेत देशमुख के प्राेफाइल पर भी इसे पोस्ट किया गया है । हाल ही में प्रसारित हुई वेब सीरिज बुलबुल के आधार पर इस पेंटिंग में एक महिला को दिखाया है जिसके पिछे मां दुर्गा समान अनेक हाथ दिखाए गए है । उनमें से एक हाथ में महिला ने जलती हुई सिगारेट पकडी है । इस तरह देवी का मानवीकरण कर उसका घोर अपमान किया गया है । इससे करोडों हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है ।
Instagram पर की गई अनादरात्मक पोस्ट का धर्माभिमानी हिन्दू वैध मार्ग से विरोध कर रहे है…
Post Link 1 : https://www.instagram.com/p/CCBzTQVjHoZ/
Post Link 2 : https://www.instagram.com/p/CCllxGMAo6z/
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित कर चर्चित होना कुछ साम्प्रदायिक तत्वों का मूलम....
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हिंदुओं की वेशभूषा और उनकी संस्कृति से जुड़े चिह्नों को लेकर अक्सर सवाल जवाब होता रहता है। एक पूरा तबका इस विषय को ....

दिल्ली प्रेस कर रहा सरिता, कारवाँ, और चम्पक से हिन्दूफ़ोबिया और वामपंथी प्रोपेगेंडा का विस्तार

आज हम उस दौर में रह रहे हैं, जहाँ कट्टरपंथी इस्लाम ने लाखों लोगों की मौत के साथ दुनिया को अपने चंगुल में जकड़ रखा है, जो काफिरों (हिन्दुओं) पर होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए साफ़ तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन ऐसे दौर में भी अधिकांश वामपंथी प्रोपेगेंडा चलाने वाले वेबसाइट उन पर आँख मूँदे हुए हैं। वहाँ उन्हें कोई बुराई नज़र नहीं आती। कोई असहिष्णुता दिखाई नहीं देती क्योंकि समस्याओं के व्यापार पर पलने वाले ऐसे कुटीर उद्योग जो मुख्य रूप से हिन्दुओं, उनके धर्म और संस्कृति को निशाना बनाने पर ही केंद्रित है। दशकों से ऐसे गिरोहों का एकमात्र उद्देश्य ही पीड़ित हिन्दुओं को और प्रताड़ित और अपमानित करना हो चुका है। अब तो ये गोएबल्स धुरंधर प्रचारक इतना आगे बढ़ चुके हैं कि ये अपने नापाक इरादों के लिए बच्चों को बलि का बकरा बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। यहाँ बात हो रही है बच्चों की एक पत्रिका ‘चंपक’ के नवीनतम संस्करण पर।
वैसे प्रकाशक दिल्ली प्रेस द्वारा अपनी मैग्ज़ीनों से हिन्दू फोबिया कोई नई बात नहीं है। इसके किसी भी अंक को देख लो, किसी न किसी मुद्दे पर हिन्दू रीति-रिवाजों, पुराणिक कथाओं पर प्रहार करते कोई न कोई लेख जरूर मिल जाएगा। शायद यही कारण है की ये प्रकाशक अपने इतने प्रकाशनों को आज भी प्रकाशित कर रहा, जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स इतने बड़े समूह की बहुचर्चित पत्रिकाएँ बंद हो चुकी है।  
@OnlyNakedTruth नामक ट्विटर हैंडल से एक ट्विटर यूजर ने चंपक के अक्टूबर संस्करण के कुछ स्क्रीनशॉट ट्वीट किए, जो कि कश्मीर पर केंद्रित है। इसमें ये दिखाया गया है कि अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करने के लिए मोदी सरकार के कदम ने उस विशेष स्थिति को ही समाप्त कर दिया, जिसका कश्मीर दशकों से लाभ ले रहा था। यहाँ यह छिपा है कि वामपंथी और अलगाववादी इससे मलाई काट रहे थे और आतंकी कश्मीर में आश्रय पा रहे थे।

इसी ट्विटर हैंडल द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में से एक में बच्चों से कश्मीर में अन्य बच्चों को लिखने का देखिए कितना ‘मार्मिक’ आग्रह किया गया है।
चंपक पत्रिका के अक्टूबर संस्करण के एक हिस्से में पत्रिका बच्चों से कश्मीर में अपने जैसे अन्य बच्चों के नाम पत्र लिखने और उनसे वहाँ की स्थिति के बारे में पूछने के लिए अपील की गई है। पत्रिका के इस संस्करण में कहा गया है कि कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त किए जाने के बाद घाटी में स्थिति ठीक नहीं है। हजारों सैनिकों और सेना की बटालियनों को कश्मीर भेजा गया है और जगह-जगह कर्फ्यू लगा हुआ है। यहाँ तक कि टेलीफोन लाइनों और इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया है। मतलब उनपर बड़ा अत्याचार हो रहा है। आप हमें पत्र भेंजे हम उन्हें निश्चित रूप से कश्मीर के बच्चों तक पहुँचाएँगे। ऐसा करके बच्चों में ये जहर बोने की कोशिश है कि देखिए वहाँ के बच्चे किस हाल में हैं। कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि इससे पहले वहाँ के क्या हालात थे।
चम्पक अक्टूबर एडिशन का एक हिस्सा
अगला स्क्रीनशॉट तो और भी खतरनाक है:
अगले भाग में, चंपक में एक छोटे लड़के की तस्वीर खींची गई है, नाम है हसन जो स्कूल जाना और खेलना चाहता है, जबकि अत्याचारी भारतीय राज्य और वहाँ की सेना उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रही है। कहानी के माध्यम से दुष्प्रचार का पूरा खाका खींचा गया है, लेख में इस बारे में भी बात की गई है कि हसन की माँ घर पर नहीं है और पिता फोन के काम न करने के कारण उनसे संपर्क नहीं कर पाने के कारण सभी दुखी हैं। यहाँ एक बात गौर करने लायक है जैसे फोन का कुछ दिनों काम न करना बहुत बुरी स्थिति है। इससे अच्छा तो आतंकवाद और अलगाववाद ही था।
हालाँकि, इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है, कि घाटी में संचार व्यवस्था पर वास्तव में रोक थी, लेकिन क्यों थी इस पर चर्चा नहीं है। जबकि सबको पता है कि कश्मीर कहीं अधिक अति सूक्ष्म विषय है, जिसे छोटे स्कूली बच्चों को भावुकता के साथ सुनाए गए ऐसे कहानियों के माध्यम से नहीं समझाया जा सकता है। यह कहानी स्पष्ट रूप से बच्चों को कश्मीर में बड़े पैमाने पर होने वाले जिहाद, आईएसआईएस और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में नहीं बताती है, और ये भी नहीं कि अनुच्छेद 370 के कारण घाटी के हिंदुओं, वहाँ के पंडितों, महिलाओं के अधिकारों और अन्य छोटे समुदायों के अधिकारों पर कितना ज़्यादा बुरा प्रभाव पड़ रहा था। ये सभी वर्ग अपने मूलभूत अधिकारों से भी वंचित थे। लेकिन ये ऐसे वामपंथी प्रोपेगेंडा बाजों के लिए कोई समस्या की बात नहीं है बल्कि कुछ दिनों तक फोन का बंद होना सबसे बड़ी समस्या और कश्मीर के लोगों पर अत्याचार हो गया।
शुद्ध भावुकता के साथ बच्चों को ऐसे आधे-अधूरे तथ्य परोसने के कई खतरे हैं, ऐसे कई तथ्य हैं जो चम्पक बच्चों से छिपा रहा है। लेकिन यही तो वामपंथी प्रोपेगेंडा का असली हथियार है। हमेशा उन्हीं तथ्यों या घटनाओं पर बात या बवाल कीजिए जो एजेंडे को शूट करे।
दिल्ली प्रेस और उग्र हिन्दूफोबिया 
 दिल्ली प्रेस, जहाँ से बच्चों की मैगज़ीन चंपक प्रकाशित होता है, उसे अब परंपरागत रूप से जमीनी वास्तविकताओं से दूर कर अक्सर वामपंथी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने के लिए, हिंदुओं और भारतीय संस्कृति के खिलाफ लगातार अभियान चलाने का मुखपत्र बना दिया गया है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस तरह से कहीं न कहीं मासूम बच्चों की जड़ों में ही मट्ठा घोल देने का प्रयास इस वामपंथी एजेंडे के तहत किया जा रहा है।
दिल्ली प्रेस एक बड़ा प्रकाशन हाउस है जो 10 अलग-अलग भाषाओं में 36 पत्रिकाओं के माध्यम से अपना प्रोपेगेंडा और एजेंडा फैला रहा है। दिल्ली प्रेस की स्थापना 1939 में हुई थी और इसकी शुरुआत 1940 में कारवाँ पत्रिका से हुई थी। कारवाँ के कारनामे आपने पुलवामा के समय देखें होंगे जहाँ एक तरफ देश बलिदानियों के दुःख से आहत था तो वहीं कारवाँ हुतात्माओं की जाति तलाश रहा था।
IndiaFacts.org में प्रकाशित एक ओपिनियन में लेखक ने लिखा है:
“ऐसे समय में जब नास्तिकता वयस्कों के बीच भी अलोकप्रिय हो रही थी, बच्चों की पत्रिका, चंपक ने नास्तिक प्रोपेगेंडा पर काम करना शुरू किया, जिसका मुख्य टारगेट हिंदू धर्म था। कई कहानियों के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि कैसे ‘मूर्तियों की पूजा करना अंधविश्वास है’ और कैसे ‘विज्ञान के वर्चस्व वाले विश्व में धर्म पर हावी होने वाली संस्कृति को बदल देना चाहिए।’ यहाँ इनके वामपंथियों के निशाने पर यह धर्म हमेशा ‘हिंदू धर्म’ ही है।
यह सब कुछ नया नहीं है बल्कि कश्मीर पर चंपक की नवीनतम लघु कहानी के जरिए परोसे गए प्रोपेगेंडा जैसा ही है।
सरिता : अश्लीलता और हिन्दूफोबिआ से जुड़े वाक्यांश का उपयोग 
दिल्ली प्रेस, की एक अन्य पत्रिका सरिता तो ‘उग्र हिंदूफ़ोबिया’ के ख़िलाफ़ तो पूरा वसीयतनामा ही प्रस्तुत करती है।
दिल्ली प्रेस की वेबसाइट खुद सरिता को एक प्रमुख पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लिखता है कि यह पत्रिका जो ‘धार्मिक अश्लीलतावाद’ और ‘राजनीतिक सत्तावाद’ के खिलाफ लड़ाई है।
यह देखना दिलचस्प है कि सरिता का वर्णन करने के लिए दिल्ली प्रेस ‘धार्मिक अश्लीलता’ से लड़ने जैसे शब्द का उपयोग कर रहा है। इस मैगज़ीन में छपे हिंदू-विरोधी लेखन को देखते हुए, कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि सरिता का उद्देश्य केवल हिंदू संस्कृति और धर्म के सिद्धांतों पर सवाल उठाना है, जिसे वे अक्सर ‘अंधविश्वास’ के रूप में दिखाते हैं। ‘अश्लीलतावाद’ जब एक गहरी हिंदू-विरोधी पत्रिका का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है, तो इसका अर्थ केवल ब्राह्मणवाद-विरोधी माना जा सकता है, जो कि एक ट्रैप है जो अक्सर वामपंथियों द्वारा हिंदू धर्म को गलत तरीके से वर्णित करने के लिए बड़ी धूर्तता से उपयोग किया जाता है।
सरिता में छपे कई ऐसे लेख हैं जिनके शीर्षक, जो स्पष्ट रूप से हिंदू-विरोधी तिरस्कार और नफरत को प्रदर्शित करते हैं। जैसे- ‘कांवड़िया, अंधविश्वासी परंपराओं के वाहक’“(हिन्दू) पंडितों का भ्रम”, “वास्तु (हिंदू) धर्म की एक बुराई”, धर्म की आड़ में सब्ज़बाग, नए टोटकों से ठगी: मिर्ची यज्ञ और गुप्त नवरात्री’ आदि कुछ ऐसे लेख हैं जो पत्रिका में मौजूद हैं। इन लेखों के शीर्षकों से ही एजेंडा साफ़ दिखने लगता है कि इनके निशाने पर कौन है।
सरिता का वर्तमान मुख्यपृष्ठ धर्म इस प्रकार दिखाता है 
’धर्म’ के होम पेज पर हर एक लेख में हिंदू धर्म को अपमानित करता हुआ लेख देख सकते हैं। 13 लेखों में कुछ के टाइटल हैं- “पुजारी कैसे भक्तों को भटकाते हैं”, “किस तरह से भक्ति के शहर में ‘लड़कियों की बिक्री’ होती है। साधुओं और संतों को एक्सपोज़ करने के नाम पर यह लेख कि ‘धर्म खून से खेलता है।”
वेबसाइट के आर्काइव में आगे भी, ऐसे कई लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि सरिता हिंदुओं के विश्वास का अपमान करने के मिशन पर है।
2016 में प्रकाशित एक लेख 
अनिवार्य रूप से, लेख का शीर्षक है, “अंधविश्वास और पाखंड का महिमामंडन करती श्री दुर्गासप्तशती”
सरिता ने पहले भी और यहाँ तक कि हाल ही में अक्टूबर 2019 में हाल ही में प्रकाशित किए गए गटर के स्तर के हिंदूफोबिक लेखों के बारे में बात करने के लिए देखे जा सकते हैं। हालाँकि, इतने से ही यह स्पष्ट है कि सरिता, दिल्ली प्रेस की प्रमुख हिंदी पत्रिका पिछले कई दशकों से हिंदू धर्म के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़े हुए है। इसे सारी बुराई सिर्फ एक ही धर्म में दिख रही है।
सरिता के हिंदूफ़ोबिया की गाथा नई नहीं है। 1957 में, अरविंद कुमार की कविता “राम का अन्तर्द्वंद” को लेकर एक विवाद उत्पन्न हुआ जो सरिता में ही प्रकाशित हुआ था।
कारवाँ : दिल्ली प्रेस की मूल हिन्दूफोबिआ  
कारवाँ पत्रिका दिल्ली प्रेस की पहली पेशकश थी और इसे 1940 में लॉन्च किया गया था। लेकिन वर्तमान में कारवाँ इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली प्रेस वास्तव में अपने दुर्भावनापूर्ण लेखों के माध्यम से कितना नीचे गिर गया है। पुलवामा आतंकी हमला पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित और नृशंस रूप से किया गया एक आत्मघाती हमला था जिसमें कई भारतीय सैनिकों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया था। पूरा देश ने एकजुट होकर शोक व्यक्त किया। देश ने एक ऐसे आतंकी राज्य पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिशोध की माँग भी की जिसने हमारे सैनिकों के खून से पुलवामा की गलियों को रंग दिया। जब राष्ट्र अपने सशस्त्र बलों के पीछे खड़ा था, तो उस समय कारवाँ उनकी जाति की गिनती में व्यस्त था।
द कारवाँ के एज़ाज अशरफ की एक रुग्ण रिपोर्ट में, उन्होंने हमारे शहीद सैनिकों की ‘जाति का विश्लेषण’ किया था। कारवाँ का एजेंडा तो ऐसा है, जिसमें उन्होंने उन बलिदानी सैनिकों को भी नहीं छोड़ा, जिनकी पाकिस्तान जैसे आतंकी स्टेट द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी।
इसी द कारवाँ ने केवल अपने एजेंडे के लिए अमित शाह, पीएम मोदी, एनएसए डोभाल और उनके बेटे पर कई घटिया आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित किए हैं। और जब खुलासा हुआ तो नए प्रोपेगेंडा की तरफ निकल लिए।
कुल मिलाकर, लाखों पाठकों के साथ, दिल्ली प्रेस ने एक ऐसा व्यापक जाल बुन डाला है। जिससे निकलना शायद अब उससे संभव न हो। सरिता, कारवाँ, जो संभ्रांत अंग्रेजी बोलने वाली भीड़ का मुखपत्र है। दिल्ली प्रेस ने अब अपनी प्रोपेगेंडा की धार और तेज करने के लिए स्पष्ट रूप से अब बच्चों की पत्रिका चंपक को भी अपने एजेंडे का हथियार बनाकर मासूमों के कोमल मन पर भी अपनी विषबेल फ़ैलाने के पथ पर अग्रसर है।
आज सूचना युद्ध के युग में दिल्ली प्रेस ने एक ऐसे पक्ष को चुना है जो हिन्दफोबिया से ग्रसित और वामपंथी दूषित एजेंडे का पोषक है। आज जब एक ऐसा दौर चल रहा है जहाँ आतंक को बढ़ावा देने के लिए एक देश जी जान से लगा है तो इस दौर में आपको सोचना अपने समाज, अपने देश और अपने बच्चों के भावी भविष्य के बारें में। हम सबको पता है यह वामपंथी एजेंडे का पोषक पक्ष जो हिंदुओं के लिए खड़ा नहीं है, और न ही यह भारत के लिए खड़ा है। तो हमें खुद अपने लिए खड़ा होना होगा। और ऐसे प्रोपेगेंडा से निपटना होगा। ये वामपंथी गिरोह जहाँ भी जहर फ़ैलाने की कोशिश करें उसे पूरी सजगता से रोकना होगा। इसी में देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों की भलाई है।