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कांग्रेस के टूलकिट प्रोपेगंडा फैलाने में 5 ‘दोस्त’ मीडिया संस्थान, बॉलीवुड से मदद

सोशल मीडिया पर एक ‘टूलकिट’ वायरल हुआ, जिसके बारे में बताया गया कि ये कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने नेताओं को दी गई निर्देशावली है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हिन्दुत्व, कुम्भ और देश को बदनाम करने का पूरा खाका है। इस टूलकिट’ का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिस पर ज्यादा बात नहीं हुई। इसमें उन मीडिया संस्थानों के बारे में बताया गया है, जिनकी मदद लेकर कांग्रेस नेताओं को प्रोपेगंडा फैलाना है। इन कठिन परिस्थितियों में सरकार से कन्धा मिलाकर चलने की बजाए अपने ही देश की सरकार को अपमानित करने का षड़यंत्र रच रहे हैं। 
ऑक्सीजन की कमी का शोर भारत ही नहीं, विश्व ने देखा, विश्व तो भारत की सहायतार्थ खड़ा हो गया, लेकिन जयचन्द ऑक्सीजन की कमी करते रहे, और जब ऑक्सीजन की ऑडिट करने की बात होते ही, एकदम कहां से कमी पूरी हो गयी, यह लाशों पर सियासत करने वालों से जनता को पूछना होगा। अब कोई हॉस्पिटल भी नहीं बोलता कि 'हमारे पास इतने ही घंटे की ऑक्सीजन बची है।' यूँ तो जिसे देखो यही कहता नज़र आता है कि मोदी सरकार ने मीडिया को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है, परन्तु उसी मीडिया ने उसी मोदी सरकार द्वारा ऑक्सीजन देने के बावजूद कहाँ जा रही है, इस समस्या की जड़ में जाने की कोशिश तक नहीं की, क्यों? लेकिन अपवादों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने ब्रह्मात्र यानि "ऑक्सीजन ऑडिट" का प्रयोग कर समस्त विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया।     

मेजर सुरेंद्र पुनिआ का ट्वीट उस कड़वी सच्चाई को सार्वजनिक करने का प्रयास कर रहा है, जिसे कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने कभी नहीं पढ़ाया, विपरीत इसके आतताई मुग़लों को महान पढ़ाया गया। अब जब देश अपनी खोई संस्कृति एवं सम्मान को प्राप्त कर रहा है, जयचंदों के वंशज अपना सिर उठा, आपदा में अवसर खोज रहे हैं। 

टूलकिट के इस हिस्से में बताया गया है कि ‘द प्रिंट’, ‘द वायर’, ‘द क्विंट’ और ‘आउटलुक’ जैसे मीडिया संस्थानों में कोविड-19 को लेकर जो भी लेख प्रकाशित होते हैं, उन्हें शेयर किया जाए और वायरल किया जाए। ऐसे मीडिया भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम करने के लिए किस हद तक गिरते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। इन संस्थानों ने महाराष्ट्र और केरल की सरकारों के खिलाफ कुछ नहीं लिखा, जहाँ कोरोना सबसे ज्यादा बेकाबू है।

इस ‘टूलकिट’ में कांग्रेस नेताओं को निर्देश दिया गया है कि वो इन मीडिया संस्थानों में लिखे कोरोना सम्बंधित लेखों को खूब प्रचारित करें और उन्हें हाइलाइट करें। दो मीडिया संस्थान ऐसे भी हैं, जिन्हें इनसे भी ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। इसमें लिखा है कि अगर कोई स्टोरी अन्य मीडिया संस्थानों में प्रकाशित नहीं होती है तो उन्हें ‘कारवाँ’ या पार्टी के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ को भेजा जाए। यानी, कांग्रेस की साँठगाँठ से इन मीडिया संस्थानों में नकारात्मक लेख प्रकाशित किए जा रहे थे।

इस ‘टूलकिट’ के एक पॉइंट में ‘समान विचारधारा’ वाले बॉलीवुड सेलेब्स से मदद लेने की बात भी की गई है। उनसे ट्वीट्स, मीम्स, कॉमिक वीडियोज और कार्टून्स के अलावा अन्य ऐसे वायरल पोस्ट्स को शेयर करवाने की बात की गई है, जिसमें मोदी सरकार को निशाना बनाया गया हो। समय-समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कुछ ‘कॉम्स सेन्स सलाह’ देने का भी निर्देश दिया गया है। ऐसा दिखाने को कहा गया है, जैसे मोदी सरकार और इसके मंत्रीगण मूर्ख हों।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बिगाड़ने के लिए किस तरह से विदेशी मीडिया के साथ हाथ मिलाया गया था, वो भी देखिए। भारत में विदेशी मीडिया संस्थानों के कॉरेस्पोंडेंट्स के माध्यम से पीएम मोदी को सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। विदेशी मीडिया में लेख लिखने वाले भारतीय प्रोपेगंडा पत्रकारों को पॉइंट्स दिए गए, ताकि वो मोदी सरकार को बदनाम कर सकें। स्थानीय पत्रकारों को जलती चिताओं और लाशों की तस्वीरें देकर रिपोर्ट बनवा उसे वायरल करवाने की भी साजिश थी।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया है कि ये ‘टूलकिट’ सौम्या वर्मा ने तैयार किया है। वो प्रोफेसर राजीव गौड़ा के दफ्तर में कार्यरत हैं। MV राजीव गौड़ा कांग्रेस के सांसद रहे हैं और यूपीए काल में कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। कर्नाटक कांग्रेस कमिटी ने उन्हें प्रवक्ता और घोषणापत्र समिति का अध्यक्ष बनाया था। फ़िलहाल वो IIM बेंगलुरु में प्रोफेसर हैं। कांग्रेस की विचारधारा को फैलाने के लिए वो कई ऑनलाइन कार्यक्रम चलाते हैं।

क्या JNU की पूर्व छात्रा सौम्या वर्मा ने तैयार किया है Toolkit 

सोशल मीडिया पर मई 18 को एक दस्तावेज जम कर शेयर किया गया, जिसके बारे में लोगों ने दावा किया कि ये ‘कांग्रेस का टूलकिट’ है। इसमें कुम्भ मेला को बदनाम करने, ईद का महिमामंडन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करने और जलती चिताओं व लाशों की तस्वीरें शेयर कर भारत बदनाम करने का खाका था। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया है कि ये ‘टूलकिट’ सौम्या वर्मा ने तैयार किया है।

सौम्या वर्मा का LinkedIn प्रोफ़ाइल खँगाला तो पता चला कि वो प्रोफेसर राजीव गौड़ा के दफ्तर में कार्यरत हैं। 

सौम्या वर्मा ने इंस्टाग्राम पर अपना पता दिल्ली दिया है। संबित पात्रा द्वारा शेयर किए गए कंटेंट के अनुसार, 6 पन्नों वाले कांग्रेस के ‘टूलकिट’ को उन्होंने ही ‘माइक्रोसॉफ्ट वर्ड 2019’ एप का प्रयोग कर के बनाया है। उन्होंने कुछ तस्वीरें भी शेयर की, जिसमें सौम्या वर्मा कांग्रेस नेताओं के साथ दिख रही हैं। संबित पात्रा ने लिखा, “क्या सोनिया व राहुल गाँधी कोई प्रतिक्रिया देंगे? दस्तावेज की ‘प्रॉपर्टीज’ से ही साफ़ है कि इसका ऑथर कौन है।”

लोकसभा चुनाव 2019 के समय भी सौम्या वर्मा का नाम सामने आया था। वो उन युवाओं में शामिल थीं, जिन्होंने कांग्रेस का घोषणापत्र तैयार किया था। उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक किया है। इसके बाद उन्होंने JNU से इतिहास में मास्टर्स की डिग्री ली। सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करते समय उनके मन में राजनीति से जुड़ने की इच्छा जागी। वो सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के स्नातक छात्रों को पढ़ाती भी थीं।

उन्होंने सिविल सर्विसेज की परीक्षा तो उत्तीर्ण नहीं की, लेकिन राजनीति व राजनीतिक नीतियों के प्रति उनके मन में खासी जागरूकता आई। राजीव् गौड़ा से प्रभावित होकर वो राजनीतिक रिसर्च में रुचि लेने लगीं। ‘द प्रिंट’ से बातचीत में उन्होंने बताया था कि अब वो पर्यावरण व उससे जुड़ी नीतियों में दक्ष होना चाहती हैं। राजीव गौड़ा के दफ्तर में उन्हें ‘डिप्टी हेड ऑफ रिसर्च’ का पद दिया गया।

सौम्या वर्मा ने शशि थरूर और सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के अंतर्गत काम करते हुए आंतरिक सुरक्षा, पर्यावरण और संस्थागत सुधारों को लेकर रिपोर्ट तैयार की थी। ‘कांग्रेस के टूलकिट’ के अनुसार, भाजपा कुम्भ पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए ईद का नाम ले सकती है लेकिन हमें दोनों त्योहारों की तुलना वाले ‘जाल’ में फँसने से बचना है। स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि ईद को लेकर एकदम से चुप्पी साध ली जाए और जहाँ भी ईद को लेकर बात हो उस पोस्ट या ट्वीट से खुद को अलग किया जाए।

कोरोना के फ्री टेस्ट की सुविधा : आखिर किसके इशारे पर कारवाँ पत्रिका झूठ फैला रही है?

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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
मीडिया जिसे निर्भीकता से संकट के समय जनता का मनोबल बढ़ाने का काम करना चाहिए, परन्तु कुछ मीडिया जनता-विरोधी पार्टियों के चुंगल में फंसकर जनता का मनोबल तोड़ डराने में व्यस्त हैं। यह उस प्रकाशक की पत्रिका का हाल है, जिसकी अन्य पत्रिकाएं कई वर्षों से महिलाओं और बच्चों की पहली पसंद होती हैं। 
चीन के वुहान शहर से निकलकर पूरे विश्वभर में आतंक मचाने वाले कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ हर देश ने जंग छेड़ रखी है। लेकिन इतने संवेदनशील मौक़े पर भी वामपंथी मीडिया गिरोह की ओछी हरकतें जारी है। भारत में जहाँ सरकार संक्रमित लोगों को हर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने में प्रयासरत है। वहीं मीडिया गिरोह उनके ख़िलाफ़ फेक न्यूज फैलाने में। कल हमने देखा कि किस तरह कुछ फर्जी ट्विट्स को आधार बनाकर चुनिंदा लोगों द्वारा सरकार पर सवाल उठाए गए। अब कारवाँ मैग्जीन के एक्जिक्यूटिव एडिटर भी इसी खेल को आगे बढ़ाते यानी झूठ फैलाते पकड़े गए हैं।
विनोद के. जोस ने एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर किया है। इसमें दावा किया गया कि अन्य देशों में कोरोना वायरस का टेस्ट फ्री है, जबकि भारत में इसके लिए बहुत रुपए लिए जा रहे हैं। विनोद ने ट्विटर पर जिस स्क्रीनशॉट को शेयर किया, वो @devil-ind नाम के यूजर का है। इस यूजर ने दावा किया है कि इरान, चीन, यूरोप, अमेरिका, श्रीलंका में ये टेस्ट फ्री है। लेकिन पाकिस्तान में इसे कराने की कीमत 500 है, बांग्लादेश में 300 और भारत में 4500। अब हालाँकि, जो लोग सरकार की कोशिशों के गवाह है उन्हें ये समझने में बिलकुल समय नहीं लगेगा कि ये झूठी खबर है। लेकिन जो उनके विरोधी हैं उनके लिए ये प्रमाण की तरह है। इसलिए आपको बता दें कि जो दावे विनोद द्वारा किए जा रहे हैं वो देश की निजी लैब द्वारा निर्धारित दामों पर किए जा रहे हैं, क्योंकि भारत में सरकार द्वारा किए जा रहे कोरोना वायरस के टेस्ट बिलकुल फ्री हैं।
भारत सरकार के प्रयासों की विश्व सराहना कर रहा है। WHO तक स्तब्ध है, लेकिन कारवाँ किसके इशारे पर जनता को डरा रही है, यह चिंता का विषय है। जबकि news24 ने नारद पुराण में इस संक्रामक बीमारी के होने के बारे में उल्लेख का उपरोक्त वीडियो के माध्यम से बताया है।  

अब हालाँकि, ये बात सच है कि कोरोना के बढ़ते मामलों को देखकर सरकार ने कुछ प्राइवेट लैब को टेस्ट करने के लिए अप्रूव किया है। जिसमें ICMR ने टेस्ट की अधिकतम कीमत 4500 रखी है। यानी प्राइवेट लैब में ये टेस्ट कराने वाले मरीज को प्राइवेट लैब 4500 तक चार्ज कर सकती हैं। लेकिन ये भी सच है कि सरकार ने इस बात की अपील है कि या तो वे इस टेस्ट को फ्री करें या फिर अपने दामों को कम करें।
ये सब लेफ्ट लिबरलों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ से बिल्कुल उलट है। सरकार ने टेस्ट के दाम 4500 रुपए तय नहीं किए हैं, बल्कि यह केवल दाम की अधिकतम सीमा है। प्राइवेट लैब से इससे काम पैसा लेने की उम्मीद की जाती है। यहाँ स्पष्ट कर दें कि ये स्थिति सिर्फ़ भारत के साथ नहीं है। बल्कि यूएस में भी है जहाँ सरकार ने टेस्ट को मुफ्त किया हुआ है। लेकिन अगर प्राइवेट लैब में चेक करवाया जाता है तो वह पैसा या तो मरीज को देना होता है या फिर वो पैसा उसके इंश्योरेंस से कटता है। इसलिए लेफ्ट मीडिया द्वारा लगाए जा रहे आरोप बिलकुल गलत है कि कोरोना वायरस का टेस्ट भारत में फ्री नहीं है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार चीन के बुहान शहर से निकला कोरोना वायरस का कहर आज पूरे विश्व में फैल चुका है। हर कोई इसक....
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पाकिस्तान में सरकार की लापरवाही के कारण कोरोना का संक्रमण अब विकराल रूप लेने की कगार पर है। मार्च 25 तक वहाँ 1000 कोरोन....
सच ये है कि सरकारी लैब में ये टेस्ट फ्री हैं और प्राइवेट प्रयोगशालाओं में इनके लिए कुछ पैसे लगते हैं। यह 4500 रुपए से ज्यादा नहीं हो सकता। साथ ही सरकार लगातार कहती रही है कि सरकारी प्रयोगशालाओं में जाँच की पर्याप्त क्षमता है।
सरकार को ऐसी भ्रामिक झूठी खबरें प्रकाशित एवं प्रसारण करने वालों के विरुद्ध सख्ती से पेश आना चाहिए। 

दिल्ली प्रेस कर रहा सरिता, कारवाँ, और चम्पक से हिन्दूफ़ोबिया और वामपंथी प्रोपेगेंडा का विस्तार

आज हम उस दौर में रह रहे हैं, जहाँ कट्टरपंथी इस्लाम ने लाखों लोगों की मौत के साथ दुनिया को अपने चंगुल में जकड़ रखा है, जो काफिरों (हिन्दुओं) पर होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए साफ़ तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन ऐसे दौर में भी अधिकांश वामपंथी प्रोपेगेंडा चलाने वाले वेबसाइट उन पर आँख मूँदे हुए हैं। वहाँ उन्हें कोई बुराई नज़र नहीं आती। कोई असहिष्णुता दिखाई नहीं देती क्योंकि समस्याओं के व्यापार पर पलने वाले ऐसे कुटीर उद्योग जो मुख्य रूप से हिन्दुओं, उनके धर्म और संस्कृति को निशाना बनाने पर ही केंद्रित है। दशकों से ऐसे गिरोहों का एकमात्र उद्देश्य ही पीड़ित हिन्दुओं को और प्रताड़ित और अपमानित करना हो चुका है। अब तो ये गोएबल्स धुरंधर प्रचारक इतना आगे बढ़ चुके हैं कि ये अपने नापाक इरादों के लिए बच्चों को बलि का बकरा बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। यहाँ बात हो रही है बच्चों की एक पत्रिका ‘चंपक’ के नवीनतम संस्करण पर।
वैसे प्रकाशक दिल्ली प्रेस द्वारा अपनी मैग्ज़ीनों से हिन्दू फोबिया कोई नई बात नहीं है। इसके किसी भी अंक को देख लो, किसी न किसी मुद्दे पर हिन्दू रीति-रिवाजों, पुराणिक कथाओं पर प्रहार करते कोई न कोई लेख जरूर मिल जाएगा। शायद यही कारण है की ये प्रकाशक अपने इतने प्रकाशनों को आज भी प्रकाशित कर रहा, जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स इतने बड़े समूह की बहुचर्चित पत्रिकाएँ बंद हो चुकी है।  
@OnlyNakedTruth नामक ट्विटर हैंडल से एक ट्विटर यूजर ने चंपक के अक्टूबर संस्करण के कुछ स्क्रीनशॉट ट्वीट किए, जो कि कश्मीर पर केंद्रित है। इसमें ये दिखाया गया है कि अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करने के लिए मोदी सरकार के कदम ने उस विशेष स्थिति को ही समाप्त कर दिया, जिसका कश्मीर दशकों से लाभ ले रहा था। यहाँ यह छिपा है कि वामपंथी और अलगाववादी इससे मलाई काट रहे थे और आतंकी कश्मीर में आश्रय पा रहे थे।

इसी ट्विटर हैंडल द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में से एक में बच्चों से कश्मीर में अन्य बच्चों को लिखने का देखिए कितना ‘मार्मिक’ आग्रह किया गया है।
चंपक पत्रिका के अक्टूबर संस्करण के एक हिस्से में पत्रिका बच्चों से कश्मीर में अपने जैसे अन्य बच्चों के नाम पत्र लिखने और उनसे वहाँ की स्थिति के बारे में पूछने के लिए अपील की गई है। पत्रिका के इस संस्करण में कहा गया है कि कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त किए जाने के बाद घाटी में स्थिति ठीक नहीं है। हजारों सैनिकों और सेना की बटालियनों को कश्मीर भेजा गया है और जगह-जगह कर्फ्यू लगा हुआ है। यहाँ तक कि टेलीफोन लाइनों और इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया गया है। मतलब उनपर बड़ा अत्याचार हो रहा है। आप हमें पत्र भेंजे हम उन्हें निश्चित रूप से कश्मीर के बच्चों तक पहुँचाएँगे। ऐसा करके बच्चों में ये जहर बोने की कोशिश है कि देखिए वहाँ के बच्चे किस हाल में हैं। कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि इससे पहले वहाँ के क्या हालात थे।
चम्पक अक्टूबर एडिशन का एक हिस्सा
अगला स्क्रीनशॉट तो और भी खतरनाक है:
अगले भाग में, चंपक में एक छोटे लड़के की तस्वीर खींची गई है, नाम है हसन जो स्कूल जाना और खेलना चाहता है, जबकि अत्याचारी भारतीय राज्य और वहाँ की सेना उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रही है। कहानी के माध्यम से दुष्प्रचार का पूरा खाका खींचा गया है, लेख में इस बारे में भी बात की गई है कि हसन की माँ घर पर नहीं है और पिता फोन के काम न करने के कारण उनसे संपर्क नहीं कर पाने के कारण सभी दुखी हैं। यहाँ एक बात गौर करने लायक है जैसे फोन का कुछ दिनों काम न करना बहुत बुरी स्थिति है। इससे अच्छा तो आतंकवाद और अलगाववाद ही था।
हालाँकि, इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है, कि घाटी में संचार व्यवस्था पर वास्तव में रोक थी, लेकिन क्यों थी इस पर चर्चा नहीं है। जबकि सबको पता है कि कश्मीर कहीं अधिक अति सूक्ष्म विषय है, जिसे छोटे स्कूली बच्चों को भावुकता के साथ सुनाए गए ऐसे कहानियों के माध्यम से नहीं समझाया जा सकता है। यह कहानी स्पष्ट रूप से बच्चों को कश्मीर में बड़े पैमाने पर होने वाले जिहाद, आईएसआईएस और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में नहीं बताती है, और ये भी नहीं कि अनुच्छेद 370 के कारण घाटी के हिंदुओं, वहाँ के पंडितों, महिलाओं के अधिकारों और अन्य छोटे समुदायों के अधिकारों पर कितना ज़्यादा बुरा प्रभाव पड़ रहा था। ये सभी वर्ग अपने मूलभूत अधिकारों से भी वंचित थे। लेकिन ये ऐसे वामपंथी प्रोपेगेंडा बाजों के लिए कोई समस्या की बात नहीं है बल्कि कुछ दिनों तक फोन का बंद होना सबसे बड़ी समस्या और कश्मीर के लोगों पर अत्याचार हो गया।
शुद्ध भावुकता के साथ बच्चों को ऐसे आधे-अधूरे तथ्य परोसने के कई खतरे हैं, ऐसे कई तथ्य हैं जो चम्पक बच्चों से छिपा रहा है। लेकिन यही तो वामपंथी प्रोपेगेंडा का असली हथियार है। हमेशा उन्हीं तथ्यों या घटनाओं पर बात या बवाल कीजिए जो एजेंडे को शूट करे।
दिल्ली प्रेस और उग्र हिन्दूफोबिया 
 दिल्ली प्रेस, जहाँ से बच्चों की मैगज़ीन चंपक प्रकाशित होता है, उसे अब परंपरागत रूप से जमीनी वास्तविकताओं से दूर कर अक्सर वामपंथी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने के लिए, हिंदुओं और भारतीय संस्कृति के खिलाफ लगातार अभियान चलाने का मुखपत्र बना दिया गया है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस तरह से कहीं न कहीं मासूम बच्चों की जड़ों में ही मट्ठा घोल देने का प्रयास इस वामपंथी एजेंडे के तहत किया जा रहा है।
दिल्ली प्रेस एक बड़ा प्रकाशन हाउस है जो 10 अलग-अलग भाषाओं में 36 पत्रिकाओं के माध्यम से अपना प्रोपेगेंडा और एजेंडा फैला रहा है। दिल्ली प्रेस की स्थापना 1939 में हुई थी और इसकी शुरुआत 1940 में कारवाँ पत्रिका से हुई थी। कारवाँ के कारनामे आपने पुलवामा के समय देखें होंगे जहाँ एक तरफ देश बलिदानियों के दुःख से आहत था तो वहीं कारवाँ हुतात्माओं की जाति तलाश रहा था।
IndiaFacts.org में प्रकाशित एक ओपिनियन में लेखक ने लिखा है:
“ऐसे समय में जब नास्तिकता वयस्कों के बीच भी अलोकप्रिय हो रही थी, बच्चों की पत्रिका, चंपक ने नास्तिक प्रोपेगेंडा पर काम करना शुरू किया, जिसका मुख्य टारगेट हिंदू धर्म था। कई कहानियों के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि कैसे ‘मूर्तियों की पूजा करना अंधविश्वास है’ और कैसे ‘विज्ञान के वर्चस्व वाले विश्व में धर्म पर हावी होने वाली संस्कृति को बदल देना चाहिए।’ यहाँ इनके वामपंथियों के निशाने पर यह धर्म हमेशा ‘हिंदू धर्म’ ही है।
यह सब कुछ नया नहीं है बल्कि कश्मीर पर चंपक की नवीनतम लघु कहानी के जरिए परोसे गए प्रोपेगेंडा जैसा ही है।
सरिता : अश्लीलता और हिन्दूफोबिआ से जुड़े वाक्यांश का उपयोग 
दिल्ली प्रेस, की एक अन्य पत्रिका सरिता तो ‘उग्र हिंदूफ़ोबिया’ के ख़िलाफ़ तो पूरा वसीयतनामा ही प्रस्तुत करती है।
दिल्ली प्रेस की वेबसाइट खुद सरिता को एक प्रमुख पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लिखता है कि यह पत्रिका जो ‘धार्मिक अश्लीलतावाद’ और ‘राजनीतिक सत्तावाद’ के खिलाफ लड़ाई है।
यह देखना दिलचस्प है कि सरिता का वर्णन करने के लिए दिल्ली प्रेस ‘धार्मिक अश्लीलता’ से लड़ने जैसे शब्द का उपयोग कर रहा है। इस मैगज़ीन में छपे हिंदू-विरोधी लेखन को देखते हुए, कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि सरिता का उद्देश्य केवल हिंदू संस्कृति और धर्म के सिद्धांतों पर सवाल उठाना है, जिसे वे अक्सर ‘अंधविश्वास’ के रूप में दिखाते हैं। ‘अश्लीलतावाद’ जब एक गहरी हिंदू-विरोधी पत्रिका का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है, तो इसका अर्थ केवल ब्राह्मणवाद-विरोधी माना जा सकता है, जो कि एक ट्रैप है जो अक्सर वामपंथियों द्वारा हिंदू धर्म को गलत तरीके से वर्णित करने के लिए बड़ी धूर्तता से उपयोग किया जाता है।
सरिता में छपे कई ऐसे लेख हैं जिनके शीर्षक, जो स्पष्ट रूप से हिंदू-विरोधी तिरस्कार और नफरत को प्रदर्शित करते हैं। जैसे- ‘कांवड़िया, अंधविश्वासी परंपराओं के वाहक’“(हिन्दू) पंडितों का भ्रम”, “वास्तु (हिंदू) धर्म की एक बुराई”, धर्म की आड़ में सब्ज़बाग, नए टोटकों से ठगी: मिर्ची यज्ञ और गुप्त नवरात्री’ आदि कुछ ऐसे लेख हैं जो पत्रिका में मौजूद हैं। इन लेखों के शीर्षकों से ही एजेंडा साफ़ दिखने लगता है कि इनके निशाने पर कौन है।
सरिता का वर्तमान मुख्यपृष्ठ धर्म इस प्रकार दिखाता है 
’धर्म’ के होम पेज पर हर एक लेख में हिंदू धर्म को अपमानित करता हुआ लेख देख सकते हैं। 13 लेखों में कुछ के टाइटल हैं- “पुजारी कैसे भक्तों को भटकाते हैं”, “किस तरह से भक्ति के शहर में ‘लड़कियों की बिक्री’ होती है। साधुओं और संतों को एक्सपोज़ करने के नाम पर यह लेख कि ‘धर्म खून से खेलता है।”
वेबसाइट के आर्काइव में आगे भी, ऐसे कई लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि सरिता हिंदुओं के विश्वास का अपमान करने के मिशन पर है।
2016 में प्रकाशित एक लेख 
अनिवार्य रूप से, लेख का शीर्षक है, “अंधविश्वास और पाखंड का महिमामंडन करती श्री दुर्गासप्तशती”
सरिता ने पहले भी और यहाँ तक कि हाल ही में अक्टूबर 2019 में हाल ही में प्रकाशित किए गए गटर के स्तर के हिंदूफोबिक लेखों के बारे में बात करने के लिए देखे जा सकते हैं। हालाँकि, इतने से ही यह स्पष्ट है कि सरिता, दिल्ली प्रेस की प्रमुख हिंदी पत्रिका पिछले कई दशकों से हिंदू धर्म के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़े हुए है। इसे सारी बुराई सिर्फ एक ही धर्म में दिख रही है।
सरिता के हिंदूफ़ोबिया की गाथा नई नहीं है। 1957 में, अरविंद कुमार की कविता “राम का अन्तर्द्वंद” को लेकर एक विवाद उत्पन्न हुआ जो सरिता में ही प्रकाशित हुआ था।
कारवाँ : दिल्ली प्रेस की मूल हिन्दूफोबिआ  
कारवाँ पत्रिका दिल्ली प्रेस की पहली पेशकश थी और इसे 1940 में लॉन्च किया गया था। लेकिन वर्तमान में कारवाँ इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली प्रेस वास्तव में अपने दुर्भावनापूर्ण लेखों के माध्यम से कितना नीचे गिर गया है। पुलवामा आतंकी हमला पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित और नृशंस रूप से किया गया एक आत्मघाती हमला था जिसमें कई भारतीय सैनिकों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया था। पूरा देश ने एकजुट होकर शोक व्यक्त किया। देश ने एक ऐसे आतंकी राज्य पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिशोध की माँग भी की जिसने हमारे सैनिकों के खून से पुलवामा की गलियों को रंग दिया। जब राष्ट्र अपने सशस्त्र बलों के पीछे खड़ा था, तो उस समय कारवाँ उनकी जाति की गिनती में व्यस्त था।
द कारवाँ के एज़ाज अशरफ की एक रुग्ण रिपोर्ट में, उन्होंने हमारे शहीद सैनिकों की ‘जाति का विश्लेषण’ किया था। कारवाँ का एजेंडा तो ऐसा है, जिसमें उन्होंने उन बलिदानी सैनिकों को भी नहीं छोड़ा, जिनकी पाकिस्तान जैसे आतंकी स्टेट द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी।
इसी द कारवाँ ने केवल अपने एजेंडे के लिए अमित शाह, पीएम मोदी, एनएसए डोभाल और उनके बेटे पर कई घटिया आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित किए हैं। और जब खुलासा हुआ तो नए प्रोपेगेंडा की तरफ निकल लिए।
कुल मिलाकर, लाखों पाठकों के साथ, दिल्ली प्रेस ने एक ऐसा व्यापक जाल बुन डाला है। जिससे निकलना शायद अब उससे संभव न हो। सरिता, कारवाँ, जो संभ्रांत अंग्रेजी बोलने वाली भीड़ का मुखपत्र है। दिल्ली प्रेस ने अब अपनी प्रोपेगेंडा की धार और तेज करने के लिए स्पष्ट रूप से अब बच्चों की पत्रिका चंपक को भी अपने एजेंडे का हथियार बनाकर मासूमों के कोमल मन पर भी अपनी विषबेल फ़ैलाने के पथ पर अग्रसर है।
आज सूचना युद्ध के युग में दिल्ली प्रेस ने एक ऐसे पक्ष को चुना है जो हिन्दफोबिया से ग्रसित और वामपंथी दूषित एजेंडे का पोषक है। आज जब एक ऐसा दौर चल रहा है जहाँ आतंक को बढ़ावा देने के लिए एक देश जी जान से लगा है तो इस दौर में आपको सोचना अपने समाज, अपने देश और अपने बच्चों के भावी भविष्य के बारें में। हम सबको पता है यह वामपंथी एजेंडे का पोषक पक्ष जो हिंदुओं के लिए खड़ा नहीं है, और न ही यह भारत के लिए खड़ा है। तो हमें खुद अपने लिए खड़ा होना होगा। और ऐसे प्रोपेगेंडा से निपटना होगा। ये वामपंथी गिरोह जहाँ भी जहर फ़ैलाने की कोशिश करें उसे पूरी सजगता से रोकना होगा। इसी में देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों की भलाई है।